Saturday, April 17, 2010

बधाई! हम विकास कर रहे हैं


ट्रैफिक जाम तो मेरठ और मुरादाबाद में भी लगता था. लेकिन ऐसा मेरे साथ कभी नहीं हुआ कि जाम की वजह से ऑफिस छूट जाये और बीच रस्ते घर वापस लौटना पड़े. कल जब गाज़ियाबाद से दिल्ली के लिए जब मैं रोज़ की तरह ऑफिस को निकला तो नए बस अड्डे से कुछ दूर पहले ही ट्रैफिक जाम मिला. ट्रैफिक जाम कोई नई चीज़ तो थी नहीं सो आगे बढ़ते रहने में ही मैंने भलाई समझी. लेकिन थोड़ी देर में ही मुझे जाम का भयानक रूप नज़र आ गया. बेसब्रों ने लेन को तोडना शुरू किया और रोंग साइड दे गाड़ियाँ निकालनी शुरू कर दी. पहले पहल तो मुझे ये गलत लगा, लेकिन भीषण गर्मी और ऑफिस पहुचने की जल्दी को देखते हुए मैंने भी रौंग साइड में बाइक घुसेड दी. एक के बाद एक लेन तोड़ने का सिलसिला शुरू हो गया. पहले बाइक वालों ने हिम्मत दिखाई, फिर कार वालों ने और फिर बस और ट्रक वाले भी कहाँ पीछे रहने वाले थे. एक भयंकर जाम के लिए शानदार पटकथा लिख दी गयी. उसके बाद जो हुआ वो देखने लायक था. सर पे तपता सूरज और वाहनों से उठता जहरीला धुआं ऐसी कॉकटेल बना रहा था कि पूछो मत. हर एक को जल्दी थी. बस किसी तरह अपनी गाड़ी निकल जाये बाकि सब जाएँ भाड़ में. खैर इस होड़ में जाम कुछ इस तरह से फंसा कि मैंने मौका पाकर अपनी बाइक वापस मोड़ ली. क्योंकि अगर आधा घटे में भी जाम खुलता तो आगे का सफ़र तय करने में १२ बजने ही थे, तो वापस लौटने में ही भलाई थी. अगर उस समय बाइक न मोड़ता तो फिर बाइक मोड़ना नामुमकिन हो जाता. खैर शाम को पता चला की जाम का झाम दोपहर दो बजे तक लगा रहा.
जनाब ये हाल है अपने एनसीआर का. चाहे जिधर निकल जाओ, पाँव रखने की जगह नहीं है. ये हाल तो तब है जब हजारों कि तादाद को मेट्रो ने अपने आप में सोख लिया है. अगर मेट्रो की सवारी भी सड़क पर आ जाये तो सोचो क्या हाल हो. अरे साहब हम विकास कर रहे हैं. हमने न हवा को शुद्ध छोड़ा है न पानी को. कुछ भी हो लेकिन जीडीपी बढ़नी चाहिए. सो लो अब जीडीपी का मज़ा.

कॉमनवेल्थ खेलों के मद्देनज़र हमने खूब विकास कराया है. पूरी दिल्ली कि काया पलट कर दी है. अरबों के वारे-न्यारे हो गए हैं. जब तक ये खेल चलेंगे तब तक हमें ऐसी तस्वीर पेश करनी है कि हमसे विकसित और सभ्य कोई नहीं. दिल्ली सरकार का एक विज्ञापन गज़ब का है. आपको स्टेनलेस स्टील से बने बस अड्डों पर दिख जायेगा. उसमें सरकार लोगों को तहजीब सिखा रही है. विज्ञापन कहता है "रिंगा रिंगा रोज़, बात बात में मुंह से निकले सॉरी, थैंक-यू, प्लीज़." इस से ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि देश की राजधानी का सिविक सेन्स कैसा होगा.

कॉमन वेल्थ खेलों के लिए बिलकू वैसे ही इंतजाम किये गए हैं जैसे कोई कैंसर के मरीज़ के चेहरे पर ढेर सारा पावडर लगा कर उसको स्वस्थ्य दिखलाने की कोशिश करे. भारत में अब तक की सरकारों ने विकास की जो सतही निति अपनाई है उससे वापस लौटना होगा. ग्रास रूट लेवल से विकास करेंगे तब इसका सही चेहरा नज़र आयेगा. हम विकास के लिए पश्चिमी मॉडल का अनुसरण कर रहे हैं, जहाँ जनसँख्या बेहद कम है और संसाधन बेहद ज्यादा. भारत जितनी जनसँख्या और संसाधन किसी भी विकसित देश को दे कर देख लो, हफ्ते भर में न जीभ बहार आ जाये तो बात है.

भारत के विकास के लिए भारतीय मॉडल को ही अपनाना जरुरी है. वही मॉडल जिसकी परिकल्पना महात्मा गाँधी ने की थी, जिसका परिकल्पना बाबा रामदेव कर रहे हैं. विकास का वर्तमान ढर्रा देश को रसातल में ले जाने के सिवा कुछ नहीं देने वाला है. 

2 comments:

  1. "भारत जितनी जनसँख्या और संसाधन किसी भी विकसित देश को दे कर देख लो, हफ्ते भर में न जीभ बहार आ जाये तो बात है."

    "भारत के विकास के लिए भारतीय मॉडल को ही अपनाना जरुरी है. वही मॉडल जिसकी परिकल्पना महात्मा गाँधी ने की थी, जिसका परिकल्पना बाबा रामदेव कर रहे हैं. विकास का वर्तमान ढर्रा देश को रसातल में ले जाने के सिवा कुछ नहीं देने वाला है."

    सही है।

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  2. मेरी तरफ से भी बहुत बहुत बधाई...अगली बार जाम लगे तो हफ़्ते बाद भी खुल सकता है..जितनी तरक़्क़ी उतने लंबे जाम.

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