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रविवार, 26 अप्रैल 2026
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शनिवार, 22 नवंबर 2025
बिहार विधानसभा चुनाव 2025: शांतिपूर्ण लोकतंत्र का अद्भुत उदाहरण
बिहार, जिसे कभी चुनावी हिंसा और तनाव के लिये जाना जाता था, इस बार लोकतंत्र के इतिहास में एक उल्लेखनीय परिवर्तन का गवाह बना है। हाल ही सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव अब तक के सबसे शांतिपूर्ण चुनाव माने जा रहे हैं। न कोई बड़े पैमाने पर हिंसा, न प्रतिशोध की घटनाएँ—यह अपने आप में बिहार की लोकतांत्रिक परिपक्वता और प्रशासनिक तैयारियों का जीवंत प्रमाण है।
शांतिपूर्ण चुनाव के लिये सभी को बधाई
इस उत्कृष्ट उपलब्धि का श्रेय किसी एक संस्था या समूह को नहीं जाता। यह सामूहिक प्रयास की सफलता है।
- बिहार की जनता, जिसने धैर्य, अनुशासन और समता के साथ मतदान किया।
- भारत निर्वाचन आयोग, जिसने व्यापक और प्रभावी व्यवस्था की।
- बिहार पुलिस और अर्धसैनिक बल, जिन्होंने बिना भय या दबाव के मतदान सुनिश्चित किया।
- मतदान कर्मी, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपनी जिम्मेदारियाँ पूर्ण निष्ठा से निभाईं।
इन सबके प्रयासों ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि लोकतंत्र केवल मतदान का दिन नहीं बल्कि जनभागीदारी और अनुशासन का महोत्सव है।
राजनीतिक दलों की परिपक्वता
चुनावी भाषणों में भले ही तीखे शब्दों और आरोप–प्रत्यारोपों का दौर चला हो, परंतु परिणाम आने के बाद सभी दलों ने जनादेश का सम्मान किया। इससे यह प्रतीत होता है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच भी बिहार का लोकतंत्र संवाद और स्वीकार्यता की राह पर आगे बढ़ रहा है।
पश्चिम बंगाल के लिये एक सीख
इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का अंधकार अब भी गहरा है। वर्षों से चल रही राजनीतिक हिंसा—चाहे वह हत्याओं के रूप में हो, धमकियों में या आम नागरिकों के रक्तपात में—एक लोकतांत्रिक समाज की आत्मा को चोट पहुँचाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक चली विचारधारात्मक राजनीति और जमीन-स्तर पर हिंसा-आधारित सत्ता संरचना इसका मुख्य कारण रही है। आज भारत के किसी अन्य राज्य में इतनी तीव्र और संगठित चुनावी हिंसा नहीं देखी जाती।
साल 2026 में पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले, वहाँ के नेतृत्व और जनता—दोनों को बिहार से सीख लेनी चाहिये। लोकतंत्र में सत्ता बदलने का अधिकार जनता का है, न कि हिंसा और भय का।
मीडिया की चुप्पी और बिहार की अनदेखी उपलब्धि
गौर करने वाली बात यह है कि इतने शांतिपूर्ण चुनाव के बावजूद राष्ट्रीय मीडिया ने बिहार की इस उपलब्धि को शायद ही उचित ध्यान दिया। हिंसा की खबरें सुर्खियों में आती हैं, लेकिन जब कोई राज्य शांतिपूर्ण लोकतंत्र का उदाहरण प्रस्तुत करता है—अक्सर वह अनदेखा रह जाता है।
बिहार ने साबित किया है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति, जनता का सहयोग और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान साथ हो, तो कोई भी राज्य हिंसक चुनावी इतिहास से निकलकर परिवर्तन की राह पकड़ सकता है।
यह चुनाव केवल सरकार गठन की प्रक्रिया नहीं था, बल्कि एक संदेश था—भारत का लोकतंत्र प्रगति की परिपक्व अवस्था में प्रवेश कर रहा है।
