गुरुवार, 23 अप्रैल 2015
मत जइयो केदार!
शुक्रवार, 25 मार्च 2011
राजनीति की ओर बाबा रामदेव के बढ़ते मजबूत कदम!
जो काम गांधी न कर पाए, जो काम संघ न कर पाया, अब वही काम बाबा रामदेव ने अपने हाथ में लिया है। देश को सही दिशा देने के लिए सत्ता का एक केंद्र स्थापित किया जाए और फिर उस केंद्र को पीछे से मार्गदर्शित किया जाए। एक राजनीतिक संगठन के पीछे नैतिक और चारित्रिक रूप से शक्तिशाली संगठन का मार्गदर्शन ताकि देश का सर्वांगीण विकास हो सके। महात्मा गांधी ने भी ये कोशिश की थी कि वे बिना किसी पद पर बैठे कांग्रेस को पीछे से मार्गदर्शित करते रहेंगे और कांग्रेस उनके सपनों का भारत खड ा करेगी। लेकिन सत्ता के दिन नजदीक आते-आते उनके चेलों में ऐसा झगड ा शुरू हुआ कि देश का बंटवारा और बंटाधार दोनों एक साथ हो गया। आजादी मिलने के बाद नेहरू ने गांधी की एक न मानी और अपने हिसाब से देश का विकास करना शुरू कर दिया। शहरों को विकास का केंद्र बना दिया गया और गांवों की ओर ध्यान नहीं दिया गया। परिणाम स्वरूप शहर और गांव के बीच का फासला बढ ता चला गया। गांधी जो चाहते थे वो उनकी किताबों तक ही सीमित होकर रह गया। कांग्रेस ने गांधी का मुखौटा जरूर लगाया, लेकिन न तो गांधी को अपनाया और न उनकी मानी। बंटवारे के बाद मिली आजादी से गांधी इतने ज्यादा खिन्न थे कि उन्होंने १५ अगस्त १९४७ को आजादी जलसे में शामिल होना भी मुनासिब नहीं समझा। गांधी अच्छी तरह जान गए थे कि कांग्रेस भटक गई है। आजादी के बाद गांधी तकरीबन डेढ साल जीवित रहे, लेकिन इस दौरान उन्होंने देश की शासन व्यवस्था में कोई सक्रिय भूमिका नहीं निभाई।
संघ और भाजपा
आरएसएस भी एक नैतिक और चारित्रिक संगठन के रूप में ही काम करना चाहता था, लेकिन पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने संघ को इस बात के लिए राजी कर लिया कि देश को सही दिशा और दशा प्रदान करने के लिए राजनीति में उतरना जरूरी है। और आरएसएस ने अपना पॉलिटिकल विंग खड़ा करने का रास्ता साफ कर दिया। मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की पहली सरकार कम ही दिन रही पर उसने कई ठोस और नए कदम उठाए। लेकिन बाद में ये सरकार भी इंदिरा गांधी के बिछाए जाल में फंसकर पद लोलुपता की भेंट चढ गई। बाद में १९९८ में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी भारतीय जनता पार्टी की सरकार सात साल तक गठबंधन धर्म का रोना रोती रही और संघ के दिशानिर्देशों की अवहेलना करती रही। माना कि राम मंदिर का मुद्दा विवादित था, लेकिन भाजपा ने स्वदेशी से लेकर धारा ३७० और समान नागरिक कोड सबको भुला दिया। लोगों को भाजपा सरकार नई बोतल में पुरानी शराब की तरह लगनी शुरू हो गई। देश का आर्थिक विकास तो हुआ, लेकिन उसका मॉडल विदेशी की था। उसमें भारतीयता की बू कहीं नहीं थी। अगर एक परमाणु परीक्षण को छोड दिया जाए तो पूरे कार्यकाल के दौरान एक भी ठोस कदम नहीं उठाया गया। प्रधानमंत्री वाजपेयी के दिल में उमड ी नोबल पुरस्कार की चाह ने उन्हें बार-बार पाकिस्तान के सामने मजबूर किया। पार्टी के दिग्गज नेताओं का अहंकार इतना बढ ा कि उन्होंने आम जनता से कुछ ज्यादा ही दूरी बना ली। कांग्रेस से भी ज्यादा। जिस पॉलिटिकल विंग को खड ा करते वक्त संघ ने तरह-तरह के सपने संजोए थे, उसका वही संगठन उसको आंखें तरेरने लगा। हश्र सबके सामने है कांग्रेस और भाजपा एक ही सिक्के के दो पहलू बनकर रह गए हैं। भाजपा के दामन में भ्रष्टाचार के दाग भले ही न हों पर दोनों ही दलों में पद की लोलुपता सिर चढ कर बोल रही है।
अब बाबा रामदेव
