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मंगलवार, 2 जुलाई 2024

निर्माण कार्यों की गुणवत्ता जांचने आया मानसून और कर्नल बड़ोग का स्वाभिमान


इस वर्ष मानसून की शुरुआत के साथ ही देश के विभिन्न हिस्सों में पुलों, हवाई अड्डों और राजमार्गों के धंसने की खबरें सुर्खियां बटोरने लगी हैं। हाल ही में देश ने जब स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मनाया है, तब निर्माण कार्यों की संदेहास्पद गुणवत्ता आधुनिक डिग्री धारक इंजीनियर्स और निर्माण कार्य से जुड़े संस्थानों के लिए निश्चित रूप से गहन चिंता का विषय है। 

जिस ब्रिटिश शासन से हमने स्वतंत्रता प्राप्त की, उसके माथे पर भले ही अनेक संगीन आरोप हों, लेकिन उनके निर्माण कार्य आज भी अपनी गुणवत्ता की तस्दीक कर रहे हैं। नई दिल्ली का निर्माण हो या भारतीय रेल व्यवस्था की आधारशिला, यह सब कार्य अंग्रेजों ने भले ही अपने स्वार्थ के लिए किये, लेकिन उनके कार्य पर आज भी कोई संदेह नहीं करता। एक ही बारिश में धराशायी हो जाने वाले कागजी निर्माण करने वाले आधुनिक समय के काबिल इंजीनियर्स के लिए पुराने निर्माण कार्य निश्चित रूप से एक नज़ीर हैं। 

जब भी अखबारों में खराब निर्माण कार्य से जुड़ी खबरें प्रकाशित होती हैं, तब सहसा कर्नल बड़ोग (बरोग) का नाम सहसा ध्यान में आता है। वे ऐसा ही एक उदाहरण हैं, जिससे अपने काम के प्रति समर्पण, ईमानदारी और जिम्मेदारी का भाव सीखा जा सकता है। 

जब 20वीं सदी में जब कालका- शिमला रेलवे लाइन बिछाने का कार्य चल रहा था, तब पहाड़ी काटकर बड़ोग सुरंग (क्रमांक 33) बनाने का कार्य ब्रिटिश इंजीनियर कर्नल बड़ोग के पास था। उस जमाने में कालका- शिमला के बीच पहाड़ों को काटकर 100 से अधिक सुरंगें बनाना अपने आप में एक विलक्षण कार्य था। बरोग सुरंग कर्नल बड़ोग के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन गई। सुरंग बनाने के लिए कर्नल बड़ोग ने सबसे पहले पहाड़ का निरीक्षण किया। सुरंग बनाने के लिए दोनों छोर पर निशान लगाने के बाद मजदूरों को खोदने का ऑर्डर दिए। मजदूर दोनों छोर से एकसाथ खुदाई करने लगे। कर्नल बड़ोग इस बात से आश्वस्त थे कि खुदाई के दौरान दोनों सुरंगें बीच में आकर मिल जाएंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अंग्रेजी हुकूमत को यह पैसे की बर्बादी लगी और उन्होंने कर्नल बड़ोग पर एक रुपया जुर्माना लगा दिया। बड़ोग इस कार्रवाई से बहुत आहत हुए और उनके आत्मसम्मान को गहरी ठेस लगी। एक दिन वह अपने कुत्ते को लेकर सुबह टहलने निकले व सुरंग के नजदीक ही खुद को गोली मार ली। बड़ोग को वर्तमान सुरंग के पास ही दफनाया गया है। आत्महत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं, लेकिन यह कहानी उस इंजीनियर के स्वाभिमान की है। बाद में एक स्थानीय निवासी बाबा भलकू ने उस सुरंग को पूरा करने में मदद की थी, जिनके दिशा-निर्देशन में एक नई सुरंग बनाई गई। ब्रिटिश सरकार ने नई सुरंग का नाम इंजीनियर कर्नल बड़ोग के नाम पर ही रखा। यह इस मार्ग पर सबसे लंबी सुरंग है।

अपने कार्य के प्रति निष्ठा और समर्पण का कर्नल बड़ोग जैसा भाव ही ऐतिहासिक और पीढ़ियों तक चलने वाले निर्माण की नींव रखते हैं। वर्तमान भारत में निर्माण कार्यों से जुड़ी एजेंसियों और  अधिकारियों को यह कहानी नियमित पढ़ानी चाहिए, शायद कभी उनके अंदर अंतःप्रेरणा जागृत हो, ताकि एक मजबूत देश का निर्माण बन सके। हर विफलता का आरोप राजनीति पर लगा देना सबसे आसान मार्ग है। किसी भी तरह की राजनीति आपको तब तक मजबूर नहीं कर सकती, जब तक कमजोरी आपके स्वयं के अंदर न हो। कहीं न कहीं आपने भी बहती नदी में हाथ धोए होंगे, तब जाकर ये पुल धराशायी हुए होंगे।


रविवार, 26 अगस्त 2012

कितनी हिंदी!


