Sunday, March 30, 2008

State of Women in Media : Priya Bhandari

प्रिया जी से कहा कि मीडिया की वर्तमान स्थिति पर कुछ नारी विमर्श दें। उन्होंने एक बढ़िया सा लेख प्रेषित किया। जो वास्तव में पढ़ने लायक है।


The man has been following the route to development since the stone age and that is the reason we are what we are today: The Homo sapiens sapiens॥Isnt’t it? Man developed agriculture, settled down, made societies, incurred wars, divided himself to boundaries and made sections which are called nation in our millennium but one point that none of us can deny is that women have played a vital role in all the developments। Today we count on our nation’s infrastructure, stock exchange and militia strength, and women are said to be going stronger still. As we all call them, women of 21st century.Coming back to development, with this whole blow of advancement was introduced a new phenomenon called Electronic media, which is progressing immensely. It has become of paramount importance to all of us and women are progressing or ‘so-called progressing’ here as well. Well we all praise Indira Nooyi, but the fact is that there are so many Indira Nooyis in the country who are still struggling hard to be at the place where they ought to be, for all the same dirty reasons, that they are still considered the secondary creatures in this man’s world, where Government has to come up with schemes like ‘Ladli’ to lure people to bring up girl child and not kill her at birth. This is not the only face of this devil truth, Like Ravana it has many faces. But the most interesting one is the stature of women in Electronic media and entertainment industry at large. My own experience has been an example of the shameful situation.The torment starts right at the training school, where right from the lowest technician to the most reputable educationist would confirm that ‘Women are an object to be put in front of camera, they can not have anything to do with the thinking and the creative side’. As you go in the field, you realize that its just the extension of the same repressing family of the academic institute, the ideologies and their effects becoming even more severe.. Everything happens with women in the field of entertainment, right from physical exploitation to the most disrespectful and unwanted suppression to her freedom of applying her brain. From my own experience I can tell that men at lower level than you still fight their ego with the fact that we, the women, are at a place higher than them and give them orders and to fight it, they argue that we are where are because men like them have chosen to put us there. Could you believe that?Besides facing the problems like not getting promotion and even the right jobs, women face this awkwardly real problem caused by some hardcore male chauvinists that their creatives and skills can be under-estimated by the man of lowest degree in her team. This is a side that can only be partially seen but what is most visible in the entertainment industry is the physical exploitation of women, to get a job that they can do better than any one else, they have to sell their bodies. Number of the most talented women never get to the places they deserve because they can’t sacrifice on moral values. Then come the women who have somehow reached the highest level, they don’t very often get the acclaim they deserve. No matter what they do for the organization, the board or some hypocrite men would always have an eye to make sure that she doesn’t get any credit, or to would be a disgrace to them and their manhood.
So at stages and ages, in Indian entertainment industry, the women has to sacrifice either her dreams, or her respect…She can only be allowed be a glam doll, and if she tries to make her way out, she is going to face the most unique problems…These are some facts that we turn are back on till it happens to us. Such a shameful society we are living in…Why, we can’t really answer.
For women, it has come with the package of development, with better infrastructures and better economy…!

Thursday, March 13, 2008


देश में बेरोजगारी की समस्या तो उस दिन से है जिस दिन से देश आजाद हुआ है। साठ सालों में भी हम ऐसा नहीं कह सकते कि हमारे देश में सबको रोज़गार है। बेरोजगारी का एक चेहरा अभी हाल ही में मेरठ में देखने को मिला। पॉवर कॉर्पोरेशन में फोर्थ क्लास कर्मियों के लिए रिज़र्व श्रेणी में कुछ नौकरियां निकाली थीं। बताया जाता है कि पॉवर कॉर्पोरेशन में १९७९ से भर्तियां नहीं हुई हैं। विभाग कर्मचारियों कि कमी से बुरी तरह जूझ रहा है। हारकर सरकार ने बैकलोग भरने के लिए फोर्थ ग्रेड कर्मचारियों के कुछ पदों पर भरती करने के लिए कुछ आवेदन मांगे।