बाबा रामदेव भी अब इस पथ पर कदम बढ़ा रहे हैं। प्राचीन भारतीय राज व्यवस्था ऐसी ही थी, जहां संतों के मार्गदर्शन में राजा शासन किया करते थे। संत ऐसे सलाहकार की भूमिका निभाते थे, जो निःस्वार्थ भाव से प्रजा के हित में सलाह देते थे और उनकी राय सर्वोपरि होती थी। आज की सरकारें जितने भी सलाहकार नियुक्त करती हैं वे सभी पद और पैसे की चाह में हवा का रुख देखकर सलाह देते हैं। कोई सही सलाह देता भी है तो उसकी एक नहीं सुनी जाती। वर्तमान में सभी सरकारी सलाहकार महज शो-पीस मात्र बनकर रह गए हैं। बाबा रामदेव भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के माध्यम से यही चाहते हैं कि एक ऐसी राजनीतिक शक्ति का सृजन हो जो देश को संतों और समाजसेवियों के मार्गदर्शन में आगे ले जाए। जो उच्च स्तर के नैतिक मूल्यों की स्थापना करे, जो देश को लूटने और बांटने के बजाए पूरी ईमानदारी के साथ जोड े। इतना तो तय है कि बाबा खुद चुनाव नहीं लड ेंगे। लेकिन भारत स्वाभिमान के अंतर्गत उनके नुमाइंदे चुनावी दंगल में उतरेंगे और भ्रष्टाचारियों से मुकाबला करेंगे। देखना यही होगा कि २०१४ में जब बाबा की पार्टी मैदान में आएगी तो क्या गुल खिलाएगी। इससे पहले बाबा जय गुरुदेव भी एक पॉलिटिकल एक्सपेरिमेंट कर चुके हैं जो विफल रहा। हालांकि बाबा रामदेव का ये प्रयोग एकदम अलग किस्म का है और उम्मीद जगाने वाला है। उनके साथ हर वर्ग, हर जाति और हर धर्म के लोग जुड े हुए हैं। और फिलहाल सब जोश से भरे दिख रहे हैं। सत्ता हासिल करने तक ये जोश ठंडा भी नहीं होने वाला।
राजीव दीक्षित का नुकसान
राजीव दीक्षित के रूप में बाबा रामदेव को एक कुशल वक्ता और तेजस्वी व्यक्तित्व मिला था, जिसे काल ने असमय छीन लिया। उनके भाषण में एक अजीब सा सम्मोहन था। उनकी आवाज में गजब का आकर्षण था। तथ्यों की जानकारी ऐसी थी कि कंप्यूटर को भी मात दे दे। विषयों की पड़ताल ऐसी थी कि विशेषज्ञों से पानी भरवा ले। ये राजीव दीक्षित की कार्य कुशलता और नेतृत्व कुशलता ही थी कि उन्हें लोग भारत के प्रधानमंत्री के रूप में देखने लगे थे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। भारत स्वाभिमान यात्रा के दौरान ३० नवंबर को अचानक आए हार्ट अटैक ने बाबा रामदेव से उनका ये सिपेहसालार छीन लिया। ये बाबा रामदेव के लिए बहुत बड ा झटका था। भारत स्वाभिमान का सबसे मजबूत स्तंभ भरभराकर गिर गया। लेकिन बाबा ने हार नहीं मानी और न ही यात्रा को वापस लिया। भारत स्वाभिमान यात्रा यथावत चलती रही और २७ फरवरी को दिल्ली के रामलीला ग्राउंड में एक विशाल रैली करने के बाद राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपने के साथ संपन्न हुई। उस दिन भारत स्वाभिमान ट्रस्ट ने सत्ताधीशों को अपनी ताकत का अंदाजा भी करा दिया। अब भारत स्वाभिमान ट्रस्ट को राजीव दीक्षित के बिना राजनीतिक मोर्चा संभालना होगा।
हरिद्वार बना आध्यात्मिक राजधानी
जैसे मुंबई को भारत की कमर्शियल कैपिटल कहा जाता है, उसी तरह हरिद्वार आज भारत की स्प्रिचुअल कैपिटल कहलाए जाने योग्य है। पतंजलि योग पीठ, गायत्री शक्ति पीठ और गुरुकुल कांगड़ी सरीखे शक्तिशाली आध्यात्मिक संगठनों की बदौलत इस नगरी से आध्यात्म की बयार निकलकर न केवल पूरे देश में बल्कि विश्व के कोने-कोने में फैल रही है। राजनीति के पैरों में अगर धर्म की बेडि यां डाल दी जाएं तो वह भटक नहीं पाएगी। लेकिन इस बात का खयाल भी रखना है कि राजनीति धर्म से चले, पर धर्म की राजनीति न हो। राजनीति को उसका धर्म समझाना जरूरी है और ये काम संत ही कर सकते हैं, ऐसे संत जो धार्मिक उन्माद भड काकर देश को तोड ने के बजाए देश को जोड ने का काम करें। बाबा रामदेव ने विभिन्न धर्मों और मतों के लोगों को एक मंच पर लाकर जोड ने का काम किया है। आशा करें कि हरिद्वार आने वाले समय में देश का ऐसा मार्गदर्शन करे कि उसको सचमुच देश की आध्यात्मिक राजधानी घोषित कर दिया जाए।
गुरुवार, 17 मार्च 2011
बाबा रामदेव की हुंकार!!!!!
