Tuesday, March 29, 2011

चुनाव का फंदा और उद्योपतियों का चंदा!!!


अंग्रेजी में एक कहावत है ‘‘नो लंचेज आर फ्री!’’ यानि कोई भी भोज मुफ्त नहीं होता। उसके पीछे कोई न कोई स्वार्थ जरूर जुड़ा होता है। भारतीय राजनीति को ये बात अच्छी तरह पता होने के बावजूद हमारी राजनीति फ्री के भोज खाने में मगन है। जी मेरा इशारा पाॅलिटिकल फंडिंग की तरफ है। भारत की पाॅलिटिकल पार्टियां अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए इस कदर उद्योगपतियों पर निर्भर हो गई हैं कि सत्ता हासिल करने के लिए वे उद्योगपतियों के हाथ की कठपुतली बन जाती हैं। उद्योगपति किस कदर शासन व्यवस्था में अपना हस्तक्षेप करते हैं इसका नमूना अभी हाल ही में राजा-राडिया-बरखा-टाटा प्रकरण में देश के सामने आ ही चुका है। मंत्रीमंडल के चयन में भी उद्योगपति दखल देते हैं, जोकि केवल प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है। इसका एकमात्र कारण पाॅलिटिकल फंडिंग ही है। जो पैसा उद्योगपति चंदे के तौर पर जिन पार्टियों को देते हैं, सत्ता हासिल करने के बाद उनसे पाई-पाई वसूलने की कोशिश करते हैं। कोई भी चंदा निःस्वार्थ भाव से या राष्ट्र निर्माण की भावना से नहीं दिया जाता।


शायद आपने सुना होगा काका जोगिंदर सिंह उर्फ धरतीपकड़ के बारे में। उन्होंने देश हर एक चुनाव लड़ा था। पार्षदी से लेकर राष्ट्रपति तक, लेकिन कभी नहीं जीते। वो किसी पार्टी से नहीं जुड़े थे, बस निर्दलीय खड़े हो जाते थे। चुनाव लड़ना उनकी हाॅबी थी। उस समय चुनाव लड़ने की फीस भी बहुत ज्यादा नहीं थी। वे अपना परचा दाखिल करते और अकेले ही निकल पड़ते प्रचार करने पैदल-पैदल। कंधे पर झोला और झोले में कुछ किशमिश और छुआरे। दिनभर लोगों से मिलते और वोट मांगते। बच्चों को किशमिश और छुआरे देते। उनको चुनाव प्रचार का वही अंदाज था और वही खर्च भी। चुनाव में लगाने के लिए काका के पास करोड़ों की रकम नहीं थी। लेकिन क्या यही कारण था कि काका कोई चुनाव नहीं जीत पाए? काका के चुनाव न जीतने के पीछे धन के अलावा और भी कई कारण थे। लेकिन आज चुनाव जीतने और हारने के पीछे सिर्फ एक ही मकसद है और एक ही कारण है और वो है- धन!

आज चुनाव जीतने के लिए धन को सबसे बड़ा मापदंड माना जाता है और चुनाव जीतने के बाद उस धन का कई गुना वापिस अर्जित करना उस नेता का जन्म सिद्ध अधिकार होता है। भारतीय राजनीति में यही तमाशा सालों से चला आ रहा है। चुनाव जीतने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया जाता है। कोई मंगलसूत्र बांट रहा है तो कोई टीवी दे रहा है। कोई अखबार वालों को पैसा बांटकर पेड न्यूज छपवाता है तो कोई पीआर फर्म की मदद से जीत सुनिश्चित करता है। और इतना मोटा खर्च करने के लिए रकम ली जाती है चंदे में, यानि देश के उद्योगपतियों से। उद्योगपति भी सभी पार्टियों को थोड़ा-थोड़ा बांटते हैं। कोई न कोई तो सत्ता में आ ही जाएगी। किसी एक को देकर और किसी दूसरे को न देकर क्यों बैर मोल लिया जाए। पैसा तो है ही, 80 जी में छूट भी मिल जाती है, सो सभी को खुश रखा जाए। धीरुभाई अंबानी कहते थे कि एक उद्योगपति के सभी पार्टियों के साथ अच्छे रिश्ते होने चाहिए। लेकिन उनकी बात उनके बेटे अनिल अंबानी ने नहीं मानी। एक बार वो अमर सिंह की बातों में आकर सपा के समर्थन से राज्यसभा की शोभा बढ़ाने पहंुच गए थे, लेकिन थोड़े समय में ही उनको अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया।

