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मंगलवार, 3 नवंबर 2015

पंचायत चुनाव बनाम ग्राम स्वराज


इन दिनों जब पूरे देश का ध्यान बिहार के विधानसभा चुनाव और उनके परिणामों पर केंद्रित हैं, ठीक उसी वक्त उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों का जोर है। अभी एक दिन के लिए अपने गांव जाना हुआ तो वहां की दीवारों पर चस्पा पोस्टरों को देखकर आभास हुआ कि देश में किसी भी चीज की कमी हो सकती है पर नेताओं की कमी कभी नहीं होगी। ऐसी-ऐसी चुनावी बिसात बिछाई जा रही हैं कि अमित शाह और लालू यादव भी मात खा जाएं। ऐसी गोटियां फेंकी जा रही हैं कि पूरी कांग्रेस पार्टी भी पानी मांगने लगे। पिलखुन के नीचे बैठकर ऐसी रणनीति तैयार हो रही हैं जिनको सुनकर बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ शर्म खा जाएं। छोटे-छोटे गांवों में इतनी बड़ी-बड़ी राजनीति खेली जा रही है कि दिल्ली भी लजा जाए। गांव के इस चुनावी माहौल को देखकर अरस्तु के वाक्य पर यकीन होने लगता है- ‘मनुष्य एक जन्मजात राजनीतिक जीव है’। भारत में तो राजनीति रग-रग में बसी है। किसी को छेड़ना भर मात्र है और वो अपने अंदर का पूरा राजनीतिक शास्त्र उड़ेल कर रख देगा। अपने यहां नाई की दुकान से लेकर रेल की बोगी तक, चाय के खोखे से लेकर गांव की चैपाल तक, मंदिर-मस्जिद से लेकर विश्वविद्यालयों तक राजनीतिक शास्त्रार्थ करने के लिए पुरोधा हर वक्त मुफ्त में तैयार मिलते हैं।

परंतु गांधी जी ने जिस ग्राम स्वराज का सपना देखा और दिखाया था वह आज के ग्राम पंचायत चुनाव से कतई मेल नहीं खाता। गांधी जी यदि आज की ग्रामीण राजनीति देख लेते तो शायद पंचायत चुनाव की जगह गांव की जिम्मेदारी एक दरोगा के हवाले करने की सिफारिश करते। उत्तर प्रदेश के अंदर ग्राम पंचायत चुनाव में जीतने के लिए हर वो हथकंडा अपनाया जाता है जिसका नैतिकता के दायरे से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं। पूरे चुनाव के दौरान मांस-मदिरा और सुरा-सुंदरी का प्रचलन अपने उत्कर्ष पर रहता है। इससे भी बात न बने तो बंदूक की गोली अंतिम उपाय के तौर पर काम आती है। यकीन न आए तो जिस दिन से चुनाव घोषित हुए हैं उस दिन से लेकर परिणाम घोषित होने के बीच कितनी चुनावी हत्याएं और हमले हुए इनके आंकड़े आरटीआई से निकलवाकर देखे जा सकते हैं। चुनाव आयोग ने विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान होने वाली हिंसा पर तो काबू पा लिया है, लेकिन पंचायत चुनाव के मौसम में पूरे उत्तर प्रदेश में रंजिशन गोलीबारी और हत्याओं के मामलों में अब भी बेतहाशा वृद्धि दर्ज की जाती है।  

कई जगह पंचायत चुनाव ने ऐसी गहरी रंजिशों की नींव डाली हैं कि पीढि़यां उसका खामियाजा भुगत रही हैं। यूं तो सतत विकास के कारण भी गांव की सामाजिक समरसता प्रभावित हो चुकी है, लेकिन पंचायत चुनावों ने भी गांव के सामाजिक ताने-बाने को पूरी तरह तोड़-मरोड़ दिया है। किसी कवि कि कविता या हिंदी फिल्म में गांव की जो सुनहरी तस्वीर पेश की जाती है, गांव दरअसल ठीक उसके विपरीत हैं। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाज का सटीक चित्रण श्रीलाल शुक्ला के उपन्यास ‘राग दरबारी’ में ही देखने को मिलता है। देश के आर्थिक विकास के साथ जब से पंचायतों को मोटा धन मिलना शुरू हुआ है, तब से उत्तर प्रदेश में सभी पंचायती प्रतिनिधित्व वाले पद सिर्फ भ्रष्टाचार के गढ़ बन कर रह गए हैं। ग्राम प्रधान बनते ही गांव की उन्नति हो न हो पर उस व्यक्ति की उन्नति निश्चित है जो उस पद पर शोभायमान है।

हो सकता है इसी पंचायती राज व्यवस्था के कुछ सकारात्मक पहलू भी हों या फिर कुछ गांवों ने इसी व्यवस्था के तहत विकास किया हो। लेकिन मेरा निजी अनुभव यही कहता है कि उत्तर प्रदेश के अंदर पंचायती राज व्यवस्था अधिकांश गांवों के अंदर राजनीतिक सड़ांध पैदा कर रही है। ऐसी सड़ांध जो ग्रामीण जीवन के लिए एक अभिशाप से कम नहीं। पंचायतों में महिलाओं को जबरदस्त आरक्षण देकर हम दिल्ली में दो-चार महिला सरपंचों को सम्मानित कर महिला सशक्तिकरण का ढोल भले ही पीटें, लेकिन 99.99 प्रतिशत मामलों में महिला सरपंच अपने पति के आधीन होकर ही चलती हैं। सिर्फ कागजों पर विश्व को दिखाने भर के लिए इस प्रकार का महिला सशक्तिकरण क्या सचमुच देश और समाज के हित में होगा। महात्मा गांधी ने जरूर ग्राम स्वराज की परिकल्पना देश के समक्ष रखी थी, लेकिन हम अपने दिल पर हाथ रख कर बता दें कि क्या वर्तमान पंचायती राज व्यवस्था सचमुच गांव के हित में है। जहां ग्राम प्रधान और स्कूल प्रधानाचार्य मिलकर बच्चों का भोजन डकारने की मानसिकता रखते हों भला ऐसा पंचायती राज समाज के किस काम का?

अन्ना हजारे के गांव रालेगण सिद्धि और उनके प्रभाव वाले आसपास के कुछ गांवों में पंचायत चुनाव नहीं होते, बल्कि आम राय से निर्विरोध तरीके से पदों पर नियुक्ति की जाती है। और फिर अन्ना के दिए गए सूत्रों के अनुसार गांव का विकास किया जाता है, जिसमें शराब बंदी, बालिका शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, जननी सुरक्षा, शाकाहार, अहिंसक जीवन जैसे मूल्यों को आधार बनाया गया है। उन्होंने अपने गांव में एक ऐसा स्कूल भी खोला है जिसमें दूसरे स्कूलों में फेल हुए बालक-बालिकाओं को पढ़ाया जाता है। साथ ही उत्तम भोजन भी प्रदान किया जाता है। कुछ ऐसे ही मापदंडों पर यदि देश के अधिकांश गांव आगे बढ़ते हैं तब कहीं गांव में सुधार की शुरुआत होगी अन्यथा खानापूर्ति के लिए पंचायती राज व्यवस्था हम अपने कंधों पर ढोते रहेंगे। अंतिम बात, राजनीति जब राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ही हो तो बेहतर है, लेकिन जब ये आपके गांव और घर में घुसने लगे तो बेहद घातक सिद्ध होती है।