प्रचीन शासन व्यवस्था
भारत की प्रचीन शासन व्यवस्था ऐसी ही थी जिसमें शासक संतों और मुनियों से मार्गदर्शन में प्रजापालन का कार्य करते थे। राम और वशिष्ठ से लेकर चंद्रगुप्त और चाणक्य तक सभी सफल शासन व्यवस्थाओं में संतों के मार्गदर्शन ने न्यायपूर्ण और खुशहाल प्रजापालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन हमने भारत में भारतीय दर्शन पर आधारित शासन व्यवस्था न अपनाकर विदेश से आयातित शासन व्यवस्था को अपनाया। हमने वो नहीं अपनाया जो हमारे लिए उपयुक्त था, बल्कि हमने वो अपनाया जो दूसरों के लिए उपयुक्त था। आजादी के ६५ साल बाद आज इसका परिणाम हमारे सामने है। देश में व्याप्त बुराइयों और समस्याओं का जिक्र करने की जरूरत नहीं है। आम लोगों का पैसा पिछले ६५ सालों से भ्रष्टाचार की बेदी पर बदस्तूर चढ़ रहा है। सबसे बड े लोकतंत्र में लोगों के पास कोई विकल्प नहीं है। चोट्टों की फौज खड ी है उनमें से या तो उनको उसे चुनना है जो कम चोर है या फिर उसे चुनना है जो उनकी जाति और धर्म की बात करता है। २१वीं सदी में भी हम जाति और धर्म के आधार पर वोट डाल रहे हैं। आज ऐसा कोई नहीं जो देश की बात करे, जो भारत की बात करे। कोई मराठों की बात करता है, कोई तमिलों की, कोई बंगालियों तो कोई तेलंगाना की, कोई दलितों की बात करता है तो कोई ओबीसी। भारत और भारतीयों की बात करने वाला कोई नहीं। अंग्रेजों की डिवाईड एंड रूल का सिद्धांत जस का तस चला आ रहा है।
धार्मिक राजनीति बनाम राजनीतिक धर्म
कुछ राजनीतिज्ञ कह रहे हैं कि बाबाओं का राजनीति में आना ठीक नहीं है। जबकि प्राचीन भारतीय राज व्यवस्था के हिसाब से संतों ने सदा सत्ता का मार्गदर्शन किया। संतों का मार्गदर्शन इसलिए सर्वोच्च और सर्वमान्य था क्योंकि वे बिना किसी स्वार्थ और बिना किसी निजि हित को ध्यान में रखे प्रजा की भलाई के निर्देश देते थे। बाबा रामदेव ने अपना सफर समाज में योग की चिंगारी से किया, जो आज पूरे देश में ज्वाला बनकर जल रही है। गली मोहल्लों के पार्कों में लोग सुबह-सुबह योग करते दिख रहे हैं, स्कूलों ने योग की क्लास को अनिवार्य किया है। ये बाबा रामदेव ही थे जिन्होंने दवा कंपनियों के मकड़जाल से लोगों को छुड ाने के लिए देश को ''दवा मुक्त भारत'' का सपना दिखाया। जो लोग ये मानकर चलते थे कि दवा जीवन का अभिन्न अंग है उनको ये विश्वास दिलाया कि जीवन शैली बदलो और जीवनभर बिना दवा खाए जियो। लोगों ने अपने जीवन में उतारा और सीधा-सीधा लाभ उठाया। बाबा रामदेव ने अब भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना लोगों को दिखाया है। ये कोई धार्मिक उन्माद नहीं है। ये कोई धर्म की राजनीति नहीं है। उनको सभी धर्मों के लोगों को समर्थन प्राप्त है। उन्होंने किसी एक धर्म को दूसरे धर्म के प्रति उकसाया नहीं है। वे सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं। यही कारण है कि धुर-विरोधी संगठन भी एक साथ उनके संग बैठे हैं। उनके साथ ब्यूरोक्रेसी भी है और टेक्नोक्रेसी भी, उनके साथ संत भी हैं और उनका सपना है अखंड भारत, संपन्न भारत और स्वस्थ भारत। और क्योंकि इस सपने को पूरा करने के लिए पॉवर सेंटर्स को हाथ में लेना जरूरी है इसलिए चुनाव लड ना एक मजबूरी है। लोगों को भारत स्वाभिमान से एक बड ी उम्मीद जगी है। भ्रष्ट पार्टियों की फौज में उनको अब एक विकल्प नजर आने लगा है। जो जाति और क्षेत्र की घटिया राजनीति नहीं करता।
लोकपाल और भ्रष्टाचार
