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बुधवार, 14 अगस्त 2013

ऐ पाकिस्तान बता तेरी रजा क्या है?


पाकिस्तान में आम चुनाव के बाद जिस दिन मियां नवाज शरीफ की पार्टी जीत की ओर बढ़ी, उन्होंने तपाक से बयान जारी कर दिया ‘वो भारत के साथ मजबूत और दोस्ताना रिश्ते बनाना चाहते हैं और बनाएंगे, चाहे भारत आग आए या न आए’। भारत के खबरिया चैनलों में बैठे अंग्रेजीदां पत्रकार इस बयान से इतने प्रेरित हुए कि उन्होंने मियां नवाज शरीफ का एक ‘मासूम गऊ’ चेहरा अपनी टीवी स्क्रीनों पर दिखाना शुरू कर दिया और तब तक दिखाते रहे जब तक हमारे ‘सिंह’ प्रधानमंत्री ने भी नहीं कह दिया कि वो भी पाकिस्तानी के नए गऊ प्रधानमंत्री से बतियाना चाहते हैं।

पाकिस्तान के मामले में अब तक के अनुभवों के बावजूद पता नहीं क्यों भारतीय मीडिया को उधर से दोस्ती की इतनी ज्यादा उम्मीद रहती है। किसी को उधर से अमन की आशा रहती है, कोई वहां के कलाकारों को मंच देने के लिए पलक बिछाए रहता है, तो कोई क्रिकेट डिप्लोमेसी की पैरोकारी करता है। भारतीय मीडिया के बीच पाए जाने वाले चंद जरूरत से ज्यादा ‘क्रिएटिव’ पत्रकार बार-बार ये बताने का प्रयास करते हैं कि वे जरा अलग ढंग से सोचते हैं, उनकी सोच परंपरागत नहीं है।

आप नई सोच रखें या परंपरागत पाकिस्तान अपनी करतूतों से आपकी हर सोच पर पानी फेरता रहा था, है और रहेगा। एक नई सोच के साथ ही अटल बिहारी वाजपेयी बस में सवार होकर लाहौर गए थे। यही मियां नवाज शरीफ उस समय भी दोस्ती के राग अलाप रहे थे। पर हुआ क्या इधर वो लाहौर में बार-बार वाजपेयी से गले मिल रहे थे और उधर कारगिल में मुशर्रफ भारत की पीठ में छुरा घोंप रहे थे। कारगिल में धोखा खाने के बावजूद वाजपेयी ने तानाशाह मुशर्रफ को बातचीत के लिए आगरा बुलाया। लेकिन आगरा में भारत का नमक खाने के बाद भी मुशर्रफ ने क्या सिला दिया, वो सबके सामने है।

नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान जो इन दिनों कारस्तानियां कर रहा है, वो सोची समझी रणनीति लगती है। उधर मियां नवाज शरीफ अपनी शराफत का लबादा ओढ़े हुए हैं और विश्व को दिखा रहे हैं कि पाकिस्तान भारत के साथ शांति चाहता है, और इधर उनकी फौज भारत के साथ छिछोरी हरकतें कर रही है। पाकिस्तान ने इस बार अपनी आजादी के जलसे में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बानकी मून को न्यौतकर एक तरफ उनके समाने शांति का ढोंग रचा और दूसरी तरफ सीमा पर लगातार गोलीबारी करता रहा। पाकिस्तान कश्मीर के मसले पर विश्व समुदाय के सामने झूठ परोसकर बेहद धूर्त राजनीति करता आया है। लेकिन फिर भी न जाने क्यों भारत को पाकिस्तान के साथ दोस्ती की उम्मीदें बरकरार हैं।

मियां नवाज शरीफ भले ही देखने में शरीफ लगें, लेकिन वो भारत के साथ शराफत से कभी पेश नहीं आएंगे। भारत को ये भी नहीं भूलना चाहिए कि शरीफ की पार्टी पाकिस्तान के कट्टरपंथियों के समर्थन से ही सत्ता में आई है। लिहाजा अपने आकाओं के साथ दगा करके भारत के साथ वफा करने की गलती नवाज शरीफ कर ही नहीं सकते। फिर भी कुछ भारतीय पत्रकार सिर्फ इस बात से खुश हो जाते हैं कि पाकिस्तान के शीर्ष नेता उनको नाम से पहचानते हैं और तवज्जो देते हैं, लिहाजा वो हर वक्त अपने चैनलों पर उन पाकिस्तानी नेताओं का अहसान सा उतारते दिखते हैं।

ये बात किसी से भी छिपी नहीं है कि पाकिस्तान की पूरी राजनीति भारत के साथ घृणा पर टिकी है, सो वो अमन की बात कर ही नहीं सकता। यहां से न जाने कितनी बार दोस्ती के हाथ बढ़ाए गए, लेकिन हर बार उसने दोस्ती का सिला दुश्मनी से दिया। पाकिस्तान की ये ऐंठ तो तब है जब उसके आर्थिक हालात समुंद्र में गोते लगा रहे हैं। अगर छोटा सा भी युद्ध हुआ तो पाकिस्तान छेल नहीं पाएगा, लेकिन फिर भी भारत को उकसाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा है। चाहे वो भारतीय जवानों का सिर कलम करने की दुस्साहस हो या फिर भारतीय चैकी पर हमला कर पांच जवानों की हत्या का मामला। भाड़े के आतंकियों के बलबूते पाकिस्तानी सेना हमेशा से कायराना और छिछोरा खेल खेलती आई है। इसी से भारत को समझ लेना चाहिए कि पाकिस्तान भारत का कभी हितैषी नहीं बन सकता।

मंगलवार, 27 मार्च 2012

भारतीय गांव तो पान सिंह तोमर जैसे बागी पैदा करने की फैक्ट्री हैं

विकिपीडिया पर पान सिंह तोमर की तस्वीर
फिल्म पान सिंह तोमर भारतीय ग्रामीण परिवेश की सच्ची तस्वीर दिखाती है। उस तस्वीर से बिल्कुल अलग जो कवियों की कविताओं में होती है- संुदरता, प्यार और सौहार्द से भरे गांव! शायद पहले कभी ऐसे गांव रहे हों जो प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण हों, जहां के समाज में आपसी सौहार्द हो, आज हिंदी क्षेत्र के अधिकांश गांव पान सिंह तोमर के गांव से मेल खाते हैं, जहां की परिस्थितियों ने एक बेहतरीन प्रतिभा को बागी (डकैत नहीं; डकैत तो पान सिंह तोमर ने फिल्म में बता ही दिया था कि कहां मिलते हैं।) बनने पर मजबूर कर दिया। उत्तराखंड और हिमाचल में जरूर ऐसे गांव बचे हैं जहां प्राकृतिक सौंदर्य भी है और आपसी सौहार्द भी। लेकिन अब वहां भी धीरे-धीरे राजनीति और पैसे की होड़ पहुंचती जा रही है।

पढ़ाई के दौरान 2004 में काॅलेज टूर पर एक बार मनाली जाना हुआ। हिमाचल का खूबसूरत गांव जो अटल जी को खासा प्रिय है। वहां के लोकल टैक्सी ड्राइवर से हुई बातचीत मुझे आजतक याद है। पत्रकारिता के छात्र होने के नाते मैंने केलांग और सोलांग के रास्ते पर उससे कई सवाल किए थे। मनाली और हिमाचल के सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक पक्ष से जुड़े सवाल। बात मनाली के सेबों की और पहाड़ी आलुओं की हुई तो उसने बताया- ‘‘फसल को बेचने के लिए यहां के किसानों को दिल्ली और मुंबई के बाजारों में नहीं जाना पड़ता। हमारे गांव का ही एक एजेंट वहां होता है, जो सबकी फसल की चिंता करता है। हमारा आपसी विश्वास इतना गहरा है कि कोई भी उस एजेंट पर शक नहीं करता, वो जितनी रकम भेजता है वो हमें स्वीकार होती है। और हमें पता है कि वो हमारे साथ कुछ गलत कर ही नहीं सकता। वैसे भी गांव के लोग बेहद भोले हैं वे दिल्ली और मुंबई के बाजारों में फिट नहीं बैठते।’’ काॅलेज टूर पर एक और छोटी सी घटना घटी। हमारी गाड़ी के पीछे चल रही इन्नोवा में जो लड़के सवार थे, उनमें से किसी ने मनाली की एक लड़की को देखकर कोई फब्ती कसी, जिसे सुनकर गाड़ी के ड्राइवर ने गाड़ी को वहीं रोक लिया और गाड़ी चलाने से इंकार कर दिया। उसने लड़कों से कहा ‘‘मनाली की लड़कियां हमारी मां बहनें हैं। आप लोगों को ये सब करना है तो पैदल चले जाइए। यहां का कोई भी ड्राइवर ये सब बर्दाश्त नहीं करेगा।’’ काॅलेज स्टाफ के लड़कों को डांटने और ड्राइवर से माफी मांगने के बाद काॅनवाॅय आगे बढ़ा।