बुधवार, 13 मई 2015

चुनाव जो इतिहास रच गया (भाग-4): टूट गया मुस्लिम वोट बैंक का तिलिस्म

16वीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव के जब 16 मई 2014 को परिणाम सामने आए तो वे अविस्मरणीय और हतप्रभ करने वाले थे। 16 मई की तिथि इतिहास में इस तरह दर्ज हो गई कि जब-जब बदलाव पर चर्चा होगी तो इस तिथि का जिक्र आएगा। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार किसी गैर कांग्रेसी दल को बहुमत देकर भारतीय मतदाताओं ने अपने वोट की ताकत का अहसास करा दिया। मतदाताओं ने न केवल एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार दी बल्कि इन परिणामों के माध्यम से देश के राजनीतिज्ञों को कई छिपे हुए संदेश भी दे दिए। जिस सुंदर राष्ट्र का सपना सड़क से लेकर संविधान तक आम लोगों को दिखाया जाता रहा, अब जनता उसे हकीकत में तब्दील होते देखना चाहती है। इसी उम्मीद के साथ देश के जनमानस ने नरेंद्र मोदी में अपनी आस्था दिखाई और उनके हाथ में एक मजबूत सरकार की बागडोर सौंप दी। उस ऐतिहासिक चुनाव परिणाम की पहली वर्षगांठ पर एक पुनरावलोकलनः
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देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी ने 2014 की ऐतिहासिक करारी हार के कारणों को तलाशती रिपोर्ट तैयार करने के लिए अपने वरिष्ठ नेता एके एंटनी को जिम्मेदारी सौंपी। जैसा कि एंटनी की ईमानदार छवि है, उन्होंने उसी के अनुसार हार का एक ईमानदार विश्लेषण कांग्रेस आलाकमान के सामने रखा। उनकी रिपोर्ट में पार्टी की हार का जो प्रमुख कारण सामने आया वो था कांग्रेस द्वारा जरूरत से ज्यादा ‘माइनाॅरिटी पालिटिक्स’ का कार्ड खेलना। एंटनी पैनल को लगा कि कांग्रेस द्वारा बहुत ज्यादा ‘अल्पसंख्यकवाद’ को बढ़ावा देने के कारण देश के बहुसंख्यक समाज में कहीं न कहीं ये संदेश चला गया कि कांग्रेस हिंदू विरोधी है और इस कारण हिंदू वोट का भाजपा की तरफ जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ, जिसका कांग्रेस को भी अंदाजा नहीं था।

‘फूट डालो राज करो’
दरअसल, अंग्रेजों ने जिस ‘फूट डालो राज करो’ की नीति पर चलकर भारत पर राज किया, आजादी के बाद वही नीति हमारे राजनीतिज्ञों की भी पथ प्रदर्शक बनी। पार्टियों ने जातियों में बंटे हिंदू समाज को जाति के आधार पर और ज्यादा बांटा और अल्पसंख्यकों को एक ठोस वोट बैंक की तरह प्रयोग किया। अमूमन सभी राजनीतिक पार्टियां इस नीति का अनुसरण करती दिखीं। योजनाएं बनाने से लेकर नीतियां गढ़ने तक जाति और धर्म व जाति आधारित राजनीति को दिमाग में रखा गया। देश की आने वाली पीढि़यां राजनीतिक विज्ञान की किताबों में ये पढ़कर अपना माथा पीटा करेंगी कि भारतीय राजनीति में सत्ता हथियाने के लिए ‘अजगर’ (अहीर, जाट, गुर्जर, राजपूत) और ‘मजगर’ (मुस्लिम, अहीर, जाट, गुर्जर, राजपूत) जैसे समीकरणों का सहारा लिया गया।

एकजुट होता समाज
भारत की अधिकांश राजनीतिक पार्टियां यही मानकर चल रही थीं, कि जातियों में बंटा हिंदू समाज कभी संगठित होकर वोट कर ही नहीं सकता। जबकि अल्पसंख्यक समाज एक तरफा वोट डाल सकता है। कांग्रेस से लेकर कई क्षेत्रीय पार्टियों ने इस फाॅर्मूले का फायदा उठायाः ‘कुछ हिंदू जातियां + एकमुश्त अल्पसंख्यक वोट = जीत’। मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी ने इसी फाॅर्मूले के दम पर कई बार यूपी की सत्ता पर कब्जा किया। जबकि मायावती की बहुजन समाज पार्टी द्वारा दलितों को अपना ठोस वोट बैंक बना कर, बड़ी संख्या में मुस्लिमों को टिकट बांटना इसी रणनीति का हिस्सा है। जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एकजुट हिंदू समाज की बात करता है तो इसके पीछे भी कहीं न कहीं इस एकजुटता को सत्ता की चाभी में तब्दील करने की दूरगामी दृष्टि है, जिसकी एक बानगी 2014 के लोकसभा चुनाव में नजर आई। उत्तर प्रदेश में मोदीमय भाजपा के पक्ष में ऐसा जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ कि ऐसे-ऐसे लोग सांसद बनकर दिल्ली पहुंच गए जिनके सपने में भी जीत के आसार नहीं थे। ध्रुवीकरण का असर इतना गहरा था कि कि बसपा का परंपरागत दलित वोट भी उससे छिटक गया। 

फेल हुआ फाॅर्मूला
2014 लोकसभा चुनाव परिणामों की विशेषता यह भी रही कि इस बार जीत का ये परंपरागत फाॅर्मूला पार्टियों के काम नहीं आया। ‘जिधर हम हैं, उधर जीत है’ की बात कहकर ताल ठोकने वाले उत्तर प्रदेश के मुस्लिम समुदाय ने 2014 के चुनाव में हर कोण से सोच कर देखा लेकिन कहीं जीत बनती नहीं दिखी। पहली बार हुआ कि यूपी में मुस्लिम वोट भी सपा, कांग्रेस और बसपा के बीच जमकर बंटा। एमआईएम के अध्यक्ष ओवैसी ने एक इंटरव्यू में तंज कसते हुए कहा कि ‘मैं मोदी को इस चीज के लिए बधाई देना चाहता हूं कि उन्होंने मुस्लिम वोट बैंक के मिथक को तोड़ दिया’।

सबका साथ
भाजपा पर भी हिंदूवादी साम्प्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगता रहा है। भाजपा विरोधी पार्टियां साम्प्रदायिकता का हौवा दिखाकर लोगों को डाराने का भी काम करती आई हैं। अयोध्या के राम मंदिर मुद्दे को भाजपा ने जिस तरह से गर्माया उससे इन आरोपों में दम भी दिखाई दिया। लेकिन वही भाजपा जब सत्ता में आई तो सबको साथ लेकर चलने में ही उसे देश की भलाई लगी। भाजपा ने अयोध्या को अपने एजेंडे में रखकर काशी और मथुरा का मुद्दा छोड़ने में देर नहीं लगाई। पहली एनडीए सरकार में भाजपा के पास पूर्ण बहुमत नहीं था, इसलिए सबकी बात करना प्रधानमंत्री वाजपेयी की मजबूरी कहा जा सकता है, लेकिन वर्तमान सरकार में भाजपा के पास पूर्ण बहुमत है फिर भी प्रधानमंत्री मोदी ने ‘सबका साथ और सबके विकास’ की राह पर चलने का प्रण दोहराया। इसलिए मजबूरी न पहले थी न अब है, बल्कि यही भारत की मूल संस्कृति है जो इस देश को हमेशा ये संदेश देती आई हैः 
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्रणिपश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भाग भवेत्।।
(End of Series)

मंगलवार, 12 मई 2015

चुनाव जो इतिहास रच गया (भाग-3): परिणामों ने पलट दी राजनीति की तस्वीर

2014 के चुनाव उपरांत भाजपा की सरकार बनेगी ऐसा विश्वास तो पार्टी के भीतर था, लेकिन अकेले अपने दम पर बनेगी ये दिग्गज से दिग्गज भाजपाई भी नहीं सोच पा रहे थे। यही कारण था कि पार्टी आखिरी दम तक अपने सहयोगियों की संख्या बढ़ाने में लगी थी। गठबंधन के लिए बातचीत का दौर खुला हुआ था। लेकिन भारत के चुनावी इतिहास में सबसे लंबे चले चुनाव का जब 16 मई को परिणाम आया तो उसने भारतीय राजनीति की तस्वीर बदल कर रख दी। आजादी के 67 साल बाद पहली बार देश में किसी गैर कांग्रेसी दल को अकेले अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिल गया। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का दूर-दूर तक सूपड़ा साफ हो गया। कांग्रेस पार्टी किसी भी राज्य में दो अंकों में सीटें नहीं ला पाई और अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन करते हुए 44 सीटों पर सिमट गई। देश की जनता ने मिलीजुली सरकार की कमजोरियों और लाचारियों का एक झटके में इलाज कर दिया। क्षेत्रीय पार्टिंयों की ब्लैकमेलिंग पर एकाएक विराम लग गया। उठापटक के पुरोधाओं के चेहरे लटक गए और मजबूत राष्ट्र का सपना देखने वालों की आंखें छलक उठीं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की ऐतिहासिक जीत की गवाह बनकर 16 मई की तारीख देश के स्वर्णिम इतिहास में दर्ज हो गई। 2014 के चुनाव परिणाम की सबसे मजेदार बात ये है कि इनके आंकड़े इतने एक-तरफा थे कि इनको याद रखना किसी के लिए भी बेहद आसान है।

