<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591</id><updated>2012-02-13T16:28:40.822+05:30</updated><category term='घूमना फिरना'/><category term='युद्ध'/><category term='आस्था'/><category term='System'/><category term='मेरी कवितायें'/><category term='राजनीति'/><category term='कायदा कानून'/><category term='बचपन'/><category term='हिंसा'/><category term='हम लोग'/><category term='अयोध्या'/><category term='कलमघिस्सू'/><category term='बाज़ार'/><category term='खेल'/><category term='Poem'/><category term='प्रेम'/><category term='शेर'/><category term='नारी'/><category term='शिक्षा'/><category term='बाज़ार'/><category term='खान-पान'/><category term='जिन्दगी'/><category term='श्रद्धांजलि'/><category term='सफलता'/><category term='विकास'/><category term='शांति'/><category term='नौकरी चाकरी'/><category term='संस्मरण'/><category term='जिंदगी और मौत'/><category term='पर्यावरण'/><title type='text'>APNA SAMAJ</title><subtitle type='html'>स्वागत है आपका॥ आइये मैं आपको दिखाता हूँ आपका समाज॥ बेहद सुंदर, बेहद वीभत्स॥</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>124</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-4227069524998716096</id><published>2012-02-13T16:22:00.000+05:30</published><updated>2012-02-13T16:28:40.836+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रेम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाज़ार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जिन्दगी'/><title type='text'>वैलेंटाइन हफ्ते के बहाने...</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-cPYMzcytdKY/Tzjq2OiJw0I/AAAAAAAAAaA/38zpr_WTna4/s1600/rose_bud.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em; text-align: justify;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/-cPYMzcytdKY/Tzjq2OiJw0I/AAAAAAAAAaA/38zpr_WTna4/s320/rose_bud.jpg" width="208" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;7 फरवरी को गुलाब दिवस था, बोले तो रोज डे। आॅफिस जाते वक्त मेट्रो में काॅलेज के लड़के-लड़कियों को आपस में एक-दूसरे को विश करते देखा। वैलेंटाइन और उससे जुड़े दिनों का सबसे बड़ा मार्केट स्कूल काॅलेजों में ही बसता है। तो उन स्टूडेंट्स की बातों से मेरे ज्ञान चक्षु खुले। फिर सोचा जब ज्ञान बढ़ ही गया है तो इसका इस्तेमाल भी कर लिया जाए, सो झट से पत्नी को एक एसएमएस टाइप कर दिया ‘हैप्पी रोज डे!’ वैसे भी शादी के बाद पहली बार रोज डे टाइप चीजें आई हैं। हालांकि अपन के माइंड में वैलेंटाइन जैसी चीजें कभी फिट नहीं हो पाई। न ही पत्नी का माइंड सेट वैसा है। भारत में तो हर सुबह जब लोग अपने माता-पिता के पांव छूते हैं तो उनका फादर्स और मदर्स डे होता है; फिर शाम को जब पत्नी से प्रेम भरी बातें करते हैं तो हर रोज वैलेंटाइन डे होता है। हमें अपने रिश्ते निभाने के लिए किसी विशेष दिन की आवश्यकता नहीं। हालांकि इन विचारों को अपनी इलीट क्लास मित्र मंडली आॅर्थोडाॅक्स टाइप कहकर नकार देती हैं। या ये भी कह दिया जाता है कि हिंदी भाषा में लिखने वाले इसी टाइप के लोग होते हैं। खैर कोई जो कहे, हमें उससे क्या? हमें अभिव्यक्ति की आजादी है। तो जी मेरे एसएमएस का कोई खास फर्क नहीं पड़ा। उधर से ‘हा हा हा हा... थैंक्यू’ लिखकर आ गया।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;खैर बात यहीं खत्म हो गई। फिर आॅफिस पहुंचा तो गूगल पर भी रोज डे की चर्चा थी, जिन न्यूज वेबसाइट्स को मैं पढ़ता हूं उन पर भी रोज डे महक रहा था। कुछ चीजें आपको जबरदस्ती परोसी जाती हैं और आप यहां वहां तहां तहां उनसे टकराते हैं। रात को घर लौटते वक्त इंदिरापुरम के मोड़ पर लगे जाम में मुझे सड़क किनारे एक फूल वाले की दुकान दिखी। जिस पर कुछ युवक रोज बड खरीद रहे थे। इसे रोज वाली खबरों और विज्ञापनों का असर कहें या कुछ और, लेकिन आज मेरे दिमाग ने भी सोच लिया जो कभी सोचा न था- क्यों न एक गुलाब खरीदकर देखा जाए। दुकान के पास बाइक रोक दी। तकरीबन 13 साल का एक लड़का मैला सा स्वेटर और सिर पर टोपी लगाए दुकान की कमान संभाले था। आज कोई भी उससे बुके नहीं बनवा रहा था। सबको गुलाब की कली चाहिए थी।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;गुलाब की एक कली अमूमन 10 रुपए की आती है। लेकिन आज उसके रेट 25 रुपए थे। मैंने पूछा रेट क्यों बढ़ा रखे हैं तो उसका जवाब था- ‘शर आज रोज डे है!’ मैंने पूछा तुझे किसने बताया? तो बोला- ‘शर सबको पता है। सुबह से 200 गुलाब बेच चुका हूं।’ उसने सिद्ध किया कि छोटा हो बड़ा अपने-अपने बिजनेस में सब माहिर होते हैं। क्या चीज कब, क्यों और कितने की बिकेगी दुकानदार को पता रहता है। खैर 10 रोज बड खरीदने की बात पर भी वो रेट घटाने को तैयार नहीं हुआ। फिर आखिरकार एक रोज बड खरीदी। उसने बड़े करीने से उस बड को सफेद फूल वाली हरी घास के साथ एक सेलोफेन शीट में रैप किया और बड बनाकर मुझे सौंप दी। तभी एक बाइक वाला वहां और आया, जिसने आते ही उस लड़के से पूछा ‘ओए छोटू आज क्या रोज डे है?’ अपने ग्राहक की अज्ञानता पर लड़का मुस्कुराकर बोला- ‘हां, शर! आपको नहीं पता, सुबह से 200 गुलाब बेच चुका हूं।’ रात के आठ बजे भी गुलाबों की बढ़ती मांग को देखकर लड़के के चेहरे की मुस्कान रोके नहीं रुक रही थी। और उस बाइकधारी युवक ने भी एक रोज बड का आॅर्डर किया।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मैंने घर आकर गुलाब पत्नी को दिया, तो मैडम ने मुस्कुराकर उसे ग्रहण किया, थैंक्यू बोला और टीवी पर रख कर दूसरे काम में व्यस्त हो गई। मुझे लगा पांच मिनट तो हाथ में रखना चाहिए थी। आखिर 25 रुपए खर्च किए हैं। खैर, थोड़ी देर बाद मैंने ही उस गुलाब को अपने हाथ में उठाया और उसकी खूबसूरती को निहारा। देखने में सुंदर तो था, लेकिन उसमें खुशबू बहुत कम थी। देखने में इतना सुंदर और खुशबू इतनी कम। देसी गुलाब तो दूर से ही महकता है। मुझे लगा कि ये बिना खुशबू वाला सुंदर सा गुलाब बिल्कुल उन लोगों की तरह है जो ऊपर देखने में तो बहुत टिपटाॅप और सुंदर होते हैं, लेकिन उनके अंदर से चरित्र की खुशबू नहीं आती।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;तो साहब, वो गुलाब टीवी पर रखा-रखा अब बिल्कुल सूख चुका है और थोड़े दिन में डस्टबिन के हवाले कर दिया जाएगा।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-4227069524998716096?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/4227069524998716096/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2012/02/blog-post_13.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/4227069524998716096'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/4227069524998716096'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2012/02/blog-post_13.html' title='वैलेंटाइन हफ्ते के बहाने...'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-cPYMzcytdKY/Tzjq2OiJw0I/AAAAAAAAAaA/38zpr_WTna4/s72-c/rose_bud.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-7992972762107254708</id><published>2012-02-06T18:34:00.000+05:30</published><updated>2012-02-06T18:34:49.033+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='युद्ध'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शांति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंसा'/><title type='text'>जगह-जगह से उठ रही हैं बदलाव की सुगबुगाहटें!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-F66m6DimWz8/Ty_PjZNFJ_I/AAAAAAAAAZw/84r7E3hbrFU/s1600/syria-violence.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="213" sda="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-F66m6DimWz8/Ty_PjZNFJ_I/AAAAAAAAAZw/84r7E3hbrFU/s320/syria-violence.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;2012 की शुरुआत एक ऐसे समय में हुई है जब लीबिया में गद्दाफी की तानाशाही खत्म हो चुकी थी और विश्व के दूसरे कोनों से क्रांति की आवाजें सुनाई पड़ रही थीं। ज्यों-ज्यों 2012 आगे बढ़ रहा है अशांति बढ़ती जा रही है। अफगानिस्तान, लीबिया, सीरिया, मिस्र, इजराइल, ईरान, इराक और पाकिस्तान सरीखे देश युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं। कोई दिन ऐसा जा रहा है जब इन इलाकों से खून बहने की खबरें नहीं आतीं। वहां की आवाम में आक्रोश है, जनमानस में और इन सभी क्षेत्रों में कहीं न कहीं अमेरीकी दखल है। और तिब्बत कुछ ऐसे देशों के नाम हैं जहां अशांति की सबसे ज्यादा सुगबुगाहट सुनाई दे रही है। एक तरफ इजराइल-ईरान भिड़ने को तैयार हैं और अप्रैल या जून में युद्ध की बात कही जा रही है। सीरिया की तपिश भी थमने का नाम नहीं ले रही है। मिस्र में लोकतंत्र की बहाली के बावजूद हालात इतने तनावपूर्ण हैं कि फुटबाॅल मैच के बहाने लोग एक-दूसरे पर हमला कर बैठे। इराक से अमेरिका ने बाॅय-बाॅय कर दी है, लेकिन वहां से भी आए दिन धमाकों की खबरें आ रही हैं। इराक और अफगानिस्तान दोनों देशों में अमेरिका ने हिंसक युद्ध के दम पर जीत तो हासिल कर ली लेकिन शांति स्थापना अभी दूर की कौड़ी दिख रही है। इधर सालों से अहिंसा के मार्ग पर चलकर आजादी की लड़ाई लड़ रहे तिब्बत के लोगों का धैर्य भी अब जवाब दे रहा है और तिब्बत से भी हिंसा और आत्मदाह की खबरें मिल रही हैं। और जिस आतंकवाद के दम पर पाकिस्तान पिछले कई दशकों से भारत के साथ कायरतापूर्ण हरकतें करता आ रहा था, वही आतंकवाद अब पाकिस्तान के सिर पर चढ़कर नाच रहा है। वहां की तथाकथित लोकतांत्रिक सरकार आतंकी सरगनाओं के हाथ की ऐसी कठपुतली बन कर रह गई है जिसका कोई भविष्य नहीं। पाकिस्तान इस समय अभूतपूर्व अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। माली हालत इतनी खराब हो चुकी है कि वहां की सेना ने इस बार सत्ता हथियाने का गोल्डन चांस हाथ से जाने दिया। क्योंकि फौज जानती थी कि वो लाख कोशिशों के बावजूद पाकिस्तानी खोखली अर्थव्यवस्था को नहीं संभाल पाएगी और आवाम को दो जून की रोटी नहीं मुहैया करा सकेगी। ऐसे में सारा ठीकरा अपने सिर फुड़वाने से अच्छा फौज ने बाहर बैठकर शासन चलाना बेहतर समझा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुल मिलाकर 2012 बड़े बदलावों के संकेत दे रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-l5EaRZdrw1A/Ty_PwEVO4GI/AAAAAAAAAZ4/ExsKMvRhI00/s1600/rafale.png" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" sda="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-l5EaRZdrw1A/Ty_PwEVO4GI/AAAAAAAAAZ4/ExsKMvRhI00/s320/rafale.png" width="251" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;बदलाव के बादल इधर भारत पर भी मंडरा रहे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ देश में अभूतपूर्व जनजागरूकता है। बड़े-बड़े दिग्गज कानून की गिरफ्त में हैं। आला पदों पर बैठे सत्तानशीनों के माथे से पसीने टपक रहे हैं। भारत की शांति प्रियता और दूसरे देशों पर हमले की पहल न करने की नीति का लाभ आज प्रत्यक्ष नजर आ रहा है। इस नीति पर चलकर देश ने न केवल बेहतरीन आर्थिक विकास किया है बल्कि मुल्क में लोकतंत्र भी मजबूत हुआ है। वो बात दीगर है कि भ्रष्टाचार के दम पर अरबों-खरबों में खेलते जनसेवक दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का एक काला पक्ष है। लेकिन अन्ना हजारे, बाबा रामदेव और डाॅ. सब्रमण्यम स्वामी की तिकड़ी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक अनोखा सामाजिक युद्ध छेड़ रखा है। इस सामाजिक युद्ध में हार चाहे सरकार की हो या सामाजिक संगठनों की, लेकिन इसका परिणाम सिर्फ अच्छा ही होगा। क्योंकि जब तक इस सामाजिक युद्ध का फैसला होगा तब तक देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ गली-गली तक जागरुकता फैल जाएगी। और सरकार भले ही इन सामाजिक कार्यकर्ताओं को साम, दाम, दंड, भेद अपनाकर हरा दे, लेकिन इस देश की सरकारों को अब बदलना ही होगा। रही बात देश की शांति प्रियता की तो भारत का इतिहास है कि कभी हमने किसी देश पर हमले की पहल नहीं की। लेकिन हर हमले के लिए हमने खुद को तैयार कर रखा है। हाल में हुए विश्व के सबसे बड़े रक्षा सौदे में भारत ने 50 हजार करोड़ रुपए की मोटी रकम खर्च करके फ्रांस से 126 राफेल विमान खरीदे हैं जो अगले कुछ सालों में भारत को मिलेंगे। इस रक्षा सौदे पर विश्व के तमाम हथियारों के सौदागर भारत के सामने अपनी लार टपका रहे थे। लेकिन सौदा फ्रांस की झोली में गिरते ही अमेरिका और ब्रिटेन सरीखे देश हाथ मलते रह गए। इस सौदे के बाद भारत ने विश्व के सामरिक बाजार में अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज कराई है। पर हम अपनी नीतियों पर इसलिए ज्यादा खुश नहीं हो सकते क्योंकि इन्हीं नीतियों के चलते हम पाक अधिकृत कश्मीर, अक्साई चिन और अरुणाचल का काफी हिस्सा गंवा चुके हैं। जबकि 62 के युद्ध को भी हरगिज नहीं भुलाया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा है कि 2012 में बदलावों बयार भारत के पक्ष में बहने वाली है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसे आप अटल जी की सरकार वाला फील-गुड फैक्टर भी समझ सकते हैं। लेकिन ये ‘‘फीलिंग’’ काफी मजबूत है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कल ही कहा है कि पाकिस्तान अब कश्मीर के नाम पर युद्ध नहीं झेल सकता। जबकि सच्चाई ये है कि पाकिस्तानी स्थिति इतनी नाजुक है कि वो इस समय अपने देश के अंदर का ही असंतोष नहीं झेल पा रहा है। अब वो अपनी आवाम को कश्मीर के नाम की अफीम नहीं सुंघा सकता। वहां की आवाम अब बेहतर जिंदगी चाहती है। पाकिस्तान में अमेरिका का बढ़ता दखल वहां की आवाम और कट्टरपंथियों को अब एक आंख नहीं सुहा रहा। जबकि अमेरिकी वहां से हटने को हरगिज तैयार नहीं और पाकिस्तान की जम्हूरियत वाॅशिंगटन से मिलने वाले डाॅलरों और अपनी जनता के बीच पिसने को मजबूर है। अफगानिस्तान और इराक में लगातार दो युद्ध लड़ने और उसके बाद दोनों देशों में अपनी सेना को युद्धक्षेत्र में बनाए रखने में अमेरिका को नुकसान भी बहुत हुआ है। और उसको पानी की तरह खरबों डाॅलर बहाने पड़ रहे हैं। जिसके चलते अमेरिका की आर्थिक स्थिति पर भी लगातार असर पड़ रहा है। ओबामा ने अमेरिकी आर्थिक नीतियों में कुछ फेरबदल जरूर किए लेकिन कोई करिश्माई निर्णय अभी तक सामने नहीं आया है। जबकि राष्ट्रपति पद के चुनाव जरूर सामने आ गए हैं। जिस तरह अमेरिका ईरान और पाकिस्तान में दखल दे रहा है, उसको देखते हुए अगर अमेरिका को एक और युद्ध लड़ना पड़ जाए तो क्या वो अपनी अर्थव्यवस्था को संभाले रख पाएगा और फिर इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आने वाला समय बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन वो किस तरह करवट बदलेगा ये किसी को नहीं पता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-7992972762107254708?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/7992972762107254708/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2012/02/blog-post_06.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/7992972762107254708'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/7992972762107254708'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2012/02/blog-post_06.html' title='जगह-जगह से उठ रही हैं बदलाव की सुगबुगाहटें!'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-F66m6DimWz8/Ty_PjZNFJ_I/AAAAAAAAAZw/84r7E3hbrFU/s72-c/syria-violence.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-5707118874641375502</id><published>2012-02-03T12:53:00.000+05:30</published><updated>2012-02-03T12:53:22.651+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाज़ार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कायदा कानून'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='System'/><title type='text'>भय बिनु होई न प्रीतिः आम आदमी के लिए काफी मददगार है नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/--kYNbs3efFo/TyuKs7W1LOI/AAAAAAAAAZI/hf4i3oUuEuA/s1600/national-consumer-hlpline.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" sda="true" src="http://4.bp.blogspot.com/--kYNbs3efFo/TyuKs7W1LOI/AAAAAAAAAZI/hf4i3oUuEuA/s1600/national-consumer-hlpline.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;मेरी मां गीताप्रेस गोरखपुर से छपने वाली ‘कल्याण’ मासिक पत्रिका की नियमित पाठक हैं। पिछले दिनों दिसंबर में जब मैं हरिद्वार गया तो रेलवे स्टेशन के प्लेटफाॅर्म नंबर एक पर स्थित प्रेस के स्टाॅल पर मैंने पत्रिका का वार्षिक शुल्क जमा करा दिया ताकि 2012 में पत्रिका का क्रम न टूटे। 2 फरवरी को डाकिया महोदय पत्रिका का पहला विशेषांक, जो काफी मोटा होता है, लेकर मुरादाबाद में मेरे घर पहुंचे। मम्मी तो पत्रिका का महीने भर से इंतजार था। लेकिन डाकिए ने कहा कि आपके पैसे जमा नहीं हैं आपको ये पत्रिका छुड़ाने के लिए 210 रुपए वीपीपी शुल्क अदा करना होगा। मम्मी ने डाकिए को बताया भी कि शुल्क दिया जा चुका है पर डाकिया मानने को तैयार नहीं था। फिर मम्मी ने उससे रसीद दिखाने को कहा तो वो भी उसके पास नहीं थी। इस पर मम्मी को शक हुआ और उन्होंने मुझे फोन किया। मैं उस वक्त दिल्ली स्थित अपने आॅफिस में था। मैंने आनन-फानन कह दिया कि बिना पैसे देता है तो लो वरना जाने दो। डाकिया किताब लेकर वापस चला गया और यह भी कह गया कि- अब मैं दोबारा देने नहीं आउंगा, हेड पोस्ट आॅफिस से अपने आप मंगवा लेना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर मैंने गीताप्रेस गोरखपुर फोन घुमाया तो पता चला कि किताब रजिस्टर्ड डाक से भेजी गई है न कि वीपीपी से और मुझे उसके बदले कोई पैसा नहीं देना है। उन्होंने मुझे रजिस्ट्री नंबर भी दे दिया-34437। साथ में उन्होंने ये भी कहा कि हो न हो आपका डाकिया पैसे कमाने के चक्कर में है। फिर मैंने वो रजिस्ट्री नंबर लेकर पहले तो डाक विभाग के पोर्टल पर कंप्लेंट डाली और उसके बाद नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन (एनसीएच) 1800114000 पर फोन किया। उन्होंने बड़े इत्मिनान से मेरी बात सुनी और कंप्लेंट दर्ज करके एक डाॅकिट नंबर दिया। फिर मुझे बताया कि मैं पहले मुरादाबाद के एसएसपीओ (सीनियर सुप्रिंटेंडेंट आॅफ पोस्ट आॅफिस) के यहां इस बारे में एक शिकायत दर्ज करूं अगर वहां से बात न बने तो फिर हमें बताना। मुरादाबाद के हेडपोस्ट आॅफिस का फोन नंबर 0591-2415639 तो मैं कई बार मिला चुका था, लेकिन उसे किसी ने उठाया नहीं। फिर मैंने गूगल का सहारा लेकर मुरादाबाद के एसएसपीओ का लैंडलाइन नंबर खोज निकाला 0591-2410023। घड़ी में देखा तो पांच बज चुके थे, लगा कि सरकारी दामाद लोग दफ्तर बंद कर चुके होंगे। फिर भी एक कोशिश करने में क्या घिस रहा था। तीन-चार घंटी के बाद ही फोन उठ गया, किसी बाबू ने उठाया, लेकिन मेरी उम्मीद के विपरीत अदब से बात की। जब मैंने उनसे कहा कि मैं दिल्ली से बोल रहा हूं तो उनकी आवाज थोड़ी और दब गई। फिर मैंने उनको डाकिए की करनी बताई तो उन्होंने कहा कि वीपीपी होगी उसके तो पैसे देने ही होंगे, तो मैंने डाकिए के पास कोई रसीद न होने की बात बताई और अपना रजिस्ट्री नंबर दिया जो गोरखपुर से 24 जनवरी को की गई है। फिर उन्होंने मेरा फोन ट्रांसफर कर दिया। उधर से एक महिला की मधुर आवाज सुनाई दी, उन्होंने मेरी उम्मीद के विपरीत सारी बात आराम से सुनी। फिर मेरा मुरादाबाद का पता पूछा और साथ ही मैंने उन्हें रजिस्ट्री नंबर भी बता दिया। बोलीं कि मैं दिखवाती हूं। मैंने कहा कि मेरी शिकायत दर्ज की हो तो मुझे नंबर दे दीजिए, तो थोड़ा मुस्कुराकर बोलीं कि अभी शिकायत दर्ज नहीं की है। कल तक अगर आपकी डाक न पहुंचे तो शिकायत दर्ज करवा दीजिएगा। खैर, जब उन्होंने मेरी सारी बात सुन ही ली और आश्वासन भी दिया तो, मेरे पास बहस करने की कोई वजह नहीं थीं। लेकिन सरकारी सिस्टम के खिलाफ मन में कोफ्त जरूर हो रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-aUOktpEdBNU/TyuKuE1FAwI/AAAAAAAAAZQ/aKXOYgw_qQU/s1600/jago-grahak-jago.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="226" sda="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-aUOktpEdBNU/TyuKuE1FAwI/AAAAAAAAAZQ/aKXOYgw_qQU/s400/jago-grahak-jago.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;फिर रात को नौ बजे मां का फोन फिर से आया कि- आठ बजे डाकिया आया था और किताब दे गया है। वही डाकिया जो दिन में कह कर गया था कि अपने आप हेड पोस्ट आॅफिस से मंगवा लेना, रात के आठ बजे ड्यूटी टाइम खत्म हो जाने के बावजूद घर आकर किताब दे गया। साथ में दांत निपोरते हुए स्पष्टीकरण भी दे गया कि किसी दूसरे की वीपीपी वाली डाक उठा लाया था इसलिए गलती हो गई। मम्मी ने फोन पर मुझे डाकिए का वृतांत सुनाने के बाद कहा- बड़ा खराब समय है, रामायण में सही लिखा है ‘भय बिनु होई न प्रीति दयाला’। &lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;खैर, इस पूरी घटना को यहां लिखकर मैं डाक विभाग की साख पर बट्टा नहीं लगा रहा, न डाक विभाग से मेरी कोई निजी खुंदक है। देश की सेवा में डाक विभाग जो काम कर रहा है वो काफी सराहनीय भी है और बेमिसाल भी। लेकिन हर जगह कुछ एक लोग ऐसे होते हैं जो अपने पूरे विभाग पर बट्टा लगवाने का काम करते हैं और आप उनका कुछ नहीं उखाड़ सकते। जैसे कई ट्रकों के पीछे लिखा होता है न कि ‘यो तो यूं ही चालैगी’ तो भैया ये सिस्टम तो यूं ही चलता रहेगा।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;ये घटना यहां लिखने के पीछे मेरा मकसद सिर्फ इतना है कि नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन नंबर उपभोक्ताओं की मदद करने में काफी सराहनीय भूमिका निभा रहा है। मेरे कई मित्र इसी नंबर के इस्तेमाल से मोबाइल कंपनियों की दाढ़ में गया व्यर्थ पैसा वापस निकलवा चुके हैं। मैंने भी इसका पहली बार इस्तेमाल किया और काफी उपयोगी पाया। इस तरह की चीजें आम आदमी को सशक्त बनाती हैं। अगर हर सरकारी विभाग अपना काॅल सेंटर बनाकर कंज्यूमर हेल्पलाइन नंबर शुरू कर दे, तो आम आदमी की परेशानियां काफी कम हो सकती हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-5707118874641375502?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/5707118874641375502/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2012/02/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/5707118874641375502'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/5707118874641375502'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2012/02/blog-post.html' title='भय बिनु होई न प्रीतिः आम आदमी के लिए काफी मददगार है नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/--kYNbs3efFo/TyuKs7W1LOI/AAAAAAAAAZI/hf4i3oUuEuA/s72-c/national-consumer-hlpline.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-3797511803559257173</id><published>2012-01-23T13:42:00.001+05:30</published><updated>2012-01-23T14:16:16.525+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पर्यावरण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बचपन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खान-पान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जिन्दगी'/><title type='text'>बेरियों के बेर पक गए...</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-M8aqj-_ZmqY/Tx0WHXD8THI/AAAAAAAAAZA/X3ixWBD0QtA/s1600/ber1.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="311" nfa="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-M8aqj-_ZmqY/Tx0WHXD8THI/AAAAAAAAAZA/X3ixWBD0QtA/s320/ber1.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आज सुबह-सुबह आॅफिस जाते वक्त छोटे-छोटे हरे-पीले बेरों से भरा एक ठेला दिखा। मतलब बसंत पंचमी आसपास ही है। इस दिन होने वाली सरस्वती पूजा में चढ़ावे में सबसे ज्यादा बेर चढ़ाए जाते हैं। आॅफिस आकर कैंलेण्डर देखा तो पता चला कि इस बार बसंत 28 जनवरी से शुरू हो रहा है। बसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा के साथ-साथ होलिका भी रखने की परंपरा है। गांवों में होली बसंत पंचमी को ही रख दी जाती है। लेकिन कुछ शहरों में चैराहों पर जगह की किल्लत को देखते हुए प्रायः एक-दो दिन पहले ही होलिका रखने का प्रचलन है। पीली सरसों, पीले कपड़े और पतंगबाजी से भी बसंत आगमन का जुड़ाव है। ऋतुओं में सबसे श्रेष्ठ ऋतु। बसंत पर न जाने कितने कवियों की कल्पनाओं ने लिख-लिख कर कलम तोड़ दीं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;खैर, हम बसंत ऋतु की नहीं बल्कि बेरों की बात करेंगे। बेर अमूमन काफी सस्ता फल है। गांव में तो जंगलों में उगे पेड़ों से आप मुफ्त में प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन महंगाई के इस दौर में मेट्रो सिटीज में बेर के दाम भी आसमान से नीचे कैसे हो सकते हैं। सरस्वती पूजा पर तो बेरों का महत्व है ही, लेकिन भोलेनाथ को भी बेर कम प्रिय नहीं हैं। इसलिए शिवरात्रि पर भी बेरों की रेलमपेल रहती है। भगवान शिव ने तो वैसे भी भस्म, बिल्वपत्र, धतूरा, भांग आदि चीजों को अपनाकर मनुष्य को प्राकृतिक जीवन जीते हुए कम से कम जरूरतों में जीवन यापन करने की सीख दी है। भगवान शिव का पूजन सबसे सरल और सबसे सस्ता है। उन्होंने कभी अपने भक्तों से छप्पन भोगों की लालसा नहीं की। बेर भी ऐसा ही फल है जो आसपास के पेड़ से तोड़कर सीधे भोले को समर्पित किया जा सकता है। इधर शबरी को जब कुटिया में पधारे अपने प्रभु का आदर सत्कार करना था, तो उस बूढ़ी भगतनी को भी बेरों से सुलभ फल कोई नहीं दिखा। बेरी का पेड़ उसको अपनी कुटिया के आसपास ही मिल गया होगा। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-8sCeK68__ns/Tx0VBjhA_wI/AAAAAAAAAY4/6BDE4MvU5j8/s1600/ber.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="300" nfa="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-8sCeK68__ns/Tx0VBjhA_wI/AAAAAAAAAY4/6BDE4MvU5j8/s400/ber.JPG" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;वैसे तो बेर एक जंगली पेड़ है। यहां-वहां यूं ही उग आता है। कांटेदार और बेहद नीरस सा नाॅन रोमैंटिक पेड़। फिर भी बाॅलीवुड की गीतों की खान में से एक-दो गानों में बेरी का जिक्र मिल ही जाता है कि साहब- &lt;em&gt;&lt;strong&gt;मेरी बेरी के बेर मत तोड़ो, कांटा लग जाएगा...&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; और दूसरा वाला था कि जी- &lt;strong&gt;&lt;em&gt;ऋतु प्यार करन की आई... और बेरियों के बेर पक गए जिंदमेरिये....&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;। गीतकार की सोच का कुछ भरोसा नहीं, जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि। बेरी जैसे कंटीले पेड़ पर ही गाना लिख डाला। लेकिन शुक्र इस बात का है कि किसी निर्देशक ने अपनी हीरोइन से बेरी के पेड़ का आलिंगन करते हुए गाना नहीं फिल्माया। दूसरे वाले गीत ने इशारों में ये भी बता दिया कि जब प्यार करने की ऋतु आती है तो बेरियों पर बेर पक जाते हैं या ये कहें कि जब बेरियों पर बेर पक रहे हों तो प्यार करना चाहिए। सो बसंत और प्रेम का संबंध कितना पुराना है ये बताने की जरूरत ही नहीं है। शिव सेना का दुश्मन मूआ वैलेंटाइन डे भी बसंत में ही आता है।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;वैसे आम का बाग लगाते लोगों को खूब सुना, लेकिन बेरी का बाग लगाते किसी को नहीं देखा, सुना। गांव में बसंत के दिनों में बच्चों का फेवरेट टाइम-पास होता है खेतों में उगे जंगली बेरों से बेर तोड़कर इकट्ठा करना। फिर चाहे उसके लिए डांट पड़े या हाथ में कांटा लगे। इतनी मेहनत से प्राप्त हुए फल भले ही खट्टे हों, पर गजब के मीठे लगते हैं। खेतों के किनारे उगी बेरी की झाडि़यों से निजात पाने के लिए किसान उसमें कई बार आग भी लगा देते हैं। पर बेशर्म इतना कि फिर से उग आता है। आम के पेड़ की तरह बेर के पेड़ के नखरे नहीं होते। बेर एक तरह से देश की आम जनता की तरह है कहीं भी किसी भी माहौल में एडजस्ट कर लेता है और आम का पेड़ नाम से ‘आम’ होते हुए भी देश के इलीट क्लास को दर्शाता है, जो हर चीज में वीआईपी ट्रीटमेंट चाहता है। गांवों में तो शायद ही कोई बेर खरीदकर खाता हो। लेकिन शहर में बेर का पेड़ खोजना फिर उससे फल तोड़कर खाना थोड़ी टेढ़ी खीर है। खैर, दिल्ली की भागमभाग से समय निकालकर सिर्फ बेर तोड़कर खाने की ख्वाहिश से गांव जाना मुश्किल है, तो जी खरीदकर ही खा लिए जाएंगे। कल बेरों पर हुई बातचीत में ये भी पता चला कि बिहार में बसंत पंचमी की पूजा के बाद ही बेर खाने की परंपरा रही है, उससे पहले खाना दोष माना जाता है। लेकिन अब बहुत कम लोग इस परंपरा को निभाते हैं। ऐसी ही एक परंपरा हमारे गांव में भी है जो गन्ने से जुड़ी है, जिसमें ‘‘देव-उठान’’ की पूजा से पहले न तो गन्ना खाया जाता है और न ईख की छिलाई शुरू की जाती है। पर इन परंपराओं के मर्म पर फिर कभी। अभी आप बाजार जाओ और बेर खरीदकर खाओ!&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-3797511803559257173?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/3797511803559257173/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2012/01/blog-post.html#comment-form' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/3797511803559257173'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/3797511803559257173'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='बेरियों के बेर पक गए...'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-M8aqj-_ZmqY/Tx0WHXD8THI/AAAAAAAAAZA/X3ixWBD0QtA/s72-c/ber1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-7806872865912459477</id><published>2011-12-17T22:59:00.000+05:30</published><updated>2011-12-17T22:59:56.100+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='युद्ध'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शांति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंसा'/><title type='text'>आ रहा है 2012!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-d_zLxb0gbuc/TuzQ6bm8TYI/AAAAAAAAAYo/OxnlNO8Z_k0/s1600/2012.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="250" src="http://1.bp.blogspot.com/-d_zLxb0gbuc/TuzQ6bm8TYI/AAAAAAAAAYo/OxnlNO8Z_k0/s400/2012.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;वर्ष 2012 आ रहा है। टीवी चैनल वालों ने जमकर तैयारी कर रखी है। बार और पब वाले भी चांदी कूटने के लिए तैयार बैठे हैं। केक कटेगा, सबको बंटेगा, गुब्बारे फूटेंगे, डांस, पार्टी, मस्ती वगैराह, वगैराह। लेकिन 2012 के बारे में कई भविष्यवाणियां भी जुड़ी हैं। इस साल की भीषणता को लेकर काफी भविष्यवाणियां हुई और उन पर काफी बहस भी। किसी ने कहा कि पानी वाली प्रलय होगी तो किसी ने कहा कि आसमान से शोले बरसेंगे। 2011 की अंतिम कुछ घटनाओं को देखा जाए तो अगले साल भीषण युद्ध के समीकरण जरूर बन रहे हैं, वो भी सबसे ज्यादा आबादी वाले दक्षिण एशिया में। लक्ष्य बनेंगे पाकिस्तान, अफगानिस्तान, अमेरिका, चीन और भारत। 2011 में भले ही अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को मारने में सफलता प्राप्त कर ली हो, लेकिन अभी भी अलकायदा के कई बड़े खिलाड़ी आतंक का कारखाना चला रहे हैं, जिनकी अमेरिका को तलाश है। इस तलाश में अमेरिका ने पाकिस्तान के तमाम नागरिकों की भी बलि ले ली, लेकिन बात तब और भी ज्यादा बिगड़ गई जब अमेरिकी हमले में 28 पाकिस्तानी सैनिक काल के गाल में समा गए। अमेरिका कहता है कि गलती से हुआ, लेकिन उससे इतना भी नहीं हुआ कि साॅरी बोल दे। ओबामा को दुख तो हुआ, लेकिन साॅरी कहने में उनकी जुबान पथरा गई। बुरी तरह तिलमिलाए पाकिस्तान ने अमेरिका से एयरबेस खाली करने का फरमान जारी कर दिया और खूब खरी-खोटी सुनाई। पाकिस्तान के फौजी आका ने तो एक कदम आगे बढ़कर अपने सैनिकों को खुली आजादी दे दी कि अमेरिकी सैनिकों को मारने के लिए आदेश का इंतजार भी न करें। पाकिस्तानी कट्टरपंथ और आईएसआई तो पहले से ही अमेरिका से खार खाए बैठी थी, उनके लिए तो अब हालात असहनीय हो चुके हैं। संबंध खराब होते देख अमेरिका ने भी अपने टुकड़े डालने बंद कर दिए और 70 करोड़ डाॅलर की मदद रोक दी है। अब पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति तो किसी से छिपी नहीं है। अमेरिकी मदद के बिना कितने दिन कमर सीधी रख पाएगा कहा नहीं जा सकता। उस पर अपना ही बोया आतंक का बीज खुद उसको ही निगलने को तैयार बैठा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमेरिकी-पाक रिश्ते सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं। अमेरिका को ओसामा के बाद अब जावाहिरी की खोज है, उसको पाए बिना वो मैदान छोड़ेगा नहीं। पाक को केवल अब चीन का ही सहारा है और चीन अमेरिका और भारत की आंखों की किरकिरी है। मोटे तौर पर देखा जाए तो युद्ध के लिए माकूल प्लेटफाॅर्म तैयार हो गया है। अगर ये युद्ध होता है तो अमेरिका के लिए ये अफगानिस्तान और इराक के बाद तीसरा युद्ध होगा। उधर ईरान भी अमेरिका पर आंखें तरेर रहा है। माना की अमेरिका बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन इतने सारे देशों से एक साथ पंगा लेकर उसने आफत मोल ले ली है। इराक और अफगानिस्तान में खरबों डाॅलर लुटाने के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था तीसरे युद्ध को किस हद तक झेल पाएगी कहा नहीं जा सकता। उधर आईएमएफ की ताजा चेतावनी में कहा गया है कि पूरा विश्व एक और आर्थिक महामंदी की ओर बढ़ रहा है, जिससे कोई भी देश अछूता नहीं रह पाएगा। लीबिया, सीरिया और मिस्र की अशांति भी कुछ कम घातक सिद्ध नहीं हुई। कुल मिलाकर 2012 की शुरुआत में विश्व के खतरनाक मोड़ पर खड़ा हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-agmey-0B0_Q/TuzRW74dMTI/AAAAAAAAAYw/8Wxc0uZQ6tA/s1600/india-america-pakistan-flags.