बुधवार, 9 सितंबर 2026

‘हनुमान अंश’ की सफलताः देशज कहानी की जीत


भारतीय सिनेमा में सफलता का पैमाना लंबे समय से बड़े बजट, बड़े सितारों, विदेशी लोकेशन और भव्य प्रचार से जोड़ा जाता रहा है। ऐसे समय में ‘हनुमान अंश’ की सफलता फिर एक नया उदाहरण बनकर सामने आई है। महज 2 करोड़ रुपये के बजट में बनी इस फिल्म का बॉक्स ऑफिस संग्रह 160 करोड़ रुपये के पार पहुंच जाना अपने आप में असाधारण उपलब्धि है।

खास बात यह है कि फिल्म ने शुरुआत में कोई तूफानी प्रदर्शन नहीं किया। पहले दो सप्ताह इसकी रफ्तार अपेक्षाकृत धीमी रही, लेकिन धीरे-धीरे दर्शकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया और सोशल मीडिया प्रचार ने फिल्म को गति दी। इसके बाद स्थिति ऐसी बनी कि पिछले कई सप्ताह से सिनेमाघरों में शो हाउसफुल चल रहे हैं। यह सफलता बताती है कि दर्शकों तक किसी फिल्म की बात पहुंचाने में कई बार बड़े प्रचार से अधिक प्रभावी स्वयं दर्शकों की प्रतिक्रिया होती है।

आस्था एक पहलू, लेकिन पूरी कहानी नहीं

फिल्म की सफलता को लेकर एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि इसका आध्यात्मिक जुड़ाव, बाबा नीम करौली के प्रति लोगों की आस्था और उनके विशाल अनुयायी वर्ग ने फिल्म को दर्शकों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसे मौखिक प्रचार ने और गति दी। निश्चित रूप से यह फिल्म की सफलता का एक पहलू हो सकता है और इससे शुरुआती दर्शकों को फिल्म तक पहुंचने में मदद मिली होगी। लेकिन पूरी सफलता का श्रेय केवल इसी आधार पर देना उचित नहीं होगा।

फिल्म देखने वाले हर दर्शक बाबा जी के अनुयायी या भक्त नहीं हैं। बड़ी संख्या में ऐसे दर्शक भी सिनेमाघरों तक पहुंचे जिन्होंने फिल्म की कहानी, प्रस्तुति और दूसरों की सकारात्मक प्रतिक्रिया के आधार पर इसे देखने का निर्णय लिया। इसलिए इस सफलता का मूल कारण वही दिखाई देता है-साफ-सुथरी फिल्म, पारिवारिक मनोरंजन और ऐसी कहानी जिसे परिवार की तीन पीढ़ियां साथ बैठकर देख सकें। आस्था ने शायद दर्शकों को आकर्षित करने में भूमिका निभाई हो, लेकिन दर्शकों को सिनेमाघर में बनाए रखने का काम फिल्म की अपनी गुणवत्ता ने किया।

न बड़े सितारे, न करोड़ों का बजट-फिर भी बड़ी सफलता

‘हनुमान अंश’ की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसकी सफलता के पीछे सामान्य अर्थों में कोई बड़ा ‘फॉर्मूला’ दिखाई नहीं देता। न कोई 100 करोड़ रुपये फीस लेने वाला सुपरस्टार, न कोई ख्यातिलब्ध नायिका, न विदेशी लोकेशन पर करोड़ों रुपये खर्च करने का दिखावा और न ही अभद्र भाषा अथवा अनावश्यक उत्तेजक दृश्यों का सहारा।

फिर भी दर्शकों ने फिल्म को स्वीकार किया।

इस सफलता का सबसे महत्वपूर्ण संदेश शायद यही है कि भारत आधुनिक जरूर हुआ है, लेकिन भारतीय परिवार की मनोरंजन की मूल पसंद पूरी तरह नहीं बदली है। आज भी दर्शक ऐसी फिल्म देखना चाहता है, जिसे वह अपने परिवार के साथ सहजता से देख सके-जहां एक ही सिनेमाघर में दादा-दादी, माता-पिता और बच्चे, तीन पीढ़ियां साथ बैठकर मनोरंजन कर सकें।

दर्शक आधुनिक विषयों और तकनीक को स्वीकार करता है, लेकिन पारिवारिक संवेदनाएं और सांस्कृतिक मूल्यों का दायरा उनके लिए आज भी जरूरी है।