मनाली की ये तस्वीर मैदानी क्षेत्र के गांवों से कतई भिन्न है। मैदानी क्षेत्र के गांव आज ईष्र्या, द्वेष और डाह के शिकार बनकर रह गए हैं। गांवों में रंजिशें, जमीनों को लेकर हत्याएं, मुकदमेबाजी आम हो गई है। छोटी-छोटी बातों को लेकर एक-दूसरे की जान का दुशमन बन जाना, दूसरे की तरक्की देखकर जलना, ईष्र्या के कारण द्वेष रखना और फिर उस द्वेष का रंजिश में बदल जाना और फिर शहर की कचहरियों के चक्कर लगाना गांवों का शगल बनता जा रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में ऐसी-ऐसी चीजों को लेकर मुकदमेबाजी के दिलचस्प केस मिल जाएंगे कि गधों को भी हंसी आ जाए। मसलन- खेत की मेंढ को लेकर, चैक के कुएं को लेकर, दल्लान में बैठने को लेकर, घर में गिर रहे पनारे या नालियों को लेकर, खेत में भैंस के घुस जाने पर और न जाने कैसी-कैसी हास्यासपद चीजों पर लोग आपस में भिड़ने को तैयार रहते हैं और उस भिडं़त को कोर्ट-कचहरी तक ले जाने में गुरेज नहीं करते। घर चाहे खाने के लाले पड़ रहे हों, लेकिन नाक की झूठी लड़ाई वो पेट पर पत्थर बांधकर लड़ने को भी तैयार हैं। लोगों की आपसी जलन और अहम की लड़ाई न तो उन्हें न तो खुद की तरक्की करने दे रही है और न ग्रामीण समाज की। इस तरह की ओछी लड़ाइयां ग्रामीण समाज को नई सोच देने में बड़ी बाधा बनी हुई है। अगर उस दौर में पान सिंह तोमर को एक श्रेष्ठ धावक से एक बागी बनकर बंदूक उठानी पड़ी तो आज का दौर भी कुछ भिन्न नहीं है। आज के गांवों में भी तमाम युवा ऐसे हैं जिनकी आंखों में आगे बढ़ने के सपने हैं, देश के प्रति सपने हैं, लेकिन गांव की आपसी रंजिशें और आए दिन की छोटी-छोटी परेशानियां उन्हें आगे नहीं बढ़ने देतीं।

राजनीति जब अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर हो तो ठीक लगती है लेकिन जब वो गिरते-गिरते ग्रामीण स्तर तक पहुंच जाए तो बेहद हानिकारक सिद्ध होती है और हो भी रही है। पंचायती राज व्यवस्था बनाई तो गई थी गांवों के विकास के लिए, लेकिन इस व्यवस्था ने ग्रामीण समाज का जितना नुकसान किया शायद उतना किसी चीज ने नहीं किया। ग्राम प्रधान या सरपंच पद को लेकर होने वाली ग्रामीण स्तर की राजनीति ने गांव के समाज को बुरी तरह बांटकर रख दिया। और इतना गहरा बांटा है कि खाइयों को पाटना नामुमकिन लगता है। पंचायती राज व्यवस्था के तहत होने वाले चुनावों से हो रहे नुकसान को शायद अन्ना हजारे को भी दिखा होगा, तभी तो रालेगणसिद्धि से जुड़े तमाम गांवों में ग्राम प्रधान के चुनाव नहीं होते, बल्कि सरपंच को सर्वसम्मति से चुना जाता है। गांवों के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत रखने के लिए अन्ना द्वारा उठाया गया ये एक बेहद जरूरी कदम है। भारत के गांव अगर इसी तरह राजनीति के शिकार होते रहे तो फिर गांवों को बचाना मुश्किल होगा। सांप जब बाहर घूमता है टेढ़ा-मेढ़ा होकर चलता है, लेकिन जब भी अपने घर में घुसता है तो सीधा घुसता है। गांव भारत के सच्चे घर हैं, राष्ट्रीय स्तर पर भले ही राजनीति का टेढ़ापन झेला जा सकता है, लेकिन अगर राजनीति का ये टेढ़ापन गांवों में घुसता रहा तो नुकसान ही नुकसान है। गांवों को राजनीति से दूर सीधी-सादी जिंदगी से भरा ही रहने दिया जाए तो बेहतर होगा। खासतौर से हिंदी पट्टी के मैदानी क्षेत्र के गांवों को पहाड़ के ग्रामीण समाज से और अन्ना के रालेगणसिद्धि से काफी कुछ सीखने की जरूरत है।

बुधवार, 7 मार्च 2012

पार्टियों को लेना होगा इस जनादेश से सबक!


पांच राज्यों के चुनाव परिणाम देश के राजनीतिक व्यवस्था के लिए कई पाठ सिखाने वाले हैं। शह और मात के राजनीतिक खेल में कई पार्टियों के समीकरण बिगाड़ कर रख दिए हैं। सपा, बसपा, भाजपा, अकाली और कांग्रेस के लिए ये चुनाव कई सबक लेकर आए। सबसे अच्छी बात ये रही कि उत्तराखंड को छोड़कर हर जगह जनता ने एक पार्टी के पक्ष में बहुमत दिया है। न त्रिशंकु विधान सभा, न राष्ट्रपति शासन और न मध्यावधि चुनावों की गुंजाइश। उत्तराखंड में भी परिस्थितियां इतनी बुरी नहीं हैं। कांग्रस या भाजपा अन्यों के भरोसे अगर सरकार बनाती है तो वो स्थाई ही होगी। इन चुनावों के परिणामों ने साफ कर दिया है कि आवाम अब पहले से काफी जागरूक है। जनता ने तमाम गुंडों, दबंगों और बाहुबलियों को हराकर साफ संदेश दे दिया है कि उसे अपने ही जैसे साफ-सुथरे और सज्जन नेता चाहिए। पार्टियां इन चुनावों से क्या सबक ले सकती हैं, आइए डालते हैं एक नजरः 

समाजवादी पार्टीः सबसे पहले बात सपा की करते हैं जिसके सिर पर जनता ने जीत का सेहरा बांधा है। इस जीत का श्रेय अगर अखिलेश यादव को दिया जा रहा है तो इसमें कोई गलत नहीं है। ये अखिलेश ही हैं जिन्होंने पार्टी में नए प्रयोग किए, खांटी नेताओं की जगह युवाओं को टिकट वितरित किए, जिनमें इंजीनियर, डाॅक्टर और मैनेजर शामिल हैं, पार्टी के दिग्गज नेताओं के खिलाफ जाकर डीपी यादव का टिकट कैंसिल कराया, गांव-गांव और गली-गली जाकर चुपचाप पार्टी के लिए काम किया। अखिलेश पिछले नौ साल से सपा के साथ राजनीति में सक्रिय हैं और दो बार से सांसद हैं। लेकिन नौ सालों में कभी अखिलेश ने मीडिया अटेंशन प्राप्त करने की कोशिश नहीं की। मीडिया को राहुल को युवराज-युवराज कहकर पुकार रही थी, लेकिन यूपी के असली युवराज अखिलेश साबित हुए। ऐसा नहीं है कि अखिलेश ने ग्रासरूट लेवल पर जाकर काम नहीं किया, उन्होंने कस्बाई स्तर तक जाकर जमकर काम किया लेकिन राहुल की तरह कभी कैमरे के सामने नहीं किया। शायद वो जानते थे कि दिखावे पर मत जाओ, अपनी अक्ल लगाओ। बेहद संयत भाषा में, बेहद विनम्र तरीके से वो जनता के बीच अपना काम करते रहे और छह मार्च को जनता ने उनके हक में परिणाम दे दिया। तब जाकर देश की मीडिया को एहसास हुआ कि देश में राहुल के अलावा भी एक और युवा नेता है। लेकिन अखिलेश ने अभी भी अपनी भाषा का संयम नहीं खोया, न माया के खिलाफ और न कांग्रेस के खिलाफ। चुनौतियाः लेकिन अखिलेश के सामने बहुत बड़ी चुनौतियां इंतजार कर रही हैं। सपा के जिस गुंडाराज की बात हमेशा विपक्ष और मीडिया करता आया है, उसका एक ट्रेलर चुनावी नतीजे सामने आते ही दिखने लगा। शाम होते-होते यूपी के तमाम जिलों से हिंसा और मौतों की खबरें आने लगीं। अखिलेश में जो संमय और समझदारी है उस स्तर का संयम सपा के कार्यकताओं में ला पाना बेहद मुश्किल है, क्योंकि सपा का जनाधार समाज के बेहद निचले स्तर तक है, जहां सत्ता का मतलब केवल अहंकार के मद में चूर रहना होता है। अगर सपा के कार्यकर्ताओं ने इस बार भी थानों पर कब्जे, गुंडागर्दी और दबंगई दिखाई तो जनता सपा को 2014 में सबक सिखाने से गुरेज नहीं करेगी। ये एक तरह से अच्छा निर्णय है कि मुलायम मुख्यमंत्री बनेंगे, इससे अखिलेश को अपने संगठन को शक्ति देने का वक्त मिलेगा। लेकिन अखिलेश ने संगठन को संयमित करने के लिए कदम नहीं उठाए तो उनके लिए भारी पड़ सकता है। अखिलेश को देखना होगा कि वो राहुल गांधी की तरह पार्टी के कुछ चुनिंदा नेतओं के हाथों की कठपुतली न बनें, बल्कि इसी संयम और विवेक के साथ पार्टी को सीख देते रहें। प्रदेश ने जितनी बड़ी जीत दी है तो जनता अखिलेश से उतनी ही बड़ी उम्मीदें रखेगी। अगर वो जिलास्तर तक अपनी पार्टी के छुटभैये नेताओं को कंट्रोल करने और भ्रष्टाचार पर लगाम कसने में सफल रहते हैं तो हो सकता है कि यूपी की जनता उन्हें दिल्ली की उस कुर्सी पर बिठा दे जिस पर राहुल की नजरें हैं।