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/-agmey-0B0_Q/TuzRW74dMTI/AAAAAAAAAYw/8Wxc0uZQ6tA/s1600/india-america-pakistan-flags.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;भारतीय उपमहाद्वीप में अगर युद्ध छिड़ता है तो भारत भी अछूता नहीं रहेगा। परोक्ष या अपरोक्ष किसी न किसी रूप से भारत को इसमें भागीदारी करनी होगी। पड़ोसी देश पाकिस्तान में आजादी के बाद से लोकतंत्र मजबूत रह ही नहीं पाया। लोकशाही पर फौज और कट्टरपंथ का वर्चस्व हमेशा रहा। वहां की राजनीति कश्मीर से ऊपर उठकर सोच ही नहीं पाई और हमेशा फौज और आईएसआई के दबाव में रही। खुदा न खास्ता अगर अमेरिका ने पाकिस्तान के खिलाफ सीधा युद्ध छेड़ दिया तो फिर पाकिस्तान जैसी कोई चीज नक्शे पर बचनी मुश्किल होगी, क्योंकि वहां लोकतंत्र टिक ही नहीं सकता। केवल फौज शासन कर सकती है, जिसे अमेरिका बर्दाश्त नहीं करेगा। तो 2012 में जिस बड़े उठा-पटक की बात कहीं जाती रही थी, उसके संकेत अभी से मिल रहे हैं। आगे आगे देखिए होता है क्या?&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-7806872865912459477?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/7806872865912459477/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/12/2012.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/7806872865912459477'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/7806872865912459477'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/12/2012.html' title='आ रहा है 2012!'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-d_zLxb0gbuc/TuzQ6bm8TYI/AAAAAAAAAYo/OxnlNO8Z_k0/s72-c/2012.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-8818102739220482648</id><published>2011-11-23T21:41:00.001+05:30</published><updated>2011-11-23T21:54:26.004+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विकास'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='System'/><title type='text'>बाप मर गए अंधेरे में और बेटे का नाम लाइट हाउस!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-XCZb2l_8V-s/Ts0a5kfmEWI/AAAAAAAAAYg/SftyrwCHPkc/s1600/VS+Bldg.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="215" src="http://2.bp.blogspot.com/-XCZb2l_8V-s/Ts0a5kfmEWI/AAAAAAAAAYg/SftyrwCHPkc/s320/VS+Bldg.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;तो जी यूपी की मिट्टी से चुनावी खुशबू आनी शुरू हो गई है और धीरे-धीरे पूरे देश में फैलती जा रही है। चैनलों पर गर्म-गर्म पकौड़ों के माफिक गर्मागर्म बहसों का दौर शुरू हो गया है। एक के बाद एक शिगूफे छेड़े जा रहे हैं और चैनलों को मुद्दे पर मुद्दे मिल रहे हैं। पत्रकार लोग ऐसे संजीदा होकर सवाल पूछ रहे हैं मानो उन्हें अपनी टीआरपी से ज्यादा सचमुच देश की चिंता सताने लगी है। जनता को लुभाने के लिए दाव पर दाव फेंके जा रहे हैं। कोई कह रहा है कि ‘उत्तर परदेस’ को चार टुकड़ों में बांट दो तो कोई बेचारे और मजलूमों के कर्ज माफ करा रहा है। बस किसी तरह ये 19 करोड़ भिखारी उनके फेवर में बटन दबा दें। लेकिन ये भिखारी कुछ ज्यादा ही श्याणे हो गए हैं। इत्ती आसानी से बटन नहीं दबाने वाले। ये लोकपाल वाले भी तो भड़काने में लगे हैं इन भिखारियों को। ऊपर से वो हरिद्वार वाले बाबा और दूसरे वो बंगलुरू वाले ये दोनों भी जनता को जागरूक करने पर तुले हैं। ‘उत्तर परदेस’ के स्कूलों में तो इस तरह की शिक्षा देने की गंुजाइश रखी ही नहीं कि लोगों का जमीर जाग सके, वो अपने दिमाग का इस्तेमाल कर सकें। चाहे कितना भी पढ़ाई कर लें, ऐसी सोशल इंजीनियरिंग की है कि लोग जाति और धर्म से ऊपर उठकर वोट डाल ही नहीं सकते। बाकी रहा-सहा काम आरक्षण का मुद्दा कर देता है। पिछले 64 सालों से आरक्षण का बाण ठीक निशाने पर लगता आया है। लेकिन अबकी बार ये सामाजाकि और आध्यात्मिक नेता सारा गुड़ गोबर करने पर तुले हैं। अरे ‘उत्तर परदेस’ की चुनावी कढ़ाई में जरा सा आरक्षण का तड़का लगाया जाता, कर्ज माफी का मसाला डाला जाता और बंटावारे की कढ़ाई पर जब चढ़ाया जाता तो जनता खुद-ब-खुद गफलत में पड़ जाती कि किसको वोट दें और किसको न दें। लेकिन पता नहीं ये लोग कहां से आ गए हैं बीच में टांग अड़ाने भ्रष्टाचार और काले-पीले धन का मुद्दा लेकर। अब बताओ जरा अपने विपक्षियों से निपटें या इन समाज के ठेकेदारों से। ‘उत्तर परदेस’ के चुनावी मैच में ये एक्स्ट्रा प्लेयर्स गड़बड़ किए दे रहे हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अब बताओ इसमें कौनसी बात हो गई कि बंटवारे का प्रस्ताव पांच मिनट में पास हुआ या पांच घंटे में या फिर जनता को किसी ने भिखारी कहा या शहंशाह, कुर्सी के गेम में थोड़ा बहुत तो चलता है। लेकिन इन खबरिया चैनलों को तो बस मुद्दा चाहिए। 24-24 घंटे के चैनल खोल रखे हैं, दिखाने के लिए कुछ है नहीं, टीआरपी बचानी है, सो जरा सी बात का बतंगड़ बना देते हैं। चेहरे पर पाउडर पोत कर ऐसे बहस करते हैं मानो देश की सबसे ज्यादा चिंता इन्हीं पत्रकारों को है। केवल अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए पब्लिक का इमोशनल सपोर्ट पाने की कोशिश करते रहते हैं। खैर चैनल और अखबार वालों से तो निपट लिया जाएगा। इनकी कमजोर नब्ज तो नेताओं के हाथ में ही होती है। चुनाव में जब पैसों की बोरियों के और दारू की बोतलों के मुंह खुलेंगे तो सारी पत्रकारिता पानी भरती नजर आएगी। लेकिन ये लोकपाल वाले और बाबा लोग जरूर नाक में दम कर सकते हैं। पब्लिक का बहुत ज्यादा जागरूक होना भी ठीक नहीं है साहब। पब्लिक जितना अंधेरे में रहे उतना अच्छा। जिनकी पीढि़यां दर पीढि़यां अंधेरे में रहती चली आई हैं, तो उनके बच्चों का नाम लाइट हाउस रखने से कोई थोड़े ही रोशनी हो जाएगी। विकास के नाम पर बंटवारे का जो पासा फेंका है, तो आपको क्या लगता है कि सचमुच हमें विकास की चिंता सता रही है। अरे चुनावी गोटी है, चली चली न चली। पांच साल में चुनाव आते हैं अरबों के वारे-न्यारे हो जाते हैं। इसी काले धन की बदौलत पूरी अर्थव्यवस्था में जबरदस्त तेजी आ जाती है। लेकिन लगे हैं लोग काले धन का ढोल पीटने। ये काला धन है जिसकी बदौलत देश की इकोनाॅमी में इतना बूम नजर आ रहा है। माॅल पर माॅल खड़े हो रहे हैं, छोटे-छोटे शहरों में भी रीयल एस्टेट आसमान से बातें कर रहा है। बिना काले धन के हो जाता ये सब। करते रहते पैंठ और हाट से शाॅपिंग। अब भगवान झूठ न बुलवाए। अगर देश-विदेश में आज भारतीय अर्थव्यवस्था की चर्चा हो रही है तो उसमें काले धन का बहुत बड़ा योगदान है, ये मत समझ लेना कि उसमें वित्तमंत्री की कोई कारीगरी है। अब समझते तो हैं नहीं। अगर भ्रष्टाचार मिट गया तो पूरी की&amp;nbsp;पूरी अर्थव्यवस्था लड़खड़ा जाएगी। आम जनता के दुख और परेशानी देखकर क्या हमारा दिल नहीं पसीजता? हमारा भी दिल रोता है। पर करें क्या? सिस्टम ही कुछ ऐसा है। तमाम दलितों के यहां हमने रातें गुजारी हैं। ऐसा नहीं है कि हमें कुछ पता नहीं है। लेकिन सिस्टम कुछ ऐसा है कि जरा सी छेड़छाड़ करने की कोशिश की तो सबसे ज्यादा नुकसान उसी को होगा जो उसे बदलने की कोशिश करेगा। तो जी जैसा चल रहा है चलने दो। पब्लिक भी अब इसी सिस्टम की आदि हो चुकी है। ज्यादा भड़काने की कोशिश की तो हालात मिस्र और सीरिया जैसे हो सकते हैं।&lt;b&gt;&lt;i&gt; (‘‘उत्तर परदेस’’ के जनहित में देश के ‘जिम्मेदार’ नेताओं द्वारा जारी!!!!)&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-8818102739220482648?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/8818102739220482648/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/11/blog-post_23.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/8818102739220482648'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/8818102739220482648'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/11/blog-post_23.html' title='बाप मर गए अंधेरे में और बेटे का नाम लाइट हाउस!'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-XCZb2l_8V-s/Ts0a5kfmEWI/AAAAAAAAAYg/SftyrwCHPkc/s72-c/VS+Bldg.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-6909724094850683463</id><published>2011-11-18T13:32:00.001+05:30</published><updated>2011-11-18T13:34:26.912+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विकास'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कायदा कानून'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शिक्षा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जिन्दगी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='System'/><title type='text'>पैसा बटोरने वाले कॉलेजों से बेहतर तो तिहाड़ जेल निकली!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: left; margin-right: 1em; text-align: left;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-Uu48L0cCVCQ/TsYPXslN5xI/AAAAAAAAAYQ/_-jLWqM-FfI/s1600/TiharProdsShop.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" hda="true" height="213" src="http://1.bp.blogspot.com/-Uu48L0cCVCQ/TsYPXslN5xI/AAAAAAAAAYQ/_-jLWqM-FfI/s320/TiharProdsShop.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;एक शो रूम में तिहाड़ के उत्पाद. &amp;nbsp;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;अब इसे समय की विडंबना कहें या फिर बदलते समीकरण&amp;nbsp;कि संभ्रांत कॉलेजों में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स चेन स्नेचिंग और वाहन चोरी जैसी घटनाओं में पकड़े जा रहे हैं और तिहाड़ जेल में सजायाफ्ता कैदी पढ़-लिख कर प्लेसमेंट प्राप्त कर रहे हैं। खबर है कि तिहाड़ जेल के 100 कैदियों को विभिन्न कंपनियों ने अच्छे पैकेज पर लिया है। जो सबसे मोटा पैकेज दिया गया है वो है छह लाख प्रति वर्ष। कैंपस प्लेसमेंट में ऐसे कैदियों ने भाग लिया जो जेल में रहकर विभिन्न प्रोफेशनल कोर्स कर रहे थे और जिनकी सजा आने वाले एक साल में पूरी होने वाली है। तिहाड़ जेल इससे पहले भी अपनी विशेषताओं के चलते चर्चा में रही है। कैदियों पर जितने प्रयोग इस जेल में किए गए, वे देश की किसी भी जेल में नहीं हुए। कितने ही मामले ऐसे हैं जिनमें अपराधियों के लिए तिहाड़ जेल एक वरदान साबित हुई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: left; margin-right: 1em; text-align: left;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-_sVEKbhfDb4/TsYP8bU-Y3I/AAAAAAAAAYY/VwxcBTm6hr4/s1600/PM-TJ%2527s09_i.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" hda="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-_sVEKbhfDb4/TsYP8bU-Y3I/AAAAAAAAAYY/VwxcBTm6hr4/s1600/PM-TJ%2527s09_i.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;तिहाड़ की नमकीन. &lt;br /&gt;तिहाड़ जेल का ट्रेड मार्क है टीजे. &lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;यहां पर सवाल फिर वही उठता है कि सवा सौ करोड़ के देश में केवल एक जेल ऐसी है जिसमें कैदियों को सुधारने की दिशा में कदम उठाए जाते हैं। एक मानवाधिकार संगठन के वर्ष दो हजार के आंकड़ों को देखा जाए तो देश की सभी जेलों में कुल 211720 कैदी रखे जा सकते हैं, लेकिन उनमें 248115 कैदी कैद हैं। भारतीय जेलों की रिहायशी दर 117.19 प्रतिशत तक पहुंच गई हैं। तिहाड़ जेल भी इस समस्या से अछूती नहीं रही है। लेकिन फिर भी तिहाड़ जेल में कैदियों के लिए विशेष कार्यक्रम चलाए जाते रहे हैं। लेकिन अगर जिला स्तर पर जाकर देखें तो जेल वास्तव में नर्क का द्वार हैं। कैदियों के लिए विशेष कार्यक्रम तो दूर की बात है, वहां बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं। वातावरण ऐसा है कि अगर यहां की जेलों में कोई छोटा अपराधी जाता है तो वहां से और बड़ा अपराधी बनकर निकलता है। मतलब अगर अन्ना हजारे की भाषा में कहें तो क्राईम का ग्रजुएट जाता है और डाॅक्टरेट करके निकलता है। जेलों का महाभ्रष्ट तंत्र कुछ इस प्रकार का है कि पैसे के दम पर वहां कानून की धज्जियां सरेआम उड़ाई जाती हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिए मेरठ के जिला कारागार में कई बार जब छापे मारे गए तो वहां कैदियों के पास से मोबाइल मिले, पैने हथियार बरामद किए गए और न जाने क्या क्या! हर बार छापा पड़ता है और हर बार ऐसा होता है। कैदियों तक ये सामान पहुंचाते हैं उनसे मिलने आने वाले उनके परिजन, लेकिन उनको रखने की इजाजत आखिर कौन देता है। जेल प्रशासन देखकर भी चीजों को अनदेखा कर देता है। जेल के अंदर कैदियों की जरूरत का सामान बेचने के लिए दुकान भी होती है। लेकिन चीजों के दाम बाजार से पांच गुना लिए जाते हैं। खुद जेल में मौजूद जेल स्टाफ चंद पैसों के लिए कैदियों की उंगलियों पर खेलते हैं। ये तो बेहद छोटी किस्म की चीजों का उल्लेख किया। बड़ी-बड़ी कारस्तानियों को अंजाम दिया जा रहा है। इस सब की जानकारी जेल के जेलर समेत पूरे मेरठ प्रशासन को भी है। लेकिन फिर भी चीजें चल रही हैं। सिर्फ औपचारिकता के लिए कभी-कभी छापे मार दिए जाते हैं। उसके बाद स्थिति जस की तस। और ऐसा केवल मेरठ में नहीं है, देश की समस्त जेलों में अमूमन यही हाल है, कहीं थोड़ा कम तो कहीं थोड़ा ज्यादा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिला प्रशासन के पास इतना वक्त ही नहीं कि कैदियों के बारे में थोड़ा रचनात्मक ढंग से सोचकर जेल का एक सुधारगृह के रूप में तब्दील करे। यहां तक कि जो बाल सुधार गृह या बच्चा जेल हैं उनमें भी बच्चों को सुधारने की दिशा में कुछ रचनात्मक नहीं किया जा रहा। कुछ सामाजिक संगठन समय-समय पर जरूर वहां अपनी गतिविधियां आयोजित करते रहते हैं। ऐसा भी नहीं कि जिला प्रशासन के पास सोच नहीं है। लेकिन जेलों को अगर सुधार गृह बनाने की कोशिश की गई तो वहां से आने वाली कमाई पर ब्रेक लग जाएंगे। शायद ही कोई जेलर ऐसा चाहे। तिहाड़ की तरह भारतीय जेलों में तमाम प्रयोग किए जा सकते हैं। सवाल ही नहीं कि इंसान के अंदर सुधार न आए। कुछ अपराध न चाहते हुए भी परिस्थितिवश करने पड़ते हैं। लेकिन अगर जेल में भी नारकीय परिस्थिति मिले तो इंसान की मानसिक हालत और जड़ हो जाती है। तिहाड़ को माॅडल मानकर भारतीय जेलों में जेल इंडस्ट्री भी बनाई जा सकती है। कैदियों की अभिरुचि के मुताबिक उनको प्रशिक्षित किया जा सकता है या उनसे कोई भी रचनात्मक काम कराया जा सकता है। वरना जेलों में अपराधी जाते रहेंगे और वहां से घोर अपराधी बनकर बाहर आते रहेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-6909724094850683463?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/6909724094850683463/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/11/blog-post_18.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/6909724094850683463'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/6909724094850683463'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/11/blog-post_18.html' title='पैसा बटोरने वाले कॉलेजों से बेहतर तो तिहाड़ जेल निकली!'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-Uu48L0cCVCQ/TsYPXslN5xI/AAAAAAAAAYQ/_-jLWqM-FfI/s72-c/TiharProdsShop.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-767408694383341625</id><published>2011-11-15T12:20:00.001+05:30</published><updated>2011-11-15T12:26:40.803+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विकास'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='System'/><title type='text'>कान खोल कर सुन लो यूपी के भिखारियों!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-hUfGsFkraMU/TsIJ92y8BgI/AAAAAAAAAYA/k-n53LwoxuE/s1600/rahul+2.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="238" nda="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-hUfGsFkraMU/TsIJ92y8BgI/AAAAAAAAAYA/k-n53LwoxuE/s320/rahul+2.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;यूपी में रहने वाले भिखारियों (निवासियों) तुम्हारे दिन बदलने वाले हैं। तुम्हारा मुकद्दर बदलने के लिए राहुल गांधी आ गए हैं। अब तुमको नौकरी के लिए पलायन नहीं करना पड़ेगा। राज ठाकरे की लातें नहीं खानी पड़ेंगी, शिव सेना की बातें नहीं सुननी पड़ेंगी। तुम्हारे गौरवशाली दिन लौट सकते हैं। बशर्ते तुम कांग्रेस को वोट दो। अगर तुमने कांग्रेस को वोट नहीं दिया तो तुम भिखारी के भिखारी रहोगे। एक कांग्रेस और राहुल गांधी ही हैं जो तुमको तुम्हारी दुर्गति से निकाल सकते हैं। शायद आपने भाषण देते वक्त उनका आत्मविश्वास नहीं देखा। इतना आत्मविश्वास तो रावण को वरदान देते वक्त ब्रह्मा में भी नहीं रहा होगा। लेकिन राहुल गांधी पूरे आत्मविश्वास से आपको अपना वरदान दे रहे हैं कि यूपी के भिखारियों अब तुमको कहीं जाकर भीख मांगने की जरूरत नहीं हैं। बस तुम कांगे्रस को वोट दो और तुम्हारे सुनहरे दिन आ जाएंगे। घर में धन की वर्षा होगी, कोई बेरोजगार नहीं होगा, गरीबी मिट जाएगी, भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा, महिलाएं सुरक्षित घूम सकेंगी, थानों में तुम्हारी सुनवाई होगी ये सब करिश्मा आपका राहुल गांधी करके दिखाएगा। बस इस बार आप कांग्रेस को वोट दो। भूल जाओ माया, मुलायम, और राजनाथ को, भूल जाओ हाथी, साईकिल और फूल को, बस याद रखो कांग्रेस के हाथ को। फिर देखना आपकी किसमत कैसे बदलती है। तो क्या हुआ कि राहुल बाबा को तुम्हारे दर्द और परेशानियों को समझने के लिए तुम्हारी गलियों में पैदल घूम-घूम कर खटिया पर रात बितानी पड़ी। विदेशों में रहने के कारण थोड़ा गैप आ ही जाता है। पर अब राहुल बाबा तुम्हारे दर्द को समझ गए हैं, तुम्हारी रोटी का स्वाद उन्होंने चख लिया है, जातियों के समीकरण भी दिमाग में घुस गए हैं, उम्मीदवार तुम्हारी जातियों और धर्मों के मुताबिक ही उतारे जाएंगे। लेकिन राहुल बाबा तुम्हारे लिए तब तक कुछ नहीं कर सकते जब तब आप उनको अपना वोट नहीं दोगे। तो इस बार के चुनाव में जमकर कांग्रेस को वोट डालना। तो क्या हुआ कि राहुल यहां किसी दूसरे को मुख्यमंत्री बनाएंगे और खुद प्रधानमंत्री पद के लिए प्रैक्टिस जारी रखेंगे। सत्ता की लगाम तो आखिरकार उनके ही हाथ में रहेगी न। वे तुमसे मिलने आएंगे। तुम्हारी गलियों में पदयात्रा करेंगे। टाटा सफारी की छत पर बैठकर तुमको दर्शन देंगे। तुम उन पर फूलों की वर्षा करना। फूल तुम्हें खरीदने की जरूरत नहीं युवराज के चमचे फूल तुमको मुफ्त में प्रदान कर देंगे। हां, अगर तुम दलित हो तो युवराज तुम्हारे घर में रोटी भी तोड़ सकते हैं। फिर देखना ऐसा करते-करते तुम्हारी जिंदगी बदल जाएगी। राहुल को देखते ही तुम्हारे पेट की भूख मिट जाएगी, बेरोजगारी का दर्द खत्म हो जाएगा, अन्याय की आग तुमको ठंडक देना शुरू कर देगी। चिंता मत करो यूपी के भिखारियों राहुल बाबा ने पूरे होशो-हवास में तुम लोगों से जो वादा किया है वो उसे जरूर पूरा करेंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर देश को आजादी के बाद पिछले 65 सालों में से 55 साल तक राहुल के पापा, दादी और नाना ने ही चलाया है। और अभी पिछले सात सालों से उनकी मम्मी उनके अंकल मनमोहन के माध्यम से देश को लगातार चलवा रही हैं। उनके परिवार को देश चलाने का सबसे ज्यादा तजुर्बा है। अनुभव की दृष्टि से भी आपको राहुल की बात माननी चाहिए। उनके परिवार के राज में देश कितनी तरक्की कर रहा है। दिनों-दिन पैसा बढ़ रहा है। इतना पैसा हो गया है कि देश के बैंकों में जगह कम पड़ गई है और विदेशी बैंकों में पैसा जमा करवाना पड़ रहा है। सब ओर खुशहाली ही खुशहाली है। देश में कितनी भी महंगाई क्यों न हो, लोगों के घरों का चूल्हा लगातार जल रहा है। ऊंची से ऊंची महंगाई में भी लोगों के घर चल रहे हैं। इसे आप कम बात समझते हो। महंगाई तो केवल पब्लिक का परीक्षण करने के लिए है कि कहीं देश में गरीबी तो नहीं है। महंगाई बढे़गी तो गरीब लोग चिल्लाएंगे, सड़कों पर निकलकर आएंगे, तो उनको चिन्हित कर लिया जाएगा। लेकिन कोई सड़कों पर निकल कर नहीं आया। सब अपने घरों में चैन से हैं। देश का हर इंसान 32 रुपए कमा रहा है। तो देखा आपने कांग्रेस ने देश से गरीबी मिटाने में सफलता प्राप्त कर ली है। केवल यूपी में भिखारी बचे हुए हैं। वो भी इसलिए क्योंकि पिछले 22 साल से यूपी के भिखारियों ने कांग्रेस को नहीं चुना। हे! उत्तर प्रदेश के 20 कारोड़ भिखारियों, अपने युवराज की आवाज सुनो। वे तुम्हारे दुख से बेहद दुखी हैं। तुम्हारा दर्द समझने के लिए वो दिन रात एक किए हुए हैं, तो तुम्हारा भी फर्ज बनता है कि तुम भी उनके दर्द को समझो। कांग्रेस को वोट दो। कांग्रेस का हाथ, भिखारियों के साथ।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-767408694383341625?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/767408694383341625/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/11/blog-post_15.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/767408694383341625'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/767408694383341625'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/11/blog-post_15.html' title='कान खोल कर सुन लो यूपी के भिखारियों!'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-hUfGsFkraMU/TsIJ92y8BgI/AAAAAAAAAYA/k-n53LwoxuE/s72-c/rahul+2.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-3739796357077699785</id><published>2011-11-12T18:13:00.001+05:30</published><updated>2011-11-12T18:17:12.782+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='System'/><title type='text'>राग-ए-उमर</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-BeQD-6DvVRQ/Tr5p5DbF2YI/AAAAAAAAAX4/8wU4tpNLC10/s1600/omar.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="238" nda="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-BeQD-6DvVRQ/Tr5p5DbF2YI/AAAAAAAAAX4/8wU4tpNLC10/s320/omar.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;जम्मू-कश्मीर के युवा मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को गद्दी ज्यादा रास आ रही है। रास आए भी क्यूं न ये उनकी खानदानी गद्दी है जिस पर कभी उनके पिता और उससे पहले उनके दादा विराजमान थे। और भारतीय लोकतंत्र अगर इसी पैटर्न पर चलता रहा तो आगे चलकर उमर की संतानें इस गद्दी की शोभा बढ़ाएंगी। ये वही अब्दुल्ला परिवार है जिसने कभी सत्ता से बाहर रहना नहीं सीखा। जब ये परिवार दिल्ली में होता है तो इसके सुर कोई और होते हैं और जब ये कश्मीर में होता है तो दूसरे। सत्ता की लोलुपता का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि उसका सुख भोगने के लिए ये परिवार उनका भी दामन थाम सकता है जिनको ये अपना दुश्मन कहता है, जिनके साथ इनका न विचार मेल खाता है और न विचारधारा। जिस भाजपा को सुबह से शाम तक गरियाने में जो पार्टी कभी पीछे नहीं रहती उसी पार्टी के मुखिया भाजपा को समर्थन देकर वाजपेयी मंत्रीमंडल में मंत्री भी बन जाते हैं। किसी भी कीमत पर सत्तासुख भोगने वाले लोग क्या कभी राष्ट्रहित में निर्णय ले सकते हैं? उनकी नजरों में सदैव कुर्सी प्रथम होती है। ऐसे में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अबदुल्ला सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून को हटाने की जो मांग कर रहे हैं उसको उनकी सत्ता की महत्वाकांक्षा और इमोशनल वोट बैंक पाॅलिटिक्स के नजरिए से क्यों न देखा जाए? खैर बात हो रही है गद्दी पर रासलीला की। उमर ने शिगूफा छेड़ा है कि जम्मू-कश्मीर में प्रयोग के तौर पर कुछ इलाकों से सशस्त्र सेना विशेषाधिकार कानून हटा दिया जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुख्यमंत्री के इस बयान से देश में एक बहस छिड़ गई है। तमाम तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता और मानवाधिकार संगठनों ने लामबंद होकर उनका समर्थन करना शुरू कर दिया है। पूर्वोत्तर राज्यों और कश्मीर की समस्या को एक ही चश्मे से देखने की कोशिश की जा रही है। जबकि दोनों जगह ये कानून लगाने के पीछे अलग-अलग कारण हैं। मणिपुर की इरोम शर्मिला का उदाहरण देकर कश्मीर से एफ्सपा हटाने की मांग की जा रही है। कल एनडीटीवी पर प्राइमटाइम में इस विषय पर एक बहस दिखाई जा रही थी, जिसमें एक सामाजिक कार्यकर्ता कम पत्रकार राहुल पंडिता भारतीय सेना को समाज का शत्रु बताने पर तुले थे। उनकी बातों में झलक रहा था मानो भारतीय सेना विश्व की समस्त सेनाओं में मानवाधिकारों का सबसे ज्यादा हनन कर रही है। और अपने इन्हीं कुतर्कों के आधार पर वे कश्मीर से एफ्सपा हटाने की मां कर रहे थे। बहस में मौजूद आर्मी के रिटायर्ड मेजर जनरल जीडी बख्शी ने तो उनकी अच्छी खबर ली और जमकर सुनाया। बहस के दौरान जनरल बख्शी को इतना गुस्सा आ गया कि पंडिता का चेहरा पीला पड़ गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(देखें विडियो-&lt;a href="http://khabar.ndtv.com/PlayVideo.aspx?id=215864"&gt;http://khabar.ndtv.com/PlayVideo.aspx?id=215864&lt;/a&gt;&amp;nbsp;)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनरल बख्शी का गुस्सा लाजमी था। मानवाधिकार के दो-चार कानून पढ़कर और उसके नाम पर विदेशों से फंड इकट्ठा करके मलाई मारने वाले चंद मानवाधिकार कार्यकर्ता अपने छिछले ज्ञान से भारतीय सेना पर उंगली उठाने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। ऐसी हरकत करते हुए वे ये भूल जाते हैं कि अगर जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर में सेना की मौजूदगी न होती तो आज देश के गई टुकड़े हो गए होते। वे भूल जाते हैं कि कितने जवानों ने देश को अखंड रखने के लिए अपने प्राणों की आहुतियां दीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुद को लीग से हटकर दिखाना और नाॅर्मल चीजों पर एब्नाॅर्मल राय देना या तो फैशन बन गया है या फिर उसमें कोई न कोई फायदा निहित होता है। लेकिन दुखद पक्ष ये है कि इस ट्रेंड में हमने अपनी सेना को भी टार्गेट करना शुरू कर दिया है। इससे हमारे उन सैनिकों पर जो देश के लिए अपना खून बहाते हैं क्या असर पड़ेगा इसका अंदाजा लगाना कठिन है। हो सकता है कि इस कानून की वजह से एक-दो घटनाएं ऐसी घटित हुई हों जिसमें मानवाधिकारों का हनन हुआ हो। लेकिन अगर इस कानून का आधार न होता तो कश्मीर के अलगाववादी संगठन कब का उसे निगल गए होते। इस कानून का ही डर है कि आतंकी अपना सिर उठाने से घबराते हैं। यही कानून का सहारा है कि फौज हर साल अपने दम पर अमरनाथ यात्रा संपन्न कराती है। जम्मू-कश्मीर पुलिस के भरोसे अमरनाथ यात्रा कभी नहीं पूरी की जा सकती। आज जिस कश्मीर में जिस शांति की दुहाई दी जा रही है वो भी फौज के दम पर ही है। एक दिन के लिए भी अगर फौज को वहां से बुला लिया जाए तो उमर अब्दुल्ला अपनी लाड़ली कुर्सी ढूंढते रह जाएंगे। लाखों विस्थापित कश्मीरी पंडितों के मसले पर आज तक जम्मू-कश्मीर सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठा पाई, वो सरकार अगर मानवाधिकार की बात करती है तो समझ से परे है। ताली एक हाथ से नहीं बजती। अच्छा हुआ होता अगर एफ्सपा हटाने से पहले विस्थापित कश्मीरी पंडितों को फिर से कश्मीर में बसाने के बारे में कोई कदम उठाया होता।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-3739796357077699785?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/3739796357077699785/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/11/blog-post_12.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/3739796357077699785'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/3739796357077699785'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/11/blog-post_12.html' title='राग-ए-उमर'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-BeQD-6DvVRQ/Tr5p5DbF2YI/AAAAAAAAAX4/8wU4tpNLC10/s72-c/omar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-5272405264550911499</id><published>2011-11-08T18:38:00.000+05:30</published><updated>2011-11-08T18:38:32.689+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जिंदगी और मौत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आस्था'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><title type='text'>भीड़ का मतलब भगदड़ः लाखों लोगों को इकट्ठा करना अब नासमझी!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-IWUPT1qBoyE/TrkoYBz2a8I/AAAAAAAAAXw/kG2d0MtkXKE/s1600/haridwar+stampede.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="261" ida="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-IWUPT1qBoyE/TrkoYBz2a8I/AAAAAAAAAXw/kG2d0MtkXKE/s320/haridwar+stampede.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;भारत में भीड़ का मतलब भगदड़ बन चुका है। देश में कोई विशाल कार्यक्रम आयोजित किया जाए और भगदड़ न मचे ऐसा कम ही होता है। ताजा खबर मिली है हरिद्वार के शांतिकुंज से जहां श्री राम शर्मा आचार्य की जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य में आयोजित पांच दिवसीय कार्यक्रम के तीसरे दिन लोगों की भीड़ के सामने व्यवस्थाएं चरमरा गईं और तकरीबन 16 लोग काल के गाल में समा गए और ढेरों लोग घायल हो गए। मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है और मरने वालों में हमेशा की तरह श्रद्धावान महिलाओं की तादाद ज्यादा है। अभी तक प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक 14 महिलाएं और दो पुरुष।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाहे बसपा की रैली हो या कोई धार्मिक महाकुंभ भगदड़ भारतीय आयोजनों का एक हिस्सा बन चुकी है। जनसंख्या बढ़ी है, आने-जाने के साधन बढ़े हैं, लोगों के पास पैसा बढ़ा है, लेकिन लोगों का सिविक सेंस जस का तस है, संसाधन और स्थान जस के तस हैं। व्यवस्थाएं बनाने वाले व्यवस्थापकों बुद्धि कितना भी दम लगा ले लेकिन भीड़ के सामने लंबलेट हो जाती है। गायत्री परिवार अपने संस्थापक श्री राम शर्मा की जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य में सालभर से इस कार्यक्रम की तैयारी कर रहा था। लेकिन सालभर की मेहनत का अंजाम ये होगा ये किसी ने भी सोचा नहीं होगा। चाहे किसी पाॅलिटिकल पार्टी के आयोजन हों या धार्मिक आयोजन इस तरह की विशाल भीड़ जुटाने का मकसद केवल शक्ति प्रदर्शन होता है। हर संगठन इस प्रकार के आयोजन करके समाज के समक्ष अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है। लेकिन ज्यों-ज्यों आवागमन के साधन बढ़े, लोगों के पास पैसा बढ़ा, त्यों-त्यों इस तरह के आयोजनों में लोगों की भागीदारी भी बढ़ती गई। आज सुबह ही जब मैंने संस्कार टीवी खोला तो डाॅ. प्रणव पांड्या अपने अनुयायियों से शांति और व्यवस्था बनाए रखने की अपील कर रहे थे। बल्कि उन्होंने कहा कि अगर व्यवस्थाओं का ख्याल नहीं रखेंगे तो भगदड़ मच सकती है और थोड़ी देर बाद जब में आॅफिस पहंुचा तो भगदड़ मच चुकी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल कार्यक्रम में 1551 कुडीय यज्ञ आयोजित हो रहा है, जिसमें आहुतियां देने के लिए हर कोई आतुर था। हर संभव प्रयास किया जाए तब भी इन 1551 कुंडों पर 25 हजार से ज्यादा लोगों को नहीं बैठाया जा सकता। लेकिन हरिद्वार पहुंचे श्रद्धालुओं की संख्या लाखों में है। 