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मंगलवार, 3 जून 2014

सड़कों पर सपनों की मौत

नई सरकार ने संसद का मुख देखने से पहले ही अपने वरिष्ठ मंत्री गोपीनाथ मंुडे को सड़क हादसे में खो दिया। एक ऐसा नेता जो जमीन से उठकर राजनीति के शिखर तक पहुंचा, जो अपने पीछे कठोर संघर्ष का इतिहास और प्रेरणा छोड़ गया। इस दुर्घटना में यदि उनकी मृत्यु न होती तो वो अवश्य कल महाराष्ट्र की सबसे ताकतवर कुर्सी पर बैठते। व्यक्ति के चले जाने के बाद उसके पीछे रह गए लोग शोक और संवेदनाओं के अलावा कुछ विशेष नहीं कर पाते। अकाल मृत्यु को ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करने के अलावा कोई चारा उनके पास नहीं बचता। लेकिन सड़क दुर्घटनाएं भारत में इतना बड़ा अभिशाप बन गई हैं कि अगर इन पर गंभीरता से विचार करके ठोस कदम नहीं उठाए गए तो देश इसी तरह अपने नागरिकों से हाथ धोता रहेगा।

युद्ध से बड़ा खतरा
भारत में सड़क दुर्घटनाएं युद्ध से भी बड़ा खतरा हैं। भारत ने अब तक जितने युद्ध लड़े उनमें इतनी जानें नहीं गंवाईं जितनी हम हर साल सड़क दुर्घटनाओं में गंवा देते हैं। एनसीआरबी के आंकड़े इस बारे में भयावह आंकड़े पेश करते रहे हैं। इससे भी दुखद बात ये है कि इन सड़क हादसों में सबसे ज्यादा मौत युवाओं और बच्चों की दर्ज होती हैं। ये किसी भी देश के लिए सबसे शर्मसार करने वाला और चिंताजनक तथ्य है। भारत की सड़कों पर सुरक्षा मानकों के साथ किस हद तक लापरवाही बरती जाती है ये बताना तो बेमानी ही है। पर  दुर्घटना में केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती, उसके साथ उसके परिवार, उसके सपनों और तमाम संभावनाओं की भी मौत हो जाती है। 

एनसीआरबी के भयावह आंकड़े
वर्ष         सड़क दुर्घटना में मौत
2008 118239 
2009 126896
2010 133938
2011 136834
2012 139091

नई सरकार के लिए चुनौती
भाजपा सरकार को पहले ही दिन रेल हादसे से दो-चार होना पड़ा था। और अब अपने मंत्री की सड़क हादसे में मौत के बाद सरकार को दुर्घटनाओं पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है। देश में नए-नए हाई स्पीड नेशनल हाईवे बनाए जा रहे हैं, एक्सप्रेस वे बनाए जा रहे हैं, विदेशों से हाईस्पीड गाडि़यां आयात करने का रास्ता आसान किया जा रहा है, मलाईदार सड़कों पर टोल-टैक्स लगाकर सरकार जमकर चांदी भी छाप रही है। वहीं जब आप सड़क दुर्घटनाओं पर नजर डालें तो ये सब मौत के सरकारी इंतजाम लगते हैं। इसका मतलब ये भी नहीं है कि देश को फिर से बैलगाड़ी युग में धकेल दिया जाए, लेकिन कम से कम इस दिशा में कुछ ऐसे ठोस कदम उठाए जाएं कि दुर्घटनाओं की संख्या घटे।

जनजागरण जरूरी
जिस देश के नागरिक हेलमेट पहनने में अपनी तौहीन समझते हों, बंद रेलवे फाटक पार करना वीरता समझा जाता हो, अत्यधिक तेज गति में गाड़ी चलाना फैशन हो, ट्रैफिक लाइट तोड़ना फख्र की बात हो और विदेशी गाडि़यों में बैठकर सड़कों पर रेस लगाना स्टेटस सिंबल समझा जाए, उस देश में एक्सीडेंट्स को रोक पाना नामुमकिन है। फिर भी यदि जनजागरण के साथ सड़कों पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाएं तो काफी जानें बच सकती हैं। हालांकि ये काम काफी मुश्किल है, पर अगर लगातार अभियान चलाने से देश का वोटिंग परसेंट बढ़ाया जा सकता है तो एक्सीडेंट परसेंट भी घटाया जा सकता है।

