Sunday, May 29, 2011

क्या प्रसंशा के लिए केवल महिला होना की काफी है?

कल अचानक एक अखबार में मृणाल पांडे जी का लेख पढ़ने को मिला। लेख में वो जयललिता और ममता के मुख्यमंत्री बनने पर नारी शक्ति को बधाई देते हुए न केवल खुशी का इजहार कर रही थीं, बल्कि ममता और जाया के साथ उन्होंने मायावती के भी तारीफों के पुल भी बांधे हैं। वे केवल इस बात से ही फूली नहीं समा रही हैं कि विजेता के रूप में महिलाएं उभर कर आई हैं। इन तीन महिला मुख्यमंत्रियों को उन्होंने तीन देवियां कहकर पुकारा है। अब ममता के बारे में तो नहीं कह सकते क्योंकि वे पहली बार सत्ता में आई हैं, लेकिन माया और जयललिता वर्तमान और भूत में किस तरह की मुख्यमंत्री साबित हुई हैं ये सारा देश जानता है। अब चूंकि वे महिलाएं हैं बस इसलिए उनकी तारीफों के पुल बांधे जाएं ये तो कोई तुक न हुई। 

मायावती ने भ्रष्टाचार के मामले में अपने पूर्ववर्ती सभी मुख्यमंत्रियों के रिकाॅर्ड तोड़ दिए हैं। जयललिता ने भी अपने पिछले कार्यकालों के दौरान जो अकूत संपत्ति कमाई है वो भी किसी से छिपी नहीं है। उनकी हजारों साडि़यों और सैकड़ों जोड़ी चप्पलों की कहानी देश की गरीब जनता को भलीभांति याद है। इन दोनों ने ही महिला होते हुए महिलाओं के लिए भी कुछ ऐसा उल्लेखनीय नहीं किया जिसपर फख्र किया जाए। न ही अपने-अपने प्रदेश की आवाम को ही कुछ खास दिया जो तारीफ के कसीदे कसे जाएं। जैसा पुरुषों का शासन होता है, कमोवेश वैसा ही इन महिलाओं का शासन भी है। वो तो जनता के पास विकल्पों की कमी और चुनावी समीकरण ऐसे बैठते हैं कि इन दोनों की बार-बार ताजपोशी हो जाती है। इनमें केवल ममता बनर्जी एक ऐसी महिला हैं जिन्होंने रेल मंत्री रहते हुए भी अपनी सादगी को नहीं छोड़ा। ममता और जया-माया में बहुत बड़ा फर्क है। इन तीनों को एक ही श्रेणी में रखकर उन पर प्रशंसा के फूल चढ़ाना कहां तक सही है मुझे समझ नहीं आता। तारीफ भी केवल इसलिए कि वो महिला हैं। हां, अगर उन्होंने अपने मुख्यमंत्री रहते हुए कोई ऐसा शासन दिया होता जिससे ये सिद्ध होता कि महिलाएं पुरुषों से बेहतर शासन देती हैं तो बात अलग थी। लेकिन उन्होंने तो भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमान ही स्थापित किए हैं। फिर भी मृणाल पांडे जी उनकी बस इसलिए प्रशंसा की जा रही हैं कि वो महिला हैं। ये तो वही बात हुई कि पुरुष करे तो भ्रष्टाचार और महिला करे तो चमत्कार।

अगर महिला-पुरुष के शासन में इतना ही अंतर होता तो आज देश की तस्वीर की कुछ और होनी चाहिए थी। देश के राष्ट्रपति पद से लेकर यूपीए सरकार तक की कमान महिला ही संभाले हुए है। और अब तीन प्रदेशों की कमान भी महिलाओं के हाथ में है और वर्तमान तस्वीर भी हम सबके सामन ही है। कोई ये नहीं कह सकता कि हम अपनी सरकार को पसंद करते हैं। आम लोगों के दिलों में सरकार के प्रति नफरत न भी हो पर सम्मान और प्रेम तो कतई नहीं है।

दरअसल, बात महिला-पुरुष की है ही नहीं। कुछ महिलावादी संगठन इस तरह की बातें करके स्त्री-पुरुष के बीच खाई पैदा करने का ही काम करते हैं। स्त्री-पुरुष दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों ही एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। जो महिलाएं आज सफलता के शिखर पर हैं उनको वहां होना ही था। पंडित नेहरू के घर अगर एक बेटा पैदा हुआ होता तो क्या उनकी विरासत इंदिरा गांधी को मिल पाती, शायद नहीं। उनकी स्वाभाविक विरासत उनके बेटे को ही जाती। इसलिए इंदिरा गांधी को आगे आना ही था। अब राहुल और प्रियंका गांधी का ही मामला लें तो प्रियंका के प्रति लोगों में ज्यादा लगाव और रुझान होने के बावजूद राहुल को ही युवराज के तौर पर पेश किया जा रहा है। जबकि आम लोगों में भी और कांग्रेसियों में भी राहुल से ज्यादा प्रियंका के प्रति उत्साह देखने को मिलता है।

तो जिन तीन देवियों की बात मृणाल जी कर रही हैं उनमें से केवल ममता बनर्जी जमीन से उठीं और बेहद संघर्षपूर्ण सफर तय करके इस मुकाम तक पहुंची हैं। बाकी बची दो देवियां अपने सरपरस्तों की कृपा से सत्ता सुख भोग रही हैं। वैसे मेरी राय पढ़कर कुछ लोग ऐसा भी कह सकते हैं कि ये मेरा नारी विरोध है. पर जिसको जो लगे लेकिन महिलाओं की प्रशंशा में इस तरह की हवा हवाई बातें ज़मीनी स्तर पर महिलाओं को काफी नुकसान पहुंचा सकती हैं. 

3 comments:

  1. यक़ीनन ...इलेक्ट्रोनिक मीडिया जैसे सुर म्रणाल जैसे संवेदनशील संपादक जब उठाते है तो हैरानी होती है ...ठीक वैसे ही जैसे कनिमोड़ी पर सोनिया गांधी सार्वजानिक रूपसे दुःख जताती है ....

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  2. Dhanyawad.... Par mai Jab tak Meerut mein tha, tab kabhi aapse parichay na aa saka...

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  3. सचिन सर, प्रशाशन चलाने के लिए सुसाशन की समझ और अनुभव की जरूरत होती है... जो कम से कम इन महिलाओं में बिलकुल नहीं है.

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