बहुजन समाज पार्टीः बसपा को जिस नाज के साथ यूपी की जनता ने 2007 में लखनऊ के तख्त पर बिठाया था, बसपा उस जनता के लिए कुछ खास करने में विफल रही। जनता के करोड़ों रुपये खर्च करके अपने पुतले खड़े करवाकर माया ने भले ही खुद को और अपने एक खास वोट बैंक को भले ही खुश कर दिया हो, लेकिन प्रदेश की आम आवाम को ये शाही खर्च कतई पसंद नहीं आया। सत्ता में आते ही सबसे पहले माया द्वारा अपना बंगला बनवाना, जन्मदिन पर नोटों का हार पहनना, प्रशासनिक अधिकारियों से ब्रीफकेस लेना, भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए हुई हत्याएं जनता के गले नहीं उतरीं। कांग्रेस के नेता भले ही कह रहे हों कि भ्रष्टाचार चुनावों में मुद्दा नहीं था, लेकिन अन्ना हजारे द्वारा चलाई गई भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम का प्रदेश की जनता पर साफ-साफ असर दिखा। मायावाती जिस दलित समाज के कंधे पर पांव रखकर चार बार सत्ता पर काबिज हुईं उस दलित समाज की स्थिति में उनके इस पांच साल के शासन में कोई खास फर्क पड़ता नहीं दिखाई। दलित समाज की माली हालत सुधरी हो या न सुधरी हो, लेकिन मायावती की आर्थिक स्थिति आज बेहद मजबूत है। माया जिस सख्त शासन के लिए जानी जाती हैं, अगर उस सख्ती का लाभ उन्होंने प्रदेश को सुशासन देने में उठाया होता तो यूपी की तस्वीर आज कुछ और होती। लेकिन उन्होंने इन पांच सालों को केवल निजी लाभ उठाने के लिए इस्तेमाल किया। जिस लाड़ के साथ जनता ने उनको 206 सीटें देकर सत्ता सौंपी थी, माया ने उस सत्ता को प्राप्त करके न तो विनम्रता दिखाई और न बड़प्पन, पांच साल तक केवल ऐंठ और अहंकार नजर आता रहा। वो देश की पहली ऐसी नेता बनीं जिसने जीते जी पार्कों में अपनी मूर्तियां ठुकवाईं, वो थोड़ा बहुत नहीं बल्कि करोड़ों का राजस्व खर्च करके। मंच पर खड़े होकर सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय का नारा चिल्लाने से सर्वजन सुखी नहीं हो सकता। सर्वजन को सुखी करने के लिए कुछ करना भी पड़ता है। माया का थैली और ब्रीफकेस के प्रति प्यार प्रदेश में किसी से नहीं छिपा। टिकट बेचने से लेकर जन्मदिन के उपहारों तक। प्रशासन पर केवल सख्ती बरतने से सुधार नहीं हो सकता, प्रशासनिक अधिकारियों के मन में प्रदेश के मुखिया के प्रति सम्मान भी होना जरूरी है। वो सम्मान थैलियां बटोरने से तो नहीं आ सकता था। माया अगर ये सोच रही हों कि तमिलनाडु की तरह यूपी की सत्ता एक-एक बार सपा और बसपा को मौका देती रहेगी, तो भी ये उनकी भूल होगी। भाजपा और कांग्रेस अभी भी खेल में बनी हुई है। माया को चाहिए कि वो नारों को छोड़कर हकीकत में दलितों के उत्थान के लिए कुछ करके दिखाएं। उनका सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्तर सुधारने के लिए जरूरी नहीं कि माया सीएम की कुर्सी पर बैठी हों, एक संगठन और आम नागरिक के तौर पर भी वो दलितों के उत्थान के लिए काफी कुछ कर सकती हैं, क्योंकि अभी काफी कुछ करना बाकी है। बसपा के लिए खुशी की बात यही है कि उसकी सत्ता रहे न रहे लेकिन हाथी और मूर्तियां बनी रहेंगी।

