Monday, November 9, 2015

क्यों जरूरी थी भाजपा के लिए ये हार?


दिल्ली के बाद बिहार में मिली दूसरी करारी हार भाजपा के लिए जरूरी हो गई थी। दिल्ली से कोई सबक न सीखकर केवल हवाई माहौल में जीत के सपने संजोना और एकजुटता के अभाव में केवल धन के दम पर चुनावी मैदान में उतर जाना भाजपा को भारी पड़ गया। ये हार एक जड़ी की तरह भाजपा को 2014 की जीत की तंद्रा से जगाने का काम कर सकती हैं। 2014 की संसद विजय और उसके बाद महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्म-कश्मीर की जीत से संगठन में कहीं न कहीं ये मुगालता हो गया था कि प्रधानमंत्री मोदी की करिश्माई छवि को बार-बार भुनाकर वह हर चुनाव अपने हक में कर लेगी। भाजपा केंद्र में कितना भी अच्छा काम क्यों न कर ले, जमीन पर उसकी राह अभी उतनी आसान नहीं है, जितनी रैलियों में भीड़ देखकर उसको लगने लगती है।

हार के कारण
अहंकारः रामचरितमानस में एक चैपाई है- नहिं कोउ अस जनमा जग माही, प्रभुता पाहि जाहि मद नाही। भाजपा के नेता कितनी भी धर्म और आध्यात्मिकता की बातें क्यों न करते हों किंतु सत्ता और पद अच्छों-अच्छों के अंदर अहंकार का स्फुरण कर ही देती है। लोकसभा और कई राज्यों में विजय प्राप्त करने के उपरांत भाजपा संगठन से आने वाली अहं की गंध कोई साधारण व्यक्ति भी आसानी से संूघ सकता है। एक महिला पत्रकार तो टीवी चैनल पर ये तक कहती नजर आईं कि भाजपा नेता अब सीधे मुंह बात नहीं करते थे, इसलिए बिहार में इनका हारना जरूरी था। करोड़ों रुपये खर्च कर बिहार को हाथ से गंवाकर भी अगर ये अहं न गया तो फिर हारना ही उचित है।

फाइव स्टार कल्चरः हमने कितना भी आर्थिक विकास क्यों न कर लिया हो, लेकिन ये एक विकराल सत्य है कि देश में अभी भी गरीबी और बेरोजगारी है। देश में 70 प्रतिशत आबादी मध्यम वर्ग से ही ताल्लुक रखती है। ऐसे में किसी पार्टी द्वारा फाइव स्टार कल्चर का अपनाना आम लोगों के गले नहीं उतरता। शुरुआती दिनों में सादगी की बात करने के बाद धीरे-धीरे भाजपा फाइव स्टार संस्कृति की ओर लौटती दिख रही है। चुनाव के दौरान चार्टर्ड प्लेन और कारपोरेट हाउस के हेलीकाॅप्टरों का प्रयोग धड़ल्ले से देखा गया। ठहरने के लिए पटना के बड़े-बड़े होटलों को चुना गया। लालू ये बात अच्छी तरह समझते हैं, भले ही उन पर करोड़ों के घोटालों का आरोप हों, लेकिन जनता के बीच लालू अपना देसी अंदाज नहीं छोड़ते, जो उनको सीधे आम लोगों से जोड़ता चला जाता है। जबकि भाजपा के नेता आम जनों और यहां तक कि अपने कार्यकर्ताओं से भी कटे-कटे दिखते हैं। ऊंचा ओहदा पाकर नीचे वालों की याद न आए तो फिर हारना ही उचित है।

अत्यधिक धन का प्रयोगः यूं तो चुनाव में पैसा बहुत जरूरी है, लेकिन सिर्फ पैसे के दम पर या फिर धन के अश्लील प्रदर्शन से चुनाव नहीं जीता जा सकता। अत्यधिक प्रचार कब दिशा भटक कर वोटर को चिढ़ाने का काम करने लगे पता नहीं चलता। ये बात हर कोई कह रहा है कि भाजपा ने बिहार में अपने हाईटेक प्रचार के लिए पानी की तरह पैसा बहाया। यहां तक कि पार्टी विद ए डिफरेंस पर टिकट बेचने के भी आरोप लगे, आरोप ये भी लगे कि भाई-भतीजों और रिश्तेदारों को भी टिकट बांटने में प्राथमिकता दी गई। अगर आदर्शों की बात करने वाली पार्टी में इस तरह की गिरावट थी, तो उसका हारना उचित था।

प्रशांत किशोर का जानाः किसी भी घुटे हुए राजनीतिज्ञ के मन में ये बात अनायास ही आ सकती है कि जिन लोगों का सारा जीवन और चिंतन राजनीति का पर्याय बन गया हो उनको 35-36 साल के लड़कों की टीम क्या राजनीति करना सिखा सकती है? लेकिन प्रशांत किशोर के नेतृत्व में इन्हीं नौजवानों ने नरेंद्र मोदी के लिए 2012 में गुजरात चुनाव और फिर 2014 में लोकसभा चुनाव के लिए बकायदा फीस लेकर रणनीति बनाई और विजय भी दिलाई। परखी परखाई इस टीम का भाजपा से अलग होना संगठन के लिए नुकसानदायक सिद्ध हुआ। संगठन ने एक ऐसी व्यक्ति को विरोधी खेमे में जाने दिया जो न केवल आपको जीत दिला चुका था, बल्कि आपके भेद और काम करने की शैली से भी भली-भांति परिचित था। प्रशांत की टीम को जाने देना भाजपा की एक बड़ी रणनीतिक भूल रही। घर-घर दस्तक हो या नीतीश का प्रेस में जाकर मोदी को जवाब देना, डीएनए के सैंपल दिल्ली भेजना हो या जहरीले बयानों को मुद्दा बनाना, प्रशांत किशोर की टीम ने सोशल मीडिया से लेकर जमीनी स्तर तक भाजपा के हर नहले पे दहला मारा। इसलिए भाजपा का हारना उचित था।

