मंगलवार, 19 मई 2026

युवाओं का बदलता मनोविज्ञान: नौकरी से आगे बढ़कर “स्वनिर्माण” की ओर

भारत का युवा एक मानसिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। कुछ वर्ष पहले तक एक अच्छी नौकरी - विशेषकर सरकारी नौकरी या किसी बड़ी कंपनी में स्थायी पद - सफलता का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती थी। परिवारों का मुख्य लक्ष्य भी यही होता था कि बच्चे को सुरक्षित और स्थायी रोजगार मिल जाए। लेकिन आज का युवा केवल नौकरी नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, पहचान, संतुलित जीवन, आर्थिक स्वामित्व और आत्मसंतोष चाहता है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में युवा कुछ वर्षों की नौकरी के बाद अपना व्यवसाय, स्टार्टअप, फ्रीलांस कार्य या डिजिटल उद्यम शुरू करने की ओर बढ़ रहे हैं। यह केवल करियर परिवर्तन नहीं, बल्कि  समाज की मानसिकता का बदलाव है।

एआई और भविष्य की असुरक्षा ने बदल दी सोच

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और ऑटोमेशन ने युवाओं की सोच को गहराई से प्रभावित किया है। आईटी, कंटेंट, डिज़ाइन, डेटा एनालिटिक्स और अनेक कॉर्पाेरेट क्षेत्रों में यह स्पष्ट दिखने लगा है कि आने वाले समय में कई पारंपरिक नौकरियाँ बदल जाएँगी या सीमित हो जाएँगी।

युवाओं को लगने लगा है कि केवल नौकरी पर निर्भर रहना भविष्य में पर्याप्त सुरक्षित नहीं होगा। इसलिए दूरदर्शी युवा अब जल्दी ही अपने कौशल, नेटवर्क और स्वयं के कार्यक्षेत्र बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।

पहले लोग 40 वर्ष की आयु के बाद व्यवसाय की ओर सोचते थे, अब 25-30 वर्ष की आयु में ही युवा प्रयोग शुरू कर रहे हैं। वे समझ चुके हैं कि एआई के युग में केवल डिग्री नहीं, बल्कि अनुकूलन क्षमता और स्वनिर्माण ही सबसे बड़ी शक्ति होगी।

महानगरों से छोटे शहरों की ओर बढ़ता झुकाव

भारत में एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन यह भी है कि युवा अब केवल दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु या हैदराबाद जैसे महानगरों को ही अवसर का केंद्र नहीं मान रहा।

महानगरों की वास्तविकता आज यह है-

  • अत्यधिक महंगा किराया,
  • लंबा ट्रैफिक जाम,
  • प्रदूषण
  • तनावपूर्ण जीवन,
  • सीमित बचत,
  • सामाजिक अकेलापन।

अनेक युवाओं को यह महसूस होने लगा है कि बड़ी तनख्वाह के बावजूद जीवन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।

दूसरी ओर टीयर-2 और टीयर-3 शहर बेहतर संतुलन प्रदान कर रहे हैं। इंटरनेट, यूपीआई, ई-कॉमर्स, डिजिटल मार्केटिंग और रिमोट वर्क ने छोटे शहरों से भी व्यवसाय और प्रोफेशनल कार्य करना संभव बना दिया है।

आज इंदौर, जयपुर, लखनऊ, नागपुर, सूरत, देहरादून और कोच्चि जैसे शहर नई संभावनाओं के केंद्र बन रहे हैं। यहां तक कि पहाड़ों में घर लेने का चलन भी बहुत तेजी से बढ़ा है। बहुत बड़ी संख्या में दिल्ली के लोग उत्तराखण्ड और हिमाचल जैसे स्थानों पर घर ले चुके हैं या योजना बना रहे हैं। समाज के मन में कहीं न कहीं यह स्पष्ट हो रहा है कि- “सफलता केवल महानगरों की मोहताज नहीं है।”

भारतीय कार्यसंस्कृति से बढ़ती निराशा

युवाओं के मानसिक बदलाव का एक बड़ा कारण भारतीय कॉर्पाेरेट और पारंपरिक कार्यसंस्कृति भी है। सामान्यतः भारतीय कार्यालयों और पेशेवर संस्थानों में आज भी-

