भारतीय समाज बड़ा अद्भुत है। यहाँ रिश्ते दिल से कम और दिमाग से ज़्यादा निभाए जाते हैं।
दुनिया में शायद ही कोई ऐसा समाज होगा जहाँ “आशीर्वाद” भी डेबिट-क्रेडिट की तरह दर्ज किया जाता हो।
उत्तर भारत की शादी में जाइए, आपको लगेगा कि किसी बैंक की शाखा खुल गई है। एक तरफ मंच पर दूल्हा-दुल्हन मुस्कुरा रहे होते हैं, दूसरी तरफ शामियाने के कोने में एक गंभीर चेहरे वाले चाचा या फूफा जी रजिस्टर लेकर बैठे होते हैं। उनका चेहरा देखकर लगता है मानो देश का बजट वही संभाल रहे हों।
मेहमान आते हैं। लिफाफा देते हैं।
व्यवहार लिखने वाले इंचार्ज फूफा जी तुरंत पूछते हैं - “क्या नाम है...?”
फिर बड़ी श्रद्धा से लिखा जाता है -
“फलाने जी या ढिमकाने जी - 1100 रुपये।”
कई बार आपका बंद लिफाफा वहीं फाड़कर फेंक दिया जाता है और सबके सामने जोर से बोलकर राशि रजिस्टर में चढ़ाई जाती है। यह कई बार असहज करने वाली स्थिति होती है। शादी के अगले दिन पूरे रजिस्टर का हिसाब जोड़ा भी जाता है और कैश मिलाया जाता है।
सबसे मज़ेदार बात यह है कि यह हिसाब केवल याद रखने के लिए नहीं होता। यह एक प्रकार का सामाजिक निवेश है। आज आपने जितना डाला है, कल उतना ही ब्याज-मुक्त वापस मिलेगा।
किसी के घर शादी पड़े तो वर्षों पुराना रजिस्टर निकाला जाता है। धूल झाड़ी जाती है। फिर पूरा परिवार ऐसे बैठकर हिसाब देखता है जैसे पुरातत्व विभाग कोई प्राचीन शिलालेख पढ़ रहा हो।
“देखो, इनके यहाँ से 2001 आया था...”
“तो हमारे यहाँ से 2100 जाना चाहिए, आखिर इज़्ज़त का सवाल है।”
यानी रिश्ते नहीं, मानो यूपीआई ट्रांजैक्शन का इतिहास चल रहा हो।
और यह परंपरा केवल शादी तक सीमित नहीं। बहू की मुंह दिखाई हो या बच्चे का मुण्डन संस्कार हर आयोजन में जेवर, कैश, गिफ्ट - प्रत्येक लेन-देन का बाकायदा लेखा-जोखा तैयार। कहीं ऐसा न हो कि भविष्य में भावनाओं का बैलेंस गड़बड़ा जाए।
विडंबना यह है कि कार्ड पर छपवाया जाता है - “आपका स्नेह और आशीष ही हमारे लिए सबसे बड़ा उपहार है।” लेकिन अंदरखाने व्यवस्था ऐसी होती है कि स्नेह की पाई-पाई का हिसाब चढ़ा लिया जाता है।
हमारा समाज बड़ा दिलचस्प है। मुंह पर मिठास ऐसी कि रसगुल्ला शर्मा जाए, और दिमाग में हिसाब ऐसा कि चार्टर्ड अकाउंटेंट भी प्रेरणा लेने लगे।
शायद आने वाले समय में चीजें बदलें, लेकिन फिलहाल तो अपने समाज में आपके प्यार और आशीर्वाद का पूरा हिसाब रखा जा रहा है।



