Tuesday, October 5, 2010

अयोध्या का फैसला!

श्री राम लला विराजमान 
जून की तपिश तो थी ही, लेकिन अयोध्या में विवादित भूमि के मालिकाना हक के मसले पर सुनवाई कर रहे इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के तीनों जज दोहरी तपिश झेल रहे थे. जस्टिस सुधीर अग्रवाल, जस्टिस एस यू खान और जस्टिस धर्मवीर शर्मा तीनों लम्बे समय से इस केस की सुनवाई कर रहे थे. लेकिन अब इस केस को और ज्यादा खींचना नामुमकिन था. दोनों पक्ष अपनी अपनी ओर से पूरी सफाई पेश कर चुके थे. अब कहने सुनने को कुछ रह नहीं गया था. यूँ तो मालिकाना हक के तमाम केस देश की अदालतों में चल रहे हैं, तमाम केसों में फैसले भी दिए जा चुके हैं. बिरला खानदान से लेकर नुक्कड़ के छग्गन तक तमाम मामलों में अदालत ने मालिकाना हक के फैसले सुनाये हैं. लेकिन इस केस का फैसला सुनाने में अदालत को पसीने भी आ रहे हैं और उसको नर्वेसनेस भी है. कहने को तो ये मामला अयोध्या के बेहद आम लोगों ने ही दर्ज कराया था. लेकिन ये मुकदमा इतना ख़ास हो चुका था की इससे ७५ करोड़ से ज्यादा हिन्दू और 25 करोड़ से ज्यादा मुसलमान खुद-बा-खुद जुड़ते चले गए. किसी एक के हक में फैसला देने का मतलब था एक बहुत बड़े तबके को खुश करके एक बहुत बड़े तबके को नाराज करना. तीनों ही जज धर्मसंकट में थे. करें तो क्या करें. ये भावनाओं से जुड़ा मुद्दा था, आस्था से जुड़ा मामला था, और भारत जैसे भावनात्मक देश में आस्था बहुत ज्यादा मायने रखती हैं. आस्था के लिए इस देश के नागरिक कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं. और फिर इसका फायदा उठाने वाले भी कम नहीं हैं. उनको तो बस एक मौका चाहिए लोगों की भावनाओं को हवा देने का. इस देश में इतने दंगे यूँ ही नहीं हो गए.

आज फिर अयोध्या मामले की तारीख है. तीनों जज अपने-अपने चैंबर में पहुँच गए हैं. जून की तपती गर्मी और उस पर अयोध्या का केस. सुनवाई में अभी वक़्त है. तीनों जज समय से पहले ही पहुँच गए हैं. जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने अपने चपरासी को भेजकर चाय के बहाने अयोध्या केस की सुनवाई कर रहे बाकी के दोनों जजों को भी अपने चैंबर में बुलवा लिया. थोड़ी ही देर में दोनों जज जस्टिस अग्रवाल के चैंबर में पड़ी मेज एक इर्द-गिर्द बैठे थे. जस्टिस अग्रवाल ने चपरासी को चाय के लिए इशारा किया और अपने दोनों साथियों से बतियाने लगे. शुरुआत हल-चाल पूंछने से हुई और धीरे धीरे गंभीर डिस्कशन होने लगा, जो घूमते-घूमते अयोध्या केस पर आकर टिक गया. इतने में चपरासी चाय लेकर आ गया. जस्टिस अग्रवाल ने उसको निर्देश दिया कि अभी किसी को अन्दर नहीं आने देना, जरूरी मीटिंग चल रही है.

"तो फिर खान साहब अब इस मामले में क्या किया जाये" , जस्टिस शर्मा ने जस्टिस खान से पूछा.

"देखिये अब और तारीख देना मुमकिन नहीं है. अब तो गेंद पूरी तरह हमारे ही पाले में है. ६० साल हो गए हैं, फैसला तो देना ही होगा.", जस्टिस खान ने अपनी राय दी.

जस्टिस अग्रवाल ने आगे जोड़ा "लेकिन फैसले का मतलब समझते हैं न आप. मामला कितना सेंसिटिव है ये तो हम सभी समझते हैं."