कोरोना के बाद बदली फिल्म देखने की आदत

कोरोना महामारी के बाद मनोरंजन की दुनिया में बड़ा बदलाव आया। ओटीटी मंचों के तेजी से विस्तार ने घर बैठे फिल्में देखने की आदत को मजबूत किया। जब नई फिल्में कुछ समय बाद घर की स्क्रीन पर उपलब्ध होने लगीं, तो दर्शकों के सामने एक नया विकल्प पैदा हो गया।

महंगे टिकट, महंगे पॉपकॉर्न और परिवार के साथ सिनेमाघर जाने का बढ़ता खर्च-इन सबके बीच बहुत से लोगों को लगने लगा कि जब वही फिल्म कुछ समय बाद घर पर आराम से देखी जा सकती है तो सिनेमाघर क्यों जाएं? दिल्ली सरकार का हालिया डाटा बताता है कि दिल्ली में 2016 के बाद दैनिक सिनेमाघर दर्शकों में 83 प्रतिशत की कमी आई है।

ऐसे माहौल में ‘हनुमान अंश’ का सिनेमाघरों में दर्शकों को बड़ी संख्या में खींचना विशेष महत्व रखता है। यह केवल किसी एक फिल्म की व्यावसायिक सफलता नहीं है, बल्कि यह संकेत भी है कि यदि फिल्म दर्शकों को पर्याप्त कारण देती है, तो भारतीय दर्शक आज भी सिनेमाघर जाने के लिए तैयार है।

दर्शक सिनेमाघर से दूर नहीं हुआ है; वह केवल यह तय करने लगा है कि किस फिल्म के लिए सिनेमाघर जाना सार्थक है।

फिल्म उद्योग के महंगे सितारों के लिए भी एक संदेश

‘हनुमान अंश’ की सफलता फिल्म उद्योग के उस आर्थिक ढांचे पर भी सवाल खड़े करती है, जिसमें कुछ बड़े सितारे एक फिल्म के लिए ही कई करोड़ रुपये बतौर पारिश्रमिक लेते हैं। जब किसी अभिनेता की फीस ही फिल्म के बजट का बड़ा हिस्सा बन जाए, तो निर्माता के पास कहानी, तकनीक, प्रचार और अन्य कलाकारों पर खर्च करने के लिए सीमित संसाधन बचते हैं।

भारतीय फिल्म उद्योग में पारिश्रमिक को लेकर एक बड़ा असंतुलन है, जो किसी से छिपा नहीं है। एक ओर मुख्य सितारों को 50 से 100 करोड़ तक फीस मिलती है, वहीं सहायक कलाकारों और तकनीकी टीम के अनेक सदस्यों को अपेक्षाकृत बहुत कम भुगतान किया जाता है। पृष्ठभूमि में काम करने वाले कलाकारों और डांसर्स की स्थिति तो और भी चुनौतीपूर्ण होती है, जिन्हें 1000 से 3000 रुपये प्रतिदिन की भुगतान की दरें बताई जाती हैं।।

सिनेमा जगत के लिए लंबे समय से यह प्रश्न विचारणीय है कि यदि पूरी फिल्म को सफल बनाने में सैकड़ों लोग योगदान देते हैं, तो सफलता का आर्थिक लाभ कुछ चुनिंदा चेहरों तक ही क्यों सीमित रहे?

यह धारणा भी लंबे समय से चर्चा में रही है कि बड़े सितारों के प्रभुत्व के कारण नए और प्रतिभाशाली कलाकारों को पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाते। यदि यह धारणा कहीं सही है, तो ‘हनुमान अंश’ जैसी फिल्मों की सफलता उस व्यवस्था को चुनौती देती है। यह बताती है कि दर्शक केवल स्टार नहीं, किरदार और कहानी भी देखता है।

निर्माताओं और निर्देशकों के लिए स्पष्ट संदेश

‘हनुमान अंश’ की सफलता निर्माताओं और निर्देशकों के लिए भी एक महत्वपूर्ण सबक है। दर्शक को कमतर आंकना शायद सबसे बड़ी भूल है।

दर्शक को हर बार बड़े बजट, महंगे सितारे और विदेशी लोकेशन नहीं चाहिए। उसे चाहिए-एक अच्छी कहानी, प्रभावशाली प्रस्तुति, विश्वसनीय अभिनय और ऐसा मनोरंजन जिसे वह अपने परिवार के साथ देख सके।