दादरी का दंशः बिहार चुनाव के ऐन वक्त गौमांस को लेकर हुई दादरी की घटना का भाजपा को भारी नुकसान हुआ। विरोधी दल लोगों को ये समझाने में सफल रहे कि भाजपा एक दंगाई पार्टी है। उस पर दिल्ली में हर रोज आयोजित होने वाले पुरस्कार लौटाओ कार्यक्रमों ने आग में घी का काम किया। जबकि भाजपा एक संगठन के तौर पर दादरी और कलबुर्गी के मुद्दे पर प्रदेश सरकारों को घेरने में पूरी तरह विफल रही। एक संगठन के तौर पर भाजपा को निष्पक्ष तौर पर दादरी के मुद्दे पर सपा सरकार को और कलबुर्गी के मुद्दे पर सिद्धरमैया सरकार पर हल्ला बोल देना चाहिए था। किंतु राज्य सभा की मजबूरी के कारण भाजपा ने सपा पर तीखा हमला नहीं किया। जबकि उत्तर प्रदेश के अंदर कानून व्यवस्था का हाल बेहद चिंतनीय स्तर तक पहुंच गया है। पार्टी की राज्य कार्यकारिणी अगर हमलों का उत्तर न दे पाए तो हारना ही उचित था।

आरक्षण का मुद्दाः संघ प्रमुख द्वारा आरक्षण पर दिये गये बयान को लालू यादव ने अपनी छोटे-छोटी सभाओं में ऐसे तोड़-मरोड़ कर पेश किया मानो बिहार में भाजपा सरकार बनते ही आरक्षण व्यवस्था खत्म हो जाएगी। मुस्लिम-यादव वोट तो पहले से ही लालू-नीतीश के पक्ष में था लेकिन आरक्षण का मुद्दा बनने के बाद ओबीसी और एससी का दूसरा बड़ा धड़ा भी उनके पक्ष में चला गया। जबकि भाजपा और संघ अपने स्पष्टिकरण को न तो ठीक से समझा पाए और न ही आरक्षण लागू होने में जो खामियां हैं उनको बता पाए। उसी तरह 15 लाख रुपये वाला एक दूसरा झूठ विपक्ष की ओर से बार-बार प्रचारित किया जाता है। भाजपा आज तक इस झूठ का भांडाभोड़ करने में विफल रही है क्योंकि किसी भी भाषण में नरेंद्र मोदी ने ये नहीं कहा था कि हर भारतीय को काले धन में से 15 लाख रुपये दिए जाएंगे। सिर्फ एक तुलना करके बताया था कि अगर विदेश से काला धन आ जाए तो उसकी मात्रा इतनी ज्यादा है कि हर भारतीय के हिस्से में 15 लाख रुपये आ सकते हैं।

एकाधिपत्यः पिछले 18 महनों में भाजपा के अंदर जिस प्रकार का एकाधिपत्य देखने को मिला जिसमें कुछ नेताओं को छोड़कर अन्यय नेताओं और आम कार्यकर्ता की आवाज कहीं दब रही है। राज्य कार्यकारिणी और स्थानीय नेताओं का कद घटा है। अरुण शौरी का आरोप है कि सिर्फ तीन नेता पूरी पार्टी को चला रहे हैं। ऐसे में जब पार्टी पर हमले होते हैं तो स्थानीय नेता उस एकजुटता से मुकाबला नहीं करते जिसकी इस वक्त सबसे ज्यादा दरकार है। भाजपा के खिलाफ पूरा विपक्ष लामबंद है लेकिन पार्टी के अंदर एकजुटता, अपनत्व और टीम स्प्रिट का बहुत बड़ी कमी नजर आती है। सोशल मीडिया पर चुटकुले यहां तक चल रहे हैं कि दिल्ली और बिहार की हार पर खुद भाजपा नेताओं ने खुशी मनाई। कितनी भी बुद्धिमत्ता हो लेकिन पार्टी चलाना दो-चार लोगों के बस की बात नहीं। भाजपा को अपने मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, सांसदों, प्रदेश अध्यक्षों को भी साथ लेना होगा और सफलता का श्रेय भी बांटना चाहिए।

जहरीले बयानः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछले 18 महीनों के कार्यकाल के दौरान सरकार ने जितने में कदम उठाए हैं उनसे कहीं से कहीं तक भी सरकार की नीयत पर उंगली नहीं उठाई जा सकती। 18 महीनों में हर मोर्चे से अच्छी ही खबरें मिली हैं कोई बहुत बुरी खबर सुनाई नहीं दी। पीएम मोदी की कार्यशैली इतनी सुगठित है कि विपक्ष को आज तक कोई ठोस मुद्दा नहीं मिला। विपक्ष या तो किसी झूठ का प्रोपैगैंडा कर रहा है या फिर बयानों पर राजनीति। भाजपा के अंदर और परिवार से जुड़े अन्य संगठनों के चंद नेताओं द्वारा बार-बार दिए जाने वाले गैर-जिम्मेदाराना बयानों के कारण कई दफा केंद्र सरकार को नीचा देखना पड़ा है। इसके बावजूद जुबानों पर लगाम नहीं कसी गई। माना कि कांग्रेस के भ्रष्टाचार के कारण देश में भाजपा के पक्ष में महौल बना, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था कुछ ऐसी होती है कि अच्छे से अच्छे माहौल की हवा निकलते देर नहीं लगती। बिहार हमारे सामने प्रत्यक्ष उदाहरण है।