कोस-कोस पर पानी बदले पांच कोस पर वाणी- ये कहावत है तो पुरानी पर भारत पर पूरी तरह लागू होती है। हिंदी कितने प्रकार की हो सकती है इसका अंदाजा आपको भारत के गांवों में जाकर लगेगा। हर गांव की अपनी अलग लोकल हिंदी है, जिसे शहरी लोग गंवारू भाषा कहकर पुकारते हैं। लेकिन इस गंवारू भाषा की अपनी अलग संुदरता है। गांव की इन भाषाओं की लगातार उपेक्षा ने इन्हें विलुप्त होने के कगार पर पहुंचा दिया है। 

मेरा गांव नगला नीडर मुरादाबाद से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर है (फिलहाल ये संभल और मुरादाबाद के बीच सीमा सीमा विवाद में फंसा है)। लेकिन मुरादाबाद की हिंदी से इसका दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं। यहां तक कि हमारे गांव से सिर्फ डेढ़ किलोमीटर दूर खेमपुर गांव की बोली नगला नीडर से बिल्कुल अलग है। लेकिन जब से गांव में टीवी पहुंचा और गांव के कुछ लोग शहर आकर रहने लगे तब से लोगों में शहरी खड़ी बोली बोलने का शौक चर्रा गया। अगर आपने पान सिंह तोमर फिल्म देखी हो तो हमारे गांव की बोली कुछ-कुछ उसकी बोली से मिलती-जुलती है। लेकिन अब गांव के अधिकाश लोग साहित्यिक बोली बोलने की कोशिश करने लगे हैं। खासतौर से नई पीढ़ी। यहां तक कि गांव के कुछ घरों में चाचा-बुआ को अंकल-आंटी कहने का भी चलन चल पड़ा है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि गांव से शहर गए लोग जब कभी गांव आते हैं तो उनमें एक अजीब सी इतराहट होती है। ऐसा भी नहीं है कि वे शहर में बहुत बड़े तीर मार रहे हों। शहर के नाम पर वे बस गांव से 15 किलोमीटर दूर मुरादाबाद आकर बस गए हैं और बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। उनके इतराने के लिए यही काफी है। गांव आकर अपनी स्वाभाविक हिंदी बोलने के बजाय वो नफासत दिखाते हुए साहित्यिक हिंदी बोलकर दिखाते हैं।

संयुक्त राष्ट्र के मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स में काॅफी अन्नान ने तो इस बात का जिक्र नहीं किया कि विकसित दिखने के लिए आपको अपनी भाषा छोड़नी होगी, लेकिन भारतीय समाज में ये धारणा अंदर तक पैठ बनाए हुए है कि सभ्य होने का मतलब है कि आप नफासत के साथ साहित्यिक भाषा में बात करें और बीच-बीच में इंग्लिश के शब्दों का प्रयोग करें तो और ज्यादा बेहतर होगा। गांव की भाषा पर दूसरा कुठाराघात टीवी और अखबारों ने किया है। गांव-गांव टीवी और अखबार पहुंच जाने से नई पीढ़ी का रहन-सहन और बातचीज का स्टाइल अब यही तय कर रहे हैं। पर है ये अजीब बात कि शहर के लोग दूर के रिश्तों में गर्माहट दिखाने के लिए बच्चों को चाचा, बुआ, मौसी जैसे शब्द कहना सिखा रहे हैं, जबकि गांव में अंकल-आंटी का चलन बढ़ रहा है। और सिर्फ भाषा के स्तर पर ही नहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में तो कई स्तरों पर बदलाव देखने को मिल रहे हैं। मैं समझता हूं कि हरियाणा और पंजाब के गांव तो पहले ही इन चीजों की चपेट में आ गए होंगे।