भारतीय जनता पार्टीः भारतीय जनता पार्टी के लिए गोवा को छोड़कर कहीं भी खुश होने की स्थिति नहीं है। यूपी में 51 से घटकर 47, पंजाब में 19 से घटकर 12 और उत्तराखंड में पार्टी 31 पर सिमट गई है। अटल बिहारी वाजपेयी के जाने के बाद भाजपा में जो शून्य पैदा हुआ है उसको भर पाना नामुमकिन लग रहा है। आदर्श, सिद्धांत और त्याग की बात करने वाली पार्टी की अंदरूनी हालत ऐसी हो गई है कि पदलोलुपता, टांग खिंचाई, भितराघात जैसी बीमारियां सिर चढ़कर बोल रही हैं। भाजपा आज एक डिवाइडेड हाउस नजर आ रही है। उत्तराखंड में निशंक ने अंदरखाने खंडूरी को हरवाने के पूरे प्रयास किए। वरुण गांधी, मेनका गांधी, योगी आदित्यनाथ और नरेंद्र मोदी ने यूपी के प्रचार में भाग नहीं लिया। ये भाजपा के वो नाम हैं जिनको जनता पसंद करती है। लेकिन फिर पार्टी ने आपसी सौहार्द कायम करने की दिशा में कदम नहीं उठाए। पार्टी के खुद के नेता भाजपा के हारने की भविष्यवाणी कर रहे थे। वरुण ने कहा कि पार्टी में सीएम पद के 55 उम्मीदवार हैं, योगी ने कहा कि भाजपा हारेगी, संघ के काशी प्रचारक का बयान आया कि भाजपा हार ही जाए तो अच्छा। दरअसल ये सभी पार्टी का बुरा नहीं चाहते, बल्कि ये उनके अंदर का गुस्सा और पार्टी की कार्यप्रणाली के प्रति उनकी खुंदक बोल रही थी। यूपी में उमा भारती और राजनाथ सिंह सीएम पद के दावेदार थे, वरुण गांधी और मेनका गांधी भी महत्वपूर्ण भूमिका की चाहत में मुंह फुलाए थे। 2009 के आम चुनाव में आडवाणी के नाम पर भाजपा को जनता का मैंडेट नहीं मिला। अब पार्टी के अंदर पीएम पद के तमाम दावेदार हैं- मोदी, सुष्मा, राजनाथ, जेटली, मुरली मनोहर जोशी, ऐसे में पार्टी एकजुट होकर कभी चुनाव लड़ ही नहीं सकती। पार्टी की हार-जीत की तरफ किसी का ध्यान नहीं, सबको सीएम और पीएम बनना है। सीएम-पीएम न भी बनें तो दावेदार तो बनना ही बनना है। ऐसी परिस्थिति में भाजपा को अमेरिकी पार्टियों से सीख लेनी चाहिए और सीएम-पीएम पद के लिए चुनावों से पहले इंटरनल इलेक्शन करा लेना चाहिए। डिवाइडेड हाउस के तौर पर चुनाव लड़ने से अच्छा है कि एक बार इंटरनल डिविजन ही करवा लिया जाए। दूसरे भाजपा को अब मुसलमानों के प्रति जो उसकी छवि बना दी गई है, उस छवि को सुधारना होगा। ऐसा नहीं है कि भाजपा मुसलमानों के प्रति दुर्भावना से काम करती है। वाजपेयी सरकार के सात साल, और तमाम प्रदेशों में भाजपा की सरकारों के काम को देखा जाए तो भाजपा ने कहीं भी दुर्भावाना से काम नहीं किया है। गुजरात के दंगों को लेकर जरूर हायतौबा मची है। इस्लाम के प्रति भाजपा के मन में दुर्भावना होती तो वाजपेयी बस लेकर लाहौर न जाते, पाकिस्तान के फौजी तानाशाह को आगरा बुलाकर मुर्गमुसल्लम न खिलाते और आडवाणी-जसवंत जिन्ना की तारीफ में कसीदे न पढ़ते। भाजपा को अपना राष्ट्रवादी एजेंडा लोगों के बीच ले जाने की जरूरत है और राम मंदिर के मुद्दे को आपसी समझौते से सुलझाने की आवश्यकता है। भाजपा को अपना हाई प्रोफाइलपना छोड़कर आम लोगों के बीच पहुंच बनानी चाहिए। भाजपा को शहर की चमक से निकलकर गांवों की धूल भी छाननी चाहिए। भाजपा में धन को इतना महत्व दिया जा रहा है कि वो बनियों और उद्योगपतियों की पार्टी बनकर रह गई है। धन बहुत बड़ा फैक्टर होता है, लेकिन टिकट बांटते समय जनाधार वाले नेताओं को दरकिनार न किया जाए।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसः इन चुनावों में सबसे पतली हालत अगर किसी की हुई तो वो है कांग्रेस। इस राष्ट्रीय पार्टी ने इन चुनावों में गिरावट के सारे कीर्तिमान तोड़ दिए। चुनाव आयोग को चुनौतियां दीं, खराब भाषा का इस्तेमाल किया, आस्तीनें चढ़ाईं, विरोधियों का माखौल उड़ाया, उनका मेनिफेस्टो फाड़े, आरक्षण का ओछा कार्ड खेला, लेकिन कुछ काम नहीं आया। राहुल गांधी 39 साल की उम्र में भी काफी अपरिपक्व नजर आ रहे थे। जो परिपक्वता अखिलेश ने इन नौ सालों में चुपचाप हासिल की, उस स्तर की परिपक्वता राहुल तमाम मीडिया मैनेजमेंट के बावजूद हासिल नहीं कर पाए। चमचागीरी सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गई। हार का तमगा टांगने के लिए पार्टी के तमाम बड़े नेता राहुल के चरणों में लंबलेट होने को तैयार हैं। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के साथ किया गया कांग्रेस का बुरा सलूक वोटों में ऐसा तब्दील हुआ कि दोनों भाई-बहन रायबरेली की इज्जत भी नहीं बचा पाए। कांग्रेस की केंद्र सरकार में लगातार उजागर हो रहे भ्रष्टाचार के मामले जनता को कतई पसंद नहीं आ रहे। राहुल गांधी मायावती के भ्रष्टाचार पर उंगलियां उठाने से पहले अपनी पार्टी के भ्रष्टाचार पर लगाम कसते तो लोग उनपर कहीं ज्यादा पसंद करते। शायद ये पहली बार ही हुआ है कि सत्ता में रहते हुए किसी सरकार के कई मंत्री सलाखों के पीछे पहुंचे। लाख मुकदमों के बावजूद सुरेश कलमाड़ी को अभी तक कांग्रेस से निकाला नहीं गया है। लगातार बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार से लोग परेशान हैं। उस पर भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों के साथ कांग्रेस ने जो बर्ताव किया वो बेहद निंदनीय है। सोते हुए लोगों पर लाठचार्ज करना किसी तानाशाही की याद दिलाता है। ये बात सही है कि कांग्रेस का अस्तित्व नेहरू-गांधी परिवार के बिना खतरे में पड़ जाता है। नरसिंह राव और सीताराम केसरी के जमाने में लगने लगा था कि कांग्रेस खत्म हो गई समझो। लेकिन सोनिया के बागडोर संभालने के बाद पार्टी में नई जान आई और उसके नेता फिर से कमाने खाने लगे। लेकिन गांधी परिवार का मतलब ये नहीं कि चमचागीरी की सारी हदें पार कर दी जाएं। आज कांग्रेस का एक-एक नेता रीढ़विहीन इंसान की तरह हो गया है, जो हर समय मैडम और बाबा के चरणों में गिरने को तैयार रहता है। प्रधानमंत्री से लेकर कांग्रेस के तमाम वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री जिस तरह राहुल की तारीफों के पुल बांधते हैं उसे देखकर लगता है कि सबकी आंखों में काला चश्मा चढ़ा है जिसमें से सिर्फ राहुल ही राहुल नजर आते हैं। राहुल के हावभाव से यही लगता है कि भारतीय राजनीति के लिए राहुल अभी कतई तैयार नहीं है। हालांकि यही बात इंदिरा गांधी के शुरुआती दिनों में भी कही जाती थी, लेकिन बाद में वो एक परिपक्व राजनीतिज्ञ साबित हुईं। लेकिन इन चुनाव परिणामों को देखकर कांग्रेस को हवा का रुख समझना चाहिए। जनता को आज वो कांग्रेस चाहिए जिसका सपना महात्मा गांधी ने देखा था। जिसकी पहुंच गांव-गांव तक थी। जो सत्य, अहिंसा और त्याग की बुनियाद पर खड़ी थी। जहां पद की लोलुपता के लिए जगह नहीं थी। कांग्रेस को पार्टी और यूपीए के अंदर खाओ और खाने दो की प्रवृत्ति पर लगाम कसनी होगी। अन्यथा देश के साथ-साथ पार्टी का भी बंटाधार हो जाएगा। दूसरी बात, मुसलमानों के लिए मंच से बड़ी-बड़ी बातें करके उनको वोटबैंक बनाने से बेहतर होगा कि पार्टी मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने के लिए हकीकत में कोई दूरगामी कदम उठाए। केवल कर्जा माफी, आरक्षण और पैसा बांटने से किसी समुदाय का विकास नहीं हो सकता। मुसलमानों के बीच जो अशिक्षा है सबसे पहले उस पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

जगह-जगह से उठ रही हैं बदलाव की सुगबुगाहटें!

2012 की शुरुआत एक ऐसे समय में हुई है जब लीबिया में गद्दाफी की तानाशाही खत्म हो चुकी थी और विश्व के दूसरे कोनों से क्रांति की आवाजें सुनाई पड़ रही थीं। ज्यों-ज्यों 2012 आगे बढ़ रहा है अशांति बढ़ती जा रही है। अफगानिस्तान, लीबिया, सीरिया, मिस्र, इजराइल, ईरान, इराक और पाकिस्तान सरीखे देश युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं। कोई दिन ऐसा जा रहा है जब इन इलाकों से खून बहने की खबरें नहीं आतीं। वहां की आवाम में आक्रोश है, जनमानस में और इन सभी क्षेत्रों में कहीं न कहीं अमेरीकी दखल है। और तिब्बत कुछ ऐसे देशों के नाम हैं जहां अशांति की सबसे ज्यादा सुगबुगाहट सुनाई दे रही है। एक तरफ इजराइल-ईरान भिड़ने को तैयार हैं और अप्रैल या जून में युद्ध की बात कही जा रही है। सीरिया की तपिश भी थमने का नाम नहीं ले रही है। मिस्र में लोकतंत्र की बहाली के बावजूद हालात इतने तनावपूर्ण हैं कि फुटबाॅल मैच के बहाने लोग एक-दूसरे पर हमला कर बैठे। इराक से अमेरिका ने बाॅय-बाॅय कर दी है, लेकिन वहां से भी आए दिन धमाकों की खबरें आ रही हैं। इराक और अफगानिस्तान दोनों देशों में अमेरिका ने हिंसक युद्ध के दम पर जीत तो हासिल कर ली लेकिन शांति स्थापना अभी दूर की कौड़ी दिख रही है। इधर सालों से अहिंसा के मार्ग पर चलकर आजादी की लड़ाई लड़ रहे तिब्बत के लोगों का धैर्य भी अब जवाब दे रहा है और तिब्बत से भी हिंसा और आत्मदाह की खबरें मिल रही हैं। और जिस आतंकवाद के दम पर पाकिस्तान पिछले कई दशकों से भारत के साथ कायरतापूर्ण हरकतें करता आ रहा था, वही आतंकवाद अब पाकिस्तान के सिर पर चढ़कर नाच रहा है। वहां की तथाकथित लोकतांत्रिक सरकार आतंकी सरगनाओं के हाथ की ऐसी कठपुतली बन कर रह गई है जिसका कोई भविष्य नहीं। पाकिस्तान इस समय अभूतपूर्व अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। माली हालत इतनी खराब हो चुकी है कि वहां की सेना ने इस बार सत्ता हथियाने का गोल्डन चांस हाथ से जाने दिया। क्योंकि फौज जानती थी कि वो लाख कोशिशों के बावजूद पाकिस्तानी खोखली अर्थव्यवस्था को नहीं संभाल पाएगी और आवाम को दो जून की रोटी नहीं मुहैया करा सकेगी। ऐसे में सारा ठीकरा अपने सिर फुड़वाने से अच्छा फौज ने बाहर बैठकर शासन चलाना बेहतर समझा।