80 देशों से लोग आए हैं। गायत्री परिवार की ओर से कभी इनकी संख्या 5 लाख बताई जा रही है तो कभी 20 लाख। इसलिए यज्ञ को कई पारियों में आयोजित किया गया। हवन कुंड में आहुतियां देने के लिए लोगों में ऐसा उन्माद था कि रोके नहीं रुक रहे थे। जैसा कि खबर मिली है कि भगदड़ हवनकुंड में आहुतियां देने को आतुर लोगों के बीच ही मची जिसमें 16 लोगों ने अपने जीवन की आहुतियां दे दीं। इस तरह का ये कोई पहला हादसा नहीं है। इससे पहले भी भीड़ में भगदड़ मचने के हादसे होते रहे हैं। मरने वालों में आम लोग ही शामिल होते हैं। क्योंकि जो खास हैं, उनके लिए खास स्थान पहले से ही मनोनीत होते हैं। लेकिन फिर भी कभी इस दिशा में हमने सोचने की कोशिश नहीं की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रिकाॅर्ड भीड़ इकट्ठा करने की जुगत में लगे संगठनों का ऐसे आयोजनों के पीछे कई मकसद छिपे होते हैं। लेकिन अगर मकसद ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपने विचारों को पहुंचाना हो तो फिर उसके लिए इस तरह का आयोजन रखना कोई जरूरी तो नहीं। आचार्य श्रीराम शर्मा की जन्मशताब्दी के उपलक्ष्य में ज्यादा जरूरी था कि उनके परिवार से जुड़े करोड़ों लोग अपने गांवों और शहरों में कार्यक्रमों का आयोजन करते और उन लोगों का मार्गदर्शन करते जो अभी भी अंधकारमय जीवन जी रहे हैं। या वे करोड़ों लोग ये सुनिश्चित करते कि क्या उन्होंने अपने और अपने परिवार के भीतर अपने गुरु के निर्देशों को उतारा है या फिर केवल दिखावे के लिए खुद को अपने गुरु का अनुयायी मानते हैं। क्या शांतिकुंज जाने से पहले वे अपने घर शांति स्थापित कर पाए हैं या फिर घर में अशांति करके शांतिकुंज की ओर प्रस्थान कर रहे हैं। आज छोटे-छोटे स्तरों पर जाकर बदलाव करने की आवश्यकता है न कि एक केंद्रीय स्थान पर बैठकर लाखों लोगों को इकट्ठा करने की। आचार्य श्री की जन्मशताब्दी पर ये आवलोकन करने की आवश्यकता थी कि क्या उनके द्वारा जिया गये सादा और उच्च विचारों से परिपूर्ण जीवन से हम कितना अपने अंदर उतार पाए। क्या हम उनके बताए मार्ग पर चल रहे हैं या संगठन के भीतर आपसी खींचतान में लगे हैं। मैंने जिलास्तर पर कई बड़े संगठनों के से जुड़े कार्यकर्ताओं से बात की है, उनके अंदर अपने मिशन के प्रति ध्येय कम पाया और श्रेय लेने की होड़ अधिक थी, अखबारों में छपने की होड़ अधिक थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-pdh-4hVcRWY/TrkoC5voYbI/AAAAAAAAAXo/IUz2WrERqLM/s1600/shanti+kunj.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" ida="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-pdh-4hVcRWY/TrkoC5voYbI/AAAAAAAAAXo/IUz2WrERqLM/s320/shanti+kunj.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;हरिद्वार में शांतिकुंज मैं कई बार गया और एक चीज मेरा बार-बार ध्यान खींचती थी। आश्रम में प्रवेश करने के कई द्वार हैं, लेकिन जो उसका मुख्य द्वार है, जो सीधे गुरु जी और माता जी की समाधि तक जाता है वो इतना छोटा है कि उसको देखकर लगता ही नहीं कि ये इतनी बड़ी संस्था का मुख्य द्वार है, जिसके साथ करोड़ों लोग जुड़े हुए हैं। किसी कार्यक्रम या पर्व के दौरान ये द्वार खचाखच भरा रहता है। किसी भी बड़ी संस्था का इतना संकरा रास्ता मैंने कभी नहीं देखा। पता नहीं शांतिकुंज के व्यवस्थापकों का ध्यान इस ओर कभी गया कि नहीं। खैर अब हादसा हो चुका है, जानें जा चुकी हैं, श्रद्धांजलियों का सिलसिला शुरू हो चुका है, अनुदान घाषित किए जा रहे हैं। लेकिन ये विचार करने का समय है कि ये परिवर्तन का समय जरूर है, लेकिन परिवर्तन इस तरह नहीं आएगा। आज लोगों को अपने तक बुलाने की अपेक्षा उन तक पहुंचकर सुधार किया जाए। संस्थाएं विचार करें कि उनका लक्ष्य आखिर है क्या? वे चाहती क्या हैं? किसी भी कार्यक्रम को केवल इसलिए आयोजित न किया जाए कि शक्ति प्रदर्शन करना है। इसके लिए राजनीतिक पार्टियां ही बहुत हैं। सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं पर आज खास जिम्मेदारी है, उनको लोगों को जागरुक करने के साथ-साथ शिक्षित भी करना है। जब तक बड़ा कार्यक्रम आयोजित करने के पीछे कोई बहुत बड़ा मकसद न हो तब तक ऐसे विशाल आयोजन न ही किए जाएं तो बेहतर।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;वैसे भी पर्यावरण की दृष्टि से इतनी लाखों की भीड़ एक ही स्थान पर इकट्ठा करना उचित नहीं। गंगा नगरी में इतने लोग जब एक साथ पहुंचेंगे तो गंदगी तो फैलेगी ही और उस गंदगी का सीधा असर गंगा पर ही पड़ता है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-5272405264550911499?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/5272405264550911499/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/11/blog-post_08.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/5272405264550911499'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/5272405264550911499'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/11/blog-post_08.html' title='भीड़ का मतलब भगदड़ः लाखों लोगों को इकट्ठा करना अब नासमझी!'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-IWUPT1qBoyE/TrkoYBz2a8I/AAAAAAAAAXw/kG2d0MtkXKE/s72-c/haridwar+stampede.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-336638689458693753</id><published>2011-11-06T12:12:00.000+05:30</published><updated>2011-11-06T12:12:29.845+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाज़ार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='System'/><title type='text'>ये कौन नचा रहा है देश की आवाम को कठपुतली की तरह!!!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-I2xnJfLjCCk/TrYsBgkRGfI/AAAAAAAAAXc/GkDEPc6nqAg/s1600/inflation.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="232" ida="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-I2xnJfLjCCk/TrYsBgkRGfI/AAAAAAAAAXc/GkDEPc6nqAg/s320/inflation.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;महंगाई डायन है, महंगाई चु़ड़ैल है, महंगाई भूतनी है! हर गली, हर गांव, हर मोहल्ले, हर चैराहे, हर शहर में महंगाई ऐसी खुल्ली होकर नाच रही है जैसे मुंबई के क्लबों में बार बालाएं नाचती थीं। भारत के मिडिल क्लास के लिए महंगाई एक डरावना सपना बन गई है। एक भी तो ऐसी चीज नहीं बची जिसको सस्ता कहा जा सके। एक भारतीय रेल के जनरल डिब्बों के किराए को छोड़कर हर चीज के दाम महीना तो दूर हर हफ्ते बढ़ जाते हैं। 10 रुपये में निरमा का जो 500 ग्राम का पैकेट आता था वो अब 400 ग्राम का हो चुका है। कंपनियां अपने ग्राहकों को साइकोलाॅजिकली ट्रीट कर रही हैं। कभी सोचा भी नहीं था कि चीजों का वजन इस तरह घटेगा कि बाजार में 100 ग्राम, सवा तीन सौ ग्राम के भी पैकेट मिला करेंगे। पहले सब्जी वाले सीधे किलो भर का रेट बताते थे। अब वही सब्जी वाले एक पाव का रेट बताते हैं। बताएं भी क्यों न, जो सब्जी अभी थोड़े दिन पहले तक 10-15 रुपए किलो मिल जाती थी, वही सब्जी अब 10-15 रुपए पाव बिक रही है। एक पाव सब्जी लेने पर सब्जी वाला ऐसे देखता था मानो कहां का कंगाल आ गया हो। अब तो चेहरे पर मुस्कुराहट के साथ 100 ग्राम सब्जी भी तोलकर देने को तैयार है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;लेकिन हम भारतीयों की सबसे अच्छी बात यही है कि हम हर परिस्थिति में एडजस्ट कर लेते हैं। हमने महंगाई के साथ भी एडजस्ट करना सीख लिया है। घर की गृहणी से लेकर बच्चों तक को समझ हो गई है कि महंगाई बहुत ज्यादा है माता-पिता के सामने नाजायज मांगें न रखें। अबकी दीवाली पर जब मैं मुरादाबाद में पटाखों के बाजार में गया तो देखा कि बच्चे नन्हीं-नन्हीं थैलियों में पटाखे खरीदकर ले जा रहे थे। किसी के पास पटाखों का जखीरा नहीं था, मानो केवल नेग करने के लिए पटाखे खरीद रहे हों। पटाखा बाजार में बैठे दुकानदार भी कुछ खास उत्साहित नजर नहीं आ रहे थे। महंगाई के चलते दुकानदारों ने भी माल कम ही मंगवाया था। अब से तीन-चार साल पहले मैंने उसी शहर में लोगों को बोरे भर-भर कर पटाखे खरीदते देखा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इस महंगाई का सबसे दुखद पक्ष यही है कि सबसे ज्यादा मार रोटी पर है। खाने-पीने की वस्तुओं के जिस तरह से दाम बढ़ रहे हैं, वह बेहद निराशाजनक है। इलेक्ट्राॅनिक्स आइटम हों या आॅटो बाजार यहां काॅम्पटीशन के चलते बहुत ज्यादा महंगाई की मार नजर नहीं आती। बल्कि कार और बाइक खरीदना तो कहीं आसान हो गया है, लेकिन पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के बीच उनको चलाना एक टेढ़ी खीर है। लेकिन रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी चीजों पर तो महंगाई ऐसे चढ़कर बैठ गई है जैसे मुर्गी अपने अंडों पर बैठती है। आटा, चावल, दालें, तेल, चीनी, सब्जियां, फल, दूध, दही, पनीर जैसी चीजों के दाम आम आदमी को चैन से सोने नहीं दे रहे। खाने की चीजों के दाम तब आसमान छू रहे हैं जब हम रिकाॅर्ड फसल उत्पादन का दावा करते हैं और हमारे भंडार भरे हुए हैं। लेकिन इस रिकाॅर्ड उत्पादन का लाभ न तो गांव के किसान को हो रहा है और न शहर के उस ग्राहक को हो रहा है जो परचून की दुकान से आटा खरीदता है। इन दोनों के बीच में कोई है जो बहुत मोटा कमा रहा है। वो कौन है, कैसा दिखता है, क्या करता है, ये किसी को नहीं पता। वो एकदम उस ब्रह्म के समान है, जो है लेकिन दिखता नहीं। उसकी लीला कुछ ऐसी है कि देश की पूरी जनता को कठपुतली के समान नचा रहा है। वो कोई बहुत गहरा और समझदार कलाकार है, जो बड़ी सफाई के साथ किसानों का पसीना पी रहा है और जनता का टैक्स हड़प रहा है। जैसे ब्रह्म को जानना बहुत कठिन है उसी प्रकार इस कलाकार को भी पहचानना बेहद मुश्किल है। जैसे कठिन साधना के उपरांत अगर कोई ब्रह्म को जान लेता है तो उसको जानने के बाद उसी के जैसा बन जाता है, उसी प्रकार इस कलाकार को जब कोई पहचान लेता है तो वो भी उसी के रंग में रंग जाता है। इसलिए आम लोगों की परिस्थिति जस की तस बनी रहती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विडंबना ये है कि अर्थव्यवस्था का ये हाल तब है जब देश का प्रधानमंत्री एक अर्थशास्त्री है। अर्थशास्त्री भी ऐसा-वैसा नहीं, जिसके अर्थज्ञान का की चर्चा दसों दिशाओं में होती रही है। देश के पास एक ऐसी सरकार है जो मंचों पर केवल आम आदमी की बात करती है। जिसके युवराज अपना फोटो खिंचवाने और रोटी खाने के लिए गरीब से गरीब की झोंपड़ी खोजते फिरते हैं। पता नहीं युवराज अपनी आंखों पर कौनसा चश्मा लगाकर जाते हैं कि उनको उन परिवारों की समस्याएं नहीं दिखतीं। क्योंकि ये भी हमारे समाज की संस्कृति का हिस्सा है कि हम अतिथि के सामने अपनी समस्याओं का रोना नहीं रोते। ये सामने वाले की पारखी नजर होती है जो बिना कहे चीजों को समझ लेती है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-336638689458693753?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/336638689458693753/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/11/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/336638689458693753'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/336638689458693753'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='ये कौन नचा रहा है देश की आवाम को कठपुतली की तरह!!!'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-I2xnJfLjCCk/TrYsBgkRGfI/AAAAAAAAAXc/GkDEPc6nqAg/s72-c/inflation.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-305364649376441054</id><published>2011-10-31T17:33:00.000+05:30</published><updated>2011-10-31T17:33:02.564+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='System'/><title type='text'>दिग्विजय सिंह और एडवर्टाइजिंग का सिद्धांत!!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एडवर्टाइजिंग के क्षेत्र में एक सिद्धांत प्रचलित है- &lt;strong&gt;&lt;em&gt;‘एक झूठ को अगर 100 बार कहा जाए तो&amp;nbsp; वो सच बन जाता है।’ &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह आजकल इसी सिद्धांत पर खेल रहे हैं। बाबा रामदेव और अन्ना के आंदोलन ने जब कांग्रेस की पूरे देश में थू-थू कराई तो कांग्रेस ने अपने सिपेहसालार दुर्मुख दिग्विजय के माध्यम से हमेशा की तरह संघ कार्ड चला दिया। पहले उन्होंने बाबा रामदेव के आंदोलन में संघ का हाथ बताकर मीडिया के सामने चिल्लाना शुरू किया और फिर बाद में अन्ना के अनशन की सफलता में भी संघ का हाथ-पांव बता दिया (वैसे मैडम ने तो उनसे कहा था कि ये भी बोल दें कि कांग्रेस के झंडे में जो हाथ है वो भी संघ का है)। दोनों ही आंदोलनों में जो कार्यकर्ता दिन-रात पसीना बहा रहे थे वे तमाम संगठनों से आए थे और उनमें संघ के कार्यकर्ता भी शामिल थे। तमाम काॅर्पोरेट हाउसों से लेकर देश के आम आदमी तक सभी इन आंदोलनों के समर्थन में थे। कांग्रेस के वे नेता जो देश में सुधार देखना चाहते हैं वे भी अपनी-अपनी तरह से इन आंदोलनों का समर्थन कर रहे थे। लेकिन केवल संघ का नाम लेकर आंदोलन के उद्देश्य से ध्यान हटाने की जो दिग्गी-कोशिश हो रही है वो एक कुंठाग्रस्त स्थिति को प्रदर्शित करती है। संघ विश्व का सबसे बड़ा संगठन है। देश का हर तीसरा-चैथा आदमी या तो उसका कार्यकर्ता है, या उसकी विचारधारा को मानने वाला है, या किसी न किसी रूप में उससे जुड़ा है।&amp;nbsp;जब&amp;nbsp;राष्ट्र निर्माण और चरित्र निर्माण की बात हो तो उसमें कहीं न कहीं संघ की उपस्थिति मिल ही जाएगी। तो इस&amp;nbsp;दृष्टि&amp;nbsp;से&amp;nbsp;संघ की उपस्थिति को इन दोनों आंदोलनों में नजरंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन ये कहना कि पूरा आंदोलन ही संघ का था या रिमोट कंट्रोल संघ के हाथ में था ये बेहद बचकाना और मूर्खतापूर्ण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-Nsxf2T-ycQQ/Tq6MVHEorGI/AAAAAAAAAXM/bhVr5VgaZSw/s1600/Digvijay.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" ida="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-Nsxf2T-ycQQ/Tq6MVHEorGI/AAAAAAAAAXM/bhVr5VgaZSw/s320/Digvijay.jpg" width="283" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;ये तो नहीं कहा जा सकता कि कांग्रेस महासचिव बौखलाहट में इस तरह के बयान जारी कर रहे हैं। मध्यप्रदेश से स्थाई देश निकाला मिलने के बाद दिग्विजय सिंह की मानसिक स्थिति में बहुत छटपटाहट तो है, उस पर केंद्र सरकार में उनको मंत्री भी नहीं बनाया गया, और फिर वो अभी इतने बूढ़े भी नहीं हुए हैं कि उनको कहीं का राज्यपाल नियुक्त कर दिया जाए। वैसे भी राज्यपाल तो बेहद धीर-गंभीर और कम बोलने वाले व्यक्तित्वों के लिए बना पद है, अब दिग्विजय तो उसमें कहीं फिट नहीं बैठते। वर्तमान में कांग्रेस के अंदर सबसे ऊट-पटांग बोलने&amp;nbsp;वाली&amp;nbsp;लीग के&amp;nbsp;अग्रणी नेता&amp;nbsp;दिग्विजय ही हैं। कांग्रेस ने सोच-समझकर उनको अपना मोहरा बनाया है, लेकिन दिग्विजय अपने बड़बोलेपन में ये नहीं देख रहे हैं कि वे अपना कितना निजी नुकसान कर रहे हैं। वे उन लोगों पर उंगलियां उठा रहे हैं जिनपर न केवल भारत के लोगों ने बल्कि विदेशी भारतीयों और विदेशी नागरिकों ने भी भरोसा जताया है। दिग्विजय चुन-चुनकर अन्ना, रामदेव और श्री श्री पर उंगलियां उठा रहे हैं (लेकिन&amp;nbsp;कोई&amp;nbsp;ये&amp;nbsp;न&amp;nbsp;कहे&amp;nbsp;की&amp;nbsp;वो&amp;nbsp;किसी&amp;nbsp;का सम्मान&amp;nbsp;नहीं&amp;nbsp;करते&amp;nbsp;, वो&amp;nbsp;आतंकियों&amp;nbsp;का&amp;nbsp;पूरा सम्मान करते हैं) । इन तीनों के अनुयाई पूरे विश्व में मौजूद हैं। और ये लोग कोई पाप तो नहीं कर रहे? जो काम देश की राजनीति को करना चाहिए था आज वो काम सामाजिक संगठनों को हाथ में लेना पड़ा है। आज भ्रष्टाचार के मसले पर देश में ऐसी जागरुकता है जैसी कभी नहीं थी। भारत गरीब देश नहीं है बल्कि उसको जानबूझकर गरीब बनाए रखा गया। और क्योंकि आजादी के 64 सालों में अधिकांश राज कांग्रेस का रहा है तो देश की वर्तमान पीड़ाओं के प्रति सबसे ज्यादा जवाबदेही कांग्रेस की ही बनती है। इसमें कांग्रेस को तिलमिलाने की कोई जरूरत नहीं है। अच्छा होता कि कीचड़ उछालने का खेल खेलने के बजाय कांग्रेस ने गंभीरता से स्थिति पर विचार किया होता। विदेश में जमा काला धन देश में वापस लाने या भ्रष्टाचार पर रोक लगाने में केवल और केवल भारत की जनता की भलाई है। प्रत्येक भारतीय की भलाई है। न किसी जाति विशेष की और न ही किसी धर्म विशेष की। लेकिन कांग्रेस ने अन्ना को गिरफ्तार करके और बाबा पर लाठी भांजकर अपनी छवि को और भी ज्यादा मिट्टी में मिला दिया। इसका जवाब जनता समय आने पर जरुर देगी।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;दरअसल कांग्रेस का संचालन उसके&amp;nbsp;नीति निर्धारकों के साथ-साथ पब्लिक रिलेशन कंपनियां भी देख रही हैं। दिग्विजय सिंह को मोहरा बनाने की सलाह किसी पब्लिक रिलेशन फर्म की ही रही होगी। और संघ कार्ड खेलने की सलाह भी उन्ही की देन है, जो पूरी तरह एडवर्टाइजिंग के सिद्धांत पर आधारित है। पर न जाने ये लोग दिग्विजय से किस जन्म का बदला ले रहे हैं। पार्टी ने एक इंसान को छुट्टा बोलने की इजाजत दे रखी है और वो इंसान इतना ज्यादा बोल रहा है कि तमाम सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर मोस्ट हेटेड पर्सनेलिटी बन गया है। शायद दिग्गी राजा को ये अंदाजा भी नहीं होगा कि जिस दिन कांग्रेस सत्ता से हाथ धोएगी उस दिन उनका एक भी समर्थक नहीं बचेगा.&amp;nbsp;जब कहीं बहस चलती है तो खुद दिग्गी के समर्थक भी उनका बचाव करने के लिए शब्द नहीं ढूंढ पाते हैं। लेकिन अभी दिग्गी के चेहरे पर सत्ता की चमक है। जिस दिन सत्ता हाथ से जाएगी तो उनका क्या भविष्य होगा कहा नहीं जा सकता!!&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-305364649376441054?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/305364649376441054/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/10/blog-post_31.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/305364649376441054'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/305364649376441054'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/10/blog-post_31.html' title='दिग्विजय सिंह और एडवर्टाइजिंग का सिद्धांत!!'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-Nsxf2T-ycQQ/Tq6MVHEorGI/AAAAAAAAAXM/bhVr5VgaZSw/s72-c/Digvijay.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-7891525920223013624</id><published>2011-10-28T17:05:00.000+05:30</published><updated>2011-10-28T17:05:53.822+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='श्रद्धांजलि'/><title type='text'>राग दरबारी की स्वर्गयात्रा!!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-DV-aGoD_pUI/TqqTctG0TwI/AAAAAAAAAXE/4uZmtvMJSoI/s1600/rag+darbari.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/-DV-aGoD_pUI/TqqTctG0TwI/AAAAAAAAAXE/4uZmtvMJSoI/s1600/rag+darbari.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;आज जब हिंदी जगत के वरिष्ठ साहित्यकार श्री लाल शुक्ल की मृत्यु की खबर मिली तो अचानक मुझे अनुराग की बात याद हो आई जो उसने ‘राग दरबारी’ के बारे में कही थी। मेरठ में पत्रकारिता के दिनों में एडिशन छोड़ने के बाद रात के 12 बजे जो बैठकी जमती थी उसमें अक्सर राग दरबारी और श्री लाल शुक्ल की चर्चा उठती थी। राग दरबारी भले ही 1968 में लिखी गई हो लेकिन वो आज भी वर्तमान पत्रकारिता को आइना दिखा सकने की कुव्वत रखती है। अनुराग का कहना था कि राग दरबारी पढ़ते वक्त बार-बार ऐसे मौके आए जब वो ठठ्ठा मार कर हंस पड़ता था। घर वाले भी उसकी ओर हैरत से देखने लगते थे कि ऐसी कैसी किताब है कि अच्छे-खासे शांत इंसान को बार-बार हंसने पर मजबूर कर रही है। अनुराग की सभी पत्रकारों को राय थी कि हर एक पत्रकार को राग दरबारी अवश्य पढ़नी चाहिए वो भी मांगकर नहीं खरीदकर। मेरे कई साथी पत्रकारों के पास राग दरबारी थी, लेकिन मांगने पर किसी ने पढ़ने के लिए नहीं दी। क्योंकि गई हुई किताब के वापस लौटने के चांस न के बराबर होते हैं और राग दरबारी ऐसी किताब नहीं जिसको खो दिया जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब कंडवाल जी ने एक बार राग दरबारी का जिक्र किया जो उनके मुख से सीधे ये निकला कि जिस किताब के पहले ही पृष्ठ पर भारतीय सड़कों की दुर्दशा के बारे में इतना तगड़ा व्यंग्य लिखा हो कि ‘ट्रक का जन्म ही सड़कों का बलात्कार करने के लिए हुआ है’, तो अनायास ही उसको और भी ज्यादा पढ़ने की इच्छा जागृत हो जाती है। कंडवाल जी की इस प्रशंसा में उनका अपना दर्द भी छिपा था, क्योंकि दिन भर बाइक पर रिपोर्टिंग करने वाला रिपोर्टर जब अपनी खबरें पंच करके देर रात घर लौटता है तो उसके आगे-आगे सड़क की धूल उड़ाते ट्रकों का सबसे ज्यादा शिकार वही बनता है। श्री लाल शुक्ल का यही अंदाज था कि उनकी लेखनी हर इंसान के दिल की बात या दिल के दर्द को बयां करती थी। आप चाहे किसी भी क्षेत्र से जुड़े हुए हो आप उनकी रचनाओं में खुद को कहीं न कहीं फिट कर ही लोगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे मजेदार बात ये कि शुक्ल जी ने एक खास पद पर रहते हुए आम आदमी की बात कही। सिविल सर्वेंट को भारतीय समाज में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है और शुक्ल जी जिस जमाने में सिविल सर्वेंट थे उस जमाने में तो सिविल सर्वेंट होने का मतलब आप समझ ही सकते हैं। प्रशासकों पर अक्सर ऐसे आरोप लगते हैं कि वे आम आदमी की भावनाओं को नहीं समझते, लेकिन शुक्ल जी ने न केवल आम आदमी की भावनाओं को समझा बल्कि उसको बखूबी अपनी लेखनी के दम पर किताबों में उतारा भी। रिटायर होने के बाद या रिटायरमेंट के आसपास प्रायः अधिकांश प्रशासक लेखक बन ही जाते हैं, लेकिन वो अलग किस्म का लेखन होता है, जिसको एक इलीट वर्ग ही समझ सकता है। लेकिन शुक्ल जी ने पद पर रहते हुए ऐसे व्यंग्य लिखे जो जनसाधारण के दिलों को छू गए, ये उनकी अपनी विशेषता थी। शुक्ल जी भले ही मृत्युलोक से स्वर्गलोक की यात्रा पर चले गए हैं, लेकिन इतना तय है कि उनका व्यंग्य राग सुनकर वहां विराजमान ब्रह्मदेव की भी हंसी छूट जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-7891525920223013624?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/7891525920223013624/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/10/blog-post_28.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/7891525920223013624'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/7891525920223013624'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/10/blog-post_28.html' title='राग दरबारी की स्वर्गयात्रा!!'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-DV-aGoD_pUI/TqqTctG0TwI/AAAAAAAAAXE/4uZmtvMJSoI/s72-c/rag+darbari.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-2177567855935256389</id><published>2011-10-23T16:25:00.000+05:30</published><updated>2011-10-23T16:25:13.841+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाज़ार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विकास'/><title type='text'>आओ मनाएं मिलावटी दीवाली!!!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-lIsbal12ZaA/TqPyUXZH1nI/AAAAAAAAAW8/i8mFG8ZXueU/s1600/Deep.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" rda="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-lIsbal12ZaA/TqPyUXZH1nI/AAAAAAAAAW8/i8mFG8ZXueU/s320/Deep.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;त्योहारों का मौसम है! मन में ढेर सारी खुशियां हैं (खासतौर से बच्चों के, बड़े तो खुश होने का केवल अभिनय करते हैं) और जेब में ढेर सारे पैसे हैं (मनमोहन सिंह द्वारा दिए गए 32 रुपयों से कहीं ज्यादा)। महंगाई भी है, लेकिन दीवाली तो हमने तब भी मनाई थी जब पूरे विश्व में महामंदी का दौर था। हमें हमारे त्योहार मनाने से कोई नहीं रोक सकता। इस देश के माता-पिता कमाते ही त्योहार मनाने के लिए हैं। बच्चों को कतई मायूस नहीं कर सकते। प्रेमचंद की ईदगाह में भी गरीबी के दिन झेल रही दादी ने हामिद के हाथ पर ईद मनाने के लिए तीन पैसे रखे थे। वो बात दीगर है कि वो ईदगाह के मेले से अपने लिए खिलौने लाने के बजाय अपनी दादी के लिए चिमटा लेकर आया था। ये तो हमारे रिश्तों की मिठास है। त्योहार तो भारत की पहचान हैं। हम उनको मनाए बिना नहीं रह सकते, चाहे प्रधानमंत्री हमारे हाथ पर 32 रुपए रखें और चाहे पश्चिमी देश महामंदी में डूब जाएं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दीवाली तो सबकी है (जेल में बंद यूपीए के मंत्रियों को छोड़कर) और सभी मनाने को उत्सुक हैं। माल तैयार है और बाजार सजे पड़े हैं। बाजार के बाजीगरों ने ग्राहकों को लुभाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है। सबकी पौ बारह है। हालांकि महंगाई नंगी होकर भूतनी की तरह नाच रही है। इस महंगाई से निपटने में भारत सरकार भले ही विफल रही हो, लेकिन चीन हम भारतीयों का दर्द भलीभांति समझता है। उसने हमारे दर्द को समझते हुए अपने यहां से सस्ता माल भारत भेज दिया है। पता नहीं क्यों विशेषज्ञ लोग यूं ही कहते रहते हैं कि चीन भारत का दुश्मन है! इस चुड़ैल महंगाई से निपटने में तो चीन भारतीयों का दोस्त ही साबित हो रहा है! मूर्तियां, बिजली की टिमटिमाती लडि़यां, पटाखे, इलेक्ट्राॅनिक्स, चीन ने सबकुछ भेज दिया है आपके लिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब जो चीजें चीन से नहीं भेजी जा सकतीं, उन चीजों में भारतीय मिलावट कर-कर के लोगों की दीवाली मनवा रहे हैं। नकली मावा, नकली मिठाई, नकली सोना-चांदी, सबकुछ मिलावटी। हालात इतने सड़ गए हैं कि किसी भी चीज पर भरोसा नहीं किया जा सकता। कल बात छिड़ी तो आंटी बताने लगीं कि बाजार में डाई मिली हुई मेहंदी आ रही है, जिससे किसी भी गृहणी का हाथ हल्का न रचे। डाई के असर से सबके हाथ स्याह सुर्ख रचते हैं। पहले कहते थे कि जिन पति-पत्नी में ज्यादा प्यार होता है उनकी मेहंदी ज्यादा रचती है। अब तो प्यार भी नकली है देखने में पता ही नहीं चलेगा कि सच्चा या झूठा। तो मेहंदी भी अगर झूठ बोल रही है तो गुरेज क्या है? मिलावटी मावा और मिठाइयां तो अब पुरानी बात हो चुकी हैं। लोगों ने मिठाइयों का विकल्प भी खोज लिया है। मुंह मीठा कराने की जगह नमकीन कराया जा रहा है- कुरकुरे, लेहर, हल्दीराम वगैराह-वगैराह!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों रिश्तेदारी में एक बच्चे का जन्म हुआ तो सोचा कि चांदी की नजरियां भेंट कर दी जाएं, ताकि उसे दुनिया की नजर न लगे। मुरादाबाद में था, सो वहीं के एक सुनहार की दुकान पर गया और एक जोड़ा पसंद करके उसके दाम पूछे। उसने उन रजत कंगनों को इलेक्ट्राॅनिक तराजू में ऐसे तौला मानो अपनी ईमानदारी का परिचय दे रहा हो। बोला जी 600 रुपये के पड़ेंगे। मैंने कहा- भाई मिलावटी तो नहीं है। चांदी में बहुत मिलावट सुनने को मिल रही है। बोला- भाई साहब आपको पूरे बाजार में असली चांदी मिलने की ही नहीं है। सब 60 परसेंट है। हम तो बताकर बेचते हैं। चांदी का असली वाला क्वीन विक्टोरिया का सिक्का 1200 रुपए का पड़ेगा। कौन ग्राहक दे देगा इत्ते रुपए। सबको 500-600 वाले चाहिए। अब मेरठ में हू-ब-हू वैसा ही सिक्का तैयार हो रहा है। आप पहचान नहीं सकते। बस 600 रुपए का है। दीवाली पे जमके बिकेगा। मैंने मन में सोचा जब ये इन कंगनों को अपने मुंह से 60 परसेंट प्योर बता रहा है तो हरगिज ये 20 परसेंट ही प्योर हैं। मेरी उसके साथ कोई नाते-रिश्तेदारी तो थी नहीं जो वो मुझसे हरीशचंद्रपना दिखाएगा। सो मैंने कहा 500 रुपये लगाओ, एक नोट में काम चलाओ। न नुकुर करते हुए उसने 500 पकड़ ही लिए और अपन ये जानते हुए भी कि माल नकली है खुशी-खुशी घर आ गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भयानक स्थिति है। इंसान से लेकर मशीन तक, भावनाओं से लेकर चरित्र तक, फलों से मिठाइयों तक, दूध से लेकर दही तक, पानी से लेकर खून तक, मंत्री से लेकर संत्री तक, खुशियों से लेकर दुःख तक, नौकरी से लेकर छोकरी तक, सरकार से लेकर संस्थाओं तक, धर्म से लेकर न्याय तक, हंसी से लेकर आंसुओं तक सबकुछ मिलावटी है हो गया है इस देश में। तो साथियों आप सभी को मिलावटी दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं!!!!!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-2177567855935256389?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/2177567855935256389/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/10/blog-post_23.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/2177567855935256389'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/2177567855935256389'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/10/blog-post_23.html' title='आओ मनाएं मिलावटी दीवाली!!!'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-lIsbal12ZaA/TqPyUXZH1nI/AAAAAAAAAW8/i8mFG8ZXueU/s72-c/Deep.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-6571383759670123178</id><published>2011-10-20T12:42:00.000+05:30</published><updated>2011-10-20T12:42:50.567+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='System'/><title type='text'>त्योहार और नेताओं की शुभकामनाएं!!!!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-PnOnyTHmEX4/Tp_JryI1IKI/AAAAAAAAAW0/DafhOfK989I/s1600/wishes.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="213" rda="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-PnOnyTHmEX4/Tp_JryI1IKI/AAAAAAAAAW0/DafhOfK989I/s320/wishes.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;आप लोगों को पता है कि आप लोगों के त्योहार इतने मंगलमय और शुभ क्यों होते हैं? क्योंकि हमारे नेतागण हम सबको त्योहारों की हार्दिक शुभकामनाएं जो देते हैं। शहर में जिधर निकल जाओ उधर बोर्ड ही बोर्ड लगे हैं, जिन पर विभिन्न पार्टियों के छुटभैये नेता अपना फोटो लगाकर आपको त्योहारों की शुभकामनाएं दे रहे हैं वो भी थोक में। फ्लैक्स बोर्ड के आ जाने से इनको बड़ा आराम हो गया है। लेकिन बार-बार पैसा न खर्च करना पड़े तो एक ही बोर्ड पर भविष्य में आने वाले ढेर सारे त्योहारों की बधाई एक साथ दे देते हैं। आ तो रही है दीवाली पर गाजियाबाद से लेकर मेरठ तक लगे बैनर और बोर्ड चीख-चीख कर नववर्ष 2012 तक की शुभकामनाएं एडवांस में आपको दे रहे हैं। बोर्ड का रंग देखकर ही आपको उनकी पार्टी का पता चल जाएगा। कोई नीला, कोई भगवा, कोई तिरंगा तो कोई हरा। क्योंकि यूपी में चुनावी साल है, तो अपनी-अपनी पार्टी से ‘टिकटेच्छु’ नेता दिल खोलकर आपको अपनी शुभकामनाएं दे रहे हैं। बोर्ड पर शुभकामना के उस नेता का फोटो जिसके खर्च पर बोर्ड लगा है, उसके बगल में उसकी पार्टी के किसी बड़े नेता का फोटो, जिसके दम पर टिकट मिलने की उम्मीद है, और फिर सबसे नीचे कतार में कुछ छुटभैयों के फोटो। शहर की सड़कों पर लगे अपने फोटो देखकर इन महानुभावों के कलेजों को वैसी ही ठंडक पहुंचती है जैसी किसी नौजवान को कोकाकोला पीने के बाद मिलती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं तो यही सोचकर रह जाता हूं अगर हमारे ये शुभचिंतक और परमहितैषी नेतागण आम लोगों को त्योहारों की शुभकामनाएं न देते तो हमारे त्योहार शुभ कैसे होते? ये इन लोगों की शुभकामनाओं का ही नतीजा है कि आम जनमानस के त्योहार शुभ और मंगलमय होते हैं। बधाई और शुभकामनाएं देने में डिस्ट्रिक्ट लेवल के लीडरान बड़े आगे होते हैं। पार्टी के अध्यक्ष का बर्थडे हो या किसी मंत्री या मुख्यमंत्री का, पूरा शहर बधाइयों से पटा नजर आएगा। मजेदार बात ये कि एक आदमी जो जनप्रतिनिधि भी नहीं है, पूरे शहर की तरफ से बधाई दे देता है। खुद ही पूरे शहर की नुमाइंदगी करने लगता है और अगर नेता जी पर बोर्ड लगवाने के पैसे न हों तो शहर के किसी लाला जी को पकड़कर उनसे पैसा खर्च करवाता है और बोर्ड के नीचे छोटा-छोटा लिखवा देता है- सौजन्य से फलाने लाला जी झानझरोखा वाले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन होर्डिंग्स को देखकर ही शहर वालों को अंदाजा लग जाना चाहिए कि उनके नेता उनकी कितनी चिंता करते हैं। ये उनकी बधाइयों और शुभकामनाओं का ही नतीजा है कि उनके त्योहार इतने अच्छे बीतते हैं। साथ ही हर शहरवासी का यह कर्तव्य भी बनता है कि इन बधाइयों के पीछे छिपी नेताओं की इच्छाओं को भी पहचानें और उन इच्छाओं को पूरा भी करें। आखिर कोई आपके लिए इतने पैसे खर्च कर रहा है, आपके त्योहार की चिंता कर रहा है, तो आपका इतना तो फर्ज बनता ही है न कि आप उसकी इच्छाओं का भी ख्याल करो। ज्यादा कुछ नहीं कर सकते तो कम से कम उस बोर्ड को ध्यान से पढ़ तो सकते ही हो जिस पर आपके के त्योहार के लिए शुभकामना लिखी है। अब ये मत बोलना कि महंगाई की वजह से त्योहार मनाना मुश्किल है। महंगाई और बधाई में कैसा रिश्ता? नेताओं का काम है शुभकामना देना। अब अगर आपके पास अपने बच्चों को त्योहार पर खुश करने लायक पैसे नहीं हैं तो ये आपकी परेशानी है इसमें महंगाई का क्या रोल है। इसलिए आम लोगों की तरह मत सोचो, हर समय महंगाई और पैसे का रोना मत रोओ। जैसे नेताओं ने एक बोर्ड लगाकर आपको कहा हैप्पी दीवाली आप भी वैसे ही घर में एक बोर्ड लगाकर अपने बच्चों को बोलो हैप्पी दीवाली!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-6571383759670123178?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/6571383759670123178/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/10/blog-post_20.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/6571383759670123178'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/6571383759670123178'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/10/blog-post_20.html' title='त्योहार और नेताओं की शुभकामनाएं!!!!'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-PnOnyTHmEX4/Tp_JryI1IKI/AAAAAAAAAW0/DafhOfK989I/s72-c/wishes.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-7926719007261773593</id><published>2011-10-13T17:01:00.000+05:30</published><updated>2011-10-13T17:01:28.607+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नौकरी चाकरी'/><title type='text'>नारायण का वर्क लोड!