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रविवार, 14 दिसंबर 2014

गोलगप्पे की बात ही कुछ और है

चाट की दुनिया में गोलगप्पों का कोई तोड़ हो नहीं सकता। बिना कोई गरिष्ठता लिए, सीधा, सरल, प्यारा सा गोलगप्पा। दिखने में जितना गोलू-मोलू खाने में उतना की जायकेदार। बशर्ते उसका पानी जरा ठीक से बनाया गया हो। फिर बीच में चाहे आलू भरा हो या काला चना या फिर उबली मटर। मुंह में जाते ही खट्टे, मीठे, चटपटे स्वाद के साथ घुल जाता है। लेकिन अगर आप मुंह बड़ा करके नहीं खोल सकते तो इसे खाने से बचें या अकेले में ही खाएं।

चटपटा स्वाद, मजेदार नाम 
इसका स्वाद जितना चटखारेदार है उतने ही रोचक इसके नाम हैं। भारत के अलग-अलग हिस्सों में इसे कई मजेदार नामों से पुकारा जाता है, जैसे दिल्ली में गोलगप्पा, पश्चिमी यूपी में पानी के बताशे, बंगाल में फुचका, हरियाणा और पंजाब में पानी के पताशे, महाराष्ट्र और गुजरात में पानी पूरी, उड़ीशा में गुपचुप, मध्यप्रदेश में फुल्की जैसे नामों से फेमस हैं। हाल ही में आई क्वीन फिल्म में हिरोइन कंगना राणावत ने भी इन नामों का जिक्र किया है। इसके चाहने वाले भी हर उम्र में मिलते हैं। छोटे बच्चे जरूर इसका तीखा स्वाद नहीं झेल पाते, लेकिन टीन-एज से लेकर ओल्ड-एज तक इसके कद्रदानों की तादाद बहुत बड़ी है। हालांकि कुछ लोग ऐसे भी आपको मिल सकते हैं जो कहेंगे कि गोलगप्पे भी कोई खाने की चीज है (फिलहाल उनसे बहस करने का कोई मूड नहीं है)।

गोलगप्पे और नफासत!
गोलगप्पे खाने का तरीका परंपरागत देसी वाला ही अच्छा लगता है। मतलब हाथ में हो दोना (पत्ते वाला,प्लास्टिक का नहीं) और सामने वाला एक-एक करके खिलाए। प्लेट में पानी और गोलगप्पे रखकर खुद खाले वाला नफासती तरीका अपन को नहीं जंचता। हाथ में पन्नी पहनने तक तो ठीक है, लेकिन एक शादी में गए तो कैटरर ने नफासत की पूरी टांग ही तोड़ रखी थी। एक जगह गोलगप्पे और दोने रख दिए और दो जगह डिस्पेंसर में पानी भरकर रख दिया। टोंटी खोलो, गोलगप्पे में पानी भरो और खुद ही खाओ। जबरदस्ती की नफासत दिखाने के चक्कर में वहां लंबी लाइन लग गई और व्यवस्था डोल गई। न स्वाद आया न मजा, पानी गिरने से जूता गीला हुआ सो अलग।

सस्ता ही अच्छा
बात गोलगप्पे के दामों की करें तो ये इन दिनों दस रुपये प्लेट से लेकर साठ रुपये प्लेट तक मिलते हैं। लेकिन गोलगप्पा एक ऐसी चाट है जो महंगी नहीं जंचती। ये सस्ती और आम आदमी से जुड़ी हुई चीज है। आज के समय के हिसाब से दस रुपये से ज्यादा नहीं मिलनी चाहिए। लेकिन दिल्ली के कुछ ब्रांडेड फूड चेन इस सस्ती चाट को भी 60 रुपये में बेचकर गोलगप्पे की सादगी और स्वाद का अपमान करते हैं। अपनी तो यही राय है कि ऐसी जगह गोलगप्पे कभी नहीं खाने चाहिए। जबकि मेरठ में अच्छे से अच्छे गोलगप्पे 10-20 रुपये में ही मिलते हैं। हालांकि गोलगप्पे के लिए 20 रुपये भी ज्यादा हैं। क्योंकि गोलगप्पे गिनकर प्लेट के हिसाब से खाने की चीज नहीं है। एक बार खाओ तो तब तक खाओ जब तक मन न भर जाए। दिल्ली में रहकर मैं मेरठ के गोलगप्पे मिस करता हूं। आबूलेन के टी प्वाइंट पर डेरावाल चाट भंडार के गोलगप्पों का जवाब नहीं साहब। खट्टे, मीठे और हींग के पानी की तीन वैरायटी के  साथ, सस्ते और स्वादिष्ट।

हजारों गोलगप्पे वाले, लाखों गोलगप्पे
ये स्वादिष्ट चाट हजारों लोगों को रोजगार भी मुहैया कराती है। शहर की गलियों में हजारों रेहड़ी-फेरी वाले गोलगप्पे बेचकर अपने घर की गुजर-बसर करते हैं। बेरोजगारी की स्थिति में कोई नया काम शुरू करने के लिए ये एक कम इन्वेस्टमेंट वाला बिजनेस आइडिया है। अगर आपके हाथ में स्वाद, जुबान पर मिठास और रेट लाजमी हों तो ग्राहक खोजना कोई बड़ी बात नहीं। एक दिन मेरठ में राकेश जी के साथ मैंने बैठे-बैठे हिसाब जोड़ा तो पता चला कि शहर में प्रतिदिन तकरीबन तीन लाख गोलगप्पों की खपत है। ये अंदाजा उस समय और पुख्ता हो गया जब कहीं से ये खबर मिली कि शहर में एक गोलगप्पे की फुल्की बनाने वाला प्लांट लगने जा रहा है, जो शहर के सभी मशहूर गोलगप्पे वालों को उचित रेट पर रेडीमेड फुल्कियां मुहैया कराएंगे।

गोलगप्पे का ठेला और पुलिस
कभी-कभी गोलगप्पे का मोह मुझे कहीं भी ब्रेक लगाकर इनका स्वाद चखने को मजबूर कर देता है। पिछले दिनों घर लौटते वक्त वैशाली में गोलगप्पे का नया ठेला दिखा तो एक प्लेट आजमाने के लिए मैं वहां रुका। दस रुपये के पांच पीस दिए। रेट के हिसाब से उसका स्वाद ठीक-ठाक था। ज्यों ही मैं उसके पैसे देकर आगे बढ़ा तभी एक पुलिस जीप चैराह पर आकर रुकी और उसमें से एक रौबदार आवाज ने गाली का छौंक लगाकर गोलगप्पे वाले को अपने पास बुलाया। गोलगप्पे वाला थोड़ा झिझकता हुआ वर्दीधारियों के पास जा पहुंचा, कुछ सवाल-जवाब हुए, फिर एक नई गाली की टेक के साथ जोरदार तमाचे की आवाज आई। उत्तर प्रदेश पुलिस ने अपनी वीरता का परिचय देते हुए बीच चैराहे पर गोलगप्पे बेचने वाले उस युवक की इज्जत उतार दी। अगले दिन मैंने उससे पूछा तो उसने बताया कि स्टाल लगाने से पहले हल्का इंचार्ज से महीना तय नहीं किया था, अब मामला तय हो गया है। साहिबान ये आलम तक है जब केंद्र सरकार रेहड़ी-ठेले वालों के हितों की रक्षा के लिए स्ट्रीट वेंडर्स बिल पास कर चुकी है। पर सरकारी रक्षक उस बिल की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। गोलगप्पे वाले का कुसूर सिर्फ इतना है कि वो इज्जत और ईमानदारी से गुजर-बसर करना चाहता है। अगर वो भी नक्सलियों की तरह बंदूक उठा ले या अपराध की दुनिया में उतर जाए तो यही यूपी पुलिस उसके आगे दुम हिलाती नजर आएगी।

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

रफ्ता-रफ्ता आउट-डेटेड होती जिंदगी

छोटी सी जिंदगी में हम बार-बार आउट-डेटेड हो रहे हैं। कभी मोबाइल के बहाने, कभी टीवी के बहाने, कभी कपड़ों के बहाने, कभी खानपान के बहाने तो कभी अपनी सोच के बहाने। पिछली पीढ़ी को ये सुविधा उपलब्ध नहीं थी, जब उनको आउट-डेटेड कहा जाता था तब तक वे 60 के पार पहुंच जाते थे, पर अब आप टीन एज में भी आउटडेटेड कहलाए जा सकते हैं। हालत ये है कि आप आउट-डेटेड होने से बच नहीं सकते क्योंकि बाजार और टेक्नोलाॅजी आप से दस कदम आगे चल रहा है। बाजार के साथ कदमताल करने के लिए आपकी जेब में दम होना चाहिए। जेब में दम नहीं तो आप बाजार से पीछे तो रहेंगे, लेकिन खुद को सही साबित करने के लिए थोड़ा ज्ञान भी बांचेंगे और आपका ये ज्ञान फिर आपकी आउट-डेटेड सोच का परिचायक बन जाएगा।

नरेंद्र मोदी के प्रचार तंत्र के सामने कांग्रेस का प्रचार तंत्र एकदम आउट-डेटेड साबित हुआ, जैसे स्मार्ट फोन के सामने साधारण मोबाइल फोन आउट-डेटेड होते जा रहे हैं। अब तक शाहरुख खान की डीडीएलजे सबकी जुबान पर थी लेकिन ज्यों ही आलिया भट्ट अभिनीत ‘हम्प्टी शर्मा की दुलहनिया’ आई तो पता चला कि हमारे जमाने का प्यार करने का स्टाइल भी अब आउट-डेटेड हो गया है। शहर के व्यस्ततम चौक पर अपनी पुश्तैनी दुकान को एक शोरूम में तब्दील करके दुकानदारी पर बैठे लालाजी से अगर आप आॅनलाइन शाॅपिंग की बात छेड़ दो तो बुरी तरह फनफना जा रहे हैं और फ्लिपकार्ट, अमेजन, स्नैपडील जैसी साइट्स को जमकर गरियाकर उनका सामान फर्जी बता रहे हैं। पर वो ये स्वीकार करने को कतई तैयार नहीं कि वो और उनका शोरूम अब आउट-डेटेड हो गया है।

तो जी, फिर से बताएं कि खुद को आउट-डेटेड होने से बचाने के लिए आपके बटुए में दम होना जरूरी है। खानपान से लेकर बोलचाल तक, शाॅपिंग से लेकर बैंकिंग तक, मोबाइल से लेकर टीवी, फिल्मों से लेकर सीरियल्स, नेता से लेकर अभिनेता, लाइफस्टाइल से लेकर लविंगस्टाइल तक सब बहुत तेजी से बदल रहे हैं। इस तीव्र गति बदलाव के साथ कदमताल करना एक काॅमन मैन के बस की बात नहीं, इसके लिए सुपर मैन होना जरूरी है। दूसरा फाॅर्मूला ये है कि ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना’ वाले सिद्धांत को आत्मसात करते हुए आप अपनी गति से चलते जाएं और लोगों को अपनी जुबानी खुजली मिटाने का मौका देते रहे।

वैसे तो आपकी जिंदगी की डेट हर रोज आपके हाथ से निकल रही है, लेकिन उससे ज्यादा मतलब नहीं है। असली मतलब इस बात से है कि आप बाजार और टेक्नोलाॅजी के हिसाब से आउट-डेटेड न हो जाएं। वैसे भारतीय संस्कृति की बात की जाए तो हम भारतीयों की प्राथमिकता पर जिंदगी की डेट्स होनी चाहिए, पर एक विकासशील देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था की मजबूरियों और अंतर्राष्ट्रीय मानकों को ध्यान में रखा जाए तो राष्ट्र का हित इसी में है कि उसके नागरिक अपना ज्यादा से ज्यादा ध्यान बाजार और टेक्नोलाॅजी के हिसाब से खुद को अपडेट करने पर लगाएं।

हमारे ऋषि-मुनि तो बहुत पहले ही कह गए हैं कि बाबू ये संसार सब माया है ज्यादा चक्कर में मत पड़ना अगर संसार के ज्यादा चक्कर में पड़ोगे तो इह लोक तो खराब होगा ही परलोक भी बिगड़ जाएगा, इसलिए जिंदगी की डेट्स का ध्यान रखना और जितना वक्त इस दुनिया में आए हो प्रभु का भजन करते हुए सत्कर्मों में लगा देना। लेकिन हमारी सरकार और बाजारू ताकतें यही चाहती हैं कि आप खुद को बाजार के हिसाब से अपडेटेड रखें, इसी में देश और विश्व की अर्थव्यवस्था की भलाई है। यदि हर कोई अपनी जरूरतों को कम करके हरि भजन करने लग गया तो संसार की आर्थिक कश्ती डूब सकती है। बीच-बीच में कुछ धर्म धुरंधर बढ़ते उपभोक्तावाद के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद तो करते हैं, लेकिन ध्यान से देखने पर धर्म भी खुद बाजार की गिरफ्त में खड़ा मिलता है।

सो, अंत में गौतम बुद्ध के मध्यम मार्ग का ही सहारा लेना पड़ता है, के भैया इतना भी मत जुटाओ की बाजार के हिसाब से चलकर ईएमआई भरते-भरते कमरिया टूट जाए और इतने भी सिद्धांतों पर अडिग मत रहो कि दीन-हीन की श्रेणी में आ जाओ।

शनिवार, 31 मई 2014

नई सरकार और भारत के गांव

भारतीय शहर और गांव में इतना बड़ा अंतर है कि उन्हें देखकर ये लगता ही नहीं कि वे एक ही देश के हिस्सा हैं। भारतीय गांव की असली तस्वीर किसी पेंटिग में बनी गांव की सुंदर सी तस्वीर से बिल्कुल विपरीत है। गांवों और शहर के विकास के लिए केंद्र सरकार ने  अलग-अलग मंत्रालय खड़े किये- शहरी विकास और ग्रामीण विकास मंत्रालय। जहां तक शहरी विकास का मामला है तो वह तो खुली आंखों से स्पष्ट नजर आता है, लेकिन अगर गांव के विकास की बात करें तो वह केवल किसानों की जमीन अधिग्रहण तक ही नजर आता है। जब भी सरकार कोई भी नया काॅलेज या अस्पताल खोलने की घोषणा करती है तो वह शहर के लिए ही होती है, यानि हर काम के लिए गांव वाले ही शहर आएं। इसका विपरीत कभी होते नहीं देखा। यहां तक कि देश के नेताओं को भी अगर चुनावी रैली करनी है तो वह शहर में ही होगी, गांव में जाकर रैली करना केवल किसी विशेष अवसर पर ही होता है। 67 साल की आजादी में गांवों को मुख्य धारा से जोड़ने के दावे और वादे तो बहुत हुए पर गांव अभी भी बहुत उपेक्षित हैं। अब अच्छे दिन देने का वादा करके देश में नई सरकार आई है। लोगों में उत्साह है और उनकी नए प्रधानमंत्री से ‘महा‘ अपेक्षाएं हैं। ऐसे में गांव के कुछ मुद्दों को उठाने का प्रयास-

