Thursday, October 13, 2011

नारायण का वर्क लोड!



नारायण! नारायण! अपनी वीणा के तारों को झंकारते हुए नारद मुनि ने बैकुंठ के द्वार पर कदम रखा तो अपने भगावन को थोड़ा चिंतित देखा। उनसे रहा न गया और पूछ बैठे- आपके माथे पर ये चिंता की लकीरें कैसी भगवन?

मानो भगवान विष्णु इसी प्रश्न को सुनने को बेचैन थे- क्या बताऊं मुनि श्रेष्ठ मेरे ऊपर वर्क लोड बढ़ता ही जा रहा है। परम पिता ब्रह्मा ने जिस सृष्टि की रचना की थी उसका संचालन दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है।

इस पर नारद जी ने पूछा- ऐसा क्या हो गया जिसने सर्वशक्तिमान, अखिल ब्रह्मांड नायक, देवादिदेव, स्वयं नारायण को चिंता में डाल दिया है।

भगवान बोले- हे! मुनि ये तो आप जानते ही हैं कि मृत्युलोक में पब्लिक लगातार बढ़ रही है और उसी के साथ बढ़ रही हैं उनकी डिमांड भी। मैं सबकी डिमांड पूरी करने में असमर्थ महसूस कर रहा हूं, भक्तों की डिमांड लगातार बढ़ रही हैं। डिमांड और सप्लाई का गैप भी लगातार बढ़ता ही जा रहा है। बैकलाॅग में करोड़ों एप्लीकेशन पड़ी हुई हैं। लेकिन मनुष्य की इच्छाएं खत्म होने का नाम नहीं ले रहीं। एक वो जमाना था जब मेरा भक्त कहता था भगवान मुझे एक नौकरी दो। मैं उसकी प्रार्थना सुनता और एक नौकरी लगवा देता और वो पूरी जिंदगी उसी नौकरी में बिता देता। फिर कभी वो दोबारा मुझसे नौकरी की डिमांड नहीं करता था। लेकिन आज का मनुष्य बड़ा अजीब है। एक नौकरी में टिकता ही नहीं है। एक लगवाई तो फिर दूसरी मांगता है, दूसरी का इंतजाम किया तो तीसरी मांगता है, चैथी, पांचवीं, छठी... कोई अंत ही नहीं है। न लगवाओ तो उलाहने देता है कि भगवान तेरे यहां देर भी है और अंधेर भी। पहले इंसान एक लड़की से प्यार करता था और मुझसे उसी का हाथ मांगता था और उसके साथ शादी करके जिंदगी भर निभाता था। लेकिन अब तो अजीब चलन चल पड़ा है शादी तो बहुत बाद की चीज रही, मल्टीपल गर्लफ्रेंड की डिमांड रखता है। कभी इस लड़की के लिए प्रार्थना करता है, कभी दूसरी लड़की के लिए। अक्ल पर पत्थर पड़ गए हैं बिल्कुल। अब तुम ही बताओ नारद कि इतने वर्क प्रेशर में मैं कैसे काम करूं।

नारद बोले- भगवन समस्या तो गंभीर है, लेकिन यदि आप ही परेशान होने लगे तो संसारियों का क्या होगा?

भगवान ने पूछा- तो तुम ही बताओ मुनि क्या उपाय किया जाए? आप तो संसार भर में विचरते हो, आप ही कुछ सुझाओ!

नारद मुने कहने लगे- प्रभु पृथ्वी पर कंज्यूमरिज्म का दौर चल रहा है। रिश्ते-नाते, आचार-विचार-व्यवहार सब कुछ कंज्यूमरिज्म की चपेट में है। वहां की अर्थव्यवस्था को पंख लगाने के लिए कंजंप्शन को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है। इसके चलते एक नौकरी में भला इंसान कैसे संतुष्ट रह सकता है। वो तो आपसे मांगने के लिए मजबूर है प्रभु!