भारतीय राजनीति में ये जो उद्योगपतियों की दखल है, ये कहीं न कहीं सिस्टम को कमजोर बना रही है। कोई पार्टी इतनी स्वावलंबी नहीं है जो अपने दमखम पर चुनाव लड़ सके। अगर वामपंथी पार्टियों को छोड़ दिया जाए तो हर पार्टी को उद्योगपतियों से ही जीवन जीने के लिए आॅक्सीजन मिल रही है। धनबलियों की धन की बैसाखी को हटा लिया जाए तो कोई पार्टी चुना न लड़ पाए। चुनावी खर्च हर साल सुरसा के मुख की तरह बढ़ रहा है। उत्तर प्रदेश में पिछले दिनों ग्राम पंचायत के चुनाव संपन्न हुए। अभी होली पर गांव गया तो गांव की बहुओं की वोट मांगते पोस्टर और होर्डिंग्स लगे दिखे। जिन बहुओं को आज तक गांव के किसी बुजुर्ग ने नहीं देखा था, वही बहुएं चुनाव प्रचार के नाम दीवारों पर चिपकी थीं। चुनाव में प्रचार के नाम धन की गंगा बहाना किस तरह जरूरी हो गया है, इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं। ग्राम प्रधान से लेकर प्रधानमंत्री तक का सफर आप बिना धन बहाए नहीं तय कर सकते। जब कुछ आदर्शवादी नेता कभी-कभी चंदा न मांगने की जिद पर अड़ जाते हैं, लेकिन उनके चेले उनको बार-बार व्यवहारिक बनने का हवाला देकर स्वयं चंदा वसूल कर लाते हैं।

यूं तो चुनाव आयोग कई दफै चुनावी खर्च कम करने के लिए संसद के पास प्रस्ताव भेज चुका है। लेकिन हर मसले पर अलग राय रखने वाले राजनीतिक दल इस मसले पर एकमत हो जाते हैं और उस प्रस्ताव को देखना तक मुनासिब नहीं समझते। चुनाव लड़ने के नाम पर पार्टियां न केवल मोटा चंदा उगाती हैं बल्कि उनके बड़े नेता उद्योगपतियों के निजी हेलीकाॅप्टरों का भी इस्तेमाल करते हैं। अब सोचिए जब उद्योगपतियों से इतना लोगे तो बदले में कुछ भी न दोगे। ये पूरी सृष्टि ही लेन-देन के सिद्धांत पर टिकी है। सो, नेताओं को सत्ता मिलने के बाद पग-पग पर उद्योगपतियों का फेवर करना पड़ता है। वैसे तो इस देश को कृषि प्रधान देश कहा जाता है, लेकिन जब आम बजट का समय आता है, तब देश के वितमंत्री बड़े-बड़े उद्योगपतियों से रायशुमारी करते हैं। क्या आज तक उन्होंने बजट से पहले किसानों की राय ली? किसानों और आम आदमी की राय भला क्यों लें, वे कौनसे चुनाव लड़ने के लिए चंदा देते हैं। जो देगा सो लेगा।

अजीब सी बात है कि आजादी के 64 साल बाद भी किसी पार्टी ने इस चंदा सिस्टम का विकल्प नहीं तलाशा। ऐसा विकल्प जिससे उन्हें किसी उद्योगपति के एहसानों के नीचे न दबना पड़े। हमारे गांव में कहावत है कि- जब मिले यूं तो करे क्यूं! जब पार्टियों का खर्चा-पानी चंदे से चल ही रहा है तो ज्यादा दिमाग लगाने के लिए क्या गांधी जी कह गए हैं।

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