हालांकि इन दिनों टीवी पर प्रसारित कई सीरियल्स में लोकल भाषा को जमकर भुनाया जा रहा है। गुजराती, हरियाणवी, राजस्थानी और बिहारी हिंदी पर टीवी सीरियल्स में जमकर प्रयोग हुए हैं और लोगों ने उनको पसंद भी किया है। वैसे ध्यान से देखा जाए तो सीरियल्स को सर्वग्राही बनाने के लिए लोकल भाषा को काफी तोड़ा-मरोड़ा तो गया है, लेकिन लोग फिर भी उन्हें देखना पसंद कर रहे हैं। एक सर्वे रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि अगले 100 सालों में विश्व की कई भाषाएं गायब हो जाएंगी। लेकिन साहित्यिक हिंदी इस खतरे से बाहर है। पर भारत में सबसे बड़ा खतरा गांवों की लोकल हिंदी पर जरूर मंडरा रहा है। तेजी से हो रहे विकास और शहरीकरण की दौड़ में इन रस भरी बोलियां को खत्म होने में मुश्किल से 20 साल भी नहीं लगेंगे। क्योंकि नई पीढ़ी अब टीवी देखकर बड़ी हो रही है। त्योहार मनाना अब घर के बुजुर्ग नहीं बल्कि न्यूज चैनल सिखाते हैं। कपड़ों का लेटेस्ट ट्रेंड क्या है ये भी टीवी ही तय कर रहा है। शहर में रहने वाले लोग और शहरी भाषा ज्यादा सभ्य मानी जाती है। तो कोई भला क्यों अपने को गंवारू कहलवाना पसंद करेगा।


शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

पैसा बटोरने वाले कॉलेजों से बेहतर तो तिहाड़ जेल निकली!

एक शो रूम में तिहाड़ के उत्पाद.  
अब इसे समय की विडंबना कहें या फिर बदलते समीकरण कि संभ्रांत कॉलेजों में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स चेन स्नेचिंग और वाहन चोरी जैसी घटनाओं में पकड़े जा रहे हैं और तिहाड़ जेल में सजायाफ्ता कैदी पढ़-लिख कर प्लेसमेंट प्राप्त कर रहे हैं। खबर है कि तिहाड़ जेल के 100 कैदियों को विभिन्न कंपनियों ने अच्छे पैकेज पर लिया है। जो सबसे मोटा पैकेज दिया गया है वो है छह लाख प्रति वर्ष। कैंपस प्लेसमेंट में ऐसे कैदियों ने भाग लिया जो जेल में रहकर विभिन्न प्रोफेशनल कोर्स कर रहे थे और जिनकी सजा आने वाले एक साल में पूरी होने वाली है। तिहाड़ जेल इससे पहले भी अपनी विशेषताओं के चलते चर्चा में रही है। कैदियों पर जितने प्रयोग इस जेल में किए गए, वे देश की किसी भी जेल में नहीं हुए। कितने ही मामले ऐसे हैं जिनमें अपराधियों के लिए तिहाड़ जेल एक वरदान साबित हुई।

तिहाड़ की नमकीन.
तिहाड़ जेल का ट्रेड मार्क है टीजे.
यहां पर सवाल फिर वही उठता है कि सवा सौ करोड़ के देश में केवल एक जेल ऐसी है जिसमें कैदियों को सुधारने की दिशा में कदम उठाए जाते हैं। एक मानवाधिकार संगठन के वर्ष दो हजार के आंकड़ों को देखा जाए तो देश की सभी जेलों में कुल 211720 कैदी रखे जा सकते हैं, लेकिन उनमें 248115 कैदी कैद हैं। भारतीय जेलों की रिहायशी दर 117.19 प्रतिशत तक पहुंच गई हैं। तिहाड़ जेल भी इस समस्या से अछूती नहीं रही है। लेकिन फिर भी तिहाड़ जेल में कैदियों के लिए विशेष कार्यक्रम चलाए जाते रहे हैं। लेकिन अगर जिला स्तर पर जाकर देखें तो जेल वास्तव में नर्क का द्वार हैं। कैदियों के लिए विशेष कार्यक्रम तो दूर की बात है, वहां बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं। वातावरण ऐसा है कि अगर यहां की जेलों में कोई छोटा अपराधी जाता है तो वहां से और बड़ा अपराधी बनकर निकलता है। मतलब अगर अन्ना हजारे की भाषा में कहें तो क्राईम का ग्रजुएट जाता है और डाॅक्टरेट करके निकलता है। जेलों का महाभ्रष्ट तंत्र कुछ इस प्रकार का है कि पैसे के दम पर वहां कानून की धज्जियां सरेआम उड़ाई जाती हैं।