सरकार के स्तर पर जो पहल हो सकती है

  • बच्चों को लाइसेंस देने में सख्ती
  • मोटरसाइकिल निर्माता उनमें अधिकतम स्पीड 50 करें से ज्यादा न हो
  • हाई स्पीड विदेशी गाड़ियों के आयात पर लगाम कसे 
  • हाईवे पेट्रोलिंग पुलिस का गठन किया जाए
  • हाईवे पर ट्राॅमा सेंटरों की स्थापना 
  • हाईवे पर एयर एंबुलेंस से सर्विस सुविधा
  • हाईवे पर सबको एक्सीडेंट बीमा
  • मदद करने वालों को पुलिस प्रताड़ना से सुरक्षा
  • प्राइवेट अस्पतलों को एक्सीडेंटल केस में बिना फीस जमा कराए तत्काल कदम उठाने के निर्देश

मेट्रो का विस्तार
यदि देश के पब्लिक ट्रांस्पोर्ट पर नजर डालें तो मेट्रो अब तक कि सबसे सुरक्षित यात्रा सेवा साबित हुई है। दिल्ली में मेट्रो चलते 10 साल से ज्यादा हो गए हैं, और कोलकाता मेट्रो उससे भी पुरानी है, लेकिन आज तक कोई बड़ा हादसा सामने नहीं आया है। दिल्ली मेट्रो में कुछ मामले आत्महत्या के जरूर हुए हैं, पर एक्सीडेंट मेट्रो के स्तर पर हुआ हो ऐसा सुनने को नहीं मिला। यदि देश में इस तरह का सुरक्षित पब्लिक ट्रांसपोर्ट को विस्तार दिया जाता है तो इन हादसों पर काफी हद तक लगाम कसी जा सकती है।

राम राज्य की बात
देश में समय-समय पर राम राज्य की बात अक्सर उठा करती है, तो राम राज्य के बारे में बता दें कि उस राज्य का एक पक्ष ये भी था कि उस समय अकाल मृत्यु नहीं हुआ करती थीं। 21वीं सदी में राम राज्य का ये पक्ष आधुनिक सरकारें कैसे दे पाएंगी ये उन्हीं को तय करना है। ये भी याद रहे कि दुर्घटनाएं बड़ा और छोटा नहीं देखतीं, ये किसी के भी साथ कहीं भी घट सकती हैं।

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

राग दरबारी की स्वर्गयात्रा!!


आज जब हिंदी जगत के वरिष्ठ साहित्यकार श्री लाल शुक्ल की मृत्यु की खबर मिली तो अचानक मुझे अनुराग की बात याद हो आई जो उसने ‘राग दरबारी’ के बारे में कही थी। मेरठ में पत्रकारिता के दिनों में एडिशन छोड़ने के बाद रात के 12 बजे जो बैठकी जमती थी उसमें अक्सर राग दरबारी और श्री लाल शुक्ल की चर्चा उठती थी। राग दरबारी भले ही 1968 में लिखी गई हो लेकिन वो आज भी वर्तमान पत्रकारिता को आइना दिखा सकने की कुव्वत रखती है। अनुराग का कहना था कि राग दरबारी पढ़ते वक्त बार-बार ऐसे मौके आए जब वो ठठ्ठा मार कर हंस पड़ता था। घर वाले भी उसकी ओर हैरत से देखने लगते थे कि ऐसी कैसी किताब है कि अच्छे-खासे शांत इंसान को बार-बार हंसने पर मजबूर कर रही है। अनुराग की सभी पत्रकारों को राय थी कि हर एक पत्रकार को राग दरबारी अवश्य पढ़नी चाहिए वो भी मांगकर नहीं खरीदकर। मेरे कई साथी पत्रकारों के पास राग दरबारी थी, लेकिन मांगने पर किसी ने पढ़ने के लिए नहीं दी। क्योंकि गई हुई किताब के वापस लौटने के चांस न के बराबर होते हैं और राग दरबारी ऐसी किताब नहीं जिसको खो दिया जाए।