पूरे सूबे में कुल ५२८ पद निकाले गए। पता है कितने लोगों ने आवेदन किया, पूरे ३४००० लोगों ने नौकरी के लिए आवेदन किए। यानी एक पद पर ६५ लोगों कि दावेदारी। श्रमिक पद के लिए हाईस्कूल तक पढे हुए लोग चाहिए थे। हैरत तो मुझे जब हुई जब मैं कैलाश प्रकाश स्टेडियम में भरती प्रक्रिया देखने गया। लड़कों को फिजिकल ले लिए खूब दौड़ाया जा रहा था। बमुश्किल ५००० वेतन कि नौकरी के लिए लोगों में बहुत बड़ी ललक थी। मेरठ में ७००० लोगों का फिजिकल टेस्ट लिया गया।

सबसे हैरत की बात यह थी की श्रमिक के पद पर हाईस्कूल पास लोगों को बुलाया गया था। लेकिन फिजिकल टेस्ट में पीजी किए हुए लोग भी आए थे। इकोनोमिक्स में मास्टर डिग्री कर रहे बिजनौर के यशपाल से जब मैंने पूछा की इतने पढे लिखे होने के बाद भी श्रमिक की नौकरी क्यों करना चाहते हो? तो उसने कहा की बेरोजगारी से परेशां हूँ। घर वाले चाहते हैं की कोई सरकारी नौकरी मिल जाए। इसलिए श्रमिक ही सही सरकारी नौकरी तो होगी। अब भला जब ऐसे लोग नौकरी में आएंगे तो उनको सिवाय कुंठा के क्या हाथ लगेगा। लेकिन उनको सरकारी नौकरी का ठप्पा चाहिए।

मज़ेदार बात यह है की पॉवर कॉर्पोरेशन में सबसे ऊँची कुर्सी यानी प्रबंध निदेशक के पद पर आईएएस को बैठाया जाता है। और आईएएस बनने के लिए केवल ग्रैजुएट होना जरुरी है। तो फिर देखा एम् डी ग्रैजुएट और चपरासी पीजी। कितना बढ़िया सिस्टम है अपने देश का।

Tuesday, March 11, 2008


समय कितनी जल्दी बीत जाता है पता है नही चलता। अभी कुछ दिन पहले कैंट स्टेशन पर ख़बर के सिलसिले में गया तो वहां शहतूत का पेड़ नज़र आया। उस पर छोटे छोटे शहतूत लगे थे। एकाएक गाँव के दिन याद आ गए। स्कूल में पढ़ाई के दौरान, गर्मियों की छुट्टियों में गाँव चले जाया करते थे। वहां मैं, छोटा भाई रोमी और रोहित तीनों लोग जमकर मस्ती करते। मिटटी के खिलौने बनाते और बाग़ में जाकर शहतूत, खजूर, बेर और आम जो भी फल पेडों पर होते उनको दोपहरी भर तोड़ते। दोपहरी में घर से बाहर घूमने पर अम्मा की डांट भी पड़ती। लेकिन कोई फर्क नही पड़ता। एक समय वो था, जब समय ही समय था। गर्मियों की छुट्टियाँ ऐसी कटतीं थीं किउनका साल भर इंतजार रहता था। लेकिन अब स्थिति यह है कि कब होली आती है और कब दीवाली पता है नहीं चलता। छुट्टी जैसी कोई चीज़ कम से कम पत्रकार की जिंदगी में तो नहीं होती। सामाजिक जिम्मेदारियां या फिर औपचारिकतायें निभाने तक का वक्त नही रहा। नई नई तकनीकी ने जिंदगी को मशीन जैसा बना दिया है। जब मैंने ब्लॉग बनाया, तो मुकेश सर की इस पर नज़र पड़ गई। फट से उनके मुह से एक ही बात निकली किइस तरह की चीजों से लोगों में बची-कुछी सामाजिकता भी ख़त्म हो जायेगी। कहीं न कहीं वो सही कह रहे थे।
लेकिन कैंट स्टेशन पर लगे शहतूत के पेड़ ने वो दिन याद जरूर दिला दिए। मन हुआ किशहतूत तोड़ लूँ। फिर लगा कि अब बड़े हो गए हैं, यह सोचकर नहीं तोड़े और चल दिए ख़बर की तलाश में।