पूरी रैली के दौरान भ्रष्टाचार और विदेश में जमा काले धन को वापस लाने का मुद्दा छाया रहा। भ्रष्टाचारियों की नाक में नकेल डालने के लिए ''इंडिया अगेंस्ट करप्शन'' द्वारा तैयार किया गया लोकपाल विधेयक पारित कराने के लिए भी पुरजोर मांग उठाई गई। हमारा सिस्टम ही कुछ ऐसा है कि आम जनता का करोड़ों डकारने के बावजूद भ्रष्ट लोग इस देश में खुले सांड की तरह पूरी ऐश से घूमते हैं। उनका बाल भी बांका नहीं होता। जबकि छोटा सा ट्रैफिक रूल तोड ने पर आम आदमी की हडि्डयां तक तोड दी जाती हैं। इस विधेयक का प्रारूप कुछ ऐसा है कि अगर ये पारित हुआ तो भ्रष्टाचारियों की नींद उड जाएगी। कोई भी भ्रष्ट आचरण करने से पहले सौ बार सोचेगा। इस विधेयक को पारित कराने के लिए गांधीवादी अन्ना हजारे ने अप्रैल के प्रथम सप्ताह में ''अनशन'' पर जाने की घोषणा की है। अगर भारत सरकार नहीं चेती तो वे आमरण अनशन पर बैठ जाएंगे। आजादी के ६५ सालों में से ५५ साल तक केंद्र में एक ही पार्टी का राज रहा है। ये वही पार्टी है जिसके साथ महात्मा गांधी के सपने जुड े थे। लेकिन सत्ता महारानी मिलते ही गांधी के अनुयाइयों ने गांधी के विचारों का बलात्कार कर उनकी हत्या कर दी। उन्होंने विश्व को दिखाने के लिए गांधी का मुखौटा लगा लिया। गांधी को ५०० के नोट पर चस्पा कर दिया, भाषण में बोलने के लिए गांधी की उक्तियां रट लीं, लेकिन गांधी के विचारों को न तो अपने जीवन में उतारा और न शासन व्यवस्था में। लोग यहां तक त्रस्त हैं कि ये भी कह दिया जाता है कि इससे तो हम गुलाम ही अच्छे थे। इससे दुखद स्थिति कुछ नहीं हो सकती।
बाबा रामदेव देश के लिए जो सपना लेकर चल रहे हैं, उसको पूरा करने में भारत स्वाभिमान ट्रस्ट और उनके अनुयायियों पर महत्वपूर्ण भूमिका है। जो शुद्ध भावना बाबा रामदेव लेकर चल रहे हैं, वही शुद्ध भाव उनके अनुयायियों को भी अपनाना होगा। अगर यहां भी पद का लोभ और चुनावी टिकट की लालसा हिलोरें मारने लगी तो यहां भी हाल वही होगा जो गांधी और कांग्रेस का हुआ। सभी के समक्ष केवल एक ध्येय होना चाहिए कि ''राष्ट्र प्रथम बाद में हम''। किसी भी महान विचार को सबसे ज्यादा नुकसान उसके विरोधी नहीं बल्कि उसके अनुयायी पहुंचाते हैं। चाहे वह गांधी का विचार हो या संघ का विचार। गांधी की कांग्रेस ने सत्ता मिलते ही गांधी के जीवन और उनके विचार को छोड़ दिया। भाजपा ने भी सत्ता मिलते ही संघ के भारतीय मॉडल को भुला दिया और फाइव स्टार कल्चर अपना लिया। सात साल के अंदर ही भाजपा घुटनों पर आ गई। अब वही भारतीय विचार बाबा रामदेव लेकर आए हैं। उनके लाखों-करोड ों अनुयायी हैं, लेकिन देखना ये होगा कि जब सही समय आएगा तब वे बाबा रामदेव के विचारों का खयाल रखते हैं कि नहीं।
मंगलवार, 8 मार्च 2011
दर्शन
शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010
जयंती तो वाल्मीकि की है, फिर चौपाइयां तुलसी की क्यों?
दरअसल हर बार महर्षि वाल्मीकि जी के चित्र के साथ उनकी जयंती की बधाई दी जाती है. रामायण लिखते हुए उनका पारंपरिक चित्र. लेकिन उनके समक्ष जो रामायण होती है वो वाल्मीकि रामायण की जगह तुलसी रामायण होती है, जिसमें तुलसी की चौपाइयां लिखी होती हैं. ये चीज़ आपको तमाम जगह देखने को मिल जाएगी. भगवन वाल्मीकि के कैलेंडरों से लेकर उनकी जयंती पर दिए जाने वाली विज्ञापनों तक. आज भी दिल्ली सरकार का जो विज्ञापन दिया गया है (चित्र देखें हिंदुस्तान टाइम्स में छपा विज्ञापन) उसमें महर्षि वाल्मीकि के समक्ष जो रामायण रखी है उस पर तुलसी की चौपाई- "रघुकुल रीत सदा चल आई..." लिखी है. जबकि महर्षि वाल्मीकि की रामायण संस्कृत में है.