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-JW2lb-QTGd8/TpbLvC6EtHI/AAAAAAAAAWs/n6CyrEJOiSk/s1600/vishnu.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" oda="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-JW2lb-QTGd8/TpbLvC6EtHI/AAAAAAAAAWs/n6CyrEJOiSk/s320/vishnu.jpg" width="250" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;नारायण! नारायण! अपनी वीणा के तारों को झंकारते हुए नारद मुनि ने बैकुंठ के द्वार पर कदम रखा तो अपने भगावन को थोड़ा चिंतित देखा। उनसे रहा न गया और पूछ बैठे- आपके माथे पर ये चिंता की लकीरें कैसी भगवन? &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;मानो भगवान विष्णु इसी प्रश्न को सुनने को बेचैन थे- क्या बताऊं मुनि श्रेष्ठ मेरे ऊपर वर्क लोड बढ़ता ही जा रहा है। परम पिता ब्रह्मा ने जिस सृष्टि की रचना की थी उसका संचालन दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पर नारद जी ने पूछा- ऐसा क्या हो गया जिसने सर्वशक्तिमान, अखिल ब्रह्मांड नायक, देवादिदेव, स्वयं नारायण को चिंता में डाल दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवान बोले- हे! मुनि ये तो आप जानते ही हैं कि मृत्युलोक में पब्लिक लगातार बढ़ रही है और उसी के साथ बढ़ रही हैं उनकी डिमांड भी। मैं सबकी डिमांड पूरी करने में असमर्थ महसूस कर रहा हूं, भक्तों की डिमांड लगातार बढ़ रही हैं। डिमांड और सप्लाई का गैप भी लगातार बढ़ता ही जा रहा है। बैकलाॅग में करोड़ों एप्लीकेशन पड़ी हुई हैं। लेकिन मनुष्य की इच्छाएं खत्म होने का नाम नहीं ले रहीं। एक वो जमाना था जब मेरा भक्त कहता था भगवान मुझे एक नौकरी दो। मैं उसकी प्रार्थना सुनता और एक नौकरी लगवा देता और वो पूरी जिंदगी उसी नौकरी में बिता देता। फिर कभी वो दोबारा मुझसे नौकरी की डिमांड नहीं करता था। लेकिन आज का मनुष्य बड़ा अजीब है। एक नौकरी में टिकता ही नहीं है। एक लगवाई तो फिर दूसरी मांगता है, दूसरी का इंतजाम किया तो तीसरी मांगता है, चैथी, पांचवीं, छठी... कोई अंत ही नहीं है। न लगवाओ तो उलाहने देता है कि भगवान तेरे यहां देर भी है और अंधेर भी। पहले इंसान एक लड़की से प्यार करता था और मुझसे उसी का हाथ मांगता था और उसके साथ शादी करके जिंदगी भर निभाता था। लेकिन अब तो अजीब चलन चल पड़ा है शादी तो बहुत बाद की चीज रही, मल्टीपल गर्लफ्रेंड की डिमांड रखता है। कभी इस लड़की के लिए प्रार्थना करता है, कभी दूसरी लड़की के लिए। अक्ल पर पत्थर पड़ गए हैं बिल्कुल। अब तुम ही बताओ नारद कि इतने वर्क प्रेशर में मैं कैसे काम करूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नारद बोले- भगवन समस्या तो गंभीर है, लेकिन यदि आप ही परेशान होने लगे तो संसारियों का क्या होगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवान ने पूछा- तो तुम ही बताओ मुनि क्या उपाय किया जाए? आप तो संसार भर में विचरते हो, आप ही कुछ सुझाओ!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नारद मुने कहने लगे- प्रभु पृथ्वी पर कंज्यूमरिज्म का दौर चल रहा है। रिश्ते-नाते, आचार-विचार-व्यवहार सब कुछ कंज्यूमरिज्म की चपेट में है। वहां की अर्थव्यवस्था को पंख लगाने के लिए कंजंप्शन को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है। इसके चलते एक नौकरी में भला इंसान कैसे संतुष्ट रह सकता है। वो तो आपसे मांगने के लिए मजबूर है प्रभु!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवान बोले- अगर वहां कंज्यूमरिज्म बढ़ रहा है तो उसके लिए वहां की सरकारें जिम्मेदार हैं। उसका खामियाजा मुझे क्यों भुगतना पड़ रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नारद जी ने कहा- ये तो आप भली-भांति जानते हो प्रभु की धरती पर लोकतांत्रिक सरकारें किस तरह काम कर रही हैं। अगर वे ही ठीक से काम कर रही होतीं तो आज आपके इतने भक्त न होते। सब खुश, संतुष्ट और संपन्न होते। ये वहां की सरकारों की कुव्यवस्था का ही परिणाम है कि आप पर विश्वास करने वालों की संख्या हर रोज बढ़ रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पर भगवान ने कहा- फिर भी मुनि श्रेष्ठ मांगने की कोई लिमिट होती है। मेरी भी अपनी कुछ लिमिटेशंस हैं कि नहीं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नारद जी मुस्कुराए- प्रभु आपके भक्त तो सिर्फ इतना जानते हैं कि आपकी कोई लिमिट नहीं है। आपका तो न आदि है और न अंत।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुनि के जवाब में भगवान ने खुद को फंसा हुआ महसूस किया- ठीक बात है, लेकिन फिर भी मुनि सोच कर देखो, परिवार के मुखिया से परिवार की डिमांड पूरी नहीं हो रहीं, मोहल्ले के पार्षद से मोहल्ला नहीं संभल रहा, जिलाधिकारी जैसे-तैसे काम को निपटा रहे हैं, धुरंधर से धुरंधर पुलिस अधीक्षक अपराध नहीं रोक पा रहे, राज्य सरकारें विफलता का राग गा रही हैं (गुजरात को छोड़कर), और देश का मुखिया भी खुद को मजबूर बता रहा है। तो आप बताओ की लोग मुझसे क्यों इतनी उम्मीद रखते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नारद जी फिर मुस्कुराए- प्रभु! लोग आपसे इसीलिए उम्मीद रखते हैं क्योंकि आप ही सचमुच उनकी आखिरी उम्मीद हो। आप भलीभांति जानते हो कि आप सर्वशक्तिमान और सामथ्र्यवान हो, लेकिन फिर भी अगर आप उनकी इच्छाएं पूरी नहीं कर रहे हो, तो इसमें भी आपकी दूरदृष्टि ही है। रही बात आपकी परेशानी की। तो आप अपने दिल पर हाथ रख कर देखिए आप वर्कलोड से परेशान नहीं हो आप परेशान हो लोगों की बढ़ती अपेक्षाओं से। अधिकांश मनुष्य अपने लक्ष्य को छोड़कर जिस मार्ग पर चल निकले हैं, आप कहीं न कहीं उनकी अधोगति से परेशान हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवान बोले- हे मुनि आपकी बात कुछ हद तक ठीक है, लेकिन ये मेरी समस्या का समाधान नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नारद ने कहा- भगवन आप की परेशानी ये है कि आप हर चीज पर गंभीरता से विचार करते हैं। आप भी धरती की सरकारों की तरह हो जाइए। सरकार सिर्फ गंभीर होने का दिखावा करती है। आप भी वैसा ही कीजिए। जब भी कहीं त्रासदी होती है तो मंत्रीगण अपने शब्दों से गंभीर शोक प्रकट करते हैं। उनकी जीभ के सिवा वह शोक उनके तन पर कहीं भी नजर नहीं आता। घायलों का हाल जानने के लिए मंत्रीगण ऐसे अस्पतालों में घूमते हैं मानो मुगल गार्डन में घूम रहे हों। वे बार-बार ऐसा करते हैं, लेकिन सुधार फिर भी नहीं होता। आप भी चीजों को दिल पर मत लो। लोकतांत्रिक सरकार की तरह बनो नाथ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवान ने कहा- यही तो दिक्कत है नारद मुनि की मैं वैसा नहीं बन सकता। मैं सरकार नहीं हूं मैं तो इस संसार का पालनहार हूं। मैं आंखें नहीं मूंद सकता, न खुद को मजबूर बता सकता हूं, इस सृष्टि को नियमानुसार चलाना ही मेरा कार्य है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-7926719007261773593?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/7926719007261773593/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/10/blog-post_13.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/7926719007261773593'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/7926719007261773593'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/10/blog-post_13.html' title='नारायण का वर्क लोड!'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-JW2lb-QTGd8/TpbLvC6EtHI/AAAAAAAAAWs/n6CyrEJOiSk/s72-c/vishnu.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-2850466736054195040</id><published>2011-10-11T18:24:00.000+05:30</published><updated>2011-10-11T18:24:01.915+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कायदा कानून'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='घूमना फिरना'/><title type='text'>अतिथि ‘कस्टमर’ भवः</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;भारतीय संस्कृति में अतिथि को देवता का दर्जा दिया गया है। अतिथि ही को क्या, हर उस चीज को जिसकी मर्यादा की रक्षा जरूरी थी उसे देवी-देवता का दर्जा दे दिया गया। चाहे वह वन देवता हो, ग्राम देवता या जल देवता, भाव यही था कि इंसान इन की अहमियत समझे। लेकिन इस भाव को समझे बगैर मशीन की तरह मंत्रों को याद कर लिया और लगे रटने। अतिथि देवो भवः के पीछे कहीं न कहीं पर्यटन की बेहद गहरी सोच छिपी थी और यही कारण है कि पर्यटन मंत्रालय इस मंत्र को जगह-जगह विज्ञापनों में इस्तेमाल भी करता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सचमुच बेचारे अतिथि को ‘देव’ समझा जा रहा है। जहां तक पर्यटन का सवाल है तो पर्यटक स्थलों पर आने वाले सैलानियों को केवल ग्राहक की नजर से देखा जाता है। हालात इतने बुरे हैं कि अच्छे से अच्छा घूमने के शौकीन का मन मैला हो जाए। लेकिन ये सब अनुभव करने के लिए आपको कम बजट में एक आम सैलानी की तरह घूमने जाना होगा, अगर किसी वीआईपी तमगे के तले या फिर बोरे में नोट भरकर आप जाते हैं तो कोई दिक्कत नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-JyS2pxoTQOk/TpQ8KqRXK-I/AAAAAAAAAWc/ZGmETbz3eBQ/s1600/welcome-india.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/-JyS2pxoTQOk/TpQ8KqRXK-I/AAAAAAAAAWc/ZGmETbz3eBQ/s1600/welcome-india.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;रेलवे स्टेशन पर उतरते ही आॅटो और रिक्शे वालों के छल-कपट से लेकर अतिथि को सू-सू कराने वाले सुलभ शौचालयों तक और शुद्ध शाकाहारी भोजनालय से लेकर समर्पित धर्मशालाओं तक हर जगह सेवा भाव की जगह लूट भाव आ चुका है। किसी भी पर्यटक स्थल के रेलवे स्टेशन या बस स्टेशन पर पर्यटक के उतरते ही तमाम अतिथि सेवक उसको गिद्धों की तरह घेर लेते हैं। और अगर आप उस शहर में पहली बार घूमने गए हैं तो इन आॅटो और रिक्शे वालों का सहारा लेने के सिवा आपके पास कोई दूसरा चारा नहीं होता। ‘सर’ और ‘मैडम’ जैसे अति सम्मानित शब्दों के साथ वे एक झूठी मुस्कुराहट के साथ आपके पथप्रदर्शक बनने के लिए उत्सुक हैं। आपको होटल चाहिए या लाॅज, धर्मशाला चाहिए या मुसाफिरखाना इनकी हर जगह, हर रेंज में जान पहचान होती है। बस आपको अपना बजट बताना है बाकी अपना कमीशन तो ये होटल वाले से ले ही लेंगे।&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-SUn4Sf5EsQY/TpQ8RQKwFAI/AAAAAAAAAWk/TUHeaGE8zxc/s1600/autowala.JPG" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="231" src="http://1.bp.blogspot.com/-SUn4Sf5EsQY/TpQ8RQKwFAI/AAAAAAAAAWk/TUHeaGE8zxc/s320/autowala.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;स्टेशन के मुहाने पर इन अतिथि सेवकों से बात करते-करते अगर आपको प्यास लग आए तो ये आपकी गलती है। अब वहीं पास वाले खोखे से खरीदो पानी की बोतल जो प्रिंट रेट से 2-3 रुपए महंगी मिलेगी। अगर आप उस इज्जतदार खोखे वाले को टोकोगे तो दो बातें होंगी। या तो वो आपको यह कहकर झिड़क देगा कि- यहां तो इतने की ही मिलेगी, लेनी है लो, नहीं लेनी मत लो! या फिर कुटिलता से मुस्कुराकर कहेगा- दो-तीन रुपये ही तो कमाने हैं, वैसे भी धंधा एकदम मंदा चल रहा है। और आप उसे कानून पढ़ाने की कोशिश तो कतई न करें। यानि उसको एमआरपी का अर्थ समझाना मतलब भैंस के आगे बीन बजाना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर जैसे-तैसे जब आप होटल पहुंचोगे तो वहां होटल वाला आपकी गर्दन का नाप लेकर उसी हिसाब से आपकी जेब ढीली करवा लेगा। अगर आप मिडिल क्लास से बिलांग करते हैं तो आपके मन में ये ख्याल जरूर आएगा- साला कहां तो हमारे यहां पूरे महीने का किराया 1200 रुपए होता है और कहां ये कमबख्त एक रात के 1200 मांग रहा है। पर मरता क्या न करता, तिस पर सफर की थकान, सो आप कलेजे पर पत्थर रखकर उसके हाथों में एडवांस थमा देंगे, क्योंकि होटल वाला आपको बताना नहीं भूलेगा कि पीक सीजन चल रहा है। इससे कम कहीं नहीं मिलने वाला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर साहब आप थोड़ा कूल होकर जब शहर घूमने निकलेंगे तब? तब फिर दो बातें होंगी- अगर आप किसी धार्मिक नगरी में गए हैं तो पंडे आपके पीछे पड़ जाएंगे और अगर किसी हिल स्टेशन पर गए हैं तो गाइड, ट्रैवल एजेंट आपके पीछे पड़ेंगे। पंडित जी भी आपको ‘सर’ कहकर ही बुलाएंगे। हमारे संविधान में तो साफ-साफ लिखा गया है कि ‘सर’ और ‘लाॅर्ड’ जैसे टाइटल देश में नहीं दिए जाएंगे। लेकिन ‘सर’ नाम का टाइटल जितना भारत में पाॅपुलर है उतना शायद ही विश्व के किसी कोने में हो। सब के होठों पर मीठे-मीठे बोल और दिल में आपके पैसे ठंडे कराने की हसरत।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घूमने गए हैं तो खाए बिना तो काम चलेगा नहीं। अव्वल तो घर से खाना लेकर चलने का चलन खत्म हो चुका है अगर कोई लेकर चलता भी है तो कितना चलेगा। रेस्तरां में खाने जाइये तो साहब पता चलेगा कि कोई भी सब्जी हाफ प्लेट नहीं मिलेगी और जब छोटी सी कटोरी में फुल प्लेट लग कर आएगी तो आप समझ जाएंगे कि हाफ प्लेट क्यों नहीं मिलती। मेन्यू में सबसे सस्ती सब्जी खोजते-खोजते आपकी आंखें तरस जाएं और जब हारकर दाल की तरफ देखों तो दाल फ्राई भी 80 रुपए प्लेट। दाल मक्खनी की तरफ देखना भी गुनाह। जिस आलू को कोई नहीं पूछता वही आलू जीरा के नाम से 60 रुपए में बिक रहा है। सलाद चाहिए तो पैसे अलग से देने होंगे। बाकी बची रोटी तो साहब प्लेन रोटी 8 रुपए और बटर रोटी 10 रुपए। बटर और प्लेन में सिर्फ दो रुपए का अंतर इसलिए रखा गया है ताकि आप दो रुपए बचाने की कोशिश न करें और सीधे बटर रोटी ही आॅर्डर करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घूमते-घूमते यदि आपको लघुशंका लग आए तो फिर से दो बातें होंगी। अगर आप थोड़े से बेशर्म टाइप होंगे तो आपके लिए किसी भी पेड़ या दीवार का सहारा काफी है। लेकिन अगर आप थोड़े से शर्मदार हैं और खुद को सभ्य कैटेगरी में समझते हैं तो आप सुलभ शौचालय खोजेंगे। शौचालय के द्वार पर एक मेज होगी और उस मेज के पीछे एक काला सा व्यक्तित्व आपकी मजबूरी का फायदा उठाने के लिए बैठा होगा, जो आपको सू-सू कराने के एवज में कम से कम दो रुपए और अधिकतम पांच रुपए चार्ज करेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सब हालातों से जूझते-जूझते जब आप घर वापस लौटोगे तो आपकी जेब जरूरत से ज्यादा ठंडी होगी। घर वाले जब इस उम्मीद से आपकी तरफ देखेंगे कि आप उनके लिए क्या लाए तो आपके पास सुनाने के लिए बातों के अलावा कुछ नहीं होगा। अंततः आपको घुमक्कड़ मन आपको आपकी घुमक्कड़ी के लिए घुड़केगा।&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-2850466736054195040?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/2850466736054195040/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/10/blog-post.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/2850466736054195040'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/2850466736054195040'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='अतिथि ‘कस्टमर’ भवः'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-JyS2pxoTQOk/TpQ8KqRXK-I/AAAAAAAAAWc/ZGmETbz3eBQ/s72-c/welcome-india.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-7254359721386205560</id><published>2011-07-05T17:21:00.000+05:30</published><updated>2011-07-05T17:21:48.107+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जिन्दगी'/><title type='text'>बच्चों के पास खुशी ही खुशी और बड़ों के पास गम ही गम...</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-TPSZMS7chy8/ThL55ErfHaI/AAAAAAAAAWY/uQc4-LamIRc/s1600/happy-children+%25281%2529.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="213" i$="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-TPSZMS7chy8/ThL55ErfHaI/AAAAAAAAAWY/uQc4-LamIRc/s320/happy-children+%25281%2529.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;बच्चों के पास खुश होने के कितने सारे कारण होते हैं। बारिश को देखकर खुश, बर्फ को देखकर खुश, नई पेंसिल पाकर खुश, हवा में उड़ता पंख देखकर खुश, ट्रेन की खिड़की से झांककर खुश, पापा से मिली अठन्नी पाकर खुश, छोटी सी कहानी सुनकर खुश, चवन्नी की टाॅफी पाकर खुश, मम्मी के आंचल में छिपकर खुश, बिल्ली को भगाकर खुश, तितली को पकड़कर खुश, काॅक्रोच को छूकर खुश, भूत की कहानी से डरकर भी खुश और आपस में झगड़कर भी खुश, गाड़ी की सवारी करके खुश, चाचा की पीठ पर लटककर भी खुश। कितनी स्वाभाविक होती है उनकी ख़ुशी. रोम रोम से ख़ुशी झलक रही होती है. एक बार सोचने लगा कि भगवान ने बच्चों को खुश होने के कितने सारे कारण दिए हैं, और बड़ों के पास खुशी के कितने कम कारण होते हैं। फिर अगले पल सोचा कि जिन चीजों पर बच्चे खुश होते हैं, उन पर कभी बड़े लोग भी खुश हुआ करते थे। लेकिन अब वे बड़े हो गए हैं, उनको बच्चों की तरह खिलखिलाना शोभा नहीं देता। हर समय मुंह चढ़ाकर रखने की उनकी आदत होती है। वे बड़े हो गए हैं इसलिए वे छोटी-मोटी चीजों पर खुशी का इजहार नहीं करते। वे बड़े हैं तो उनको खुशी भी बड़ी चाहिए। आमतौर पर बड़े लोग जिन चीजों पर&amp;nbsp;खुश होते हैं वे हैं पैसा, पद, शौहरत, सम्मान, अच्छा भोजन, आराम, सुरा और सुंदरी। इसके अलावा और किसी चीज पर बड़े लोगों को अंदरूनी खुशी नहीं मिलती। बाकी एक-दूसरे को देखकर मिलते मुस्कुराते बड़े लोग वास्तव में सिर्फ बनावटी खुशी का इजहार कर रहे होते हैं। जबकि बच्चे दिल खोलकर हंसते हैं और खुशी का इजहार करते हैं। वैसे&amp;nbsp;हम&amp;nbsp;बड़े&amp;nbsp;लोग&amp;nbsp;बच्चों&amp;nbsp;से&amp;nbsp;इतने&amp;nbsp;चिड़ते&amp;nbsp;हैं&amp;nbsp;कि&amp;nbsp;&amp;nbsp;उनकी&amp;nbsp;ख़ुशी&amp;nbsp;छीनने&amp;nbsp;में&amp;nbsp;भी&amp;nbsp;कोई&amp;nbsp;कसार&amp;nbsp;नहीं&amp;nbsp;छोड़ी&amp;nbsp;है.&amp;nbsp;कहीं हमने उनपर अपने सपनों को लाड दिया हैं तो कहीं उनको पैसे कि दौड़ में शामिल कर दिया है. लेकिन&amp;nbsp;वे&amp;nbsp;फिर भी&amp;nbsp;खुश&amp;nbsp;रहते हैं.&amp;nbsp;&amp;nbsp;बच्चों और बड़ों की खुशियों में इतना अंतर क्यों है? क्या इसलिए कि वे ज्यादा पढ़े-लिखे हैं और उनको जिंदगी का ज्यादा तजुर्बा है। या इसलिए कि बनावटी हंसी हंसना आज के समय की जरूरत है। या फिर इसलिए कि सच्ची खुशी केवल बच्चों के लिए होती है। पता नहीं क्यों बड़े लोगों का दिमाग इतना क्यों चलता है कि वो हर चीज को तर्क की धार पर कसने लगते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-7254359721386205560?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/7254359721386205560/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/07/blog-post.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/7254359721386205560'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/7254359721386205560'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='बच्चों के पास खुशी ही खुशी और बड़ों के पास गम ही गम...'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-TPSZMS7chy8/ThL55ErfHaI/AAAAAAAAAWY/uQc4-LamIRc/s72-c/happy-children+%25281%2529.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-4868060459240853319</id><published>2011-05-29T16:14:00.000+05:30</published><updated>2011-05-29T16:14:04.922+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नारी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सफलता'/><title type='text'>क्या प्रसंशा के लिए केवल महिला होना की काफी है?</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-zRQnJRbuUGE/TeIgquiNBwI/AAAAAAAAAWQ/hnZ5ObT4jCA/s1600/mamta+jaya+maya.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://3.bp.blogspot.com/-zRQnJRbuUGE/TeIgquiNBwI/AAAAAAAAAWQ/hnZ5ObT4jCA/s320/mamta+jaya+maya.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कल अचानक एक अखबार में मृणाल पांडे जी का लेख पढ़ने को मिला। लेख में वो जयललिता और ममता के मुख्यमंत्री बनने पर नारी शक्ति को बधाई देते हुए न केवल खुशी का इजहार कर रही थीं, बल्कि ममता और जाया के साथ उन्होंने मायावती के भी तारीफों के पुल भी बांधे हैं। वे केवल इस बात से ही फूली नहीं समा रही हैं कि विजेता के रूप में महिलाएं उभर कर आई हैं। इन तीन महिला मुख्यमंत्रियों को उन्होंने तीन देवियां कहकर पुकारा है। अब ममता के बारे में तो नहीं कह सकते क्योंकि वे पहली बार सत्ता में आई हैं, लेकिन माया और जयललिता वर्तमान और भूत में किस तरह की मुख्यमंत्री साबित हुई हैं ये सारा देश जानता है। अब चूंकि वे महिलाएं हैं बस इसलिए उनकी तारीफों के पुल बांधे जाएं ये तो कोई तुक न हुई।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मायावती ने भ्रष्टाचार के मामले में अपने पूर्ववर्ती सभी मुख्यमंत्रियों के रिकाॅर्ड तोड़ दिए हैं। जयललिता ने भी अपने पिछले कार्यकालों के दौरान जो अकूत संपत्ति कमाई है वो भी किसी से छिपी नहीं है। उनकी हजारों साडि़यों और सैकड़ों जोड़ी चप्पलों की कहानी देश की गरीब जनता को भलीभांति याद है। इन दोनों ने ही महिला होते हुए महिलाओं के लिए भी कुछ ऐसा उल्लेखनीय नहीं किया जिसपर फख्र किया जाए। न ही अपने-अपने प्रदेश की आवाम को ही कुछ खास दिया जो तारीफ के कसीदे कसे जाएं। जैसा पुरुषों का शासन होता है, कमोवेश वैसा ही इन महिलाओं का शासन भी है। वो तो जनता के पास विकल्पों की कमी और चुनावी समीकरण ऐसे बैठते हैं कि इन दोनों की बार-बार ताजपोशी हो जाती है। इनमें केवल ममता बनर्जी एक ऐसी महिला हैं जिन्होंने रेल मंत्री रहते हुए भी अपनी सादगी को नहीं छोड़ा। ममता और जया-माया में बहुत बड़ा फर्क है। इन तीनों को एक ही श्रेणी में रखकर उन पर प्रशंसा के फूल चढ़ाना कहां तक सही है मुझे समझ नहीं आता। तारीफ भी केवल इसलिए कि वो महिला हैं। हां, अगर उन्होंने अपने मुख्यमंत्री रहते हुए कोई ऐसा शासन दिया होता जिससे ये सिद्ध होता कि महिलाएं पुरुषों से बेहतर शासन देती हैं तो बात अलग थी। लेकिन उन्होंने तो भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमान ही स्थापित किए हैं। फिर भी मृणाल पांडे जी उनकी बस इसलिए प्रशंसा की जा रही हैं कि वो महिला हैं। ये तो वही बात हुई कि पुरुष करे तो भ्रष्टाचार और महिला करे तो चमत्कार।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अगर महिला-पुरुष के शासन में इतना ही अंतर होता तो आज देश की तस्वीर की कुछ और होनी चाहिए थी। देश के राष्ट्रपति पद से लेकर यूपीए सरकार तक की कमान महिला ही संभाले हुए है। और अब तीन प्रदेशों की कमान भी महिलाओं के हाथ में है और वर्तमान तस्वीर भी हम सबके सामन ही है। कोई ये नहीं कह सकता कि हम अपनी सरकार को&amp;nbsp;पसंद करते हैं। आम लोगों के दिलों में सरकार के प्रति नफरत न भी हो पर सम्मान और प्रेम तो कतई नहीं है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दरअसल, बात महिला-पुरुष की है ही नहीं। कुछ महिलावादी संगठन इस तरह की बातें करके स्त्री-पुरुष के बीच खाई पैदा करने का ही काम करते हैं। स्त्री-पुरुष दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों ही एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। जो महिलाएं आज सफलता के शिखर पर हैं उनको वहां होना ही था। पंडित नेहरू के घर अगर एक बेटा पैदा हुआ होता तो क्या उनकी विरासत इंदिरा गांधी को मिल पाती, शायद नहीं। उनकी स्वाभाविक विरासत उनके बेटे को ही जाती। इसलिए इंदिरा गांधी को आगे आना ही था। अब राहुल और प्रियंका गांधी का ही मामला लें तो प्रियंका के प्रति लोगों में ज्यादा लगाव और रुझान होने के बावजूद राहुल को ही युवराज के तौर पर पेश किया जा रहा है। जबकि आम लोगों में भी और कांग्रेसियों में भी राहुल से ज्यादा प्रियंका के प्रति उत्साह देखने को मिलता है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;तो जिन तीन देवियों की बात मृणाल जी कर रही हैं उनमें से केवल ममता बनर्जी जमीन से उठीं और बेहद संघर्षपूर्ण सफर तय करके इस मुकाम तक पहुंची हैं। बाकी बची दो देवियां अपने सरपरस्तों की कृपा से सत्ता सुख भोग रही हैं। वैसे मेरी राय पढ़कर कुछ लोग ऐसा भी कह सकते हैं कि ये मेरा नारी विरोध है. पर जिसको जो लगे लेकिन महिलाओं की प्रशंशा में इस तरह की हवा हवाई बातें ज़मीनी स्तर पर महिलाओं को काफी नुकसान पहुंचा सकती हैं.&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-4868060459240853319?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/4868060459240853319/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/05/blog-post_29.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/4868060459240853319'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/4868060459240853319'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/05/blog-post_29.html' title='क्या प्रसंशा के लिए केवल महिला होना की काफी है?'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-zRQnJRbuUGE/TeIgquiNBwI/AAAAAAAAAWQ/hnZ5ObT4jCA/s72-c/mamta+jaya+maya.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-5093386289764385915</id><published>2011-05-16T18:55:00.000+05:30</published><updated>2011-05-16T18:55:30.705+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पर्यावरण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विकास'/><title type='text'>यमुना एक्सप्रेस वे- एक कहानी अनकही</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;i&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: x-small;"&gt;(ये स्टोरी मैंने चेन्नई से प्रकाशित होने वाली एक नयी "इंक" मैगजीन के लिए लिखी थी जिसे अंग्रेजी में अनुवाद करके पृष्ठ संख्या ९९ पर&amp;nbsp;छापा गया है-&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;a href="http://www.inkthemagazine.com/"&gt;www.inkthemagazine.com &lt;/a&gt;&amp;nbsp;क्यूंकि अब ये स्टोरी प्रकाशित हो चुकी है तो&amp;nbsp;आज अपने ब्लॉग पर प्रकाशित कर रहा हूँ. )&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="margin-left: auto; margin-right: auto; text-align: center;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-ah1ziTYBYzo/TdEjmLbyfjI/AAAAAAAAAWE/YNwAw6vReJI/s1600/pari+chowk.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://2.bp.blogspot.com/-ah1ziTYBYzo/TdEjmLbyfjI/AAAAAAAAAWE/YNwAw6vReJI/s320/pari+chowk.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;ग्रेटर नॉएडा का&amp;nbsp;परी चौक&lt;/b&gt;&amp;nbsp;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मंजिलों तक ले जाते हैं रास्ते, नई उम्मीद जगाते हैं रास्ते, कभी कोई गीत तो कभी नई कहानी सुनाते हैं रास्ते। रास्ते बदलाव के सूचक हैं, रास्ते नई शुरुआत के सूचक हैं, रास्ते सूचक हैं जीवंतता के, रास्ते सूचक हैं विकास के। भारत में सड़कों और रास्तों का इतिहास उतना ही पुराना है जितना ये देश। चंद्रगुप्तमौर्य ने जिस सड़क का सपना देखकर उसकी शुरुआत की थी, उसको शेरशाह सूरी ने आगे बढ़ाया और कलकत्ता से पेशावर तक ग्रैंड ट्रंक रोड का विशाल निर्माण कराया। तब से लेकर आज तक लगातार भारत में सड़कों का जाल बिछाया जाता रहा है। चाहे वो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का गोल्डन क्वाड्रिलेटरल हो या ईस्ट-वेस्ट और नाॅर्थ-साउथ काॅरिडोर, यूपी की मुख्यमंत्री मायावती का गंगा एक्सप्रेस-वे का सपना हो या यमुना एक्सप्रेस वे की हकीकत। सड़कें भारत के विकास में सबसे बड़ी मददगार बन गईं और जहां सड़क नहीं पहुंची वहां के लिए बाधा। नई सड़क जब किसी इलाके से गुजरती है तो वहां के बाशिंदों के जीवन को कई तरह से प्रभावित करती है। एक ओर यही सड़क उन इलाकों को आर्थिक उन्नति देती है, तो दूसरी ओर वहां की आबोहवा और संस्कृति को निगल भी जाती है।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यमुना एक्सप्रेस वे- दिल्ली को ताज नगरी आगरा से जोड़ने के लिए तैयार किया जा रहा ये खालिस कंकरीट का 165 किलोमीटर लंबा विशालकाय ढांचा दिल्ली-आगरा के बीच सफर को बेहद सुगम बनाने जा रहा है, समय की बचत से लेकर आर्थिक विकास तक तमाम संभावनाएं इस रोड से जुड़ गई हैं। न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि समूचे भारत की दृष्टि से ये सड़क ऐतिहासिक है। ताज महल के दीदार करने आने वाले विदेशी सैलानियों के सामने ये सड़क एक नए भारत की तस्वीर पेश करेगी। लेकिन इसके आसपास जो पुराना भारत बसा था वो भी बदला-बदला सा नजर आएगा। जी हां, बात कर रहे हैं उन 1187 गांवों की जिनसे होकर यमुना एक्सप्रेस वे गुजर रहा है। चैहड़पुर, घरबरा, मुरशदपुर, जगनपुर, नौरंगपुर, सिलारपुर, रीलखा, छपरगढ़, रौनीजा, मिर्जापुर, नीलानी, जेवर, जिकरपुर और टप्पल ये कुछ ऐसे गांवों के नाम हैं जिनका आने वाले समय में नक्शा बदलने वाला है। आने वाला समय इन गांवों में रहने वाले लोगों के लिए उम्मीदों की फुलवारी लेकर आएगा या फिर नाउम्मीदी के कांटे ये तो वक्त ही बताएगा, बहरहाल इतना तो तय है कि ये गांव अब गांव नहीं रहेंगे बल्कि देश के सबसे बड़े अर्बन जोन का हिस्सा होंगे, जो ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस-वे के दोनों तरफ पांव पसारने वाला है। यमुना एक्सप्रेस वे को लेकर पत्रकारों ने जमकर अपनी स्याही खर्च तो की है, लेकिन इसके आसपास बसे इन गांवों के अंदरूनी हालात जानने की कोशिश नहीं की गइ। वैसे मुख्य रूप से ये गांव गुर्जर बाहुल्य क्षेत्र हैं, लेकिन यहां यादव, पंडित, ठाकुर, जाट और दलितों की भी अच्छी खासी तादाद है। जनरल इमरजेंसी के दौरान 19 अप्रैल 1976 को जब संजय गांधी की पहल पर नोएडा शहर की स्थापना हुई थी, तब शायद सोचा भी न गया होगा कि ये कारवां ग्रेटर नोएडा तक ऐसा बढ़ेगा कि देश का सबसे बड़ा अर्बन जोन कहलाएगा। लेकिन नोएडा की जिन जमीनों को अधिग्रहित करके उनपर उद्योग लगाए गए वो जमीनें कम उपजाऊ थीं, लेकिन अंधाधुंध विकास की दौड़ में अब जिन जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है वे बेहद उपजाऊ और कमाऊ हैं। वे न केवल वहां के किसानों का पेट पाल रही हैं बल्कि देश के खाद्यानों में भी बड़ा योगदान दे रही हैं। इन्हीं सब जमीनी हकीकतों को जानने के लिए हम निकल पड़े यमुना एक्सप्रेस-वे के इर्दगिर्द बसे गांवों का जायजा लेने के लिए और वहां के किसानों और युवाओं से मुलाकात की।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;चौहड़पुर में आवभगत&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यमुना एक्सप्रेस वे के आसपास के गांवों का जायजा लेने की शुरुआत हमने चैहड़पुर गांव से की। ग्रेटर नोएडा में बतौर इंश्योरेंस एजेंट काम कर रहे श्यामवीर ने मेरी अगवानी की और सीधे अपने घर ले गए। वे अपनी मारूती आॅल्टो में आगे-आगे और मैं अपनी हीरो हाॅन्डा स्प्लेंडर बाइक से उनके पीछे-पीछे। उस विशालकाय हाईवे के नीचे &amp;nbsp;से कब कहां एक छोटा सा रास्ता चैहड़पुर की तरफ मुड़ गया पता ही न चला। फिर उस छोटे से रास्ते ने एक गली का रूप ले लिया जो सीधे श्यामवीर के घर के बाहर खुली जगह पर जाकर खत्म हुई। सीधे अपने ड्राइंग रूम के सामने उन्होंने अपनी गाड़ी पार्क की और उसी के बगल में मैंने अपनी बाइक लगा दी। आंगन में गाड़ी, फिर एक वेरांडा और उसमें दो कमरे। अंदर कमरे में बैठते ही उन्होंने अपने भाई को आंखों ही आंखों में इशारा किया और वो हमारे लिए पानी ले आया। फिर उन्होंने अपने जेब से मोबाइल निकाला और गांव के कुछ लोगों को फोन करके अपने घर पर ही बुला लिया। हमने चर्चा शुरू की ही थी कि तीन लोग और कमरे में आ गए। ‘राम राम जी...’ और तीनों हमारे सामने सोफों पर बैठ गए। अपना परिचय देने के बाद मैंने फिर से बातचीत शुरू की ही थी कि श्यामवीर का भाई हम सबके लिए चाय ले आया, जिसमें पानी कम और दूध ज्यादा था। ‘अरे कुछ खाने को भी ला’ श्यामवीर ने भाई को हिदायत दी। ‘ला रहा हूं जी’ कहकर वो बाहर गया और दो प्लेट लेकर आया। एक प्लेट में पारले जी के बिस्किट थे ओर दूसरी प्लेट में नमकीन। अब चाय की चुस्कियों के साथ मैंने बातचीत को आगे बढ़ाया, लेकिन मैं सोच रहा था कि भारत के जिन गांवों में पहले दूध, मट्ठा, दही और गुड़ से मेहमानों का स्वागत होता था आज उन्हीं गांवों में चाय और बिस्किट अब आम हो गया है।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;जब जमीन थी तब विकास नहीं आज विकास है पर जमीन नहीं&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यमुना एक्सप्रेस वे पर बसे चैहड़पुर जैसे गांवों की कहानी बड़ी अजीब है। जब किसानों के पास खेती के लिए जमीन थी तो उस समय उनके पास संसाधन नहीं थे, आज जब संसाधन हैं तो उनके पास मेहनत करने के लिए जमीन नहीं बची। 1989 तक गांव के पास से गुजरने वाली यमुना पर बांध नहीं था। पुरानी दिनों को याद करते हुए श्यामवीर बताते हैं कि बरसात के दिनों में दो-दो महीने तक स्कूल नहीं जा पाते थे। जब कुछ पानी उतरता तो स्कूल जाना शुरू करते, लेकिन वो भी पैंट उतार कर रास्तों से गुजरना पड़ता था। लेकिन अब यमुना पर बांध भी है और आने-जाने के लिए रास्ते भी, लेकिन नहीं बची है तो करने के लिए खेती। यमुना एक्सप्रेस वे में भूमि अधिग्रहित हो जाने के बाद गांव वालों के पास खेती के लिए तकरीबन पांच प्रतिशत ही जमीन बची है। स्थिति ये आ गई है कि इन गांवों का जो किसान कल तक दूसरों के पेट भरता था आज खुद बाहर से अनाज खरीदकर अपना जीवन यापन करने को मजबूर है। ये बेहद चिंताजनक स्थिति है कि देश के अन्नदाता के सामने ही आज अन्न का संकट खड़ा है।