भगवान बोले- अगर वहां कंज्यूमरिज्म बढ़ रहा है तो उसके लिए वहां की सरकारें जिम्मेदार हैं। उसका खामियाजा मुझे क्यों भुगतना पड़ रहा है।

नारद जी ने कहा- ये तो आप भली-भांति जानते हो प्रभु की धरती पर लोकतांत्रिक सरकारें किस तरह काम कर रही हैं। अगर वे ही ठीक से काम कर रही होतीं तो आज आपके इतने भक्त न होते। सब खुश, संतुष्ट और संपन्न होते। ये वहां की सरकारों की कुव्यवस्था का ही परिणाम है कि आप पर विश्वास करने वालों की संख्या हर रोज बढ़ रही है।

इस पर भगवान ने कहा- फिर भी मुनि श्रेष्ठ मांगने की कोई लिमिट होती है। मेरी भी अपनी कुछ लिमिटेशंस हैं कि नहीं?

नारद जी मुस्कुराए- प्रभु आपके भक्त तो सिर्फ इतना जानते हैं कि आपकी कोई लिमिट नहीं है। आपका तो न आदि है और न अंत।

मुनि के जवाब में भगवान ने खुद को फंसा हुआ महसूस किया- ठीक बात है, लेकिन फिर भी मुनि सोच कर देखो, परिवार के मुखिया से परिवार की डिमांड पूरी नहीं हो रहीं, मोहल्ले के पार्षद से मोहल्ला नहीं संभल रहा, जिलाधिकारी जैसे-तैसे काम को निपटा रहे हैं, धुरंधर से धुरंधर पुलिस अधीक्षक अपराध नहीं रोक पा रहे, राज्य सरकारें विफलता का राग गा रही हैं (गुजरात को छोड़कर), और देश का मुखिया भी खुद को मजबूर बता रहा है। तो आप बताओ की लोग मुझसे क्यों इतनी उम्मीद रखते हैं?

नारद जी फिर मुस्कुराए- प्रभु! लोग आपसे इसीलिए उम्मीद रखते हैं क्योंकि आप ही सचमुच उनकी आखिरी उम्मीद हो। आप भलीभांति जानते हो कि आप सर्वशक्तिमान और सामथ्र्यवान हो, लेकिन फिर भी अगर आप उनकी इच्छाएं पूरी नहीं कर रहे हो, तो इसमें भी आपकी दूरदृष्टि ही है। रही बात आपकी परेशानी की। तो आप अपने दिल पर हाथ रख कर देखिए आप वर्कलोड से परेशान नहीं हो आप परेशान हो लोगों की बढ़ती अपेक्षाओं से। अधिकांश मनुष्य अपने लक्ष्य को छोड़कर जिस मार्ग पर चल निकले हैं, आप कहीं न कहीं उनकी अधोगति से परेशान हो।

भगवान बोले- हे मुनि आपकी बात कुछ हद तक ठीक है, लेकिन ये मेरी समस्या का समाधान नहीं है।

नारद ने कहा- भगवन आप की परेशानी ये है कि आप हर चीज पर गंभीरता से विचार करते हैं। आप भी धरती की सरकारों की तरह हो जाइए। सरकार सिर्फ गंभीर होने का दिखावा करती है। आप भी वैसा ही कीजिए। जब भी कहीं त्रासदी होती है तो मंत्रीगण अपने शब्दों से गंभीर शोक प्रकट करते हैं। उनकी जीभ के सिवा वह शोक उनके तन पर कहीं भी नजर नहीं आता। घायलों का हाल जानने के लिए मंत्रीगण ऐसे अस्पतालों में घूमते हैं मानो मुगल गार्डन में घूम रहे हों। वे बार-बार ऐसा करते हैं, लेकिन सुधार फिर भी नहीं होता। आप भी चीजों को दिल पर मत लो। लोकतांत्रिक सरकार की तरह बनो नाथ।

भगवान ने कहा- यही तो दिक्कत है नारद मुनि की मैं वैसा नहीं बन सकता। मैं सरकार नहीं हूं मैं तो इस संसार का पालनहार हूं। मैं आंखें नहीं मूंद सकता, न खुद को मजबूर बता सकता हूं, इस सृष्टि को नियमानुसार चलाना ही मेरा कार्य है।

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