गांव की राजनीतिः राजनीति जब राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो तो अच्छी होती है, लेकिन अगर वही राजनीति गांव और घर में होने लगे तो बेहद घातक सिद्ध होती है। इसके दुष्परिणाम सामने आने भी लगे हैं। पंचायती राज व्यवस्था बनाई तो गई थी गांवों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए, लेकिन इस व्यवस्था ने कितना वीभत्स रूप अख्तियार किया है, ये उत्तर प्रदेश के कुछ गांवों में जाकर देखें। आपसी प्रेम, सौहार्द और सहयोग पर टिका गांव का समाज गांव की राजनीति के कारण पूरी तरह बिखर चुका है। आपसी सहयोग की भावना पैसे की दौड़ में खत्म होती चली जा रही है। ऐसे में गांवों में होने वाले प्रधानी के चुनावों पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। महात्मा गांधी ने जिस ग्राम स्वराज की अवधारणा देश को दी थी वो वर्तमान पंचायती राज व्यवस्था कभी नहीं दे सकती। सही मायने में गांधी के ग्राम स्वराज को वास्तविकता में उतारने का प्रयोग अगर किसी ने किया है तो वह अन्ना हजारे ने रालेगण सिद्धि और उसके आसपास के गांव में कर के दिखाया है। नई सरकार को ग्रामीण भारत के उत्थान के लिए पंचायती राज व्यवस्था पर नये सिरे से सोचना चाहिए। गैर सरकारी संगठन और सीएसआर ग्रामीण उत्थान में बड़ा सहयोग कर सकते हैं। बस जरूरत यही है कि जो भी योजना या कदम उठाए जाएं उनमें गंभीरता हो, सिर्फ पैसे कमाने और नेतागीरी के उद्देश्य से काम न हो।

किसान और खेती को सम्मानः ग्लैमरस नौकरियों के इस दौर में ग्रामीण युवा के बीच खेती के प्रति तेजी से अरुचि पैदा हो रही है। गांव का युवा अब हल चलाना नहीं चाहता, उसको भी शहर में अच्छी नौकरी की दरकार है। बड़ी तादाद में ग्रामीण युवा इस दिशा में सफल भी हो रहे हैं, सरकारी और निजि क्षेत्र दोनों में अपना परचम लहराया है। इनमें अधिकांश मामले उन युवाओं के हैं, जिनके परिवारों की माली हालत पहले से ठीक-ठाक होती है। इधर जिन युवाओं का शहर में नौकरी का सपना पूरा नहीं हो पाता वो भी खेती-किसानी से कतराता है। भले ही पूरे देश को किसान की उपजाई फसल के कारण दो वक्त की रोटी नसीब होती हो, लेकिन खेती करना समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता है। इसलिए नई सरकार को खेती को प्रोमोट करने की दिशा में ध्यान देना चाहिए। गांव से तेजी से हो रहा पलायन रोकने के लिए उनके आसपास ही रोजगार हों। खेती के साथ-साथ उनके हाथ में जो हुनर है उसको नजदीक में ही बाजार मिले। ऐसे तमाम उदाहरण इसी देश में उपलब्ध हैं जहां बड़ी-बड़ी नौकरियां छोड़कर लोगों ने खेती करना बेहतर समझा। खबरें आ रही हैं कि सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश पी. सताशिवम् रिटायरमेंट के बाद दिल्ली में रहने के बजाय तमिलनाडु स्थित अपने गांव जाकर खेती करेंगे।

उपजाऊ जमीन और विकासः ये भी अजीब विडंबना है कि भारत में सिमेंटीकरण की प्रक्रिया को ही विकास का मापदंड समझा जाता है। जिस इलाके में जितना ज्यादा सीमेंट ठुका है यानि वो उतना ही विकसित है। कच्चे छप्पर वाले घर पिछड़ेपन की निशानी बन गए हैं। सिमेंटीकरण को बढ़ाकर शुरू हुआ विकास का दौर इस कदर फैल रहा है कि गांव की खेतीहर भूमि को भी कब्जे में लेता जा रहा है। रीयल एस्टेट की छतरी के नीचे फैल रहा हाई राइज अपार्टमेंट कल्चर दिल्ली से निकल कर एनसीआर, फिर एनसीआर से निकल कर वृहद एनसीआर और वृहद एनसीआर से निकल कर छोटे-छोटे शहरों की उपजाऊ जमीन कब्जाता जा रहा है। आलम ये है कि मेरठ जैसे उपजाऊ जिले के किसानों ने भी थोड़े से लाभ के लिए बड़े पैमाने पर अपनी खेती की जमीन रीयल एस्टेट के हाथों बेच दी और बेच रहे हैं। इसी तरह 160 किलोमीटर लंबे नवनिर्मित यमुना एक्सप्रेस वे के दोनों तरफ हजारों एकड़ उपजाऊ जमीन को भी अर्बन जोन में तब्दील करने की भी महायोजना है। इतनी बड़े स्तर पर उपजाऊ जमीन का सीमेंटीकरण करना न केवल पर्यावरण की दृष्टि से बल्कि कृषि उत्पादन की दृष्टि से भी नुकसान दायक साबित होगा। जबकि जरूरत इस बात की है कि देश में ऐसी भूमि को चिन्हित किया जाए जो अनउपजाऊ और बेकार पड़ी हैं। नए टाउनशिप, इंडस्ट्रियल एरिया डेवलप करने से पहले इलाके का सर्वे कराकर बेकार और बंजर जमीन को प्राथमिकता दी जाए। हालांकि ये थोड़ा जटिल कार्य होगा, पर अगर ध्यान नहीं दिया गया तो परिणाम आगे लिखे हैं।

काॅस्मेटिक फूड-काॅस्मेटिक जेनरेशनः मेरठ में पत्रकारिता के दौरान एक बार सेंट्रल पटैटो रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीपीआरआई) के एक वैज्ञानिक का इंटरव्यू लेने का मौका मिला। बातचीत करते-करते हाइब्रिड बीज और जीएम बीज तक पहुंची। मैंने उनसे पूछा कि आजकल के अनाज में वो पहले वाली खुशबू क्यों नहीं है। गेहूं की रोटी, अरहड़ की दाल और बासमती चावल में वो पहले जैसी बात कहां चली गई? क्या ये हाइब्रिड बीजों का नतीजा है। उन्होंने न लिखने की शर्त पर बताया कि ‘देश की जनसंख्या लगातार तेजी से बढ़ रही है और उपजाऊ जमीन उतनी ही तेजी से घट रही है। ऐसे में सरकार की पहली प्राथमिकता है इतनी बड़ी जनसंख्या का पेट भरना। इसलिए सरकार का मुख्य ध्यान पैदावार पर है, गुणवत्ता पर नहीं। यानि क्वांटिटी प्राथमिकता है क्वालिटी नहीं। हाइब्रिड और जीएम बीजों की मदद से पैदावार में जबरदस्त इजाफा देखने को मिला है‘। पर्यावरणविद् समय-समय पर जीएम फूड के नुकसानों की ओर ध्यान खींचते रहे हैं। एक और नुकसानदायक प्रत्यक्ष उदाहरण पंजाब में देखने को मिलता है जहां अच्छी पैदावार के चक्कर में केमिकल फर्टिलाइजर और पेस्टिसाइड्स के प्रयोग से वहां कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इस तरह का अन्न खाकर देश की आने वाली पीढ़ी कैसी होगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। नए पर्यावरण मंत्री ने बयान तो दे दिया कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, लेकिन असलियत तो यही है कि विकास पर्यावरण की कीमत चुकाकर ही होता है। अब ये नई सरकार को तय करना है कि वो सिमेंटीकरण के विकास का अनुसरण करे या फिर विकास के नए अर्थ गढ़े। 

गोधन और जैविक खादः खेती और गौपालन को समाज में सम्मान दिलाना बहुत जरूरी है। व्हाइट काॅलर जाॅब का आकर्षण गांव के युवाओं को खेती और गौपालन से खींच रहा है। अच्छी खेती के लिए गायों का बड़े स्तर पर पालन होना चाहिए उनका कटान नहीं। गायों का पालन हर दृष्टि से लाभदायक है, इसे बार-बार बताया गया है। बच्चों के लिए दूध से लेकर किसान को जैविक खाद प्रदान करने तक गायें हर तरह से अर्थव्यवस्था में लाभदायक है। जरूरत इस बात की है कि गौपालन का काम भी समाज में सम्मान से देखा जाए। अन्यथा सिंथेटिक दूध, दही और पनीर खाकर बढ़ रही पीढ़ी कितनी मजबूत होगी ये कहना मुश्किल है। सरकार चाहे तो शहरों में घरों से निकलने वाला कचरा और नदियों की सफाई में निकलने वाले कचरे को भी जैविक खाद् में तब्दील कर किसानों को मुहैया करा सकती है।

गांव की संस्कृतिः इसे बाॅलीवुड का असर ही कह सकते हैं कि गांव का नाम सुनकर जो पहली तस्वीर बनती है वो है एक हरा-भरा, साफ-सुथरा स्थान जहां सीधे-सरल लोग रहते हैं। जबकि सच्चाई इसके उलट है। न तो गांव उतने हरे-भरे रहे और न साफ-सुथरे। गांव की राजनीति ने वहां के लोगों को भी सीधा और सरल नहीं रहने दिया है। वो तो भला हो पाॅपुलर के पेड़ों से मिलने वाले आर्थिक लाभ का कि कई गांवों में इन पेड़ों की वजह से हरियाली फिर लौट आई है। फिर भी हर गांव की अपनी एक संस्कृति होती है, जो शहरीकरण की होड़ और दौड़ में खोती जा रही है। वहां की बोलचाल, भाषा, वेशभूषा तथाकथित माॅडर्न कल्चर की भेंट चढ़ती जा रही है। इसे घर-घर लगे टेलीविजन का ही असर कहें या आधुनिक दिखने की होड़ कि गांव की अपनी बोली का स्थान एक सभ्य खड़ी हिंदी लेती जा रही है, वहां का खानपान बदल रहा है, पहनावा बदल रहा है। हालांकि बदलाव अवश्यंभावी है और उसको स्वीकार किया जाना चाहिए, लेकिन किस हद तक ये सोचना होगा!

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

स्टिंग आॅपरेशन और एक दिन की नैतिकता!

"There are well known instances of bad journalism, like unfair reporting, pronouncement of guilt without fair trial , invasion of privacy, insensitive portrayal of victims." -N Ravi, Editor, The Hindu (July 6, 2012)

एक दौर था जब पत्रकारिता तीक्ष्णता और बुद्धिमत्ता का काम था। समय बदला और पत्रकारिता धीरे-धीरे टीआरपी और सर्कुलेशन का नाम हो गया। जितनी ज्यादा टीआरपी और सर्कुलेशन उतने ज्यादा विज्ञापन, जितना ज्यादा विज्ञापन उतनी ज्यादा इनकम। भारत में प्रिंट मीडिया का इतिहास खासा पुराना है, सो कुछ अखबारों को अगर छोड़ दिया जाए तो अधिकांश अखबारों ने फिर भी पत्रकारिता की गरिमा को बचा रखा है। लेकिन इलेक्ट्राॅनिक मीडिया में 24 घंटे वाले खबरिया चैनल अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए नित नए हथकंडे आजमा रहे हैं। इनमें स्टिंग आॅपरेशन भी एक ऐसा ही हथकंडा है, जो चैनल को कुछ समय के लिए अच्छी टीआरपी दिला देता है।

इन स्टिंग आॅपरेशनों ने किसी को नहीं बख्शा है- नेता, संत, महात्मा, डाॅक्टर, ब्यूरोक्रेट, काॅरपोरेट, बाॅलीवुड, टीचर, प्रोफेसर सब इसकी जद में आ चुके हैं। देश में राजनीतिक और धार्मिक स्टिंग आॅपरेशन सबसे ज्यादा बिके हैं। पर यहां मौलिक प्रश्न यही उठता है कि स्टिंग आॅपरेशन करके दूसरे पर कीचड़ उछालने वाले खुद कितने दूध के धुले हैं। स्टिंग आॅपरेशन के दौरान नैतिकता की बार-बार दुहाई देने वाले खुद कितने नैतिक हैं। सच पूछा जाए तो नैतिकता का आधार इतना ऊंचा है कि अगर हर चीज में नैतिकता को ही आधार बना दिया जाए तो देश के तमाम व्यवसायिक संस्थान और व्यवस्थाओं को चलाना असंभव है। शायद की कोई ऐसा पेशा है जिसे विशुद्ध नैतिकता के आधार पर चलाया जा सकता है। नैतिकता हर मोड़ पर आपके सामने अपने प्रश्न लेकर खड़ी मिलेगी। इसलिए कई बार आपको व्यवहारिकता की राह पकड़नी होती है। देश की कानून व्यवस्था कुछ ऐसी है कि घर से निकलने से लेकर अपने आॅफिस पहुंचने तक आप जाने-अनजाने तमाम नियम तोड़ते हैं। पर व्यवहारिक दृष्टि से उनको नजरंदाज किया जा सकता है। लेकिन स्टिंग आॅपरेशन करने वाले उस दिन नैतिकता का ऐसा पैमाना लेकर स्टूडियो में बैठते हैं कि सामने वाले को विश्व का सबसे बड़ा अपराधी और खुद को स्टिंग करने वाला सबसे बड़ा वीर घोषित कर डालते हैं। अगर चैनल नैतिकता के लिए इतने ही ज्यादा मचल रहे हैं तो फिर विज्ञापन लेने में नैतिकता को आधार क्यों नहीं बनाते, पेड न्यूज का काॅन्सेप्ट क्यों तेजी से फल-फूल रहा है। सही मायने में तो ये चैनल द्वारा ओढ़ी गई एक दिन की नैतिकता होती है, जिसका वे चिल्ला-चिल्लाकर ढोल पीटते हैं।