उदाहरण के लिए मेरठ के जिला कारागार में कई बार जब छापे मारे गए तो वहां कैदियों के पास से मोबाइल मिले, पैने हथियार बरामद किए गए और न जाने क्या क्या! हर बार छापा पड़ता है और हर बार ऐसा होता है। कैदियों तक ये सामान पहुंचाते हैं उनसे मिलने आने वाले उनके परिजन, लेकिन उनको रखने की इजाजत आखिर कौन देता है। जेल प्रशासन देखकर भी चीजों को अनदेखा कर देता है। जेल के अंदर कैदियों की जरूरत का सामान बेचने के लिए दुकान भी होती है। लेकिन चीजों के दाम बाजार से पांच गुना लिए जाते हैं। खुद जेल में मौजूद जेल स्टाफ चंद पैसों के लिए कैदियों की उंगलियों पर खेलते हैं। ये तो बेहद छोटी किस्म की चीजों का उल्लेख किया। बड़ी-बड़ी कारस्तानियों को अंजाम दिया जा रहा है। इस सब की जानकारी जेल के जेलर समेत पूरे मेरठ प्रशासन को भी है। लेकिन फिर भी चीजें चल रही हैं। सिर्फ औपचारिकता के लिए कभी-कभी छापे मार दिए जाते हैं। उसके बाद स्थिति जस की तस। और ऐसा केवल मेरठ में नहीं है, देश की समस्त जेलों में अमूमन यही हाल है, कहीं थोड़ा कम तो कहीं थोड़ा ज्यादा।

जिला प्रशासन के पास इतना वक्त ही नहीं कि कैदियों के बारे में थोड़ा रचनात्मक ढंग से सोचकर जेल का एक सुधारगृह के रूप में तब्दील करे। यहां तक कि जो बाल सुधार गृह या बच्चा जेल हैं उनमें भी बच्चों को सुधारने की दिशा में कुछ रचनात्मक नहीं किया जा रहा। कुछ सामाजिक संगठन समय-समय पर जरूर वहां अपनी गतिविधियां आयोजित करते रहते हैं। ऐसा भी नहीं कि जिला प्रशासन के पास सोच नहीं है। लेकिन जेलों को अगर सुधार गृह बनाने की कोशिश की गई तो वहां से आने वाली कमाई पर ब्रेक लग जाएंगे। शायद ही कोई जेलर ऐसा चाहे। तिहाड़ की तरह भारतीय जेलों में तमाम प्रयोग किए जा सकते हैं। सवाल ही नहीं कि इंसान के अंदर सुधार न आए। कुछ अपराध न चाहते हुए भी परिस्थितिवश करने पड़ते हैं। लेकिन अगर जेल में भी नारकीय परिस्थिति मिले तो इंसान की मानसिक हालत और जड़ हो जाती है। तिहाड़ को माॅडल मानकर भारतीय जेलों में जेल इंडस्ट्री भी बनाई जा सकती है। कैदियों की अभिरुचि के मुताबिक उनको प्रशिक्षित किया जा सकता है या उनसे कोई भी रचनात्मक काम कराया जा सकता है। वरना जेलों में अपराधी जाते रहेंगे और वहां से घोर अपराधी बनकर बाहर आते रहेंगे।