"सेंसिटिव होने का मतलब ये तो नहीं कि फैसला नहीं दिया जायेगा. अदालत को तो अपना काम करना ही पड़ेगा. बाकी जिम्मेदारी सरकार की है." जस्टिस शर्मा ने थोड़ा मजबूती से कहा.

"दरअसल, हम तीनों ही इस केस की संजीदगी को अच्छी तरह समझते हैं. अदालत की सुनवाई पूरी तरह से निष्पक्ष रूप से चली है. उस पर कोई ऊँगली नहीं उठा सकता. लेकिन जैसे ही फैसला किसी एक के पक्ष में आएगा उस पर थोड़ी बेचैनी जरूर हो सकती है.", जस्टिस खान ने फैसले के बाद के हालातों की हलकी सी विवेचना की.

"कहाँ खान साहब. अब ज्यादा गर्मी बची नहीं है. ६० सालों में दोनों पक्षों के अन्दर की बेचैनी तकरीबन ख़त्म हो चुकी है. अब वो लोग भी इस मुक़दमे को और लम्बा नहीं खींचना चाहते. सब के सब फैसला सुनना चाहते हैं. मुझे नहीं लगता कि कोई बहुत ज्यादा असर पड़ने वाला है.", जस्टिस खान की बात पर जस्टिस शर्मा ने अपने ख्याल जताए.

इस पर जस्टिस अग्रवाल ने सुझाया, "देखिये, है तो ये मामला पूरी तरह संवेदनशील ही. ये किसी की संपत्ति की बंटवारे के मानिंद तो है नहीं कि थोड़ा एक भाई को दे दिया थोड़ा दूसरे को. नेताओं ने इस मुद्दे को जिस तरह हवा दे राखी है उससे इस मामले का फैसला अब भारत की सीमाओं से बहार भी असर डालेगा. इसलिए मुझे तो लगता है कि इस मसले पे फैसला देते वक़्त हमें बीच का रास्ता अख्तियार करना चाहिए."

"बीच का रास्ता मतलब?" जस्टिस शर्मा ने थोड़ा अचरज से पूछा.

"मतलब ये कि इतने सैकड़ों साल बाद इस बात का निर्णय करना कि ये जमीन किसकी है एक कठिन काम है. खासतौर से जब मामला धर्म से जुड़ा हो. इसलिए ऐसा फैसला आना चाहिए कि किसी एक पक्ष के फेवर में फैसला सुनाने के बजाय दोनों पक्षों को कुछ कुछ हिस्सा दे दिया जाए.", जस्टिस अग्रवाल ने साफ़ किया.

"लेकिन क्या ये न्याय होगा, ६० साल तक क्या दोनों पक्ष ऐसे ही फैसले के लिए लड़ रहे हैं. ये तो फिर से वैसी ही स्थिति हो जाएगी.", जस्टिस शर्मा ने थोड़ी आपत्ति की.

"देखिये आप खुद ही मान रहे हैं कि मसला संवेदनशील है. किसी एक पक्ष को पूरी जमीन का मालिकाना हक़ देने से गड़बड़ हो सकती है. अगर फैसला एक के हक़ में दिया जाए तो हिन्दुओं का पक्ष मजबूत है. चाहे सबूत देखे जाएँ या फिर इतिहास. वैसे भी अयोध्या और राम का नाता मुग़लों के आने से हजारों साल पहले का है. उस दृष्टि से पूरी की पूरी अयोध्या राम की ही है. लेकिन बाबरी मस्जिद से मुसलमानों की भी भावनाएं जुडी हैं. मस्जिद के गिराए जाने से एक ठेस उनको पहले ही पहुँच चुकी है. इस तरह का फैसला देकर उनको एक और ठेस लगेगी. तो सोच लीजिये. आप बताइए जस्टिस खान क्या मैं गलत कह रहा हूँ."

"नहीं जनाब, गलत तो नहीं कह रहे. अगर केवल हिन्दुओं के पक्ष में फैसला दिया गया तो आने वाली मुस्लिम पीढियां मेरा नाम ले-लेकर मुझे कोसेंगी. बात आपकी सही है. बीच का रास्त अख्तियार करके मामले को निबटाया जाए. बाकी का सुप्रीम कोर्ट जाने. हमारे पाले से गेंद निकल जायेगी.", जस्टिस खान ने जस्टिस अग्रवाल से इत्तेफाक जताया.