वास्तव में स्टिंग आॅपरेशन विश्वासघात का खेल है, जिसमें आप दूसरे को अपना बनाकर उसकी पीठ में छुरा भोंकते हैं। लेकिन इस स्टिंग को जनहित में बताकर नैतिकता के दायरे के अंदर धकेल दिया जाता है। देश में टीवी पत्रकारिता के उदय से लेकर अब तक तमाम स्टिंग आॅपरेशन किए गए, उसमें चैनल का पहला उद्देश्य जनहित के बजाय अपनी टीआरपी बढ़ाना था। लेकिन उस स्टिंग को परोसा कुछ इस तरह जाता है कि मानो उस चैनल से ज्यादा जनहितकारी संसार में कोई नहीं। भले ही स्टूडियो से उठने के बाद एडिटर महोदय खुद सेटिंग और गेटिंग का खेल खेलते हों, लेकिन कैमरे के सामने उनसे बड़ा नैतिकतावादी दूसरा कोई नहीं। खबरें किस तरह दबाई और भड़काई जाती हैं, कई संस्थानों के साथ काम करने के बाद इसका मुझे खूब अनुभव है। खबर को लिखते और पेश करते वक्त एक पत्रकार जितना शुद्धतावादी दिखता है, असल जिंदगी में उतना होता नहीं। लेकिन दूसरों से उसकी अपेक्षा ये रहती है कि नैतिकता की नंगी तलवार पर चलकर दिखाए।

भारतीय रेल में सफर के दौरान पहले एक परंपरा थी, लोग अपना खाना बांटकर खाते थे। अगर किसी का बच्चा भूखा रो रहा है, तो सहयात्री अपना खाने का डिब्बा खोलकर उसकी भूख मिटाने में देर नहीं लगाता था। इस परंपरा में जहरखुरानों को एक सुनहरा मौका नजर आया और उन्होंने यात्रियों को नशीला पदार्थ खिलाकर लूटना शुरू कर दिया। इसका नजीता यह हुआ कि आज रेल में कोई अपना खाना नहीं बांटता। मुझे लगता है कि ये स्टिंग आॅपरेशन समाज में थोड़े से बचे विश्वास को भी खा जाएंगे। 

शनिवार, 18 जनवरी 2014

एक था आम आदमी!

एक बार एक आम आदमी था। एक दम आम, खास होने के दूर-दूर तक कोई लक्षण नहीं। सादगी से जीवन जीता, दिन भर मेहनत करता, दो वक्त की रोटी कमाता और रात को चैन की नींद सोता। मनोरंजन के लिए उसके पास ज्यादा कुछ नहीं था, अपने तीज-त्योहार और कुछ लोक गीत। कभी-कभार सिनेमा भी देख आता था। उसकी दाल-रोटी आराम से चल रही थी। उसकी जरूरतें भी ज्यादा नहीं थीं।

फिर अचानक उसकी भेंट रेडियो नामक यंत्र से हुई। देश दुनिया की खबरें और फिल्मी गाने सुनने के लिए ये यंत्र उसको बढि़या लगा। थोड़े पैसे जोड़कर वो इस यंत्र को अपने घर ले आया। शाम को जब ये आम आदमी काम के बाद लौटता तो रेडियो पर खबरें सुनकर अपनी जानकारी बढ़ाता। रेडियो की खबरें सुनकर उसकी अपनी भी राय बनने लगी। उस पर प्रसारित होने वाले फिल्मी गानों की गीतमाला की उसे आदत सी पड़ गई। जिंदगी में छोटी-मोटी परेशानियां तो थीं, लेकिन आम आदमी टेंशन में कभी नहीं आता था। साधारण दाल-रोटी खाकर भी उसका स्वास्थ्य ठीक था।

समय बीता और आम आदमी को पता चला कि टीवी नामक यंत्र भी देश के शहरों में पांव पसारने लगा है। इस यंत्र पर आप गाने सुनने के साथ-साथ देख भी सकते हो। नाायक और नायिका टीवी पर नाचते हुए दिखते हैं। घर के घर में बैठे सिनेमा भी देख लो। यंत्र थोड़ा महंगा था, फिर भी आम आदमी पैसे जोड़-जोड़ कर जैसे-तैसे एक ब्लैक एंड व्हाइट टीवी घर में ले ही आया। बच्चों और पत्नी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पूरा परिवार बड़ी खुशी से टीवी पर रामायण, महाभारत सीरियल, चित्रहार और फिल्म देखता। आम आदमी को समाचार देखने का भी शौक था। समाचार से ही उसको पता चलता कि हमारी सरकार देश के प्रति कितनी चिंतित है। वो रोज दूरदर्शन पर प्रधानमंत्री के बयान सुनता। टीवी पर दिखने वाले तमाम नेताओं का आभामंडल उसको खासा आकर्षित करता। उसका भी मन होता कि काश वो भी उन्हीें की तरह बड़ा आदमी होता। 

खैर, टीवी देखकर ही उसको पता चला कि वो दुनिया से कितना पीछे चल रहा है। वो अभी तक घड़े का पानी पीता है, जबकि बाजार में फ्रिज आ चुका है। वो मंजन करता है जबकि दांतों को मोतियों की तरह चमकाने वाला पेस्ट बाजार में मौजूद है। पत्नी रद्दी से साबुन से कपड़े धोती है जबकि बाजार में साबुन की ऐसी नीली टिकिया आ चुकी है जो उसकी साड़ी को पड़ोसन की साड़ी से ज्यादा सफेद बना देती है। पत्नी का रंग इसलिए सांवला है क्योंकि वो गोरापन बढ़ाने वाली क्रीम नहीं लगाता। बच्चों को भी पता चल गया कि दूध ऐसे ही नहीं पीना चाहिए इसमें लंबाई बढ़ाने वाला पाउडर डालना चाहिए उससे दूध का स्वाद भी अच्छा लगता है। आम आदमी को लगने लगा कि बेहतर जीवन जीने के लिए घर में ये सब सामान होने जरूरी हैं। पत्नी और बच्चों की भी यही इच्छा थी। इसके लिए आम आदमी ने अपनी आमदनी बढ़ाने की सोची। छोटी सी सरकारी नौकरी में ये सब जुटा पाना मुश्किल था। सो, आम आदमी ने वही राह पकड़ी जिस पर उसके कुछ साथी चल रहे थे। आम आदमी अपनी तनख्वाह के अलावा मेज के नीचे से भी कमाना शुरू कर दिया।

आम आदमी के घर में धीरे-धीरे संसाधन जुटने लगे। आम आदमी अब अपने सपनों को जी रहा था। जिंदगी काफी आरामदायक लग रही थी। लेकिन उसके मन का चैन कहीं जाता रहा। पर आम आदमी ने उस चैन की परवाह किए बगैर अपना अभियान जारी रखा। आम आदमी को अभी भी वो नेताओं वाला आभा मंडल आकर्षित कर रहा था। लाल बत्ती, सलाम ठोकते अर्दली, बड़ा बंगला, दौलत, शौहरत। आम आदमी ने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाया। उनको एक से एक बेहतर सुविधा देने की कोशिश की। तब तक बाजार में नए-नए कोर्स भी आ गए थे। सो, एक बेटे को एमबीए कराया और दूसरे को बीटेक।

आज आम आदमी के पास गाड़ी है, बंगला है सब सुख सुविधाएं हैं। एक बेटा विदेश में है, दूसरा मुंबई में सेटल है। आम आदमी अपने बच्चों के साथ रोज वीडियो चैटिंग करता है। उसको ये सब बच्चों न ही सिखाया। बच्चे इतने व्यस्त हैं कि माता-पिता के पास कम ही आ पाते हैं। फिर काम का इतना दबाव है कि उनकी तबियत भी ठीक नहीं रहती। आम आदमी को अपने बच्चों की याद तो आती है, लेकिन ये सुकून होता है कि उसके बच्चे भले ही उसके पास नहीं हैं पर अपनी मेहनत के दम पर अपने पांव पर खड़े हैं और सारी सुख सुविधाएं जुटा ली हैं।

लेकिन जब से ये आम आदमी पार्टी आई है तब से आम आदमी के मन में उथल-पुथल सी है। आम आदमी को लग रहा है कि जिन सुविधाओं के पीछे वो पिछले 30 सालों से दौड़ता रहा, ये नई पार्टी उन सुविधाओं को दरकिनार करके काम कर रही है। आम आदमी का मन बदल रहा है, पर उसको लगता है कि थोड़ी देर हो चुकी है क्योंकि उसने अपने जीवन का सबसे खूबसूरत दौर सुख-सुविधाओं के पीछे दौड़ने में बिता दिया।

रविवार, 8 दिसंबर 2013

आम आदमी की ताकत

चार राज्यों में झन्नाटेदार हार का सामना करने के बाद कांग्रेस के युवराज ने कहा- ’’शायद हम आम लोगों को अपने साथ नहीं जोड़ पाए। लेकिन अब हम कांग्रेस के साथ भी आम लोगों को जोड़ेंगे, और इस तरह जोड़ेंगे कि आपने सोचा भी नहीं होगा’’।

यहां सवाल यही उठता है कि इतनी करारी हार के बाद राहुल को आम आदमी की सुध क्यों आई। जब गली-गली, गांव-गांव घूमकर देश की नब्ज को समझ रहे थे, तब उनको समझ क्यों नहीं आया कि आम आदमी इस व्यवस्था से कितना आजिज आ चुका है। राहुल गरीब कलावती के घर पर रात बिताने के बाद भी उसके दर्द और जरूरतों को नहीं समझ पाए। कलावती के घर से लौटकर उन्होंने लंबा-चैड़ा भाषण तो दिया लेकिन सरकार में होते हुए भी कोई ऐसा ठोस कदम नहीं उठा पाए कि देश की सैकड़ों कलावतियों का भला हो। 

बस्तर की नक्सली हिंसा में तकरीबन 27 लोग मारे गए। कांग्रेस ने सहानुभूति भुनाने के लिए उस हमले में मारे गए नेताओं के परिजनों को तो चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिए, लेकिन कांग्रेस को ये ख्याल नहीं आया कि उन शहीद जवानों के परिजनों को भी टिकट दिए जाने चाहिए, जिन्होंने उन नेताओं की सुरक्षा करते हुए जान गंवाई। बल्कि ये काम बीजेपी भी कर सकती थी। लेकिन दोनों में से किसी पार्टी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। यही अंतर है आम आदमी पार्टी और दूसरी पार्टियों की सोच में। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में खालिस आम लोगों को टिकट दिए, उन युवाओं को मौका दिया जो अभी राजनीति का ककहरा भी नहीं जानते। आम आदमी पार्टी के नवनिर्वाचित विधायकों में से अधिकांश को भाषण देना भी नहीं आता। खुद केजरीवाल भी धाराप्रवाह नहीं बोल पाते। लेकिन फिर भी लोगों ने उन्हें जिताया। उसके पीछे बड़ा कारण यही है कि अब लोगों को भाषण देने वाला नहीं काम करने वाला नेता चाहिए। भाषण तो लोग पिछले 67 सालों से सुनते चले आ रहे हैं। उन भाषणों ने उनके जीवन को नहीं बदला। 

बस इतनी सी बात राहुल गांधी को समझनी होगी। अगर समझ गए तो आगे का रास्ता आसान हो जाएगा।

हार के बाद राहुल गांधी मीडिया के सामने दावा कर रहे थे कि वो किसी चमत्कारिक रूप से आम लोगों को कांग्रेस से जोड़कर दिखाने वाले हैं। उनका ये दावा बेहद संदेहास्पद है, क्योंकि ऐसा करने के लिए उन्हें कांग्रेस का पूरा कल्चर बदलना पड़ेगा। उन्हें उस बूढ़े फकीर के पास फिर से लौटना पड़ेगा जिसका ‘सरनेम’ वो आज तक इस्तेमाल कर रहे हैं। हो सकता है कि राहुल गांधी के मन की भावना अच्छी हो, लेकिन उस भावना को वो पिछले दस साल में कांग्रेस पर परिलक्षित नहीं कर पाए। दस साल की यूपीए सरकार ने देश को रिकाॅर्ड तोड़ भ्रष्टाचार, घोटाले और महंगाई की मार दी। खाद्य पदार्थों में जो महंगाई आई वो पूरी तरह आर्टिफिशियल थी और बाजारी ताकतों द्वारा पैदा की गई थी। उसका फायदा न तो किसान को मिल रहा था और न आम आदमी को। उसका लाभ केवल बिचैलिए और जमाखोर उठा रहे थे। कांग्रेस का नेतृत्व अपनी आंखों के सामने यह सब होता देखता रहा और देख रहा है। केवल मुफ्तखोरी की योजनाएं चलाने से देश और लोगों का भला कभी नहीं हो सकता। योजनाओं का असली लाभ तो किसी और की ही जेब में पहुंचता है। लोगों का भला तो उनको आत्मनिर्भर बनाने से ही होगा।

बहरहाल, इस कारारी हार के बाद राहुल गांधी को अगर आत्मविश्लेषण करना ही है तो एक महीने तक अपनी सलाहकार समिति से दूर रहकर केवल महात्मा गांधी का साहित्य पढ़ें। शायद उनको 2014 के लिए कोई दिशा मिले, अन्यथा लोगों ने अपने इरादे इन चुनावों में जता ही दिए हैं।

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

आओ मनाएं जश्न-ए-आजादी!