कुल मिलाकर 2012 बड़े बदलावों के संकेत दे रहा है।

बदलाव के बादल इधर भारत पर भी मंडरा रहे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ देश में अभूतपूर्व जनजागरूकता है। बड़े-बड़े दिग्गज कानून की गिरफ्त में हैं। आला पदों पर बैठे सत्तानशीनों के माथे से पसीने टपक रहे हैं। भारत की शांति प्रियता और दूसरे देशों पर हमले की पहल न करने की नीति का लाभ आज प्रत्यक्ष नजर आ रहा है। इस नीति पर चलकर देश ने न केवल बेहतरीन आर्थिक विकास किया है बल्कि मुल्क में लोकतंत्र भी मजबूत हुआ है। वो बात दीगर है कि भ्रष्टाचार के दम पर अरबों-खरबों में खेलते जनसेवक दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का एक काला पक्ष है। लेकिन अन्ना हजारे, बाबा रामदेव और डाॅ. सब्रमण्यम स्वामी की तिकड़ी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक अनोखा सामाजिक युद्ध छेड़ रखा है। इस सामाजिक युद्ध में हार चाहे सरकार की हो या सामाजिक संगठनों की, लेकिन इसका परिणाम सिर्फ अच्छा ही होगा। क्योंकि जब तक इस सामाजिक युद्ध का फैसला होगा तब तक देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ गली-गली तक जागरुकता फैल जाएगी। और सरकार भले ही इन सामाजिक कार्यकर्ताओं को साम, दाम, दंड, भेद अपनाकर हरा दे, लेकिन इस देश की सरकारों को अब बदलना ही होगा। रही बात देश की शांति प्रियता की तो भारत का इतिहास है कि कभी हमने किसी देश पर हमले की पहल नहीं की। लेकिन हर हमले के लिए हमने खुद को तैयार कर रखा है। हाल में हुए विश्व के सबसे बड़े रक्षा सौदे में भारत ने 50 हजार करोड़ रुपए की मोटी रकम खर्च करके फ्रांस से 126 राफेल विमान खरीदे हैं जो अगले कुछ सालों में भारत को मिलेंगे। इस रक्षा सौदे पर विश्व के तमाम हथियारों के सौदागर भारत के सामने अपनी लार टपका रहे थे। लेकिन सौदा फ्रांस की झोली में गिरते ही अमेरिका और ब्रिटेन सरीखे देश हाथ मलते रह गए। इस सौदे के बाद भारत ने विश्व के सामरिक बाजार में अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज कराई है। पर हम अपनी नीतियों पर इसलिए ज्यादा खुश नहीं हो सकते क्योंकि इन्हीं नीतियों के चलते हम पाक अधिकृत कश्मीर, अक्साई चिन और अरुणाचल का काफी हिस्सा गंवा चुके हैं। जबकि 62 के युद्ध को भी हरगिज नहीं भुलाया जा सकता है।

फिर भी पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा है कि 2012 में बदलावों बयार भारत के पक्ष में बहने वाली है।

इसे आप अटल जी की सरकार वाला फील-गुड फैक्टर भी समझ सकते हैं। लेकिन ये ‘‘फीलिंग’’ काफी मजबूत है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कल ही कहा है कि पाकिस्तान अब कश्मीर के नाम पर युद्ध नहीं झेल सकता। जबकि सच्चाई ये है कि पाकिस्तानी स्थिति इतनी नाजुक है कि वो इस समय अपने देश के अंदर का ही असंतोष नहीं झेल पा रहा है। अब वो अपनी आवाम को कश्मीर के नाम की अफीम नहीं सुंघा सकता। वहां की आवाम अब बेहतर जिंदगी चाहती है। पाकिस्तान में अमेरिका का बढ़ता दखल वहां की आवाम और कट्टरपंथियों को अब एक आंख नहीं सुहा रहा। जबकि अमेरिकी वहां से हटने को हरगिज तैयार नहीं और पाकिस्तान की जम्हूरियत वाॅशिंगटन से मिलने वाले डाॅलरों और अपनी जनता के बीच पिसने को मजबूर है। अफगानिस्तान और इराक में लगातार दो युद्ध लड़ने और उसके बाद दोनों देशों में अपनी सेना को युद्धक्षेत्र में बनाए रखने में अमेरिका को नुकसान भी बहुत हुआ है। और उसको पानी की तरह खरबों डाॅलर बहाने पड़ रहे हैं। जिसके चलते अमेरिका की आर्थिक स्थिति पर भी लगातार असर पड़ रहा है। ओबामा ने अमेरिकी आर्थिक नीतियों में कुछ फेरबदल जरूर किए लेकिन कोई करिश्माई निर्णय अभी तक सामने नहीं आया है। जबकि राष्ट्रपति पद के चुनाव जरूर सामने आ गए हैं। जिस तरह अमेरिका ईरान और पाकिस्तान में दखल दे रहा है, उसको देखते हुए अगर अमेरिका को एक और युद्ध लड़ना पड़ जाए तो क्या वो अपनी अर्थव्यवस्था को संभाले रख पाएगा और फिर इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?

आने वाला समय बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन वो किस तरह करवट बदलेगा ये किसी को नहीं पता।

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

आ रहा है 2012!



वर्ष 2012 आ रहा है। टीवी चैनल वालों ने जमकर तैयारी कर रखी है। बार और पब वाले भी चांदी कूटने के लिए तैयार बैठे हैं। केक कटेगा, सबको बंटेगा, गुब्बारे फूटेंगे, डांस, पार्टी, मस्ती वगैराह, वगैराह। लेकिन 2012 के बारे में कई भविष्यवाणियां भी जुड़ी हैं। इस साल की भीषणता को लेकर काफी भविष्यवाणियां हुई और उन पर काफी बहस भी। किसी ने कहा कि पानी वाली प्रलय होगी तो किसी ने कहा कि आसमान से शोले बरसेंगे। 2011 की अंतिम कुछ घटनाओं को देखा जाए तो अगले साल भीषण युद्ध के समीकरण जरूर बन रहे हैं, वो भी सबसे ज्यादा आबादी वाले दक्षिण एशिया में। लक्ष्य बनेंगे पाकिस्तान, अफगानिस्तान, अमेरिका, चीन और भारत। 2011 में भले ही अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को मारने में सफलता प्राप्त कर ली हो, लेकिन अभी भी अलकायदा के कई बड़े खिलाड़ी आतंक का कारखाना चला रहे हैं, जिनकी अमेरिका को तलाश है। इस तलाश में अमेरिका ने पाकिस्तान के तमाम नागरिकों की भी बलि ले ली, लेकिन बात तब और भी ज्यादा बिगड़ गई जब अमेरिकी हमले में 28 पाकिस्तानी सैनिक काल के गाल में समा गए। अमेरिका कहता है कि गलती से हुआ, लेकिन उससे इतना भी नहीं हुआ कि साॅरी बोल दे। ओबामा को दुख तो हुआ, लेकिन साॅरी कहने में उनकी जुबान पथरा गई। बुरी तरह तिलमिलाए पाकिस्तान ने अमेरिका से एयरबेस खाली करने का फरमान जारी कर दिया और खूब खरी-खोटी सुनाई। पाकिस्तान के फौजी आका ने तो एक कदम आगे बढ़कर अपने सैनिकों को खुली आजादी दे दी कि अमेरिकी सैनिकों को मारने के लिए आदेश का इंतजार भी न करें। पाकिस्तानी कट्टरपंथ और आईएसआई तो पहले से ही अमेरिका से खार खाए बैठी थी, उनके लिए तो अब हालात असहनीय हो चुके हैं। संबंध खराब होते देख अमेरिका ने भी अपने टुकड़े डालने बंद कर दिए और 70 करोड़ डाॅलर की मदद रोक दी है। अब पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति तो किसी से छिपी नहीं है। अमेरिकी मदद के बिना कितने दिन कमर सीधी रख पाएगा कहा नहीं जा सकता। उस पर अपना ही बोया आतंक का बीज खुद उसको ही निगलने को तैयार बैठा है।

अमेरिकी-पाक रिश्ते सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं। अमेरिका को ओसामा के बाद अब जावाहिरी की खोज है, उसको पाए बिना वो मैदान छोड़ेगा नहीं। पाक को केवल अब चीन का ही सहारा है और चीन अमेरिका और भारत की आंखों की किरकिरी है। मोटे तौर पर देखा जाए तो युद्ध के लिए माकूल प्लेटफाॅर्म तैयार हो गया है। अगर ये युद्ध होता है तो अमेरिका के लिए ये अफगानिस्तान और इराक के बाद तीसरा युद्ध होगा। उधर ईरान भी अमेरिका पर आंखें तरेर रहा है। माना की अमेरिका बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन इतने सारे देशों से एक साथ पंगा लेकर उसने आफत मोल ले ली है। इराक और अफगानिस्तान में खरबों डाॅलर लुटाने के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था तीसरे युद्ध को किस हद तक झेल पाएगी कहा नहीं जा सकता। उधर आईएमएफ की ताजा चेतावनी में कहा गया है कि पूरा विश्व एक और आर्थिक महामंदी की ओर बढ़ रहा है, जिससे कोई भी देश अछूता नहीं रह पाएगा। लीबिया, सीरिया और मिस्र की अशांति भी कुछ कम घातक सिद्ध नहीं हुई। कुल मिलाकर 2012 की शुरुआत में विश्व के खतरनाक मोड़ पर खड़ा हुआ है।