"देखिये हम तीनों एक केस की बारीकियां अलग अलग दर्ज कर ही रहे हैं. फैसला भी अलग अलग सुनाया जाए.", जस्टिस अग्रवाल ने अपना प्लान बताया.

"सो किस तरह", जस्टिस शर्मा ने पूछा.

"देखिये शर्मा जी, आप १ अक्टूबर को रिटायर हो रहे हैं, तो आप पूरी तरह हिन्दुओं के पक्ष में फैसला सुनाएँ. जस्टिस खान अपने फैसले में थोड़ा मुस्लिमों का पक्ष लेते नज़र आयें और मैं आप दोनों के बीच का रास्ता ले लूँगा. इससे बात थोड़ी बन जाएगी." जस्टिस अग्रवाल ने सुझाया.

"लेकिन राम लला का क्या? वो वहां रहेंगे या हटाये जायेंगे? असली मसला तो यही है.", जस्टिस शर्मा ने पूछा.

"राम लला को हटाया जाना ठीक नहीं है. अपनी ही अयोध्या में रहने के लिए राम लला को केस लड़ना पड़ रहा है. वो जगह तो राम लला को ही मिलनी चाहिए. बाकी की जगह को बाँट दो. इसमें तीन पक्ष हैं. तीनों को बराबर बराबर दे दो." जस्टिस अग्रवाल ने स्पष्ट करते हुए जस्टिस खान की ओर देखा.

"हम्म! देखिये पहले रहा तो वहां पर मंदिर ही होगा. मस्जिद तो बाद में ही बनी है. लेकिन किसने मंदिर गिराया और किसने मस्जिद बनाई इसको लेकर मैं अभी भी क्लियर नहीं हूँ. तो इस लिहाज से अगर मुख्य स्थान राम लला को दे भी दें तो चलेगा. लेकिन ये स्थान उनको देने के पीछे मेरे पास अलग कारण होंगे. मैं वो कारण नहीं मानता जो हिन्दू पक्ष के वकील दे रहे हैं." जस्टिस खान ने अपनी स्थिति साफ़ की.

"लो फिर तो मसला हल ही हो गया. फिर ऐसा ही करते हैं हम तीनों अलग अलग फैसला लिख लेते हैं. फैसला सुनाने की तारीख जस्टिस शर्मा की रिटायर्मेंट डेट के आस-पास रख लेते हैं. इससे दो बातें होंगी. एक तो ये कि रिटायर्मेंट डेट के चलते फैसला सुनाना मजबूरी हो जाएगी और दूसरा ये कि जस्टिस शर्मा हिन्दुओं का साफ़ फेवर करके रिटायर हो जायेंगे. इससे आगे उनकी निष्पक्षता पर आगे कोई ऊँगली भी नहीं उठाएगा." जस्टिस अग्रवाल ने ख़ुशी जाहिर की.

"हम्म! अगर परिस्थितियों ने साथ दिया और हम इस पेचीदे केस का फैसला सुनाने में सफल रहे तो इतना तो तय है कि हम तीनों एक इतिहास रचेंगे. हमारे नाम हमेशा के लिए इस केस के साथ जुड़ जायेंगे.", थोड़ी ख़ुशी जस्टिस शर्मा को भी थी.

"बिलकुल सही फरमा रहे हैं आप. लेकिन हमारा रास्ता इतना आसान है नहीं जितना जस्टिस अग्रवाल को लग रहा है." जस्टिस खान ने कहा.

"आसान तो कुछ भी नहीं खान साहब. फैसले की डेट तो दो, उसका रियक्शन देख कर पता चल जायेगा कि राह कितनी कठिन है. चलिए कागज पत्तर संभालिये, कोर्ट का समय हो गया है."

और दोनों जज अपने-अपने चैंबर में चले गए. कुछ मिनट बाद तीनों अपने चैम्बरों से निकले और कोर्ट में सुनवाई के लिए चल दिए, जहाँ अयोध्या मसले पर दोनों पक्ष उनका इंतजार कर रहे थे.

तभी मेरे मोबाइल में अलार्म बजा और मेरी आंख खुल गयी. सुबह के ६:०० बजे थे. लेकिन मुझे अपने कई सवालों का जवाब मिल चुका था.

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