  • अत्यधिक पदानुक्रम,
  • माइक्रो-मैनेजमेंट,
  • सीमित स्वतंत्रता,
  • धीमी पदोन्नति,
  • कम वेतन वृद्धि,
  • और “आदेश पालन” आधारित संस्कृति देखने को मिलती है।

कई युवा यह महसूस करते हैं कि कंपनियाँ कर्मचारियों को साझेदार नहीं बल्कि प्रतिस्थापित संसाधन की तरह देखती हैं।

आज का युवा केवल वेतन के लिए काम नहीं करना चाहता। वह चाहता है-

  • सम्मान,
  • रचनात्मकता,
  • निर्णय लेने की स्वतंत्रता,
  • सीखने के अवसर,
  • और अपने कार्य का वास्तविक प्रभाव।

जब उसे लगता है कि उसकी प्रतिभा का उचित उपयोग नहीं हो रहा, तब वह स्वयं के लिए काम करने की दिशा में सोचने लगता है।

क्या यह भारतीय कंपनियों के लिए चेतावनी है?

यह बदलती मानसिकता भारतीय कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत भी है। पहले स्थायी वेतन और नौकरी की सुरक्षा कर्मचारियों को लंबे समय तक संगठन से जोड़े रखती थी। लेकिन आज का युवा पूछता है-

  • “क्या मैं यहाँ विकसित हो रहा हूँ?”
  • “क्या मेरी क्षमता को पहचान मिल रही है?”
  • “क्या इस कार्य में अर्थ और सम्मान है?”

यदि इन प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक हो, तो युवा नौकरी छोड़ने में देर नहीं करता।

एआई के दौर में केवल बड़ी कर्मचारी संख्या या कठोर व्यवस्थाएँ सफलता की गारंटी नहीं होंगी। आने वाले समय में वही कंपनियाँ आगे बढ़ेंगी जो-

  • नवाचार को बढ़ावा दें,
  • कर्मचारियों को स्वायत्तता दें,
  • लचीली कार्यसंस्कृति अपनाएँ,
  • और प्रतिभा को सम्मान दें।

अन्यथा कंपनियों को प्रतिभा पलायन, कम नवाचार और घटती निष्ठा जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

“स्थिरता” से अधिक “स्वतंत्रता” की चाह

पुरानी पीढ़ी का लक्ष्य था - सुरक्षित जीवन।

नई पीढ़ी का लक्ष्य है - स्वतंत्र और सार्थक जीवन।

कहीं न कहीं युवाओं के मन में यह बात उठती ही रहती है- “यदि संघर्ष करना ही है, तो अपने सपनों के लिए क्यों न किया जाए?”

इसलिए आज व्यवसाय केवल धन कमाने का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह-

  • आत्मसम्मान,
  • पहचान,
  • रचनात्मक संतोष,
  • और जीवन पर नियंत्रण का माध्यम बन गया है।

सोशल मीडिया और स्टार्टअप संस्कृति का प्रभाव

इंस्टाग्राम, यूट्यूब और लिंक्डइन जैसे प्लेटफॉर्म ने युवाओं के भीतर नई आकांक्षाएँ पैदा की हैं। वे लगातार ऐसे लोगों को देख रहे हैं जिन्होंने छोटे स्तर से शुरुआत करके अपनी पहचान बनाई।

स्टार्टअप संस्कृति ने यह विश्वास पैदा किया है कि- “साधारण पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति भी बड़ा परिवर्तन ला सकता है।”

हालाँकि सोशल मीडिया सफलता को अधिक दिखाता है और संघर्ष को कम, फिर भी उसने युवाओं में आत्मविश्वास और जोखिम लेने की मानसिकता को मजबूत किया है।

चुनौतियाँ भी कम नहीं

यह परिवर्तन अवसरों से भरा है, लेकिन चुनौतियों से भी। हर व्यवसाय सफल नहीं होता। आर्थिक अस्थिरता, प्रतिस्पर्धा, मानसिक दबाव और असफलता का जोखिम भी वास्तविक हैं।