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;जाएं तो जाएं कहां?&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;चैहड़पुर के ही संजय भाटी की 15 बीघा जमीन 2003 में यमुना एक्सप्रेस वे डेवलपमेंट अथाॅरिटी ने अधिग्रहित कर ली। जमीन चले जाने के बाद की स्थिति पर चर्चा करते हुए संजय कहते हैं कि ये हाईवे किसानों के लिए नहीं बनाए जा रहे हैं। इनका असली फायदा कहीं और होने वाला। किसान तो इस रास्ते का महज एक रोड़ा मात्र है, जिसे सरकार ने एक रकम देकर हटा दिया है। एक साथ रकम आ जाने से किसानों का फौरी तौर पर जरूर फायदा हुआ है, लेकिन आने वाले समय में किसानों को इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ेगा। नोएडा से इतर ग्रेटर नोएडा के आसपास स्थित गांवों की जमीनें उपजाऊ हैं। यहां गन्ना, गेहूं, और धान जैसी फसलें अच्छे स्तर पर उगाई जाती थीं। जबकि नोएडा के आसपास की जमीनों की पैदावार बहुत कम थी। इसलिए ग्रेटर नोएडा के आसपास के गांवों का किसान कमोबेश खुशहाल था। लेकिन अब उनके पास पैसा तो है पर उसका सदुपयोग करने के लिए उतनी शिक्षा नहीं है। एक बार बात शुरू हुई तो संजय एक बहाव में बहते चले गए और अपने मन की गांठों को खोलने लगे। वे बताते हैं कि किसानों को मुआवजे के साथ उसकी जमीन के छह प्रतिशत के बराबर का प्लाॅट भी दिया गया। लेकिन प्लाॅट भले ही मुफ्त दिया गया हो, लेकिन उसके डेवलपमेंट फीस और सर्किल रेट इतने महंगे हैं कि किसानों को भारी पड़ रहे हैं। किसानों के लिए की गई प्लाॅटिंग में काभी भेदभाव भी किया गया है। वहां की सड़कों और सीवरों की क्वालिटी बेहद खराब है। ग्रेटर नोएडा में जहां कम से कम सड़कों की चैड़ाई 12 मीटर है वहीं किसानों को दी गई काॅलोनी में सड़कें केवल 7.5 मीटर की ही है। चाय पीते-पीते संजय थोड़े गंभीर होकर एक बड़ी गहरी बात कहते हैं ‘सरकार जिन प्रोजेक्ट्स के पीछे जनता का फायदा और समाज का फायदा बताती है, दरअसल उनके पीछे बेहद चुनिंदा लोगों का फायदा छिपा होता है। एक सरकार द्वारा एक ही कंपनी को ग्रेटर नोएडा के सारे प्रोजेक्ट्स दिए गए हैं। जनता का फायदा तो महज एक छलावा है। इन प्रोजेक्ट्स में असली फायदा तो राजनीति और नौकरशाही के शिखर पर बैठे चंद लोगों का है।’&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;बदलते व्यवसाय&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;संजय बताते हैं कि एक्सप्रेस वे ने गांवों की एक पीढ़ी को खाली बिठा दिया है। वे कहते हैं ‘हमारा मुख्य काम खेती था, अब इस उम्र में कोई हम से कहे कि हम कंप्यूटर सीखें तो हम नहीं कर सकते। जिसका जो काम है वो उसी को शोभा देता है। एक्सप्रेस वे के साथ-साथ रेजिडेंशियल एरिया ज्यादा डेवलप किया जा रहा है। अगर उद्योग ज्यादा आते तब भी किसानों को थोड़ा फायदा हो सकता था।’ बातचीत में पता चला कि आज गांव के ज्यादातर युवा जो थोड़े पढ़े-लिखे हैं वो प्राॅपर्टी डीलिंग का काम कर रहे हैं। जो पढ़े-लिखे कम हैं वे या तो कंपनियों में सिक्योरिटी गार्ड का काम करते हैं या फिर अपनी ट्रैक्टर-ट्राॅली से किराए पर मिट्टी ढोते हैं। उसमें भी बार-बार उनका चालान काट दिया जाता है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;शिक्षा का अभाव&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सड़कें बनीं, विकास हुआ, नए-नए संसाधन खड़े हुए और इस विकास ने समाज के दो वर्गों को एक साथ लाकर खड़ा कर दिया। एक ओर वे लोग हैं जो इलीट क्लास कहलाते हैं और दूसरी तरफ वे लोग हैं जिनको ये इलीट क्लास देहाती कहकर पुकारती है। दोनों वर्गों की संस्कृति, शिक्षा, रहन-सहन, खान-पान, बोलचाल और आर्थिक स्थिति में जमीन आसमान का अंतर है। और अब ये दोनों वर्ग आमने-सामने हैं। एक मजबूरी के तहत आसपास रह रहे हैं, एक अनकहे और अनसुने तनाव के साथ। इलीट क्लास का मानना है कि गांव के लोग हिंसक हैं और अनएजुकेटिड हैं। जबकि गांव के लोग मानते हैं कि उनको एवाॅइड किया जाता है। ग्रामीण क्षे़त्र की सबसे बड़ी समस्या है अच्छी शिक्षा का अभाव। पैसा आ जाने से आज गांव के हर घर में कलर टीवी है, गाड़ी है और रहने के लिए अच्छा घर है। लेकिन इस स्टैंडर्ड को सस्टेन करने के लिए उनके पास उतनी शिक्षा नहीं है। संजय भाटी के साथ आए गांव के ही एक निवासी लोई ओढ़े काफी देर से खामोश बैठे थे। अपना नाम तो नहीं बताया पर इतना ही बोले ‘सरकार को हमारे बच्चों की शिक्षा का ख्याल करना चाहिए। ग्रेटर नोएडा में नाॅलेज पार्क बनाया गया और तमाम प्रोफेशनल इंस्टीट्यूट खोले गए। यहां तकरीबन डेढ़ लाख स्टूडेंट पढ़ रहे हैं, लेकिन हमारे बच्चों को एडमिशन देने से सब बचते हैं। उनको दबंग कहा जाता है। ऐसे तो ये बच्चे कहीं के नहीं रहेंगे।’ बताया जाता है कि ग्रेटर नोएडा की गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी जो मुख्यमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट है, वहां प्रोफेशनल कोर्सेज की फीस इतनी ज्यादा है कि वो प्राइवेट इंस्टीट्यूट्स को भी मात देती नजर आती है। वो किसी भी दृष्टि से ग्रामीण स्टूडेंट्स की जरूरतें पूरी करती नहीं दिखती।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;क्या किया पैसे का?&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: left; margin-right: 1em; text-align: justify;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-WbXWPVz9KxI/TdElXhvsysI/AAAAAAAAAWM/8LovuMMkO3Q/s1600/DSC00128.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/-WbXWPVz9KxI/TdElXhvsysI/AAAAAAAAAWM/8LovuMMkO3Q/s320/DSC00128.JPG" width="240" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;मनोज भाटी&amp;nbsp;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ये सवाल काफी कौतूहल का विषय रहता है कि आखिर किसान उस मुआवजे की रकम का करते क्या हैं, जो जमीन के एवज में या तो सरकार से या फिर प्राइवेट बिल्डर्स से मिलती है। हमारी मुलाकात हुई ग्रेटर नोएडा के जुनपत गांव में रहने वाले मनोज भाटी से। मनोज की खानदानी जमीन दो बार अधिग्रहण की चपेट में आई। पहली बार 2002 में जब उनको 40 लाख का मुआवजा मिला और दूसरी बार 2007 में जब उनको 1 करोड़ 77 लाख का मुआवजा हाथ आया। इतनी बड़ी रकम अचानक मिल जाना और फिर उसको सही दिशा दे पाना एक बड़़ी चुनौती थी। अपने ठेठ देसी अंदाज में मनोज अपनी कहानी मेरे सामने बयां करते चले गए। उन्होंने बेबाकी से स्वीकार किया कि गांव के लोग पैसे को सही जगह लगाना नहीं जानते। इसके चलते थोड़े ही समय में मुआवजा खत्म हो जाता है और अभाव की स्थिति आ जाती है। मुआवजा मिलते ही सबसे पहला काम होता है- एक गाड़ी खरीदना और फिर गांव में एक शानदार घर बनवाना। मनोज ये भी स्वीकारते हैं कि कई घरों को शराब की लत ले डूबी। बहरहाल मनोज अपने बारे में बताते हैं ‘हमने तो जी दादरी कस्बा में एक बड़ो मकान बनायो, और वाकू किराये पै उठा दियो। अब हमैं जी महीना के बीस हजार बैठे बिठाए मिल जावै हैं। बाकी खाली समय में मेरो प्राॅपर्टी डीलिंग और सैटरिंग को काम है।’ मनोज ने अपनी देसी भाषा में पूरी स्थिति मेरे सामने साफ कर दी। आज इस क्षेत्र के ज्यादातर युवाओं का यही हाल है। उनके पास बहुत पैसा है, लेकिन एक अच्छा&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;रोजगार है&amp;nbsp;नहीं और खेती वो कर नहीं सकते।&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मनोज ये भी बताते हैं कि क्षेत्र के कई किसानों ने जमीन के बदले जमीन खरीदने की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं। अपने गांवों में जमीन खत्म हो गईं तो किसानों ने बुलंदशहर और अलीगढ़ की तरफ के गांवों में जमीनें खरीदनी शुरू कीं, ताकि उनका परंपरागत और खानदानी पेशा न छूटने पाए। ऐसा करके जहां कुछ लोगों को सफलता हाथ लगी तो वहीं कुछ किसान विफल भी रहे। दूर दराज के गावों में जमीन खरीदना काफी रिस्की खेल था। क्योंकि वहां के लोकल लोगों द्वारा यहां के किसानों की जमीनों पर कब्जा करने के कई मामले प्रकाश में आए। रंजिशें पनपने लगीं, थाने-कचहरियों के चक्कर लगने लगे और रकम फंसी सो अलग। इस सबके बाद क्षेत्र के किसानों ने दूर दराज इलाकों में बिना जान-पहचान के जमीन खरीदने का सिलसिला कम कर दिया।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;राजनीति का चस्का&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पैसा आ जाने के बाद युवाओं में राजनीति का चस्का भी जबरदस्त है। हाल ही में संपन्न हुए ग्राम पंचायत और जिला पंचायत चुनावों में युवाओं ने जमकर भागीदारी की। युवाओं के पास धन भी है, समय भी है और अपने सपनों को अमलीजामा पहनाने के लिए आवश्यक पौरुष भी। पूरे ग्रेटर नोएडा में चिपके पाॅलिटिकल पोस्टर्स पर युवाओं के चेहरे मुस्कुराते नजर आते हैं और ये युवा किसी इलीट क्लास के नहीं बल्कि ठेठ गंवई हैं जो अपने धन के बल पर राजनीति में अपना भाग्य आजमाने उतर पड़े हैं। युवाओं में गाड़ी और राजनीति के बाद जो दूसरा ट्रेंड देखने को मिल रहा है वो है लाइसेंसी हथियार रखने का। शादियों में अंधाधुंध फायरिंग करने के अलावा अपनी जींस में विदेशी पिस्टल लगाना एक शगल बन गया है। शायद यही सब कारण हैं कि ग्रेटर नोएडा के इलीट क्लास को गांव के ये लोग दबंग और वाॅयलेंट लगते हैं।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;बढ़ गया दहेज का चलन&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जब से इस क्षेत्र के किसानों को जमीन के एवज में मोटे-मोटे मुआवजे मिले हैं तब से यहां के दूल्हों की पौ बारह हो गई है। इन गांवों के लड़कों के रेट सातवें आसमान पर हैं। इन गांवों के लड़के भले की कुछ न कर रहे हों फिर भी उनकी शादी में लड़की वालों को औसतन 20 से 40 लाख तक खर्च करने पड़ रहे हैं। अपनी बेटी के साथ उनको देनी पड़ रही है एक शानदार चमचमाती गाड़ी और मोटा कैश। कारण वही कि लड़की वालों को इस क्षेत्र के लड़कों में उनके मुआवजे की वजह से ज्यादा संभावना नजर आती है। उनकी बेटी के रहने के लिए एक अच्छा घर और खाता-पीता परिवार। ये भी कोई अचरज की बात नहीं कि इसी क्षेत्र के इमलिया गांव में आई बारात एक मिसाल बन गई। दूल्हा हेलीकाॅप्टर से जो आया था। थोड़ा आगे बढ़कर खुद मुख्यमंत्री मायावती के गांव तक चलें तो यहां एक लड़के को शादी में बीएमडब्ल्यू कार दी गई। ये बात दीगर है कि लड़का एक मंत्री का बेटा था। जबकि मर्सिडीज कार तो कई लड़कों को मिल चुकी है। दहेज की ये होड़ इस क्षेत्र के लिए बेहद हानिकारक साबित हो रही है। ग्रेटर नोएडा के गांवों में दहेज का इतना तगड़ा काॅपटीशन चल निकला है कि लड़की वालों की आफत आ गई है। भरे समाज के बीच लड़के की लगन चढ़ती है और लड़की वाला उसको उपहार स्वरूप तमाम कैश, गाड़ी और तमाम घरेलू साजो सामान से नवाजता है। फिर गांव के पंडित जी सभी के बीचो-बीच खड़े होकर एनाउंसमेंट करते हैं कि गांव के इस होनहार सपूत को दहेज में क्या-क्या मिला है। और इस प्रथा को बल मिलता चला जाता है। कुछ सामाजिक संगठन दहेज के खिलाफ लामबंद तो हुए हैं लेकिन उनकी मुखालफत करने वाले ज्यादा हैं और समर्थन करने वाले कम।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: left; margin-right: 1em; text-align: justify;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-hILdJ9IlC1w/TdEkv6hRuDI/AAAAAAAAAWI/tGdrgqFQO3g/s1600/DSC00131.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://1.bp.blogspot.com/-hILdJ9IlC1w/TdEkv6hRuDI/AAAAAAAAAWI/tGdrgqFQO3g/s320/DSC00131.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;सुरेन्द्र नागर&lt;/b&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कुड़ी खेड़ा गांव यूं तो अभी अधिग्रहण की चपेट में नहीं आया है, लेकिन बहुत जल्द यहां भी अधिग्रहण का खेल शुरू होने वाला है। गांव के किसान पहले से ही सजग हो सतर्क बैठे हैं कि किस प्रकार अपनी जमीन का ज्यादा से ज्यादा मुआवजा लिया और फिर अक्समात मिलने वाले धन का किस तरह सही उपयोग किया जाए। सुरेंद्र नागर इस गांव से एमबीए की पढ़ाई करने वाले पहले युवा थे। इन्होंने पहले गाजियाबाद के एक इंस्टीट्यूट से बीबीए और फिर ग्रेटर नोएडा के ही गलगोटिया काॅलेज से एमबीए किया। आज सुरेंद्र अपने गांव के सबसे एलिजिबल बैचलर हैं और उनकी देखादेखी आज उनके गांव के कम से कम दस लड़के एमबीए कर रहे हैं। कोर्स करने बाद ही सुरेंद्र को आईसीआईसीआई बैंक में अच्छी नौकरी भी मिल गई। लेकिन नौकरी के सत्तर झंझट सुरेंद्र को पसंद नहीं आए और एक दिन ये फैसला ले लिया कि अब अपना काम करना है। सुरेंद्र ने अपने एमबीए के ज्ञान को लाभी उठाते हुए ग्रेटर नोएडा में ही शेयर मार्केट का बिजनेस शुरू कर दिया। साथ में परिवार के प्राॅपर्टी डीलिंग के काम में भी हाथ बंटाने लगे। सुरेंद्र भले ही बहुत पढ़-लिख गए हों लेकिन उनका अंदाज एकदम देसी है। गलगोटिया काॅलेज का माॅडर्न एन्वाॅयरमेंट उन पर बहुत प्रभाव नहीं डाल पाया। 25 साल का ये युवक मानता है कि शादी के मामले में युवाओं को माता-पिता की मर्जी का ख्याल रखना चाहिए। अपने आॅफिस में चाय-पकौड़ों से मेरा इस्तकबाल करने के साथ-साथ सुरेंद्र अपनी भावनाएं व्यक्त करते चले गए ‘अभी इस क्षेत्र में एजूकेशन की बहुत कमी है। अगर एजूकेशन की तरफ जल्द ही ध्यान नहीं दिया गया तो युवा बहक भी सकते हैं। उनके अंदर भरपूर एनर्जी है- धन की भी और तन की भी और इस एनर्जी को सही दिशा देना बेहद जरूरी है। वरना वो क्राइम में भी उतर सकते हैं।’&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;पंचायत को पूरा अधिकार&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इन गांवों के आसपास भले ही एक सुपर माॅडर्न वल्र्ड खड़ा हो रहा हो। लेकिन आज भी ये गांव अपनी जड़ों को नहीं छोड़ पाए हैं। आज भी गांवों में पंचायतें फैसले लेती हैं। लड़का-लड़की का अपनी मर्जी से ‘लव मैरिज’ करना अवैध माना जाता है। आॅनर किलिंग की घटनाएं होती हैं, लेकिन उनको इस कदर समाज का समर्थन प्राप्त है कि वे घटनाएं प्रकाश में भी नहीं आ पातीं। युवा अपनी दुनिया में कितने भी मनचले और उन्मुक्त क्यों न हों, लेकिन गांव के बड़े बुजुर्गों के सामने आज भी जुबान नहीं खोल पाते।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;अर्बन जोन&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए यमुना एक्सप्रेस वे के दोनों तरफ के इलाकों को अर्बन जोन घोषित कर दिया है। ग्रेटर नोएडा का ये अर्बन जोन नोएडा से कम से कम दस गुना बड़ा होगा। इससे छह जिलों के 1187 गांव शहरी सीमा में आ जाएंगे। एक्सप्रेस वे के बाईं तरफ 10 से 15 किमी का क्षेत्र और दाईं तरफ यमुना नदी तक का क्षेत्र इस अर्बन जोन की हद में आ जाएगा। सरकार का तर्क है कि एक्सप्रेस वे के दोनों तरफ बेतरतीब तरीके से होने वाले विकास की जगह एक सिस्टेमैटिक डेवलपमेंट करने के लिए ये फैसला जरूरी था। इस फैसले का इन गांवों पर क्या असर होने जा रहा है इसका अंदाजा अभी से लगाया जा सकता है। सुरेंद्र नागर कहते हैं कि ‘जो लोग अब तक दाल-रोटी को तरजीह देते थे उनको जबरदस्ती डोमिनोज पिज्जा परोसने की कोशिश है’।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;संस्कृति&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;गांवों के आसपास भले ही विकास अपने पांव पसारता जा रहा है, लेकिन गांवों की संस्कृति में बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं आया है। जब मैं श्यामवीर के साथ चैहड़पुर गांव में घुस रहा था तो गांव के मुहाने पर ही कुछ महिलाएं गोबर से उपले बनाने व्यस्त थीं। जब उन्होंने मुझे अपनी ओर देखता पाया तो उन्होंने झट से पर्दा कर लिया। गांवों के लड़कों ने भले ही जींस पहननी शुरू कर दी है लेकिन महिलाएं भी पारंपरिक सूट और साड़ी ही पहनती हैं। बस इतना जरूर है कि उनकी साड़ी अब थोड़ी महंगी हो गई है। हां, अगर खत्म हो रही है तो मर्दानी धोती। गांव के बूढ़े भी अब धोती कुर्ता की जगह कुर्ता पयजामा पहन रहे हैं। वैसे अब तो संसद में धोती वाले नेता कम होते जा रहे हैं। उत्तर भारत में धोती हो या दक्षिण भारत की लूंगी युवाओं में इस परिधान के प्रति रुझान काफी तेजी से घट रहा है। शहरों में तो धोती वैसे भी रुढि़वादी और दकियानूसी विचारधारा का प्रतीक होती है।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;इंश्योरेंस एजेंट&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बातचीत में पता चला कि गांवों में अभी मैकडोनाल्ड बर्गर और डोमिनोज पिज्जा का चलन तो नहीं, लेकिन इंश्योरेंस एजेंट धड़ल्ले से पहुंच रहे हैं। गांव वालों को अचानक मिली अकूत संपत्ति को सही जगह इंवेस्ट करने की तरीके सुझाने के लिए तमाम कंपनियों के एजेंट्स गांव की धूल फांक रहे हैं। ये भी कोई अतिश्योक्ति नहीं कि ज्यादातर एजेंट इन्हीं गांवों के रहने वाले हैं, जो आपसी विश्वास और भाईचारे के आधार पर लोगों को पाॅलिसियां बेच रहे हैं। हालांकि लोगों की ये भी शिकायत थी कि कुछ एजेंट्स उनका पैस लेकर भाग गए, जो शहर से आए थे और ये लोग उनको जानते भी नहीं थे।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;और अब नाइट सफारी&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यमुना एक्सप्रेस वे के आसपास के गांव में रहने वाले लोगों के बीच अब ‘नाइट सफारी’ का एक नया शिगूफा आ रहा है। इस क्षेत्र में रहने वाले अधिकांश लोग तो नाइट सफारी का मतलब भी नहीं जानते। लेकिन अगर सबकुछ ठीक रहा तो ये अजीबोगरीब नाम जल्द ही उनके बीच प्रचलित होने वाला है। जी हां, नाइट सफारी मतलब एक ‘नाॅक्टरनल जू’ यानि रात को देखा जाने वाला चिडि़याघर। विश्व भर में अब तक केवल तीन देशों में ही नाइट सफारी हैं- सिंगापुर, चीन और थाइलैंड। यदि प्रयास सफल होते हैं तो भारत इस तरह का चैथा देश होगा। ग्रेटर नोएडा अथाॅरिटी सूत्रों की मानें तो विश्वप्रसिद्ध जू डिजाइनर बरनार्ड हैरिसन, जिन्होंने सिंगापुर नाइट सफारी को डिजाइन किया था, ग्रेटर नोएडा नाइट सफारी को भी डिजाइन करेंगे। 222 एकड़ में बनने वाले इस मेगा प्रोजेक्ट में तमाम तरह के वन्यजीवों को लाने की तैयारी है। पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए यहां हाई प्रोफाइल कैसीनो और रेस्तरां भी तैयार करे जाएंगे। इतना तो तय है कि इस नाइट सफारी के बनने से एनसीआर के लोगों को मस्ती का नया अड्डा और देश के लोगों को एक शानदार पर्यटन स्थल मिलने जा रहा है, लेकिन एक्सप्रेस वे के आसपास बसे गांवों में रहने वाली आबादी की जिंदगी को ये किस तरह प्रभावित करेगा ये देखना होगा। बहरहाल इस नाइट सफारी को सेंट्रल जू अथाॅरिटी और सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी मिल गई है। गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के पास बनने वाले इस प्रोजेक्ट के लिए जमीन का अधिग्रहण भी किया जा चुका है। जब ये नाइट सफारी अस्तित्व में आएगी तब शायद गांवों के लोग इसके आसपास चाय और जूस के खोखे लगाते नजर आएं। या फिर ऐसा भी हो सकता है कि हाइजीन के नाम पर उनको इसकी भी इजाजत न दी जाए।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;i&gt;’’यमुना एक्सप्रेस-वे पूर्णतयाः व्यवासयिक दृष्टिकोण पर आधारित है। इसमें किसान और गांवों का कोई लाभ नहीं है। इस एक्सप्रेस-वे को बनाने में जिस तरह की नीतियां अपनाई गई हैं, उससे वेस्ट यूपी का ग्रामीण अंचल बर्बाद हो जाएगा। इस क्षेत्र में मुख्यतौर पर गुर्जर, पंडित, ठाकुर और जाटों के पास अधिकांश जमीनें हैं। ये एक तरह से इन जातियों को कमजोर करने का भी जरिया है। इस क्षेत्र में लगातार बढ़ रहा अपराध आने वाले बुरे समय की ओर इशारा कर रहा है। सरकार को किसानों की पूरी जमीन न लेकर आधी जमीन लेनी चाहिए थी, ताकि उनका परंपरागत काम उनके हाथ से नहीं छिनता। साथ ही 25 प्रतिशत जमीन किसानों के लिए विकसित करके देनी चाहिए थी, ताकि वे उसमें कोई व्यवसाय आदि कर सकें। सरकार फार्म हाउस तो बना रही है लेकिन वे उद्योगपतियों के लिए हैं। इस क्षेत्र को जो अर्बन जोन में कन्वर्ट करने का फैसला आया है वो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। इसको लागू नहीं होने दिया जाएगा। किसान अभी शांत हैं, इसका मतलब ये नहीं कि आंदोलन समाप्त हो गया। आंदोलन फिर शुरू होने वाला है, हम अपनी पूरी ताकत लगा देंगे। जमीन अपनी शर्तों पर देंगे और अपने रेट पर देंगे। चाहे हमारी जान ही क्यों न चली जाए।’’&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;i&gt;-&lt;b&gt;मनवीर सिंह तेवतिया, अध्यक्ष, सर्वदल किसान संर्घष समिति&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 18.0pt; margin-bottom: 1.2pt; margin-left: .25in; mso-margin-top-alt: auto;"&gt;&lt;b style="mso-bidi-font-weight: normal;"&gt;&lt;u&gt;&lt;br /&gt;&lt;/u&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 18.0pt; margin-bottom: 1.2pt; margin-left: .25in; mso-margin-top-alt: auto;"&gt;&lt;b style="mso-bidi-font-weight: normal;"&gt;&lt;u&gt;Quick Facts about Yamuna Expressway&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/u&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 18.0pt; margin-bottom: 1.2pt; margin-left: .25in; mso-list: l0 level1 lfo1; mso-margin-top-alt: auto; tab-stops: list .5in; text-indent: -.25in;"&gt;&lt;span style="font-family: Wingdings; font-size: 10pt;"&gt;§&lt;span style="font: normal normal normal 7pt/normal 'Times New Roman';"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;Districts Touched: 6 (Gautam Buddha Nagar,&amp;nbsp;Bulandshahr,&amp;nbsp;Aligarh, Mahamaya Nagar (Hathras),Mathura&amp;nbsp;and&amp;nbsp;Agra)&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 18.0pt; margin-bottom: 1.2pt; margin-left: .25in; mso-list: l0 level1 lfo1; mso-margin-top-alt: auto; tab-stops: list .5in; text-indent: -.25in;"&gt;&lt;span style="font-family: Wingdings; font-size: 10pt;"&gt;§&lt;span style="font: normal normal normal 7pt/normal 'Times New Roman';"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;Villages Touched: 1187&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 18.0pt; margin-bottom: 1.2pt; margin-left: .25in; mso-list: l0 level1 lfo1; mso-margin-top-alt: auto; tab-stops: list .5in; text-indent: -.25in;"&gt;&lt;span style="font-family: Wingdings; font-size: 10pt;"&gt;§&lt;span style="font: normal normal normal 7pt/normal 'Times New Roman';"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;Rural Population affected:&amp;nbsp; 24 Lakhs&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 18.0pt; margin-bottom: 1.2pt; margin-left: .25in; mso-list: l0 level1 lfo1; mso-margin-top-alt: auto; tab-stops: list .5in; text-indent: -.25in;"&gt;&lt;span style="font-family: Wingdings; font-size: 10pt;"&gt;§&lt;span style="font: normal normal normal 7pt/normal 'Times New Roman';"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;Length - 165.53&amp;nbsp;km&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 18.0pt; margin-bottom: 1.2pt; margin-left: .25in; mso-list: l0 level1 lfo1; mso-margin-top-alt: auto; tab-stops: list .5in; text-indent: -.25in;"&gt;&lt;span style="font-family: Wingdings; font-size: 10pt;"&gt;§&lt;span style="font: normal normal normal 7pt/normal 'Times New Roman';"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;Right of Way - 100m&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 18.0pt; margin-bottom: 1.2pt; margin-left: .25in; mso-list: l0 level1 lfo1; mso-margin-top-alt: auto; tab-stops: list .5in; text-indent: -.25in;"&gt;&lt;span style="font-family: Wingdings; font-size: 10pt;"&gt;§&lt;span style="font: normal normal normal 7pt/normal 'Times New Roman';"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;Number of Lane - 6 Lanes extendable to 8 lanes&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 18.0pt; margin-bottom: 1.2pt; margin-left: .25in; mso-list: l0 level1 lfo1; mso-margin-top-alt: auto; tab-stops: list .5in; text-indent: -.25in;"&gt;&lt;span style="font-family: Wingdings; font-size: 10pt;"&gt;§&lt;span style="font: normal normal normal 7pt/normal 'Times New Roman';"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;Type of Pavement - Rigid (Concrete)&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 18.0pt; margin-bottom: 1.2pt; margin-left: .25in; mso-list: l0 level1 lfo1; mso-margin-top-alt: auto; tab-stops: list .5in; text-indent: -.25in;"&gt;&lt;span style="font-family: Wingdings; font-size: 10pt;"&gt;§&lt;span style="font: normal normal normal 7pt/normal 'Times New Roman';"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;Interchange - 7&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 18.0pt; margin-bottom: 1.2pt; margin-left: .25in; mso-list: l0 level1 lfo1; mso-margin-top-alt: auto; tab-stops: list .5in; text-indent: -.25in;"&gt;&lt;span style="font-family: Wingdings; font-size: 10pt;"&gt;§&lt;span style="font: normal normal normal 7pt/normal 'Times New Roman';"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;Main Toll Plaza - 3&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 18.0pt; margin-bottom: 1.2pt; margin-left: .25in; mso-list: l0 level1 lfo1; mso-margin-top-alt: auto; tab-stops: list .5in; text-indent: -.25in;"&gt;&lt;span style="font-family: Wingdings; font-size: 10pt;"&gt;§&lt;span style="font: normal normal normal 7pt/normal 'Times New Roman';"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;Toll Plaza on Interchange Loop - 7&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 18.0pt; margin-bottom: 1.2pt; margin-left: .25in; mso-list: l0 level1 lfo1; mso-margin-top-alt: auto; tab-stops: list .5in; text-indent: -.25in;"&gt;&lt;span style="font-family: Wingdings; font-size: 10pt;"&gt;§&lt;span style="font: normal normal normal 7pt/normal 'Times New Roman';"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;Underpass - 35&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 18.0pt; margin-bottom: 1.2pt; margin-left: .25in; mso-list: l0 level1 lfo1; mso-margin-top-alt: auto; tab-stops: list .5in; text-indent: -.25in;"&gt;&lt;span style="font-family: Wingdings; font-size: 10pt;"&gt;§&lt;span style="font: normal normal normal 7pt/normal 'Times New Roman';"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;Rail Over Bridge - 1&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 18.0pt; margin-bottom: 1.2pt; margin-left: .25in; mso-list: l0 level1 lfo1; mso-margin-top-alt: auto; tab-stops: list .5in; text-indent: -.25in;"&gt;&lt;span style="font-family: Wingdings; font-size: 10pt;"&gt;§&lt;span style="font: normal normal normal 7pt/normal 'Times New Roman';"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;Major Bridge - 1&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 18.0pt; margin-bottom: 1.2pt; margin-left: .25in; mso-list: l0 level1 lfo1; mso-margin-top-alt: auto; tab-stops: list .5in; text-indent: -.25in;"&gt;&lt;span style="font-family: Wingdings; font-size: 10pt;"&gt;§&lt;span style="font: normal normal normal 7pt/normal 'Times New Roman';"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;Minor Bridge - 42&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 18.0pt; margin-bottom: 1.2pt; margin-left: .25in; mso-list: l0 level1 lfo1; mso-margin-top-alt: auto; tab-stops: list .5in; text-indent: -.25in;"&gt;&lt;span style="font-family: Wingdings; font-size: 10pt;"&gt;§&lt;span style="font: normal normal normal 7pt/normal 'Times New Roman';"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;Cart Track Crossing - 68&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 18.0pt; margin-bottom: 1.2pt; margin-left: .25in; mso-list: l0 level1 lfo1; mso-margin-top-alt: auto; tab-stops: list .5in; text-indent: -.25in;"&gt;&lt;span style="font-family: Wingdings; font-size: 10pt;"&gt;§&lt;span style="font: normal normal normal 7pt/normal 'Times New Roman';"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;Culverts – 204&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 18.0pt; margin-bottom: 1.2pt; margin-left: .25in; mso-list: l0 level1 lfo1; mso-margin-top-alt: auto; tab-stops: list .5in; text-indent: -.25in;"&gt;&lt;span style="font-family: Wingdings; font-size: 10pt;"&gt;§&lt;span style="font: normal normal normal 7pt/normal 'Times New Roman';"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;Slated to Complete in: April 2011&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="tab-stops: 138.7pt;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;a href="http://www.inkthemagazine.com/"&gt; www.inkthemagazine.com&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-5093386289764385915?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/5093386289764385915/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/05/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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src="http://3.bp.blogspot.com/-GIjBImy1tOc/TbZpmLt7VWI/AAAAAAAAAVg/U4riNATuN5A/s1600/kalmadi.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;कौं रे कलुआ ऐसी का खबर छपी है, जो घूर घूर&amp;nbsp;कै&amp;nbsp;अख़बार&amp;nbsp;मैं&amp;nbsp;घुसो&amp;nbsp;जा&amp;nbsp;रो है.&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;कुछ न दद्दा.... वे हे न अपने चचा कलमाडी, उनके ताईं पुलिस पकड़ कै लै गयी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कौन वो कॉमनवेल्थ करोडपति कलमाडी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ दद्दा वोई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर अब?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब का दद्दा पार्टी वारे भी किनारा कर गए हैं. मैडम ने&amp;nbsp;लिकाड़&amp;nbsp;दओ&amp;nbsp; पार्टी सै. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बताओ मुसीबत मैं सब संग छोड़ जाए हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे कैसे मुसीबत दद्दा... करोड़ों डकारते बखत सोचनी चहिए ही न. मुसीबत तो खुद की बुलाई भई है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे तौ का बिचारे नै अकेले डकारे हे. और भी तो हे संग मैं. उनको नाम कोई न लै रओ.&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;नाम तौ दद्दा कई के आ रए हैं। शीला चाची कौ भी अंदर करान की मांग उठ रई हैगी। विपच्छ वारे बड़ो&amp;nbsp;हो-हल्ला मचा रए हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखौ तो एक तौ बिचारन नै अपने यहां खेल कराए और अब जेल भी जानो पड़ रौ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेल-वेल तौ कोई ना जा रौ दद्दा। सब बाहर है जांगे। जे तो लोगन के ताईं फुद्दू बनान के नाटक हैं। जा सै पहलै भी तो कितने नेता पकड़े गए हे, पर काई कौ जेल भई। सब खुल्ले घूम&amp;nbsp;रये हैंगे सांडन के तरह।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर मोय तो तरस आबै बिचारे कलमाडी पै। बिचारे को अकेले को नाम खराब है रओ है, घी तो औरन नै भी पियो हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पियो तो हो दद्दा, पर सबसै ऊपर तो कलमाडी ही हो। जो चाहतो तो सबको रोक लेतो। पर चुपचाप तमाशो देखतो रओ और सबके संग अपनी बैंकैं भरतो रओ। तौ इत्ती फजीहत होनी ही चहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम्म्! चलौ अब का कर सकै हैं। लगै अब भ्रष्टन की हजामत को समय आ गओ है। जे सब हजारे को कमाल है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे दद्दा कमाल काई को न है। जे सब दिखावो है। कुछ दिनन की बात है खुलो सांड की तरह घूमैगो सड़कन पै, कुछ न होने वारो। बाद में करोड़न की मलाई खाएगो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर&amp;nbsp;जौ&amp;nbsp;सजा है&amp;nbsp;गई तौ&amp;nbsp;खेलन की आफत आ जाएगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सो क्यौं दद्दा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब नेतन की हवा खराब है जाऐगी। फिर कोई अपने यहां खेल न कराने वारो। सब मनै कर दिंगे, जी हमें कोई खेल न कराने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुन तो रये हैं कि शीला चाची की घबराई फिर रई हैं। गर कलमाडी नै उनको नाम लै लओ तौ फिर समझो दद्दा बिगड़ गई बात।