बिहार की यह उपलब्धि आने वाले वर्षों में अन्य राज्यों के लिये मार्गदर्शक बनेगी, और उम्मीद है कि देश का राजनीतिक वातावरण इसी तरह संयमित और शांतिपूर्ण बने।
शुक्रवार, 6 सितंबर 2024
कर्म फल
बहुत खुश हो रहा वो, यूरिया वाला दूध तैयार कर
कम लागत से बना माल बेचेगा ऊंचे दाम में जेब भर
बहुत संतुष्ट है वो, कि उसके बच्चों को यह नहीं पीना
बनाया है दूसरों के लिए, किसको यहां अधिक जीना
भूल गया है कि कोई और कर रहा आइसक्रीम में मिलावट
जिसे खरीदकर खाएंगे उसके बच्चे बड़े चाव से झटपट
खुद के मिलावटी दूध से अपने बच्चों को तो बचा लिया
पर जो मिलावटी आइसक्रीम वे खा रहे उसका क्या
आइसक्रीम वाले के बच्चे रोज खा रहे मिलावटी नमकीन
धन को लक्ष्य बनाकर तली गई है बिल्कुल होकर भावहीन
और नकीमन वाले के बच्चों को नसीब हैं मिलावटी मसाले
पैकेट बंद अच्छे ब्रांड के चुनकर किये हैं पत्नी के हवाले
बड़े ब्रांड को भी बिना मिलावट के कहां मुनाफा आता है
आटे में नमक के बराबर तो पूरे देश में चल ही जाता है
मसाले वाले सेठ के बच्चे भी कहां बच पा रहे मिलावट से
चपेट में आ ही जाते हैं कहीं न कहीं इस गिरावट के
उसके बच्चे खा रहे बड़े होटल में मिलावटी पनीर का टिक्का
फाइव स्टार भोजन को समझ बैठे हैं एकदम खरा सिक्का
पर इस मिलावटी दौर में कहां अछूते हैं तथाकथित फाइव स्टार
सरल कमाई के इस दौर में शुद्धता की बात करनी है बेकार
मिलावटखोर चाहता है कि उसके बच्चे मिलावटी खाने से बचें
पर विधाता ने हर किसी के लिए कर्मों के फल यहीं पर रचे।
© सचिन राठौर
मंगलवार, 3 सितंबर 2024
सीसीटीवी कैमरा
सहसा बदल गए हैं चाल-ढाल और आचरण,
सतर्क हो गया है अपने बर्ताव में, व्यवहार में,
अभिनय ऐसा जो भरा हो एक उम्दा फनकार में,
दिखना चाहता है अधिक सभ्य और अत्यंत कुशल,
यही सोच कर रही अंदर गहरी उथल-पुथल,
कहीं कोई देख रहा हो कैमरे से उसका चाल-चलन,
जाने किस नज़र से कर रहा हो उसका आंकलन,
छोटे से कैमरे ने कर दिया इतना बड़ा परिवर्तन,
बेपरवाह व्यक्तित्व में भर दिया त्वरित अनुशासन,
वैसे एक कैमरा तो लगा है उसके स्वयं के भीतर भी,
रिकॉर्ड करता सब तस्वीरें और है एक अच्छा टीचर भी,
अंतर्मन के सीसीटीवी कैमरे से देखा होता अपने कर्म को,
तो समझ गया होता अब तक जीवन के असली मर्म को।
© सचिन राठौर
शुक्रवार, 5 जुलाई 2024
मिलावटः समाज में घुल रहा एक धीमा जहर
खाद्य पदार्थों में मिलावट की समस्या सतही तौर पर भले बहुत गंभीर नहीं दिखती हो, लेकिन मिलावटखोरी का बाजार देश में गहराई तक फैला हुआ है। धन कमाने की दौड़ इस कदर आंख मूंद ली गई हैं कि बच्चों के दूध और आइस्क्रीम को भी नहीं बख्शा गया है। यह समस्या न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, बल्कि इसके सामाजिक दुष्परिणाम भी नजर आने लगे हैं।
भारतीय मसालों पर लगा प्रतिबंध
हाल ही में भारतीय मसालों के ब्रांडों पर कई देशों में प्रतिबंध लगाया गया है। इनमें मिले हानिकारक रसायनों की वजह से कुछ देशों ने यह कदम उठाया। बताया जा रहा है कि इन मसालों में एथलीन ऑक्साइड मिला है, जो कैंसरकारक होता है। एमडीएच और एवरेस्ट जैसे ब्रांड के मसाले दशकों से भारतीय रसोइयों में बड़े विश्वास से प्रयोग किये जाते रहे हैं। लेकिन इन प्रतिबंधों के बाद नामी कंपनियों के प्रति विश्वास कमजोर हुआ है। अपने पेड पीआर के माध्यम से ऐसी कंपनियां अपने कारनामों पर कितना भी पर्दा डालें, लेकिन इन्होंने न केवल अपने उपभोक्ताओं का विश्वास खोया है, बल्कि विदेश में भी भारत की छवि खराब की है।