नए चेहरों को अवसर देने का जोखिम पहली नजर में भले ही बड़ा दिखाई दे, लेकिन यदि उनके साथ मजबूत कहानी हो तो वही जोखिम बड़ी उपलब्धि में बदल सकता है।

सिनेमा अंततः दर्शक के लिए बनता है। इसलिए यह आवश्यक है कि निर्माता यह समझें कि दर्शक की जेब, समय और पसंद-तीनों का सम्मान करना जरूरी है।

दर्शक नयापन पसंद करता है

‘हनुमान अंश’ की सफलता को केवल 160+ करोड़ रुपये के आंकड़े से नहीं देखा जाना चाहिए। इसका वास्तविक महत्व उस संदेश में है जो यह फिल्म उद्योग को देती है।

बड़ा बजट सफलता की गारंटी नहीं है। बड़ा सितारा सफलता की गारंटी नहीं है। विदेशी लोकेशन सफलता की गारंटी नहीं है।

लेकिन एक अच्छी कहानी, साफ-सुथरा मनोरंजन और दर्शकों की भावनाओं से जुड़ाव-इनकी ताकत आज भी कायम है। शायद यही इस फिल्म की सबसे बड़ी सीख है।

और ‘हनुमान अंश’ की सफलता ने एक बार फिर यह साबित किया है कि भारतीय दर्शक नई प्रतिभाओं को अवसर देने के लिए तैयार है, बशर्ते उन्हें लगे कि- “इस फिल्म को देखने के लिए पैसा और समय खर्च करना सार्थक था।”

फिल्म निर्माता अक्सर कहते हैं-“हम वही दिखाते हैं, जो दर्शक देखना चाहते हैं।” ‘हनुमान अंश’ की सफलता के माध्यम से दर्शकों ने इसका उत्तर भी स्पष्ट रूप से दे दिया है कि वे क्या देखना चाहते हैं-अच्छी कहानी, साफ-सुथरा मनोरंजन और ऐसी फिल्म, जिसे पूरा परिवार साथ बैठकर देख सके। अब बारी फिल्म निर्माताओं की है कि वे इस संदेश को कितनी गंभीरता से लेते हैं।

मंगलवार, 19 मई 2026

युवाओं का बदलता मनोविज्ञान: नौकरी से आगे बढ़कर “स्वनिर्माण” की ओर

भारत का युवा एक मानसिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। कुछ वर्ष पहले तक एक अच्छी नौकरी - विशेषकर सरकारी नौकरी या किसी बड़ी कंपनी में स्थायी पद - सफलता का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती थी। परिवारों का मुख्य लक्ष्य भी यही होता था कि बच्चे को सुरक्षित और स्थायी रोजगार मिल जाए। लेकिन आज का युवा केवल नौकरी नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, पहचान, संतुलित जीवन, आर्थिक स्वामित्व और आत्मसंतोष चाहता है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में युवा कुछ वर्षों की नौकरी के बाद अपना व्यवसाय, स्टार्टअप, फ्रीलांस कार्य या डिजिटल उद्यम शुरू करने की ओर बढ़ रहे हैं। यह केवल करियर परिवर्तन नहीं, बल्कि  समाज की मानसिकता का बदलाव है।

एआई और भविष्य की असुरक्षा ने बदल दी सोच

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और ऑटोमेशन ने युवाओं की सोच को गहराई से प्रभावित किया है। आईटी, कंटेंट, डिज़ाइन, डेटा एनालिटिक्स और अनेक कॉर्पाेरेट क्षेत्रों में यह स्पष्ट दिखने लगा है कि आने वाले समय में कई पारंपरिक नौकरियाँ बदल जाएँगी या सीमित हो जाएँगी।

युवाओं को लगने लगा है कि केवल नौकरी पर निर्भर रहना भविष्य में पर्याप्त सुरक्षित नहीं होगा। इसलिए दूरदर्शी युवा अब जल्दी ही अपने कौशल, नेटवर्क और स्वयं के कार्यक्षेत्र बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।

पहले लोग 40 वर्ष की आयु के बाद व्यवसाय की ओर सोचते थे, अब 25-30 वर्ष की आयु में ही युवा प्रयोग शुरू कर रहे हैं। वे समझ चुके हैं कि एआई के युग में केवल डिग्री नहीं, बल्कि अनुकूलन क्षमता और स्वनिर्माण ही सबसे बड़ी शक्ति होगी।

