Monday, June 9, 2014

यूपी में भाजपा किस पर लगाएगी दाव?


2014 के चुनाव में उत्तर प्रदेश से भाजपा को मिली सफलता को शतप्रतिशत कहा जा सकता है। क्योंकि जो सात सीटें पार्टी ने हारी हैं वे चेहरों पर आधारित सीटें थीं। अगर वे चेहरे उन सीटों से न खड़े होते तो ये सातों सीट भी भाजपा की झोली में गिरतीं। प्रदेश में हाशिए पर गए संगठन को अमित शाह की इंजीनियरिंग ने नई आॅक्सीजन प्रदान कर दी। सूबे में ऐसी मोदी सुनामी आई कि 73 सीटें झटक लीं और यहीं से केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार की बुनियाद बन गई।

अब पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि वह विधानसभा के स्तर पर भी कुछ ऐसा करिश्मा करे कि उत्तर प्रदेश को सपा के गुंडा राज और बसपा के भ्रष्ट राज से मुक्ति मिल सके। सपा-बसपा रूपी क्षेत्रीय ताकतों के सामने भाजपा 2007 और 2012 के विधानसभा चुनाव में लगातार तीसरे स्थान जगह बनाए हुए है। यूपी में पार्टी की इतनी बदहाली के लिए अंदरूनी कलह और लचर नेतृत्व जिम्मेदार है। वैसे यूपी में भाजपा की दुर्गति की सबसे बड़ी वजह मायावती से हाथ मिलाना भी माना जाता है। मायावती को तीन बार भाजपा ने मुख्यमंत्री बनाया और चैथी बार माया भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाकर 2007 में अपने दम पर पूर्ण बहुमत ले आईं। मायावती का प्रशासन सख्त था, अपराध पर लगाम लगी, लेकिन भ्रष्टाचार अपनी सारी सीमाएं लांघकर पराकाष्ठा पर पहुंच गया। लोग मायावती के भ्रष्टाचार से त्रस्त थे और हर हाल बदलाव चाहते थे। इस जनभावना को पहचानने में भी भाजपा विफल रही और 2012 में मजबूत विकल्प नहीं दे पाए, नतीजतन लोगों को युवा अखिलेश में ज्यादा संभावनाएं नजर आईं और सपा के हाथों में सूबे की बागडोर सौंप दी।

जैसा कि अंदाजा लगाया जा रहा था सपा की सरकार वैसी ही साबित हुई। पहले से भ्रष्टाचार की मार झेल रहे सूबे में अराजकता, अपराध और गुंडागर्दी का अभिशाप और जुड़ चुका है। अब तक अखिलेश यादव एक कमजोर मुख्यमंत्री साबित हुए हैं। यूपी में लोग बदलाव के लिए कितने उत्सुक हैं, ये उन्होंने इस लोकसभा चुनाव में बता दिया है। यही वो समय है जब भाजपा को संगठन स्तर पर ठोस फैसले लेने होंगे। 2012 के विधानसभा चुनाव में आंतरिक खींचतान के कारण भाजपा बिना नेतृत्व के ही चुनाव मैदान में कूद पड़ी थी। अमूमन भाजपा किसी भी चुनाव में अपना सीएम और पीएम कैंडिडेट चुनाव से पहले ही घोषित करती है, लेकिन यूपी में तब ऐसा नहीं किया गया।

अगला विधानसभा चुनाव अब 2017 में होना है। सपा सरकार इसी ढर्रे पर चलती रही तो पहले भी हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश में बदलाव लाने के लिए भाजपा को अभी से मेहनत करनी होगी। लोकसभा चुनाव ऐसे संकेत दे चुके हैं कि भाजपा का खोया हुआ वोटबैंक वापस आ गया है। पार्टी को लोकसभा चुनाव में कुछ 42.3 प्रतिशत वोट मिले। पार्टी ने सारी आरक्षित सीटें जीतकर बसपा को भी शून्य पर लाकर खड़ा कर दिया।