मिलावट का व्यापक असर
इसी प्रकार पनीर, दूध, घी और मिठाइयों में भी भारी मिलावट की खबरें भी लगातार आती रहती हैं। थोड़ी लागत से मोटा पैसा बनाने की फिराक में मिलावट का यह बाजार छोटे-छोटे शहरों और गांव तक तक फैल चुका नजर आता है। सब्जियों में भी खरनाक रसायन पाए जा रहे हैं। खाद्य तेलों में भी यह समस्या गंभीर रूप से देखी जा सकती है। इसके अलावा पैकेट बंद खाद्यपदार्थों की एक अलग दुनिया है, जो महीनों तक खराब ही नहीं होते। ऐसे कौन से कारक उनमें प्रयोग किये जाते हैं, जो उन्हें महीनों तक प्रयोग करने योग्य बनाए रखते हैं। इन सब परिस्थितियों में आम जन के स्वास्थ्य पर होने वाले दुष्परिणामों के बारे में आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है।
खाद्य मिलावट से जुड़े आंकड़े
मिलावट के संदर्भ में भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के आंकड़े डराने वाले हैं। एक संसदीय प्रश्न के उत्तर केन्द्रीय उपभोक्ता कार्य, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री द्वारा ये आंकड़े संसद के पटल पर रखे गए। इन आंकड़ों की मानें तो एफएसएसएआई द्वारा जांचे गए खाद्य पदार्थों में 20 से 25 प्रतिशत सैंपल मानकों पर खरे नहीं उतरे। गौर करने वाली बात यह है कि अनेक मामलों में सजा भी हुई, लेकिन 6 माह जैसी मामूली सजा ऐसे अपराध के लिए कम प्रतीत होती है, जिसके साथ देश का स्वास्थ्य जुड़ा हो। देश में तेजी से बढ़ रहीं कैंसर, डायबिटीज, ब्लडप्रेशर, और दिल की बीमारियों के मामलों के पीछे मिलावटी खाद्य पदार्थ भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं।
|
Year |
No. of Samples Analysed |
No. of Samples found non-conforming |
Civil Cases |
Criminal Cases |
|||
|
No. of Cases launched |
No. of Convictions |
No.
of Cases Launched |
No.
of Convictions |
|
|||
|
2018-19 |
1,06,459 |
30,415 |
18,550 |
12,734 |
2,813 |
701 |
|
|
2019-20 |
1,18,775 |
29,589 |
27,412 |
17,345 |
4681 |
780 |
|
|
2020-21 |
1,07,829 |
28347 |
24,195 |
14,817 |
3869 |
506 |
|
|
2021-22 |
1,44,345 |
32,934 |
28,906 |
19,437 |
4,946 |
671 |
|
|
2022-23 |
1,72,687 |
44,421 |
38,053 |
27,053 |
4,817 |
1133 |
|
एक स्वस्थ समाज की दिशा
इस समस्या के समाधान के लिए अत्यंत जनजागरण की आवश्यकता है। पैकेट बंद खाद्य पदार्थों पर तेजी से बढ़ रही निर्भरता पर स्व-नियंत्रण करना होगा। बाजार के खाद्य पदार्थों पर आंख मूंदकर विश्वास करने की प्रवृत्ति बदलनी होगी। सदैव यह ध्यान रहे कि बाजार मुनाफे के लिए बना है, परोपकार के लिए नहीं और मुनाफा बढ़ाने के लिए बाजार में बैठी शक्तियां किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहती हैं।
बुधवार, 3 जुलाई 2024
अत्यंत विशेष है कैवल्यदर्शनम् पुस्तक की भूमिका
मंगलवार, 2 जुलाई 2024
निर्माण कार्यों की गुणवत्ता जांचने आया मानसून और कर्नल बड़ोग का स्वाभिमान