क्या करें
सतत प्रयासः जिस तत्परता के साथ मोदी सरकार काम कर रही है, उसकी आधी तत्परता यदि कांग्रेस की कार्यशैली में नजर आती तो कांगे्रस को सत्ता से कोई बाहर नहीं कर सकता था। लेकिन भाजपा के मामले में ऐसा नहीं है, केवल काम करने मात्र से देश में भाजपा की स्वीकार्यता नहीं बढ़ सकती। इसका उदाहरण वाजपेयी सरकार के दौरान भी देखा गया और अब मोदी सरकार के मामले में भी देखा जा रहा है। जिस प्रकार कांग्रेस एक बार सरकार बनने के बार आराम से बैठकर सत्ता चलाया करती थी, वह सुविधा भाजपा को नहीं है। ये बात प्रधानमंत्री मोदी समझते भी हैं, इसलिए वह अपनी उपलब्धियां गिनाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। विश्लेषक कहते भी हैं कि चुनाव बीतने के बावजूद पीएम मोदी की गाड़ी प्रचार मोड में ही चल रही है, लेकिन यह प्रचार मोड भाजपा के लिए जरूरी है। साथ ही इसमें कुछ अन्य प्रयासों का भी समावेश करने की आवश्यकता है, ऐसे प्रयास जो निरंतर सरकार के साथ-साथ कदम ताल करें।

मीडिया सेल की ताकत बढ़ाएंः जब से मोदी सरकार बनी है तब से मीडिया में एक विशेष वर्ग सरकार को नीचा दिखाने के मिशन के साथ पूरी ताकत से जुटा है। कुछ नई न्यूज वेबसाइट ऐसी बनी हैं जो सिर्फ मोदी सरकार की नीतियों और योजनाओं की कमियां उजागर करने के साथ-साथ साम्प्रदायिकता, असहिष्णुता का प्रोपैगंडा आगे बढ़ा रही हैं। इन मीडिया संस्थानों का एक सेट एजेंडा स्पष्ट नजर आता है। हालांकि कुछ न्यूज चैनल और वेबसाइट ऐसी भी हैं जो सरकार की नीतियों की सकारात्मक आलोचना करती हैं या फिर  अच्छे कामों को उजागर करती हैं। किंतु जैसा की मानवीय स्वभाव है कि नकारात्मकता ज्यादा जल्दी बिकती और नजर आती है, लिहाजा सकारात्मक खबरें नकारात्मकता के सामने फीकी पड़ जाती हैं। ऐसे में बहुत जरूरी है कि सरकार अपना मीडिया मैनेजमेंट थोड़ा और दुरुस्त करे। सरकार को अपने मीडिया एडवाइसर सेल में बड़े फेरबदल की आवश्यकता है जो मीडिया माॅनिटरिंग के साथ समय-समय जमीनी हकीकत से रू-ब-रू कराए। एक ऐसे पत्रकारों, लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का समूह जो देश के विभिन्न मुद्दों पर स्वतंत्रता के साथ काम करे।

सोशल इंजीनियरिंग पर ध्यान देंः देश में सबसे पहले ई-गवर्नेंस की शुरुआत चंद्रबाबू नायडू ने आंध्र प्रदेश में की थी। लेकिन प्रदेश को हाई-टेक बनाने के चक्कर में नायडू ने किसानों और समाज के पिछड़े तबकों की अनदेखी कर दी। जिसके कारण उन्हें सत्ता से हाथ धोना पड़ा। अपनी लोकलुभावन योजनाओं के दम पर लंबे समय तक कांग्रेस ने उन्हें सत्ता की दहलीज पर नहीं चढ़ने दिया। अब कहीं जाकर 2014 में नायडू को आंध्र की सत्ता मिल पाई। भाजपा भी देश का तीव्र आर्थिक विकास करने के फेर में किसानों और पिछड़े तबकों की अपेक्षाओं को अनदेखा करती नजर आ रही है। लाख कोशिशों के बावजूद भाजपा की पहचान एक काॅरपोरेट और शहरी पार्टी के तौर पर बन कर रह गई है। भाजपा को अपनी इस कारपोरेट इमेज से बाहर आकर पिछड़ों, किसानों और गरीबों के बीच भी अपनी पहचान बनानी होगी। ये बहुत बड़ा तबका है, केवल कारपोरेट और मध्यम वर्ग के दम पर सरकार चलाना कठिन कार्य है।

अत्यधिक महिमामंडन से बचेंः सरकार की ब्रांडिंग अच्छी बात है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ओवर ब्रांडिंग के घेरे में आते चले जा रहे हैं। विदेशी दौरे पूर्व प्रधानमंत्री भी कम नहीं किया करते थे, लेकिन नरेंद्र मोदी के विदेश दौरों का महिमामंडन कुछ ज्यादा ही हो जाता है। कई बार वह उनका हित करते-करते अहित कर जाता है। अब समय है कि चीजें यथार्थ रूप से जमीन पर होती नजर आएं। हालांकि केंद्र सरकार ने कई योजनाएं ऐसी भी लागू करी जिनका असर सीधे जिला स्तर पर देखने को मिला। फिर भी जिस तरह की सुपर इमेज प्रधानमंत्री की बन गई है, वैसी ही कुछ सुपर-डुपर अपेक्षाएं लोगों के मन में घर कर गई हैं।

महंगाई पर नकेल कसेंः महंगाई एक ऐसा शब्द है जो हर मौसम में चलाया जा सकता है। जनता को हर समय महंगाई ज्यादा ही नजर आती है। लेकिन खाद्य पदार्थों का महंगा होना चिंता का विषय है। दाल-रोटी गरीब आदमी की पहचान है। वही दाल आज आम आदमी के कब्जे से बाहर हो गई। इस तरह की महंगाई पर पर नकेल कसना सबसे ज्यादा जरूरी है। कई बार जमाखोरी के कारण कृत्रिम रूप से महंगाई बढ़ाई जाती है, इस को काबू करने के लिए केंद्र को राज्य के साथ सामंजस्य बैठाना ही चाहिए। इस तरह की महंगाई से न तो कभी किसान का भला होता है और न उपभोक्ता का। इसमें सिर्फ बिचैलिए चांदी कूटते हैं। तीन बेसिक सब्जियां हैं आलू, प्याज और टमाटर, इनके बिना रसोई में कोई भी सब्जी नहीं बन सकती। मंडी माफिया ये बात अच्छी तरह जानते हैं। इसलिए हमेशा इन सब्जियों की कीमतों को कृत्रिम रूप से बढ़ाया जाता है। इसके लिए कोई रास्ता निकाला जाना चाहिए।