इस कन्फ्यूज़न को दूर करना जरूरी है. क्योंकि छोटे बच्चे इन्हीं सब चीज़ों से अपनी संस्कृति के बारे में सीखते हैं. गोस्वामी तुलसीदास और महर्षि वाल्मीकि की रामायण में अंतर हमें पता होना चाहिए. तुलसी की रामचरितमानस अवधी में है और वाल्मीकि रामायण संस्कृत में. इसलिए महर्षि वाल्मीकि के चित्र में वाल्मीकि रामायण के श्लोकों का समावेश करना चाहिए. इससे वाल्मीकि रामायण की जानकारी का भी प्रसार होगा. कम से कम सरकारी विज्ञापन में इस तरह की गलती की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए. उम्मीद है आगे इस बात का ख्याल रखा जायेगा. दिल्ली सफाई कर्मचारी कमीशन की ओर से जारी इस विज्ञापन में मुख्यमंत्री का चित्र लगा है साथ में कमीशन के चेयरमैन स्वरुप चंद राजन और सदस्य गण राजू सारसर और बीरपाल गहलोत का नाम छपा है. मुझे पूरी उम्मीद है कि ये गलती केवल दिल्ली सरकार के विज्ञापन में ही नहीं बाकि प्रदेश सरकारों और संस्थाओं द्वारा जारी विज्ञापनों में भी होगी.
रविवार, 3 अक्टूबर 2010
हम अपने पिता का कहना नहीं मानते!
यहां संक्षेप में ये भी बताते चलें कि जिस राम राज्य की बात गांधी से लेकर आज तक के नेता करते आए हैं, आखिर उसमें ऐसा क्या था कि हम आज भी वैसे शासन की इच्छा रखते हैं। संदर्भ के लिए अगर केवल तुलसी की रामचरितमानस को ही लें तो हम पाएंगे कि राम के शासन में किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं था। न तो कोई किसी से बैर रखता था और न किसी तरह का भेदभाव था। सभी को समान अधिकार प्राप्त थे। सब अपने-अपने धर्म (कर्तव्यों) का भली-भांति पालन करते थे। न वहां भय था न कोई रोग और न शोक. न तो शारीरिक कष्ट थे और न सांसारिक, प्राकृतिक आपदाएं भी नहीं आती थीं। समय से बारिश होती थी और पशु-पक्षी स्वच्छंद रूप से विहार करते थे। यानि प्रकृति एकदम संतुलित थी। सभी नागरिक ज्ञानी, चरित्रवान और परोपकारी थे। यानि शिक्षा व्यवस्था बेहद उच्च स्तर की थी। सबसे बड़ी बात जो कही वो ये कि अल्पमृत्यु भी नहीं थी। सुनने में ये सब शायद एक सपनों की दुनिया लगे, लेकिन जरा सोच कर देखें कि उस शासन का कैसा सिस्टम रहा होगा? अगर आज की जुबान में कहें तो एकदम फूलप्रूफ सिस्टम।
इसके उलट जरा आज के भारत पर नजर डालते हैं। आजादी से लेकर आज तक भारत सरकार के सामने समस्याओं का अटंबार लगता जा रहा है, लेकिन किसी भी समस्या का कोई ठोस निराकरण नहीं निकल पा रहा। प्राकृतिक आपदाएं हों, अंदरूनी समस्याएं या फिर बाहरी खतरे हर मोर्चे पर हम ढुलमुल खड़े हैं। न तो हम अपने लोगों की बीमारियों से रक्षा कर पा रहे हैं और न तरह-तरह के आतंकवादियों से। कश्मीर से लेकर आसाम तक, आतंकवाद से लेकर नक्सलवाद तक हम हर समस्या के सामने घुटने टेक कर खड़े हैं। हम कोई समाधान नहीं निकाल पा रहे, न तो शक्ति के बल पर और न प्रीति के बल पर। ऊपर से तुर्रा ये कि हम विकास कर रहे हैं, विश्व में एक शक्ति के रूप में उभर रहे हैं। आर्थिक विकास का छद्म चश्मा उतार कर देखें तो दिखेगा कि हम एक मुगालते में जी रहे हैं। ये एकदम २००४ के इंडिया शाइनिंग के माफिक है।
राष्ट्र निर्माण करते-करते हम चरित्र निर्माण करना भूल गए। आज हमने नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर तो खड़ा कर लिया है लेकिन देश के पास नेशनल कैरेक्टर नहीं बचा। ये नेशनल कैरेक्टर की ही कमी है कि तमाम योजनाओं में करोड़ों बहाने के बावजूद उसका लाभ आम लोगों तक नहीं पहुंच पाता। ये नेशनल कैरेक्टर की ही कमी है कि आज कॉमनवेल्थ खेलों में ७० हजार करोड का खजाने खोलने के बावजूद हमारे पांव थर-थर कांप रहे हैं और देश की इज्जत दाव पर है। इस सबकी जड में कहीं न कहीं हमारे एजुकेशन सिस्टम का ही दोष है। जिन बालकों के संग खेलते वक्त पंडित नेहरू उन्हें देश का भविष्य कहकर पुकारते थे, उन बालकों को हम अच्छा नागरिक बनने की दिशा ठीक से नहीं दे पाए। अब वही बालक विभिन्न पदों पर बैठे देश का बंटाधार कर रहे हैं।