खिसियानी बिल्ली
भाजपा की ये ऐतिहासिक जीत न तो विपक्ष को हजम हो रही थी और न कुछ पत्रकार रूपी चुनाव विश्लेषकों को। जब कोई तर्क देते नहींे बना तो कहा गया कि भाजपा को सीटें भले ही 282 मिल गई हों, लेकिन उसका वोट शेयर महज 31.3 प्रतिशत है, जो उसे सबसे कम वोट पाकर बहुमत लाने वाली सरकार की श्रेणी में डालता है। पर अगर आंकड़ों को गहराई से विश्लेषण किया जाए तो भाजपा की स्थिति किसी भी दृष्टि से कमजोर नहीं लगती। भाजपा ने कुल लोकसभा सीटों में से केवल 428 पर ही अपने उम्मीदवार खड़े किए थे और इन सीटों का वोट शेयर 40 प्रतिशत बैठता है। भाजपा ने गुजरात में 60 प्रतिशत से ज्यादा वोट पाए। कुल 6 प्रदेशों और केंद्र शासित प्रदेशों में 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल गए। जबकि कुल 9 प्रदेशों और केंद्र शासित प्रदेशों में 40 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले और तीन राज्यों में 30 प्रतिशत से ज्यादा मत मिले।

यूपी ने दिखाया दम
सभी पोल पंडितों को हैरानी में डालते हुए भाजपा ने दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और गोवा में शत प्रतिशत सीटें जीतकर अनोखा इतिहास रचा। इसके अलावा मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश में भी ऐतिहासिक जीत दर्ज कराई। उत्तर प्रदेश में 80 में से 71 सीट जीतकर भाजपा ने ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया जो खुद उसके लिए भी तोड़ना अब मुश्किल होगा। उत्तर प्रदेश में भाजपा की जबरदस्त जीत के पीछे एक ऐसा माहौल खड़ा था, जो अब शायद की कभी मिले। उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत में जो फाॅर्मूला काम किया उसे ऐसे लिखा जा सकता है- 

"केंद्र सरकार के खिलाफ लहर+राज्य सरकार के खिलाफ गुस्सा+नरेंद्र मोदी लहर+मुजफ्फरनगर दंगों का दंश = भाजपा की ऐतिहासिक जीत"

ये भाजपा के पक्ष में एक ऐसा ब्लेंड था जो आगे कभी नहीं मिलेगा और भाजपा का भविष्य में 71 सीटें जीत पाना बेहद मुश्किल है। 

अन्य राज्य
उधर मध्य प्रदेश में 29 में से 27 सीट जीतकर भाजपा ने अपना परचम लहरा दिया। जो दो सीटें कांग्रेस के खाते में गईं उनमें ज्योतिरादित्य सिंधिया की ग्वालियर सीट और कमलनाथ की छिंदवाड़ा सीट शामिल है। राजघराने से जुड़े सिंधिया की जीत तो समझ आती है, लेकिन जबरदस्त मोदी लहर के बीच कमलनाथ का अपनी सीट निकाल पाना काबिले तारीफ है। जबकि छत्तीसगढ़ में भाजपा ने 11 में से 10 सीटें जीतीं, जो एक दुर्ग सीट पार्टी हारी उसके पीछे भी कहा जा रहा है कि पार्टी के स्थानीय नेतृत्व ने इसे जानबूझकर हारा। जम्मू कश्मीर जैसे सेंसिटिव राज्य में भी पार्टी ने छह में से तीन सीट जीतकर सबको हैरत में डाल दिया। जम्मू कश्मीर से अब्दुल्ला परिवार का पूरी तरह सफाया हो गया। इधर बिहार में भाजपा ने भले ही 40 में से 22 सीटें जीती हों, पर उसका वोट शेयर महज 29.9 प्रतिशत ही रहा। आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को इस तरफ ध्यान देना होगा। जबकि कर्नाटक में भाजपा ने 28 में से 17 सीटें जीतकर मजबूत वापसी की और 43.4 प्रतिशत मत प्राप्त किए।

कहां हुई दुर्गति
जिन बड़े राज्यों में पार्टी की दुर्गति हुई उनमें दक्षिण और पूर्व के राज्य शामिल हैं। केरल में बिना खाता खोले पार्टी को 10.5 प्रतिशत मत मिले। तमिलनाडु में 5.5 प्रतिशत मत पाकर एक सीट जीती जबकि एक सीट सहयोगी पीएमके ने। जबकि जयललिता की अन्नाद्रमुक ने 37 सीटों पर जबरदस्त सीट दर्ज की। भ्रष्टाचार के चलते कानूनी चंगुल में फंसा करुणानिधि परिवार को सिफर पर धूल चाटनी पड़ी। उड़ीशा में 21 में से 20 सीटों में नवीन पटनायक की बीजद ने शानदार जीत दर्ज कराई, लेकिन एक सीट जीतकर भी भाजपा को राज्य में 21.9 प्रतिशत मत मिले जो पार्टी के लिए एक अच्छा संकेत हो सकता है। पश्चिम बंगाल में 42 में से 34 सीटें जीतकर ममता दीदी ने अपना दबदबा कायम रखा, जबकि भाजपा ने अपने वोट शेयर में दस प्रतिशत का इजाफा करते हुए 17 प्रतिशत मतों के साथ दो सीटें जीतीं। बंगाल में सीपीआईएम के वोट शेयर में जबरदस्त कमी आई, जो ये संकेत देता है कि वहां का वोटर विकल्प की तलाश में है। आंध्र प्रदेश में भाजपा टीडीपी के साथ गठबंधन में थी और दोनों ने मिलकर 25 में से 17 सीटें जीतीं, लेकिन दो सीटों पर सिमटी भाजपा के लिए आंध्र में स्थिति कुछ बहुत अच्छी नहीं है। जबकि हाल में अलग हुए तेलंगाना में भी पार्टी कोई विशेष उपलब्धि दर्ज नहीं करा पाई। 

भाजपा की कमजोर नस
भाजपा भले ही एक राष्ट्रीय पार्टी हो, लेकिन केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तलंगाना, पश्चिम बंगाल और उड़ीशा में उसकी स्थिति कमजोर है। पंजाब में अकाली दल के बिना पार्टी अभी तक कुछ खास नहीं कर पाई है। जबकि पर्वोत्तर राज्यों में अरुणाचल और आसाम में पार्टी अगली बार राज्य सरकार बनाने की स्थिति में लग रही है, किंतु मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम में पार्टी बेहद कमजोर है। केंद्र शासित राज्यों की बात करें तो एक लक्षद्वीप ही है जहां भाजपा के लिए निकट भविष्य में कोई संभावना नजर नहीं आती।
(To be continued....)

सोमवार, 11 मई 2015

चुनाव जो इतिहास रच गया (भाग-2): मोदी ने ठोका हर विवाद पर छक्का


16वीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव के जब 16 मई 2014 को परिणाम सामने आए तो वे अविस्मरणीय और हतप्रभ करने वाले थे। 16 मई की तिथि इतिहास में इस तरह दर्ज हो गई कि जब-जब बदलाव पर चर्चा होगी तो इस तिथि का जिक्र आएगा। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार किसी गैर कांग्रेसी दल को बहुमत देकर भारतीय मतदाताओं ने अपने वोट की ताकत का अहसास करा दिया। मतदाताओं ने न केवल एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार दी बल्कि इन परिणामों के माध्यम से देश के राजनीतिज्ञों को कई छिपे हुए संदेश भी दे दिए। जिस सुंदर राष्ट्र का सपना सड़क से लेकर संविधान तक आम लोगों को दिखाया जाता रहा, अब जनता उसे हकीकत में तब्दील होते देखना चाहती है। इसी उम्मीद के साथ देश के जनमानस ने नरेंद्र मोदी में अपनी आस्था दिखाई और उनके हाथ में एक मजबूत सरकार की बागडोर सौंप दी। उस ऐतिहासिक चुनाव परिणाम की पहली वर्षगांठ पर एक पुनरावलोकलनः
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भाजपा नेता नरेंद्र मोदी कभी अपने कड़वे बोलों के लिए चर्चित रहते थे। 2009 के चुनाव में राहुल गांधी को जर्सी बछड़ा और सोनिया को जर्सी गाय कहकर वो मीडिया के निशाने पर आ गए थे। लेकिन वही मोदी जब 2014 के चुनावी मैदान में उतरे तो उनकी भाषा इतनी ज्यादा संयत थी कि 440 रैलियों में लंबे-लंबे भाषण देने के बावजूद उनकी जुबान ऐसी नहीं फिसली जिससे कोई विवाद खड़ा हो। राहुल गांधी के चुनावी करियर को तो उन्होंने केवल ‘शहजादे’ कह-कह कर ही हाशिए पर पहुंचा दिया। कुछ रैलियों में उनके भाषण में फैक्चुअल मिस्टेक जरूर हुईं, लेकिन वे ऐसी नहीं थीं कि उन पर विवाद खड़ा हो। उन गलतियों से ‘आज तक’ चैनल को अपने ‘सो साॅरी’ सीरीज का एक एपिसोड बनाने भर का मसाला मिला। पूरे चुनावी माहौल में मोदी विकास का माॅडल प्रस्तुत करते और कांग्रेस की खामियां गिनाते नजर आए। कहीं भी उन्होंने निजी हमले या कमर से नीचे वार नहीं किए और ये बात उनके पक्ष में जाती गई। चुनावी युद्ध पर गिद्ध की तरह नजरें गड़ाए बैठी मीडिया इसी फिराक में थी कि कब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार गलती करें और कब वो उस गलती का पोस्ट माॅर्टम करे, पर मोदी ने उस पद की पूरी गरिमा को बनाए रखा, जिसके वो उम्मीदवार थे।

