Sunday, January 4, 2015

दिल्ली में किरण बेदी से क्यों बच रही भाजपा?

दिल्ली में दस्तक दे रहे चुनावों को लेकर अब तक जितने भी ओपीनियन पोल हुए हैं, उनमें भाजपा को बढ़त दिखाई गई है, हालांकि ये बढ़त इतनी मजबूत नहीं है कि इसे चुनाव तक बदला न जा सके। दूसरी ओर मुख्यमंत्री की रूप में अभी भी अरविंद केजरीवाल लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं। एक चीज सब तय मानकर चल रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी को तीसरे दर्जे पर धकिया दिया जाएगा। मुख्य मुकाबला भाजपा और आप के बीच ही होने जा रहा है। लोकसभा चुनावों में भी आप सातों लोकसभा सीटों पर दूसरे स्थान पर रही थी। खैर, दिल्ली विधानसभा के चुनावों का परिणाम जो भी हो, पर इन दिनों आप और भाजपा के रणनीतिज्ञों की चिंताएं जरूर बढ़ी हुई होंगी। आप अपने 49 दिनों की दुहाई देकर लोगों को रिझाने का प्रयास कर रही है तो भाजपा मोदी के सुशासन को आगे रखकर लोगों से मिल रही है।

सीएम कैंडिडेट गायब
आप को छोड़कर बाकी दोनों पार्टियों ने अपने सीएम उम्मीदवार घोषित नहीं किये हैं। जबकि केजरीवाल के नाम पर आप जमकर खेल रही है। कांग्रेस में तो नहीं पर भाजपा में पहले परंपरा थी कि पीएम या सीएम कैंडिडेट चुनाव से पहले की घोषित कर दिए जाते थे। भाजपा हमेशा एक चेहरा सामने रखकर लोगों के बीच जाती थी। भाजपा ने पीएम के लिए पहले अटल बिहारी वाजपेयी, फिर एलके आडवाणी और फिर नरेंद्र मोदी को कैंडिडेट के रूप में पेश करके चुनाव लड़ा। उसी तरह राज्यों में भी सीएम कैंडिडेट के चेहरों पर चुनाव लड़े गए हैं। लेकिन मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से भाजपा की इस रणनीति में बदलाव आया दिखता है। अब भाजपा मोदी के चेहरे पर ही राज्यों के चुनाव लड़ती दिख रही है। महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, और जम्मू-कश्मीर इसके हालिया उदाहरण हैं। अब आगामी दिल्ली और बिहार के चुनाव में भी भाजपा इसी राह पर कदम बढाएगी, ऐसा लगता है।

केजरीवाल नहीं आसां
भाजपा के लिए दिल्ली में केजरीवाल की छवि के सामने बिना सीएम कैंडिडेट घोषित करे चुनाव लड़ना आसान नहीं होगा। केजरीवाल का ट्रैक रिकाॅर्ड साफ-सुथरा है और वो बाकी पार्टियों को भ्रष्ट साबित करने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं। ऐसे में भाजपा साफ छवि के सीएम कैंडिडेट के बिना चुनाव में उतरती है तो उसे जबरदस्त मेहनत करनी पड़ेगी। पछले चुनाव में डाॅ. हर्षवर्धन को उतारने से भाजपा को जबरदस्त फायदा मिला था। उससे पहले तक भाजपा की स्थिति डांवाडोल थी। फिलहाल हर्षवर्धन केंद्र में मंत्री हैं और दिल्ली भाजपा से जुड़े कई दिग्गज उनकी अनुपस्थिति का फायदा जरूर उठाना चाहेंगे। कुछ नेताओं को सीएम बनाने के समर्थन में तो होर्डिंग्स भी लगाए गए थे।

किरण में उम्मीद की किरण
अगर भाजपा अभी भी किरण बेदी को अपना सीएम कैंडिडेट बनाती है तो केजरीवाल की मजबूत दावेदारी पर पानी फेरा जा सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के कई नेता अन्ना आंदोलन की सूत्रधार रहीं किरण को दिल्ली के सीएम कैंडिडेट के रूप में उतारना चाहते हैं, तो वहीं दिल्ली राज्य ईकाई के कई नेता इसके विरोध में है। उनकी नजर में सीएम कैंडिडेट ग्रासरूट से होना चाहिए न कि पैराशूट से। पर भाजपा के लिए किरण एक ऐसा चेहरा हो सकती हैं, जो आम आदमी पार्टी की बढ़त पर तगड़ी चोट पहुंचा सकती हैं। किरण बेदी की साफ छवि, प्रशासनिक अनुभव और बदलाव लाने की क्षमता के साथ-साथ वो आप नेताओं को भी नजदीकी से परिचित हैं, लिहाजा उनकी शक्ति और कमजोरियों को पहचानती हैं, ये सभी बातें भाजपा के हक में जाती हैं। इसमें कोई शक नहीं किरण के समाने आते ही केजरीवाल की दावेदारी की हवा भले ही न निकले, लेकिन कमजोर पड़ जाएगी। जबकि आम आदमी पार्टी भी किरण बेदी पर उस तरह हमला नहीं कर पाएगी जिस तरह वो अन्य कैंडिडेट पर कर सकती है।

ग्रासरूट बनाम पैराशूट
ये बात सही है कि पैराशूट नेताओं के आने से ग्रासरूट नेताओं के मनोबल पर असर पड़ता है, लेकिन किसी भी संगठन के लिए ये बात भी समझने की है कि उसकी सफलता में सक्रिय कार्यकर्ताओं की मेहनत के साथ-साथ भावनात्मक रूप से जुड़े जनमानस का भी बहुत बड़ा योगदान होता है। किरण बेदी भले ही भाजपा की सक्रिय कार्यकर्ता न रही हों, लेकिन उन्होंने कई बार आड़े वक्त पर भाजपा को समर्थन जताकर उसे मजबूती प्रदान की है। वैसे भी किरण बेदी को दिल्ली का सीएम कैंडिडेट बनाने में ज्यादा फायदा भाजपा को ही होने जा रहा है। नई क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभर रही आप को साधने के लिए ये कदम काफी कारगर साबित हो सकता है।

1 comment:

  1. आपके ब्लॉग को ब्लॉग एग्रीगेटर (संकलक) ब्लॉग-चिट्ठा के "विविध संकलन" कॉलम में शामिल किया गया है। कृपया हमारा मान बढ़ाने के लिए एक बार अवश्य पधारें। सादर …. अभिनन्दन।।

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