गांधी ने अपने राम राज्य का खाका सत्य और अहिंसा की नींव पर खड़ा किया था। वो चाहते कि विकास की बयार गांव से शहर की ओर बहे। बेहूदे विकास के नाम पर पर्यावरण के साथ खिलवाड न किया जाए। नागरिक तप और त्याग का जीवन जिएं। ऐसी अर्थव्यवस्था हो जो सबका पेट भर सके। लेकिन हुआ क्या? सत्ता मिलते ही गांधी के विचार को दरकिनार कर दिया गया और विकास का पश्चिमी मॉडल अपनाया गया। विकास शहरों से शुरू किया गया और गांव पिछडते चले गए, जिसका परिणाम निकला पलायन। स्थिति ये बन गई कि बार-बार दिल्ली की मुखयमंत्री को कहना पड़ा कि दिल्ली अब और लोगों को जगह नहीं दे सकती, कृपया दूसरे राज्यों से लोग यहां आकर न बसें।
हम अपनी नदियों, पहाड़ों और जंगलों को नहीं बचा पा रहे। गंगा-यमुना को साफ करने के नाम पर बार-बार प्रोजेक्ट लांच कर खानापूर्ति की गई लेकिन उनको गंदा करने वाली इंडस्ट्रीज के मालिकों से चुनावी फंड पाने के लिए राजनीतिज्ञ गलबहियां करते रहे। बाजारवाद और भोगवाद इतनी गहराई तक फैल गया कि तप और त्याग की बातें बेहद दकियानूसी लगीं। प्रकृति के साथ तो हमने ऐसा घिनौना बर्ताव किया कि हम उसको अपनी दासी मान बैठे हैं। हालांकि प्रकृति बार-बार अपनी ताकत का ऐहसास कराकर चेताने की कोशिश भी करती है, लेकिन हम उसके इशारे को नहीं समझ पाते। इस साल के मॉनसून ने समूचे उत्तर भारत को पानी पिला दिया। कॉमनवेल्थ की आयोजन कमेटी को तो ये मॉनसून खासतौर से याद रहेगा। खैर, जीव जंतुओं और पर्यावरण की रक्षा तो हम बाद में करेंगे, पहले तो हमारे नागरिक ही देश की सीमाओं में सुरक्षित नहीं हैं। हमको कोई भी, कभी भी, कहीं भी मार जाता है और सरकार के पास बयानों के मलहम के सिवा कुछ नहीं होता। शायद इसीलिए अब ये जुमला आम हो चला है कि भारत राम भरोसे चल रहा है।
जहां तक बात अल्पमृत्यु की है तो आज भारत में वह भी चर्म पर है। अल्पमृत्यु का सबसे बड़ा कारण बन रहे हैं तमाम तरह के हादसे और जानलेवा बीमारियां। हमने आज तक लड़े गए युद्धों में इतनी जानें नहीं गंवाई जितने नागरिक हमने देश की सडकों पर गंवा दिए। हमने ऐसी-ऐसी कारों को अपनी सडकों पर दौडने की इजाजत दे दी जिनके लिए भारतीय सडकें बिल्कुल अनुकूल नहीं हैं। हाईवे पर अधिकतम गति सीमा ६० किमी प्रति घंटा की है लेकिन गाडियों के अंदर २०० किमी प्रति घंटे तक का प्रावधान है। हाई स्पीड पर गाड़ी चलाने पर हम चालक का तो चालान काटते हैं, लेकिन गाड़ी में हाई स्पीड का प्रावधान देने वाली कंपनी के प्रति हमारा रवैया क्या होना चाहिए? वैसे इसपर कोई यह भी सवाल उठा सकता है कि देश का नागरिक कम उम्र में मरता है या उम्र पूरी करके, इसमें शासन की भूमिका कहां पर है। दरअसल यहीं पर राम राज्य का अंतर छिपा है। हम भारत पर भारतीयता की दृष्टि से शासन करने के बजाय एक विदेशी चश्मा लगाकर राज कर रहे हैं। गांधी के स्वदेशी मंत्र में केवल विदेशी चीज़ों की होली जलाना भर नहीं था, उनके 'स्वदेशी अपनाओ' में गहरा दर्शन छिपा था।