महानगरों से छोटे शहरों की ओर बढ़ता झुकाव

भारत में एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन यह भी है कि युवा अब केवल दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु या हैदराबाद जैसे महानगरों को ही अवसर का केंद्र नहीं मान रहा।

महानगरों की वास्तविकता आज यह है-

  • अत्यधिक महंगा किराया,
  • लंबा ट्रैफिक जाम,
  • प्रदूषण
  • तनावपूर्ण जीवन,
  • सीमित बचत,
  • सामाजिक अकेलापन।

अनेक युवाओं को यह महसूस होने लगा है कि बड़ी तनख्वाह के बावजूद जीवन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।

दूसरी ओर टीयर-2 और टीयर-3 शहर बेहतर संतुलन प्रदान कर रहे हैं। इंटरनेट, यूपीआई, ई-कॉमर्स, डिजिटल मार्केटिंग और रिमोट वर्क ने छोटे शहरों से भी व्यवसाय और प्रोफेशनल कार्य करना संभव बना दिया है।

आज इंदौर, जयपुर, लखनऊ, नागपुर, सूरत, देहरादून और कोच्चि जैसे शहर नई संभावनाओं के केंद्र बन रहे हैं। यहां तक कि पहाड़ों में घर लेने का चलन भी बहुत तेजी से बढ़ा है। बहुत बड़ी संख्या में दिल्ली के लोग उत्तराखण्ड और हिमाचल जैसे स्थानों पर घर ले चुके हैं या योजना बना रहे हैं। समाज के मन में कहीं न कहीं यह स्पष्ट हो रहा है कि- “सफलता केवल महानगरों की मोहताज नहीं है।”

भारतीय कार्यसंस्कृति से बढ़ती निराशा

युवाओं के मानसिक बदलाव का एक बड़ा कारण भारतीय कॉर्पाेरेट और पारंपरिक कार्यसंस्कृति भी है। सामान्यतः भारतीय कार्यालयों और पेशेवर संस्थानों में आज भी-

  • अत्यधिक पदानुक्रम,
  • माइक्रो-मैनेजमेंट,
  • सीमित स्वतंत्रता,
  • धीमी पदोन्नति,
  • कम वेतन वृद्धि,
  • और “आदेश पालन” आधारित संस्कृति देखने को मिलती है।

कई युवा यह महसूस करते हैं कि कंपनियाँ कर्मचारियों को साझेदार नहीं बल्कि प्रतिस्थापित संसाधन की तरह देखती हैं।

आज का युवा केवल वेतन के लिए काम नहीं करना चाहता। वह चाहता है-

  • सम्मान,
  • रचनात्मकता,
  • निर्णय लेने की स्वतंत्रता,
  • सीखने के अवसर,
  • और अपने कार्य का वास्तविक प्रभाव।

जब उसे लगता है कि उसकी प्रतिभा का उचित उपयोग नहीं हो रहा, तब वह स्वयं के लिए काम करने की दिशा में सोचने लगता है।

क्या यह भारतीय कंपनियों के लिए चेतावनी है?

यह बदलती मानसिकता भारतीय कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत भी है। पहले स्थायी वेतन और नौकरी की सुरक्षा कर्मचारियों को लंबे समय तक संगठन से जोड़े रखती थी। लेकिन आज का युवा पूछता है-

  • “क्या मैं यहाँ विकसित हो रहा हूँ?”
  • “क्या मेरी क्षमता को पहचान मिल रही है?”
  • “क्या इस कार्य में अर्थ और सम्मान है?”

यदि इन प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक हो, तो युवा नौकरी छोड़ने में देर नहीं करता।

एआई के दौर में केवल बड़ी कर्मचारी संख्या या कठोर व्यवस्थाएँ सफलता की गारंटी नहीं होंगी। आने वाले समय में वही कंपनियाँ आगे बढ़ेंगी जो-

  • नवाचार को बढ़ावा दें,
  • कर्मचारियों को स्वायत्तता दें,
  • लचीली कार्यसंस्कृति अपनाएँ,
  • और प्रतिभा को सम्मान दें।

अन्यथा कंपनियों को प्रतिभा पलायन, कम नवाचार और घटती निष्ठा जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

“स्थिरता” से अधिक “स्वतंत्रता” की चाह

पुरानी पीढ़ी का लक्ष्य था - सुरक्षित जीवन।

नई पीढ़ी का लक्ष्य है - स्वतंत्र और सार्थक जीवन।

कहीं न कहीं युवाओं के मन में यह बात उठती ही रहती है- “यदि संघर्ष करना ही है, तो अपने सपनों के लिए क्यों न किया जाए?”