चाय वाला तंज
भारतीय राजनीति का पढ़ा-लिखा चेहरा समझे जाने वाले मणिशंकर अय्यर को न जाने क्या हुआ कि उन्होंने 18 जनवरी 2014 कोई हुई एआईसीसी की मीटिंग में नरेंद्र मोदी के खिलाफ जहर उगलते हुए कह दिया कि- 21वीं शताब्दी में मोदी इस देश के प्रधानमंत्री कभी नहीं बन सकते, हां अगर वो चाय बेचना चाहें तो उसके लिए जगह का इंतजाम कर दिया जाएगा। दून स्कूल से पढ़े-बढ़े मणिशंकर का ये तंज उनकी पार्टी के लिए इतना भारी पड़ेगा ये उन्होंने सोचा नहीं होगा। भाजपा कार्यकर्ता सचमुच चाय की केतली लेकर एआईसीसी की मीटिंग में पहुंच गए और मीडिया ने जबरदस्त कवरेज दी। इसके बाद मोदी ने हर रैली में अपनी पहचान बतानी शुरू कर दी। मोदी ने ‘चाय वाले’ की छवि को पूरे चुनाव प्रचार में इतना ज्यादा भुनाया कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी मोदी की काबिलियत के कायल हो गए। इतना ही नहीं उन्होंने अपने नामांकन में चाय वालों को अपना अनुमोदक भी बनाया। मोदी ने हर मंच से अपनी पुरजोर आवाज में बार-बार लोगों को बताया- ‘मैंने चाय बेची है, देश नहीं बेचा’। इस स्ट्रैटेजी को अपनाकर भाजपा ने मोदी के पक्ष में माहौल बनाने में असरदार मदद की।

बड़ौदा की सेल्फी 
अपनी संसदीय सीट बड़ौदा में वोट डालने के बाद मोदी ने जब कमल के फूल के निशान के साथ मीडिया के सामने सेल्फी खींची तो उन्हें अच्छी तरह पता होगा कि ये आचार संहिता का उल्लंघन है, बात बढ़ सकती है। लेकिन यही मोदी चाहते थे। दरअसल 2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी की मीडिया में अधिकतम दिखने और चर्चित रहने की रणनीति साफ नजर आई। चाहे इसके लिए कोई छोटा-मोटा उल्लंखन ही क्यों न करना पड़े। सेल्फी लेने की पीछे उनकी यही मंशा थी। जैसे ही सेल्फी टीवी स्क्रीन पर दिखनी शुरू हुई, हंगामा खड़ा हो गया। चैनल और विपक्षी पार्टियां उल्लंघन-उल्लंघन चिल्लाने लगे। अपने चुनाव चिन्ह के साथ फोटो खिंचाना चुनाव आयोग की आचार संहिता का उल्लंघन जरूर था पर ये इतना बड़ा अपराध कतई नहीं था कि मतदाता को नागवार गुजरे। इसलिए इस विवाद का भाजपा के अभियान पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा, पर मीडिया में हुई चर्चा के कारण मोदी ने कम से कम दो दिन तक सभी चैनलों का एयर टाइम अपने पक्ष में मोड़ लिया।

वाराणसी रैली पर प्रतिबंध
वाराणसी के जिलाधिकारी और रिटर्निंग आॅफिसर प्रांजल यादव द्वारा सुरक्षा का हवाला देकर शहर के बेनियाबाग इलाके में नरेंद्र मोदी की प्रस्तावित रैली को इजाजत न देकर चुनावी माहौल में जबरदस्त उबाल ला दिया। भाजपा ने रैली की पूरी तैयारी कर ली थी, गुजरात की बहुत बड़ी टीम वाराणसी में डेरा डाले थी, कार्यकर्ताओं का जोश आसमान पर था, ऐसे में रैली की इजाजत न मिलने की खबर फैलते ही, मायूसी के साथ-साथ भावनात्मक उबाल भी देखने को मिला। जिलाधिकारी ने भले ही सुरक्षा और कानून व्यवस्था की बात कहकर रैली पर प्रतिबंध लगाया था, लेकिन आम लोग इस निर्णय के पीछे डीएम प्रांजल यादव और यूपी के मुखिया अखिलेश यादव के बीच यादव कनेक्शन की नजर से देखने लगे। खबरिया चैनलों पर इस प्रतिबंध का अलग-अलग एंगल से पोस्ट माॅर्टम होने लगा। एक बार फिर माहौल मोदी के पक्ष में जाता दिखा। मौका भांपकर भाजपा के रणनीतिज्ञों ने गर्म लोहे पर चोट की। नरेंद्र मोदी 8 मई को वाराणसी पहुंचे, पर रैली नहीं की, न माइक संभाला और न कोई बयान दिया। मोदी ने बस इतना किया कि वो बीएचयू गेट से अपनी गाड़ी में सवार होकर वाराणसी की सड़कों से गुजरते हुए भाजपा कार्यालय तक पहुंचे। पर ये कदम इतना छोटा नहीं था, जितना पढ़ने में लग रहा है। इस छोटे से सफर को तय करने में मोदी के काफिले को कई घंटे लगे। भारी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता और आम लोग उन्हें देखने के लिए सड़कों और घरों की छत पर निकल आए। मोदी खुद को एक ऐसी उम्मीदवार के तौर पर पेश करने में सफल रहे जिससे उसका बोलने का अधिकार छीना जा रहा है। मीडिया पल-पल की लाइव कवरेज दिखाता रहा और ये सब फिर एक बार नरेंद्र मोदी के पक्ष में चला गया।

दूरदर्शन का इंटरव्यू 
बिना बात के विवाद कैसे खड़ा किया जाता है ये मोदी के आखिरी मास्टर स्ट्रोक में देखा जा सकता है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने एक खास पैटर्न में सभी टीवी चैनलों को इंटरव्यू दिए। इंडिया टीवी की ’आपकी अदालत’ में रजत शर्मा को दिया गया इंटरव्यू तो लोगों में जबरदस्त हिट हुआ। चैनल ने इस इंटरव्यू को बार-बार दिखाकर खूब टीआरपी भी बटोरी। अंत में दूरदर्शन की बारी आई। वैसे तो चुनाव के दौरान दूरदर्शन चुनाव आयोग की आचार संहिता का सख्ती से पालन करता है, लेकिन फिर भी वह उस समय की यूपीए सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधीन था। किसी भी इंटरव्यू के बाद उसमें एडिटिंग होना एक स्वभाविक प्रक्रिया है। सभी चैनलों में ऐसा होता है, ये हर चैनल का विशेषाधिकार है। लेकिन डीडी न्यूज को नरेंद्र मोदी के इंटरव्यू में काट-छांट बहुत भारी पड़ गई। डीडी-न्यूज द्वारा गुजरात जाकर मुख्यमंत्री आवास पर लिए गए इस इंटरव्यू के प्रसारित होते ही भाजपा ने दूरदर्शन पर हल्ला बोल दिया। भाजपा ने आरोप लगाया कि चैनल ने यूपीए सरकार के दबाव में इंटरव्यू का सबसे महत्वपूर्ण भाग काट दिया है। ये आरोप कुछ हद तक ठीक भी था, क्योंकि मोदी का इटरव्यू प्रसारित करने से पहले दूरदर्शन के आला अधिकारियों से लेकर कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा उसे देखा गया था। पर चैनल की समय सीमा में बांधने के लिए इंटरव्यू को काटना भी जरूरी था। कहीं न कहीं से तो इंटरव्यू को काटा ही जाना था। पर भाजपा दूरदर्शन को कोई मौका नहीं देना चाहती थी। पार्टी ने बेहद आक्रामक होकर दूरदर्शन पर आरोप लगाए। ये गुस्सा इसलिए भी था क्योंकि पूरे यूपीए काल में डीडी न्यूज ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का बायकाॅट करके रखा। गुजरात सरकार तो दूर वहां के विकास से जुड़ी खबरें भी बमुश्किल दिखाई गईं। पर मोदी ने एक ही मास्टर स्ट्रोक से दूरदर्शन से बदला भी ले लिया और अपना चुनावी मकसद भी पूरा कर लिया। ये मुद्दा कई दिनों तक मीडिया में छाया रहा, और मोदी को कवरेज मिलने का सिलसिला जारी रहा।

भाजपा की इस तरह की रणनीति का परिणाम ये निकला कि चुनाव प्रचार के दौरान चैनलों का अधिकांश एयर टाइम हो या अखबारों के फ्रंट पेज हर ओर मोदी ही मोदी छाए रहे। कोई दूसरा चेहरा चाहे वह अपनी पार्टी का हो या विपक्षी पार्टियों का, उनके आसपास भी नहीं भटका।
(To be continued...)