Friday, March 7, 2008

एक थी रश्मि

आओ आपको एक कहानी सुनाता हूँ। इस समाज की एक सच्ची कहानी। तो ऐसे शुरू करते हैं। एक थी रश्मि। भोली सी एक लड़की थी। मेरठ के मलियाना गाँव की ब्लाक प्रमुख की नातिन थी वो। उसका मामा शहर का कुख्यात और शातिर डॉन था। अक्सर जेल में ही रहता था। रश्मि अपने माँ बाप के साथ ननिहाल में ही रहती थी। रश्मि के मामा उधम ने जेल जाने से पहले घर की देखभाल करने को परमिंदर को रख दिया था।

रश्मि देखने में सुंदर थी, युवावस्था में कदम रखे है थे। सो उसको परमिंदर से प्यार हो गया। घर वालों को कुछ ख़बर न लगी और दोनों ने घर से भागकर शादी कर ली। अब क्या था। लोक लाज की बात खड़ी हो गई। बड़ा हंगामा खड़ा हुआ। एक तो भागकर शादी का मामला, वो भी किसी डॉन के परिवार से। मीडिया ने मामला उछाल दिया। रश्मि की नानी ब्लाक प्रमुख है। पूरे दल बल के साथ कचेहरी में मोर्चा बाँध लिया। लेकिन पुलिस प्यार करने वालों को सहयोग कर रही थी। नानी भी कम दबंग न थी। पुलिस पर अकेले भारी पड़ रही थी। लेकिन उसकी भी की एक न चली। हारकर बेहोश हो गई। रश्मि के घर में तो हाहाकार मच गया।

रश्मि को कोर्ट ने कुछ समय के लिए नारी निकेतन भेज दिया। रश्मि के घर वालों ने उसको पुचकारा, घर की इज्ज़त का हवाला दिया। उसके आगे खूब रोये। रश्मि का दिल पिघल गया। उसने घर वालों का ख्याल करके परमिंदर को छोड़ कर घर जाने का फ़ैसला लिया। वो घर चली गई। उसकी नानी ने मीडिया को बुलाकर कैमरे के सामने रश्मि को खूब पुचकारा। प्यार किया। कहा मेरी बेटी घर आ गई। मैं बहुत खुश हूँ। बात ख़त्म हो गई। यह बात अक्टूबर २००७ के पहले हफ्ते की है। समय गुजर गया और फरवरी आ गई। लेकिन पता चला की रश्मि तो लंबे समय से घर से गायब है। अक्टूबर में ही वो घर से गायब हो गई थी.

लाश मिली
अक्टूबर में ही मेरठ मुजफ्फरनगर के बॉर्डर पर गंग नहर में एक लाश पुलिस को मिली थी। लाश लड़की की थी। जब कोई दावेदार नहीं आया तो लावारिस में उसका अन्तिम संस्कार कर दिया गया। इधर परमिंदर बार बार कह रहा था की रश्मि को मार दिया गया है। उधर रश्मि का भाई बदौत जिले में किसी और मामले में पकड़ा गया। पुलिस ने उससे रश्मि के बारे में दबाब बनाया तो उसने कबूल किया की उसने रश्मि को मार दिया है। थाने में रखे कपडों से परमिंदर ने पहचान भी कर ली। तो प्यार की सजा रश्मि को यह मिली की उसको उसके है घर वालों ने ही मौत दे दी। बाकी अभी मामला कोर्ट में है। लंबा चलेगा। पता नहीं रश्मि को न्याय मिलेगा भी के नहीं। उसकी कोई पैरोकारी करने वाला भी तो कोई नहीं है।

लेकिन इस सभ्य समाज का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा है जो इस बात को सही मानता है की रश्मि के साथ ठीक हुआ। मेरठ मुजफ्फरनगर के अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में प्यार करने वालों को उनके है घर वाले मौत के घाट उतर देते हैं। ताकि आने वाली पीढ़ी इससे सबक ले और ऐसी गलती न करे। दिल्ली में बैठकर लोग बड़ी बड़ी बातें करते हैं। सेमिनार करते हैं। समाज की चिंता करते हैं। अब बताओ रश्मि की कहानी में समाज कितनी बढ़िया दिशा में जाता दिख रहा है।

Thursday, March 6, 2008

Rahul's Photography at St. Jhon's Cemetery, Meerut Cantt.