बचपन में स्वतंत्रता दिवस का मतलब एक ऐसा दिन जब स्कूल में प्रिंसिपल द्वारा झंडारोहण, एक पकाऊ भाषण और उसके बाद चपरासी के हाथों कागज के खलते में मिलने वाले बूंदी के दो लड्डू। स्कूल में एक घंटा खर्चने के बाद पूरा दिन अपना घर पर खेलने कूदने के लिए। 

ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ी इस आजादी के मायने पता चलते गए। प्रिंसिपल की जो बातें पहले समझ नहीं आती थीं, धीरे-धीरे समझ आने लगीं। समझ आने लगीं देश के अंदर व्याप्त समस्याएं, चुनौतियां, भ्रष्टाचार और चरमराता सिस्टम।

तरुणाई के समय जैसे तकरीबन हर युवा के मन में देशभक्ति का जज्बा जागता है, वो आकर विद्यमान हो गया। मन में तरह-तरह के संकल्प जागे, देश के लिए ये करेंगे, वो करेंगे, एक बड़ा बदलाव लाएंगे। कोई दिशा या ठोस रणनीति नहीं थी। बस एक जज्बा था, भावना थी। परिवर्तन के लिए राजनीतिक मंच सबसे ठोस जगह हो सकती थी, लेकिन दूर-दूर तक राजनीति से कोई नाता नहीं था। सो, पत्रकारिता को माध्यम चुना।

लेकिन पत्रकारिता में आकर पता चला ये तो खालिस व्यापार है। पहले तो विज्ञापनों को लेकर ही मीडिया की नैतिकता पर सवाल उठाए जाते थे, लेकिन अब तो इतने सवाल खड़े हो गए हैं कि सवाल भी खड़े-खड़े थक चुके हैं। और ये हालात केवल पत्रकारिता के ही नहीं हैं, प्रत्येक पेशे में नैतिक गिरावट दर्ज की जा रही है। पुलिस और राजनीति तो यूं ही बदनाम है, मेडिकल, ज्यूडिशियरी, रिटेल, बैंकिंग, रीयल एस्टेट कोई सा भी सेक्टर उठा कर देख लें हर जगह नैतिक पतन दिखेगा।

महात्मा गांधी ने 15 अगस्त 1947 को मिली आजादी पर कहा था कि जहां तक देश के सात लाख गांवों का सवाल है अभी भारत को सामाजिक, नैतिक और आर्थिक आजादी मिलनी बाकी है। उन्होंने देश के पहले जश्न-ए-आजादी में शिरकत भी नहीं की थी। बल्कि आजादी के बाद कांग्रेस को भंग करने की भी बात कही थी। तब उन्होंने कांग्रेस को भंग करने की बात क्यों कही होगी, ये आज की कांगे्रस को देखकर भलीभांति समझ आता है। गांधी युगदृष्टा थे। जिस कांग्रेस को उन्होंने अपने मेहनत से सींचा था, उसी कांग्रेस के कार्यकर्ता आगे चलकर देश के साथ क्या करेंगे, गांधी पहले ही समझ चुके थे। खैर उनकी बात तब भी नहीं सुनी गई, आज तो सुनेगा ही कौन।

गांधी की किताब ‘मेरे सपनों का भारत’ के पन्ने पल्टे जाएं तो पता चलता है कि वो देश की तमाम समस्याओं पर किस तरह सोचते हैं। छोटी-छोटी चीजों पर उन्होंने स्पष्ट दिशानिर्देश दे रखे हैं। जो शराब देश की रगों में सोची-समझी रणनीति के तहत उड़ेली जा रही है, उस शराब का तो उन्होंने घोर विरोध किया है। उन्होंने यहां तक लिख डाला कि उन्हें भारत का गरीब होना पसंद है, लेकिन देश का शराबी होना उनका मंजूर नहीं। उसी गांधी के देश में आज दूध की डेरियों से ज्यादा शराब के ठेके हैं। देश में मिल रहे प्रत्येक खाद्य पदार्थ में आज मिलावट है, केवल शराब ही है जिसमें कोई मिलावट नहीं और पूरी तरह शुद्ध रूप में जमकर बेची जा रही है।

गांधी जी ने जिन नैतिक मूल्यों की बात की थी, वे नैतिक मूल्य सत्ता की भूख ने चबाचबाकर खा लिए। यथा राजा तथा प्रजा के सिद्धांत को फलीभूत करते हुए राजनीति का नैतिक पतन अंततः देश के नागरिकों में गहराई तक समाता चला गया। ऐसा पाखंड शायद ही किसी देश में देखने को मिलता हो जहां के राजनीतिज्ञ और धर्मज्ञ मंच पर खड़े होकर आदर्शवाद का गान करें और मंच से उतरते ही भ्रष्टाचार और अनैतिकता के कीर्तिमान स्थापित करते हों। देश ने चाहे जैसा भी विकास किया हो लेकिन देश के चरित्र में जबरदस्त गिरावट आ चुकी है। हम पश्चिमी देशों में भले ही तरह-तरह के दोषारोपण करें, लेकिन एक चीज साफ है कि वहां के लोग मूल रूप से ईमानदार हैं, और हम लोग मूल रूप से बेईमान। हम रिश्तों को लेकर खासतौर से अपना गुणगान करते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा अवैध रिश्तों के कीर्तिमान इसी देश में स्थापित हैं। फर्क बस इतना है कि पश्चिम में रिश्तों पर खुलकर बात होती है और हम दबे-छिपे अवैध रिश्तों को पालते हैं।

आज एक नेता ऐसा नहीं बचा जिसके आदर्श बच्चों को पढ़ा सकें। राजनीति के हमाम में सब नंगे नजर आते हैं। इसलिए देश के नैतिक विकास के लिए राजनीति का नैतिक उत्थान सबसे पहले जरूरी है। जिस राम राज्य की कल्पना हम वर्षों से करते आए हैं, उस राम राज्य के लिए पहले ये समझना होगा कि राजा राम ने उस राज्य को स्थापित करने के लिए किस स्तर का तप किया। जब राम जैसा तपस्वी राजा हो तो प्रजा में धर्म की स्थापना खुदबखुद हो जाती है।

21वीं सदी का भारत ऐसा होगा और वैसा होगा, जैसे सपने देखना छोड़कर यथार्थ की धरा पर अगर काम नहीं शुरू किया गया तो भारत की स्थिति इस से भी खराब हो सकती है। दुशमन लगातार देश की सीमाओं को सिकोड़ता जा रहा है। पाकिस्तान और चीन की बात तो क्या करें, बांग्लादेश जैसा देश भी हमारे कुछ गांवों में पर कब्जा जमाए हुए है। नेपाल में जब से नई सरकार बनी है, बहुत ज्यादा भारत के प्रति सद्भावना नहीं दिखा रही है। नेपाल में वामपंथियों के उदय को चीन का वरदहस्त प्राप्त है। अब वहां ज्यादा भरोसा बचा नहीं है। भूटान को भारत ने एलपीजी और केरोसीन पर सब्सिडी क्या कम की उसने भी चीन का दामन थामने की धमकी दे डाली। दक्षिण में श्रीलंका भी चीन के साथ जमकर गलबहियां कर रहा है। ये परिस्थितियां कोई विशेष हर्ष नहीं पैदा करती हैं।

1947 में डाॅलर एक रुपये का था, 1991 में जब प्रकांड अर्थशास्त्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने एलपीजी (लिब्रेलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन, ग्लोबलाइजेशन) की पाॅलिसी दी उस समय डाॅलर 18 रुपये का था। इस बीच देश में विकास के बड़े-बड़े दावे किए गए। इंडिया शाइनिंग से लेकर भारत निर्माण तक का सफर तय किया गया। लेकिन आज इस आर्थिक शक्ति संपन्न भारत में डाॅलर ने सारे कीर्तिमान तोड़ डाले और हमारा रुपया सीनियर सिटिजन बन गया। इस वास्तविकता को भुलाने के लिए हम पुराना राग अलापते रहते हैं कि भारत कभी सोने की चिडि़या था। पिछले दिनों ही पढ़ा कि उस समय हैदराबाद के निजाम विश्व के सबसे रईस आदमी थे। जब वर्तमान राष्ट्रपति भवन यानि उस समय का वाॅयसराॅय हाउस बना तो हैदराबाद के निजाम ने ल्युटियंस को इससे भी बड़ा घर बनाने के लिए कहा। ल्युटियंस ने उनकी बात तो मान ली, लेकिन अंग्रेजी हुकूमत नहीं चाहती थी कि दिल्ली में कोई भी बिल्डिंग वाॅयसराॅय हाउस से बड़ी बने। लिहाजा ल्युटियंस ने निजाम को हैदराबाद हाउस बनाकर दिया। इतना पैसा खर्चने के बाद भी निजाम के बच्चों को ये हाउस पसंद नहीं आया और बाद में इसे सरकार को ही प्रदान कर दिया गया। भारत की संपन्नता को लेकर इस तरह के सैकड़ों किस्से इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। लेकिन वर्तमान स्थिति क्या है, हमें उस पर गंभीरता से गौर करना होगा।

रविवार, 26 अगस्त 2012

कितनी हिंदी!


कोस-कोस पर पानी बदले पांच कोस पर वाणी- ये कहावत है तो पुरानी पर भारत पर पूरी तरह लागू होती है। हिंदी कितने प्रकार की हो सकती है इसका अंदाजा आपको भारत के गांवों में जाकर लगेगा। हर गांव की अपनी अलग लोकल हिंदी है, जिसे शहरी लोग गंवारू भाषा कहकर पुकारते हैं। लेकिन इस गंवारू भाषा की अपनी अलग संुदरता है। गांव की इन भाषाओं की लगातार उपेक्षा ने इन्हें विलुप्त होने के कगार पर पहुंचा दिया है। 

मेरा गांव नगला नीडर मुरादाबाद से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर है (फिलहाल ये संभल और मुरादाबाद के बीच सीमा सीमा विवाद में फंसा है)। लेकिन मुरादाबाद की हिंदी से इसका दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं। यहां तक कि हमारे गांव से सिर्फ डेढ़ किलोमीटर दूर खेमपुर गांव की बोली नगला नीडर से बिल्कुल अलग है। लेकिन जब से गांव में टीवी पहुंचा और गांव के कुछ लोग शहर आकर रहने लगे तब से लोगों में शहरी खड़ी बोली बोलने का शौक चर्रा गया। अगर आपने पान सिंह तोमर फिल्म देखी हो तो हमारे गांव की बोली कुछ-कुछ उसकी बोली से मिलती-जुलती है। लेकिन अब गांव के अधिकाश लोग साहित्यिक बोली बोलने की कोशिश करने लगे हैं। खासतौर से नई पीढ़ी। यहां तक कि गांव के कुछ घरों में चाचा-बुआ को अंकल-आंटी कहने का भी चलन चल पड़ा है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि गांव से शहर गए लोग जब कभी गांव आते हैं तो उनमें एक अजीब सी इतराहट होती है। ऐसा भी नहीं है कि वे शहर में बहुत बड़े तीर मार रहे हों। शहर के नाम पर वे बस गांव से 15 किलोमीटर दूर मुरादाबाद आकर बस गए हैं और बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। उनके इतराने के लिए यही काफी है। गांव आकर अपनी स्वाभाविक हिंदी बोलने के बजाय वो नफासत दिखाते हुए साहित्यिक हिंदी बोलकर दिखाते हैं।

संयुक्त राष्ट्र के मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स में काॅफी अन्नान ने तो इस बात का जिक्र नहीं किया कि विकसित दिखने के लिए आपको अपनी भाषा छोड़नी होगी, लेकिन भारतीय समाज में ये धारणा अंदर तक पैठ बनाए हुए है कि सभ्य होने का मतलब है कि आप नफासत के साथ साहित्यिक भाषा में बात करें और बीच-बीच में इंग्लिश के शब्दों का प्रयोग करें तो और ज्यादा बेहतर होगा। गांव की भाषा पर दूसरा कुठाराघात टीवी और अखबारों ने किया है। गांव-गांव टीवी और अखबार पहुंच जाने से नई पीढ़ी का रहन-सहन और बातचीज का स्टाइल अब यही तय कर रहे हैं। पर है ये अजीब बात कि शहर के लोग दूर के रिश्तों में गर्माहट दिखाने के लिए बच्चों को चाचा, बुआ, मौसी जैसे शब्द कहना सिखा रहे हैं, जबकि गांव में अंकल-आंटी का चलन बढ़ रहा है। और सिर्फ भाषा के स्तर पर ही नहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में तो कई स्तरों पर बदलाव देखने को मिल रहे हैं। मैं समझता हूं कि हरियाणा और पंजाब के गांव तो पहले ही इन चीजों की चपेट में आ गए होंगे।

हालांकि इन दिनों टीवी पर प्रसारित कई सीरियल्स में लोकल भाषा को जमकर भुनाया जा रहा है। गुजराती, हरियाणवी, राजस्थानी और बिहारी हिंदी पर टीवी सीरियल्स में जमकर प्रयोग हुए हैं और लोगों ने उनको पसंद भी किया है। वैसे ध्यान से देखा जाए तो सीरियल्स को सर्वग्राही बनाने के लिए लोकल भाषा को काफी तोड़ा-मरोड़ा तो गया है, लेकिन लोग फिर भी उन्हें देखना पसंद कर रहे हैं। एक सर्वे रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि अगले 100 सालों में विश्व की कई भाषाएं गायब हो जाएंगी। लेकिन साहित्यिक हिंदी इस खतरे से बाहर है। पर भारत में सबसे बड़ा खतरा गांवों की लोकल हिंदी पर जरूर मंडरा रहा है। तेजी से हो रहे विकास और शहरीकरण की दौड़ में इन रस भरी बोलियां को खत्म होने में मुश्किल से 20 साल भी नहीं लगेंगे। क्योंकि नई पीढ़ी अब टीवी देखकर बड़ी हो रही है। त्योहार मनाना अब घर के बुजुर्ग नहीं बल्कि न्यूज चैनल सिखाते हैं। कपड़ों का लेटेस्ट ट्रेंड क्या है ये भी टीवी ही तय कर रहा है। शहर में रहने वाले लोग और शहरी भाषा ज्यादा सभ्य मानी जाती है। तो कोई भला क्यों अपने को गंवारू कहलवाना पसंद करेगा।


सोमवार, 21 मई 2012

आईपीएल: समरथ को नहिं दोष गोसांई!

कहते हैं कि क्रिकेट पहले नवाबों का खेल था. कम ही लोग इसे खेलते और देखते थे. लेकिन जब कपिल देव की अगुवाई में भारतीय टीम ने विश्वकप झटका तो एकाएक क्रिकेट राष्ट्र का गौरव बन गया. दूरदर्शन पर लाइव टेलिकास्ट की बदौलत न केवल घर-घर में युवाओं की पसंद बना बल्कि मोहल्ले की गलियों से लेकर घर की छतों तक लघु रूप में खेला जाने लगा. फिर जब सचिन जैसे महान बल्लेबाज का क्रिकेट की पिच पर जन्म हुआ तो क्रिकेट उन बुजुर्गों और महिलाओं की भी पसंद बन गया जिन्होंने कभी बल्ला पकड़ के नहीं देखा था.