रविवार, 10 मई 2015

चुनाव जो इतिहास रच गया (भाग-1): चारों ओर नमो-नमो का शोर

16वीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव के जब 16 मई 2014 को परिणाम सामने आए तो वे अविस्मरणीय और हतप्रभ करने वाले थे। 16 मई की तिथि इतिहास में इस तरह दर्ज हो गई कि जब-जब बदलाव पर चर्चा होगी तो इस तिथि का जिक्र आएगा। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार किसी गैर कांग्रेसी दल को बहुमत देकर भारतीय मतदाताओं ने अपने वोट की ताकत का अहसास करा दिया। मतदाताओं ने न केवल एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार दी बल्कि इन परिणामों के माध्यम से देश के राजनीतिज्ञों को कई छिपे हुए संदेश भी दे दिए। जिस सुंदर राष्ट्र का सपना सड़क से लेकर संविधान तक आम लोगों को दिखाया जाता रहा, अब जनता उसे हकीकत में तब्दील होते देखना चाहती है। इसी उम्मीद के साथ देश के जनमानस ने नरेंद्र मोदी में अपनी आस्था दिखाई और उनके हाथ में एक मजबूत सरकार की बागडोर सौंप दी। उस ऐतिहासिक चुनाव परिणाम की पहली वर्षगांठ पर एक पुनरावलोकलनः
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ब भारतीय जनता पार्टी ने अपने वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की नाराजगी मोल लेकर 10 जून 2013 को नरेंद्र मोदी को 2014-लोकसभा चुनाव के लिए अपना प्रचार प्रमुख चुना था तब शायद किसी को ये अंदाजा नहीं रहा होगा कि मोदी पार्टी के लिए ऐसा प्रचार करेंगे जो न किसी ने कभी देखा होगा और न सुना। मोदी ने देश का ऐसा तूफानी दौरा किया कि 32,87,590 वर्ग किलोमीटर में फैला ये विशाल राष्ट्र उनके हौसले के सामने एक छोटा सा गांव नजर आया। चुनाव प्रचार के दौरान मोदी तीन लाख किलोमीटर से ज्यादा यात्रा कर कुल 440 रैली और 5827 अन्य कार्यक्रमों के सूत्रधार बने। भारत के चुनावी इतिहास में देश की जनता ने ऐसा जोशीला प्रचार कभी नहीं देखा था। चैनल से लेकर अखबारों तक, रेडियो से लेकर लाउडस्पीकरों तक, गली मोहल्लों से लेकर रैलियों तक, हर मोर्चे पर मोदी विपक्षी पार्टियों पर भारी और बहुत भारी पड़ते दिखे। चुनाव शुरू होने से पहले पोल पंडित ये तो कह रहे थे कि एनडीए की सरकार बनेगी, लेकिन कोई खुलकर ये कहने को तैयार नहीं था कि भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलेगा। लेकिन नौ चरणों का मतदान खत्म होते-होते कई सर्वे यह कहने को मजबूर हो गए कि भाजपा पूर्ण बहुमत से आ रही है।

चैनल बोले नमो-नमो
विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जहां धार्मिक विविधता सबसे ज्यादा है और शायद इसीलिए साम्प्रदायिक दंगे भारत में एक हकीकत हैं। ये दंगे न अंग्रेज रोक पाए और आजादी के बाद न कोई भारतीय सरकार रोक पाई। लेकिन भारतीय न्यूज चैनलों ने जितना पोस्ट माॅर्टम 2002 के गुजरात दंगों का किया और जितनी कीचड़ वहां के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर उछाली गई वैसा सुलूक भारतीय इतिहास में न तो किसी सरकार और न ही किसी नेता के साथ किया गया। यूपीए के दस साल के शासन में भारतीय न्यूज चैनल तकरीबन हर रोज गुजरात दंगों का जिक्र कर मोदी को नीचा दिखाने का कोई न कोई प्रयास करते दिखते थे। बात साम्प्रदायिकता की हो रही हो, तो उसे जबरदस्ती मोड़कर गुजरात ले जाया जाता था। पर 2014 के लोकसभा चुनाव आते-आते उसी मीडिया के सुर बदलने लगे। 2002 के दंगों को लेकर पिछले 12 सालों से हाथ-पांव धोकर नरेंद्र मोदी के पीछे पड़ी भारत की सबसे तेज मीडिया, मोदी रंग में रंगती चली गई। यकायक मीडिया ने मोदी के खिलाफ जहर उगलना बंद कर दिया और ‘तटस्थ’ खबरें दिखाने लगी। ब्रांड मोदी ने मीडिया को टीआरपी भी खूब दिलाई। बताने वाले ये भी कहते हैं कि कुछ बड़े उद्योगपतियों के माध्यम से कुछ बड़े मीडिया घरानों में पैसा लगवाया गया और विचारधारा विशेष के लिए काम कर रहे कुछ जहरीले पत्रकारों की छुट्टी का रास्ता साफ हुआ। दिल्ली के प्रेस क्लब में हल्के-हल्के सुरूर में कुछ खबरनवीस दिन के उजाले में ये कहते हुए दिख जाएंगे कि सभी सिद्धांतवादी, सत्यवादी और सुपर फास्ट न्यूज चैनलों ने मोदी को व्यापक कवरेज देने के एवज में भाजपा से ‘ठीकठाक’ दोहन भी किया। वह भी कुछ इस तरह कि पेड न्यूज का हंटर भी उनकी कमर पर न पड़े।

नारे जो जमकर चले
भाजपा के विजय अभियान में ‘अबकी बार मोदी सरकार’ ऐसा नारा रहा जो बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ गया। इस नारे को भ्रष्टाचार, अत्याचार, दुराचार, आम का अचार और न जाने किस-किस चीज के साथ जोड़कर लगाकर चलाया गया। ये नारा जमकर चला और ऐसा चला कि 16 मई को आए परिणामों में सच्चाई में तब्दील हो गया।

इसके अलावा जब मोदी समर्थकों ने वाराणसी में उनकी एक रैली में ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी’ का नारा लगाया तो ये भी लोगों ने हाथों-हाथ लिया। भगवान शिव के ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे से उधार लेकर बनाया गया ये नारा उस समय विवादों में घिर गया जब द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद ने इस पर आपत्ति दर्ज कराई। वैसे स्वामी स्वरूपानंद जी का कांग्रेस प्रेम और संघ से टकराहट जगजाहिर है, फिर भी खुद नरेंद्र मोदी को सामने आकर ये नारा न लगाने की अपील करनी पड़ी। 

इसके अलावा भाजपा के विज्ञापन ‘अच्छे दिन आने वाले हैं' की संगीतमय धुन इतनी सहज, कर्णप्रिय और उम्मीद जगाने वाली थी कि लोगों ने इसे हाथों हाथ लिया। पर पीएम बनने के बाद नरेंद्र मोदी को सबसे ज्यादा ताने, उलाहने ‘अच्छे दिन’ को लेकर ही सुनने पड़ रहे हैं।

हर वक्त कुछ नया करने की फिराक में रहने वाले नरेंद्र मोदी ने भाजपा का एंथम भी लांच किया। इस इलेक्शन एंथम में उन्होंने खुद अभिनय किया और अपनी आवाज भी दी। ‘मैं देश नहीं झुकने दूंगा’ के शब्द लोगों के बीच उतने चर्चित तो नहीं हो पाए, फिर भी नरेंद्र मोदी ने खुद इस गीत में अपनी आवाज देकर लोगों तक अपना संदेश पहुंचा दिया।

कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी
‘कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना’ किसे कहते हैं ये 2014 के भाजपा के प्रचार अभियान में देखा जा सकता है। चुनाव आते-आते ये बात लगभग साफ हो चुकी थी कि देश में जबरदस्त कांग्रेस विरोधी माहौल है और सत्ता बदलनी तय है। लेकिन मोदी इस माहौल को पूर्ण बहुमत में तब्दील करना चाहते थे। पर भाजपा के चुनावी इतिहास को देखते हुए पूर्ण बहुमत एक सपने जैसा ही था। इसलिए मोदी ने चाय पे चर्चा करने से लेकर थ्री-डी रैली तक, सेल्फी से लेकर सोशल मीडिया तक, हाई प्रोफाइल मंच से लेकर एलसीडी स्क्रीन तक हर वो माध्यम अपनाया जो जन-जन तक उनकी आवाज को पहुंचाए और तब तक पहुंचाए जब तक लोगों को ये विश्वास न हो जाए कि अगला पीएम बनने लायक अगर देश में कोई है तो वो हैं नरेंद्र मोदी। मोदी के इस हाई-टेक प्रचार अभियान के सामने सारे विपक्षी दल बेहद बौने नजर आए। हालांकि इस हाई टेक प्रचार में हुए खर्च पर उंगलियां उठती रहीं हैं।

रंग लाया ‘एक बूथ-एक बोलेरो’
मोदी की रैलियों में जबरदस्त भीड़ जुटाने के लिए ‘एक बूथ-एक बोलेरो’ का फाॅर्मूला खूब रंग लाया। मोदी ने देश भर में तकरीबन 440 रैलियों को संबोधित किया। इसके लिए भाजपा और संघ कार्यकर्ताओं को हर बूथ से कम से कम आठ लोगों को लाने की जिम्मेदारी दी गई थी। इसी फाॅर्मूले के दम पर मोदी की रैलियों में जनसैलाब देखने को मिला। मोदी खुद भी पूरी तैयारी के साथ हर रैली में पहुंचते थे। वे अपने हर भाषण में स्थानीय लोगों के साथ रिश्ता जोड़ने का प्रयास करते थे, स्थानीय समस्याओं पर चर्चा करते थे, जो लोगों के मन पर असर डालता था। भाषण में उस क्षेत्र के महापुरुषों का जिक्र करना भी मोदी नहीं भूलते थे। इससे लोगों में यह संदेश जाता था कि बंदे को हमारी समस्याओं के बारे में पता है। हर क्षेत्र की रैली में मोदी इसी तरह जनभावनाओं को समझकर अपने भाषण का मसौदा तैयार करके माइक संभालते थे।

एनआरआई योगदान
प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी जिस अप्रवासी भारतीय समुदाय की प्रशंसा करते नहीं थकते, उस समुदाय का भी चुनाव मोदी के प्रचार में कुछ कम योगदान नहीं रहा। विदेशों में बैठे भाजपा के सिम्पैथाइजर्स की एक बड़ी फौज कामधाम छोड़कर भारत पहुंची हुई थी और चुनाव प्रचार में सहयोग कर रही थी। कुछ लोगों ने वाॅल्यूंटीयर्स के समूह बनाकर इंटरनेट पर सोशल मीडिया और वेबसाइट्स पर भाजपा के समर्थन में माहौल बना रखा था। सोशल मीडिया पर भाजपा समर्थक अपने विरोधियों पर बहुत भारी पड़े। एनआरआई समुदाय ने भाजपा को चुनाव लड़ने के लिए चंदा भी जमकर दिया। यही सब कारण हैं कि पीएम मोदी अप्रवासी भारतीयों के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव रखते हैं और पीएम बनने के बाद उन्होंने अप्रवासी भारतीयों को नागरिकता और वीजा संबंधी बहुत सी सहूलियतें और रियायतें भी दी हैं। अप्रवासी भारतीयों में अपने देश के लिए कुछ करने की एक जबरदस्त भूख है। मोदी को अमेरिका द्वारा वीजा देने से इंकार करना अप्रवासी भारतीयों के बीच नाक का सवाल बन गया था। यही कारण है कि पीएम बनने के बाद मोदी के पहले अमरीकी दौरे पर अप्रवासी भारतीयों ने उनका एक हीरो की तरह स्वागत किया और मैडिसन स्क्वायर में एक अभूतपूर्व कार्यक्रम का आयोजन किया।
(To be continued...)

बुधवार, 1 अप्रैल 2015

बिहार चुनावः भाजपा सरकार या जनता परिवार


2014 के लोकसभा चुनाव से लेकर अक्टूबर 2015 में जब बिहार का चुनाव होगा तब तक पाटलिपुत्र की राजनैतिक परिस्थितियों में बहुत परिवर्तन आ चुका होगा। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न चुनाव के दौरान भी वही होगा और आज भी वही है कि सत्ता का स्वाद कौन चखेगा। क्या अपने करिश्माई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा बिहार में पूर्ण बहुमत हासिल करेगी, या फिर लालू-नीतीश की गलबहियां कोई रंग खिलाएंगी या कांग्रेस किंग मेकर बनकर उभरेगी, क्या आम आदमी पार्टी के मुखिया केजरीवाल (अपने स्टैंड, कि दिल्ली के बाहर अभी नहीं जाएंगे से यू टर्न लेकर) पार्टी के लिए बिहार के पानी में गहराई नापेंगे या फिर जीतन राम मांझी अपने राजनीतिक कौशल से नीतीश से अपने अपमान का बदला लेंगे? सवाल बहुत सारे हैं, मगर जवाब अभी किसी के पास नहीं। लेकिन अगर पिछले एक साल के दौरान हुए लोकसभा और विधानसभा चुनावों के आंकड़ों का जायजा लिया जाए तो अंदाजा जरूर लगाया जा सकता है कि बिहार का चुनाव किस करवट जा सकता है।

लोकसभा चुनाव 2014
2014 के लोकसभा चुनाव के परिणामों का विश्लेषण करें तो बिहार में भाजपा ने 40 में से कुल 30 सीटों पर चुनाव लड़ा और 30 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 22 सीटों पर विजय दर्ज कराई। जबकि उसके सहयोग से रामविलास पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी ने सात सीटों पर चुनाव लड़कर 6.5 प्रतिशत वोट शेयर के साथ छह सीटों पर जीत दर्ज कराई। भाजपा की दूसरी सहयोगी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने तीन सीटों पर चुनाव लड़ा और 3.1 प्रतिशत वोट पाकर तीनों सीटें जीत लीं।

वहीं बिहार के दूसरे धड़े पर नजर डालें तो लालू यादव की राजद ने 20.5 प्रतिशत वोट शेयर के साथ चार सीटें जीतीं। जबकि नीतीश की जनता दल यूनाइटेड ने 16 प्रतिशत वोट शेयर के साथ दो सीटों पर जीत दर्ज की। उधर सोनिया गांधी की कांग्रेस ने 8.6 प्रतिशत वोट पाकर दो सीटें जीतीं।

विधानसभा पर लोकसभा का असर
अब लोकसभा के इन परिणामों को विधानसभा वार परिवर्तित किया जाए तो भाजपा कुल 121 विधानसभा सीटों पर आगे थी और 49 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही, उसकी सहयोगी लोकजनशक्ति पार्टी 34 विधानसभा सीटों पर आगे थी और 7 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही और उसकी दूसरी सहयोगी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी 17 विधानसभा सीटों पर आगे रही और 1 सीट पर दूसरे स्थान पर। इनको जोड़ा जाए तो एनडीए कुल 172 सीटों पर आगे रहा और 57 सीटों पर दूसरे स्थान पर। बिहार विधानसभा में 243 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए 122 सीटों की जरूरत है, अगर लोकसभा चुनाव परिणामों को हूबहू विधानसभा पर लागू कर दिया जाए तो एनडीए बहुत आराम से सरकार बनाता नजर आ रहा है। लेकिन फिर वही बात है कि 2014 से लेकर 2015 तक पटना की गंगा में बहुत पानी बह चुका होगा।

यही लोकसभा परिणाम अगर भाजपा की विरोधी पार्टियों पर लागू किए जाएं तो राष्ट्रीय जनता दल 32 सीटों पर आगे रही और 110 सीटों पर दूसरे स्थान पर, जबकि जनता दल यूनाइटेड 18 सीटों पर आगे रही और 27 सीटों पर दूसरे स्थान पर और कांग्रेस 14 सीटों पर आगे रही और 44 सीटों पर दूसरे स्थान पर। इन तीनों को अगर जोड़ा जाए तो ये तीनों विरोधी दल 66 सीटों पर आगे रही और 181 सीटों पर दूसरे स्थान पर। इन आंकड़ों के अनुसार तो विरोधी दलों की सरकार बनना मुश्किल लगती है, लेकिन इस बार परिवर्तन ये आ गया है कि लालू और नीतीश एक हो गए हैं, लिहाजा उनका गठबंधन भाजपा के सामने कितनी बड़ी चुनौती पेश कर पाता है ये कहना मुश्किल है।