रविवार, 10 अप्रैल 2011

संस्कृत भाषा को बचाने के लिए पिछले चार दिन से अनशन पर बैठी एक संस्कृत टीचर


भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे का अनशन रंग लाया और सरकार झुक गई। एक व्यवस्थित ढंग से चलाए गए अभियान के सामने सरकार को घुटने टेकने पड़े। लेकिन हर आंदोलन सफलता के अंजाम तक नहीं पहुंचा करता। कई बार व्यवस्था इतनी ढीठ होती है कि अनशन पर बैठे व्यक्ति के प्राण हर कर ही बाज आती है। दिल्ली में रोहिणी के सेक्टर 15 स्थित सेंट एंजेल्स स्कूल के बाहर भी एक ऐसा ही अनशन चल रहा है। गत 7 अप्रैल से स्कूल की संस्कृत शिक्षिका श्रीमति आशा रानी पाठ्यक्रम से संस्कृत हटाने के विरोध में अनशन पर बैठी हैं। दरअसल स्कूल ने कक्षा पांच से कक्षा नौ तक संस्कृत का सूपड़ा साफ करके जर्मन और फ्रेंच भाषा को लगाने का फैसला किया है। इस फैसले से न केवल संस्कृत टीचर नाराज हैं बल्कि स्कूल के स्टूडेंट्स और पैरेंट्स भी परेशान हैं। आशा रानी की मांग है कि कम से कम बच्चों को विषय चुनने का मौका तो दिया जाना चाहिए। लेकिन स्कूल प्रबंधन एक सुनने को तैयार नहीं है। पिछले चार दिन से आशा रानी आमरण अनशन पर बैठी हैं।

जड़ में भ्रष्टाचार

दरअसल स्कूल की इस मनमानी की जड़ में भी भ्रष्टाचार ही है। स्कूल प्रबंधन अपने स्टाफ को कम सैलरी देकर कागजों में ज्यादा पर दस्तखत करवाता है। इस भ्रष्ट चलन का आशा रानी कई बार विरोध कर चुकी थीं। यहां तक कि स्कूल प्रबंधन की उनके साथ खासी तनातनी भी हो चुकी थी। अब स्कूल प्रबंधन आशा रानी से निजात पाना चाहता है। इसके लिए प्रबंधन ने फैसला किया कि स्कूल से संस्कृत विषय ही हटा दिया जाए। न रहेगी संस्कृत और न रहेगी उसको पढ़ाने वाली आशा रानी। लेकिन भारतीय संस्कृति की पहचान संस्कृत भाषा को हटाने का निर्णय न तो बच्चों को रास आ रहा है और न अभिभावकों को। इसलिए इसके विरोध में आशा रानी स्कूल के गेट पर अनशन पर बैठ गई हैं।

कोई सुनवाई नहीं

आशा रानी के इस अभियान से स्कूल प्रबंधन पर कोई खास असर पड़ता नहीं दिख रहा है। दरअसल मीडिया ने भी इस मामले अभी उस तरह नहीं दिखाया है, बल्कि ये कहें कि मीडिया में अभी ये मामला आया ही नहीं है। आशा रानी ने बस अपने दम पर बिना किसी सोची-समझी रणनीति के अभियान छेड़ दिया है। लेकिन रोहिणी सेक्टर 15 के निवासियों के बीच आशा रानी की ये मांग और विरोध प्रदर्शन लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। वैसे इससे ज्यादा दुर्भाग्य की बात कोई क्या होगी कि अपनी सांस्कृतिक धरोहर और देव वाणी संस्कृत को जर्मन और फ्रेंच की भेंट चढ़ाया जा रहा है। उम्मीद है कि आशा रानी का ये अनशन जरूर रंग लाएगा।



अधिक जानकारी के लिए संपर्क सूत्र

आशा रानीः 8826050123
सेंट एंजल्स स्कूलः 27291521, 27294021, 27298621



शुक्रवार, 7 मई 2010

ये कहाँ आ गए हम सरलता की तलाश में...

अभी कुछ दिन पहले रावण द्वारा लिखा गया "शिव तांडव स्त्रोत्र" सुनने और पढ़ने का अवसर मिला. सुनने में बेहद ही सुन्दर और कर्णप्रिय लगा.  रावण ने एक बार कैलाश पर्वत को उठा लिया था, तब शिव ने अपने पाँव से कैलाश का भार इतना बढा दिया कि रावण का हाथ उसके नीचे दब गया. तब रावण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए तत्काल इस स्त्रोत्र की रचना की और शिव को सुनाकर मनाया.  अब बात ये उठती है कि मैं इस बारे में क्यूँ लिख रहा हूँ. दरअसल इस स्त्रोत्र की शब्दावली मुझे इतनी कठिन लगी इसको ठीक से पढ़ने में ही एक घंटा लग गया. ठीक से पढ़ने के लिए मुझे कई बार इसका ऑडियो सुनना पड़ा तब कहीं ठीक से उच्चारण कर पाया (याद अभी तक नहीं हुआ है). मेरा दावा है कि आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा में पला बढा कोई भी व्यक्ति इस स्त्रोत्र का बिना एक बार सुने उचाचरण नहीं कर सकता. यहाँ तक कि लिखना भी मुश्किल है. स्त्रोत्र का पहला पैरा नीचे मैंने किसी जगह से कॉपी करके लिखा है. इसमें ऐसे ऐसे कुल १५ पैरे हैं.
.. शिवताण्डवस्तोत्रम्..
.. श्रीगणेशाय नमः ..
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्ड्ताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्.  