१९४७ से लेकर आज तक भारत में भ्रष्टाचार का बोलबाला रहा। पिछले ६३ सालों से हम अलग-अलग सुरों में देश के अंदर व्याप्त भ्रष्टाचार का रोना रो रहे हैं। लेकिन आज तक उसका खात्मा करने की दिशा में सिवाय असफलता के कुछ नहीं मिला। सर्वोच्च स्थानों से लेकर निचले तबके तक निजी हितों ने राष्ट्र हितों के ऊपर वरीयता प्राप्त कर ली है। उपभोक्तावाद ऐसा बढ़ा है कि हम अब केवल मुनाफे की भाषा बोलते और समझते हैं। बिना फायदे के तो अब हम ईश्वर को भी नहीं पूजते। राष्ट्रपिता ने तो बताया तप और त्याग का जीवन लेकिन राष्ट्र को दिया गया भोग और विलास का जीवन। धन और संपदा का लोभ इतना सिर चढ़ा कि जो धन राष्ट्र के विकास में लगना चाहिए था वह स्विस बैंकों में पड़ा सड़ रहा है। देश का शासक स्वयं देश के लिए घुन बन गया और लगातार उसको खोखला कर रहा है।
राम राज्य में दंड का भी प्रावधान था, लेकिन प्रजा इतनी अनुशासित थी कि दंड देने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। पर राजा राम ने बार-बार इस बात पर बल दिया कि अगर उचित समय पर उचित दंड दे दिया जाए तो बाकी प्रजा में उसका गहरा असर होता है। लेकिन आजाद भारत में न्यायिक प्रक्रिया किस तरह काम करती है ये बताने की आवश्यकता नहीं। देश की अस्मिता पर हमला करने वाले आतंकवादियों को सजा सुनाई गई, लेकिन उसको अमलीजामा पहनाने में सरकार के हाथ कांप रहे हैं। ऐसे में आम लोगों का देश के कानून में विश्वास कैसे दृढ बने। इसीलिए लोग कानून तोडने से भी नहीं डरते।
राजा राम का एक और विशेष गुण था। चक्रवर्ती सम्राट होने के बावजूद वे स्वयं अयोध्या के लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याओं का आकलन करते थे। लेकिन आज के शासक ने आम लोगों से बहुत बड़ी दूरी बना ली है। राजा राम के दरबार में हर रोज कार्यार्थियों के काम और शिकायतें सुनने का प्रावधान था। वे लक्ष्मण को द्वार पर देखने को भेजते कि कहीं कोई अपना काम लेकर तो नहीं आया। लेकिन लक्ष्मण को द्वार पर कभी कोई नहीं मिलता। इसका अर्थ ये नहीं कि लोगों को बोलने का अधिकार नहीं था। राजा राम के शासन में प्रजा की राय सर्वोपरि थी, जिसके कारण राम को सीता का भी परित्याग करना पड़ा। द्वार पर कोई फरियादी न होने का अर्थ है कि निचले पदों पर बैठे राजा राम के प्रशासक बखूबी अपने काम को निभा रहे थे। आज उसका उल्टा है। जिला स्तर पर देखें तो डीएम और एसएसपी के ऑफिस में सुबह से ही शिकायत लेकर आए लोगों का जमावड़ा लग जाता है। इसका सीधा सा अर्थ यही है कि डीएम् एसएसपी से नीचे बैठे कर्मचारी अपने कर्तव्यों का ठीक से पालन नहीं कर रहे।
इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर साइंटिफिक स्प्रिचुअलिज्म के संयोजक डॉ. गोपाल शास्त्री से जब मैंने राम राज्य के बाबत पूछा तो उनका कहना था कि राम राज्य तब आया जब अयोध्या के लोगों ने १४ वर्ष तक राम के इंतजार में कठिन तप किया। सभी अयोध्यावासियों ने कठोर तप करके राम के प्रति अपना समर्पण प्रदर्शित किया। उस १४ वर्ष के तप और त्याग ने अयोध्यावासियों को हर दृष्टि से एक श्रेष्ठ इंसान बनाया। जबकि उधर स्वयं राम वनवास में और अयोध्या के कार्यवाहक राजा भरत नंदिग्राम में तपस्वी का जीवन व्यतीत कर रहे थे। जब राजा और प्रजा दोनों ने १४ वर्ष तक कठोर तप और त्याग के जीवन का अनुसरण किया तो अयोध्या में राम राज्य की स्थापना हुई। एक ऐसा राज्य जो राम के पिता दशरथ के शासन से भी श्रेष्ठ सिद्ध हुआ और एक मिसाल बन गया। आज तक लोग उस शासन का सपना देख रहे हैं।
हमने महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता का दर्जा तो दे दिया। लेकिन तप और त्याग के जीवन का जो उदाहरण गांधी ने पेश किया उसको न तो देश के शासक ने अपनाया, न प्रशासक ने और न आम लोगों ने। हमने अपने बीच से एक श्रेष्ठ पुरुष को चुन लिया और अखिल विश्व को दिखाने के लिए उसको राष्ट्रपिता का दर्जा दे दिया, लेकिन हम अपने राष्ट्रपिता की वे संतानें हैं जो अपने पिता का कहना मानने को तैयार नहीं।
शुक्रवार, 24 सितंबर 2010
अयोध्या को बहुत कुछ चाहिए...