जब कंडवाल जी ने एक बार राग दरबारी का जिक्र किया जो उनके मुख से सीधे ये निकला कि जिस किताब के पहले ही पृष्ठ पर भारतीय सड़कों की दुर्दशा के बारे में इतना तगड़ा व्यंग्य लिखा हो कि ‘ट्रक का जन्म ही सड़कों का बलात्कार करने के लिए हुआ है’, तो अनायास ही उसको और भी ज्यादा पढ़ने की इच्छा जागृत हो जाती है। कंडवाल जी की इस प्रशंसा में उनका अपना दर्द भी छिपा था, क्योंकि दिन भर बाइक पर रिपोर्टिंग करने वाला रिपोर्टर जब अपनी खबरें पंच करके देर रात घर लौटता है तो उसके आगे-आगे सड़क की धूल उड़ाते ट्रकों का सबसे ज्यादा शिकार वही बनता है। श्री लाल शुक्ल का यही अंदाज था कि उनकी लेखनी हर इंसान के दिल की बात या दिल के दर्द को बयां करती थी। आप चाहे किसी भी क्षेत्र से जुड़े हुए हो आप उनकी रचनाओं में खुद को कहीं न कहीं फिट कर ही लोगे।

सबसे मजेदार बात ये कि शुक्ल जी ने एक खास पद पर रहते हुए आम आदमी की बात कही। सिविल सर्वेंट को भारतीय समाज में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है और शुक्ल जी जिस जमाने में सिविल सर्वेंट थे उस जमाने में तो सिविल सर्वेंट होने का मतलब आप समझ ही सकते हैं। प्रशासकों पर अक्सर ऐसे आरोप लगते हैं कि वे आम आदमी की भावनाओं को नहीं समझते, लेकिन शुक्ल जी ने न केवल आम आदमी की भावनाओं को समझा बल्कि उसको बखूबी अपनी लेखनी के दम पर किताबों में उतारा भी। रिटायर होने के बाद या रिटायरमेंट के आसपास प्रायः अधिकांश प्रशासक लेखक बन ही जाते हैं, लेकिन वो अलग किस्म का लेखन होता है, जिसको एक इलीट वर्ग ही समझ सकता है। लेकिन शुक्ल जी ने पद पर रहते हुए ऐसे व्यंग्य लिखे जो जनसाधारण के दिलों को छू गए, ये उनकी अपनी विशेषता थी। शुक्ल जी भले ही मृत्युलोक से स्वर्गलोक की यात्रा पर चले गए हैं, लेकिन इतना तय है कि उनका व्यंग्य राग सुनकर वहां विराजमान ब्रह्मदेव की भी हंसी छूट जाएगी।

शनिवार, 19 मार्च 2011

डॉ. राजीव दीक्षितः असमय शांत हो गई एक ओजस्वी वाणी

ऐसा कम ही होता है कि लोगों की जन्म तिथि और पुण्यतिथि एक हो। क्योंकि जिन लोगों का जन्म और देहांत एक ही दिन होता है वे महान आत्माएं होती हैं। ऐसी ही एक महान आत्मा हमारे बीच नहीं रही। जिसने अपनी तेजस्वी वाणी से भारत के कोने-कोने में स्वदेशी की अलख जगाई और अपने वाक कौशल से लोगों को अंदर तक झकझोर दिया, ऐसे डॉ. राजीव दीक्षित असमय काल का शिकार हो गए। ३० नवंबर १९६७ को उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ जिले के अतरौली तहसील में जन्में राजीव दीक्षित ने ३० नवंबर २०१० को अचानक हार्ट अटैक हो जाने से छत्तीसगढ के भिलाई में अंतिम सांस ली। उस समय वे भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के तत्वाधान में आयोजित भारत स्वाभिमान यात्रा पर थे।