भाजपा और जनता परिवार की मुश्किलें
बिहार की राजनीति को सतही तौर पर देखा जाए तो मोटे तौर पर माहौल भाजपा के पक्ष में नजर आता है। लेकिन भाजपा की अच्छे बहुमत वाली जीत इसी बात पर निर्भर करेगी कि दिल्ली के विध्वंस के बाद पार्टी कितनी एकजुटता के साथ चुनाव लड़ती है। जनता परिवार तो भाजपा को चुनौती देने की कोशिश कर ही रहा है, लेकिन उसके सामने पहली चुनौती होगी लोजप और रालोप के साथ सीटों का बंटवारा। महाराष्ट्र जैसे अनुभव से बचने के लिए पार्टी की पहली कोशिश यही होनी चाहिए कि वह अपने दम पर बहुमत प्राप्त करे और बाद में दोनों सहयोगियों को भी सरकार में स्थान दे। पार्टी के लिए दूसरी चुनौती होगी कि वह अपना सीएम उम्मीदवार चुनाव से पहले घोषित करे या बाद में। हालांकि सुशील मोदी उर्फ सुमो अपनी जबरदस्त दावेदारी पेश करते रहे हैं, फिर भी यह निर्णय बेहद अहम है। भाजपा के सामने तीसरी चुनौती होगी टिकट बंटवारे के बाद बागियों से निपटना। ये बात भी ध्यान देने की है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने वोट डालते वक्त जाति की दीवारों को भी दरकिनार करके भाजपा के पक्ष में वोट दिया। लेकिन विधानसभा चुनावों में वैसा हो पाना बहुत मुश्किल है।

वहीं दूसरी ओर जनता परिवार के लिए उम्मीदें संजोए बैठे नीतीश कुमार की राह बिल्कुल आसान नहीं है। नीतीश द्वारा सालों पुराना गठबंधन तोड़ने के फैसले के बाद उन पर पीठ में छुरा भोंकने का बड़ा आरोप भाजपा लगाती रही है। चुनाव की घोषणा होते ही उनकी पार्टी पर टूटने का खतरा मंडरा रहा है। दूसरे, लालू का साथ कितना भरोसेमंद और कितना लंबा चलेगा यह कहना मुश्किल है। ऊपरी तौर पर जनता परिवार सत्ता के लिए इक्ट्ठे हुए मौका परस्त लोगों का समूह ही नजर आता है। उनमें लोगों के लिए गंभीरता कम और कुर्सी के लिए आतुरता ज्यादा नजर आती है, जहां साफ छवि वाले नीतीश कुमार फिर से बिहार की रण जीतने की खातिर भ्रष्टाचार में आरोपी लालू का भी साथ लेने को तैयार हैं और जेल काट रहे ओमप्रकाश चैटाला को भी। भाजपा अगर ये सब चीजें अगर बिहार के लोगों को समझाने में सफल रही तो जनता परिवार के सपने टूट सकते हैं।

‘आप’ और ‘हम’ का असर 
बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) और जीतन राम मांझी की हिंदुस्तान आवाम मोर्चा (हम) भी अपना दम आजमा सकते हैं। दिल्ली में बुरी तरह अंदरूनी कलह से जूझ रहे केजरीवाल ने यूं तो शपथ लेते वक्त दिल्ली के बाहर जाने की अनिच्छा प्रकट की थी, लेकिन बाद में खबरें आईं कि आप दिल्ली के बाहर भी चुनावी भाग्य आजमाएगी। दिल्ली में चमत्कार करने वाली आप बिहार में शायद ही कोई जादू कर पाए। पार्टी की वर्तमान अंदरूनी हालात देखकर तो लगता है कि पार्टी चुनाव लड़ने से भी इंकार कर सकती है। जबकि जीतन राम मांझी की ‘हम’ का एकमात्र उद्देश्य नीतीश कुमार से अपने अपमान का बदला लेना होगा। महादलितों के वोट विधानसभा सीटों में अहम किरदार अदा करते हैं, मांझी इस वोट को काट पाएंगे या नहीं चुनाव में ही पता चलेगा। भाजपा भी मांझी को अपने पक्ष में लेने का प्रयास कर सकती है।

अन्य राज्यों पर लोकसभा चुनाव का असर
लोकसभा चुनाव के बाद कुल पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें से भाजपा ने हरियाणा और झारखंड में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया। जबकि महाराष्ट्र और जम्मू कश्मीर में मिली जुली सरकार बनाने में सफलता मिली। लेकिन दिल्ली के विस्मयकारी परिणाम ऐसे रहे कि पार्टी को अभूतपूर्व हार का सामना करना पड़ा। नीचे चित्रों में दिया गया विश्लेषण ये बताने का प्रयास करता है कि लोकसभा चुनाव के अनुसार इन राज्यों की विधानसभाओं में कितनी सीटें अनुमानित की गई थीं और वास्तविक परिणाम क्या रहे। वैसे तो हर राज्य की परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं फिर भी बिहार के बारे में एक मोटा अंदाजा लगाया जा सकता है।

हरियाणा


झारखण्ड 


महाराष्ट्र 


जम्मू कश्मीर 


दिल्ली 

बिहार



मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

जनता का संदेश - जमीनी बन जाओ सब!



कई महान संतों की भविष्यवाणी है कि 21वीं सदी भारत की होगी। जिस तरह के बदलाव देश में दिख रहे हैं उसको देखते हुए ये लगने भी लगा है। दिल्ली में भाजपा की कड़ी शिकस्त और आप की शानदार जीत उसी श्रृंखला की एक कड़ी है जो नए भारत को गढ़ने जा रही है। दिल्ली की हार में भाजपा के लिए सबक ही सबक छिपे हैं। अपने नौ महीने के कार्यकाल में पहली बार भाजपा ने हार का मजा चखा है। भले ही पार्टी इस बात को न माने लेकिन लगातार मिल रही सफलताओं से भाजपा के अंदर अहंकार बढ़ रहा था। पार्टी के आला नेताओं का आम आदमी से जुड़ाव घट रहा था। ये परिणाम भाजपा के लिए खतरे की घंटी है कि अभी भी वक्त है जमीन पर उतरें वरना कुछ भी संभव है। जनता की अपेक्षाएं लगातार बढ़ रही हैं, वो अब सरकार को नौ महीने भी नहीं देना चाहती है। इसलिए शासन को काम में स्पीड दिखानी ही होगी।

भितराघात
माने या न माने पर भाजपा इस बार सबसे बड़े भितराघात से जूझ रही है। किरण बेदी के आ जाने से दिल्ली भाजपा के नेताओं ने जमीन पर काम करने से तकरीबन इंकार कर दिया था। अपने ही नेताओं ने पार्टी के खिलाफ प्रदर्शन किया। ऐसा लग रहा था मानो इस बार पार्टी कार्यकर्ताओं ने अपनी नेशनल लीडरशिप को सबक सिखाने का मन बना लिया था। अपने पिछले ब्लाॅग में मैंने खुद किरण बेदी को मुख्यमंत्री के तौर पर उतारने की वकालत की थी। लेकिन किरण बेदी को सीएम उम्मीदवार बनाना दिल्ली भाजपा को इतना बुरा लगेगा ये कभी नहीं सोचा था। मुझको लगा था कि थोड़े विरोध के बाद प्रदेश कार्यकारिणी किरण को अपना लेगी, पर ऐसा नहीं हुआ। पार्टी में एक धड़ा ऐसा था जिसने हर्षवर्धन के उठने के डर से किरण को लाने का समर्थन कर दिया, तो दूसरा धड़ा किरण के विरोध में काहिली पर उतर आया। हारकर मोदी कैबिनेट के मंत्रियों को जिम्मेदारी बांटी गई, पर उसका कोई परिणाम नहीं मिला। एक राष्ट्रीय पार्टी ने अपना पूरा धनबल, जनबल और अनुभवबल झोंक दिया, पर परिणाम ढाक के तीन पात की तरह विधानसभा की तीन सीट में मिला।