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे वो&amp;nbsp;कलमाडी है कलमाडी! नाम न लेन के भी रुपया खा लैगो कांग्रेस सै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ही ही ही!!! तुम भी दद्दा क्यौं मजा लै रे हो बुढ़ापे मै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे मैं का मजा ले रौं हौं। मजा तो दिल्ली वारे लै रे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर दद्दा जो अगली फेरै सबनै अपने यहां खेल कराने सै मनै कर दई तौ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न सब न मनै करंगे। वो जो है न मोदी गुजरात वारो, वो करा दैगो नैक देर मैं अपने यहां। बाकी बातन में दम सो लगै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;का पते दद्दा वानै भी मनै कर दई तौ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तौ फिर कलुआ अपने गांव मै ही करा लिंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो बात सई है, दद्दा। उनको खर्चा बच जाएगो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खर्चा कैसे बचैगो कलुआ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे, खेलन के ताईं खेल गांव बनानो पड़ै न। गांव तौ जो पहले सै है बस खेल-खेल कराने हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हा हा हा हा। अरे कलुआ तू तौ समझदार है गओ है अखबार पढ़-पढ़ कै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब तुम्हारो आसिरबाद है दद्दा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीतो रै जीतो रै! चल अब खेतन पर घूम आऐं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलौ दद्दा!!!!!!!!&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-5247473897473001469?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/5247473897473001469/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/04/blog-post_26.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/5247473897473001469'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/5247473897473001469'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/04/blog-post_26.html' title='चर्चा ये आम है आज कल....'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-GIjBImy1tOc/TbZpmLt7VWI/AAAAAAAAAVg/U4riNATuN5A/s72-c/kalmadi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-6358737864612045478</id><published>2011-04-21T14:43:00.000+05:30</published><updated>2011-04-21T14:43:35.046+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कायदा कानून'/><title type='text'>अनुभव बोलता है!!!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-Pha5f2QSSg0/Ta_zSxoDgBI/AAAAAAAAAVU/BBsvsMuQVQ8/s1600/Congress_02.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" i8="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-Pha5f2QSSg0/Ta_zSxoDgBI/AAAAAAAAAVU/BBsvsMuQVQ8/s320/Congress_02.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&amp;nbsp;अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल फूंक तो दिया. जैसा अनुमान था उससे कहीं ज्यादा देश की जनता का रेस्पोंसे मिला. उससे भी हैरत की बात की महज चार दिनों में सरकार घुटनों पे आ गयी. जाहिर है कि ये अन्ना का नहीं बल्कि उनको मिले जनसमर्थन का दबाव था जो सरकार ने आत्मसमर्पण कर दिया. उस समय सरकार ने अपनी आबरू बचाने के लिए भले ही रीढ़ झुका ली थी लेकिन असली खेल तो अब शुरू हुआ है. लोकपाल बिल को पलीता लगाने और अन्ना व उनके समर्थकों पर कींचड उछालने का काम जोर शोर से शुरू कर दिया गया है. कोशिश यही है कि 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' की किसी तरह इमेज ख़राब करके लोकपाल बिल को ठन्डे बसते में डाला दिया जाये या फिर इसमें जो कड़े प्रावधान हैं उनकी हवा निकाल दी जाए. जिस तरह रणनीति बनाकर अन्ना पर हमले किये जा रहे हैं उसको देखते हुए लगता भी है कि सरकार अपने मंसूबों में कामयाब हो जाएगी. अंदरूनी खबर ये भी आ रही है कि इधर&amp;nbsp;के&amp;nbsp;कुछ लोग सरकार से मिल भी गए हैं. दरअसल ये तो होना ही था. भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐलान-ए-जंग घोषित करने से पहले हमें ये पता होना चाहिए कि सत्ताधारियों के पास भ्रष्टाचार में ६३ साल का अनुभव है. अब ये अनुभव यूँ ही बेकार तो नहीं जायेगा. नेता आखिर&amp;nbsp;नेता ही होता है. कितना भी भला बन जाये लेकिन सत्ता के खून का असर नहीं जा सकता.&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-On7J4wHsLOw/Ta_zWFC1_TI/AAAAAAAAAVY/bmfurCXv_K0/s1600/anna-hazare.png" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" i8="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-On7J4wHsLOw/Ta_zWFC1_TI/AAAAAAAAAVY/bmfurCXv_K0/s320/anna-hazare.png" width="234" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;पहले मुझे अनुभव पर उतना विश्वास नहीं था. लेकिन अब पता चला की जब कम्पनियां अनुभवी लोगों की मांग करती हैं तो यूँ ही नहीं करती, वास्तव में अनुभव काम आता है. अन्ना और सरकार की जंग में तो ये कतई साफ़ हो चुका है. कांग्रेस का ६३ साल का भ्रष्टाचारी अनुभव आज भली भांति उसके काम आ रहा है. उसके तमाम सुसुप्त और भ्रष्ट सिपहसलार एक्टिव हो गए हैं. सबने अपने-अपने ढंग से अन्ना पर हमले शुरू कर दिए हैं. फ़िलहाल उनका एक मात्र मकसद यही है कि अन्ना द्वारा जीता गया लोगों का विश्वास ख़त्म हो जाये, उसके बाद फिर लोकपाल से निपटा जायेगा. वैसे भी भ्रष्ट लोगों में कुछ एक गुण बेहद विशेष होते हैं. एक तो वो हर चीज़ मिल-बांटकर खाते हैं. बुरे समय में वे एक-दूसरे के सबसे बड़े संकट मोचक होते हैं&amp;nbsp;और&amp;nbsp;एक-दूसरे की आबरू ढकने की खातिर वे पार्टी लाइन से ऊपर उठकर काम करते हैं. लेकिन ये जो नॉन-भ्रष्ट लोग हैं ये बड़े अहंकारी होते हैं. इनको अपनी ईमानदारी और सात्विकता का इतना अहम् होता है कि ये दूसरे नॉन-भ्रष्ट को कतई कॉपरेट नहीं करते. बल्कि एक-दूसरे की तरक्की से जलते रहते हैं. दरअसल गलती उनकी भी नहीं है. आज संसार का सारा व्यव्हार फायदे और नुकसान के पैमाने पर टिका है. निस्वार्थ तो कुछ भी नहीं. एक भ्रष्ट जब दूसरे भ्रष्ट की मदद करता है तो उसमें दोनों का फायदा होता है. लेकिन एक नॉन-भ्रष्ट जब दूसरे नॉन-भ्रष्ट की सहायता करता है तो उसमें एक का ज्यादा फायदा होता है जबकि दूसरा पाशर्व में रहता है. जैसे तमाम नॉन-भ्रष्ट लोगों के समर्थन से अन्ना रातों-रात हीरो बन गए. लेकिन अन्ना की ये ख्याति कई नॉन-भ्रष्टों को पच नहीं रही है.&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;इसी चीज़ का सत्ताधारियों ने फायदा उठाया और अन्ना पर हमला बोल दिया. अन्ना पर इन सरकारी हमलों के पीछे कहीं न कहीं कई नॉन-भ्रष्ट एलिमेंट्स काम कर रहे हैं, जो दरअसल अन्ना के बढ़ते कद से खुश नहीं हैं. तो ये जो नॉन-भ्रष्ट लोगों की ईगो प्रोब्लम है, वही भ्रष्टों के लिए सबसे बड़ा वरदान&amp;nbsp;है. नॉन-भ्रष्ट लोगों की आपसी फूट और ईगो प्रोब्लम की वजह से देश में भ्रष्टाचारियों की बल्ले-बल्ले है. खैर अब जब बात निकली है तो दूर तलक जाएगी, आगे आगे देखिये अन्ना की ये जंग क्या गुल खिलाएगी.... &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-6358737864612045478?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/6358737864612045478/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/04/blog-post_21.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/6358737864612045478'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/6358737864612045478'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/04/blog-post_21.html' title='अनुभव बोलता है!!!'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-Pha5f2QSSg0/Ta_zSxoDgBI/AAAAAAAAAVU/BBsvsMuQVQ8/s72-c/Congress_02.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-4555505390062697897</id><published>2011-04-10T16:45:00.000+05:30</published><updated>2011-04-10T16:45:43.885+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शिक्षा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='System'/><title type='text'>संस्कृत भाषा को बचाने के लिए पिछले चार दिन से अनशन पर बैठी एक संस्कृत टीचर</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-EnryMuJ62-Y/TaGOii6sbgI/AAAAAAAAAVM/8KauFZoG6Nk/s1600/DSC00624.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" r6="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-EnryMuJ62-Y/TaGOii6sbgI/AAAAAAAAAVM/8KauFZoG6Nk/s320/DSC00624.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे का अनशन रंग लाया और सरकार झुक गई। एक व्यवस्थित ढंग से चलाए गए अभियान के सामने सरकार को घुटने टेकने पड़े। लेकिन हर आंदोलन सफलता के अंजाम तक नहीं पहुंचा करता। कई बार व्यवस्था इतनी ढीठ होती है कि अनशन पर बैठे व्यक्ति के प्राण हर कर ही बाज आती है। दिल्ली में रोहिणी के सेक्टर 15 स्थित सेंट एंजेल्स स्कूल के बाहर भी एक ऐसा ही अनशन चल रहा है। गत 7 अप्रैल से स्कूल की संस्कृत शिक्षिका श्रीमति आशा रानी पाठ्यक्रम से संस्कृत हटाने के विरोध में अनशन पर बैठी हैं। दरअसल स्कूल ने कक्षा पांच से कक्षा नौ तक संस्कृत का सूपड़ा साफ करके जर्मन और फ्रेंच भाषा को लगाने का फैसला किया है। इस फैसले से न केवल संस्कृत टीचर नाराज हैं बल्कि स्कूल के स्टूडेंट्स और पैरेंट्स भी परेशान हैं। आशा रानी की मांग है कि कम से कम बच्चों को विषय चुनने का मौका तो दिया जाना चाहिए। लेकिन स्कूल प्रबंधन एक सुनने को तैयार नहीं है। पिछले चार दिन से आशा रानी आमरण अनशन पर बैठी हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;जड़ में भ्रष्टाचार&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;दरअसल स्कूल की इस मनमानी की जड़ में भी भ्रष्टाचार ही है। स्कूल प्रबंधन अपने स्टाफ को कम सैलरी देकर कागजों में ज्यादा पर दस्तखत करवाता है। इस भ्रष्ट चलन का आशा रानी कई बार विरोध कर चुकी थीं। यहां तक कि स्कूल प्रबंधन की उनके साथ खासी तनातनी भी हो चुकी थी। अब स्कूल प्रबंधन आशा रानी से निजात पाना चाहता है। इसके लिए प्रबंधन ने फैसला किया कि स्कूल से संस्कृत विषय ही हटा दिया जाए। न रहेगी संस्कृत और न रहेगी उसको पढ़ाने वाली आशा रानी। लेकिन भारतीय संस्कृति की पहचान संस्कृत भाषा को हटाने का निर्णय न तो बच्चों को रास आ रहा है और न अभिभावकों को। इसलिए इसके विरोध में आशा रानी स्कूल के गेट पर अनशन पर बैठ गई हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;कोई सुनवाई नहीं&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;आशा रानी के इस अभियान से स्कूल प्रबंधन पर कोई खास असर पड़ता नहीं दिख रहा है। दरअसल मीडिया ने भी इस मामले अभी उस तरह नहीं दिखाया है, बल्कि ये कहें कि मीडिया में अभी ये मामला आया ही नहीं है। आशा रानी ने बस अपने दम पर बिना किसी सोची-समझी रणनीति के अभियान छेड़ दिया है। लेकिन रोहिणी सेक्टर 15 के निवासियों के बीच आशा रानी की ये मांग और विरोध प्रदर्शन लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। वैसे इससे ज्यादा दुर्भाग्य की बात कोई क्या होगी कि अपनी सांस्कृतिक धरोहर और देव वाणी संस्कृत को जर्मन और फ्रेंच की भेंट चढ़ाया जा रहा है। उम्मीद है कि आशा रानी का ये अनशन जरूर रंग लाएगा। &lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;अधिक जानकारी के लिए संपर्क सूत्र&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;आशा रानीः 8826050123&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;सेंट एंजल्स स्कूलः 27291521, 27294021, 27298621&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-4555505390062697897?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/4555505390062697897/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/04/blog-post_10.html#comment-form' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/4555505390062697897'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/4555505390062697897'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/04/blog-post_10.html' title='संस्कृत भाषा को बचाने के लिए पिछले चार दिन से अनशन पर बैठी एक संस्कृत टीचर'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-EnryMuJ62-Y/TaGOii6sbgI/AAAAAAAAAVM/8KauFZoG6Nk/s72-c/DSC00624.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-3409541179050290410</id><published>2011-04-04T17:56:00.000+05:30</published><updated>2011-04-04T17:56:20.694+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाज़ार'/><title type='text'>दुकानदारी के नुस्खे!!!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-n41-8sc4BRo/TZm4BWPuO2I/AAAAAAAAAVI/XgxnriGX2as/s1600/shop.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="266" r6="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-n41-8sc4BRo/TZm4BWPuO2I/AAAAAAAAAVI/XgxnriGX2as/s400/shop.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली से लेकर देहरादून तक और बीकानेर से लेकर बाराबंकी तक दुकानदारों के पास अपना सामान बेचने और दुकानदारी का तकरीबन एक सा ही पैटर्न है। अपना सामान बेचने के लिए न जाने उनको क्या-क्या तरीके आते हैं। ये तरीके उन्होंने किसी स्कूल या एमबीए की क्लास में नहीं सीखे। बस पापी पेट की जरूरतों ने उनको सबकुछ सिखा दिया। पहले वे धर्म का आचरण करते हुए दुकानदारी करते थे। फिर देखा कि बहुत ज्यादा धर्म का आचरण करने से मुनाफा नहीं हो रहा तो उन्होंने थोड़ा साम, दाम, दंड और भेद की नीति अपनाई। फिर देखा कि दूसरे की दुकानदारी कुछ ज्यादा ही चल रही है तो मिलावट यानि झूठ का सहारा लिया। मिलावट ये कहकर शुरू की कि आटे में नमक के बराबर मिलावट करनी ही पड़ेगी, तभी व्यवहार चलेगा। देश&amp;nbsp;की&amp;nbsp;एक&amp;nbsp;प्रसिद्ध धार्मिक नगरी का सच्चा प्रसंग है, वहां का नाम जानबूझकर नहीं लिखना चाहता। वहीं के एक बड़े संत ने मुझे बताया था। उस नगरी में आने वाले तीर्थ यात्री वहां से तुलसी की माला बहुत खरीदते हैं। लेकिन उस पूरी नगरी में तुलसी के नाम पर सब नकली मालाएं मिलती हैं। लेकिन उस माला का सबसे ऊपर वाला मनका असली तुलसी का होता है।&amp;nbsp;महाराज जी ने बताया कि नगरी के दुकानदार तुलसी के उस एक मनके को पकड़कर नगरी के ईष्ट देव की कसम खाते हैं और ग्राहक को विश्वास दिलाते हैं कि माला तुलसी की ही है। इसे कहते हैं स्मार्ट मार्केटिंग। ऐसा ही हाल अमूमन पूरे देश का है। शुद्धता केवल लिखने और दिखाने के लिए है। नकली और दोयम दर्जे के माल को भी दुकानदार खूबसूरती के साथ बेच रहे हैं। मिट्टी से लेकर सोने तक सबमें मिलावट है। अब तो लगता है जहर में भी मिलावट आ रही है। पिछले दिनों मेरठ के एक गांव में जाना हुआ तो वहां के लोग आपस में बात कर रहे थे कि फलां की बहू ने सेलफाॅस की पूरी शीशी गटक ली, अस्पताल ले गए और वो बच गई। गांव के लोग तो इसे डाॅक्टरों की कुशलता बता रहे थे, लेकिन मुझे लगता है कि जहर में ही मिलावट होगी। अब तो न जीना आसान रह गया है और न मरना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिलावटी सामान को मिलावटी बातों के साथ दुकानदार किस तरह बेचते हैं, इसका नमूना हम रोजमर्रा की जिंदगी में देखते ही हैं। दुकानदारों के कई फेवरेट डायलाॅग हैं जो वे हर ग्राहक के सामने मारते मसलन- &lt;strong&gt;‘‘ये तो आपके लिए ही इतने कम रेट लगा दिए हैं वरना तो ये महंगा आइटम है’’&lt;/strong&gt;, क्यों जी हम आपके दामाद लगते हैं क्या?, &lt;strong&gt;‘‘अरे भाई साहब इतना मार्जिन कहां है जितना आप सोच रहे हो, बस एक आध रुपया कमाना है’’&lt;/strong&gt; क्यों यहां बैठकर आप तीर्थाटन कर रहे हो क्या?, &lt;strong&gt;‘‘अरे साहब इसमें कोई प्राॅफिट नहीं है, जितने का आया है उतने का ही दे रहे हैं’’&lt;/strong&gt; क्यों आपने बाबा जी का लंगर खोल रखा है क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;इस तरह के जुमले दुकानदार अपने यहां आने वाले हर ग्राहक पर इस्तेमाल करते हैं। मार्केटिंग वालों के बीच तो ये कहावत भी है कि आपका हुनर तब है जब आप गंजे को कंघा बेच दो। लेकिन अगर इतनी बातें न बनाकर सीधे-सीधे ईमानदारी से अपना माल बेचें तो कहीं ज्यादा ठीक है। इस तरह की करतूतों से तो लोगों का आपसी विश्वास की कम होता है। ईमादारी की दुकानदारी को जमने में थोड़ा वक्त जरूर लगेगा लेकिन अगर एक बार जम गई तो लंबी चलेगी। इस बात को वे लोग अच्छी तरह जानते हैं जो खानदानी बिजनेसमैन हैं। जो नौसिखिए हैं वो जल्दी से जल्दी दो और दो पांच करने में लगे रहते हैं। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-3409541179050290410?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/3409541179050290410/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/04/blog-post_04.html#comment-form' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/3409541179050290410'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/3409541179050290410'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/04/blog-post_04.html' title='दुकानदारी के नुस्खे!!!'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-n41-8sc4BRo/TZm4BWPuO2I/AAAAAAAAAVI/XgxnriGX2as/s72-c/shop.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-5348350246381311009</id><published>2011-04-03T12:57:00.000+05:30</published><updated>2011-04-03T12:57:16.216+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खेल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सफलता'/><title type='text'>कमऑन इंडिया! यूँ ही जारी रखो बड़े सपने देखने का सिलसिला</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-CiZmrSX92eY/TZggwCo2y5I/AAAAAAAAAVE/W7rWmS12JNs/s1600/world+cup.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="241" r6="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-CiZmrSX92eY/TZggwCo2y5I/AAAAAAAAAVE/W7rWmS12JNs/s320/world+cup.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;‘‘ये हौसले की कमी ही तो थी जो हमको ले डूबी, वरना भंवर से किनारे का फासला ही क्या था...’’ &lt;/strong&gt;विश्व कप के फाइनल मैच में भारतीय क्रिकेट टीम ने ये बात सिद्ध कर दी कि अगर हौसले बुलंद हों तो नामुमकिन को भी मुमकिन किया जा सकता है। 1983 में विश्वकप जीतने के बाद से भारत लगातार वो इतिहास दोहराने की कोशिश कर रहा था, लेकिन लगातार उसको असफलता ही मिल रही थी। लेकिन उन असफलताओं का न तो हमारी टीम पर और न हमारे देश के लोगों पर कोई असर पड़ा। हर हार के बाद हम झल्लाते थे, गाली बकते थे, अपनी टीम को कोसते थे और फिर नाॅर्मल हो जाते थे। हमने कभी अपने जोश को कम नहीं होने दिया। वल्र्ड कप न जीत पाने के बावजूद देश में क्रिकेट के प्रति दीवानगी लगातार बढ़ती रही। और इस हद तक बढ़ी कि क्रिकेट एक अलग धर्म बन गया। हर विश्वकप में हम अपनी टीम का जोश बढ़ाते थे, उम्मीदें जगाते थे कि इस बार सपना साकार कर दो और देश को विश्वकप दिला दो। ये उम्मीदें भी लोगों में यूं ही नहीं जगी थीं। 1983 के वल्र्ड कप में उस अप्रत्याश्ति जीत के बाद लोगों में ये विश्वास आ गया था कि हम में पूरे विश्व से लोहा लेने का दम है। बस हमें अपने हौसले बुलंद रखने की जरूरत है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और हमारे बुलंद हौसले आखिरकार कल रंग लाए जब 2 अप्रैल 2011 को भारत ने फिर से 1983 का इतिहास दोहरा दिया। 121 करोड़ भारतीयों का सपना आखिरकार साकार हो गया। इस सपने को साकार करने में भले ही हमें 28 सालों का संबा समय लगा, लेकिन हमारे धैर्य, हमारे जज्बे और हमारे हौसले की दादा देनी ही पड़ेगी। मेरे एक मित्र के मित्र ने उनको फोन किया और कहा कि अगर आज भारत नहीं जीतती तो मैं ये मान लेता कि मेरे जीते जी इस देश में विश्व कप नहीं आएगा। उनके इस वाक्य में आशा और निराशा एक साथ झलक रही थी। ऐसी ही आशा और निराशा प्रत्येक भारतीय मन में उठ रही थी। कल अगर विश्वकप भारत के पास नहीं आता तो लोगों को बहुत बड़ी निराशा हाथ लगती, हम फिर अपनी टीम को कोसते, लेकिन फिर से 2015 के लिए उम्मीदों बांध लेते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस जीत पर सचिन तेंदुलकर से ज्यादा खुशी शायद की किसी को हो रही हो। जिंदगी के 37वें पायदान पर खड़े सचिन का ये सातवां वल्र्ड कप था। सचिन का 2015 वाला विश्वकप खेलना मुश्किल माना जा रहा है। इस लिहाज से ये विश्वकप जीतना बेहद जरूरी था। इस जीत से सबसे बड़ा सबक यही मिलता है कि हमें कभी मन से हार नहीं माननी चाहिए। अपनी इच्छाओं और सपनों को कभी मरने नहीं देना चाहिए। किसी शायर ने कहा है न कि बहुत खतरनाक होता है सपनों का मर जाना... । सपने अगर जीवित हैं तो वे एक न एक दिन सच होकर ही रहेंगे। ये बात कल के फाइनल मैच में सिद्ध हो गई। इसलिए सपनों को नहीं मरने देना है। हारों से निराश नहीं होना है। जय हिंद!!!!&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-5348350246381311009?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/5348350246381311009/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/04/blog-post_03.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/5348350246381311009'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/5348350246381311009'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/04/blog-post_03.html' title='कमऑन इंडिया! यूँ ही जारी रखो बड़े सपने देखने का सिलसिला'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-CiZmrSX92eY/TZggwCo2y5I/AAAAAAAAAVE/W7rWmS12JNs/s72-c/world+cup.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-5241200736797797018</id><published>2011-04-02T09:53:00.001+05:30</published><updated>2011-04-02T09:54:52.997+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाज़ार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जिन्दगी'/><title type='text'>खर्च करने का स्टाइल अपना-अपना !</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-Nk8r2kZr9kM/TZW2rNUg7TI/AAAAAAAAAU8/K4UAbKVLHuw/s1600/eat+drink.jpg" imageanchor="1" style="cssfloat: left; margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="300" r6="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-Nk8r2kZr9kM/TZW2rNUg7TI/AAAAAAAAAU8/K4UAbKVLHuw/s400/eat+drink.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;भारतीय लोगों में आर्थिक व्यवहार दो दर्शन शास्त्रों पर आधारित है। पहला ये कि &lt;strong&gt;‘‘जब तक जियो मौज से जियो, चाहे कर्जा लेकर घी पियो’’&lt;/strong&gt; और दूसरा ये कि &lt;strong&gt;‘‘तेते पांव पसारिए जेती लंबी सैर’’&lt;/strong&gt;। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;पहला दर्शन ईडीएम (ईट ड्रिंक एंड बी मेरी) सोसायटी पर फिट बैठता है। ईडीएम सोसायटी पांच दिन कमाती है और छठे-सातवें दिन पूरी कमाई को उड़ा देने में विश्वास रखती है। उनकी शान और रहन-सहन में कभी कोई बदलाव नहीं आता। वो कच्छा जाॅकी का ही पहनेंगे, चाहे लोन लेना पड़े। उनकी सलामी तोप से ही होनी चाहिए, छोटी-मोटी बंदूकें उनको रास नहीं आतीं। उनके मन में बड़ा बनने से ज्यादा बड़ा दिखने की चाह होती है। वे मानते हैं कि आप भले ही बड़े आदमी न हो, लेकिन हमेशा बड़े दिखो। वे मानते हैं कि ‘बंद मुट्ठी लाख की खुल गई तो खाक की’। और इस सबको मेनटेन करने के लिए उनके पास होता है केवल एक हथियार- ‘इसकी टोपी उसके सिर और उसकी टोपी इसके सिर’। आम आदमी भले ही इस हथियार का इस्तेमाल करना न जानता हो, लेकिन ईडीएम सोसायटी इस हथियार का सबसे खूबसूरती के साथ इस्तेमाल करती है। बड़े कर्ज के मामले में तो ये लोग तमाम बैंकों के कर्ज में डूबे ही होते हैं, लेकिन छोटे-मोटे कर्जे के लिए ये लोग अपने आसपास के लोगों पर निर्भर रहते हैं। अपने परिचितों से इस अंदाज में कर्जा मांगते हैं कि सामने वाले से न कहते बनता ही नहीं है। हाई प्रोफाइल लाइफ स्टाइल प्रदर्शित करने की इतनी मजबूरी होती है कि उसके लिए वे कर्ज की हर सीमा लांघ जाते हैं। आज के दौर में हाई प्रोफाइल दिखने के कुछ चिन्ह इस प्रकार हैं- एक गाड़ीः भले ही उसमें तेल डलवाने के पैसे जेब में न हों, एक महंगा मोबाइलः भले ही सेकेंड हैंड खरीदा हो, महंगी घड़ीः इम्पोर्टेड हो तो और बढि़या, एक लैपटाॅप (अब आईपैड)ः भले ही उसकी जरूरत न हो, बदन पर ब्रांडेड और डिजाइनर कपड़े, एक जोड़ी कपडे़ एक ही दिन पहने जाएं, सप्ताह के सात दिनों के लिए सात जोड़ी जूते आदि आदि हाई प्रोफाइल दिखने की बहुत ही बेसिक रिक्वायरमेंट हैं। कम से कम इतना तो होना जरूरी है। ईडीएम सोसायटी मानती है कि मौज-मस्ती में कोई कमी नहीं आनी चाहिए, चाहे कितना भी कर्ज क्यों न लेना पड़े। फिर जब आप के पास पैसा आ जाए तब भी सबसे पहले उसे मौज मस्ती पर खर्च करना है उसके बाद कर्जा उतारने की सोचनी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;अर्थ व्यवहार का दूसरा दर्शन है ठेठ भारतीयों का, जो मौज-मस्ती के लिए कर्जा लेना बहुत बुरा समझते हैं। उनका मानना है कि उतने पांव फैलाए जाएं जितनी लंबी चादर है। जीवन का क्या है इसको कितना भी भोगों से भर लो, इसकी इच्छाएं पूरी नहीं हो सकतीं। फिर अगर कर्जा लेना भी हो तो बहुत ही आपातकाल में लिया जाए जैसे किसी हारी-बीमारी में, बेटी की शादी में या फिर मकान को पूरा करने में। फिर उस कर्जे को हल्के में न लिया जाए। जैसे ही पैसा आए तो सबसे पहले उससे कर्जा उतारा जाए, बाकी सब काम बाद में। घर की आवश्यक जरूरतों को भी रोककर पहले कर्जा उतारने पर ध्यान दिया। अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखा जाए और बचत हर हाल में की जाए। कर्जा लेकर कोई शौक पूरा करने से बेहतर बचत करके पैसा इकट्ठा करके उस शौक को पूरा करें। ऐसी सोसायटी को ‘डाउन टू अर्थ सोसायटी’ (मिट्टी से जुड़े लोग) कहकर पुकारा जाता है। गांधी जी और डाॅ. कलाम को भी इसी श्रेणी में रखा जाता है। ये लोग वे होते हैं जो अपने बच्चों को भी कम खर्च करने की सलाह देते हैं। अपनी जरूरतें न्यूनतम रखते हैं। फिजूलखर्ची उनके पास से होकर नहीं फटकती। ये लोग मानते हैं कि रईस बनो तो ठोस रईस बनो, खोखले रईस बनने से कोई फायदा नहीं। ठोस रईसों को ही खानदानी रईस कहा जाता है। अधजल गगरी छलकत जाए वाला हिसाब नहीं होना चाहिए। ऐसे ही लोगों में एक सब कैटेगरी होती है दानियों, जो अपने बचे हुए धन को अपने ऊपर खर्च न करके दान करना बेहतर समझते हैं। अपनी इच्छाओं की पूर्ति के बाद वे अपने धन को परोपकार में लगाना बेहतर समझते हैं। इन्हीं लोगों में एक और सब कैटेगरी होती है कंजूसों की, जो पैसे को इस तरह जोड़ते हैं कि उनकी बीवी, बच्चे सभी दुःखी रहते हैं। बच्चे छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी तरसते रह जाते हैं। लेकिन इस कैटेगरी का जो मध्यम मार्ग है वह काफी हद तक श्रेष्ठ बताया जाता है यानि- ईमानदारी व मेहनत से कमाओ और उदारता के साथ खर्च करो।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-6FTH6rW9_7o/TZW2r8MuFYI/AAAAAAAAAVA/noeHkGpdFKE/s1600/eat+drink1.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" r6="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-6FTH6rW9_7o/TZW2r8MuFYI/AAAAAAAAAVA/noeHkGpdFKE/s320/eat+drink1.jpg" width="213" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;मजेदार बात ये है कि दोनों ही कैटेगरी के लोग एक-दूसरे को गलत बताते हैं। मौज-मस्ती वाली सोसायटी मानती है कि वो भी कोई जिंदगी है जिसमें कोई रंग न हो, मस्ती न हो! हाऊ बोरिंग। दूसरी सोसायटी के लोग मानते हैं कि मौज-मस्ती के दिन ज्यादा दिन नहीं चलते, आखिरकार जिंदगी ऐसी जगह लाकर खड़ा कर देती है कि कोई पूछने वाला भी नहीं होता। इन दोनों ही क्लास के लोगों में इतना बैर है कि जब बेटे-बेटियों के रिश्ते की बात आती है तब भी अपने से मिलते हुए अर्थ व्यवहार वालों के यहां रिश्ता जोड़ते हैं। ईडीएम सोसायटी नहीं चाहती कि उसका दामाद या बहू बोरिंग और पुराने ख्यालों की हो। और दूसरे किस्म के लोग भी नहीं चाहते कि उनका दामाद या बहू को मौज-मस्ती पसंद हो।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;भारत में पूरा का पूरा मिडिल और हायर क्लास इन्हीं दो खर्च व्यवहार के आधार पर बंटा हुआ है। वैसे तो भारतीय अर्थ व्यवहार में फिजूलखर्ची, बचत न करना और कर्जा लेना हमेशा ही गलत माना जाता रहा है। लेकिन नई अर्थव्यवस्था लोगों को अधिक से अधिक खर्च करने को प्रेरित करती है। लोगों की जेब में खर्च करने के दो हथियार ठूंस दिए गए हैं। पहला डेबिट कार्डः इससे अपना पैसा खर्च करो और दूसरा क्रेडिट कार्डः जब अपना खत्म हो जाए तो कर्ज लेकर खर्च करो। जैसे प्रभाष जोशी ने वनडे क्रिकेट को फआफट क्रिकेट कहा उसी तरह क्रेडिट कार्ड भी फटाफट लोन की व्यवस्था है। कुछ दिनों पहले एक कवि सम्मेलन में गया तो देश के वर्तमान महाकवि अशोक चक्रधर काव्यपाठ कर रहे थे। उन्होंने भी अपनी कविता में लोन का संधि विच्छेदन करके बताया कि लोन अपने आप में ही कह रहा है कि ‘लो-न’।&amp;nbsp; &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-5241200736797797018?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/5241200736797797018/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/04/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/5241200736797797018'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/5241200736797797018'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='खर्च करने का स्टाइल अपना-अपना !'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-Nk8r2kZr9kM/TZW2rNUg7TI/AAAAAAAAAU8/K4UAbKVLHuw/s72-c/eat+drink.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-8707555428169236504</id><published>2011-04-01T11:21:00.000+05:30</published><updated>2011-04-01T11:21:56.864+05:30</updated><title type='text'>100वां शतक किसी दूसरे वनडे में पूरा कर लेना, अभी वर्ल्ड कप लाओ!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-PQGnFdd4soQ/TZVn3rbuscI/AAAAAAAAAU4/PHLY2UOSFRM/s1600/World-cup-2011.png" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" r6="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-PQGnFdd4soQ/TZVn3rbuscI/AAAAAAAAAU4/PHLY2UOSFRM/s320/World-cup-2011.png" width="180" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;भारत-पाक के बीच मैच शुरू होने से पहले बातचीज चल रही थी। बात शुरू हुई तो इस बात पर जाकर खत्म हुई कि अगर आज सचिन ने शतक लगाया तो भारत हारेगा और अगर नहीं लगाया तो भारत जीतेगा। जब किसी ने अंधविश्वास बताया तो कहा गया कि टोने-टोटके कहीं चलते हों या न चलते हों, लेकिन क्रिकेट में चलते हैं। बात को पुष्ट करने के लिए सचिन के इतिहास को उजागर करते दो-तीन उदाहरण भी दे दिए गए। फिर मैच शुरू हुआ। सचिन 85 रन बनाकर आउट और भारत का स्कोर भी कुछ ज्यादा नहीं था। लेकिन सब को उम्मीद थी कि बाॅलिंग और फील्डिंग की बदौलत मैच जीत लिया जाएगा। आखिरकार मैच जीत लिया गया और टोने-टोटके मानने वालों की बात सच साबित हुई। लेकिन सचिन के फैन्स को उसका 100वां शतक पूरा न होने का मलाल रह गया। हालांकि भारत की शानदार जीत के सामने ये मलाल काफी नीचे दब गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब फाइनल की बारी है। सामने लंका खड़ी है। लंका को फतेह करना टेढ़ी खीर होगी। लेकिन अब सचिन के फैन्स भी मानने लगे हैं कि 100वां शतक किसी और वनडे में पूरा हो जाएगा। अभी देश को वर्ल्ड कप दिलाना जरूरी है। जो कुछ ज्यादा आशावादी हैं वे दुआ कर रहे हैं कि 100वां शतक भी पूरा हो जाए और वर्ल्ड कप भी भारत में आ जाए। क्योंकि सबको पूरी उम्मीद है कि ये सचिन का आखिरी वर्ल्ड कप होगा। 37 साल के पायदान पर खड़े सचिन अगले वर्ल्ड कप से पहले ही संन्यास ले लेंगे। उनके फैन्स तो यही चाहते हैं कि लंका के खिलाफ सचिन 100वां शतक भी लगाएं और हम वर्ल्ड कप भी जीत जाएं। लेकिन टोने-टोटकों की बात मानें तो सचिन का शतक भारत के फेवर में नहीं जा पाता। उस दिन भारत हार जाता है। ऐसे में सचिन के कुछ फैन्स दिल पर पत्थर रखकर ये दुआ कर रहे हैं कि भले ही सचिन 90 और 100 के बीच आउट हो जाएं पर भारत वल्र्ड कप जीत जाए। सचिन जैसे महान बल्लेबाज के रहते भारत में वल्र्ड कप आना जरूरी है। वरना आने वाली पीढ़ी यही कहेंगी कि भारत में वो कैसा क्रिकेट का भगवान था जो अपने रहते वर्ल्ड कप भी न दिला पाया। इसलिए 100वां शतक आगे किसी वनडे में पूरा कर लिया जाएगा। अभी जरूरी है वल्र्ड कप। लेकिन अगर दोनों हाथों में लड्डू मिल जाएं तो कहने ही क्या। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-8707555428169236504?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/8707555428169236504/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/04/100.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/8707555428169236504'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/8707555428169236504'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/04/100.html' title='100वां शतक किसी दूसरे वनडे में पूरा कर लेना, अभी वर्ल्ड कप लाओ!'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-PQGnFdd4soQ/TZVn3rbuscI/AAAAAAAAAU4/PHLY2UOSFRM/s72-c/World-cup-2011.png' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-5179196944386076421</id><published>2011-03-31T13:19:00.001+05:30</published><updated>2011-03-31T13:19:05.585+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सफलता'/><title type='text'>टार्गेट अचीव करना है तो हनुमान से सीखो!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-AVtCuXoSuKU/TZQxWX69c2I/AAAAAAAAAU0/48KOa-1UTS0/s1600/hanuman.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="273" src="http://1.bp.blogspot.com/-AVtCuXoSuKU/TZQxWX69c2I/AAAAAAAAAU0/48KOa-1UTS0/s320/hanuman.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;सीता जी की खोज में जब समुद्र लांघकर लंका जाने की बात आई तो पूरी वानर सेना असमर्थ नजर आ रही थी. उस समय जामवंत ने हनुमान को उनकी शक्ति का स्मरण कराया। तब हनुमान ये कठिन काम अपने कंधों पर लिया और बखूबी कर के दिखाया। इस ओर से समुद्र लांघकर सीता जी के दर्शन तक के सफर में हनुमान के साथ कई घटनाएं घटीं। सबसे पहले मैनाक पर्वत ने उनसे थोड़ा आराम करने को कहा, फिर परीक्षा लेने के लिए सुरसा आई, फिर समुद्र में रहने वाली सिंघिका राक्षसी का वध करना पड़ा, फिर लंका के द्वार पर लंकिनी ने रोका, उसके बाद विभीषण से मुलाकात हुई, तब विभीषण के बताए मार्ग पर चलकर उनको सीता जी के दर्शन हुए।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इस पूरे घटनाक्रम से आज के जीवन में कई चीजें सीखने वाली हैं। जब हम कोई काम अपने हाथ में लेते हैं तो जैसा हनुमान के साथ हुआ वैसा ही हम सबके साथ भी होता है और हम मंजिल तक पहुंचने से पहले ही हिम्मत हार जाते हैं। किसी भी काम को हाथ में लेते वक्त ये बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि रास्ते में व्यवधान आएंगे ही आएंगे। हमें उन व्यवधानों का सामना अपनी बुद्धि और अपने विवेक से करना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे पहला व्यवधान है मैनाक पर्वत- यानि हमारा आलस्य। हर कंपनी में दो तरह के कर्मचारी होते हैं। एक वे जो काम को हाथ में लेने के बाद तब तक शांत नहीं बैठते जब तक कि वो पूरा न हो जाए। दूसरे वे जो काम पूरा करने के लिए डेडलाइन का इंतजार करते हैं। पहले किस्म के कर्मचारी अपना काम ज्यादा व्यवस्थित ढंग से पूरा करते हैं जबकि दूसरे किस्म के लोग हबड़धबड़ में काम को पूरा करते हैं। तो हनुमान बता रहे हैं कि काम के प्रति ऐसी लगन होनी चाहिए कि आपको भूख, प्यास और थकान जैसी चीजों का एहसास ही न हो। हनुमान जी ने कब खाने की मांग की जब उन्होंने सीता की दर्शन कर लिए। खुद सीता जी से ही कहा कि माता मुझे अब भूख लग रही है। उसी तरह कुशल टीम लीडर्स अपना काम और अपना टार्गेट पूरा करने के बाद पूरी टीम के साथ सेलिब्रेट करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर हनुमान के सामने दूसरा व्यवधान आया- सुरसा। उसने हनुमान से उसकी भूख मिटाने को कहा। तब हनुमान ने अपनी चतुराई से सुरसा को जीता। इसी तरह जब आप किसी बडे़ प्रोजेक्ट को हाथ में लेते हो तो कई तरह की सुरसाएं आपसे अपनी रिक्वायरमेंट पूरी करने की डिमांड करती हैं। कहीं आपको लालफीताशाही रोकती है तो कहीं फैमिली की समस्याएं। ऐसे में आपको अपने विवेक का इस्तेमाल करना और कम समय वेस्ट करते हुए उनकी रिक्वायरमेंट को पूरा करना है। विनम्र आचरण बनाए रखते हुए अपना ध्यान अपने मेन टार्गेट पर लगाए रखना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद हनुमान जी के सामने सिंघिका आई। ंिसंघिका आकाश में उड़ने वाले जीवों की परछाईं को पकड़कर उनको खा लेती थी। वही काम उसने हनुमान के साथ भी किया। इस बार हनुमान ने बिना कोई समय बर्बाद किए उसका वध करना उचित समझा। ये जो सिंघिका है ये आपके आसपास बिखरे अनवांटेड ऐलीमेंट्स हैं। जो आपकी टांग खींचते रहते हैं या आॅफिस में पाॅलिटिक्स करते रहते हैं। तो ऐसे लोगों की तरफ बिल्कुल ध्यान न देते हुए उनकी बात न सुनते हुए उनको पूरी तरह इग्नोर करना है। अगर आप उनके साथ उलझेंगे तो आपका अपना नुकसान होगा, जो वे चाहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर हनुमान का सामना लंकिनी से हुआ। पहले तो हनुमान ने उससे बचकर निकलने की कोशिश की। लेकिन उसने उन्हें नहीं जाने दिया। तब हनुमान ने एक घूंसा मारकर उसको अपनी शक्ति का एहसास करा दिया। एक घूंसा पड़ते ही उसने आत्मसमर्पण कर दिया और हनुमान को आगे जाने दिया। ऐसे ही जब आप अपने टार्गेट के बहुत पास पहुंचने वाले होते हो तो कुछ बाधाएं खड़ी हो जाती हैं। ऐसा लगता है मानो अब ये काम पूरा नहीं हो पाएगा। लेकिन इन परिस्थितियों में आपको अपनी जिद पर अड़ जाना है और अपनी आत्मशक्ति को जगाकर खुद में पाॅजिटिव एनर्जी जनरेट करनी है। आपके अंदर की जो पाॅजिटिव एप्रोच है वो बहुत जरूरी है किसी टार्गेट को अचीव करने के लिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब हनुमान लंका के अंदर गए तो सीता को खोज नहीं पाए। तब उनको विभीषण का घर दिखा। उसके आसपास के वातावरण से उन्होंने अंदाजा लगाया कि ये व्यक्ति सज्जन है। इससे मित्रता करनी चाहिए। ये जरूर मेरी मदद करेगा। फिर वही हुआ जैसा हनुमान ने सोचा था। विभीषण ने उनको सीता का सही पता बताया। बदले में हनुमान ने उन्हें राम जी से मिलवाने का आश्वासन दिया। इसी तरह जब हम किसी बड़े काम को हाथ में लेकर आगे बढ़ते हैं, तो हमारे आसपास कई अच्छे और अनुभवी लोग भी होते हैं। लेकिन हम अपनी ईगो के चलते उनकी मदद लेना उचित नहीं समझते। हमें ऐसे लोगों को पहचानकर उनकी मदद लेनी चाहिए। इससे हमारी मंजिल हमको जल्दी मिल सकती है। वरना काफी समय बर्बाद होगा। लेकिन ये रिश्ता एकदम क्षणिक और स्वार्थ आधारित नहीं होना चाहिए। हमें ऐसे लोगों से लांग टर्म रिलेशन बनाने चाहिए। उनको भी कभी मदद की जरूरत पड़े तो हमें भी उनकी मदद करनी चाहिए। जैसे बाद में हनुमान ने विभीषण को राम से मिलवाने में मदद की। &amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-5179196944386076421?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/5179196944386076421/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/03/blog-post_31.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/5179196944386076421'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/5179196944386076421'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/03/blog-post_31.html' title='टार्गेट अचीव करना है तो हनुमान से सीखो!'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-AVtCuXoSuKU/TZQxWX69c2I/AAAAAAAAAU0/48KOa-1UTS0/s72-c/hanuman.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-8698633881772671616</id><published>2011-03-29T17:32:00.001+05:30</published><updated>2011-03-29T18:05:01.267+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाज़ार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='System'/><title type='text'>चुनाव का फंदा और उद्योपतियों का चंदा!!!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-UB8ymhDh0x4/TZHJpV4_ryI/AAAAAAAAAUo/2MeLFJlIlm0/s1600/flag.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="170" r6="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-UB8ymhDh0x4/TZHJpV4_ryI/AAAAAAAAAUo/2MeLFJlIlm0/s400/flag.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: left;"&gt;अंग्रेजी में एक कहावत है ‘‘नो लंचेज आर फ्री!’’ यानि कोई भी भोज मुफ्त नहीं होता। उसके पीछे कोई न कोई स्वार्थ जरूर जुड़ा होता है। भारतीय राजनीति को ये बात अच्छी तरह पता होने के बावजूद हमारी राजनीति फ्री के भोज खाने में मगन है। जी मेरा इशारा पाॅलिटिकल फंडिंग की तरफ है। भारत की पाॅलिटिकल पार्टियां अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए इस कदर उद्योगपतियों पर निर्भर हो गई हैं कि सत्ता हासिल करने के लिए वे उद्योगपतियों के हाथ की कठपुतली बन जाती हैं। उद्योगपति किस कदर शासन व्यवस्था में अपना हस्तक्षेप करते हैं इसका नमूना अभी हाल ही में राजा-राडिया-बरखा-टाटा प्रकरण में देश के सामने आ ही चुका है। मंत्रीमंडल के चयन में भी उद्योगपति दखल देते हैं, जोकि केवल प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है। इसका एकमात्र कारण पाॅलिटिकल फंडिंग ही है। जो पैसा उद्योगपति चंदे के तौर पर जिन पार्टियों को देते हैं, सत्ता हासिल करने के बाद उनसे पाई-पाई वसूलने की कोशिश करते हैं। कोई भी चंदा निःस्वार्थ भाव से या राष्ट्र निर्माण की भावना से नहीं दिया जाता। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद आपने सुना होगा काका जोगिंदर सिंह उर्फ धरतीपकड़ के बारे में। उन्होंने देश हर एक चुनाव लड़ा था। पार्षदी से लेकर राष्ट्रपति तक, लेकिन कभी नहीं जीते। वो किसी पार्टी से नहीं जुड़े थे, बस निर्दलीय खड़े हो जाते थे। चुनाव लड़ना उनकी हाॅबी थी। उस समय चुनाव लड़ने की फीस भी बहुत ज्यादा नहीं थी। वे अपना परचा दाखिल करते और अकेले ही निकल पड़ते प्रचार करने पैदल-पैदल। कंधे पर झोला और झोले में कुछ किशमिश और छुआरे। दिनभर लोगों से मिलते और वोट मांगते। बच्चों को किशमिश और छुआरे देते। उनको चुनाव प्रचार का वही अंदाज था और वही खर्च भी। चुनाव में लगाने के लिए काका के पास करोड़ों की रकम नहीं थी। लेकिन क्या यही कारण था कि काका कोई चुनाव नहीं जीत पाए? काका के चुनाव न जीतने के पीछे धन के अलावा और भी कई कारण थे। लेकिन आज चुनाव जीतने और हारने के पीछे सिर्फ एक ही मकसद है और एक ही कारण है और वो है- धन!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-UiGAcO5f7gU/TZHJqin0QjI/AAAAAAAAAUs/qQMYkweos2U/s1600/maya.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" r6="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-UiGAcO5f7gU/TZHJqin0QjI/AAAAAAAAAUs/qQMYkweos2U/s320/maya.jpg" width="224" /&gt;&lt;/a&gt;आज चुनाव जीतने के लिए धन को सबसे बड़ा मापदंड माना जाता है और चुनाव जीतने के बाद उस धन का कई गुना वापिस अर्जित करना उस नेता का जन्म सिद्ध अधिकार होता है। भारतीय राजनीति में यही तमाशा सालों से चला आ रहा है। चुनाव जीतने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया जाता है। कोई मंगलसूत्र बांट रहा है तो कोई टीवी दे रहा है। कोई अखबार वालों को पैसा बांटकर पेड न्यूज छपवाता है तो कोई पीआर फर्म की मदद से जीत सुनिश्चित करता है। और इतना मोटा खर्च करने के लिए रकम ली जाती है चंदे में, यानि देश के उद्योगपतियों से। उद्योगपति भी सभी पार्टियों को थोड़ा-थोड़ा बांटते हैं। कोई न कोई तो सत्ता में आ ही जाएगी। किसी एक को देकर और किसी दूसरे को न देकर क्यों बैर मोल लिया जाए। पैसा तो है ही, 80 जी में छूट भी मिल जाती है, सो सभी को खुश रखा जाए। धीरुभाई अंबानी कहते थे कि एक उद्योगपति के सभी पार्टियों के साथ अच्छे रिश्ते होने चाहिए। लेकिन उनकी बात उनके बेटे अनिल अंबानी ने नहीं मानी। एक बार वो अमर सिंह की बातों में आकर सपा के समर्थन से राज्यसभा की शोभा बढ़ाने पहंुच गए थे, लेकिन थोड़े समय में ही उनको अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;भारतीय राजनीति में ये जो उद्योगपतियों की दखल है, ये कहीं न कहीं सिस्टम को कमजोर बना रही है। कोई पार्टी इतनी स्वावलंबी नहीं है जो अपने दमखम पर चुनाव लड़ सके। अगर वामपंथी पार्टियों को छोड़ दिया जाए तो हर पार्टी को उद्योगपतियों से ही जीवन जीने के लिए आॅक्सीजन मिल रही है। धनबलियों की धन की बैसाखी को हटा लिया जाए तो कोई पार्टी चुना न लड़ पाए। चुनावी खर्च हर साल सुरसा के मुख की तरह बढ़ रहा है। उत्तर प्रदेश में पिछले दिनों ग्राम पंचायत के चुनाव संपन्न हुए। अभी होली पर गांव गया तो गांव की बहुओं की वोट मांगते पोस्टर और होर्डिंग्स लगे दिखे। जिन बहुओं को आज तक गांव के किसी बुजुर्ग ने नहीं देखा था, वही बहुएं चुनाव प्रचार के नाम दीवारों पर चिपकी थीं। चुनाव में प्रचार के नाम धन की गंगा बहाना किस तरह जरूरी हो गया है, इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं। ग्राम प्रधान से लेकर प्रधानमंत्री तक का सफर आप बिना धन बहाए नहीं तय कर सकते। जब कुछ आदर्शवादी नेता कभी-कभी चंदा न मांगने की जिद पर अड़ जाते हैं, लेकिन उनके चेले उनको बार-बार व्यवहारिक बनने का हवाला देकर स्वयं चंदा वसूल कर लाते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;यूं तो चुनाव आयोग कई दफै चुनावी खर्च कम करने के लिए संसद के पास प्रस्ताव भेज चुका है। लेकिन हर मसले पर अलग राय रखने वाले राजनीतिक दल इस मसले पर एकमत हो जाते हैं और उस प्रस्ताव को देखना तक मुनासिब नहीं समझते। चुनाव लड़ने के नाम पर पार्टियां न केवल मोटा चंदा उगाती हैं बल्कि उनके बड़े नेता उद्योगपतियों के निजी हेलीकाॅप्टरों का भी इस्तेमाल करते हैं। अब सोचिए जब उद्योगपतियों से इतना लोगे तो बदले में कुछ भी न दोगे। ये पूरी सृष्टि ही लेन-देन के सिद्धांत पर टिकी है। सो, नेताओं को सत्ता मिलने के बाद पग-पग पर उद्योगपतियों का फेवर करना पड़ता है। वैसे तो इस देश को कृषि प्रधान देश कहा जाता है, लेकिन जब आम बजट का समय आता है, तब देश के वितमंत्री बड़े-बड़े उद्योगपतियों से रायशुमारी करते हैं। क्या आज तक उन्होंने बजट से पहले किसानों की राय ली? किसानों और आम आदमी की राय भला क्यों लें, वे कौनसे चुनाव लड़ने के लिए चंदा देते हैं। जो देगा सो लेगा।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;अजीब सी बात है कि आजादी के 64 साल बाद भी किसी पार्टी ने इस चंदा सिस्टम का विकल्प नहीं तलाशा। ऐसा विकल्प जिससे उन्हें किसी उद्योगपति के एहसानों के नीचे न दबना पड़े। हमारे गांव में कहावत है कि- जब मिले यूं तो करे क्यूं! जब पार्टियों का खर्चा-पानी चंदे से चल ही रहा है तो ज्यादा दिमाग लगाने के लिए क्या गांधी जी कह गए हैं।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-8698633881772671616?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/8698633881772671616/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/03/blog-post_29.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/8698633881772671616'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/8698633881772671616'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/03/blog-post_29.html' title='चुनाव का फंदा और उद्योपतियों का चंदा!!!'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-UB8ymhDh0x4/TZHJpV4_ryI/AAAAAAAAAUo/2MeLFJlIlm0/s72-c/flag.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-4304066945563475969</id><published>2011-03-27T13:57:00.004+05:30</published><updated>2011-03-27T14:12:42.217+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जिन्दगी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='System'/><title type='text'>देश में बदलाव का बिगुल फूंकेगा अन्ना हजारे का ये सत्याग्रह</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;table align="center" cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="margin-left: auto; margin-right: auto; text-align: center;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-9YwDX_ljMQU/TY74EGYmhII/AAAAAAAAAUg/tq7myCFueR8/s1600/ANNA_HAZARE.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://2.bp.blogspot.com/-9YwDX_ljMQU/TY74EGYmhII/AAAAAAAAAUg/tq7myCFueR8/s320/ANNA_HAZARE.jpg" width="303" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;बन्दे में है दम.. वन्दे मातरम !&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: justify;"&gt;ये संधि काल चल रहा है. यानि परिवर्तन का समय. एक ऐसा समय जब भारत में एक बड़ा और सकारात्मक परिवर्तन होने की उम्मीद है. ये उम्मीद यूँ ही नहीं जगी है. इसके पीछे कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कारण हैं. आगामी वर्ष २०१२ को लेकर तरह-तरह के कयास पहले से ही लगाये जाते रहे हैं. कोई इसको विनाश का वर्ष बताता है तो किसी के लिए ये वर्ष आशाओं वाला है. लेकिन इतना तो तय है कि परिवर्तन अवश्यम्भावी है. स्वामी विवेकानंद ने भी २०१२ को भारत की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बताया था. अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक श्री राम शर्मा आचार्य ने भी अपने साहित्य में जगह जगह इशारा किया है कि २०११-१२ महत्त्वपूर्ण वर्ष होंगे. इस वर्ष उनकी जन्म शताब्दी भी मनाई जा रही है. गायत्री परिवार के समस्त अनुयायियों का दृढ विश्वास है कि गुरु जी का जन्म शताब्दी वर्ष देश और समाज के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है और आशा की किरण जगाने वाला है.&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अगर प्रत्यक्ष तौर पर भी देखा जाए तो हर ओर बदलाव की चाह भी स्पष्ट दिख रही है. वो शहरयार की पंक्तियाँ हैं न "सीने में जलन आँखों में तूफां सा क्यों है , इस शहर में हर शख्स परेशां से क्यों है". आज देश का हर खासो-आम परेशान हो चुका है. ६३ साल की आज़ादी उसको कुछ खास दे नहीं पायी है, अब वो फिर से बदलाव चाहता है. ऐसी राजनीति का विकल्प चाहता है जो इस देश के लिए अंग्रेजों से भी ज्यादा घातक सिद्ध हुयी. बदलाव के लक्षण दिखने शुरू हो गए हैं. राजनितिक पार्टियों के सम्मेलनों में लगातार घटती भीड़ बताती है कि लोगों का विश्वास उठ चुका है. बड़े से बड़े नेता की रैली में संख्या बढ़ाने के लिए अब किराये की भीड़ जुटाई जा रही है. लोग नेताओं को मुंह पर गाली बक रहे हैं और उनका स्वागत जूतों से करने लगे हैं. मीडिया और कोर्ट के सक्रिय हो जाने से अब भ्रष्ट तंत्र में कुछ भी छिपा नहीं रह गया है. भ्रष्टाचारियों को सजा भले ही न मिल पा रही हो लेकिन इस देश की आवाम भली-भांति समझ गयी है कि हमाम में सब नंगे हैं.&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ये एक सकारात्मक बदलाव की चाह ही है कि लोग अब एकत्र हो रहे हैं. तमाम सामाजिक व धार्मिक संगठन एक साथ आने शुरू हो गए हैं. इन धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने अपनी-अपनी सात्विकता और शक्ति के अहम् में सालों तक अपनी एनर्जी एक-दूसरे की निंदा और टांग खिंचाई में लगायी. लेकिन उनको हासिल कुछ नहीं हुआ. अब सबको समझ आ रहा है कि अकेले बात बनने वाली नहीं है. अगर देश के लिए सचमुच कुछ करना है तो एकजुट होना ही पड़ेगा. भारत की दृष्टि से ये एक सकारात्मक बदलाव की किरण है. भ्रष्ट तंत्र इतना शक्तिशाली हो चुका है कि उसका मुकाबला मिलकर ही किया जा सकता है. देश में बदलाव देखने की चाह लोगों में किस तरह विद्यमान है इसका एक उदाहरण मुझे जनवरी में देखने को मिला. हरिद्वार में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय योग कांफ्रेंस में मेरी भारतीय मूल के अमरीकी व्यवसायी ब्रह्म रत्न अग्रवाल जी से एक संक्षिप्त मुलाकात हुयी. भारत में सुधर के लिए जितने में संगठन सच्चे मन से समाज सेवा के कार्य में जुटे हैं ब्रह्म अग्रवाल जी अपनी फ़ौंडेशन की ओर से तरीबन सभी को आर्थिक सहायता देते हैं. पतंजलि में आयोजित उस कांफ्रेंस में भी ब्रह्म जी ने बाबा राम देव द्वारा चलाये जा रहे कार्यों में मदद के लिए एक करोड़ रूपए देने की घोषणा की. भारत से सात समंदर दूर बैठे लोग भी चाहते हैं कि भारत में बदलाव आये. सबके मन में तीव्र उत्कंठा है कि भारत विश्व गुरु बने, उसका परचम विश्व में सबसे ऊंचा लहराए. लेकिन लोगों की उम्म्दें लगातार भ्रष्ट तंत्र की भेंट चढ़ती जा रही हैं. &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ने के लिए अस्तित्व में आया एक और संगठन "इंडिया अगेंस्ट करप्शन" भी पूरी तन्यमयता के साथ सामने आया है. भ्रष्टाचारियों को उनके सही स्थान तक पहुँचाने के लिए इस संगठन ने "जन लोकपाल बिल" का मसौदा तैयार किया. संगठन की मांग है कि देश से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए इस बिल को पारित किया जाए. लेकिन भारत सरकार की हवा खिसकी हुयी है. भ्रष्टाचारियों की पनाहगार बन चुकी संसद से वैसे ये उम्मीद करनी भी नहीं चाहिए कि वो ये बिल वर्तमान रूप में पारित भी करेगी, क्योंकि बिल में भ्रष्टाचार के खिलाफ बेहद कड़े प्रावधान हैं. लेकिन फिर भी अगर इस देश की जनता थान ले तो ये बिल पास हो भी सकता है. इसी मुद्दे को लेकर विख्यात गांधीवादी "अन्ना हजारे" आगामी ५ अप्रैल से जंतर मंतर पर अनिश्चितकाल के लिए भूख हड़ताल पर बैठकर सत्याग्रह करने जा रहे हैं. ७८ साल के अन्ना जन लोकपाल बिल पारित कराने के लिए इस उम्र में ये हिम्मत दिखा रहे हैं. ये उनकी अपनी लड़ाई नहीं हैं, न ही इससे उनके परिवार को कोई लाभ होने वाला है क्योंकि उनका अपना तो कोई परिवार ही नहीं है. वो पूरे देश को अपना परिवार मानते हैं और देश के लिए ही वो अपनी जान खतरे में डालने जा रहे हैं. अन्ना का साथ देने के लिए देश के कोने-कोने से लोग और संगठन जुटते नज़र आ रहे हैं. अन्ना का ये सत्याग्रह देश में बदलाव का बिगुल बजाने जा रहा है. उनके सत्याग्रह से सरकार के कान पर अगर जूं रेंगती है तो ये देश के आवाम की सबसे बड़ी जीत होगी.&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-4304066945563475969?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/4304066945563475969/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/03/blog-post_27.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/4304066945563475969'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/4304066945563475969'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/03/blog-post_27.html' title='देश में बदलाव का बिगुल फूंकेगा अन्ना हजारे का ये सत्याग्रह'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-9YwDX_ljMQU/TY74EGYmhII/AAAAAAAAAUg/tq7myCFueR8/s72-c/ANNA_HAZARE.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-1207221925711107837</id><published>2011-03-25T10:33:00.000+05:30</published><updated>2011-03-25T10:33:48.440+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आस्था'/><title type='text'>राजनीति की ओर बाबा रामदेव के बढ़ते मजबूत कदम!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh5.googleusercontent.com/-biXrl4E_nqs/TYIGxTaN0OI/AAAAAAAAAT8/BI-sfcKjJ4k/s1600/baba_ramdev.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="383" r6="true" src="https://lh5.googleusercontent.com/-biXrl4E_nqs/TYIGxTaN0OI/AAAAAAAAAT8/BI-sfcKjJ4k/s400/baba_ramdev.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;जो काम गांधी न कर पाए, जो काम संघ न कर पाया, अब वही काम बाबा रामदेव ने अपने हाथ में लिया है। देश को सही दिशा देने के लिए सत्ता का एक केंद्र स्थापित किया जाए और फिर उस केंद्र को पीछे से मार्गदर्शित किया जाए। एक राजनीतिक संगठन के पीछे नैतिक और चारित्रिक रूप से शक्तिशाली संगठन का मार्गदर्शन ताकि देश का सर्वांगीण विकास हो सके। महात्मा गांधी ने भी ये कोशिश की थी कि वे बिना किसी पद पर बैठे कांग्रेस को पीछे से मार्गदर्शित करते रहेंगे और कांग्रेस उनके सपनों का भारत खड ा करेगी। लेकिन सत्ता के दिन नजदीक आते-आते उनके चेलों में ऐसा झगड ा शुरू हुआ कि देश का बंटवारा और बंटाधार दोनों एक साथ हो गया। आजादी मिलने के बाद नेहरू ने गांधी की एक न मानी और अपने हिसाब से देश का विकास करना शुरू कर दिया। शहरों को विकास का केंद्र बना दिया गया और गांवों की ओर ध्यान नहीं दिया गया। परिणाम स्वरूप शहर और गांव के बीच का फासला बढ ता चला गया। गांधी जो चाहते थे वो उनकी किताबों तक ही सीमित होकर रह गया। कांग्रेस ने गांधी का मुखौटा जरूर लगाया, लेकिन न तो गांधी को अपनाया और न उनकी मानी। बंटवारे के बाद मिली आजादी से गांधी इतने ज्यादा खिन्न थे कि उन्होंने १५ अगस्त १९४७ को आजादी जलसे में शामिल होना भी मुनासिब नहीं समझा। गांधी अच्छी तरह जान गए थे कि कांग्रेस भटक गई है। आजादी के बाद गांधी तकरीबन डेढ साल जीवित रहे, लेकिन इस दौरान उन्होंने देश की शासन व्यवस्था में कोई सक्रिय भूमिका नहीं निभाई।&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संघ और भाजपा&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आरएसएस भी एक नैतिक और चारित्रिक संगठन के रूप में ही काम करना चाहता था, लेकिन पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने संघ को इस बात के लिए राजी कर लिया कि देश को सही दिशा और दशा प्रदान करने के लिए राजनीति में उतरना जरूरी है। और आरएसएस ने अपना पॉलिटिकल विंग खड़ा करने का रास्ता साफ कर दिया। मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की पहली सरकार कम ही दिन रही पर उसने कई ठोस और नए कदम उठाए। लेकिन बाद में ये सरकार भी इंदिरा गांधी के बिछाए जाल में फंसकर पद लोलुपता की भेंट चढ गई। बाद में १९९८ में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी भारतीय जनता पार्टी की सरकार सात साल तक गठबंधन धर्म का रोना रोती रही और संघ के दिशानिर्देशों की अवहेलना करती रही। माना कि राम मंदिर का मुद्‌दा विवादित था, लेकिन भाजपा ने स्वदेशी से लेकर धारा ३७० और समान नागरिक कोड सबको भुला दिया। लोगों को भाजपा सरकार नई बोतल में पुरानी शराब की तरह लगनी शुरू हो गई। देश का आर्थिक विकास तो हुआ, लेकिन उसका मॉडल विदेशी की था। उसमें भारतीयता की बू कहीं नहीं थी। अगर एक परमाणु परीक्षण को छोड दिया जाए तो पूरे कार्यकाल के दौरान एक भी ठोस कदम नहीं उठाया गया। प्रधानमंत्री वाजपेयी के दिल में उमड ी नोबल पुरस्कार की चाह ने उन्हें बार-बार पाकिस्तान के सामने मजबूर किया। पार्टी के दिग्गज नेताओं का अहंकार इतना बढ ा कि उन्होंने आम जनता से कुछ ज्यादा ही दूरी बना ली। कांग्रेस से भी ज्यादा। जिस पॉलिटिकल विंग को खड ा करते वक्त संघ ने तरह-तरह के सपने संजोए थे, उसका वही संगठन उसको आंखें तरेरने लगा। हश्र सबके सामने है कांग्रेस और भाजपा एक ही सिक्के के दो पहलू बनकर रह गए हैं। भाजपा के दामन में भ्रष्टाचार के दाग भले ही न हों पर दोनों ही दलों में पद की लोलुपता सिर चढ कर बोल रही है।&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अब बाबा रामदेव&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा रामदेव भी अब इस पथ पर कदम बढ़ा रहे हैं। प्राचीन भारतीय राज व्यवस्था ऐसी ही थी, जहां संतों के मार्गदर्शन में राजा शासन किया करते थे। संत ऐसे सलाहकार की भूमिका निभाते थे, जो निःस्वार्थ भाव से प्रजा के हित में सलाह देते थे और उनकी राय सर्वोपरि होती थी। आज की सरकारें जितने भी सलाहकार नियुक्त करती हैं वे सभी पद और पैसे की चाह में हवा का रुख देखकर सलाह देते हैं। कोई सही सलाह देता भी है तो उसकी एक नहीं सुनी जाती। वर्तमान में सभी सरकारी सलाहकार महज शो-पीस मात्र बनकर रह गए हैं। बाबा रामदेव भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के माध्यम से यही चाहते हैं कि एक ऐसी राजनीतिक शक्ति का सृजन हो जो देश को संतों और समाजसेवियों के मार्गदर्शन में आगे ले जाए। जो उच्च स्तर के नैतिक मूल्यों की स्थापना करे, जो देश को लूटने और बांटने के बजाए पूरी ईमानदारी के साथ जोड े। इतना तो तय है कि बाबा खुद चुनाव नहीं लड ेंगे। लेकिन भारत स्वाभिमान के अंतर्गत उनके नुमाइंदे चुनावी दंगल में उतरेंगे और भ्रष्टाचारियों से मुकाबला करेंगे। देखना यही होगा कि २०१४ में जब बाबा की पार्टी मैदान में आएगी तो क्या गुल खिलाएगी। इससे पहले बाबा जय गुरुदेव भी एक पॉलिटिकल एक्सपेरिमेंट कर चुके हैं जो विफल रहा। हालांकि बाबा रामदेव का ये प्रयोग एकदम अलग किस्म का है और उम्मीद जगाने वाला है। उनके साथ हर वर्ग, हर जाति और हर धर्म के लोग जुड े हुए हैं। और फिलहाल सब जोश से भरे दिख रहे हैं। सत्ता हासिल करने तक ये जोश ठंडा भी नहीं होने वाला।&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजीव दीक्षित का नुकसान&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजीव दीक्षित के रूप में बाबा रामदेव को एक कुशल वक्ता और तेजस्वी व्यक्तित्व मिला था, जिसे काल ने असमय छीन लिया। उनके भाषण में एक अजीब सा सम्मोहन था। उनकी आवाज में गजब का आकर्षण था। तथ्यों की जानकारी ऐसी थी कि कंप्यूटर को भी मात दे दे। विषयों की पड़ताल ऐसी थी कि विशेषज्ञों से पानी भरवा ले। ये राजीव दीक्षित की कार्य कुशलता और नेतृत्व कुशलता ही थी कि उन्हें लोग भारत के प्रधानमंत्री के रूप में देखने लगे थे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। भारत स्वाभिमान यात्रा के दौरान ३० नवंबर को अचानक आए हार्ट अटैक ने बाबा रामदेव से उनका ये सिपेहसालार छीन लिया। ये बाबा रामदेव के लिए बहुत बड ा झटका था। भारत स्वाभिमान का सबसे मजबूत स्तंभ भरभराकर गिर गया। लेकिन बाबा ने हार नहीं मानी और न ही यात्रा को वापस लिया। भारत स्वाभिमान यात्रा यथावत चलती रही और २७ फरवरी को दिल्ली के रामलीला ग्राउंड में एक विशाल रैली करने के बाद राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपने के साथ संपन्न हुई। उस दिन भारत स्वाभिमान ट्रस्ट ने सत्ताधीशों को अपनी ताकत का अंदाजा भी करा दिया। अब भारत स्वाभिमान ट्रस्ट को राजीव दीक्षित के बिना राजनीतिक मोर्चा संभालना होगा।&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हरिद्वार बना आध्यात्मिक राजधानी&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे मुंबई को भारत की कमर्शियल कैपिटल कहा जाता है, उसी तरह हरिद्वार आज भारत की स्प्रिचुअल कैपिटल कहलाए जाने योग्य है। पतंजलि योग पीठ, गायत्री शक्ति पीठ और गुरुकुल कांगड़ी सरीखे शक्तिशाली आध्यात्मिक संगठनों की बदौलत इस नगरी से आध्यात्म की बयार निकलकर न केवल पूरे देश में बल्कि विश्व के कोने-कोने में फैल रही है। राजनीति के पैरों में अगर धर्म की बेडि यां डाल दी जाएं तो वह भटक नहीं पाएगी। लेकिन इस बात का खयाल भी रखना है कि राजनीति धर्म से चले, पर धर्म की राजनीति न हो। राजनीति को उसका धर्म समझाना जरूरी है और ये काम संत ही कर सकते हैं, ऐसे संत जो धार्मिक उन्माद भड काकर देश को तोड ने के बजाए देश को जोड ने का काम करें। बाबा रामदेव ने विभिन्न धर्मों और मतों के लोगों को एक मंच पर लाकर जोड ने का काम किया है। आशा करें कि हरिद्वार आने वाले समय में देश का ऐसा मार्गदर्शन करे कि उसको सचमुच देश की आध्यात्मिक राजधानी घोषित कर दिया जाए।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-1207221925711107837?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/1207221925711107837/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/03/blog-post_25.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/1207221925711107837'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/1207221925711107837'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/03/blog-post_25.html' title='राजनीति की ओर बाबा रामदेव के बढ़ते मजबूत कदम!'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='https://lh5.googleusercontent.com/-biXrl4E_nqs/TYIGxTaN0OI/AAAAAAAAAT8/BI-sfcKjJ4k/s72-c/baba_ramdev.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-4490250057605222867</id><published>2011-03-21T12:37:00.000+05:30</published><updated>2011-03-21T12:37:18.184+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कायदा कानून'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='System'/><title type='text'>होली मिलने आए पत्रकार के रिश्तेदार की बच्ची का किया गाजियाबाद पुलिस ने अपहरण!!!