भारतीय उपमहाद्वीप में अगर युद्ध छिड़ता है तो भारत भी अछूता नहीं रहेगा। परोक्ष या अपरोक्ष किसी न किसी रूप से भारत को इसमें भागीदारी करनी होगी। पड़ोसी देश पाकिस्तान में आजादी के बाद से लोकतंत्र मजबूत रह ही नहीं पाया। लोकशाही पर फौज और कट्टरपंथ का वर्चस्व हमेशा रहा। वहां की राजनीति कश्मीर से ऊपर उठकर सोच ही नहीं पाई और हमेशा फौज और आईएसआई के दबाव में रही। खुदा न खास्ता अगर अमेरिका ने पाकिस्तान के खिलाफ सीधा युद्ध छेड़ दिया तो फिर पाकिस्तान जैसी कोई चीज नक्शे पर बचनी मुश्किल होगी, क्योंकि वहां लोकतंत्र टिक ही नहीं सकता। केवल फौज शासन कर सकती है, जिसे अमेरिका बर्दाश्त नहीं करेगा। तो 2012 में जिस बड़े उठा-पटक की बात कहीं जाती रही थी, उसके संकेत अभी से मिल रहे हैं। आगे आगे देखिए होता है क्या?

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

मौतों का हिसाब देना आसान है, पैसों का हिसाब देना बहुत मुश्किल...

फिर वही खून का मंजर, फिर वही अफरा-तफरी और फिर वही शब्दों के हेर-फेर.  आतंकी बनारस में एक बार फिर सफल रहे और हम एक बार फिर विफल हुए. एक बार फिर हमने खुद को झूठी तसल्ली दी. एक बार फिर हमने शब्दों के मल्हम लगाये.  

वो इतने सक्षम हैं हर बार सफल हो जाते हैं, हम इतने अक्षम हैं की हर बार विफल हो जाते हैं. वे इतने बेशर्म हैं कि बार बार अपनी हरकत दोहराते हैं और हम बेहया और बेशर्म दोनों हैं कि हर बार विफल होने के बावजूद बातें बनाते हैं. दिल्ली में बैठे लोगों को घटना का बड़ा दुःख है, लखनऊ में बैठे लोग इसे दिल्ली की विफलता बता रहे हैं, दिल्ली वाले कह रहे हैं कि हमने पहले ही आगाह कर दिया था. लेकिन फिर भी देश कि लोगों को ये समझ नहीं आता कि तुम साले न तो दिल्ली की जिम्मेदारी में आते हो और न लखनऊ की. तुम अपनी जिम्मेदारी खुद उठाओ, या फिर अपने माँ बाप से पूछो कि उन्होंने तुमको पैदा क्यों किया. क्या जरुरत थी तुमको इस दुनिया में लाने की. तुम्हारे माँ बाप ने तुमको अपने स्वार्थ के लिए पैदा किया तो फिर तुम सरकार की जिम्मेदारी कैसे हुए भला. अब मरो सालों कुत्ते-बिल्लियों की तरह.

तुम लोग आये दिन यूँ ही मरते रहते हो और दिल्ली वालों को दुखी होने के लिए वक़्त निकालना पड़ता है. बातों के परदे में चीज़ों को ढकने की कोशिश करने पड़ती है. बार बार आतंकियों को कायर कहकर पुकारना पड़ता है, इसके अलावा कोई शब्द मिल ही नहीं पा रहा है. कुछ नहीं तो ये कहकर अपनी खीज मिटाई जाती हैं कि देखो बनारस पर कोई असर नहीं पड़ा, बनारस अब भी वैसा ही है, वहां कि लोग कितने हिम्मती हैं, जिंदगी एक घंटे में ही पटरी पर लौट आई. खिसयानी बिल्ली खम्भा नोचे. तंत्र मंत्र के भरोसे २४ घंटे काट रही मीडिया को भी बढ़िया माल मिल जाता है. अब कुछ दिन बॉलीवुड कलाकारों की निजी जिंदगी में झाँकने की जरुरत नहीं पड़ेगी.  तो कुछ धर्मनिरपेक्ष लोगों को ये लगने लगता है कि देश का सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश की जा रही है. उन्हें मौतों का गम कम और सांप्रदायिक सौहार्द की चिंता ज्यादा सालती है. लेकिन बेचारे करें भी क्या बातें बनाने के अलावा कुछ किया भी नहीं जा सकता. आखिर बातें बनाने के अब मौके भी तो कम मिलते हैं. इसलिए कुछ कुछ समय के अन्तराल पर पब्लिक का मरना बड़ा जरुरी है. कितने सारे लोगों को बैठे बिठाये काम मिल जाता है.

इन खोखली बातों में कितना दम है, ये तो ज्यादातर लोगों को पता ही है. लेकिन ये झूठ का पुलिंदा हर बार काम आता है. हम इस पुलिंदे को हर वक़्त तैयार रखते हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि मौतों का ये कारवां रुकने वाला नहीं है. क्योंकि हम खुद नहीं चाहते कि ये कारवां रुके.  ये खुनी कारवां अगर रुक गया तो जनता दूसरी चीज़ों की तरफ ध्यान देने लगेगी. उसकी मांगें बढ़ने लगेंगी. इसलिए भलाई इसी में है कि जनता इन्हीं सब चीज़ों में उलझी रहे. मौतों का  हिसाब देना आसान है, पैसे का हिसाब देना बहुत मुश्किल....

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

क्या करके मानेगी ये ओछी राजनीति!

वामपंथियों ने थोड़ी नज़रें टेढ़ी कीं तो अब नक्सलियों को ममता दीदी के आंचल में जगह मिल गयी है. दीदी नक्सलियों को इतना ज्यादा पुचकार रही हैं कि पूछो मत, दीदी के दिल में रह-रह कर नक्सलियों के लिए ममता उमड़ रही है. वो भी इतनी की नक्सलियों को ममता की नयी छत्र-छाया मिलती नज़र आ रही है. 


जैसे सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है वैसे ही भारतीय नेताओं को केवल और केवल कुर्सी दिखती है. और इस कुर्सी के लिए देश, धर्म, जाति, परिवार, भाषा सबको दाव पर लगा देते हैं. ऐसा ही ममता दीदी के साथ भी है. उनको केवल बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी दिख रही है. इस कुर्सी की चाह उनके दिल में इतनी घर कर गयी है कि वो अपने सिद्धांतों से भी समझौता कर बैठी है. एक वो कर्मठ ममता थी जिसने कभी वामपंथियों से हार नहीं मानी और जिंदगी भर उनके खिलाफ लड़ती रही और एक ये ममता है जो कुर्सी की खातिर वामपंथियों के ही दूसरे रूप से हाथ मिलाने को तैयार है. ममता ने नक्सलियों के माथे पे लगे सब के सब खून माफ़ कर दिए हैं.


आखिर देश के लोग सही और गलत की पहचान कैसे करें. एक ओर ममता उस नक्सली नेता का समर्थन कर रही हैं जो छत्तीसगढ़ में ७० से ज्यादा सीआरपीऍफ़ जवानों की मौत का जिम्मेदार है. दूसरी ओर उसी सरकार के गृहमंत्री और प्रधानमंत्री नक्सलियों को देश के लिए बड़ा खतरा बता रहे हैं. देश की अवाम उलझन में है कि आखिर सही कौन है और गलत कौन. वैसे राजनीति तो यही चाहती है कि जनता उलझन में रहे, अँधेरे में रहे, गलत फहमी में रहे ताकि नेताओं की रोजी-रोटी चलती रहे.


अब तक इन नक्सलियों को बंगाल की वामपंथी सरकार दूध पिलाती रही. और जब इस नाग ने ज्यादा भयंकर रूप अख्तियार करके सरकार के लिए ही चुनौती खड़ी कर दी तो दूध की सप्लाई बंद कर दी गयी. सो अब नक्सलियों को ममता की छाँव मिल गयी है. वैसे ये सबकी समझ में अच्छी तरह से है कि ममता की ये दरियादिली केवल बंगाल में आने वाली चुनावों के चलते है. ममता जानती हैं कि केंद्र सरकार कितना भी प्रतिबन्ध क्यों न लगा ले लेकिन नक्सलियों को बंगाल के दबे, कुचले, पिछड़े वर्ग का भरपूर समर्थन है. शायद इसीलिए ममता की रैली में मेधा पाटकर, अरुंधती राय और आर्य समाज के भगवा चोले में खांटी वामपंथी स्वामी अग्निवेश भी नज़र आये.