इस वर्ष मानसून की शुरुआत के साथ ही देश के विभिन्न हिस्सों में पुलों, हवाई अड्डों और राजमार्गों के धंसने की खबरें सुर्खियां बटोरने लगी हैं। हाल ही में देश ने जब स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मनाया है, तब निर्माण कार्यों की संदेहास्पद गुणवत्ता आधुनिक डिग्री धारक इंजीनियर्स और निर्माण कार्य से जुड़े संस्थानों के लिए निश्चित रूप से गहन चिंता का विषय है।
जिस ब्रिटिश शासन से हमने स्वतंत्रता प्राप्त की, उसके माथे पर भले ही अनेक संगीन आरोप हों, लेकिन उनके निर्माण कार्य आज भी अपनी गुणवत्ता की तस्दीक कर रहे हैं। नई दिल्ली का निर्माण हो या भारतीय रेल व्यवस्था की आधारशिला, यह सब कार्य अंग्रेजों ने भले ही अपने स्वार्थ के लिए किये, लेकिन उनके कार्य पर आज भी कोई संदेह नहीं करता। एक ही बारिश में धराशायी हो जाने वाले कागजी निर्माण करने वाले आधुनिक समय के काबिल इंजीनियर्स के लिए पुराने निर्माण कार्य निश्चित रूप से एक नज़ीर हैं।
जब भी अखबारों में खराब निर्माण कार्य से जुड़ी खबरें प्रकाशित होती हैं, तब सहसा कर्नल बड़ोग (बरोग) का नाम सहसा ध्यान में आता है। वे ऐसा ही एक उदाहरण हैं, जिससे अपने काम के प्रति समर्पण, ईमानदारी और जिम्मेदारी का भाव सीखा जा सकता है।
जब 20वीं सदी में जब कालका- शिमला रेलवे लाइन बिछाने का कार्य चल रहा था, तब पहाड़ी काटकर बड़ोग सुरंग (क्रमांक 33) बनाने का कार्य ब्रिटिश इंजीनियर कर्नल बड़ोग के पास था। उस जमाने में कालका- शिमला के बीच पहाड़ों को काटकर 100 से अधिक सुरंगें बनाना अपने आप में एक विलक्षण कार्य था। बरोग सुरंग कर्नल बड़ोग के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन गई। सुरंग बनाने के लिए कर्नल बड़ोग ने सबसे पहले पहाड़ का निरीक्षण किया। सुरंग बनाने के लिए दोनों छोर पर निशान लगाने के बाद मजदूरों को खोदने का ऑर्डर दिए। मजदूर दोनों छोर से एकसाथ खुदाई करने लगे। कर्नल बड़ोग इस बात से आश्वस्त थे कि खुदाई के दौरान दोनों सुरंगें बीच में आकर मिल जाएंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अंग्रेजी हुकूमत को यह पैसे की बर्बादी लगी और उन्होंने कर्नल बड़ोग पर एक रुपया जुर्माना लगा दिया। बड़ोग इस कार्रवाई से बहुत आहत हुए और उनके आत्मसम्मान को गहरी ठेस लगी। एक दिन वह अपने कुत्ते को लेकर सुबह टहलने निकले व सुरंग के नजदीक ही खुद को गोली मार ली। बड़ोग को वर्तमान सुरंग के पास ही दफनाया गया है। आत्महत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं, लेकिन यह कहानी उस इंजीनियर के स्वाभिमान की है। बाद में एक स्थानीय निवासी बाबा भलकू ने उस सुरंग को पूरा करने में मदद की थी, जिनके दिशा-निर्देशन में एक नई सुरंग बनाई गई। ब्रिटिश सरकार ने नई सुरंग का नाम इंजीनियर कर्नल बड़ोग के नाम पर ही रखा। यह इस मार्ग पर सबसे लंबी सुरंग है।
अपने कार्य के प्रति निष्ठा और समर्पण का कर्नल बड़ोग जैसा भाव ही ऐतिहासिक और पीढ़ियों तक चलने वाले निर्माण की नींव रखते हैं। वर्तमान भारत में निर्माण कार्यों से जुड़ी एजेंसियों और अधिकारियों को यह कहानी नियमित पढ़ानी चाहिए, शायद कभी उनके अंदर अंतःप्रेरणा जागृत हो, ताकि एक मजबूत देश का निर्माण बन सके। हर विफलता का आरोप राजनीति पर लगा देना सबसे आसान मार्ग है। किसी भी तरह की राजनीति आपको तब तक मजबूर नहीं कर सकती, जब तक कमजोरी आपके स्वयं के अंदर न हो। कहीं न कहीं आपने भी बहती नदी में हाथ धोए होंगे, तब जाकर ये पुल धराशायी हुए होंगे।
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