क्रिकेट के प्रति लोगों की बढ़ती दीवानगी को देखकर बाजार के मगरमच्छों को इसमें खेल से कुछ ज्यादा नजर आने लगा और खेल-खेल में क्रिकेट दौलत की एक बहती गंगा बन गया. नैतिकता के झंडाबरदारों को उस समय क्रिकेट का व्यवसायीकरण करना ठीक न लगा और उन्होंने नैतिकता के सवाल खड़े किए. पर वो सवाल कान पर जूं की तरह रेंगे और फिसल गए.

फिर क्रिकेट के सफर में तीसरा चरण आया. लाइव टेलिकास्ट में मिनट-मिनट पर विज्ञापन मिलने लगे. खिलाडिय़ों की क्रिकेट से कम और विज्ञापन करने से ज्यादा कमाई होने लगी. नैतिकता के पैरोकारों ने फिर से नाक-भौंह सिकोड़ी, लेकिन फिर से उनकी एक न सुनी गई.

इधर बाजार में बैठे मगरमच्छ इतने से संतुष्ट नहीं थे. वे क्रिकेट की दुधारू गाय को और दूहना चाहते थे कि उसमें दूध का एक भी कतरा न बचे. सो, उन्होंने क्रिकेट में ग्लैमर और टेक्नोलॉजी का तड़का लगा दिया और बन गया आईपीएल. क्रिकेट की मंडी सजाई गई और सात समंदर पार से खिलाड़ी अपनी बोली लगवाने आए. लंबे समय बाद लोगों ने इंसानों को नीलाम होते देखा, लेकिन मॉडर्न जमाने में सब चलता है टाइप बातें कहकर सबने इसे पचा लिया. क्रिकेटरों के हेलमेट, बल्ले, ट्राउजर, जर्सी सब कुछ बिकाऊ हो गया. किसी न किसी ब्रांड ने उनके हर अंग को खरीद लिया. नैतिकता के सिपाहियों ने फिर से हाथ-पांव उछाले पर वे उछलते रह गए और कारवां बढ़ता गया.

आईपीएल दिन दोगनी-रात चौगुनी तरक्की करने लगा. पैसे का गुरूर रह-रहकर बोलने लगा. क्रिकेट अब क्रिकेट न रहकर शराब, शबाब, ग्लैमर, टेक्नोलॉजी, सट्टेबाजी, सेक्स और ड्रग्स की भयानक कॉकटेल बन गया, जो सोना बनकर बरस रहा है. कमाने वाले अपनी थैलियां भर रहे हैं. नेता हों या अभिनेता, वर्तमान क्रिकेटर हों या पूर्व क्रिकेटर, चैनल हों या रेडियो एफएम, अखबार हों या मैग्जीन सबके मुंह में सोना भर दिया गया. तनाव की मारी जनता मैदानों में पहुंचकर और टीवी से चिपककर ये सबूत देती रही कि पब्लिक इसे पसंद करती है. कमाई करने वाले इसी बात की दुहाई देकर मलाई उतारते रहे.

क्रिकेट की इस भयंकर कॉकटेल को जो भी पिएगा तो उसके कदम थोड़े बहुत तो बहकेंगे ही न. क्या हुआ जो रईस शाहरुख ने गरीब गार्ड से बद्तमीजी की, गरीब की कैसी इज्जत. क्या हुआ जो रेव पार्टी में खिलाड़ी पकड़े गए, आखिर पैसा कमाया तो खर्च भी तो करना पड़ेगा. क्या हुआ जो एक मॉडल से माल्या के लड़के और अजीब से नाम वाले एक खिलाड़ी ने छेड़खानी की, नशे में छोटी-मोटी गलतियां हो ही जाती हैं. फिक्सिंग को तो गलत मानना ही नहीं चाहिए, आईपीएल में नहीं कमाएंगे तो कहां कमाएंगे.

मैं एक बार कपड़े की दुकान में गया तो वहां पर एक स्टिकर चिपका देखा, जिस पर लिखा था- "फैशन के इस दौर में गारंटी की इच्छा न करें". शायद यही बात आईपीएल पर भी लागू होती है कि- "पैसे की इस दौड़ में नैतिकता की इच्छा न करें".

रविवार, 20 मई 2012

एक गर्म चाय की प्याली हो...


मोंटेक सिंह आहलुवालिया का ये आश्वासन कि अगले साल अप्रैल में चाय को राष्ट्रीय पेय घोषित कर दिया जाएगा, आश्वासन ही रह गया। केंद्र सरकार फिलहाल चाय को ये दर्जा न देने का मन बना चुकी है। मोंटेक के आश्वासन के बाद साफ लगने लगा था कि चाय राष्ट्रीय पेय बन जाएगी. लेकिन केंद्र सरकार ने चाय को ये दर्जा देने पर खड़े होने वाले संभावित विवादों को पहले ही ताड़ लिया और ये फैसला टाल दिया.

चाय को राष्ट्रीय पेय बनाने पर सवाल यही उठता कि आखिर चाय ही क्यों? देश में हजारों तरह के पेय हैं, सब के सब एक से बढ़कर एक, तो फिर चाय ही क्यों? पंजाब वाले लस्सी लेकर आ जाते, हरियाणे वाले दूध लेकर खड़े हो जाते, जम्मू कश्मीर वाले कहवा को लेकर शोर मचाने लगते, यूपी वाले छाछ की बाल्टी लेकर दस जनपथ पहुंच जाते, गुजरात की पूरी श्वेत क्रांति दिल्ली पहुंच जाती, दक्षिण वाले कॉफी की प्याली फूंकने लगते, बाबा रामदेव एलोवेरा जूस के पक्ष में आवाज उठाते, सारे क्रिकेटर पेप्सी-कोक को राष्ट्रीय पेय बनाने पर अड़ जाते, दारूबाज पियक्कड़ शराब को भी यही दर्जा देने की मांग करने लगते, चाय के खिलाफ स्वदेशी और राष्ट्रवादी आंदोलन खड़े हो जाते और न जाने क्या-क्या हो सकता था? सो, केंद्र सरकार के किसी समझदार सचिव ने अपनी तजुर्बेकार आखों पर चढ़े चश्में के लेंस से दूरदृष्टि का प्रयोग करके इन संभावित खतरों को देख लिया होगा और सरकार से इस जोखिम को न उठाने की सलाह दी होगी। 

हालांकि मोंटेक सिंह के आश्वासन के बाद चाय उत्पादकों ने उत्सव सा मनाना शुरू कर दिया था। लेकिन सरकार की न-नुकुर के बाद सब फुस्स हो गया। चाय को राष्ट्रीय दर्जा मिलने पर बीबीसी हिंदी भी कुछ कम खुश नहीं था। बीबीसी ने तो भारत में चाय के अच्छे उत्पादन के पीछे ब्रिटेन की औपनिवेशिक नीतियों की पीठ भी थपथपानी शुरू कर दी और बारे में इतिहास खंगालू लेख भी लिख डाले। बीबीसी के मुताबिक 2011 में 85 करोड़ किलोग्राम चाय की खपत देश में ही हो गई। अगर चाय के प्रति भारतीयों की दीवानगी ऐसी ही चलती रही तो भारत को आने वाले समय में चाय का आयात करना पड़ सकता है।

वैसे सच है कि देश में चाय एक नशा बन चुकी है। कहते हैं कि इंडिया में एवरी टाइम इज टी टाइम, यानि यहां चाय का कोई समय नहीं, जब चाहो, जहां चाहो। घर में कोई मेहमान आए उसकी लाख खातिरदारी कर लीजिए, लेकिन अगर चाय न पिलाई तो भाड़ में गई सब खातिरदारी। सरकारी मीटिंग हो या ट्रेड यूनियन की मीटिंग चाय के बिना अधूरी। ठेठ राष्ट्रवादी और स्वदेशी के झंडाबरदार तमाम नेताओं की जिंदगी का आधार भी चाय ही है। सुबह से शाम तक सात्विक भोजन पर प्रवचन देने वाले संतों के आश्रमों में भी चाय का दबदबा कायम है। कई मंत्री तो चाय के नाम पर ही सालाना लाखों डकार जाते हैं। किसी सरकारी विभाग में काम कराने जाओ तो क्लर्क रिश्वत की जगह चाय-पानी के लिए पैसे मांगता है। लड़की का रिश्ता तय होता है तो वो अपने संभावित ससुराल वालों के सामने चाय की ट्रे लेकर ही प्रकट होती है। रेलवे स्टेशन पर फेरी वाले की अंतडिय़ों से निकलने वाली चाय-चाय की आवाज न हो तो काहे का स्टेशन। कुछ लोगों को अगर उनकी पत्नी सुबह-सुबह चाय ने दे तो उनका पेट हल्का नहीं हो पाता। कहानीकार और पत्रकार न जाने कितने किस्से कहानियां चाय के खोखे पर ही बनाते हैं। भारत में चाय की महिमा अपरंपार है। लिखते-लिखते लव हो जाए। लेकिन इस महिमा मंडन के चलते चाय को राष्ट्रीय पेय बना दिया जाए, तो ये बात कुछ हजम नहीं होती।

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

नकली खुशी बनाम असली खुशी !

बात तब की है जब अपन छोटे थे। पापा की सरकारी नौकरी। किराए का मकान। घर में एक ब्लैक एंड व्हाइट टीवी, जिस पर शटर लगा था और उस टीवी पर दूरदर्शन की प्रस्तुति। समझ ही नहीं आता था कि इत्ते सारे लोग इस छोटे से डिब्बे के अंदर कैसे सोते थे। खैर, अब ये तो समझ आ गया कि इत्ते सारे लोग बुद्धू बक्से में कैसे सोते हैं। लेकिन ये आज तक समझ नहीं आया कि उसमें दिखाए जाने वाली विज्ञापनों की दुनिया इत्ती खुशहाल क्यों होती है। सारे के सारे जरूरत से ज्यादा खुश पहले भी दिखते थे आज भी दिखते हैं। अपने मसूढ़ों को आखिरी छोर तक दिखाने पर आमादा रहते हैं। उनकी खुशहाल दुनिया के सामने अपन की दुनिया तो ऐसी लगती है मानो अपन तो धरती पर भार ही बढ़ा रहे हैं।
 
उस समय एक विज्ञापन आता था किसान यूरिया का, जिसमें एक किसान बड़ा खुश होकर और गाना गाकर अपने खेत में खाद बिखेर रहा होता था। इस तरह के तमाम विज्ञापनों का बाल मन पर खासा असर पड़ता। छुट्टियों में गांव जाना हुआ। चाचा ने कहा कि आज खेत में खाद डालना है। इतना सुनते ही हम खुश। हमारे लिए खाद डालने का मतलब था चाचा खेत में जाकर गाना गाएंगे। हमने जिद ठान ली कि हम भी साथ चलेंगे। खैर, चाचा ने बुग्गी में दो खाद के बोरे रखे, तीन लोहे की बाल्टी और चल दिए खेत पर। खेत पर जाकर चाचा ने हमें मेंढ पर बैठा दिया, दो मजदूरों को संग लिया, बाएं हाथ में बाल्टी लटकाई और दाएं हाथ से खाद बिखेरना शुरू कर दिया। हमको मामला जंचा नहीं और बेहद नाॅन रोमांटिक लगा। हमने कहा चाचा खाद ऐसे थोड़ी बिखेरते हैं। खाद बिखेरते हैं तो गाना गाते हैं। हमने टीवी पर देखा है। चाचा हंस दिए और हम बच्चों का मन रखने के लिए उन्होंने एक गाना गाया। लेकिन चाचा की आवाज में वो चीज नहीं आ पा रही थी, जो टीवी वाले किसान की आवाज में थी। दूसरा बैकग्राउंड में म्युजिक भी नहीं था। तीसरा चाचा उतने खुश भी नहीं लग रहे थे, जितना टीवी वाला किसान था। वो तो बीच-बीच में मजदूरों को हिदायतें दे रहे थे, ऐसे नहीं, वैसे नहीं।
 
उस क्लोज-अप वाले मुंडे को ही लो, मंजन करते ही उसका काॅन्फीडेंस आसमान छूता है। चारों तरफ तितलियों की तरह लड़कियां इठलाने लगती हैं। दांत रगड़ते-रगड़ते तीस साल हो गए, आज तक उस मुंडे का दस प्रतिशत काॅन्फीडेंस भी नहीं आया। किसी काॅलेज का विज्ञापन देखा है कभी- काला गाउन पहने, सिर पर चैकोर टोपी लगाए, हाथ में डिग्री लेकर उसका ग्रेजुएट अपनी टांगें मोड़कर आसमान में ऐसा उछलता है मानो इंद्र का सिंहासन मिल गया हो। लेकिन असल जिंदगी में जब भी मैं किसी काॅलेज के काॅन्वोकेशन में गया तो वहां अपने अंधकारमय फ्यूचर में मोटा चश्मा लगाकर झांकते डिप्रेस्ड स्टूडेंट्स ज्यादा नजर आए और आसमान में उछलता हुआ कोई न दिखा। आजकल रीयल एस्टेट में विज्ञापनों का सबसे ज्यादा जोर है। चैक-चैबारों पर लगे बड़े-बड़े साइन बोर्ड ऐसे वादे करते दिखेंगे कि आपको दो कमरे का दड़बा नहीं, बल्कि एक राजमहल बेच रहे हों। बीस परसेंट की छूट देकर आप पर एहसान भी कर रहे हैं। लेकिन बुकिंग करवाने से लेकर पजेशन लेने तक आपके घुटनों में से एक-एक बूंद तेल न निकलवा लें तो बात है।
 