एक बात का इतिहास गवाह है, जिसने भी हिंसक संगठनो को पाला-पोसा है अंत में वो खुद उस संगठन का शिकार बना है. चाहे वो अमेरिका हो, पाकिस्तान हो या फिर भारत के वामपंथी दल. जिन नक्सलियों का दीदी आज समर्थन कर रही है वही नक्सली एक दिन ममता के लिए खतरा बनेंगे. क्योंकि आसार ऐसे बन रहे हैं कि शायद ममता का सपना इस बार बंगाल में होने वाले चुनाव में पूरा हो जाये. मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता से ये नक्सली संभाले नहीं संभलेंगे.


कुल मिलाकर जनता को गुमराह किया जा रहा है. कुछ वैसे ही जैसे कश्मीर में किया गया. वहां के लोगों को आज़ादी का सपना दिखाकर. कश्मीर में आज जो भी हालात हैं उनके लिए अब्दुल्लाह परिवार पूरी तरह दोषी है. जिसने वहां की सत्ता की खातिर कश्मीरियों को जमकर गुमराह किया, अलगावादियों का समर्थन किया और आज परिणाम सामने हैं. मजेदार बात ये है कि वही अब्दुल्लाह परिवार कश्मीर में कुछ और बात करता है और दिल्ली में कुछ और. यही राजनीति का असली चेहरा है. इन सब चालों का शिकार भोली जनता बनती है. क्योंकि हिंसा में मरने वाले या तो सरकारी जवान होते हैं या फिर भोली अवाम. शर्म है ऐसी राजनीति पे.  

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

आखिर कैसी आज़ादी चाहते हैं कश्मीरी?

कश्मीर जल रहा है. लोग मरने पर आमादा हैं. वो आजादी चाहते हैं. केंद्र सरकार हैरान है, राज्य सरकार हैरान है, लेकिन इस बार शायद हैरान हैं अलगाववादी संगठन भी. आखिर कश्मीरियों के दिलों में उनके द्वारा भरे गए जहर ने इतना हिंसक रूप अचानक कैसे ले लिया. जिस खोखली आज़ादी के झूठे सपने अलगाववादियों ने उनको दिखाए थे वो सपने एक न एक दिन फूटेंगे ये तो उनको पता था, लेकिन ये नहीं पता था कि ऐसे भयंकर रूप में सामने आएंगे कि नौजवान अपनी जान की परवाह किये बगैर "भारत" के खिलाफ आग उगलेंगे. सच्चाई ये भी है कि ऊपरी तौर पर अलगाववादी संगठन भले ही हैरानी जता रहे हों, मन ही मन वे खुश हैं और भयभीत भी. खुश इसलिए कि इस बार की हिंसा से राज्य और केंद्र सरकार दोनों ही घुटनों पर आ गयी हैं. दोनों ही सरकारों की समझ नहीं आ रहा है कि इस बार की परिस्थिति से कैसे निबटा जाये. बयानबाजी के अलावा ज्यादा कुछ कर नहीं पा रही हैं. वैसे इससे ज्यादा भारतीय सरकारें कुछ कर भी नहीं पाती हैं. चाहे मामला नक्सलियों का हो या फिर कश्मीर का, हार्ड स्टैंड लेने में भारतीय सरकारें हमेशा से डरती रही हैं. यह रीढ़विहीन रवैया भारत के लिए सबसे नुकसानदायक साबित हुआ है.

कश्मीर में जो युवा आज जान देने पर आमादा हैं उन्होंने बचपन से लेकर जवानी तक का सफ़र हिंसा और केवल हिंसा के बीच बिताया है. उनके जेहन में बचपन से ही भरा जाता रहा कि कश्मीर भारत का गुलाम है. इसे आजाद कराना होगा. इन कोशिशों के विरुद्ध केंद्र और राज्य सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया. राज्य सरकार ने तो अन्दर खाने मदद ही की. फारूक अब्दुल्लाह तो स्वायत्ता की मांग हमेशा उठाते भी रहे. कश्मीरी जनता बुरी तरह कन्फ्यूज रही. चंद लोगों के प्रोपैगैंडा के चलते कश्मीरियों को पूरी तरह भ्रम हो गया कि आखिर उनका भला किसमें है. भारत के साथ रहने में, पाकिस्तान के साथ रहने में या फिर अलग देश के रूप में. इस बीच कश्मीरी पंडितों का सूपड़ा साफ़ करने का अभियान भी जारी रहा. दिन दहाड़े चुन चुन कर उनकी हत्याएं की गयीं. बस्तियों की बस्तियां साफ़ कर दी गयीं. बचेकुचे लोग जान बचाकर वहां से पलायन कर गए और अब भी देश की सरकारें चुप रहीं. पहले कश्मीरियों के जेहन में भरा गया कि पंडितों की वजह से वहां सारी प्रॉब्लम है. अब तो वहां पंडित भी नहीं, लेकिन अब वहां फ़ौज की वजह से प्रॉब्लम बताई जा रही है. थोड़े दिनों बाद वहां जम्मू और लद्दाख के लोगों की वजह से प्रॉब्लम होने लगेगी. पाकिस्तान की शह पर वहां घटिया खेल खेला जा रहा है. हूबहू पंजाब जैसा. 

आखिर जिस आज़ादी की बात वहां के लोग कर रहे हैं अगर वो आज़ादी उन्हें मिल भी गयी तो क्या कश्मीर की सूरत बदल जाएगी. जी नहीं. वो तथाकथित आज़ादी मिलने के बाद कश्मीर की हालत क्या होगी इस बात का अंदाज़ा शायद वहां किसी को नहीं है. बुनियादी सुविधाओं के लिए भी लोग तरस जायेंगे. जो पाकिस्तान उनका बड़ा हिमायती बन रहा है उसने यहाँ से गए मुसलमानों के साथ कैसा व्यव्हार किया ये सबके सामने है. आज भी उन लोगों को मुजाहिर कहकर बुलाया जाता है. पाक अधिकृत कश्मीर में वहां की अवाम को पाकिस्तान क्या मुहैया करा पा रहा है. कोई विकास कराने से तो गया वहां आतंकी कैंप चलवा रहा है. वहां के नौजवानों को रोजगार देने के बजाय उनको बरगलाकर आतंकी बना रहा है. क्या कश्मीरी लोग अपने बच्चों के लिए ऐसे ही भविष्य की खातिर आज़ादी की मांग कर रहे हैं. वास्तविकता ये है कि भारत से अलग होते ही कश्मीर भरभरा जायेगा. उसकी हालत बद से बदतर हो जाएगी. जो ऊँचाइयाँ कश्मीर आज भारत के साथ रहकर छू सकता है वो किसी और तरह से संभव नहीं है. बस जरूरत सोच को बदलने की है.

शनिवार, 22 मई 2010

ये कार्रवाई है या पुरस्कार

कल रात एनडीटीवी पर एक ब्रेकिंग न्यूज़ फ्लैश हुई-  "दंतेवाडा में नक्सली हमले के बाद पहली कार्रवाई"
स्क्रीन पर ये लाइन पढ़ के मैं मानो कूद ही पड़ा. लगा कि आज हमारी फोर्स ने कोई बड़ा काम कर दिया. लगा सरकार ने कोई बड़ा कदम उठा लिया. लगा नक्सली चूहों पर हमला कर दिया गया है. लेकिन खबर जैसे ही आगे बढ़ी सब कुछ फुस्स हो गया. जैसे कि खोदा पहाड़ निकली चुहिया. खबर ये थी कि हमले पर तैयार हुई रिपोर्ट के बाद आला सुरक्षा अफसरान के तब्दाले कर दिए गए हैं. देखा साहब कितनी बड़ी कार्रवाई है.

लेकिन सच पूछिए तो मुझे इस कार्रवाई में दंड की जगह पुरस्कार छिपा नज़र आ रहा है. नक्सली क्षेत्र से तबादला हो जाना किसी भी अफसर के लिए पुरस्कार की तरह ही हुआ ना. आखिर कौन चाहेगा मौत के मुंह में पड़ा रहना. तो हमारी काबिल सरकार ने कार्रवाई के नाम पर सभी अफसरों को पुरस्कृत कर दिया है.  वाह भई वाह सरकारी ढर्रा तेरे क्या कहने....

भारत तमाम मोर्चों पर लगातार अपने आपको कमजोर साबित कर रहा है. चाहे आतंकवाद हो, नाक्साल्वाद हो, पूर्वोत्तर हो, छीन द्वारा भारत की सीमाओं में अतिक्रमण हो या पाकिस्तान का दुस्साहस.  किसी देश के ७६ जवान मार दिए जाएँ और वो चुप है. दुश्मन कौन है कहाँ है कैसा है ये भी साफ़ साफ़ पता है. लेकिन हम दुश्मन के साथ दोस्ती करेंगे चाहे वो हमारे कितने भी जवान क्यों ना मार दे. हम बिना रीढ़ के देश हैं. हमारा कोई आत्मसम्मान नहीं. हम कठोर कदम नहीं उठाएंगे.