हमको शमशान ने बताया है जिंदगी मौत की सहेली है

मौत कितनी शांत होती है। बेहद शांत और गंभीर। मेरठ में सैंट जोन्स सिमेंट्री के बारे में काफी सुना था। इस सिमेंट्री में १८५७ के ग़दर में मारे गए ९ अंग्रेज सिपाहियों की भी कब्र हैं। मेरठ अंग्रेजी शासन का केन्द्र रहा था। आज़ादी की पहली लड़ाई के वक्त मेरठ का बड़ा योगदान रहा। मेरठ कैंट में स्थित इस सिमेंट्री में सबसे पुरानी कब्र १८१० में बनी है।

राहुल पाण्डेय के साथ एक दिन रिपोर्टिंग के लिए निकला तो मन हुआ की चलो सिमेंट्री देख ली जाए। राहुल भी बड़ा करामाती रिपोर्टर है। साथ में कैमरा भी रखता है। बस दिनों से भूतों के बारे में हम दोनों है खोज कर रहे हैं। लेकिन कोई भूत हाथ नही आया। उसी की तलाश में सिमेंट्री पहुच गए। दरवाजा बंद था। खटखटाया तो अन्दर से एक व्यक्ति प्रकट हुआ। हमने कहा कि भाई सिमेंट्री देखनी है। बोला बंद है नही देख सकते। हमने कहा भाई अख़बार से हैं। पत्रकार हैं। सुनकर वो दबाब में आया और गेट खोल दिया। मैंने मोटर साइकिल अन्दर लगा ली। अन्दर का माहौल देखकर राहुल पाण्डेय तो चहक है पड़ा। वास्तव में एक अजीब सी शान्ति थी और अजीब सी सुन्दरता। सैकड़ों अंग्रेज चैन कि नींद सो रहे थे। कोई अकेला कोई परिवार के साथ।

काफी देर तक राहुल ने फोटोग्राफी की। तरह तरह के फोटो खीचे। मैंने कहा कि ज्यादा कब्रों पर मत कूदो। कोई भूत चिपक जाएगा। पर माना नहीं। कूद कूद कर फोटो खीचता रहा। लेकिन कब्रिस्तान में डर जैसी कोई चीज़ नहीं थी। उससे ज्यादा डरावना जिंदा शहर लगता है। जो पैसे कि भूख में कहीं खोता जा रहा है। खैर कब्रिस्तान में जाकर अजब शान्ति मिली। शायद भगवन शंकर इसीलिए शमशान में रहते हैं। चलते हुए कब्रिस्तान के केयर टेकर रोबिन सिंह से बात की। भइया तुमको डर नही लगता। कोई भूत तो नहीं आता रात को। बोला जिंदा आदमी से ज्यादा बड़ा भूत कोई नहीं। फिर राहुल ने अपनी बुद्धि लगाई। बोला अरे भाई जब भगवानहै तो भूत भी तो होगा। रोबिन बोला न भगवान है और न भूत। मैंने न भगवान को देखा है और न भूत को। बहरहाल आधा घंटे तक मुर्दों के बीच रहकर हम फिर शहर कि भीड़ मैंलौट आए थे।