लेकिन वो दुनिया खुशहाल है। उस दुनिया का युवक जरा सा डियोडरेंट ही छिड़क ले तो लड़की हां कर देती है, इस दुनिया का युवक प्रोपोज करते-करते अपनी जान ही क्यों न छिड़क दे तब भी लड़की के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। शायद इस दुनिया की सारी लड़कियां मेडिकर लगाने लगी हैं। उस दुनिया में आईपीएल देखना एक उत्सव है और इस दुनिया में घर के अंदर देर रात टीवी चलाना एक महाभारत है। उस दुनिया में कपड़े धोने में गोविंदा स्त्री की मदद करता है, इस दुनिया में घर की गृहणी को कपड़े रगड़ते-रगड़ते सालों बीत गए पर पति महोदय ने दो शब्द तारीफ के नहीं बोले। इस दुनिया के लोगों ने वो सारी चीजें खरीदकर देख लीं जो विज्ञापन की दुनिया में दिखाई जाती हैं, लेकिन वैसी वाली खुशी घर में आज तक नहीं आई। ये बात आज तक मेरी समझ में नहीं आई। या तो उस दुनिया की खुशी नकली है या फिर इस दुनिया में टेंशन बहुत ज्यादा है।

मंगलवार, 27 मार्च 2012

भारतीय गांव तो पान सिंह तोमर जैसे बागी पैदा करने की फैक्ट्री हैं

विकिपीडिया पर पान सिंह तोमर की तस्वीर
फिल्म पान सिंह तोमर भारतीय ग्रामीण परिवेश की सच्ची तस्वीर दिखाती है। उस तस्वीर से बिल्कुल अलग जो कवियों की कविताओं में होती है- संुदरता, प्यार और सौहार्द से भरे गांव! शायद पहले कभी ऐसे गांव रहे हों जो प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण हों, जहां के समाज में आपसी सौहार्द हो, आज हिंदी क्षेत्र के अधिकांश गांव पान सिंह तोमर के गांव से मेल खाते हैं, जहां की परिस्थितियों ने एक बेहतरीन प्रतिभा को बागी (डकैत नहीं; डकैत तो पान सिंह तोमर ने फिल्म में बता ही दिया था कि कहां मिलते हैं।) बनने पर मजबूर कर दिया। उत्तराखंड और हिमाचल में जरूर ऐसे गांव बचे हैं जहां प्राकृतिक सौंदर्य भी है और आपसी सौहार्द भी। लेकिन अब वहां भी धीरे-धीरे राजनीति और पैसे की होड़ पहुंचती जा रही है।

पढ़ाई के दौरान 2004 में काॅलेज टूर पर एक बार मनाली जाना हुआ। हिमाचल का खूबसूरत गांव जो अटल जी को खासा प्रिय है। वहां के लोकल टैक्सी ड्राइवर से हुई बातचीत मुझे आजतक याद है। पत्रकारिता के छात्र होने के नाते मैंने केलांग और सोलांग के रास्ते पर उससे कई सवाल किए थे। मनाली और हिमाचल के सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक पक्ष से जुड़े सवाल। बात मनाली के सेबों की और पहाड़ी आलुओं की हुई तो उसने बताया- ‘‘फसल को बेचने के लिए यहां के किसानों को दिल्ली और मुंबई के बाजारों में नहीं जाना पड़ता। हमारे गांव का ही एक एजेंट वहां होता है, जो सबकी फसल की चिंता करता है। हमारा आपसी विश्वास इतना गहरा है कि कोई भी उस एजेंट पर शक नहीं करता, वो जितनी रकम भेजता है वो हमें स्वीकार होती है। और हमें पता है कि वो हमारे साथ कुछ गलत कर ही नहीं सकता। वैसे भी गांव के लोग बेहद भोले हैं वे दिल्ली और मुंबई के बाजारों में फिट नहीं बैठते।’’ काॅलेज टूर पर एक और छोटी सी घटना घटी। हमारी गाड़ी के पीछे चल रही इन्नोवा में जो लड़के सवार थे, उनमें से किसी ने मनाली की एक लड़की को देखकर कोई फब्ती कसी, जिसे सुनकर गाड़ी के ड्राइवर ने गाड़ी को वहीं रोक लिया और गाड़ी चलाने से इंकार कर दिया। उसने लड़कों से कहा ‘‘मनाली की लड़कियां हमारी मां बहनें हैं। आप लोगों को ये सब करना है तो पैदल चले जाइए। यहां का कोई भी ड्राइवर ये सब बर्दाश्त नहीं करेगा।’’ काॅलेज स्टाफ के लड़कों को डांटने और ड्राइवर से माफी मांगने के बाद काॅनवाॅय आगे बढ़ा।

मनाली की ये तस्वीर मैदानी क्षेत्र के गांवों से कतई भिन्न है। मैदानी क्षेत्र के गांव आज ईष्र्या, द्वेष और डाह के शिकार बनकर रह गए हैं। गांवों में रंजिशें, जमीनों को लेकर हत्याएं, मुकदमेबाजी आम हो गई है। छोटी-छोटी बातों को लेकर एक-दूसरे की जान का दुशमन बन जाना, दूसरे की तरक्की देखकर जलना, ईष्र्या के कारण द्वेष रखना और फिर उस द्वेष का रंजिश में बदल जाना और फिर शहर की कचहरियों के चक्कर लगाना गांवों का शगल बनता जा रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में ऐसी-ऐसी चीजों को लेकर मुकदमेबाजी के दिलचस्प केस मिल जाएंगे कि गधों को भी हंसी आ जाए। मसलन- खेत की मेंढ को लेकर, चैक के कुएं को लेकर, दल्लान में बैठने को लेकर, घर में गिर रहे पनारे या नालियों को लेकर, खेत में भैंस के घुस जाने पर और न जाने कैसी-कैसी हास्यासपद चीजों पर लोग आपस में भिड़ने को तैयार रहते हैं और उस भिडं़त को कोर्ट-कचहरी तक ले जाने में गुरेज नहीं करते। घर चाहे खाने के लाले पड़ रहे हों, लेकिन नाक की झूठी लड़ाई वो पेट पर पत्थर बांधकर लड़ने को भी तैयार हैं। लोगों की आपसी जलन और अहम की लड़ाई न तो उन्हें न तो खुद की तरक्की करने दे रही है और न ग्रामीण समाज की। इस तरह की ओछी लड़ाइयां ग्रामीण समाज को नई सोच देने में बड़ी बाधा बनी हुई है। अगर उस दौर में पान सिंह तोमर को एक श्रेष्ठ धावक से एक बागी बनकर बंदूक उठानी पड़ी तो आज का दौर भी कुछ भिन्न नहीं है। आज के गांवों में भी तमाम युवा ऐसे हैं जिनकी आंखों में आगे बढ़ने के सपने हैं, देश के प्रति सपने हैं, लेकिन गांव की आपसी रंजिशें और आए दिन की छोटी-छोटी परेशानियां उन्हें आगे नहीं बढ़ने देतीं।

राजनीति जब अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर हो तो ठीक लगती है लेकिन जब वो गिरते-गिरते ग्रामीण स्तर तक पहुंच जाए तो बेहद हानिकारक सिद्ध होती है और हो भी रही है। पंचायती राज व्यवस्था बनाई तो गई थी गांवों के विकास के लिए, लेकिन इस व्यवस्था ने ग्रामीण समाज का जितना नुकसान किया शायद उतना किसी चीज ने नहीं किया। ग्राम प्रधान या सरपंच पद को लेकर होने वाली ग्रामीण स्तर की राजनीति ने गांव के समाज को बुरी तरह बांटकर रख दिया। और इतना गहरा बांटा है कि खाइयों को पाटना नामुमकिन लगता है। पंचायती राज व्यवस्था के तहत होने वाले चुनावों से हो रहे नुकसान को शायद अन्ना हजारे को भी दिखा होगा, तभी तो रालेगणसिद्धि से जुड़े तमाम गांवों में ग्राम प्रधान के चुनाव नहीं होते, बल्कि सरपंच को सर्वसम्मति से चुना जाता है। गांवों के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत रखने के लिए अन्ना द्वारा उठाया गया ये एक बेहद जरूरी कदम है। भारत के गांव अगर इसी तरह राजनीति के शिकार होते रहे तो फिर गांवों को बचाना मुश्किल होगा। सांप जब बाहर घूमता है टेढ़ा-मेढ़ा होकर चलता है, लेकिन जब भी अपने घर में घुसता है तो सीधा घुसता है। गांव भारत के सच्चे घर हैं, राष्ट्रीय स्तर पर भले ही राजनीति का टेढ़ापन झेला जा सकता है, लेकिन अगर राजनीति का ये टेढ़ापन गांवों में घुसता रहा तो नुकसान ही नुकसान है। गांवों को राजनीति से दूर सीधी-सादी जिंदगी से भरा ही रहने दिया जाए तो बेहतर होगा। खासतौर से हिंदी पट्टी के मैदानी क्षेत्र के गांवों को पहाड़ के ग्रामीण समाज से और अन्ना के रालेगणसिद्धि से काफी कुछ सीखने की जरूरत है।

सोमवार, 19 मार्च 2012

लालू के बाद अब बिहार के आलू का जलवा


अब तब बिहार लालू के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन अब अपने आलू के लिए भी जाना जाएगा। जी हां, खबर है कि बिहार में नितीश कुमार नाम के एक किसान ने जैविक खेती के माध्यम से आलुओं की रिकाॅर्ड पैदावार की है (ये संयोग ही है कि किसान का नाम वहां के मुख्यमंत्री के नाम से मिलता है)। किसान ने 72.9 टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से आलुओं की पैदावार कर एक विश्व कीर्तिमान स्थापित किया है।

ये खबर पढ़ते वक्त मुझे मेरठ के सेंट्रल पटैटो रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीपीआरआई) की याद आ गई। मेरठ में पत्रकारिता के दौरान सीपीआरआई के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक का इंटरव्यू करने का मौका मिला। बातों-बातों में जब उनसे मैंने पूछा कि अनाज, सब्जियों और फलों में जो पहले स्वाद हुआ करता था वो कहां विलुप्त होता जा रहा है। न गेहूं की रोटी में वो खुशबू हैं न अरहड़ की पाॅलिश्ड दाल में वो स्वाद, कहीं आने वाली पीढ़ी स्वाद से वंचित तो नहीं होने जा रही? क्या अब लोग केवल पेट भरने के लिए खाएंगे और स्वाद भूल जाएंगे? और क्या आलुओं में जेनेटिकली माॅडिफाइड बीजों के इस्तेमाल की तरफ कदम बढ़ाए जा रहे हैं?

इन सवालों के जवाब में  उन्होंने माना कि ये सही बात है कि अनाज, दलहन, तिलहन, सब्जियों और फलों में से स्वाद गायब हो रहा है, जिसका कारण है अधिक से अधिक पैदावार के लिए खेती के तौर तरीकों में बदलाव। उन्होंने कहा कि देश की आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है और उपजाऊ जमीनें उसी तेजी के साथ घट रही हैं। कृषि वैज्ञानिकों के ऊपर दबाव है कि वे बढ़ती आबादी के अनुपात में फसलों की पैदावार भी बढ़ाएं। और अगर पैदावार बढ़ानी है तो कहीं न कहीं स्वाद के साथ समझौता करना ही होगा। कृषि के परंपरागत तौर-तरीकों को छोड़कर खेती में आज जीएम बीज (जेनेटिकली माॅडिफाइड), हाइब्रिड बीज और केमिकल्स का प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि आलू हाई एनर्जी फूड है और क्योंकि भारत की अधिकांश गरीब जनता पेट भरने के लिए आलू पर निर्भर है तो आलू की पैदावार लगातार बढ़ानी ही होगी। इसके लिए जीएम बीजों के प्रयोग पर भी विचार किया जा रहा है।

लेकिन बिहार से जो खबर आई है उसके मुताबिक वहां के किसान ने जैविक खेती के माध्यम से आलू का रिकाॅर्ड उत्पादन किया है। अगर ये बात सही है तो उन कृषि विशेषज्ञों के लिए ये आइना दिखाने वाला है जो मानते हैं कि जीएम बीजों और केमिकल्स के बिना पैदावार को नहीं बढ़ाया जा सकता। जिस समय देश में हरित क्रांति आई थी उस समय खेती के गैर-परंपरागत तरीकों को अपनाना एक मजबूरी हो सकती थी, लेकिन अब हम इतने मजबूर नहीं हैं कि जैविक खेती को सिरे से नकारते रहें और उस दिशा में प्रयास ही न करें। किसी प्रजाति की जींस में छेड़छाड़ करके बाजार और मनुष्य की जरूरतों के अनुरूप तैयार किए जा रहे जीएम बीजों की खासियत ये है कि ये बीज एक ही बार इस्तेमाल किये जा सकते हैं। इन बीजों के फलों से जो बीज प्राप्त होते हैं वे दोबारा नहीं बोए जा सकते। दोबारा बोने के लिए आपको फिर से बाजार पर निर्भर होना पड़ेगा। इन बीजों के रेट का अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं कि एक बार मेरी आंटी ने अपनी गढ़मुक्तेश्वर वाली जमीन में पपीते का बाग लगाने का सोचा, काफी विचार-विमर्श के बाद उन्होंने पूसा कैंपस से बीज खरीदने का प्लान बनाया। तो वहां पपीते के बीजों के रेट थे 90 हजारे रुपए किलो और 20 हजार रुपए किलो। 90 हजार वाले बीजों में ये गारंटी थी कि पपीते के हर पेड़ पर फल आएगा। क्योंकि साधरण पपीते के पेड़ों में जो नर पेड़ होते हैं उन पर फल नहीं लगते। लेकिन वैज्ञानिकों ने उत्पादन बढ़ाने के लिए इसका भी तोड़ निकाल लिया।

वैज्ञानिकों के तोड़ के बारे में तो पूछिए ही मत, उन्होंने किस-किसी चीज के तोड़ नहीं निकाले। पहले टमाटर काटते-काटते उसका दम निकल जाता था, लेकिन आजकल का टमाटर सेब की तरह कटता है और उसमें खटास नाम को नहीं मिलेगी, सब्जी को खट्टा करने के लिए अमचूर डालना पड़ता है। प्याज काटो तो अब आंसू नहीं निकलेंगे। पपीते के अंदर बीज नहीं निकलता। तरबूज में भी बीज कम हो गए हैं। चित्तीदार केला देखने को नहीं मिलता। फल और सब्जियां जल्दी खराब नहीं होते। और बीटी ब्रिंजल के बारे में तो सबको पता ही है। सभी फल और सब्जियां देखने में बेहद सुंदर और आकर्षक होते जा रहे हैं, लेकिन उनके अंदर गुण कितने बचे हैं ये किसी को नहीं पता। और अगर इसी तरह बीजों के लिए किसानों की निर्भरता बाजार पर बढ़ती गई तो गरीब किसान तो गया काम से। रही बात स्वाद की तो बाजारवाद के इस दौर में स्वाद और गुणों की इच्छा न करें, तो ही बेहतर होगा।

रविवार, 19 फ़रवरी 2012

जायका रेलगाड़ी काः फिर चल पड़ा घर से आलू-पूड़ी और अचार बांधकर चलने का चलन...

