रविवार, 26 अगस्त 2012

कितनी हिंदी!


कोस-कोस पर पानी बदले पांच कोस पर वाणी- ये कहावत है तो पुरानी पर भारत पर पूरी तरह लागू होती है। हिंदी कितने प्रकार की हो सकती है इसका अंदाजा आपको भारत के गांवों में जाकर लगेगा। हर गांव की अपनी अलग लोकल हिंदी है, जिसे शहरी लोग गंवारू भाषा कहकर पुकारते हैं। लेकिन इस गंवारू भाषा की अपनी अलग संुदरता है। गांव की इन भाषाओं की लगातार उपेक्षा ने इन्हें विलुप्त होने के कगार पर पहुंचा दिया है। 

मेरा गांव नगला नीडर मुरादाबाद से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर है (फिलहाल ये संभल और मुरादाबाद के बीच सीमा सीमा विवाद में फंसा है)। लेकिन मुरादाबाद की हिंदी से इसका दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं। यहां तक कि हमारे गांव से सिर्फ डेढ़ किलोमीटर दूर खेमपुर गांव की बोली नगला नीडर से बिल्कुल अलग है। लेकिन जब से गांव में टीवी पहुंचा और गांव के कुछ लोग शहर आकर रहने लगे तब से लोगों में शहरी खड़ी बोली बोलने का शौक चर्रा गया। अगर आपने पान सिंह तोमर फिल्म देखी हो तो हमारे गांव की बोली कुछ-कुछ उसकी बोली से मिलती-जुलती है। लेकिन अब गांव के अधिकाश लोग साहित्यिक बोली बोलने की कोशिश करने लगे हैं। खासतौर से नई पीढ़ी। यहां तक कि गांव के कुछ घरों में चाचा-बुआ को अंकल-आंटी कहने का भी चलन चल पड़ा है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि गांव से शहर गए लोग जब कभी गांव आते हैं तो उनमें एक अजीब सी इतराहट होती है। ऐसा भी नहीं है कि वे शहर में बहुत बड़े तीर मार रहे हों। शहर के नाम पर वे बस गांव से 15 किलोमीटर दूर मुरादाबाद आकर बस गए हैं और बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। उनके इतराने के लिए यही काफी है। गांव आकर अपनी स्वाभाविक हिंदी बोलने के बजाय वो नफासत दिखाते हुए साहित्यिक हिंदी बोलकर दिखाते हैं।

संयुक्त राष्ट्र के मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स में काॅफी अन्नान ने तो इस बात का जिक्र नहीं किया कि विकसित दिखने के लिए आपको अपनी भाषा छोड़नी होगी, लेकिन भारतीय समाज में ये धारणा अंदर तक पैठ बनाए हुए है कि सभ्य होने का मतलब है कि आप नफासत के साथ साहित्यिक भाषा में बात करें और बीच-बीच में इंग्लिश के शब्दों का प्रयोग करें तो और ज्यादा बेहतर होगा। गांव की भाषा पर दूसरा कुठाराघात टीवी और अखबारों ने किया है। गांव-गांव टीवी और अखबार पहुंच जाने से नई पीढ़ी का रहन-सहन और बातचीज का स्टाइल अब यही तय कर रहे हैं। पर है ये अजीब बात कि शहर के लोग दूर के रिश्तों में गर्माहट दिखाने के लिए बच्चों को चाचा, बुआ, मौसी जैसे शब्द कहना सिखा रहे हैं, जबकि गांव में अंकल-आंटी का चलन बढ़ रहा है। और सिर्फ भाषा के स्तर पर ही नहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में तो कई स्तरों पर बदलाव देखने को मिल रहे हैं। मैं समझता हूं कि हरियाणा और पंजाब के गांव तो पहले ही इन चीजों की चपेट में आ गए होंगे।

हालांकि इन दिनों टीवी पर प्रसारित कई सीरियल्स में लोकल भाषा को जमकर भुनाया जा रहा है। गुजराती, हरियाणवी, राजस्थानी और बिहारी हिंदी पर टीवी सीरियल्स में जमकर प्रयोग हुए हैं और लोगों ने उनको पसंद भी किया है। वैसे ध्यान से देखा जाए तो सीरियल्स को सर्वग्राही बनाने के लिए लोकल भाषा को काफी तोड़ा-मरोड़ा तो गया है, लेकिन लोग फिर भी उन्हें देखना पसंद कर रहे हैं। एक सर्वे रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि अगले 100 सालों में विश्व की कई भाषाएं गायब हो जाएंगी। लेकिन साहित्यिक हिंदी इस खतरे से बाहर है। पर भारत में सबसे बड़ा खतरा गांवों की लोकल हिंदी पर जरूर मंडरा रहा है। तेजी से हो रहे विकास और शहरीकरण की दौड़ में इन रस भरी बोलियां को खत्म होने में मुश्किल से 20 साल भी नहीं लगेंगे। क्योंकि नई पीढ़ी अब टीवी देखकर बड़ी हो रही है। त्योहार मनाना अब घर के बुजुर्ग नहीं बल्कि न्यूज चैनल सिखाते हैं। कपड़ों का लेटेस्ट ट्रेंड क्या है ये भी टीवी ही तय कर रहा है। शहर में रहने वाले लोग और शहरी भाषा ज्यादा सभ्य मानी जाती है। तो कोई भला क्यों अपने को गंवारू कहलवाना पसंद करेगा।


शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

हैप्पी इंडिपेंडेंस डे बापू!