केंद्र में मोदी सरकार को राष्ट्रहित के फैसले लेने में आसानी हो, इसके लिए जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा राज्यों में भाजपा की सरकारें बनें। यूपी क्योंकि देश की आबादी में सबसे बड़ा योगदान देता है इसलिए यहां का पिछड़ापन दूर करना बहुत जरूरी है। प्रदेश में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपना सीएम कैंडिडेट चुनने में ही आएगी। यूपी में इस पद के कई दावेदार नजर आते हैं। पिछली बार राजनाथ सिंह और उमा भारती के बीच ये पद उलझ कर रह गया था। जिसका खामियाजा पार्टी ने भुगत भी लिया। जितनी जल्दी पार्टी अपना कैंडिडेट तय करेगी, उतना ही ज्यादा लाभ पार्टी को मिलने के आसार हैं।

उत्तर प्रदेश में दाव लगाने के लिए फिलहाल पार्टी के जो चेहरे हैं उनकी संभावना नीचे हैः

राजनाथ सिंहः एक बार यूपी की गद्दी संभाल चुके राजनाथ गृह मंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद छोड़कर यूपी जाएंगे ऐसा मुश्किल है। फिर भी अगर भाजपा उनको सीएम कैंडिडेट बनाती है तो इसका लाभ पार्टी को मिलेगा।

उमा भारतीः भाजपा एक बार फिर उमा को आगे कर चुनाव लड़ सकती है। उमा ने उत्तर प्रदेश में लंबे समय से काम भी किया है। पर इसके आसार कम ही हैं कि उमा गंगा पुनरुद्धार का महत्वाकांक्षी कार्य छोड़कर यूपी की डोर संभालें। गंगा अभियान उमा के दिल के करीब रहा है। उमा अगर गंगा सफाई का लक्ष्य पूरा करती हैं तो उनका नाम इतिहास में दर्ज हो जाएगा। हालांकि उनको कैंडिडेट बनाने से योगी भी अपनी दावेदारी पेश कर सकते हैं।

मेनका गांधीः सीएम की कुर्सी के लिए मेनका गांधी लीग से हटकर एक चेहरा साबित होंगी। भाजपा अगर मेनका को सीएम कैंडिडेट बनाती है, तो उनको लोगों का समर्थन मिल सकता है।

वरुण गांधीः यूपी में भाजपा के पास सबसे डायनेमिक चेहरा वरुण गांधी के रूप में है। पर उनका कम अनुभव बाधा बन सकता है। यूपी जैसे बड़े और जटिल प्रदेश को चलाने के लिए जोश के साथ अनुभव बहुत जरूरी है।

डाॅ. लक्ष्मीकांत वाजपेयीः लोकसभा चुनाव की सफलता के बाद वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी को भी सीएम कैंडिडेट के तौर पर देखा जा रहा है। वैसे वाजपेयी को किसी प्रदेश का राज्यपाल भी बनाया जा सकता है।

अमित शाहः यूपी वालों की खासियत होती है कि वे क्षेत्रवाद में विश्वास नहीं रखते। अगर अमित शाह को भाजपा यूपी में सीएम कैंडिडेट बनाती है तो लोग उनको अपनाने से गुरेज नहीं करेंगे। लोकसभा चुनाव में उनका काम और सफलता देखने के बाद ऐसी मांग उठने भी लगी हैं।

मुख्तार अब्बास नकवीः भाजपा का चर्चित मुस्लिम चेहरा हैं। हर समय मुस्लिम हितों की दुहाई देने वाले मुलायम सिंह यादव रामपुर के आजम खां को सीएम बनाने की जो हिम्मत नहीं दिखा पाए, भाजपा रामपुर के ही नकवी को सीएम कैंडिडेट बनाकर वो हिम्मत दिखा सकती है। यानि भाजपा चाहे तो सूबे को पहला मुस्लिम मुख्यमंत्री दे सकती है।

1 comment:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन पेड़ों के दर्द को क्यों नही समझते हम - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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