स्वदेशी के प्रखर वक्ता और बाबा रामदेव के मार्गदर्शन में स्थापित भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के राष्ट्रीय सचिव की जिम्मेदारी निभा रहे राजीव दीक्षित की शुरुआती शिक्षा ग्रामीण परिवेश में हुई। राधेश्याम दीक्षित के घर में जन्में डॉ. राजीव का शुरुआती जीवन वर्धा में व्यतीत हुआ। बेहद सरल और संयमी जीवन जीने वाले राजीव दीक्षित निरंतर साधना में लगे रहते थे। पिछले कुछ महीनों से वे लगातार गांव-गांव व शहर-शहर घूमकर भारत के उत्थान के लिए भ्रष्टाचार और स्वदेशी जैसे मुद्‌दों पर लोगों के बीच जनजाग्रति पैदा कर रहे थे। राजीव भाई वैज्ञानिक भी रहे उन्होंने डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के साथ भी काम किया और फ्रांस के टेलीकम्युनिकेशन सेक्टर के अलावा भारत के सीएसआईआर में भी काम किया था।
 
राजीव दीक्षित पिछले २० सालों से बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद के खिलाफ व स्वदेशी की स्थापना के लिए संघर्ष कर रहे थे। वे मानते थे कि भारत पुनर्गुलामी की ओर बढ़ रहा है और इसे रोकना बहुत जरूरी है। उनकी प्रारंभिक व माध्यमिक शिक्षा फिरोजाबाद में हुई। फिर वे १९९४ में उच्च शिक्षा के लिए इलाहबाद चले गए। वे सेटेलाइट कम्युनिकेशन में उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे, लेकिन अपनी शिक्षा बीच में ही छोड कर वे देश को विदेशी कंपनियों की लूट से मुक्त करने के लिए स्वदेशी आंदोलन में कूद पड े। शुरू में वे भगतसिंह, उधमसिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे महान क्रांतिकारियों से प्रभावित रहे। बाद में जब उन्होंने गांधी जी को पढ ा तो उनसे भी काफी प्रभावित हुए।


पिछले २० सालों में राजीव दीक्षित ने जो कुछ भी सीखा उसके बारे में लोगों को जागृत किया। भारतीय जनमानस में स्वाभिमान जगाने के लिए उन्होंने लगातार व्याखयान दिए। २० सालों में राजीव भाई ने तकरीबन १५ हजार से अधिक व्याखयान दिए। जिनमें से कुछ व्याखयानों की ऑडियो और वीडियो सीडी भी बनाई गईं। उनके व्याखयानों की सीडी लोगों के बीच खासी लोकप्रिय हैं। उन्होंने सबसे पहले देश में स्वदेशी और विदेशी कंपनियों की सूची तैयार की और लोगों से स्वदेशी अपनाने का आग्रह किया। उन्होंने पेप्सी और कोक जैसे पेय पदार्थों के खिलाफ आंदोलन चलाया और कानूनी कार्यवाही भी की। पिछले १० सालों से स्वामी रामदेव के साथ संपर्क में रहने के बाद ९ जनवरी २००९ को उन्होंने भारत स्वाभिमान की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली।
 
जब राजीव दीक्षित मंच से बोलते थे, तो सुनने वाले एकटक उनकी ओर देखते हुए उन्हें सुनते रह जाते थे। उनके भाषण में ऐसा सम्मोहन था कि बीच से उठकर जाना कठिन था। आवाज में ऐसा आकर्षण था कि कोई कहीं भी सुने तो खिंचा चला आए। ठोस तथ्यों के साथ वो अपनी बात को इतनी मजबूती और सहज ढंग से रख देते थे कि समझने के लिए दिमाग पर जोर डालने की जरूरत नहीं पड़ती। देश की कठिन से कठिन समस्या पर उन्होंने बेहद सरलता के साथ निदान दिए। कम ही लोगों को समझ आने वाला अर्थशास्त्र भी वे बेहद सरलता के साथ लोगों को समझा देते थे। यही कारण था कि लोगों को उनके रूप में देश का कर्णधार नजर आने लगा था। लेकिन ३० नवंबर २०१० को लोगों की इन उम्मीदों पर उस समय पानी फिर गया जब अचानक आए हार्ट अटैक ने डॉ. राजीव दीक्षित को हमसे छीन लिया। 

‘हनुमान अंश’ की सफलताः देशज कहानी की जीत

भारतीय सिनेमा में सफलता का पैमाना लंबे समय से बड़े बजट, बड़े सितारों, विदेशी लोकेशन और भव्य प्रचार से जोड़ा जाता रहा है। ऐसे समय में ‘हनुमान अं...