प्यारे बापू,


नमस्ते! हम आपको 66वें स्वतंत्रता दिवस की बधाई देने के लिए पत्र लिख रहे हैं. भारत की आजादी के 65 साल पूरे हो चुके हैं. इतने छोटे से अंतराल में ही व्यवस्था परिवर्तन की मांग उठने लगी है. आपने भारत की आजादी के साथ ही कई बड़े सपने देखे थे, उन सपनों की चुन-चुन कर हत्या कर दी गई है. आपके सिद्धांत और दर्शन किताबों में कैद होकर रह गये हैैं. बापू आज स्वतंत्रता दिवस के मौके पर हम बताना चाहते हैं कि आपके विचारों की अनदेखी करने से सपनों का हिंदुस्तान नहीं बन पाएगा. वो खुशहाली नहीं आएगी जो स्वतंत्रता संग्र्राम के दिनों में देखी गई थी...

स्वराज्य

स्वराज्य एक पवित्र शब्द है. यह एक वैदिक शब्द है, जिसका अर्थ आत्म-शासन और आत्म संयम है. अंग्रेजी शब्द 'इंडिपेंडेंसÓ अक्सर सब प्रकार की मर्यादाओं से मुक्त निरंकुश आजादी का या स्वच्छंदता का अर्थ देता है. वह अर्थ स्वराज्य शब्द में नहीं है.

-यंग इंडिया, 19-3-1931

बापू सच बताएं तो स्वराज्य की मूल भावना को हम सब भूल गए हैं और वास्तव में हमने स्वछंदता को ही अपना लिया है. देश के छोटे-छोटे नियम कानून मानने में हमें दिक्कत है. लेकिन ये आचरण भी हमने अपने सत्ताधीशों से ही सीखा है.



यूथ ऑफ इंडिया

मेरी आशा देश के युवकों पर है. उनमें से जो बुरी आदतों के शिकार हैं, वे स्वभाव से बुरे नहीं हैं. वे उनमें लाचारी से और बिना सोचे-समझे फंस जाते हैं. उन्हें समझना चाहिए कि इससे उनका और देश के युवकों का कितना नुकसान हुआ है. उन्हें यह भी समझना चाहिए कि कठोर अनुशासन द्वारा नियमित जीवन ही उन्हें और राष्ट्र को संपूर्ण विनाश से बचा सकता है, कोई दूसरी चीज नहीं.

-यंग इंडिया, 9-7-1925

बापू देश का भोला युवा तो परिस्थितियों का शिकार होकर रह गया है. तमाम तरह के दबावों के बीच अधिकांश युवा फ्रस्ट्रेशन की कगार पर हैं. सिगरेट पीना कहीं उनके लिए फैशन है तो कहीं स्ट्रेस से बचने का तरीका.



पंचायती राज

आजादी नीचे से शुरू होनी चाहिए. हर एक गांव में जमहूरी सल्तनत या पंचायत का राज होगा. उसके पास पूरी सत्ता और ताकत होगी. इसका मतलब यह है कि हर एक गांव को अपने पांव पर खड़ा होना होगा- अपनी जरूरतें खुद पूरी कर लेनी होंगी, ताकि वो अपना सारा कारोबार खुद चला सके.

-हरिजन सेवक, 28-7-1946

बापू पंचायती राज तो गांवों को मिल चुका है. लेकिन पंचायती राज के नाम पर गांवों में ऐसी राजनीति घुस गई है कि गांव का ताना-बाना बिखर कर रह गया है. बहुसंख्यक गांव आज पलायन की चपेट में हैं. रंजिशन हत्याएं और आपसी द्वेष चरम पर हैं.


शराब

मैं भारत का गरीब होना पसंद करूंगा, लेकिन मैं यह बरदाश्त नहीं कर सकता कि हमारे हजारों लोग शराबी हों. अगर भारत में शराबबंदी जारी करने के लिए लोगों को शिक्षा देना बंद करना पड़े तो कोई परवाह नहीं, मैं यह कीमत चुकाकर भी शराबखोरी को बंद करूंगा.

-यंग इंडिया, 15-9-1929


 बापू शराब तो आज देश की रगों में खून की जगह दौड़ रही है. सरकार खुलकर शराब की दुकानों के लाइसेंस बांट रही है. गली-गली और गांव-गांव शराब की दुकानें पहुंच चुकी हैं. सच पूछो तो देश में कुछ भी शुद्ध नहीं मिल रहा है, केवल एक शराब के सिवा.


बेरोजगारी

जब तक एक भी सशक्त आदमी ऐसा हो जिसे काम न मिलता हो या भोजन न मिलता हो, तब तक हमें आराम करने या भरपेट भोजन करने में शर्म महसूस होनी चाहिए.

-यंग इंडिया, 6-10-1921

बापू, तमाम तरक्की के बावजूद देश में भयंकर बेरोजगारी और शोषण है. शर्म तो बहुत दूर की बात है, सरकार में बैठे हमारे जनप्रतिनिधि तो भ्रष्टाचार की मलाई उड़ा रहे हैं.

मिलावटः समाज में घुल रहा एक धीमा जहर

खाद्य पदार्थों में मिलावट की समस्या सतही तौर पर भले बहुत गंभीर नहीं दिखती हो, लेकिन मिलावटखोरी का बाजार देश में गहराई तक फैला हुआ है। धन कमा...