Tuesday, November 3, 2015

पंचायत चुनाव बनाम ग्राम स्वराज


इन दिनों जब पूरे देश का ध्यान बिहार के विधानसभा चुनाव और उनके परिणामों पर केंद्रित हैं, ठीक उसी वक्त उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों का जोर है। अभी एक दिन के लिए अपने गांव जाना हुआ तो वहां की दीवारों पर चस्पा पोस्टरों को देखकर आभास हुआ कि देश में किसी भी चीज की कमी हो सकती है पर नेताओं की कमी कभी नहीं होगी। ऐसी-ऐसी चुनावी बिसात बिछाई जा रही हैं कि अमित शाह और लालू यादव भी मात खा जाएं। ऐसी गोटियां फेंकी जा रही हैं कि पूरी कांग्रेस पार्टी भी पानी मांगने लगे। पिलखुन के नीचे बैठकर ऐसी रणनीति तैयार हो रही हैं जिनको सुनकर बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ शर्म खा जाएं। छोटे-छोटे गांवों में इतनी बड़ी-बड़ी राजनीति खेली जा रही है कि दिल्ली भी लजा जाए। गांव के इस चुनावी माहौल को देखकर अरस्तु के वाक्य पर यकीन होने लगता है- ‘मनुष्य एक जन्मजात राजनीतिक जीव है’। भारत में तो राजनीति रग-रग में बसी है। किसी को छेड़ना भर मात्र है और वो अपने अंदर का पूरा राजनीतिक शास्त्र उड़ेल कर रख देगा। अपने यहां नाई की दुकान से लेकर रेल की बोगी तक, चाय के खोखे से लेकर गांव की चैपाल तक, मंदिर-मस्जिद से लेकर विश्वविद्यालयों तक राजनीतिक शास्त्रार्थ करने के लिए पुरोधा हर वक्त मुफ्त में तैयार मिलते हैं।

परंतु गांधी जी ने जिस ग्राम स्वराज का सपना देखा और दिखाया था वह आज के ग्राम पंचायत चुनाव से कतई मेल नहीं खाता। गांधी जी यदि आज की ग्रामीण राजनीति देख लेते तो शायद पंचायत चुनाव की जगह गांव की जिम्मेदारी एक दरोगा के हवाले करने की सिफारिश करते। उत्तर प्रदेश के अंदर ग्राम पंचायत चुनाव में जीतने के लिए हर वो हथकंडा अपनाया जाता है जिसका नैतिकता के दायरे से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं। पूरे चुनाव के दौरान मांस-मदिरा और सुरा-सुंदरी का प्रचलन अपने उत्कर्ष पर रहता है। इससे भी बात न बने तो बंदूक की गोली अंतिम उपाय के तौर पर काम आती है। यकीन न आए तो जिस दिन से चुनाव घोषित हुए हैं उस दिन से लेकर परिणाम घोषित होने के बीच कितनी चुनावी हत्याएं और हमले हुए इनके आंकड़े आरटीआई से निकलवाकर देखे जा सकते हैं। चुनाव आयोग ने विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान होने वाली हिंसा पर तो काबू पा लिया है, लेकिन पंचायत चुनाव के मौसम में पूरे उत्तर प्रदेश में रंजिशन गोलीबारी और हत्याओं के मामलों में अब भी बेतहाशा वृद्धि दर्ज की जाती है।  

कई जगह पंचायत चुनाव ने ऐसी गहरी रंजिशों की नींव डाली हैं कि पीढि़यां उसका खामियाजा भुगत रही हैं। यूं तो सतत विकास के कारण भी गांव की सामाजिक समरसता प्रभावित हो चुकी है, लेकिन पंचायत चुनावों ने भी गांव के सामाजिक ताने-बाने को पूरी तरह तोड़-मरोड़ दिया है। किसी कवि कि कविता या हिंदी फिल्म में गांव की जो सुनहरी तस्वीर पेश की जाती है, गांव दरअसल ठीक उसके विपरीत हैं। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाज का सटीक चित्रण श्रीलाल शुक्ला के उपन्यास ‘राग दरबारी’ में ही देखने को मिलता है। देश के आर्थिक विकास के साथ जब से पंचायतों को मोटा धन मिलना शुरू हुआ है, तब से उत्तर प्रदेश में सभी पंचायती प्रतिनिधित्व वाले पद सिर्फ भ्रष्टाचार के गढ़ बन कर रह गए हैं। ग्राम प्रधान बनते ही गांव की उन्नति हो न हो पर उस व्यक्ति की उन्नति निश्चित है जो उस पद पर शोभायमान है।

हो सकता है इसी पंचायती राज व्यवस्था के कुछ सकारात्मक पहलू भी हों या फिर कुछ गांवों ने इसी व्यवस्था के तहत विकास किया हो। लेकिन मेरा निजी अनुभव यही कहता है कि उत्तर प्रदेश के अंदर पंचायती राज व्यवस्था अधिकांश गांवों के अंदर राजनीतिक सड़ांध पैदा कर रही है। ऐसी सड़ांध जो ग्रामीण जीवन के लिए एक अभिशाप से कम नहीं। पंचायतों में महिलाओं को जबरदस्त आरक्षण देकर हम दिल्ली में दो-चार महिला सरपंचों को सम्मानित कर महिला सशक्तिकरण का ढोल भले ही पीटें, लेकिन 99.99 प्रतिशत मामलों में महिला सरपंच अपने पति के आधीन होकर ही चलती हैं। सिर्फ कागजों पर विश्व को दिखाने भर के लिए इस प्रकार का महिला सशक्तिकरण क्या सचमुच देश और समाज के हित में होगा। महात्मा गांधी ने जरूर ग्राम स्वराज की परिकल्पना देश के समक्ष रखी थी, लेकिन हम अपने दिल पर हाथ रख कर बता दें कि क्या वर्तमान पंचायती राज व्यवस्था सचमुच गांव के हित में है। जहां ग्राम प्रधान और स्कूल प्रधानाचार्य मिलकर बच्चों का भोजन डकारने की मानसिकता रखते हों भला ऐसा पंचायती राज समाज के किस काम का?

