Friday, March 18, 2011

जनगणना में हिजड़ों की तरह नेताओं की भी अलग कैटेगरी में गिनती हो!!!


आज जब मेट्रो से ऑफिस जा रहा था, तो पास बैठे मेरे सहयात्री के हाथ में अंग्रेजी का एक प्रतिष्ठित अखबार था। सीट ग्रहण करते ही उन्होंने अखबार खोला और पहले पेज से मुखातिब हुए। मैंने सोचा चलो अपना भी जुगाड हो गया और अपन भी उनके अखबार में झांकने लगे। पहले पेज की पहली खबर सांसद रिश्वत कांड की थी। संसद भवन में हंगामे की तस्वीर और भारती राजनीति पर कालिख पोतती एक हेडलाइन। वैसे क्रिकेट वर्ल्डकप के चलते लोगों को खेल पृष्ठ आजकल ज्यादा भा रहा है, लेकिन मैंने देखा कि आसपास खड े दो और सज्जन  अखबार में झांक रहे थे और विकीलीक्स द्वारा खोले गए इस कथित रिश्वत कांड की खबर को पढने की कोशिश कर रहे थे। अब मुझे मिलाकर कुल चार लोग इस खबर को पढ रहे थे। क्योंकि अखबार अंग्रेजी का था तो इसका अर्थ था कि चारों पाठक औसत दर्जे से ज्यादा पढ े-लिखे थे। मेट्रो में उस समय भीड ज्यादा नहीं थी। मुझे लगा कि ज्यों ही हम चारों खबर को पढ लेंगे तो एक बहस शुरू होगी, और ये अच्छी बहस हो सकती है। मैंने इस आशा से बाकी के पाठकों से नजरें भी मिलाईं, उन्होंने भी मेरी ओर देखा। लेकिन ये क्या किसी की ओर से कोई टिप्पणी नहीं। उनमें से एक सज्जन बस मुस्कुरा भर दिए। अखबार वाले भाई साहब ने पन्ना पलटा और अगली खबरें पढ ने लगे, तीसरे सज्जन मेट्रो की बड ी-बड ी खिड कियों से बाहर के नजारे देखने लगे। तीनों पर उस खबर का कोई खास असर नहीं पड ा। उनके चेहरे पर एकदम निर्लिप्त भाव थे। बाकी बचा मैं, सो मैंने भी अपना मोबाइल निकाला और उसमें सॉलिटेयर गेम खेलने लगा। जीभ की खुजली नहीं मिट पाई। तमाम तरह की बातें जुबान पर आकर ही रह गईं।
 
मेरे लिए ये एक परिवर्तन जैसा था। पहले लोग खबरों पर कमेंट जरूर देते थे। राजनीतिक बहस अगर शुरू हो जाए तो फिर बघिया उधेड़ कर रख देते थे। ट्रेनों और बसों में ऐसे पॉलिटिकल डिस्कशन होते थे मानो संसद का सदन हों। वैसे काफी समय से जनरल डिब्बे में सफर नहीं किया, लेकिन पिछले दिनों स्लीपर क्लास से लखनऊ गया था, उसमें भी एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी। आपस में कोई डिस्कशन नहीं। जो परिवार के साथ थे बस वे अपने परिवार वालों से बात कर रहे थे। बीच-बीच में या तो किसी के बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी या रेल के डिब्बे की संकरी गली में चाय-पानी बेचते फेरी वालों की पुकारने की आवाज।
 
अब अगर कोई ये कहे कि लोग एकांकी हो गए हैं या उनके अंदर का मिलनसार भाव खत्म हो रहा है या वे बेकार की बहस में पड़ना नहीं चाहते तो सही नहीं होगा। कितना भी विकास क्यों न हो गया हो, भारतीय समाज अभी निष्ठुर नहीं हुआ है। उसके अंदर का मिलनसार भाव अभी भी जीवित है। अगर समाज में राजनीतिक बहसें खत्म हो रही हैं जो उसका एक मात्र कारण यही है कि लोग अब राजनीति को बहस के लायक नहीं समझते। सुबह से शाम तक न्यूज चैनलों पर बहस ही बहस सुनाई देती है। लेकिन किसी बहस का कोई नतीजा निकलता नजर नहीं आता। सारे गणमान्य नेतागण अपनी ढपली और अपना राग आलाप रहे हैं। किसी नेता की बात में अब इतना दम बचा नहीं है कि लोग उसका विश्वास करे। एक-एक करके हमाम में सब के सब नंगे नजर आए। ९० के दशक राजनीतिक उथल-पुथल और अस्थिरता का दशक रहा। उस समय भाजपा ने लोगों को सुराज का सपना दिखा रखा था। लेकिन १९९८ में बनी भाजपा की गठबंधन सरकार भी वैसा कुछ खास कर नहीं पाई जैसी लोगों को उम्मीद थी। लोगों के हिस्से में केवल बातें और आश्वासन ही आए। हम देश को अच्छा शासन दे रहे हैं इस बात को सिद्ध करने के लिए सरकारें को विज्ञापनों और होर्डिंग्स का सहारा है। लेकिन अगर शासन वास्तव में अच्छा होता तो वो लोगों को खुद-ब-खुद नजर आता। फिर ढोल पीटने ही जरूरत नहीं पड ती। नौबत यहां तक आ गई है कि सरकार के १०० दिन पूरे करने पर जश्न, छह महीने पूरे करने पर जश्न, एक साल पूरा करने पर जश्न, मानो सरकार में बैठे लोगों को ये उम्मीद ही न रही हो कि सरकार इतने दिन चल भी जाएगी। एक पार्टी भी ऐसी नहीं बची है जो कोई राजनीतिक आदर्श स्थापित करती दिख रही हो। इस बहुदलीय व्यवस्था में पूरी राजनीति आरोप-प्रत्यारोप, लाल-नीली बत्ती, दल-बदल और दलाली तक सिमट कर रह गई है।
 
घोटाले और भ्रष्टाचार भारतीय लोकतंत्र का अभिन्न अंग बन चुके हैं। अब कोई घोटाला या रिश्वत कांड खुलने पर लोगों को अचंभा नहीं होता। लोग ये मानकर चल रहे हैं कि सफेद खादी में घूम रहा एक भी आदमी विश्वसनीय नहीं है। जिन लोगों के दामन साफ लग रहे हैं ये महज संयोग मात्र है, उसका किसी सच्चाई या वास्तविकता से कोई ताल्लुक नहीं है। अगर फिर भी कोई नेता ईमानदार पाया जाता है तो फिर वह नेता नहीं कुछ और है। जनगणना में इस बार जिस तरह हिजड़ों की अलग कैटेगरी में गिनती हो रही है, उसी तरह नेताओं के लिए भी अलग से एक कैटेगरी बनानी चाहिए। नेताओं को आम जनता के साथ गिनना, सरासर आम लोगों का अपमान है। इसके लिए लोगों को आवाज बुलंद करनी चाहिए। लेकिन लोगों ने राजनीति पर ऐसी खाक डाल दी है कि वे राजनीति से उम्मीद ही छोड े बैठे हैं। अगर यही आलम रहा तो चुनावों में वोटिंग प्रतिशत घटता चला जाएगा और वह दिन ज्यादा दूर नहीं नजर आ रहा।

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