इसलिए आज व्यवसाय केवल धन कमाने का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह-

  • आत्मसम्मान,
  • पहचान,
  • रचनात्मक संतोष,
  • और जीवन पर नियंत्रण का माध्यम बन गया है।

सोशल मीडिया और स्टार्टअप संस्कृति का प्रभाव

इंस्टाग्राम, यूट्यूब और लिंक्डइन जैसे प्लेटफॉर्म ने युवाओं के भीतर नई आकांक्षाएँ पैदा की हैं। वे लगातार ऐसे लोगों को देख रहे हैं जिन्होंने छोटे स्तर से शुरुआत करके अपनी पहचान बनाई।

स्टार्टअप संस्कृति ने यह विश्वास पैदा किया है कि- “साधारण पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति भी बड़ा परिवर्तन ला सकता है।”

हालाँकि सोशल मीडिया सफलता को अधिक दिखाता है और संघर्ष को कम, फिर भी उसने युवाओं में आत्मविश्वास और जोखिम लेने की मानसिकता को मजबूत किया है।

चुनौतियाँ भी कम नहीं

यह परिवर्तन अवसरों से भरा है, लेकिन चुनौतियों से भी। हर व्यवसाय सफल नहीं होता। आर्थिक अस्थिरता, प्रतिस्पर्धा, मानसिक दबाव और असफलता का जोखिम भी वास्तविक हैं।

इसलिए केवल उत्साह नहीं, बल्कि-

  • कौशल,
  • धैर्य,
  • वित्तीय अनुशासन,
  • और दीर्घकालिक सोच भी आवश्यक है।

भारतीय युवा आज “नौकरी खोजने वाली पीढ़ी” से “अवसर निर्माण करने वाली पीढ़ी” में बदल रहा है। एआई, डिजिटल क्रांति, महानगरों का बढ़ता खर्च, बदलती जीवनशैली और पारंपरिक कार्यसंस्कृति से असंतोष - ये सभी मिलकर एक नई मानसिकता को जन्म दे रहे हैं।

यह परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। आने वाले वर्षों में भारत में ऐसे युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ेगी जो नौकरी करने के साथ-साथ अपना कार्य, अपना ब्रांड और अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने का प्रयास करेंगे।

संभवतः यही परिवर्तन भारत के अगले आर्थिक और सामाजिक युग की सबसे बड़ी शक्ति सिद्ध होगा।

मंगलवार, 12 मई 2026

हिसाब-किताब का पक्का अपना समाज

भारतीय समाज बड़ा अद्भुत है। यहाँ रिश्ते दिल से कम और दिमाग से ज़्यादा निभाए जाते हैं।

दुनिया में शायद ही कोई ऐसा समाज होगा जहाँ “आशीर्वाद” भी डेबिट-क्रेडिट की तरह दर्ज किया जाता हो।

उत्तर भारत की शादी में जाइए, आपको लगेगा कि किसी बैंक की शाखा खुल गई है। एक तरफ मंच पर दूल्हा-दुल्हन मुस्कुरा रहे होते हैं, दूसरी तरफ शामियाने के कोने में एक गंभीर चेहरे वाले चाचा या फूफा जी रजिस्टर लेकर बैठे होते हैं। उनका चेहरा देखकर लगता है मानो देश का बजट वही संभाल रहे हों। 

मेहमान आते हैं। लिफाफा देते हैं।

व्यवहार लिखने वाले इंचार्ज फूफा जी तुरंत पूछते हैं - “क्या नाम है...?”