Tuesday, March 4, 2008

हाय हाय बिजली

ये जो देश का सिस्टम है न। बड़ा अजीब है। यहाँ जितने भी कायदे कानून हैं वो आम आदमी के लिए हैं। खास लोगों को कानूनों से ज्यादा सरोकार नहीं हैं। अभी पिछले दिनों मेरठ में बिजली की काफी किल्लत रही (वैसे आज भी है)। फिर क्या था पॉवर कॉर्पोरेशन पर तोहमत लगे जाने लगी। पॉवर कॉर्पोरेशन के एक उच्च अधिकारी ने अखबार में बयान दे दिया कि शहर में कोई हीटर नहीं जलाएगा। न ही दुकानों पर बेचा जाएगा। बात अजीब सी थी। सर्दियों के दिन थे। हीटर लोगों की जरूरत बन गए थे। मैंने मालूमात की, तो अधिकारी जी ने कहा किरूम हीतेर्स पर प्रतिबन्ध नहीं है, प्लेट वाले हीटर पर रोक लगे है।
मैं उनके ऑफिस से निकल ही रहा था कि ऑफिस के बाहर वाले रूम में ही पॉवर कॉर्पोरेशन के कर्मचारी हीटर पर चाय बना रहे थे। बड़ा अजीब लगा। जिस चीज़ के लिए आम लोगों पर रोक लगी है, ख़ुद पॉवर कॉर्पोरेशन के लोग उसे इस्तेमाल कर रहे हैं। थोडी और तफ्तीश करी तो पता चला कि पॉवर कॉर्पोरेशन के ज्यादातर कार्यालयों में हीटर इस्तेमाल हो रहे हैं। बहाई ये चीज़ तो बर्दाश्त से बाहर थी। मैंने सुनील जी को साथ लिया और पॉवर कॉर्पोरेशन के दो बड़े अधिकारियों के जलते हीटरों के फोटो कर लिए। फिर पंहुचा उन अधिकारी जी के पास जिन्होंने आदेश दिए थे। वो अब भी अपने बयान पर अडिग थे। फिर मैंने उनको, उनके ही ऑफिस में जल रहे हीटर के बारे में बताया। अब वो थोड़े सकपका गए। फिर बोले हाँ नैतिकता कि दृष्टि से देखा जाए तो ये ग़लत है। उन्होंने तुरंत अपना हीटर बंद कराया और अपनी गाड़ी में रखवा लिया। साथ हे आदेश जारी किए कि कॉर्पोरेशन के किसी भी ऑफिस में हीटर न जलाये जायें। बाद में मुझे पता चला कि इसमे गलती उनकी नहीं थी। उनके मातहत बिना पूछे हीटर जला रहे थे। खैर बड़ी बात ये थे उन्होंने बात को मान लिया और चीजों को समझा।
ख़बर तो मुझे लिखनी थी। मैंने लिख दी । लेकिन भाषा का बहुत संयम बरता। क्योकि अधिकारी जी ने बात मानी। लेकिन उनसे छोटे अधिकारी ख़बर से कुछ ज्यादा ही भड़क गए। जब मैं मिलने गया तो बोले हम आपको अब कोई ख़बर नही बताएँगे। ये कोई तरीका नहीं होता। मैं सब पत्रकारों को जनता हूँ। सबके बहुत काम कराये हैं। और चाय कोई मैं थोडी पीता हूँ। यहाँ आने वाले लोगों को चाय देनी पड़ती है। वैसे मैंने भी अपने यहाँ हीटर बंद करवा दिया है।
खैर उनकी नाराज़गी से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैंने अपना काम कर दिया था.

Saturday, March 1, 2008

फॉर्म 10 : एक हवलदार की कहानी

भारतीय सेना का वैसे तो पूरे विश्व में अपना रुतबा है। लेकिन आर्मी में डिसिप्लिन बनाये रखने के लिए ऐसा भी होता है, ये मुझे मेरठ में आर्मी की रिपोर्टिंग में ही पता चला। एक दिन ऑफिस में शाम के वक्त अचानक एक सज्जन हाथ में कागज लेकर प्रकट हुए। साथ में हमारे एक सहयोगी पत्रकार की सिफारिश लाये थे। मामला पूछा तो आर्मी का निकला। सो उन्हें मेरी ओर सरका दिया गया। वो मेरे सामने बैठकर अपनी समस्या सुनाने लगे।
वो आर्मी में काम करने वाले एक हवलदार के रिश्तेदार थे। उनका कहना था कि उनके जीजाजी, जो मेरठ कैंट में तैनात हैं, को उनके अधिकारियों द्वारा यातनाएं दी जा रही हैं। वो धीरे धीरे बात बढाते गए। मैं समझने की कोशिश करता गया। और सारी बात कुछ इस तरह निकल कर आई।
फॉर्म १०
उनके दुःख का कारण था आर्मी का फॉर्म १०। असल में फॉर्म १० सेना के जवान की मानसिक स्थिति बिगड़ जाने पर भरवाया जाता है। इसके बाद जवान को मनो विभाग में भर्ती करा दिया जाता है। वहां कुछ महीने के उपचार के बाद उसको वापस सेना में तैनात कर देते हैं। लेकिन उससे बंदूक वाला काम नहीं लेते। उसे सेना के दूसरे काम में लगाया जाता है। यह है फॉर्म १० की वास्तविकता।
लेकिन आर्मी के कुछ जवानों का आरोप है कि जवानों को ज़ंग से भी इतना डर नही लगता जितना फॉर्म १० से लगता है। हवलदार के रिश्तेदार ने आरोप लगाया कि जब भी कोई जवान अनुशासन हीनता करता है उसको फॉर्म १० थमा दिया जाता है। यानि मानसिक रूप से बीमार दिखा दिया जाता है। इन साहब के रिश्तेदार की बस इतनी सी गलती थी की वो अपने मेरठ तबादले के बाद बिना इजाज़त के परिवार को ले आए थे. यह बात उनके आला अधिकारियों को नागवार गुजरी और उन्होंने जबरदस्ती हवलदार का फॉर्म १० भरवा दिया. इसके बाद यह हवलदार अक्तूबर २००७ से सेना के अस्पताल में भर्ती हैं। मुझसे मिलने आए साहब अपने साथ पूरे सबूत लाये थे। उन्होंने बताया की हवालदार की रिपोर्ट्स को जब एम्स अस्पताल में दिखाया गया तो डॉक्टर ने किसी भी मानसिक बीमारी से इंकार किया। हवालदार की उम्र केवल २९ साल है। उसकी बीवी बेहद परेशान है। उसने लोकल अधिकारियों से लेकर महिला आयोग और प्रेसिडेंट तक से गुहार कर ली। लेकिन कोई सेना के मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता। कहीं से कोई मदद नहीं।