शनिवार, 16 जनवरी 2010
सूर्य ग्रहण के बहाने
भारत जैसी विविधता वाला देश वास्तव में पूरे संसार में मिलना मुश्किल है। एक ओर घनघोर विकास है तो दूसरी ओर विकास का केवल सपना, एक ओर उल्लास है उम्मीदों से भरा तो दूसरी ओर नाउम्मीदियों की उदासी है, एक ओर चमचमाती रंगीन शामें हैं तो दूसरी ओर मायूसी भरी रातें हैं। विविधता के एक से बढ़कर एक नमूने यहां देखने को मिल जाएंगे।15 जनवरी को सूर्य ग्रहण के मौके पर विविधता का एक और रंग देखने को मिला। एक ओर वह भारत था जो सूर्य ग्रहण को वैज्ञानिक आधार पर तोल रहा था और सूरज से आंखें चार कर रहा था, तो दूसरी ओर वह भारत था जो इसे दैवीय योग मानकर तमाम तरह के कर्मकांड में लिप्त था और इन दोनों के बीच एक और भारत था जो न इसे वैज्ञानिक आधार पर तोल रहा था और न दैवीय योग मान रहा था, उसके लिए ये रोजमर्रा की तरह आम दिन ही था। वह अपनी जिंदगी में व्यस्त सर्रर्र से दौड़ा चला जा रहा था, हर चीज से बेखबर।
खबरनवीसों के लिए ये एक और सुनहरा मौका था दिन भर चैनल पर बक-बक करने का। किसी ने एक ज्योतिषी बुलाया था तो किसी ने दस-दस। सब के सब तुले थे बड़ी-बड़ी भविष्यवाणियां करने में। जिस ने दस ज्योतिषी बुलाए उसके चांस ज्यादा अच्छे हैं क्योंकि दस में से एक का तुक्का तो ठीक बैठेगा ही। ऐसे में चैनल ये दावा कर सकता है कि हमने तो पहले ही बता दिया था कि क्या होने वाला है।
दूसरी ओर सूर्य ग्रहण को दैवीय योग मानने वालों ने भी इस अवसर को अपने ढंग से मनाया। भारी तादाद में श्रद्धलुओं ने कुरुक्षेत्र जाकर ब्रह्मा सरोवर में स्नान किया और जहां-जहां गंगा के तट हैं वहां गंगा में खड़े होकर अपने, अपने परिवार और देश के लिए मंगल कामना की। देश में सूर्य ग्रहण को लेकर तमाम तरह के मत हैं। उन्हीं मतों के मुताबिक लोगों ने इस मौके पर परंपराओं को निर्वहन किया। ग्रहण के दौरान व्रत रखा, दान दिया, भजन किया, सत्संग किया, भंडारा कराया।
तीसरे लोग वे थे जिनके लिए इस दिन का कोई खास मतलब नहीं। वे हर रोज की तरह व्यस्त थे। समय से उठे, ऑफिस गए, काम निपटाया और शाम को फिर घर आ गए। टीवी पर लोगों की भीड़ को गंगा में स्नान करते देखा तो बोले- ' ओ माई गौड! इस देश में लोगों के पास कितना फालतू टाइम है। लोगों के पास कोई काम नहीं है क्या। अरे हम से कुछ काम ले लें।' इनमें एक वर्ग वह भी था जो ये कहता था कि 'परंपराएं तो हम भी जानते हैं और निभाना भी चाहते हैं, लेकिन इस भागदौड़ में कहां टाइम मिलता है। बाॅस से छुट्टी मांगेंगे तो डांट ही मिलेगी।'
वैसे दिल्ली में जब मैंने अपने तमाम दोस्तों से ग्रहण के बाबत पूछा तो अधिकांश जगहों से मुझे ये पता चला कि लोग बेशक आॅफिस आए हैं, लेकिन ग्रहण के दौरान कोई भोजन नहीं कर रहा है। सबने सवा तीन बजे के बाद ही भोजन किया। लोगों की ये एप्रोच मुझे ठीक लगी। भाई जितना बन पड़ रहा है कर रहे हैं। कम से कम बिना करे दूसरों को बुरा-भला तो नहीं कह रहे।
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