फिर बड़ी श्रद्धा से लिखा जाता है -

“फलाने जी या ढिमकाने जी - 1100 रुपये।”

कई बार आपका बंद लिफाफा वहीं फाड़कर फेंक दिया जाता है और सबके सामने जोर से बोलकर राशि रजिस्टर में चढ़ाई जाती है। यह कई बार असहज करने वाली स्थिति होती है। शादी के अगले दिन पूरे रजिस्टर का हिसाब जोड़ा भी जाता है और कैश मिलाया जाता है।

सबसे मज़ेदार बात यह है कि यह हिसाब केवल याद रखने के लिए नहीं होता। यह एक प्रकार का सामाजिक निवेश है। आज आपने जितना डाला है, कल उतना ही ब्याज-मुक्त वापस मिलेगा।

किसी के घर शादी पड़े तो वर्षों पुराना रजिस्टर निकाला जाता है। धूल झाड़ी जाती है। फिर पूरा परिवार ऐसे बैठकर हिसाब देखता है जैसे पुरातत्व विभाग कोई प्राचीन शिलालेख पढ़ रहा हो।

“देखो, इनके यहाँ से 2001 आया था...”

“तो हमारे यहाँ से 2100 जाना चाहिए, आखिर इज़्ज़त का सवाल है।”

यानी रिश्ते नहीं, मानो यूपीआई ट्रांजैक्शन का इतिहास चल रहा हो।

और यह परंपरा केवल शादी तक सीमित नहीं। बहू की मुंह दिखाई हो या बच्चे का मुण्डन संस्कार हर आयोजन में जेवर, कैश, गिफ्ट - प्रत्येक लेन-देन का बाकायदा लेखा-जोखा तैयार। कहीं ऐसा न हो कि भविष्य में भावनाओं का बैलेंस गड़बड़ा जाए।

विडंबना यह है कि कार्ड पर छपवाया जाता है - “आपका स्नेह और आशीष ही हमारे लिए सबसे बड़ा उपहार है।” लेकिन अंदरखाने व्यवस्था ऐसी होती है कि स्नेह की पाई-पाई का हिसाब चढ़ा लिया जाता है।

हमारा समाज बड़ा दिलचस्प है। मुंह पर मिठास ऐसी कि रसगुल्ला शर्मा जाए, और दिमाग में हिसाब ऐसा कि चार्टर्ड अकाउंटेंट भी प्रेरणा लेने लगे।

शायद आने वाले समय में चीजें बदलें, लेकिन फिलहाल तो अपने समाज में आपके प्यार और आशीर्वाद का पूरा हिसाब रखा जा रहा है।

रविवार, 26 अप्रैल 2026

धन की भूखः कॉस्ट कटिंग के नाम पर कारों से स्टेपनी गायब

भारतीय संस्कृति की पहचान हमेशा “थोड़ा ज़्यादा देने” में रही है। यहाँ 100 नहीं, 101 देने की परंपरा है—क्योंकि इसमें सिर्फ लेन-देन नहीं, बल्कि अपनापन और सुरक्षा का भाव होता है। दूधवाला माप से थोड़ा ऊपर तक दूध भर देता था, किसान अनाज तौलने के बाद एक मुट्ठी और डाल देता था। यह “एक मुट्ठी ज़्यादा” ही तो विश्वास की असली पूँजी थी।

लेकिन आज के समय में यह भावना जैसे धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। अब बाजार का नया मंत्र है—“कम दो, ज़्यादा लो।” इसे बड़े आराम से “कॉस्ट कटिंग” का नाम दे दिया गया है, ताकि सुनने में आधुनिक लगे, लेकिन असल में यह ग्राहक के हिस्से और सुरक्षा—दोनों की कटौती है।

इस सोच का सबसे चिंताजनक उदाहरण कार कंपनियों में देखने को मिलता है। कभी गाड़ी में मिलने वाली स्टेपनी सिर्फ एक अतिरिक्त टायर नहीं होती थी, बल्कि रास्ते में आने वाली अनिश्चितताओं के खिलाफ एक मजबूत सुरक्षा कवच होती थी। पहले उसका आकार छोटा किया गया, और अब तो कई गाड़ियों से इसे पूरी तरह हटा ही दिया गया है।

Maruti Suzuki Grand Vitara जैसी गाड़ियों में स्टेपनी की जगह अब सिर्फ एक पंचर रिपेयर किट दी जा रही है।

अब ज़रा सोचिए—रात का अंधेरा, सुनसान सड़क, परिवार साथ में… और अचानक टायर फट जाता है। उस वक्त यह छोटी सी पंचर किट क्या कर पाएगी? क्या यह टायर के फटने या कट जाने की स्थिति में आपकी मदद कर सकती है? जवाब साफ है—नहीं।

उस पल में “कॉस्ट कटिंग” नहीं, “सुरक्षा” मायने रखती है। लेकिन जब सुरक्षा को ही कम कर दिया जाए, तो मुनाफे का यह खेल बेहद खतरनाक हो जाता है।