अन्ना हजारे के गांव रालेगण सिद्धि और उनके प्रभाव वाले आसपास के कुछ गांवों में पंचायत चुनाव नहीं होते, बल्कि आम राय से निर्विरोध तरीके से पदों पर नियुक्ति की जाती है। और फिर अन्ना के दिए गए सूत्रों के अनुसार गांव का विकास किया जाता है, जिसमें शराब बंदी, बालिका शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, जननी सुरक्षा, शाकाहार, अहिंसक जीवन जैसे मूल्यों को आधार बनाया गया है। उन्होंने अपने गांव में एक ऐसा स्कूल भी खोला है जिसमें दूसरे स्कूलों में फेल हुए बालक-बालिकाओं को पढ़ाया जाता है। साथ ही उत्तम भोजन भी प्रदान किया जाता है। कुछ ऐसे ही मापदंडों पर यदि देश के अधिकांश गांव आगे बढ़ते हैं तब कहीं गांव में सुधार की शुरुआत होगी अन्यथा खानापूर्ति के लिए पंचायती राज व्यवस्था हम अपने कंधों पर ढोते रहेंगे। अंतिम बात, राजनीति जब राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ही हो तो बेहतर है, लेकिन जब ये आपके गांव और घर में घुसने लगे तो बेहद घातक सिद्ध होती है।

Friday, June 5, 2015

गोलगप्पों में मिलावट-ए-टट्टी!

गोलगप्पे में टट्टी की मिलावट वाली खबर ने तो दिल ही तोड़ दिया। सच्ची! भला ये भी कोई चीज हुई मिलावट करने के लिए। शुक्ला जी को तो जिस दिन से इस खबर का पता चला है सन्नाटे में आ गए हैं। अजीब सा मौन पसरा हुआ है उनके चेहरे पर। जीवन में उन्होंने कोई ऐब या शौक नहीं पाला, शुद्ध शाकाहारी एवं ऐबरहित। बस गोलगप्पा ही उनका सबसे बड़ा ऐब और कमजोरी था। थकते नहीं थे, गोलगप्पों का बखान करते हुए। दिल्ली के कोने-कोने के गोलगप्पों का रसपान कर चुके थे। कहां-कहां कितने प्रकार के पानी के साथ गोलगप्पे खिलाए जाते हैं, सबकी फेहरिस्त उन्हें जुबानी याद थी। इसमें भी लाजपतनगर के गोलगप्पों के तो वो दीवाने थे। वैसे भी चाट के नाम पर गोलगप्पे ही उनके स्वास्थ्य पर विपरीत असर नहीं डालते थे, सुपाच्य पानी के साथ वसारहित भोज। चाट की दुकान पर ये जो टिक्की होती है न, बहुत नामुराद चीज होती है। एक तो आलू और वो भी सर से पांव तक घी में तला हुआ। घी मिलावटी हुआ फिर तो गई सेहत पानी में। सो, शुक्ला जी ने चाट की दुकान पर केवल गोलगप्पे के साथ ही अपना नाता जोड़ा था। बाकी किसी भी चाट की ओर वह आंख उठाकर भी नहीं देखते थे। अब जब एक गोलगप्पा ही खाना है, तो भला चार-पांच की संख्या में क्या खाया जाए, 15-20 से कम में शुक्ला जी का काम नहीं चलता था। जी भर के खाने के बाद जो जलजीरे वाली डकार आती, अहो! क्या कहने उसके। सचमुच दिव्य अनुभूति। अलौकिक। शुक्ला जी का वश चलता तो गोलगप्पों को ‘राष्ट्रीय खाद्य पदार्थ’ घोषित करवा देते।

गोलगप्पों के बिना अपने समाज की परिकल्पना अधूरी है। न जाने कितनी ही फिल्मों में गोलगप्पों का सीन फिल्माकर उनके महत्व का बखान किया गया है। कंगना की ‘क्वीन’ फिल्म गोलगप्पे वाले सीन के बिना अधूरी है। रब ने बना दी जोड़ी में भी शाहरुख और अनुष्का गोलगप्पे खाते हुए कितने अच्छे लगे हैं। पर गोलगप्पे में भी मिलावट हो सकती है, ये तो शुक्ला जी ने कभी सोचा ही नहीं था। मिलावट का स्कोप ही कहां है। आखिर इनमें होता ही क्या है, पानी के सिवा। लेकिन अखबारों की कतरनें चिल्ला-चिल्ला कर कह रही हैं, गोलगप्पों में मिलावट है, और वह भी ऐसी चीज की कि पूछो मत। मन घिनिया गया है उनका। पहले शुक्ला जी गोलगप्पे खाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते थे। आॅफिस से घर वापस लौटते वक्त दो-चार पत्तों पर हाथ साफ करना उनको दिन भर की थकान से आराम देता। पर जिस दिन से मिलावट वाली मनहूस खबर पढ़ी है, उस दिन से उनकी आंखें सिर्फ दूर से गोल-गोल गोलगप्पों को देखकर मन ही मन उनका स्वाद ले लेती हैं। उनके और गोलगगप्पों के बीच उनका दिमाग दीवार बनकर खड़ा हो जाता है। हालांकि, उनके दिल का एक कोना अब भी ये मानने को तैयार नहीं कि गोलगप्पे में टट्टी जैसी निकृष्ट चीज की मिलावट है।