इसलिए केवल उत्साह नहीं, बल्कि-

  • कौशल,
  • धैर्य,
  • वित्तीय अनुशासन,
  • और दीर्घकालिक सोच भी आवश्यक है।

भारतीय युवा आज “नौकरी खोजने वाली पीढ़ी” से “अवसर निर्माण करने वाली पीढ़ी” में बदल रहा है। एआई, डिजिटल क्रांति, महानगरों का बढ़ता खर्च, बदलती जीवनशैली और पारंपरिक कार्यसंस्कृति से असंतोष - ये सभी मिलकर एक नई मानसिकता को जन्म दे रहे हैं।

यह परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। आने वाले वर्षों में भारत में ऐसे युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ेगी जो नौकरी करने के साथ-साथ अपना कार्य, अपना ब्रांड और अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने का प्रयास करेंगे।

संभवतः यही परिवर्तन भारत के अगले आर्थिक और सामाजिक युग की सबसे बड़ी शक्ति सिद्ध होगा।

मंगलवार, 12 मई 2026

हिसाब-किताब का पक्का अपना समाज

भारतीय समाज बड़ा अद्भुत है। यहाँ रिश्ते दिल से कम और दिमाग से ज़्यादा निभाए जाते हैं।

दुनिया में शायद ही कोई ऐसा समाज होगा जहाँ “आशीर्वाद” भी डेबिट-क्रेडिट की तरह दर्ज किया जाता हो।

उत्तर भारत की शादी में जाइए, आपको लगेगा कि किसी बैंक की शाखा खुल गई है। एक तरफ मंच पर दूल्हा-दुल्हन मुस्कुरा रहे होते हैं, दूसरी तरफ शामियाने के कोने में एक गंभीर चेहरे वाले चाचा या फूफा जी रजिस्टर लेकर बैठे होते हैं। उनका चेहरा देखकर लगता है मानो देश का बजट वही संभाल रहे हों। 

मेहमान आते हैं। लिफाफा देते हैं।

व्यवहार लिखने वाले इंचार्ज फूफा जी तुरंत पूछते हैं - “क्या नाम है...?”

फिर बड़ी श्रद्धा से लिखा जाता है -

“फलाने जी या ढिमकाने जी - 1100 रुपये।”

कई बार आपका बंद लिफाफा वहीं फाड़कर फेंक दिया जाता है और सबके सामने जोर से बोलकर राशि रजिस्टर में चढ़ाई जाती है। यह कई बार असहज करने वाली स्थिति होती है। शादी के अगले दिन पूरे रजिस्टर का हिसाब जोड़ा भी जाता है और कैश मिलाया जाता है।

सबसे मज़ेदार बात यह है कि यह हिसाब केवल याद रखने के लिए नहीं होता। यह एक प्रकार का सामाजिक निवेश है। आज आपने जितना डाला है, कल उतना ही ब्याज-मुक्त वापस मिलेगा।

किसी के घर शादी पड़े तो वर्षों पुराना रजिस्टर निकाला जाता है। धूल झाड़ी जाती है। फिर पूरा परिवार ऐसे बैठकर हिसाब देखता है जैसे पुरातत्व विभाग कोई प्राचीन शिलालेख पढ़ रहा हो।

“देखो, इनके यहाँ से 2001 आया था...”

“तो हमारे यहाँ से 2100 जाना चाहिए, आखिर इज़्ज़त का सवाल है।”

यानी रिश्ते नहीं, मानो यूपीआई ट्रांजैक्शन का इतिहास चल रहा हो।

और यह परंपरा केवल शादी तक सीमित नहीं। बहू की मुंह दिखाई हो या बच्चे का मुण्डन संस्कार हर आयोजन में जेवर, कैश, गिफ्ट - प्रत्येक लेन-देन का बाकायदा लेखा-जोखा तैयार। कहीं ऐसा न हो कि भविष्य में भावनाओं का बैलेंस गड़बड़ा जाए।

विडंबना यह है कि कार्ड पर छपवाया जाता है - “आपका स्नेह और आशीष ही हमारे लिए सबसे बड़ा उपहार है।” लेकिन अंदरखाने व्यवस्था ऐसी होती है कि स्नेह की पाई-पाई का हिसाब चढ़ा लिया जाता है।