विडंबना यह है कि यही कंपनियाँ अपने विज्ञापनों में “फैमिली सेफ्टी”, “भरोसा” और “केयर” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती हैं। लेकिन असलियत में, सबसे ज़रूरी सुरक्षा कवच को ही हटा दिया जाता है—सिर्फ कुछ रुपये बचाने के लिए।

पहले कहते थे—“थोड़ा ज़्यादा दे दो, ग्राहक खुश रहेगा।”

आज कहा जा रहा है—“थोड़ा कम दे दो, कंपनी ज़्यादा कमाएगी।”

सवाल सिर्फ एक स्टेपनी का नहीं है, सवाल उस सोच का है—जहाँ मुनाफा इंसान की सुरक्षा से बड़ा हो गया है।

अब हमें तय करना है—क्या हम 101 देने वाली संस्कृति को बचाएंगे, या अपना समाज 99 में भी कटौती को चुपचाप स्वीकार कर लेगा?

शनिवार, 22 नवंबर 2025

बिहार विधानसभा चुनाव 2025: शांतिपूर्ण लोकतंत्र का अद्भुत उदाहरण


बिहार, जिसे कभी चुनावी हिंसा और तनाव के लिये जाना जाता था, इस बार लोकतंत्र के इतिहास में एक उल्लेखनीय परिवर्तन का गवाह बना है। हाल ही सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव अब तक के सबसे शांतिपूर्ण चुनाव माने जा रहे हैं। न कोई बड़े पैमाने पर हिंसा, न प्रतिशोध की घटनाएँ—यह अपने आप में बिहार की लोकतांत्रिक परिपक्वता और प्रशासनिक तैयारियों का जीवंत प्रमाण है।

शांतिपूर्ण चुनाव के लिये सभी को बधाई

इस उत्कृष्ट उपलब्धि का श्रेय किसी एक संस्था या समूह को नहीं जाता। यह सामूहिक प्रयास की सफलता है।

  • बिहार की जनता, जिसने धैर्य, अनुशासन और समता के साथ मतदान किया।
  • भारत निर्वाचन आयोग, जिसने व्यापक और प्रभावी व्यवस्था की।
  • बिहार पुलिस और अर्धसैनिक बल, जिन्होंने बिना भय या दबाव के मतदान सुनिश्चित किया।
  • मतदान कर्मी, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपनी जिम्मेदारियाँ पूर्ण निष्ठा से निभाईं।

इन सबके प्रयासों ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि लोकतंत्र केवल मतदान का दिन नहीं बल्कि जनभागीदारी और अनुशासन का महोत्सव है।

राजनीतिक दलों की परिपक्वता

चुनावी भाषणों में भले ही तीखे शब्दों और आरोप–प्रत्यारोपों का दौर चला हो, परंतु परिणाम आने के बाद सभी दलों ने जनादेश का सम्मान किया। इससे यह प्रतीत होता है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच भी बिहार का लोकतंत्र संवाद और स्वीकार्यता की राह पर आगे बढ़ रहा है।

पश्चिम बंगाल के लिये एक सीख

इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का अंधकार अब भी गहरा है। वर्षों से चल रही राजनीतिक हिंसा—चाहे वह हत्याओं के रूप में हो, धमकियों में या आम नागरिकों के रक्तपात में—एक लोकतांत्रिक समाज की आत्मा को चोट पहुँचाती है।


विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक चली विचारधारात्मक राजनीति और जमीन-स्तर पर हिंसा-आधारित सत्ता संरचना इसका मुख्य कारण रही है। आज भारत के किसी अन्य राज्य में इतनी तीव्र और संगठित चुनावी हिंसा नहीं देखी जाती।

साल 2026 में पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले, वहाँ के नेतृत्व और जनता—दोनों को बिहार से सीख लेनी चाहिये। लोकतंत्र में सत्ता बदलने का अधिकार जनता का है, न कि हिंसा और भय का।

मीडिया की चुप्पी और बिहार की अनदेखी उपलब्धि

गौर करने वाली बात यह है कि इतने शांतिपूर्ण चुनाव के बावजूद राष्ट्रीय मीडिया ने बिहार की इस उपलब्धि को शायद ही उचित ध्यान दिया। हिंसा की खबरें सुर्खियों में आती हैं, लेकिन जब कोई राज्य शांतिपूर्ण लोकतंत्र का उदाहरण प्रस्तुत करता है—अक्सर वह अनदेखा रह जाता है।