आजकल अकेले में शुक्ला जी यही सोचकर अपने आपको समझाते हैं- ‘‘हो न हो ये झूठी खबर है, जो अखबारों के माध्यम से अपने समाज में फैलाई गई है। दिल्ली में सड़क किनारे चाट बेचने वालों पर कराया गया ये सर्वे हो न हो एक पेड सर्वे है। ये बड़े-बड़े रेस्तरां वाले छोटे दुकानदारों की रोजी खाना चाहते हैं। ठेले वालों ने सस्ते दाम में लजीज चाट परोसकर इन बड़े-बड़े रेस्तरां वालों के सामने खतरा पैदा कर दिया होगा। तभी ऐसा सर्वे कराने की नौबत आई होगी। ताकि सारी भीड़ सड़क पर खाना बंद कर दे और रेस्तरां चल निकलें। अरे हां! रेस्तरां के बिलों पर सर्विस टैक्स भी तो बढ़कर 14 परसेंट हो गया है, इससे तो उनके यहां भीड़ और कम हो जानी है। तभी ससुरों ने ये चाल चली है। अब भला जो मजा 10 रुपये के पांच खाने में है, वो 50 रुपये में पांच खाने में कैसे आ सकता है। उस पर 14 परसेंट सर्विस टैक्स भी दो। भाड़ में जाएं ये रेस्तरां वाले। वैसे तो मल विसर्जन के बिना दिन की शुरुआत हो ही नहीं सकती, जीवन का सबसे बड़ा सत्य है मल। पर गोलगप्पों में मिलावट ही दिखानी थी, तो किसी और चीज की भी दिखा सकते थे, टट्टी की मिलावट क्यों दिखाई। छिः छिः छिः। औक!’’

Saturday, May 23, 2015

परिधानों में भारत के प्रधानमंत्रीः गुलाब के फूल से लेकर सूट-बूट तक

राहुल गांधी द्वारा दिया गया ‘सूट-बूट की सरकार’ का जुमला मोदी सरकार के मंत्रियों को खिजाने का काम कर रहा है। इसके जवाब में सरकार को ‘सूझ-बूझ की सरकार’ बताया जा रहा है और यूपीए की सरकार को ‘झूठ-लूट की सरकार’। आजादी के बाद सभी भारतीय प्रधानमंत्रियों का अपना स्टाइल स्टेटमेंट रहा है। जब पद इतना शक्तिशाली हो तो हाकिम की साधारण चाल भी एक अंदाज बन जाती है। इसीलिए जवाहरलाल नेजरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक भारत के सभी प्रधानमंत्रियों का अंदाज पहले मीडिया और फिर जनता के बीच हमेशा चर्चा का विषय रहा। लेकिन पीएम मोदी को वह सूट भारी पड़ गया जिस पर उनका नाम लिखा हुआ था। हालांकि वह सूट उपहार में मिला हुआ था, पर किसी कलमकार ने खोजते-खोजते उसके तार होस्नी मुबारक के सूट से जोड़े और फिर उसी की कीमत से मोदी के सूट की कीमत का आंकलन कर लिया कि वह नामधारी सूट साढ़े दस लाख रुपये का है। लेकिन क्या प्रधानमंत्री का पहनावा ऐसी चीज है जिसकी चर्चा संसद में की जाए? सूट-बूट का तंज अगर राहुल बार-बार प्रयोग करेंगे तो इसके तार आखिरकार उनकी दादी और पर नाना की वार्डरोब तक पहुंच सकते हैं। अगर इंदिरा और नेहरू के कपड़ों की डिटेल निकलवाई गई तो वह पीएम मोदी की वार्डरोब से हल्की तो कतई नहीं निकलेगी। जो सबसे स्टाइलिश प्रधानमंत्री भारत को मिले उनमें नेहरू और इंदिरा गांधी का ही नाम आता है। इन दोनों ही प्रधानमंत्रियों ने अपना स्टाइल उस दौर में मेनटेन किया जब भारत के पास बहुत बड़ी आबादी का पेट भरने के लिए अनाज भी नहीं था। लिहाजा कपड़ों से हटकर काम पर ही नजर रखी जाए तो बेहतर होगा, क्योंकि बात अगर निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। खैर ‘सूट-बूट’ के बहाने एक नजर डालें भारत के कुछ लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों के ड्रेसिंग सेंस परः

जवाहरलाल नेहरू
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को देश का सबसे स्टाइलिश और वेल ड्रेस्ड नेता के रूप में जाना जाता है। उनके नाम पर ही कुर्ते पर पहने जाने वाली बंद गले की जैकेट का नाम ‘नेहरू जैकेट’ और ‘जवाहर कट’ पड़ गया। नेहरू अपने कपड़ों और स्टाइल को लेकर काफी सजग रहते थे। देश के गांव-गलियों में यह भी मशहूर है कि नेहरू अपने कपड़े लंदन से खरीदते थे, पेरिस में सिलवाते थे और ड्राइक्लीन के लिए भी पेरिस भेजते थे। उनकी शेरवानी और उस पर लगा गुलाब का फूल उनकी पहचान और स्टाइल बन गया था। राष्ट्र कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने गुलाब को संबोधित करते हुए ‘कुकरमुत्ता’ कविता लिखी थी। कहा जाता है कि ये कविता नेहरू की नीतियों पर निराला का परोक्ष रूप से हमला था। कविता की कुछ पंक्तियां कुछ इस प्रकार हैंः

अबे सुन बे गुलाब,
भूल मत जो पाई खुशबू, रंगोआब,
खून चूसा तूने खाद का अशिष्ट,
डाल पर इतरा रहा है कैपिटलिस्ट....