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh3.googleusercontent.com/-Nd8PMv7tbFc/TYb45PNk5eI/AAAAAAAAAUE/stntDTQyo-E/s1600/up-police-.gif" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" r6="true" src="https://lh3.googleusercontent.com/-Nd8PMv7tbFc/TYb45PNk5eI/AAAAAAAAAUE/stntDTQyo-E/s1600/up-police-.gif" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;२० फरवरी को होली के दिन गाजियाबाद में प्रताप विहार पुलिस चौकी, पुलिस की कायरता और बर्बरता की गवाह बनी। पुलिस ने न केवल एक अबोध बच्ची के अपहरण की कोशिश की, बल्कि विरोध करने पर उसकी मां समेत अन्य महिलाओं पर लाठियां बरसाईं। पुलिस ने इतनी हिमाकत तब की जब वो पीड़ित पक्ष को अच्छी तरह जानती-पहचानती थी। घटना प्रताप विहार निवासी तेजेश चौहान जो कि पंजाब केसरी में रिपोर्टर हैं, के साथ घटी। इससे पहले तेजेश वॉइस ऑफ इंडिया चैनल में गाजियाबाद के संवाददाता थे। तेजेश चौहान और उनके भाई राजीव चौहान से रविवार को होली मिलने के लिए उनके रिश्तेदार दीपक अपने परिवार के साथ आए। लेकिन उनका घर बंद पाकर वे अपनी कार से वापस लौटने लगे इतने में तेजेश चौहान के पड़ोसियों ने उन्हें होली खेलने के लिए रोक लिया। दीपक और उनकी पत्नी अपनी ढाई साल की बच्ची आस्था को गाड़ी में अपने भाई के साथ छोड कर पड़ोसियों को गुलाल लगाने उतर पड़े । अभी उन्होंने गुलाल लगाया भी नहीं था कि बगल में ही स्थित पुलिस चौकी से चौकी इंचार्ज नरेंद्र शर्मा ने आकर गाड़ी का दरवाजा खोला और चलता बना। दीपक और उनकी पत्नी ने पीछे मुड कर देखा तो गाड़ी गायब थी। इस पर बच्ची की मां का बुरा हाल हो गया। सामने खड़े एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि एक पुलिस वाला जबरदस्ती गाड़ी ले गया है। आनन-फानन सबको फोन मिलाया गया। होली के कारण अधिकांश लोगों ने अपने मोबाइल घर पर छोड रखे थे। इतने में पत्रकार तेजेश चौहान के छोटे भाई राजीव मौके पर पहुंच गए और उन्होंने चौकी इंचार्ज को फोन करके अपना हवाला दिया। इस पर चौकी इंचार्ज ने बताया कि गाड़ी और बच्ची विजय नगर थाने में सुरक्षित है। गाड़ी और बच्ची को वो क्यों ले गया, इसका उसने कोई जवाब नहीं दिया। इतना सुनते ही परिजनों ने प्रताप विहार पुलिस चौकी पर हंगामा कर दिया। हंगामे की खबर फैलते ही चौकी इंचार्ज ने थाने पर ये कहकर चौकी पर फोर्स बुला ली कि स्थानीय लोगों ने शराब पीकर चौकी पर हमला कर दिया है। इसके बाद एसओ विजय नगर अनिल कप्परवान के नेतृत्व में आए तकरीबन ५० पुलिस वालों की फोर्स ने ऐसी लाठियां बरसाईं कि कई लोगों को लहुलुहान कर दिया। लाठीचार्ज में एक व्यक्ति का हाथ भी टूट गया, जिससे बाद में पुलिस ने झूठी गवाही भी दिलवा दी। बर्बरता का स्तर ये था कि पुरुषों को बचाने आई महिलाओं को भी उन्होंने नहीं बखशा और उनपर भी लाठियां बरसाईं। इस कायराना हरकत को अंजाम देते वक्त एसओ विजयनगर की नेमप्लेट भी मौके पर गिर गई। ये हंगामा देखकर तकरीबन पूरा प्रताप विहार पुलिस चौकी पर आ गया। इतनी भीड देखकर पुलिस के होश फाखता हो गए और पुलिस हवाई फायरिंग करने की प्लानिंग करने लगी। इतने में कॉलोनी के कुछ लोगों ने आकर मामला शांत कराया। भीड ने जब हंगामा खड़ा किया तो एसओ विजय नगर अपने मोबाइल से भीड की वीडियो बनाने लगे। इस पर कुछ महिलाओं ने उनका मोबाइल ये कहकर छीनने की कोशिश की कि उस समय उन्होंने वीडियो क्यों नहीं बनाई तब पुलिस महिलाओं पर डंडे बरसा रही थी। प्रताप विहार वासियों ने पूरी पुलिस फोर्स के सामने एसओ विजय नगर को बुरा भला कहा, दबाव बढ ता देख एसओ विजय नगर ने मौके से खिसकने में ही भलाई समझी और कुछ लोगों को जबरदस्ती गाड़ी में ठूंसकर थाने पर आकर बात करने को कहा। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विजयनगर थाने पर लोगों का भारी हुजूम पहुंच गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए सीओ सिटी आरके सिंह थाने पहुंच गए। उनके सामने ही लोगों ने एसओ विजयनगर और चौकी इंचार्ज प्रताप विहार को आड़े हाथों लिया। दोनों के दोनों इस बात का स्पष्ट जवाब नहीं दे पाए कि बच्ची को क्यों उठाया गया। इस शर्मनाक कृत्य के बावजूद दोनों के चेहरे पर न तो कोई शर्म थी और न अपने किए का पछतावा। अगर प्रताप विहार के लोगों का दवाब नहीं होता तो पुलिस क्या करती कहा नहीं जा सकता। सीओ सिटी ने बच्ची आस्था की मां, जो खुद ज्यूडिशियरी की तैयारी कर रही हैं, के बयान लिए। उनके बयान सुनकर सीओ भी सन्न रह गए। लेकिन एसओ विजय नगर अपनी गलती मानने को तैयार नहीं था। उसका बार-बार यही कहना था कि जब पता चल गया कि बच्ची सुरक्षित है तो हंगामा क्यों किया गया। लेकिन वो इस बात का जवाब नहीं दे पाया कि पूरे देश में एक आदमी ऐसा बता सकते हैं जो ये मानने को तैयार हो जाए कि उनकी बहू-बेटी पुलिस की कस्टडी में सुरक्षित है। इस देश की पुलिस ने आज तक आम लोगों का विश्वास तोडा है, जीता नहीं। बहरहाल हुआ वही जिसकी उम्मीद थी, न्याय नहीं मिला। प्रताप विहार वाहिसयों के दबाव को देखते हुए पकडे गए लोगों को तो छोड दिया गया, लेकिन गाड़ी को सीज कर दिया। गाड़ी में रखा पर्स, जिसमें पांच हजार रुपये थे, भी गाड़ी से गायब था। आज पुलिस ने गाड़ी को छोड ते हुए दिखाया है कि गाड़ी बेढंगी तरह से चौराहे पर खड़ी थी। गाड़ी में कागज नहीं थे। गाड़ी को बच्ची के ताऊ (जिनको गाड़ी चलानी नहीं आती) खुद चलाकर थाने ले गए। किसी भी पुलिस वाले के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। अगर यही काम किसी और ने किया होता तो क्या पुलिस उस पर अपहरण का मामला नहीं दर्ज करती। तो फिर चौकी इंचार्ज पर अपहरण का मुकदमा क्यों नहीं दर्ज किया गया। होली के अवसर पर गाजियाबाद एसएसपी के आदेश थे कि किसी भी गाड़ी को सीज न किया जाए, फिर उनके आदेशों की अवहेलना क्यों की गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक रिहायशी मकान में चल रही प्रताप विहार पुलिस चौकी एक सफेद हाथी मात्र है। लोगों को इस चौकी से अपनी सुरक्षा की कोई अपेक्षा नहीं है। रेजिडेंट्‌स वेलफेयर एसोसिएशन अपने दम पर अपनी दमड़ी खर्च करके प्राइवेट गाड्‌र्स से अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करती है। आए दिन होने वाली छोटी-मोटी चोरियों और चेन स्नेचिंग की भी रपट कोई लिखाने नहीं जाता क्योंकि पुलिस का रवैया सबको पता है। बल्कि ये कहें की पुलिस से सबका विश्वास उठ&amp;nbsp;चुका है. यूपी पुलिस की नस्ल ही कुछ ऐसी है कि आतंकवादियों और गुंडा तत्वों के सामने घुटने टेकती है और सारी हेकड़ी आम लोगों पर जमाती है। महिलाओं पर लाठियां तब बरसाई गई हैं, जब कुछ दिन पहले गाजियाबाद के दौरे पर आईं मुखयमंत्री मायावती ये कहकर गईं थीं कि महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करना पुलिस की प्राथमिकता हो। वो तो मामला मीडिया से जुड़े लोगों का था, तो पुलिस इतना दब भी गई वरना क्या होता कह नहीं सकते। लेकिन कौन सुनता है तूती की नक्कारखाने में। इस तरह की सैकड़ों घटनाएं हर रोज घटती हैं, लेकिन पुलिस की कार्यशैली को सुधारने की कोई कोशिश नहीं की जाती। समझौता कराने आए सीओ सिटी ने ये तो माना कि पुलिस ने गलत काम किया है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर उन्होंने कुछ नहीं किया। समझौते के अंत में उनका डायलॉग था- ''ये घटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। इसका हमें भी गहरा दुख है।'' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घटना की अधिक जानकारी&amp;nbsp;इन&amp;nbsp;नंबरों&amp;nbsp;से&amp;nbsp;ली&amp;nbsp;जा&amp;nbsp;सकती&amp;nbsp;है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्रकार तेजेश चौहान- ९७१८६२४७४४&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चौकी इंचार्ज प्रताप विहार- ९४१०८५५८८८&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थाना विजय नगर- ९४५४४०३४२८&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-4490250057605222867?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/4490250057605222867/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/03/blog-post_21.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/4490250057605222867'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/4490250057605222867'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/03/blog-post_21.html' title='होली मिलने आए पत्रकार के रिश्तेदार की बच्ची का किया गाजियाबाद पुलिस ने अपहरण!!!'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='https://lh3.googleusercontent.com/-Nd8PMv7tbFc/TYb45PNk5eI/AAAAAAAAAUE/stntDTQyo-E/s72-c/up-police-.gif' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-7265015576704788616</id><published>2011-03-19T15:49:00.000+05:30</published><updated>2011-03-19T15:49:43.612+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='श्रद्धांजलि'/><title type='text'>डॉ. राजीव दीक्षितः असमय शांत हो गई एक ओजस्वी वाणी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh6.googleusercontent.com/-qxQ4VAQV48o/TYH92inyr6I/AAAAAAAAAT4/AMH2MDco_Vw/s1600/Rajiv-Dixit1-3918.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" r6="true" src="https://lh6.googleusercontent.com/-qxQ4VAQV48o/TYH92inyr6I/AAAAAAAAAT4/AMH2MDco_Vw/s400/Rajiv-Dixit1-3918.jpg" width="265" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;ऐसा कम ही होता है कि लोगों की जन्म तिथि और पुण्यतिथि एक हो। क्योंकि जिन लोगों का जन्म और देहांत एक ही दिन होता है वे महान आत्माएं होती हैं। ऐसी ही एक महान आत्मा हमारे बीच नहीं रही। जिसने अपनी तेजस्वी वाणी से भारत के कोने-कोने में स्वदेशी की अलख जगाई और अपने वाक कौशल से लोगों को अंदर तक झकझोर दिया, ऐसे डॉ. राजीव दीक्षित असमय काल का शिकार हो गए। ३० नवंबर १९६७ को उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ जिले के अतरौली तहसील में जन्में राजीव दीक्षित ने ३० नवंबर २०१० को अचानक हार्ट अटैक हो जाने से छत्तीसगढ के भिलाई में अंतिम सांस ली। उस समय वे भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के तत्वाधान में आयोजित भारत स्वाभिमान यात्रा पर थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वदेशी के प्रखर वक्ता और बाबा रामदेव के मार्गदर्शन में स्थापित भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के राष्ट्रीय सचिव की जिम्मेदारी निभा रहे राजीव दीक्षित की शुरुआती शिक्षा ग्रामीण परिवेश में हुई। राधेश्याम दीक्षित के घर में जन्में डॉ. राजीव का शुरुआती जीवन वर्धा में व्यतीत हुआ। बेहद सरल और संयमी जीवन जीने वाले राजीव दीक्षित निरंतर साधना में लगे रहते थे। पिछले कुछ महीनों से वे लगातार गांव-गांव व शहर-शहर घूमकर भारत के उत्थान के लिए भ्रष्टाचार और स्वदेशी जैसे मुद्‌दों पर लोगों के बीच जनजाग्रति पैदा कर रहे थे। राजीव भाई वैज्ञानिक भी रहे उन्होंने डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के साथ भी काम किया और फ्रांस के टेलीकम्युनिकेशन सेक्टर के अलावा भारत के सीएसआईआर में भी काम किया था। &lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;राजीव दीक्षित पिछले २० सालों से बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद के खिलाफ व स्वदेशी की स्थापना के लिए संघर्ष कर रहे थे। वे मानते थे कि भारत पुनर्गुलामी की ओर बढ़ रहा है और इसे रोकना बहुत जरूरी है। उनकी प्रारंभिक व माध्यमिक शिक्षा फिरोजाबाद में हुई। फिर वे १९९४ में उच्च शिक्षा के लिए इलाहबाद चले गए। वे सेटेलाइट कम्युनिकेशन में उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे, लेकिन अपनी शिक्षा बीच में ही छोड कर वे देश को विदेशी कंपनियों की लूट से मुक्त करने के लिए स्वदेशी आंदोलन में कूद पड े। शुरू में वे भगतसिंह, उधमसिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे महान क्रांतिकारियों से प्रभावित रहे। बाद में जब उन्होंने गांधी जी को पढ ा तो उनसे भी काफी प्रभावित हुए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले २० सालों में राजीव दीक्षित ने जो कुछ भी सीखा उसके बारे में लोगों को जागृत किया। भारतीय जनमानस में स्वाभिमान जगाने के लिए उन्होंने लगातार व्याखयान दिए। २० सालों में राजीव भाई ने तकरीबन १५ हजार से अधिक व्याखयान दिए। जिनमें से कुछ व्याखयानों की ऑडियो और वीडियो सीडी भी बनाई गईं। उनके व्याखयानों की सीडी लोगों के बीच खासी लोकप्रिय हैं। उन्होंने सबसे पहले देश में स्वदेशी और विदेशी कंपनियों की सूची तैयार की और लोगों से स्वदेशी अपनाने का आग्रह किया। उन्होंने पेप्सी और कोक जैसे पेय पदार्थों के खिलाफ आंदोलन चलाया और कानूनी कार्यवाही भी की। पिछले १० सालों से स्वामी रामदेव के साथ संपर्क में रहने के बाद ९ जनवरी २००९ को उन्होंने भारत स्वाभिमान की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली। &lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;जब राजीव दीक्षित मंच से बोलते थे, तो सुनने वाले एकटक उनकी ओर देखते हुए उन्हें सुनते रह जाते थे। उनके भाषण में ऐसा सम्मोहन था कि बीच से उठकर जाना कठिन था। आवाज में ऐसा आकर्षण था कि कोई कहीं भी सुने तो खिंचा चला आए। ठोस तथ्यों के साथ वो अपनी बात को इतनी मजबूती और सहज ढंग से रख देते थे कि समझने के लिए दिमाग पर जोर डालने की जरूरत नहीं पड़ती। देश की कठिन से कठिन समस्या पर उन्होंने बेहद सरलता के साथ निदान दिए। कम ही लोगों को समझ आने वाला अर्थशास्त्र भी वे बेहद सरलता के साथ लोगों को समझा देते थे। यही कारण था कि लोगों को उनके रूप में देश का कर्णधार नजर आने लगा था। लेकिन ३० नवंबर २०१० को लोगों की इन उम्मीदों पर उस समय पानी फिर गया जब अचानक आए हार्ट अटैक ने डॉ. राजीव दीक्षित को हमसे छीन लिया।&amp;nbsp; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-7265015576704788616?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/7265015576704788616/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/03/blog-post_19.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/7265015576704788616'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/7265015576704788616'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/03/blog-post_19.html' title='डॉ. राजीव दीक्षितः असमय शांत हो गई एक ओजस्वी वाणी'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='https://lh6.googleusercontent.com/-qxQ4VAQV48o/TYH92inyr6I/AAAAAAAAAT4/AMH2MDco_Vw/s72-c/Rajiv-Dixit1-3918.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-4779644462220082274</id><published>2011-03-18T12:49:00.000+05:30</published><updated>2011-03-18T12:49:57.588+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम लोग'/><title type='text'>जनगणना में हिजड़ों की तरह नेताओं की भी अलग कैटेगरी में गिनती हो!!!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh5.googleusercontent.com/-pIgpudV19jo/TYMGksePJ1I/AAAAAAAAAUA/_vtq7zPgG6A/s1600/india-parliament-2009-2-12-6-4-34.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="201" r6="true" src="https://lh5.googleusercontent.com/-pIgpudV19jo/TYMGksePJ1I/AAAAAAAAAUA/_vtq7zPgG6A/s320/india-parliament-2009-2-12-6-4-34.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;आज जब मेट्रो से ऑफिस जा रहा था, तो पास बैठे मेरे सहयात्री के हाथ में अंग्रेजी का एक प्रतिष्ठित अखबार था। सीट ग्रहण करते ही उन्होंने अखबार खोला और पहले पेज से मुखातिब हुए। मैंने सोचा चलो अपना भी जुगाड हो गया और अपन भी उनके अखबार में झांकने लगे। पहले पेज की पहली खबर सांसद रिश्वत कांड की थी। संसद भवन में हंगामे की तस्वीर और भारती राजनीति पर कालिख पोतती एक हेडलाइन। वैसे क्रिकेट वर्ल्डकप के चलते लोगों को खेल पृष्ठ आजकल ज्यादा भा रहा है, लेकिन मैंने देखा कि आसपास खड े दो और सज्जन&amp;nbsp;&amp;nbsp;अखबार में झांक रहे थे और विकीलीक्स द्वारा खोले गए इस कथित रिश्वत कांड की खबर को पढने की कोशिश कर रहे थे। अब मुझे मिलाकर कुल चार लोग इस खबर को पढ रहे थे। क्योंकि अखबार अंग्रेजी का था तो इसका अर्थ था कि चारों पाठक औसत दर्जे से ज्यादा पढ े-लिखे थे। मेट्रो में उस समय भीड ज्यादा नहीं थी। मुझे लगा कि ज्यों ही हम चारों खबर को पढ लेंगे तो एक बहस शुरू होगी, और ये अच्छी बहस हो सकती है। मैंने इस आशा से बाकी के पाठकों से नजरें भी मिलाईं, उन्होंने भी मेरी ओर देखा। लेकिन ये क्या किसी की ओर से कोई टिप्पणी नहीं। उनमें से एक सज्जन बस मुस्कुरा भर दिए। अखबार वाले भाई साहब ने पन्ना पलटा और अगली खबरें पढ ने लगे, तीसरे सज्जन मेट्रो की बड ी-बड ी खिड कियों से बाहर के नजारे देखने लगे। तीनों पर उस खबर का कोई खास असर नहीं पड ा। उनके चेहरे पर एकदम निर्लिप्त भाव थे। बाकी बचा मैं, सो मैंने भी अपना मोबाइल निकाला और उसमें सॉलिटेयर गेम खेलने लगा। जीभ की खुजली नहीं मिट पाई। तमाम तरह की बातें जुबान पर आकर ही रह गईं।&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;मेरे लिए ये एक परिवर्तन जैसा था। पहले लोग खबरों पर कमेंट जरूर देते थे। राजनीतिक बहस अगर शुरू हो जाए तो फिर बघिया उधेड़ कर रख देते थे। ट्रेनों और बसों में ऐसे पॉलिटिकल डिस्कशन होते थे मानो संसद का सदन हों। वैसे काफी समय से जनरल डिब्बे में सफर नहीं किया, लेकिन पिछले दिनों स्लीपर क्लास से लखनऊ गया था, उसमें भी एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी। आपस में कोई डिस्कशन नहीं। जो परिवार के साथ थे बस वे अपने परिवार वालों से बात कर रहे थे। बीच-बीच में या तो किसी के बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी या रेल के डिब्बे की संकरी गली में चाय-पानी बेचते फेरी वालों की पुकारने की आवाज। &lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;अब अगर कोई ये कहे कि लोग एकांकी हो गए हैं या उनके अंदर का मिलनसार भाव खत्म हो रहा है या वे बेकार की बहस में पड़ना नहीं चाहते तो सही नहीं होगा। कितना भी विकास क्यों न हो गया हो, भारतीय समाज अभी निष्ठुर नहीं हुआ है। उसके अंदर का मिलनसार भाव अभी भी जीवित है। अगर समाज में राजनीतिक बहसें खत्म हो रही हैं जो उसका एक मात्र कारण यही है कि लोग अब राजनीति को बहस के लायक नहीं समझते। सुबह से शाम तक न्यूज चैनलों पर बहस ही बहस सुनाई देती है। लेकिन किसी बहस का कोई नतीजा निकलता नजर नहीं आता। सारे गणमान्य नेतागण अपनी ढपली और अपना राग आलाप रहे हैं। किसी नेता की बात में अब इतना दम बचा नहीं है कि लोग उसका विश्वास करे। एक-एक करके हमाम में सब के सब नंगे नजर आए। ९० के दशक राजनीतिक उथल-पुथल और अस्थिरता का दशक रहा। उस समय भाजपा ने लोगों को सुराज का सपना दिखा रखा था। लेकिन १९९८ में बनी भाजपा की गठबंधन सरकार भी वैसा कुछ खास कर नहीं पाई जैसी लोगों को उम्मीद थी। लोगों के हिस्से में केवल बातें और आश्वासन ही आए। हम देश को अच्छा शासन दे रहे हैं इस बात को सिद्ध करने के लिए सरकारें को विज्ञापनों और होर्डिंग्स का सहारा है। लेकिन अगर शासन वास्तव में अच्छा होता तो वो लोगों को खुद-ब-खुद नजर आता। फिर ढोल पीटने ही जरूरत नहीं पड ती। नौबत यहां तक आ गई है कि सरकार के १०० दिन पूरे करने पर जश्न, छह महीने पूरे करने पर जश्न, एक साल पूरा करने पर जश्न, मानो सरकार में बैठे लोगों को ये उम्मीद ही न रही हो कि सरकार इतने दिन चल भी जाएगी। एक पार्टी भी ऐसी नहीं बची है जो कोई राजनीतिक आदर्श स्थापित करती दिख रही हो। इस बहुदलीय व्यवस्था में पूरी राजनीति आरोप-प्रत्यारोप, लाल-नीली बत्ती, दल-बदल और दलाली तक सिमट कर रह गई है। &lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;घोटाले और भ्रष्टाचार भारतीय लोकतंत्र का अभिन्न अंग बन चुके हैं। अब कोई घोटाला या रिश्वत कांड खुलने पर लोगों को अचंभा नहीं होता। लोग ये मानकर चल रहे हैं कि सफेद खादी में घूम रहा एक भी आदमी विश्वसनीय नहीं है। जिन लोगों के दामन साफ लग रहे हैं ये महज संयोग मात्र है, उसका किसी सच्चाई या वास्तविकता से कोई ताल्लुक नहीं है। अगर फिर भी कोई नेता ईमानदार पाया जाता है तो फिर वह नेता नहीं कुछ और है। जनगणना में इस बार जिस तरह हिजड़ों की अलग कैटेगरी में गिनती हो रही है, उसी तरह नेताओं के लिए भी अलग से एक कैटेगरी बनानी चाहिए। नेताओं को आम जनता के साथ गिनना, सरासर आम लोगों का अपमान है। इसके लिए लोगों को आवाज बुलंद करनी चाहिए। लेकिन लोगों ने राजनीति पर ऐसी खाक डाल दी है कि वे राजनीति से उम्मीद ही छोड े बैठे हैं। अगर यही आलम रहा तो चुनावों में वोटिंग प्रतिशत घटता चला जाएगा और वह दिन ज्यादा दूर नहीं नजर आ रहा।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-4779644462220082274?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/4779644462220082274/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/03/blog-post_18.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/4779644462220082274'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7079008157695611591/posts/default/4779644462220082274'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/03/blog-post_18.html' title='जनगणना में हिजड़ों की तरह नेताओं की भी अलग कैटेगरी में गिनती हो!!!'/><author><name>Sachin Rathore (सचिन राठौर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08484919973851372449</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-5XlkYBYl6fM/Tbvf8-oXzLI/AAAAAAAAAVk/mbuzT-Dj-g8/s220/Sachin.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='https://lh5.googleusercontent.com/-pIgpudV19jo/TYMGksePJ1I/AAAAAAAAAUA/_vtq7zPgG6A/s72-c/india-parliament-2009-2-12-6-4-34.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7079008157695611591.post-6300373906674750976</id><published>2011-03-17T15:19:00.001+05:30</published><updated>2011-03-17T17:22:11.619+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आस्था'/><title type='text'>बाबा रामदेव की हुंकार!!!!!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh5.googleusercontent.com/-Df3C5-R_Azg/TYHWQxiUXFI/AAAAAAAAATs/FmTnpPD00Zg/s1600/baba-ramdev-subramanium-swamy-2011-2-27-9-30-18.jpg" imageanchor="1" style="cssfloat: left; margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="281" r6="true" src="https://lh5.googleusercontent.com/-Df3C5-R_Azg/TYHWQxiUXFI/AAAAAAAAATs/FmTnpPD00Zg/s400/baba-ramdev-subramanium-swamy-2011-2-27-9-30-18.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;२७ फरवरी को बाबा रामदेव के नेतृत्व में दिल्ली के रामलीला मैदान में भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के बैनर तले भ्रष्टाचार के खिलाफ आयोजित विशाल रैली देश की राजनीति को कई संदेश दे गई। विभिन्न धर्मों, सम्प्रदायों और मतों के लोग एक मंच पर थे और देश की नाकारा राजनीति को एक चेतावनी दे रहे थे। सभी राजनीतिक पार्टियों में खलबली है। सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी इसलिए डर रही है क्योंकि बिगुल भ्रष्टाचार के खिलाफ बजाया गया है और विपक्षी भाजपा इसलिए डर रही है कि बाबा ने सही मायने में धर्म को राजनीति से जोड़ दिया है। लोगों को लगने लगा है कि अब बातों और नारों की राजनीति नहीं होगी बल्कि धरातल की राजनीति का समय आ गया है। रामलीला मैदान का वो दृश्य देश की आवाम में आशा की किरण जगाने वाला था।&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;strong&gt;मेंढकों को तौल दिया&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;यूं तो भारत स्वाभिमान ट्रस्ट बाबा रामदेव के नेतृत्व में पिछले एक वर्ष से भारत स्वाभिमान यात्रा पर निकला हुआ था। दिल्ली के रामलीला मैदान में इस यात्रा की पूर्णाहुति थी। रामलीला मैदान के उस विशाल मंच से दिन तमाम समाजसेवी, पूर्व प्रशासनिक अधिकारी, कूटनीतिज्ञ और विभिन्न धर्मों के संतों ने संबोधित किया। ये वे लोग थे जिनको एकसाथ एक मंच पर लाना नामुमकिन था। अपने-अपने क्षेत्र में अपनी-अपनी तरह से सुधार के प्रयास कर रहे ये लोग शायद ही कभी एकसाथ आए हों। ये एक तरह से छोटी-छोटी नदियों द्वारा एक स्थान पर संगम होकर सागर रूप था। दरअसल अच्छाई के लिए अच्छा काम कर रहे लोगों और उनके संगठनों में एक बुराई आमतौर पर पाई जाती है और वह है- ''ईगो प्रॉब्लम''। अच्छे लोगों के अहम इस कदर टकराते हैं कि उनको एकसाथ जोड़ना नामुमकिन जैसा ही है। कहीं निजि हित आड े आते हैं तो कहीं मान-सम्मान। यही कारण है कि देश में सुधार के प्रयास तो हमेशा से ही किए जा रहे थे, लेकिन वे बिखरे हुए थे। लेकिन देश के हालातों से ईमानदार और सज्जन व्यक्ति त्रस्त है और था। सबके मन में एक चाह समान रूप से हिलोरे ले रही है कि देश की सूरत सुधरनी चाहिए। भारत स्वाभिमान ट्रस्ट ने देश में सुधार के लिए काम कर रहे तमाम संगठनों और उनके नेताओं को एक मंच पर बुलाकर मेंढकों को तौलने जैसा काम किया है, जो अब से पहले कभी नहीं हुआ था। ये बाबा रामदेव के विनम्र प्रयासों का ही नतीजा था कि आर्यसमाज के स्वामी अग्निवेश और गांधीवादी अन्ना हजारे के साथ-साथ तमाम ऐसी विभूतियां रामलीला मैदान में जुटीं जो अलग-अलग क्षेत्रों में सुधार के लिए अलग-अलग प्रयास कर रही हैं। उनमें भारत स्वाभिमान आंदोलन के अगुआ और पूर्व भाजपा नेता केएन गोविंदाचार्य, प्रखयात अधिवक्ता रामजेठमलानी, किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल, विजय कौशल जी महाराज, सुब्रमण्यम स्वामी, मौलाना मकसूद हसन, विश्वबंधु गुप्ता, कवि गजेंद्र सोलंकी और हरिओम पंवार जैसे लोग शामिल थे। &lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रचीन शासन व्यवस्था&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;भारत की प्रचीन शासन व्यवस्था ऐसी ही थी जिसमें शासक संतों और मुनियों से मार्गदर्शन में प्रजापालन का कार्य करते थे। राम और वशिष्ठ से लेकर चंद्रगुप्त और चाणक्य तक सभी सफल शासन व्यवस्थाओं में संतों के मार्गदर्शन ने न्यायपूर्ण और खुशहाल प्रजापालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन हमने भारत में भारतीय दर्शन पर आधारित शासन व्यवस्था न अपनाकर विदेश से आयातित शासन व्यवस्था को अपनाया। हमने वो नहीं अपनाया जो हमारे लिए उपयुक्त था, बल्कि हमने वो अपनाया जो दूसरों के लिए उपयुक्त था। आजादी के ६५ साल बाद आज इसका परिणाम हमारे सामने है। देश में व्याप्त बुराइयों और समस्याओं का जिक्र करने की जरूरत नहीं है। आम लोगों का पैसा पिछले ६५ सालों से भ्रष्टाचार की बेदी पर बदस्तूर चढ़ रहा है। सबसे बड े लोकतंत्र में लोगों के पास कोई विकल्प नहीं है। चोट्‌टों की फौज खड ी है उनमें से या तो उनको उसे चुनना है जो कम चोर है या फिर उसे चुनना है जो उनकी जाति और धर्म की बात करता है। २१वीं सदी में भी हम जाति और धर्म के आधार पर वोट डाल रहे हैं। आज ऐसा कोई नहीं जो देश की बात करे, जो भारत की बात करे। कोई मराठों की बात करता है, कोई तमिलों की, कोई बंगालियों तो कोई तेलंगाना की, कोई दलितों की बात करता है तो कोई ओबीसी। भारत और भारतीयों की बात करने वाला कोई नहीं। अंग्रेजों की डिवाईड एंड रूल का सिद्धांत जस का तस चला आ रहा है। &lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धार्मिक राजनीति बनाम राजनीतिक धर्म&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;कुछ राजनीतिज्ञ कह रहे हैं कि बाबाओं का राजनीति में आना ठीक नहीं है। जबकि प्राचीन भारतीय राज व्यवस्था के हिसाब से संतों ने सदा सत्ता का मार्गदर्शन किया। संतों का मार्गदर्शन इसलिए सर्वोच्च और सर्वमान्य था क्योंकि वे बिना किसी स्वार्थ और बिना किसी निजि हित को ध्यान में रखे प्रजा की भलाई के निर्देश देते थे। बाबा रामदेव ने अपना सफर समाज में योग की चिंगारी से किया, जो आज पूरे देश में ज्वाला बनकर जल रही है। गली मोहल्लों के पार्कों में लोग सुबह-सुबह योग करते दिख रहे हैं, स्कूलों ने योग की क्लास को अनिवार्य किया है। ये बाबा रामदेव ही थे जिन्होंने दवा कंपनियों के मकड़जाल से लोगों को छुड ाने के लिए देश को ''दवा मुक्त भारत'' का सपना दिखाया। जो लोग ये मानकर चलते थे कि दवा जीवन का अभिन्न अंग है उनको ये विश्वास दिलाया कि जीवन शैली बदलो और जीवनभर बिना दवा खाए जियो। लोगों ने अपने जीवन में उतारा और सीधा-सीधा लाभ उठाया। बाबा रामदेव ने अब भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना लोगों को दिखाया है। ये कोई धार्मिक उन्माद नहीं है। ये कोई धर्म की राजनीति नहीं है। उनको सभी धर्मों के लोगों को समर्थन प्राप्त है। उन्होंने किसी एक धर्म को दूसरे धर्म के प्रति उकसाया नहीं है। वे सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं। यही कारण है कि धुर-विरोधी संगठन भी एक साथ उनके संग बैठे हैं। उनके साथ ब्यूरोक्रेसी भी है और टेक्नोक्रेसी भी, उनके साथ संत भी हैं और उनका सपना है अखंड भारत, संपन्न भारत और स्वस्थ भारत। और क्योंकि इस सपने को पूरा करने के लिए पॉवर सेंटर्स को हाथ में लेना जरूरी है इसलिए चुनाव लड ना एक मजबूरी है। लोगों को भारत स्वाभिमान से एक बड ी उम्मीद जगी है। भ्रष्ट पार्टियों की फौज में उनको अब एक विकल्प नजर आने लगा है। जो जाति और क्षेत्र की घटिया राजनीति नहीं करता। &lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लोकपाल और भ्रष्टाचार&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;पूरी रैली के दौरान भ्रष्टाचार और विदेश में जमा काले धन को वापस लाने का मुद्‌दा छाया रहा। भ्रष्टाचारियों की नाक में नकेल डालने के लिए ''इंडिया अगेंस्ट करप्शन'' द्वारा तैयार किया गया लोकपाल विधेयक पारित कराने के लिए भी पुरजोर मांग उठाई गई। हमारा सिस्टम ही कुछ ऐसा है कि आम जनता का करोड़ों डकारने के बावजूद भ्रष्ट लोग इस देश में खुले सांड की तरह पूरी ऐश से घूमते हैं। उनका बाल भी बांका नहीं होता। जबकि छोटा सा ट्रैफिक रूल तोड ने पर आम आदमी की हडि्‌डयां तक तोड दी जाती हैं। इस विधेयक का प्रारूप कुछ ऐसा है कि अगर ये पारित हुआ तो भ्रष्टाचारियों की नींद उड जाएगी। कोई भी भ्रष्ट आचरण करने से पहले सौ बार सोचेगा। इस विधेयक को पारित कराने के लिए गांधीवादी अन्ना हजारे ने अप्रैल के प्रथम सप्ताह में ''अनशन'' पर जाने की घोषणा की है। अगर भारत सरकार नहीं चेती तो वे आमरण अनशन पर बैठ जाएंगे। आजादी के ६५ सालों में से ५५ साल तक केंद्र में एक ही पार्टी का राज रहा है। ये वही पार्टी है जिसके साथ महात्मा गांधी के सपने जुड े थे। लेकिन सत्ता महारानी मिलते ही गांधी के अनुयाइयों ने गांधी के विचारों का बलात्कार कर उनकी हत्या कर दी। उन्होंने विश्व को दिखाने के लिए गांधी का मुखौटा लगा लिया। गांधी को ५०० के नोट पर चस्पा कर दिया, भाषण में बोलने के लिए गांधी की उक्तियां रट लीं, लेकिन गांधी के विचारों को न तो अपने जीवन में उतारा और न शासन व्यवस्था में। लोग यहां तक त्रस्त हैं कि ये भी कह दिया जाता है कि इससे तो हम गुलाम ही अच्छे थे। इससे दुखद स्थिति कुछ नहीं हो सकती। &lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;a href="https://lh6.googleusercontent.com/-e3P0MMx96uk/TYHWZKCAY-I/AAAAAAAAAT0/QG90Y5N9CVw/s1600/delhi1.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="228" r6="true" src="https://lh6.googleusercontent.com/-e3P0MMx96uk/TYHWZKCAY-I/AAAAAAAAAT0/QG90Y5N9CVw/s320/delhi1.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;अनुयायियों पर है जिम्मेदारी&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;/div&gt;बाबा रामदेव देश के लिए जो सपना लेकर चल रहे हैं, उसको पूरा करने में भारत स्वाभिमान ट्रस्ट और उनके अनुयायियों पर महत्वपूर्ण भूमिका है। जो शुद्ध भावना बाबा रामदेव लेकर चल रहे हैं, वही शुद्ध भाव उनके अनुयायियों को भी अपनाना होगा। अगर यहां भी पद का लोभ और चुनावी टिकट की लालसा हिलोरें मारने लगी तो यहां भी हाल वही होगा जो गांधी और कांग्रेस का हुआ। सभी के समक्ष केवल एक ध्येय होना चाहिए कि ''राष्ट्र प्रथम बाद में हम''। किसी भी महान विचार को सबसे ज्यादा नुकसान उसके विरोधी नहीं बल्कि उसके अनुयायी पहुंचाते हैं। चाहे वह गांधी का विचार हो या संघ का विचार। गांधी की कांग्रेस ने सत्ता मिलते ही गांधी के जीवन और उनके विचार को छोड़ दिया। भाजपा ने भी सत्ता मिलते ही संघ के भारतीय मॉडल को भुला दिया और फाइव स्टार कल्चर अपना लिया। सात साल के अंदर ही भाजपा घुटनों पर आ गई। अब वही भारतीय विचार बाबा रामदेव लेकर आए हैं। उनके लाखों-करोड ों अनुयायी हैं, लेकिन देखना ये होगा कि जब सही समय आएगा तब वे बाबा रामदेव के विचारों का खयाल रखते हैं कि नहीं।&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;एकला चलो&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;a href="https://lh4.googleusercontent.com/-EAri9H7UbSc/TYHWSwirV5I/AAAAAAAAATw/RD37IjV1PEw/s1600/340x245.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="230" r6="true" src="https://lh4.googleusercontent.com/-EAri9H7UbSc/TYHWSwirV5I/AAAAAAAAATw/RD37IjV1PEw/s320/340x245.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;भारत स्वाभिमान को बस इतना खयाल रखना है कि किसी भी राजनीतिक दल से हाथ नहीं मिलाना है। क्योंकि सब के सब चोर हैं। कोई ज्यादा चोर है तो कोई कम चोर है और सबके सब घबराए हुए हैं। उनकी कोशिश भी रहेगी, कि भारत स्वाभिमान के साथ हाथ मिला लिया जाए। अगर देश को लूटने वाले इन दलों के साथ भारत स्वाभिमान ने हाथ मिला लिया गया तो फिर कोई फर्क नहीं रह जाएगा। केवल गुरुदेव की ''एकला चलो'' की नीति अपनानी होगी।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7079008157695611591-6300373906674750976?l=apnasamaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnasamaj.blogspot.com/feeds/6300373906674750976/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://apnasamaj.blogspot.com/2011/03/blog-post_17.html#comment-form' title='0 Comments'/><link