नक्सलियों को डरने की कोई जरूरत नहीं. वो भयमुक्त होकर हमारे जवानों के सर कलम करें. सरकार का उनके साथ मौन समर्थन रहेगा. वैसे भी अर्न्धाती राय जैसी बुद्धिजीवी भी नक्सलियों के साथ हैं. उनको डरने की कोई जरुरत नहीं है. वैसे हमारी सरकार ने तो न्यूटन का सिद्धात भी फेल कर दिया. वो जो चचा न्यूटन ने कहा था ना कि एवरी एक्शन हैज एन इक्युअल एंड अपोजिट रिएक्शन. एक बार चचा न्यूटन भारत सरकार से मिल लेते तो सारे सिद्धांत भूल जाते. ये ऐसी सरकार है जहाँ कोई कितना भी एक्शन कर ले सरकार की ओर से कोई रिएक्शन नहीं होता. - जय हो...

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

हर बार एक ही बात क्यों दोहराई जाती है?

मिस्टर पीसी,
खबर मिली है कि दंतेवाडा की घटना के बाद आप इस्तीफ़ा देना चाहते हैं. लेकिन प्रधानमंत्री ने आपका प्रस्ताव ठुकरा दिया है. अच्छी बात ये रही कि बीजेपी ने भी आपका समर्थन किया है और वो भी नहीं चाहती कि आप पद त्याग करें.

सच पूछिए तो देश के लोग भी नहीं चाहते की आप इस्तीफ़ा दें, क्योंकि लोग आप से पूर्ववर्ती गृह मंत्री की कार्यशैली देख चुके हैं. कम से कम आपके काम करने का तौर तरीका उनके जैसा नहीं है. आप की बात में काफी हद तक गंभीरता झलकती है. ये आपकी इमानदार स्वीकारोक्ति है कि इस जघन्य जनसंहार के लिए अंततः आप ही जिम्मेदार हैं. सो, इस समय आपका पद त्याग उचित नहीं.

लेकिन मिस्टर पीसी, आपको अब ये समझ लेना चाहिए कि लोग अब आजिज आ चुके हैं. आखिर कब तक हम भारतियों का खून पानी की तरह बहता रहेगा. जब जिसके मन में आता है हमारा खून बहा के चला जाता है. हद तो तब होती है जब लोगों के खून पर राजनीती होने लगती है.

अच्छा हाँ, आज आपके मंत्रालय ने देश के सभी प्रमुख अख़बारों में विज्ञापन दिया है. विज्ञापन कह रहा है "इनफ-इज-इनफ". आखिर ये विज्ञापन देकर आप साबित क्या करना चाहते हैं. ये बात जो इस विज्ञापन में कही गयी है वो हर बार कही जाती है. लेकिन कभी कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता. भावनात्मक भाषण देने से कोई काम बनने वाला नहीं है. सरकार को दृढ इच्छाशक्ति दिखानी होगी, ढुल-मुल रवैये से कुछ काम बन ने वाला नहीं है. इस देश के लोग सरकार इसीलिए चुनते हैं कि वह उनकी रक्षा करे. आप विज्ञापन देकर पता नहीं किस को क्या दिखाना चाहते हैं.

सरकार हर तरह से सक्षम है. इस हत्याकांड का बदला लेना बेहद जरूरी है. ये हमारी बदला न लेने की प्रवृत्ति ही है जिसका हम आज खामियाजा भुगत रहे हैं. अपनी अच्छी छवि बनाने के चक्कर में हम हर साल हजारों लोगों को खो रहे हैं. अगर गिन ने बैठ जाएँ तो गिनती ख़तम हो जाये, लेकिन जुल्म की दास्ताँ न ख़तम होगी. भारत इतना कमजोर तो कभी नहीं रहा.

आतंकियों ने हमारा हवाई जहाज हाई-जैक किया, हमने बदला नहीं लिया,
बांग्लादेशियों ने हमारे जवानों की ऑंखें निकल ली, हमने बदला नहीं लिया,
हमारी संसद की आबरू को तार तार कर दिया गया, हमने बदला नहीं लिया,
हमारे धार्मिक स्थलों को लहूलुहान कर दिया गया, हमने बदला नहीं लिया,
हमारी दिवाली काली कर दी गयी, हमने बदला नहीं लिया,
होटल ताज बर्बाद कर दिया गया, हमने बदला नहीं लिया,
अब हमारे ७६ जवान हमसे छीन लिए गए और हम अब भी चुप हैं....

मिस्टर पीसी, माना कि आप भले आदमी हैं, लेकिन ये भलाई अपने नागरिकों के लिए रखिये, आतताइयों के लिए नहीं. जब तक खून का बदला खून नहीं होगा, इस तरह की घटनाएँ रुकने वाली नहीं हैं. हमारी शांति प्रियता को अब हमारी कमजोरी और कायरता समझा जाने लगा है. इस छवि को जल्द से जल्द बदला जाये.

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

अबकी बार मार के देख....

भारत के बड़े लोकप्रिय प्रधानमंत्री हुए अटल बिहारी वाजपेयी. सत्ता में आने से पहले देश को उनसे जरुरत से ज्यादा उम्मीदें थीं. अपने कार्यकाल में उन्होंने एक बड़ा बढ़िया बयान दिया था- "पाकिस्तान हमारे सब्र का इम्तिहान न ले, सब्र का प्याला भर गया तो अंजाम अच्छा न होगा....". इस बयान में अपने देश की लाचारी साफ़-साफ़ झलकती है.  वो दिन था और आज का दिन है भारत का सब्र का प्याला आज तक नहीं भरा है. देश की आज़ादी से लेकर आज तक कितनी ही सरकारें आई और चली गयीं. लेकिन उनके सब्र का बांध भाकड़ा-नागल बाँध से भी मजबूत था. कभी नहीं टूटा. गाल पर तमाचे पर तमाचे खाए, आम जनता मरती रही, पिसती रही, लेकिन कभी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. कही वोट बैंक आड़े आया तो कभी ऊपरी दवाब. 

छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने  अब ऐसा थप्पड़ मारा है जो किसी भी गैरतमंद देश की सरकार की नींद तोड़ने के लिए काफी है. भारत सरकार के चेहरे पर इस थप्पड़ की पांचों उँगलियों के निशान साफ-साफ छप गए हैं. लेकिन हमको पूरा विश्वास है कि इससे सरकार रवैये पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. देश के गृह मंत्री रटा-रटाया बयान देंगे, जिसमें रीढ़ विहीन सरकार की लाचारी नज़र आएगी. आखिर हो भी क्यों न, जो लोग मरे हैं उनमें सरकारी कर्मचारी भले ही हों लेकिन कोई सरकार में बैठे दिग्गजों का नाते रिश्ते वाला नहीं है न. आम लोग मरे हैं, वो तो मरते ही रहते हैं. उनके मरने से सरकार के काम काज पर कोई फर्क नहीं पड़ता. ७६ मरे हैं, हमारे पास तो सवा सौ  करोड़ हैं.

इससे भी गैरत की बात ये है कि देश का एक तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग नक्सलियों, माओवादियों जैसे लोगों के साथ बातचीत  का पक्षधर है, उनको सही ठहरा रहा है और उनको मुख्या धरा में शामिल करने की बात करता है. इन बुद्धिजीविओं में तमाम बड़े मीडिया संस्थान, बड़े बड़े विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरान, दिग्गज लीडरान शामिल हैं. हमें यकीन है कि छत्तीसगढ़ में इतने बड़े हत्याकांड के बाद भी इन लोगों का समर्थन जारी रहेगा.

आखिर कब तक हम नम्र रुख अख्तियार करे रहेंगे. ऐसे संगठनों और उनके समर्थकों दोनों के खिलाफ अगर कठोर कदम नहीं उठाया गया तो हम इसी तरह के नरसंहार के साक्षी बनते रहेंगे. कम से कम हमें दूसरे देशों से ही कुछ सबक लेना चाहिए. हाल ही में हुए मॉस्को हमले में रूस के प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन जो बयान दिया उसके बाद आतंकी अपने बिलों में घुस गए होंगे. पुतिन ने कड़ा बयान देते हुए कहा कि- एक-एक आतंकी को गटर में से खींच- खींच कर नष्ट किया जायेगा. अमेरिका ने ९/११ हमले के बाद दुश्मन  को उसी के देश में जाकर नष्ट किया और आज भी वहां कब्ज़ा जमाये है. हम तो संसद पर हमला करवाकर भी चुप रहे, होटल ताज में नाक कटवाकर पाकिस्तान के साथ केवल कागज़ी खेल खेल रहे हैं.

हिंसा के खिलाफ इस तरह का नम्र रुख अपनाना न  तो शांति प्रियता है, न अहिंसात्मक उपदेश, ये तो भारत सरकार की केवल कायरता है और डरपोकपन है......  A BLOODY SHAME 

‘हनुमान अंश’ की सफलताः देशज कहानी की जीत

भारतीय सिनेमा में सफलता का पैमाना लंबे समय से बड़े बजट, बड़े सितारों, विदेशी लोकेशन और भव्य प्रचार से जोड़ा जाता रहा है। ऐसे समय में ‘हनुमान अं...