इंदिरा गांधी 
भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बारे में तो कई लेखकों ने लिखा है कि Indira always dressed to kill. इंदिरा गांधी का ड्रेसिंग सेंस बेहद आकर्षक था। इंदिरा गांधी ने उस दौर में अपने बालों के साथ प्रयोग किया जब भारतीय महिलाओं की केवल चोटी और जूड़े में ही स्वीकार्यता था। इंदिरा ने उस समय अपने बाल कटवाकर भारतीय महिलाओं के सामने एक नई छवि पेश की जब बाॅलीवुड की नायिकाएं भी जूड़े और चोटी में ही दिखती थीं। इंदिरा के हेयर स्टाइल को देश की तमाम महिलाओं के बीच लोकप्रिय हुआ। इंदिरा गांधी की साडि़यां हों या फिर विदेश यात्राओं के दौरान उनका लांग कोट हमेशा लीग से हटकर और खास होते थे। इंदिरा अवसर के अनुसार ही अपनी साडि़यां पहनती थीं। देश के किसी दूर-दराज के गांव में कभी वे बेहद सादगी भरी खादी की साड़ी में नजर आतीं तो अपनी विदेश यात्राओं में सिल्क साड़ी और लांग कोट में दिखतीं। उनके दौर के कई पत्रकारों ने लिखा है कि इंदिरा की साडि़यां किसी भी पुरुष राष्ट्राध्यक्ष के सूट-बूट के सामने इक्कीस होती थीं। इंदिरा गांधी अपने ड्रेस और प्रेजेंटेशन को लेकर काफी सजग रहतीं थी। अपने जीवन के अंतिम दिन भी वह बीबीसी को इंटरव्यू देने के लिए तैयार होकर जा रही थीं। इस दौरान जब उन्होंने एक टी-सेट को देखा तो उसे बदलने की सलाह दी। इससे यही पता चलता है कि वह छोटी-छोटी चीजों में भी प्रेजेंटेशन पर पैनी नजर रखती थीं।

राजीव गांधी 
भारत के सबसे युवा और स्मार्ट प्रधानमंत्री का गौरव अभी तक राजीव गांधी को ही प्राप्त है। राजीव गांधी तीन-चार तरह के परिधानों में नजर आते थे। औपचारिक कार्यक्रमों में राजीव बंद गले का जोधपुरी सूट पहनते थे, जबकि साधारणतया वह कुर्ता-पयजामा में ही दिखतेे। उन्होंने शाॅल को क्राॅस करके एक हाथ के नीचे से निकालकर पहनने का नया अंदाज निकाला था। राजीव के अभिन्न मित्र रहे अमिताभ बच्चन आज भी राजीव गांधी के स्टाइल में शाॅल पहनना पसंद करते हैं। धूप में निकलते वक्त राजीव रे-बैन का चश्मा भी पहना करते थे। जबकि अमेठी दौरे पर वह बेहद इन्फाॅर्मल होकर वहीं के अंदाज में अपने गले में गमछा भी डाल लिया करते थे।

अटल बिहारी वाजपेयी 
भाजपा के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पहनावा काफी सादगी भरा था। देश में वह अपनी चिर-परिचित कुर्ता धोती और जैकेट पहनते थे, तो विदेश यात्राओं पर वह बंद गले का जोधपुरी सूट पहना करते थे। हालांकि प्रधानमंत्री वाजपेयी कुर्ता-धोती के साथ जो जैकेट पहनते थे, वह जरूर अलग थी। वाजपेयी बंद गले की जगह गोल गले की जैकेट पहनना पसंद करते थे, जो उनके पहनावे की पहचान बन गई। साथ ही वाजपेयी के ज्यादातर कुर्तों की आस्तीनों में बटन भी लगे होते थे।

लालकृष्ण अडवाणी
भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण अडवाणी जब भारत के उप प्रधानमंत्री थे तब भारत यात्रा पर आए अफगानिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति हामिद करजई ने कई बार उनके द्वारा पहने जाने वाली जैकेट की तारीफ की थी। अमूमन सादगी पूर्ण अंदाज में रहने वाले भाजपा नेता लालकृष्ण अडवाणी की जैकेट में ऊपर की ओर तीन बटन लगे होते हैं। यही सिलाई उनकी जैकेट को बाकियों से अलग बनाती है। आखिरकार हुआ यह की हामिद करजई जब अगली बार भारत की यात्रा पर आए तो अडवाणी जी ने उन्हें चार जैकेट खासतौर से सिलवाकर उपहार में दी।

Wednesday, May 13, 2015

चुनाव जो इतिहास रच गया (भाग-4): टूट गया मुस्लिम वोट बैंक का तिलिस्म

16वीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव के जब 16 मई 2014 को परिणाम सामने आए तो वे अविस्मरणीय और हतप्रभ करने वाले थे। 16 मई की तिथि इतिहास में इस तरह दर्ज हो गई कि जब-जब बदलाव पर चर्चा होगी तो इस तिथि का जिक्र आएगा। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार किसी गैर कांग्रेसी दल को बहुमत देकर भारतीय मतदाताओं ने अपने वोट की ताकत का अहसास करा दिया। मतदाताओं ने न केवल एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार दी बल्कि इन परिणामों के माध्यम से देश के राजनीतिज्ञों को कई छिपे हुए संदेश भी दे दिए। जिस सुंदर राष्ट्र का सपना सड़क से लेकर संविधान तक आम लोगों को दिखाया जाता रहा, अब जनता उसे हकीकत में तब्दील होते देखना चाहती है। इसी उम्मीद के साथ देश के जनमानस ने नरेंद्र मोदी में अपनी आस्था दिखाई और उनके हाथ में एक मजबूत सरकार की बागडोर सौंप दी। उस ऐतिहासिक चुनाव परिणाम की पहली वर्षगांठ पर एक पुनरावलोकलनः
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देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी ने 2014 की ऐतिहासिक करारी हार के कारणों को तलाशती रिपोर्ट तैयार करने के लिए अपने वरिष्ठ नेता एके एंटनी को जिम्मेदारी सौंपी। जैसा कि एंटनी की ईमानदार छवि है, उन्होंने उसी के अनुसार हार का एक ईमानदार विश्लेषण कांग्रेस आलाकमान के सामने रखा। उनकी रिपोर्ट में पार्टी की हार का जो प्रमुख कारण सामने आया वो था कांग्रेस द्वारा जरूरत से ज्यादा ‘माइनाॅरिटी पालिटिक्स’ का कार्ड खेलना। एंटनी पैनल को लगा कि कांग्रेस द्वारा बहुत ज्यादा ‘अल्पसंख्यकवाद’ को बढ़ावा देने के कारण देश के बहुसंख्यक समाज में कहीं न कहीं ये संदेश चला गया कि कांग्रेस हिंदू विरोधी है और इस कारण हिंदू वोट का भाजपा की तरफ जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ, जिसका कांग्रेस को भी अंदाजा नहीं था।