बिहार ने साबित किया है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति, जनता का सहयोग और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान साथ हो, तो कोई भी राज्य हिंसक चुनावी इतिहास से निकलकर परिवर्तन की राह पकड़ सकता है।


यह चुनाव केवल सरकार गठन की प्रक्रिया नहीं था, बल्कि एक संदेश था—भारत का लोकतंत्र प्रगति की परिपक्व अवस्था में प्रवेश कर रहा है।

बिहार की यह उपलब्धि आने वाले वर्षों में अन्य राज्यों के लिये मार्गदर्शक बनेगी, और उम्मीद है कि देश का राजनीतिक वातावरण इसी तरह संयमित और शांतिपूर्ण बने।

शुक्रवार, 6 सितंबर 2024

कर्म फल

बहुत खुश हो रहा वो, यूरिया वाला दूध तैयार कर

कम लागत से बना माल बेचेगा ऊंचे दाम में जेब भर

बहुत संतुष्ट है वो, कि उसके बच्चों को यह नहीं पीना

बनाया है दूसरों के लिए, किसको यहां अधिक जीना


भूल गया है कि कोई और कर रहा आइसक्रीम में मिलावट

जिसे खरीदकर खाएंगे उसके बच्चे बड़े चाव से झटपट

खुद के मिलावटी दूध से अपने बच्चों को तो बचा लिया

पर जो मिलावटी आइसक्रीम वे खा रहे उसका क्या


आइसक्रीम वाले के बच्चे रोज खा रहे मिलावटी नमकीन

धन को लक्ष्य बनाकर तली गई है बिल्कुल होकर भावहीन 

और नकीमन वाले के बच्चों को नसीब हैं मिलावटी मसाले

पैकेट बंद अच्छे ब्रांड के चुनकर किये हैं पत्नी के हवाले


बड़े ब्रांड को भी बिना मिलावट के कहां मुनाफा आता है

आटे में नमक के बराबर तो पूरे देश में चल ही जाता है

मसाले वाले सेठ के बच्चे भी कहां बच पा रहे मिलावट से

चपेट में आ ही जाते हैं कहीं न कहीं इस गिरावट के


उसके बच्चे खा रहे बड़े होटल में मिलावटी पनीर का टिक्का

फाइव स्टार भोजन को समझ बैठे हैं एकदम खरा सिक्का

पर इस मिलावटी दौर में कहां अछूते हैं तथाकथित फाइव स्टार

सरल कमाई के इस दौर में शुद्धता की बात करनी है बेकार


मिलावटखोर चाहता है कि उसके बच्चे मिलावटी खाने से बचें

पर विधाता ने हर किसी के लिए कर्मों के फल यहीं पर रचे।


© सचिन राठौर

मंगलवार, 3 सितंबर 2024

सीसीटीवी कैमरा

सीसीटीवी कैमरा देख ठिठक गया है उसका मन,

सहसा बदल गए हैं चाल-ढाल और आचरण,

सतर्क हो गया है अपने बर्ताव में, व्यवहार में,

अभिनय ऐसा जो भरा हो एक उम्दा फनकार में,

दिखना चाहता है अधिक सभ्य और अत्यंत कुशल,

यही सोच कर रही अंदर गहरी उथल-पुथल,

कहीं कोई देख रहा हो कैमरे से उसका चाल-चलन,

जाने किस नज़र से कर रहा हो उसका आंकलन,

छोटे से कैमरे ने कर दिया इतना बड़ा परिवर्तन,

बेपरवाह व्यक्तित्व में भर दिया त्वरित अनुशासन,

वैसे एक कैमरा तो लगा है उसके स्वयं के भीतर भी,

रिकॉर्ड करता सब तस्वीरें और है एक अच्छा टीचर भी,

अंतर्मन के सीसीटीवी कैमरे से देखा होता अपने कर्म को,

तो समझ गया होता अब तक जीवन के असली मर्म को।


© सचिन राठौर

‘हनुमान अंश’ की सफलताः देशज कहानी की जीत

भारतीय सिनेमा में सफलता का पैमाना लंबे समय से बड़े बजट, बड़े सितारों, विदेशी लोकेशन और भव्य प्रचार से जोड़ा जाता रहा है। ऐसे समय में ‘हनुमान अं...