(एक बार अगर उच्चारण आ जाये तो ये गाने में बेहद सरल है. )

लेकिन मैं यहाँ जो असल बात कहना चाहता हूँ वो ये है कि भाषा को सरल बनाने के चक्कर में ये हम कहाँ आ गए हैं. हमने भाषा को क्या से क्या बना दिया है. भाषा की दृष्टि से हमारा भूत कितना उज्जवल था और वर्तमान कितना होंच-पॉच है. हम एक भाषा में लगातार ना तो बोल सकते हैं ना लिख सकते हैं. हमारे शब्दों का ज्ञान संकुचित होता जा रहा है लगता है. कुछ लोगों की भाषा पर पकड़ मैंने देखि है लेकिन उनके सर पर सफ़ेद बाल हैं. ये पकड़ इतनी देर से नहीं, बल्कि पढाई पूरी होते-होते ही हो जनि चाहिए थी. अंग्रेजी के पीछे ऐसे दौड़ रहे हैं कि ना तो हम हिंदी के रहे और ना अंग्रेजी के. और संस्कृत, उसका तो नाम भी मत लो साहब. हमारे देश का कितना ही बेशकीमती ज्ञान संस्कृत शास्त्रों में बिखरा पड़ा है. रावण का शिव तांडव स्त्रोत्र सुनने से पहले मैं तो ये कल्पना भी नहीं कर सकता था कि इतनी जटिल संस्कृत को भी इतनी सुन्दर तरीके से गया जा सकता है. आज के समय में शायद ही कोई इस तरह की रचना रचने की हिम्मत जुटा पाए. और अगर हिम्मत जुटा भी ली तो उसको उसका फल तो मिलने से रहा. क्योंकि समाज में समझने वाले ही नहीं हैं.

ये समाज की घटती समझ का ही नतीजा था कि तुलसी को आम लोगों की भाषा में रामचरितमानस की रचना करनी पड़ी. एक ऐसा ग्रन्थ जिसको आसानी से समझा और पढ़ा जा सके. हालाँकि तुलसी ने भी मानस में जहाँ जहाँ संस्कृत का प्रयोग किया है वो लाजवाब है और उच्च स्तर का है. लेकिन आज समाज में तुलसी के संस्कृत श्लोकों से ज्यादा तुलसी की चौपाइयां ज्यादा प्रचलित हैं. गूढ़ जीवन दर्शन देने वाली गीता को इसीलिए समझने वाले कम हैं, क्योंकि वो संस्कृत में हैं. जीवन क्या है, जीवन का उद्देश्य क्या है, जीवन को कैसे जिया जाये, ये वो सवाल हैं जो कभी ना कभी हर इन्सान के दिमाग में कौंधते हैं. लेकिन इन सवालों के जवाब आधुनिक शिक्षा व्यवस्था नहीं देती, आज कि पढाई तो कमाई के लिए है केवल. लेकिन जीवन से जुड़े इन सवालों के जवाब गीता में बड़ी सफाई से दिए गए हैं. लेकिन पढ़े कैसे, भाषा की लाचारी है. इसीलिए हम लोगों को जीवन संग्राम में जगह जगह हारते हुए देखते हैं.

तो इस भाषाई समझ को बढ़ने की जरुरत है. बाल पकने के बाद नहीं, कम उम्र से ही हमें बच्चों को ये संस्कार देने होंगे. स्कूल कॉलेज भले ही ये ज्ञान देने में विफल हों, लेकिन हमें घर पर ऐसा माहौल तैयार करना होगा जिससे बच्चों कि भाषा कि अच्छी पकड़ बने.  

‘हनुमान अंश’ की सफलताः देशज कहानी की जीत

भारतीय सिनेमा में सफलता का पैमाना लंबे समय से बड़े बजट, बड़े सितारों, विदेशी लोकेशन और भव्य प्रचार से जोड़ा जाता रहा है। ऐसे समय में ‘हनुमान अं...