हमारा समाज बड़ा दिलचस्प है। मुंह पर मिठास ऐसी कि रसगुल्ला शर्मा जाए, और दिमाग में हिसाब ऐसा कि चार्टर्ड अकाउंटेंट भी प्रेरणा लेने लगे।

शायद आने वाले समय में चीजें बदलें, लेकिन फिलहाल तो अपने समाज में आपके प्यार और आशीर्वाद का पूरा हिसाब रखा जा रहा है।

रविवार, 26 अप्रैल 2026

धन की भूखः कॉस्ट कटिंग के नाम पर कारों से स्टेपनी गायब

भारतीय संस्कृति की पहचान हमेशा “थोड़ा ज़्यादा देने” में रही है। यहाँ 100 नहीं, 101 देने की परंपरा है—क्योंकि इसमें सिर्फ लेन-देन नहीं, बल्कि अपनापन और सुरक्षा का भाव होता है। दूधवाला माप से थोड़ा ऊपर तक दूध भर देता था, किसान अनाज तौलने के बाद एक मुट्ठी और डाल देता था। यह “एक मुट्ठी ज़्यादा” ही तो विश्वास की असली पूँजी थी।

लेकिन आज के समय में यह भावना जैसे धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। अब बाजार का नया मंत्र है—“कम दो, ज़्यादा लो।” इसे बड़े आराम से “कॉस्ट कटिंग” का नाम दे दिया गया है, ताकि सुनने में आधुनिक लगे, लेकिन असल में यह ग्राहक के हिस्से और सुरक्षा—दोनों की कटौती है।

इस सोच का सबसे चिंताजनक उदाहरण कार कंपनियों में देखने को मिलता है। कभी गाड़ी में मिलने वाली स्टेपनी सिर्फ एक अतिरिक्त टायर नहीं होती थी, बल्कि रास्ते में आने वाली अनिश्चितताओं के खिलाफ एक मजबूत सुरक्षा कवच होती थी। पहले उसका आकार छोटा किया गया, और अब तो कई गाड़ियों से इसे पूरी तरह हटा ही दिया गया है।

Maruti Suzuki Grand Vitara जैसी गाड़ियों में स्टेपनी की जगह अब सिर्फ एक पंचर रिपेयर किट दी जा रही है।

अब ज़रा सोचिए—रात का अंधेरा, सुनसान सड़क, परिवार साथ में… और अचानक टायर फट जाता है। उस वक्त यह छोटी सी पंचर किट क्या कर पाएगी? क्या यह टायर के फटने या कट जाने की स्थिति में आपकी मदद कर सकती है? जवाब साफ है—नहीं।

उस पल में “कॉस्ट कटिंग” नहीं, “सुरक्षा” मायने रखती है। लेकिन जब सुरक्षा को ही कम कर दिया जाए, तो मुनाफे का यह खेल बेहद खतरनाक हो जाता है।

विडंबना यह है कि यही कंपनियाँ अपने विज्ञापनों में “फैमिली सेफ्टी”, “भरोसा” और “केयर” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती हैं। लेकिन असलियत में, सबसे ज़रूरी सुरक्षा कवच को ही हटा दिया जाता है—सिर्फ कुछ रुपये बचाने के लिए।

पहले कहते थे—“थोड़ा ज़्यादा दे दो, ग्राहक खुश रहेगा।”

आज कहा जा रहा है—“थोड़ा कम दे दो, कंपनी ज़्यादा कमाएगी।”

सवाल सिर्फ एक स्टेपनी का नहीं है, सवाल उस सोच का है—जहाँ मुनाफा इंसान की सुरक्षा से बड़ा हो गया है।

अब हमें तय करना है—क्या हम 101 देने वाली संस्कृति को बचाएंगे, या अपना समाज 99 में भी कटौती को चुपचाप स्वीकार कर लेगा?