आजकल फेसबुक पर आईआरसीटीसी की गुणवत्ता की पोल खोलता एक चित्र काफी चर्चित हो रहा है। इसमें आईआरसीटीसी का वेंडर यात्रियों को बेचने वाली चाय तैयार करते दिखाया है। महाशय नहाने का पानी गर्म करने वाली इमरशन राॅड से चाय बना रहे हैं। डिटेल में गया तो पता चला कि तस्वीर काफी पुरानी है, लेकिन फेसबुक पर पदार्पण के बाद खासी चर्चा में है। इमरशन राॅड से पक रही चाय को देखकर आप सोचने को मजबूर हो सकते हैं कि क्यों न स्टेशन पर कुछ भी खाने से परहेज किया जाए?

पानी गर्म करने वाली इमरशन राॅड से चाय पकाने की नौबत तकरीबन तीन साल पहले रेलवे के उस फैसले से आई जिसमें प्लेटफाॅर्म के ऊपर गैस सिलेंडर के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। आगजनी के भय से रेलवे ने ये फैसला किया था कि प्लेटफाॅर्म पर केवल पका हुआ खाना ही बेचा जाएगा। चलते ठेलों पर किसी भी प्रकार का ज्वलनशील आइटम न लगाया जाए। रेहड़ी वालों को अगर अपने पकवान बेचने हैं तो बाहर से तैयार करके लाएं। इस प्रतिबंध के बाद प्लेटफाॅर्म पर रेहड़ी और ठेला लगाने वालों ने आरोप लगाया था कि ये आईआरसीटीसी के दबाव में रेलवे ने ये कदम उठाया है। क्योंकि आईआरसीटीसी देशभर के स्टेशनों की कैटरिंग हथियाना चाहता है। रेहड़ी वाले आईआरसीटीसी की कमाई में सबसे बड़ा रोड़ा हैं और अपना रास्ता साफ करने के लिए ही आईआरसीटीसी ने लाॅबीइंग करके प्लेटफाॅर्म से सिलेंडर हटवाने का फैसला करवाया है। हालांकि बर्निंग ट्रेन तो कई बार सुनी लेकिन बर्निंग प्लेटफाॅर्म कभी नहीं सुना। फिर भी प्लेटफाॅर्म से सिलेंडर हटाए गए, इसलिए ठेले वालों के आरोप में दम तो नजर आता था। लेकिन ठेले वालों की एक नहीं सुनी गई। धन बल के सामने जन बल हार गया। सिलेंडर का इस्तेमाल पर प्रतिबंध आज भी जारी है। कोई गुपचुप इस्तेमाल कर रहा हो तो दीगर बात है।

अगर बात हाईजीन और गुणवत्ता की करें तो रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों में मिलने वाले खाद्य पदार्थों में लगातार गिरावाट आ रही है। कमाई के इस दौर में अगर आप स्वादिष्ट और शुद्ध भोजन की अपेक्षा लेकर रेलवे स्टेशन की तरफ रुख कर रहे हैं तो ये आपकी अच्छी बात नहीं है। वे लोग चार पैसे कमाने बैठे हैं या आपकी इच्छाओं का ख्याल रखने के लिए। दिल खोलकर खर्च करने के बावजूद आप भारतीय रेल में जायका खोजते रह जाएंगे। शायद इंडिया का जायका खोज-खोज कर दर्शकों तक पहुंचा रहे विनोद दुआ ने रेलवे स्टेशनों के जायके पर नजर नहीं डाली है। इंडियन रेलवे का स्वाद चखने के बाद वो सारे इंडिया का जायका ही भूल जाएंगे।

प्लेटफाॅर्म पर बिकने वाली कुल्हड़ वाली चाय और पत्ते के दौने में मिलने वाली आलू-पूड़ी रेल के सफर की पहचान थीं। लेकिन न कुल्हड़ रहे और न दौने। लालू यादव ने कुल्हड़ को जिलाने की कोशिश भी की, लेकिन दुकानदारों को प्लास्टिक और थर्मोकाॅल के सामने मिट्टी महंगी पड़ी। मैं रेल के सफर का पुराना शौकीन हूं। पहले कुछ स्टेशनों पर अच्छी चाय मिल जाती थी। लेकिन अब तो दिल्ली का स्टेशन हो या कटिहार का आपको अच्छी चाय नसीब नहीं हो सकती। इसे आप ग्लोबलाइजेशन कहें या कहें कि पूरे कुएं में ही भांग घुली है। जायके की बात करने पर कुछ लोग ये कहेंगे कि मियां सफर में पेट भर जाए ये ही बहुत है, बड़े आए स्वाद खोजने वाले। चलिए साहब पेट भरने के लिए ही सही, लेकिन चीज शुद्ध तो मिले। जाने कौन से तेल में खाना तैयार होता है कि उसे पचाने के लिए आपकी जेब में डाबर का हाजमोला होना जरूरी है।

लेकिन इस मिलावटखोरी और कमाईखोरी के खेल में एक नया ट्रेंड फिर से देखने को मिल रहा है और जो काफी सुखद भी है। लोगों ने अब फिर अपने घर से खाना बांधकर चलना शुरू कर दिया है। आलू-पूड़ी और आम के अचार की खुशबू जो कुछ समय के लिए रेल के डिब्बे से गायब हो गई थी, अब फिर से लौट आई है। मैं तो कहता हूं कि ये ट्रेंड खूब चले। हम भारतीय तो घर से इतना खाना लेकर चलते थे, कि अपने साथ-साथ आसपास रो रहे किसी बच्चे का भी पेट भर देते थे। लेकिन बीच में ये पैकेज्ड फूड का जमाना आ गया और हम भेड़ चाल के शिकार हो गए। इलीट क्लास में दिखने के लिए जबरदस्ती उस बेस्वाद खाने को मुंह लगाया। और यात्रियों को घटिया माल परोसने वाली आईआरसीटीसी को भी ये बात याद रखनी चाहिए कि उपभोक्ता सबसे शक्तिशाली है। ये किसी को अपनाता है तो आसमान पर बैठा देता है और किसी को पछाड़ता है तो मिट्टी में मिला देता है। चाय-चाय चिल्लाते रह जाओगे, कोई खरीददार नहीं मिलेगा!

स्टैण्डर्ड हाई रखने के वास्ते!!!

मेरा नाई मुझसे खुश नहीं रहता। क्योंकि मैं उससे केवल बाल कटवाता हूं और दाढ़ी बनवाता हूं, फेशियल, फेस मसाज, स्क्रब, थ्रेडिंग, ब्लीच जैसे चोंचले नहीं करवाता। दरअसल बात ये है कि आजकल रेस्तरां और नाई की दुकान पर एक ट्रेंड जड़ जमाए जमाए हुए है कि रेस्तरां में अगर आप खाने के लिए दाल मांगते हो और नाई की दुकान पर केवल बाल या दाढ़ी बनवाते हो तो आपको ‘लो स्टैंडर्ड’ व्यक्ति समझा जाता हैं।

रेस्तरां के बैरे को कोई दाल आॅर्डर करे तो वो उसको हेय दृष्टि से देखेगा। वहीं आप अगर पनीर या मलाई कोफ्ता या जैसे व्यंजन आॅर्डर करते हो तो उसकी नजरों आपकी इज्जत खुद-ब-खुद बढ़ जाएगी। भले ही इस इज्जत के लिए आपको सिंथेटिक पनीर खाना पड़े जिसके ऊपर मिलावटी क्रीम तैर रही हो। इसी तरह नाई की दुकान पर आपकी शेव बनाने के बाद नाई बड़े प्यार से पूछता है, ‘सर मसाज कर दूं?’ अगर आपने मना कर दिया तो वो मन ही मन आपसे कुढ़ जाता। क्योंकि उसे आपकी शेव के 15 रुपये की भूख नहीं, बल्कि उसकी प्यास है बड़ी। और अगर आपने मसाज या फेशियल के लिए हां कर दी, फिर आपके चेहरे की शामत आ गई समझो। अच्छा नब्बे के दशक तक भारत में इस तरह के चोंचले हाई क्लास लड़कियों तक ही सीमित थे। लेकिन इसे ग्लोबलाइजेशन का असर कहें या देश की आर्थिक तरक्की का या फिर होई प्रोफाइल दिखने की होड़, कि देश का मिडिल क्लास भी इस तरह के चाोंचलों में अच्छी तरह फंसता जा रहा है।

नब्बे के दशक तक भारतीय मिडिल क्लास में सुंदर दिखने के उपाय लड़कियां ही किया करती थीं। लेकिन भला हो विज्ञापन और मार्केटिंग की दुनिया का कि इन्होंने लड़कों को भी इसकी चपेट में ले लिया। जो पसीना मेहनतकश इंसान की पहचान होता था, उस पसीने में धीरे धीरे सबको बदबू आने लगी और आज काॅलेज जाने वाले अधिकांश लड़के बगल में फुस्स-फुस्स लगाकर घर से निकलते हैं। गोरी चमड़ी के तो हम आज तक इतने कायल हैं कि अब लड़कों के लिए स्पेशल फेयरनेस क्रीम बाजार में हैं। शाहरुख खान और जाॅन अब्राहम विज्ञापन में अपनी सुंदरता का श्रेय इन फेयरनेस क्रीमों को ही देते हैं। मतलब उनके माता पिता के जींस का इसमें कोई योगदान नहीं. भारत में गोरेपन की होड़ किस हद तक है इसका अंदाजा आप जुलाई 2011 में छपी एक मार्केट रिसर्च से लगा सकते हैं जिसमें बताया गया कि भारत में 2200 करोड़ के काॅस्मेटिक बिजनेस में फेयरनेस क्रीम का बिजनेस 1800 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है और हर वर्ष 31 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है।

हालांकि भारतीय घरों में लड़कियां बेसन, चंदन और मुल्तानी मिट्टी जैसे घरेलू नुस्खों से अपने चेहरे की रंगत निखारने के उपाय किया करती थीं, लेकिन अब पार्लर में जाकर केमिकल प्रोडक्ट्स लिपवाने का जमाना है। और इस पार्लरमेनिया में लड़के भी फंस गए। नाई की दुकान पर जितने भी क्रीम, पाउडर, ब्लीच के डिब्बे होते हैं, उन पर आपको फलों के चित्र छपे मिलेंगे। जो आपको ये बताने की कोशिश करते हैं कि ये प्रोडक्ट बिल्कुल नैचुरल व हर्बल है, केमिकल रहित है और उनसे आपके चेहरे को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा। लेकिन उन फल-फूल के चित्रों के पीछे असलियत में केमिकल्स ही होते हैं। कुछ-कुछ भारत के संविधान की तरह जिसमें पहले ही पेज पर लिख दिया गया है कि देश धर्मनिर्पेक्ष है, सब नागरिक बराबर हैं, आजाद हैं, सबको न्याय का समान अधिकार है वगैराह, वगैराह, लेकिन असलियत में ऊपर से लेकर नीचे तक असमानता और अन्याय है।

नाई की दुकान पर एक-दो बार मेरे चेहरे की भी शामत आ चुकी है। हाल ही में मुरादाबाद गया था, तो मेरा चेहरा नाई के हाथों का शिकार बना। शेव बनाने के बाद नाई ने बड़े अदब के साथ बोला- ‘सर आपका चेहरा बड़ा रफ हो रहा है। मसाज कर देता हूं। हमारे यहां केमिकल्स वाले प्रोडक्ट यूज नहीं होते। ये देखिए ये स्क्रब इंडिया का नहीं है अरब का है। मैं 12 साल अरब में ही था। अब वापस मुरादाबाद आकर अपनी दुकान खोली है’। मैं बोला- यार मैं ये सब नहीं करवाता, तो जनाब ने कहा कि एक बार करवाकर देखिए। मैंने कहा- करवाकर देख चुका हूं, बमुश्किल 24 घंटे चेहरा चमकता है और फिर वैसा का वैसा। लेकिन उसने कुछ इतना अनुनय-विनय किया कि मैं उस अरबी स्क्रब के लिए तैयार हो गया। उसने झट से लड़कियों वाला हेयर बैंड मेरे बालों में जड़ दिया और लगा चेहरे को लेपने। उसके बाद पांच मिनट तक चेहरे को रगड़ता रहा। वो उस दानेदार स्क्रब को मेरे चेहरे पर रेगमाल की तरह रगड़ रहा था। इतने पर भी उसका जी नहीं भरा और उसने दराज में से एक मशीन निकाली। झनझनाहट मशीन, बोले तो वाइब्रेटर। उसको हाथ में पहना और पाॅवर स्विच आॅन कर दिया। अब उसके हाथ के दबाव से मेरा पूरा चेहरा झनझना रहा था। आंखें खोलूं तो हर चीज हिलती दिख रही थी, सो आंखें बंद ही कर लीं। चेहरा साफ करते-करते उसने उस झनझनाहट मशीन के साथ एक उंगली मेरे कान में घुसा दी। एक पल को ऐसा लगा मानो कोई कान में सुरंग खोद रहा हो। मैंने जोर से खोपड़ी हिलाकर मना किया। मेरी समझ में नहीं आया कि वो कान के अंदर कौनसी मसाज कर रहा था और न ही वो मुझे समझा पाया।

खैर, 15 मिनट के उस फिजिकल अत्याचार के बाद मैं नाई के चंगुल से आजाद था। चेहरा पहले से थोड़ा चमक तो रहा था, लेकिन इतना भी नहीं जितने वो मुझसे पैसे मांग रहा था। शेव$इंपोर्टेड स्क्रब के 150 रुपए मात्र। इलीट क्लास सोसायटी का एक अलिखित नियम है कि जब आपको कोई बार-बार ‘सर’ कहकर सम्मान दे तो आप उसके साथ पैसों के लिए ज्यादा झिकझिक नहीं कर सकते। आपको स्टाइल में अपना बटुआ खोलकर उसके हाथ पर पैसे रख देने होते हैं। खैर, मैं ऐसा करने वाला नहीं था, 150 की जगह 120 रुपए दिए। और उसने ये क्या सर, ये क्या सर कहते हुए पैसे दराज में रख लिए।

