बुधवार, 2 अप्रैल 2008

काम


वो काम भी क्या काम है, जो थोड़ा भी आराम न दे।
खुशियाँ भले ही दे न दे, थोड़ा सा अहतराम तो दे।
समय किसी से मिलने का , दो घड़ी किसी की सुनने का।
मेरी राह तकने वालों को, कोई मेरा पैगाम तो दे।


वो जीवन भी क्या जीवन है, जो भाव शून्य हो चला सुनो।
हर तरफ़ झूठ का रेला है, कैसे इक सत्य की राह चुनो।
बाज़ार बना है जग सारा, बजारू सारे मंज़र हैं।
दिल में मुह में दो बातें हैं, सच्चे की कुछ पहचान तो दे।


मिलावटः समाज में घुल रहा एक धीमा जहर

खाद्य पदार्थों में मिलावट की समस्या सतही तौर पर भले बहुत गंभीर नहीं दिखती हो, लेकिन मिलावटखोरी का बाजार देश में गहराई तक फैला हुआ है। धन कमा...