शनिवार, 22 नवंबर 2025

बिहार विधानसभा चुनाव 2025: शांतिपूर्ण लोकतंत्र का अद्भुत उदाहरण


बिहार, जिसे कभी चुनावी हिंसा और तनाव के लिये जाना जाता था, इस बार लोकतंत्र के इतिहास में एक उल्लेखनीय परिवर्तन का गवाह बना है। हाल ही सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव अब तक के सबसे शांतिपूर्ण चुनाव माने जा रहे हैं। न कोई बड़े पैमाने पर हिंसा, न प्रतिशोध की घटनाएँ—यह अपने आप में बिहार की लोकतांत्रिक परिपक्वता और प्रशासनिक तैयारियों का जीवंत प्रमाण है।

शांतिपूर्ण चुनाव के लिये सभी को बधाई

इस उत्कृष्ट उपलब्धि का श्रेय किसी एक संस्था या समूह को नहीं जाता। यह सामूहिक प्रयास की सफलता है।

  • बिहार की जनता, जिसने धैर्य, अनुशासन और समता के साथ मतदान किया।
  • भारत निर्वाचन आयोग, जिसने व्यापक और प्रभावी व्यवस्था की।
  • बिहार पुलिस और अर्धसैनिक बल, जिन्होंने बिना भय या दबाव के मतदान सुनिश्चित किया।
  • मतदान कर्मी, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपनी जिम्मेदारियाँ पूर्ण निष्ठा से निभाईं।

इन सबके प्रयासों ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि लोकतंत्र केवल मतदान का दिन नहीं बल्कि जनभागीदारी और अनुशासन का महोत्सव है।

राजनीतिक दलों की परिपक्वता

चुनावी भाषणों में भले ही तीखे शब्दों और आरोप–प्रत्यारोपों का दौर चला हो, परंतु परिणाम आने के बाद सभी दलों ने जनादेश का सम्मान किया। इससे यह प्रतीत होता है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच भी बिहार का लोकतंत्र संवाद और स्वीकार्यता की राह पर आगे बढ़ रहा है।

पश्चिम बंगाल के लिये एक सीख

इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का अंधकार अब भी गहरा है। वर्षों से चल रही राजनीतिक हिंसा—चाहे वह हत्याओं के रूप में हो, धमकियों में या आम नागरिकों के रक्तपात में—एक लोकतांत्रिक समाज की आत्मा को चोट पहुँचाती है।


विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक चली विचारधारात्मक राजनीति और जमीन-स्तर पर हिंसा-आधारित सत्ता संरचना इसका मुख्य कारण रही है। आज भारत के किसी अन्य राज्य में इतनी तीव्र और संगठित चुनावी हिंसा नहीं देखी जाती।

साल 2026 में पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले, वहाँ के नेतृत्व और जनता—दोनों को बिहार से सीख लेनी चाहिये। लोकतंत्र में सत्ता बदलने का अधिकार जनता का है, न कि हिंसा और भय का।

मीडिया की चुप्पी और बिहार की अनदेखी उपलब्धि

गौर करने वाली बात यह है कि इतने शांतिपूर्ण चुनाव के बावजूद राष्ट्रीय मीडिया ने बिहार की इस उपलब्धि को शायद ही उचित ध्यान दिया। हिंसा की खबरें सुर्खियों में आती हैं, लेकिन जब कोई राज्य शांतिपूर्ण लोकतंत्र का उदाहरण प्रस्तुत करता है—अक्सर वह अनदेखा रह जाता है।

बिहार ने साबित किया है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति, जनता का सहयोग और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान साथ हो, तो कोई भी राज्य हिंसक चुनावी इतिहास से निकलकर परिवर्तन की राह पकड़ सकता है।


यह चुनाव केवल सरकार गठन की प्रक्रिया नहीं था, बल्कि एक संदेश था—भारत का लोकतंत्र प्रगति की परिपक्व अवस्था में प्रवेश कर रहा है।

बिहार की यह उपलब्धि आने वाले वर्षों में अन्य राज्यों के लिये मार्गदर्शक बनेगी, और उम्मीद है कि देश का राजनीतिक वातावरण इसी तरह संयमित और शांतिपूर्ण बने।