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

भय बिनु होई न प्रीतिः आम आदमी के लिए काफी मददगार है नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन

मेरी मां गीताप्रेस गोरखपुर से छपने वाली ‘कल्याण’ मासिक पत्रिका की नियमित पाठक हैं। पिछले दिनों दिसंबर में जब मैं हरिद्वार गया तो रेलवे स्टेशन के प्लेटफाॅर्म नंबर एक पर स्थित प्रेस के स्टाॅल पर मैंने पत्रिका का वार्षिक शुल्क जमा करा दिया ताकि 2012 में पत्रिका का क्रम न टूटे। 2 फरवरी को डाकिया महोदय पत्रिका का पहला विशेषांक, जो काफी मोटा होता है, लेकर मुरादाबाद में मेरे घर पहुंचे। मम्मी तो पत्रिका का महीने भर से इंतजार था। लेकिन डाकिए ने कहा कि आपके पैसे जमा नहीं हैं आपको ये पत्रिका छुड़ाने के लिए 210 रुपए वीपीपी शुल्क अदा करना होगा। मम्मी ने डाकिए को बताया भी कि शुल्क दिया जा चुका है पर डाकिया मानने को तैयार नहीं था। फिर मम्मी ने उससे रसीद दिखाने को कहा तो वो भी उसके पास नहीं थी। इस पर मम्मी को शक हुआ और उन्होंने मुझे फोन किया। मैं उस वक्त दिल्ली स्थित अपने आॅफिस में था। मैंने आनन-फानन कह दिया कि बिना पैसे देता है तो लो वरना जाने दो। डाकिया किताब लेकर वापस चला गया और यह भी कह गया कि- अब मैं दोबारा देने नहीं आउंगा, हेड पोस्ट आॅफिस से अपने आप मंगवा लेना।

फिर मैंने गीताप्रेस गोरखपुर फोन घुमाया तो पता चला कि किताब रजिस्टर्ड डाक से भेजी गई है न कि वीपीपी से और मुझे उसके बदले कोई पैसा नहीं देना है। उन्होंने मुझे रजिस्ट्री नंबर भी दे दिया-34437। साथ में उन्होंने ये भी कहा कि हो न हो आपका डाकिया पैसे कमाने के चक्कर में है। फिर मैंने वो रजिस्ट्री नंबर लेकर पहले तो डाक विभाग के पोर्टल पर कंप्लेंट डाली और उसके बाद नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन (एनसीएच) 1800114000 पर फोन किया। उन्होंने बड़े इत्मिनान से मेरी बात सुनी और कंप्लेंट दर्ज करके एक डाॅकिट नंबर दिया। फिर मुझे बताया कि मैं पहले मुरादाबाद के एसएसपीओ (सीनियर सुप्रिंटेंडेंट आॅफ पोस्ट आॅफिस) के यहां इस बारे में एक शिकायत दर्ज करूं अगर वहां से बात न बने तो फिर हमें बताना। मुरादाबाद के हेडपोस्ट आॅफिस का फोन नंबर 0591-2415639 तो मैं कई बार मिला चुका था, लेकिन उसे किसी ने उठाया नहीं। फिर मैंने गूगल का सहारा लेकर मुरादाबाद के एसएसपीओ का लैंडलाइन नंबर खोज निकाला 0591-2410023। घड़ी में देखा तो पांच बज चुके थे, लगा कि सरकारी दामाद लोग दफ्तर बंद कर चुके होंगे। फिर भी एक कोशिश करने में क्या घिस रहा था। तीन-चार घंटी के बाद ही फोन उठ गया, किसी बाबू ने उठाया, लेकिन मेरी उम्मीद के विपरीत अदब से बात की। जब मैंने उनसे कहा कि मैं दिल्ली से बोल रहा हूं तो उनकी आवाज थोड़ी और दब गई। फिर मैंने उनको डाकिए की करनी बताई तो उन्होंने कहा कि वीपीपी होगी उसके तो पैसे देने ही होंगे, तो मैंने डाकिए के पास कोई रसीद न होने की बात बताई और अपना रजिस्ट्री नंबर दिया जो गोरखपुर से 24 जनवरी को की गई है। फिर उन्होंने मेरा फोन ट्रांसफर कर दिया। उधर से एक महिला की मधुर आवाज सुनाई दी, उन्होंने मेरी उम्मीद के विपरीत सारी बात आराम से सुनी। फिर मेरा मुरादाबाद का पता पूछा और साथ ही मैंने उन्हें रजिस्ट्री नंबर भी बता दिया। बोलीं कि मैं दिखवाती हूं। मैंने कहा कि मेरी शिकायत दर्ज की हो तो मुझे नंबर दे दीजिए, तो थोड़ा मुस्कुराकर बोलीं कि अभी शिकायत दर्ज नहीं की है। कल तक अगर आपकी डाक न पहुंचे तो शिकायत दर्ज करवा दीजिएगा। खैर, जब उन्होंने मेरी सारी बात सुन ही ली और आश्वासन भी दिया तो, मेरे पास बहस करने की कोई वजह नहीं थीं। लेकिन सरकारी सिस्टम के खिलाफ मन में कोफ्त जरूर हो रही थी।

फिर रात को नौ बजे मां का फोन फिर से आया कि- आठ बजे डाकिया आया था और किताब दे गया है। वही डाकिया जो दिन में कह कर गया था कि अपने आप हेड पोस्ट आॅफिस से मंगवा लेना, रात के आठ बजे ड्यूटी टाइम खत्म हो जाने के बावजूद घर आकर किताब दे गया। साथ में दांत निपोरते हुए स्पष्टीकरण भी दे गया कि किसी दूसरे की वीपीपी वाली डाक उठा लाया था इसलिए गलती हो गई। मम्मी ने फोन पर मुझे डाकिए का वृतांत सुनाने के बाद कहा- बड़ा खराब समय है, रामायण में सही लिखा है ‘भय बिनु होई न प्रीति दयाला’।

खैर, इस पूरी घटना को यहां लिखकर मैं डाक विभाग की साख पर बट्टा नहीं लगा रहा, न डाक विभाग से मेरी कोई निजी खुंदक है। देश की सेवा में डाक विभाग जो काम कर रहा है वो काफी सराहनीय भी है और बेमिसाल भी। लेकिन हर जगह कुछ एक लोग ऐसे होते हैं जो अपने पूरे विभाग पर बट्टा लगवाने का काम करते हैं और आप उनका कुछ नहीं उखाड़ सकते। जैसे कई ट्रकों के पीछे लिखा होता है न कि ‘यो तो यूं ही चालैगी’ तो भैया ये सिस्टम तो यूं ही चलता रहेगा।

ये घटना यहां लिखने के पीछे मेरा मकसद सिर्फ इतना है कि नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन नंबर उपभोक्ताओं की मदद करने में काफी सराहनीय भूमिका निभा रहा है। मेरे कई मित्र इसी नंबर के इस्तेमाल से मोबाइल कंपनियों की दाढ़ में गया व्यर्थ पैसा वापस निकलवा चुके हैं। मैंने भी इसका पहली बार इस्तेमाल किया और काफी उपयोगी पाया। इस तरह की चीजें आम आदमी को सशक्त बनाती हैं। अगर हर सरकारी विभाग अपना काॅल सेंटर बनाकर कंज्यूमर हेल्पलाइन नंबर शुरू कर दे, तो आम आदमी की परेशानियां काफी कम हो सकती हैं।

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

आओ मनाएं मिलावटी दीवाली!!!



त्योहारों का मौसम है! मन में ढेर सारी खुशियां हैं (खासतौर से बच्चों के, बड़े तो खुश होने का केवल अभिनय करते हैं) और जेब में ढेर सारे पैसे हैं (मनमोहन सिंह द्वारा दिए गए 32 रुपयों से कहीं ज्यादा)। महंगाई भी है, लेकिन दीवाली तो हमने तब भी मनाई थी जब पूरे विश्व में महामंदी का दौर था। हमें हमारे त्योहार मनाने से कोई नहीं रोक सकता। इस देश के माता-पिता कमाते ही त्योहार मनाने के लिए हैं। बच्चों को कतई मायूस नहीं कर सकते। प्रेमचंद की ईदगाह में भी गरीबी के दिन झेल रही दादी ने हामिद के हाथ पर ईद मनाने के लिए तीन पैसे रखे थे। वो बात दीगर है कि वो ईदगाह के मेले से अपने लिए खिलौने लाने के बजाय अपनी दादी के लिए चिमटा लेकर आया था। ये तो हमारे रिश्तों की मिठास है। त्योहार तो भारत की पहचान हैं। हम उनको मनाए बिना नहीं रह सकते, चाहे प्रधानमंत्री हमारे हाथ पर 32 रुपए रखें और चाहे पश्चिमी देश महामंदी में डूब जाएं।

दीवाली तो सबकी है (जेल में बंद यूपीए के मंत्रियों को छोड़कर) और सभी मनाने को उत्सुक हैं। माल तैयार है और बाजार सजे पड़े हैं। बाजार के बाजीगरों ने ग्राहकों को लुभाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है। सबकी पौ बारह है। हालांकि महंगाई नंगी होकर भूतनी की तरह नाच रही है। इस महंगाई से निपटने में भारत सरकार भले ही विफल रही हो, लेकिन चीन हम भारतीयों का दर्द भलीभांति समझता है। उसने हमारे दर्द को समझते हुए अपने यहां से सस्ता माल भारत भेज दिया है। पता नहीं क्यों विशेषज्ञ लोग यूं ही कहते रहते हैं कि चीन भारत का दुश्मन है! इस चुड़ैल महंगाई से निपटने में तो चीन भारतीयों का दोस्त ही साबित हो रहा है! मूर्तियां, बिजली की टिमटिमाती लडि़यां, पटाखे, इलेक्ट्राॅनिक्स, चीन ने सबकुछ भेज दिया है आपके लिए।

अब जो चीजें चीन से नहीं भेजी जा सकतीं, उन चीजों में भारतीय मिलावट कर-कर के लोगों की दीवाली मनवा रहे हैं। नकली मावा, नकली मिठाई, नकली सोना-चांदी, सबकुछ मिलावटी। हालात इतने सड़ गए हैं कि किसी भी चीज पर भरोसा नहीं किया जा सकता। कल बात छिड़ी तो आंटी बताने लगीं कि बाजार में डाई मिली हुई मेहंदी आ रही है, जिससे किसी भी गृहणी का हाथ हल्का न रचे। डाई के असर से सबके हाथ स्याह सुर्ख रचते हैं। पहले कहते थे कि जिन पति-पत्नी में ज्यादा प्यार होता है उनकी मेहंदी ज्यादा रचती है। अब तो प्यार भी नकली है देखने में पता ही नहीं चलेगा कि सच्चा या झूठा। तो मेहंदी भी अगर झूठ बोल रही है तो गुरेज क्या है? मिलावटी मावा और मिठाइयां तो अब पुरानी बात हो चुकी हैं। लोगों ने मिठाइयों का विकल्प भी खोज लिया है। मुंह मीठा कराने की जगह नमकीन कराया जा रहा है- कुरकुरे, लेहर, हल्दीराम वगैराह-वगैराह!!

पिछले दिनों रिश्तेदारी में एक बच्चे का जन्म हुआ तो सोचा कि चांदी की नजरियां भेंट कर दी जाएं, ताकि उसे दुनिया की नजर न लगे। मुरादाबाद में था, सो वहीं के एक सुनहार की दुकान पर गया और एक जोड़ा पसंद करके उसके दाम पूछे। उसने उन रजत कंगनों को इलेक्ट्राॅनिक तराजू में ऐसे तौला मानो अपनी ईमानदारी का परिचय दे रहा हो। बोला जी 600 रुपये के पड़ेंगे। मैंने कहा- भाई मिलावटी तो नहीं है। चांदी में बहुत मिलावट सुनने को मिल रही है। बोला- भाई साहब आपको पूरे बाजार में असली चांदी मिलने की ही नहीं है। सब 60 परसेंट है। हम तो बताकर बेचते हैं। चांदी का असली वाला क्वीन विक्टोरिया का सिक्का 1200 रुपए का पड़ेगा। कौन ग्राहक दे देगा इत्ते रुपए। सबको 500-600 वाले चाहिए। अब मेरठ में हू-ब-हू वैसा ही सिक्का तैयार हो रहा है। आप पहचान नहीं सकते। बस 600 रुपए का है। दीवाली पे जमके बिकेगा। मैंने मन में सोचा जब ये इन कंगनों को अपने मुंह से 60 परसेंट प्योर बता रहा है तो हरगिज ये 20 परसेंट ही प्योर हैं। मेरी उसके साथ कोई नाते-रिश्तेदारी तो थी नहीं जो वो मुझसे हरीशचंद्रपना दिखाएगा। सो मैंने कहा 500 रुपये लगाओ, एक नोट में काम चलाओ। न नुकुर करते हुए उसने 500 पकड़ ही लिए और अपन ये जानते हुए भी कि माल नकली है खुशी-खुशी घर आ गए।

भयानक स्थिति है। इंसान से लेकर मशीन तक, भावनाओं से लेकर चरित्र तक, फलों से मिठाइयों तक, दूध से लेकर दही तक, पानी से लेकर खून तक, मंत्री से लेकर संत्री तक, खुशियों से लेकर दुःख तक, नौकरी से लेकर छोकरी तक, सरकार से लेकर संस्थाओं तक, धर्म से लेकर न्याय तक, हंसी से लेकर आंसुओं तक सबकुछ मिलावटी है हो गया है इस देश में। तो साथियों आप सभी को मिलावटी दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं!!!!!!!!

‘हनुमान अंश’ की सफलताः देशज कहानी की जीत

भारतीय सिनेमा में सफलता का पैमाना लंबे समय से बड़े बजट, बड़े सितारों, विदेशी लोकेशन और भव्य प्रचार से जोड़ा जाता रहा है। ऐसे समय में ‘हनुमान अं...