मैंने क्या किया

फिर क्या था मुझे तो किसी की मदद करने का मौका मिल रहा था। मैंने अगले ही दिन सेना के अस्पताल में दस्तक दे दी। वहां बाहर गार्ड से पूछा तो उसने बताया की मानसिक विभाग अस्पताल से बिल्कुल अलग बनाया गया है। मैं वहां गया। वहां तैनात डॉक्टर से हवालदार से मिलने की इजाज़त चाही। डॉक्टर का कहना था की बाहर वालों को , खासतौर से मीडिया को तो मरीजों से नही मिलने दिया जाता। फिर मैंने उनसे मालूमात की तो उन्होंने कहा की हमें मीडिया को बयां देने का अधिकार नहीं है। लेकिन वो यह सलाह देना नहीं भूले की मुझे सेना के मामले में न पड़कर एक जिम्मेदार पत्रकार का फ़र्ज़ अदा करना चाहिए। इसके बाद उन्होंने बयां लेने के लिए अपने से ऊपर बैठे अधिकारी का पता बता दिया। उनका ऑफिस मानसिक विभाग के सामने ही था। मैं उनके पास पहुँच गया। लेकिन मेरे वहां पहुँचने से पहले ही उनके पास मेरे बारे में जानकारी पहुच चुकी थी। उन्होंने बड़ी इज्ज़त से मेरा इस्तकबाल किया। जो अमूमन आमतौर पर देखने को नही मिलता। खैर उन्होंने केवल इतना कहा की सेना और सिविल में काम करने के तौर तरीके अलग होते हैं। लेकिन किसी के साथ अन्याय नहीं किया जा रहा है।

सेना का मामला होने की वजह से मैंने एक दो दिन ख़बर को रोक लिया। लेकिन हवालदार के परिज़नों का फ़ोन आया की हवालदार को मेरठ के अस्पताल से से पुणे ट्रान्सफर करने की तैयारी चल रही है। फिर क्या था मैंने तत्काल स्टोरी ड्राफ्ट करके तैयार कर दी। मामले में सैन्य प्रवक्ता का बयां लिया। एक बार को वो भी सकपका गए। लेकिन स्टोरी मेरे अखबार के अलावा एक और अख़बार में प्रमुखता से छपी। मीडिया की सक्रियता देखते हुए उस हवालदार को पुणे भेज दिया गया। हारकर भी हमारी खबर हवालदार की ज्यादा मदद नहीं कर पायी। दूसरा हवलदार की पैरोकारी करने वाले भी कुछ ढीले पड़ गए।

लेकिन फॉर्म १० के बारे में जानकर काफ़ी धक्का लगा। बताया जाता है की ऐसे कई जवान हैं जो फॉर्म १० की मार झेल रहे हैं।