शुक्रवार, 6 सितंबर 2024

कर्म फल

बहुत खुश हो रहा वो, यूरिया वाला दूध तैयार कर

कम लागत से बना माल बेचेगा ऊंचे दाम में जेब भर

बहुत संतुष्ट है वो, कि उसके बच्चों को यह नहीं पीना

बनाया है दूसरों के लिए, किसको यहां अधिक जीना


भूल गया है कि कोई और कर रहा आइसक्रीम में मिलावट

जिसे खरीदकर खाएंगे उसके बच्चे बड़े चाव से झटपट

खुद के मिलावटी दूध से अपने बच्चों को तो बचा लिया

पर जो मिलावटी आइसक्रीम वे खा रहे उसका क्या


आइसक्रीम वाले के बच्चे रोज खा रहे मिलावटी नमकीन

धन को लक्ष्य बनाकर तली गई है बिल्कुल होकर भावहीन 

और नकीमन वाले के बच्चों को नसीब हैं मिलावटी मसाले

पैकेट बंद अच्छे ब्रांड के चुनकर किये हैं पत्नी के हवाले


बड़े ब्रांड को भी बिना मिलावट के कहां मुनाफा आता है

आटे में नमक के बराबर तो पूरे देश में चल ही जाता है

मसाले वाले सेठ के बच्चे भी कहां बच पा रहे मिलावट से

चपेट में आ ही जाते हैं कहीं न कहीं इस गिरावट के


उसके बच्चे खा रहे बड़े होटल में मिलावटी पनीर का टिक्का

फाइव स्टार भोजन को समझ बैठे हैं एकदम खरा सिक्का

पर इस मिलावटी दौर में कहां अछूते हैं तथाकथित फाइव स्टार

सरल कमाई के इस दौर में शुद्धता की बात करनी है बेकार


मिलावटखोर चाहता है कि उसके बच्चे मिलावटी खाने से बचें

पर विधाता ने हर किसी के लिए कर्मों के फल यहीं पर रचे।


© सचिन राठौर

मंगलवार, 3 सितंबर 2024

सीसीटीवी कैमरा

सीसीटीवी कैमरा देख ठिठक गया है उसका मन,

सहसा बदल गए हैं चाल-ढाल और आचरण,

सतर्क हो गया है अपने बर्ताव में, व्यवहार में,

अभिनय ऐसा जो भरा हो एक उम्दा फनकार में,

दिखना चाहता है अधिक सभ्य और अत्यंत कुशल,

यही सोच कर रही अंदर गहरी उथल-पुथल,

कहीं कोई देख रहा हो कैमरे से उसका चाल-चलन,

जाने किस नज़र से कर रहा हो उसका आंकलन,

छोटे से कैमरे ने कर दिया इतना बड़ा परिवर्तन,

बेपरवाह व्यक्तित्व में भर दिया त्वरित अनुशासन,

वैसे एक कैमरा तो लगा है उसके स्वयं के भीतर भी,

रिकॉर्ड करता सब तस्वीरें और है एक अच्छा टीचर भी,

अंतर्मन के सीसीटीवी कैमरे से देखा होता अपने कर्म को,

तो समझ गया होता अब तक जीवन के असली मर्म को।


© सचिन राठौर

शुक्रवार, 5 जुलाई 2024

मिलावटः समाज में घुल रहा एक धीमा जहर


खाद्य पदार्थों में मिलावट की समस्या सतही तौर पर भले बहुत गंभीर नहीं दिखती हो, लेकिन मिलावटखोरी का बाजार देश में गहराई तक फैला हुआ है। धन कमाने की दौड़ इस कदर आंख मूंद ली गई हैं कि बच्चों के दूध और आइस्क्रीम को भी नहीं बख्शा गया है। यह समस्या न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, बल्कि इसके सामाजिक दुष्परिणाम भी नजर आने लगे हैं।