‘फूट डालो राज करो’
दरअसल, अंग्रेजों ने जिस ‘फूट डालो राज करो’ की नीति पर चलकर भारत पर राज किया, आजादी के बाद वही नीति हमारे राजनीतिज्ञों की भी पथ प्रदर्शक बनी। पार्टियों ने जातियों में बंटे हिंदू समाज को जाति के आधार पर और ज्यादा बांटा और अल्पसंख्यकों को एक ठोस वोट बैंक की तरह प्रयोग किया। अमूमन सभी राजनीतिक पार्टियां इस नीति का अनुसरण करती दिखीं। योजनाएं बनाने से लेकर नीतियां गढ़ने तक जाति और धर्म व जाति आधारित राजनीति को दिमाग में रखा गया। देश की आने वाली पीढि़यां राजनीतिक विज्ञान की किताबों में ये पढ़कर अपना माथा पीटा करेंगी कि भारतीय राजनीति में सत्ता हथियाने के लिए ‘अजगर’ (अहीर, जाट, गुर्जर, राजपूत) और ‘मजगर’ (मुस्लिम, अहीर, जाट, गुर्जर, राजपूत) जैसे समीकरणों का सहारा लिया गया।

एकजुट होता समाज
भारत की अधिकांश राजनीतिक पार्टियां यही मानकर चल रही थीं, कि जातियों में बंटा हिंदू समाज कभी संगठित होकर वोट कर ही नहीं सकता। जबकि अल्पसंख्यक समाज एक तरफा वोट डाल सकता है। कांग्रेस से लेकर कई क्षेत्रीय पार्टियों ने इस फाॅर्मूले का फायदा उठायाः ‘कुछ हिंदू जातियां + एकमुश्त अल्पसंख्यक वोट = जीत’। मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी ने इसी फाॅर्मूले के दम पर कई बार यूपी की सत्ता पर कब्जा किया। जबकि मायावती की बहुजन समाज पार्टी द्वारा दलितों को अपना ठोस वोट बैंक बना कर, बड़ी संख्या में मुस्लिमों को टिकट बांटना इसी रणनीति का हिस्सा है। जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एकजुट हिंदू समाज की बात करता है तो इसके पीछे भी कहीं न कहीं इस एकजुटता को सत्ता की चाभी में तब्दील करने की दूरगामी दृष्टि है, जिसकी एक बानगी 2014 के लोकसभा चुनाव में नजर आई। उत्तर प्रदेश में मोदीमय भाजपा के पक्ष में ऐसा जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ कि ऐसे-ऐसे लोग सांसद बनकर दिल्ली पहुंच गए जिनके सपने में भी जीत के आसार नहीं थे। ध्रुवीकरण का असर इतना गहरा था कि कि बसपा का परंपरागत दलित वोट भी उससे छिटक गया। 

फेल हुआ फाॅर्मूला
2014 लोकसभा चुनाव परिणामों की विशेषता यह भी रही कि इस बार जीत का ये परंपरागत फाॅर्मूला पार्टियों के काम नहीं आया। ‘जिधर हम हैं, उधर जीत है’ की बात कहकर ताल ठोकने वाले उत्तर प्रदेश के मुस्लिम समुदाय ने 2014 के चुनाव में हर कोण से सोच कर देखा लेकिन कहीं जीत बनती नहीं दिखी। पहली बार हुआ कि यूपी में मुस्लिम वोट भी सपा, कांग्रेस और बसपा के बीच जमकर बंटा। एमआईएम के अध्यक्ष ओवैसी ने एक इंटरव्यू में तंज कसते हुए कहा कि ‘मैं मोदी को इस चीज के लिए बधाई देना चाहता हूं कि उन्होंने मुस्लिम वोट बैंक के मिथक को तोड़ दिया’।

सबका साथ
भाजपा पर भी हिंदूवादी साम्प्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगता रहा है। भाजपा विरोधी पार्टियां साम्प्रदायिकता का हौवा दिखाकर लोगों को डाराने का भी काम करती आई हैं। अयोध्या के राम मंदिर मुद्दे को भाजपा ने जिस तरह से गर्माया उससे इन आरोपों में दम भी दिखाई दिया। लेकिन वही भाजपा जब सत्ता में आई तो सबको साथ लेकर चलने में ही उसे देश की भलाई लगी। भाजपा ने अयोध्या को अपने एजेंडे में रखकर काशी और मथुरा का मुद्दा छोड़ने में देर नहीं लगाई। पहली एनडीए सरकार में भाजपा के पास पूर्ण बहुमत नहीं था, इसलिए सबकी बात करना प्रधानमंत्री वाजपेयी की मजबूरी कहा जा सकता है, लेकिन वर्तमान सरकार में भाजपा के पास पूर्ण बहुमत है फिर भी प्रधानमंत्री मोदी ने ‘सबका साथ और सबके विकास’ की राह पर चलने का प्रण दोहराया। इसलिए मजबूरी न पहले थी न अब है, बल्कि यही भारत की मूल संस्कृति है जो इस देश को हमेशा ये संदेश देती आई हैः 
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्रणिपश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भाग भवेत्।।
(End of Series)