भारतीय मसालों पर लगा प्रतिबंध

हाल ही में भारतीय मसालों के ब्रांडों पर कई देशों में प्रतिबंध लगाया गया है। इनमें मिले हानिकारक रसायनों की वजह से कुछ देशों ने यह कदम उठाया। बताया जा रहा है कि इन मसालों में एथलीन ऑक्साइड मिला है, जो कैंसरकारक होता है। एमडीएच और एवरेस्ट जैसे ब्रांड के मसाले दशकों से भारतीय रसोइयों में बड़े विश्वास से प्रयोग किये जाते रहे हैं। लेकिन इन प्रतिबंधों के बाद नामी कंपनियों के प्रति विश्वास कमजोर हुआ है। अपने पेड पीआर के माध्यम से ऐसी कंपनियां अपने कारनामों पर कितना भी पर्दा डालें, लेकिन इन्होंने न केवल अपने उपभोक्ताओं का विश्वास खोया है, बल्कि विदेश में भी भारत की छवि खराब की है।

मिलावट का व्यापक असर

इसी प्रकार पनीर, दूध, घी और मिठाइयों में भी भारी मिलावट की खबरें भी लगातार आती रहती हैं। थोड़ी लागत से मोटा पैसा बनाने की फिराक में मिलावट का यह बाजार छोटे-छोटे शहरों और गांव तक तक फैल चुका नजर आता है। सब्जियों में भी खरनाक रसायन पाए जा रहे हैं। खाद्य तेलों में भी यह समस्या गंभीर रूप से देखी जा सकती है। इसके अलावा पैकेट बंद खाद्यपदार्थों की एक अलग दुनिया है, जो महीनों तक खराब ही नहीं होते। ऐसे कौन से कारक उनमें प्रयोग किये जाते हैं, जो उन्हें महीनों तक प्रयोग करने योग्य बनाए रखते हैं। इन सब परिस्थितियों में आम जन के स्वास्थ्य पर होने वाले दुष्परिणामों के बारे में आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। 

खाद्य मिलावट से जुड़े आंकड़े

मिलावट के संदर्भ में भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के आंकड़े डराने वाले हैं। एक संसदीय प्रश्न के उत्तर केन्द्रीय उपभोक्ता कार्य, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री द्वारा ये आंकड़े संसद के पटल पर रखे गए। इन आंकड़ों की मानें तो एफएसएसएआई द्वारा जांचे गए खाद्य पदार्थों में 20 से 25 प्रतिशत सैंपल मानकों पर खरे नहीं उतरे। गौर करने वाली बात यह है कि अनेक मामलों में सजा भी हुई, लेकिन 6 माह जैसी मामूली सजा ऐसे अपराध के लिए कम प्रतीत होती है, जिसके साथ देश का स्वास्थ्य जुड़ा हो। देश में तेजी से बढ़ रहीं कैंसर, डायबिटीज, ब्लडप्रेशर, और दिल की बीमारियों के मामलों के पीछे मिलावटी खाद्य पदार्थ भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं। 

Year

No. of Samples Analysed

No. of Samples found non-conforming

Civil Cases

Criminal Cases

 No. of Cases launched

No. of Convictions

 No. of Cases Launched

No. of Convictions

 

2018-19

1,06,459

30,415

18,550

12,734

2,813

701

 

2019-20

1,18,775

29,589

27,412

17,345

4681

780

 

2020-21

1,07,829

28347

24,195

14,817

3869

506

 

2021-22

1,44,345

32,934

28,906

19,437

4,946

671

 

2022-23

1,72,687

44,421

38,053

27,053

4,817

1133

 

एक स्वस्थ समाज की दिशा

इस समस्या के समाधान के लिए अत्यंत जनजागरण की आवश्यकता है। पैकेट बंद खाद्य पदार्थों पर तेजी से बढ़ रही निर्भरता पर स्व-नियंत्रण करना होगा। बाजार के खाद्य पदार्थों पर आंख मूंदकर विश्वास करने की प्रवृत्ति बदलनी होगी। सदैव यह ध्यान रहे कि बाजार मुनाफे के लिए बना है, परोपकार के लिए नहीं और मुनाफा बढ़ाने के लिए बाजार में बैठी शक्तियां किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहती हैं।

युवाओं का बदलता मनोविज्ञान: नौकरी से आगे बढ़कर “स्वनिर्माण” की ओर

भारत का युवा एक मानसिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। कुछ वर्ष पहले तक एक अच्छी नौकरी - विशेषकर सरकारी नौकरी या किसी बड़ी...