किरण का स्टाइल
उधर किरण बेदी का स्टाइल भी कुछ ठीक नहीं रहा। वो पहले दिन से खुद को सीएम उम्मीदवार के बजाय दिल्ली की सीएम की तरह कार्यकर्ताओं और लोगों से बात करती रहीं। टीवी डिबेट में भी वो अपना पक्ष ठीक से नहीं रखती पाई गईं। उनके इंटरव्यू सोशल मीडिया पर मजाक का पात्र बन गए। उनकी तुलना राहुल गांधी से की जाने लगी। ये बात तो समझ आती है कि राजनीतिज्ञ न होने के कारण उनके पास भाषण शैली नहीं है, पर तर्कों के स्तर पर भी खालीपन दिखा। अंततः पार्टी तो हारी ही खुद बेदी भी सबसे सुरक्षित सीट से हार गईं।

कमजोर पड़ी साइबर सेना
दिल्ली चुनाव में भाजपा की साइबर सेना भी कमजोर नजर आई। लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया पर मोदी और भाजपा के पक्ष में जबरदस्त जंग लड़ी जा रही थी। इस बार साइबर वीरों ने आप के आरोपों पर माकूल जवाब नहीं दिया। इसका मुख्य कारण है कि लोकसभा की जीत और फिर उसके बाद कुछ राज्यों में लगातार मिली सफलता के बाद भाजपा समर्थक कंफर्ट जोन में चले गए थे। दूसरे उन पर सोशल मीडिया पर ‘मोदी के अंध भक्त’ होने का आरोप भी बेड़ी तेजी से लगाया गया। तीसरे केंद्र सरकार बनने के बाद अधिकांश कार्यकर्ता खुद को कटा सा महसूस कर रहे हैं। यहां मैं उन लोगों की भी बात कर रहा हूं जो सक्रिय रूप से पार्टी में काम नहीं करते हैं। बल्कि भाजपा के सिम्पैथाइजर होने के नाते सोशल मीडिया पर पार्टी का पक्ष मजबूती के साथ रखते हैं, बहस करते हैं, विरोधियों को माकूल जवाब देते हैं। इसके लिए इन लोगों को पार्टी से कुछ मान्यता तो नहीं मिलती पर भक्त होने का आरोप जरूर झेलना पड़ता है।

नौ लखा सूट
जब हार के कारणों की बात चल ही रही है तो प्रधानमंत्री द्वारा ओबामा से मुलाकात के दौरान पहना गया नामांकित सूट की चर्चा नहीं छूट सकती। मीडिया ने इस सूट की कीमत नौ लाख रुपये आंकी है, जबकि कुछ लोगों का मानना है कि सूट की कीमत तकरीबन तीन लाख होगी। भले ही यह तर्क दिया जा रहा हो कि वह सूट जेड ब्लू कंपनी ने उपहार में दिया था। लेकिन ये प्रश्न तो उठता है कि जिस देश में हजारों गरीब नागरिक हर साल ठंड से मर जाते हों, क्या उस देश के प्रधानमंत्री इतने महंगे वस्त्र पहने चाहिए? प्रधानमंत्री मोदी के बारे में ये मशहूर होता जा रहा है कि वह एक जोड़ी कपड़ा एक ही बार पहनते हैं। हालांकि जिस विचारधारा से मोदी आते हैं वहां सादगी पर सबसे ज्यादा बल दिया जाता है। वह उस आरएसएस से जुड़े रहे हैं जहां एक धोती को दो दिन पहनने की तरकीब सिखाई जाती है। लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने खुद को चाय वाले से जोड़कर जो आम लोगों के दिलों में जगह बनाई थी, नौ लाख का सूट पहनने के बाद वह जगह जाती रही। ये बात समझनी जरूरी है कि भारत का संपन्न वर्ग बहुत छोटा है। अधिकांश संख्या मध्यम वर्ग और गरीबों की है और वह सादगी को ही पसंद करते हैं। भले ही प्रधानमंत्री मोदी अपने बहुत से निजी उपहारों को हर साल नीलाम कर धन को सामाजिक कार्यों के लिए दान दे देते हैं, फिर भी लोग फाइव स्टार कल्चर को नापसंद करते हैं। गांधी जी ने तो ये बात बहुत पहले ही समझ ली थी, इसीलिए उन्होंने सूट उतारकर धोती बांध ली थी और जन-जन के नेता बन गए। वही काम आज केजरीवाल कर रहे हैं, छोटी पैंट, सैंडल पर मोजे, छेद वाली जर्सी और मफलर पहनकर वो सीधे आम आदमी से जुड़ गए।

कड़वे बोल
भाजपा के लिए कुछ अनुषांगिक संगठनों के कड़वे बोल भी भारी पड़े। घर वापसी, चार-पांच बच्चे, योगी, साध्वी सबने मिलकर बयानों की झड़ी लगा दी। खुद प्रधानमंत्री को भी माफी मांगनी पड़ी। उनके कड़वे बोलों से हिंदू वोट बैंक पर तो कोई असर नहीं पड़ा पर मुस्लिम वोट बैंक लामबंद हो गया। इस बार दिल्ली में आप के पक्ष में मुस्लिम, निम्न वर्ग, मध्यम वर्ग, दलित, सरकारी कर्मचारी सबने मिलकर भाजपा को हराने का काम किया।

गणित नहीं अब भावना चलेगी
इस परिणाम में एक बात गौर करने वाली है कि भाजपा को 2013 में 26 लाख से ज्यादा वोट मिले और 2015 में 28 लाख से ज्यादा वोट मिले हैं। वोट शेयर 2013 में 33 फीसदी था और 2015 में ये 32 फीसदी है। इसका अर्थ ये हुआ कि पार्टी का वोट बैंक अपनी जगह इंटैक्ट है। पर कांग्रेस और बसपा को पूरा वोट बैंक आम आदमी पार्टी की तरफ शिफ्ट हो जाने से उनका वोट शेयर बढ़कर 54 फीसदी तक पहुंच गया और इतनी भारी जीत मिली। इन परिणामों में एक सीख ये भी है कि गणित लगाकर चुनाव लड़ने का जमाना गया, अब भावना का महत्व है। पार्टियां किस भावना और नीयत से चुनाव लड़ रही हैं इसका महत्व आने वाले समय में बढ़ेगा। मंच पर खड़े होकर बनावटी बातों से काम नहीं चलने वाला अब लोगों को विश्वास में लेना जरूरी होगा।

तुलना हो सकेगी
दिल्ली चुनाव से केंद्र में बैठी मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ा फायदा ये होगा कि अब उनकी किसी से तुलना हो सकेगी। अब तक तो मोदी की पाॅलिसियों और उनके स्टाइल की किसी से तुलना नहीं हो पा रही थी। प्रधानमंत्री मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद कई नए प्रयोग किए, कई तरह की नई पहल कीं, एक नए किस्म की व्यवस्था की शुरुआत की। इधर केजरीवाल भी नए-नए प्रयोग करने के लिए जाने जाते हैं। अब मीडिया और जनता दोनों नेताओं का तुलनात्मक अध्ययन कर सकेंगे और देश में आगे की राजनीति की दिशा तय होगी।

परिपक्व होता लोकतंत्र 
जनता द्वारा 2014 में सातों सांसद भाजपा की गोद में डालना और फिर नौ महीने बाद सारे विधायक आप की गोद में डालना भारत के परिपक्व होते लोकतंत्र की निशानी है। ऐसा उदाहरण कम ही देश में देखने को मिलेगा। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत की जनता कितनी जागरुक और परिपक्व है कि अपने लिए सही प्रधानमंत्री और सही मुख्यमंत्री के बीच चुनाव करना उसे अच्छी तरह आता है।

जमीनी बन जाओ
इस पूरे चुनावी प्रकरण में जनता ने अपने राजनेताओं को जो संदेश दिया है वो साफ है कि ‘हे भारत वर्ष के राजनीतिज्ञों जमीनी बन जाओ’।  जनता से कट कर अब राजनीति नहीं चलने वाली। जो लोग जनता के वोट से चुनाव जीतकर कैपिटलिस्ट और काॅरपोरेट हाउस की गोद में बैठ जाते हैं वे लोग अब आम लोगों की अवहेलना नहीं कर सकते। काॅरपोरेट भक्त नेताओं को भारतीय रेल से सबक लेना चाहिए। भारती की अधिकांश ट्रेनों में फस्र्ट एसी की बोगी एक ही होती है, ज्यादा डिब्बे स्लीपर और जनरल के ही होते हैं। रेलगाड़ी पूरे भारतीय समाज की तस्वीर है। नेताओं को स्लीपर और जनरल बोगी में सफर करने वाली जनता का ध्यान रखना होगा। फस्र्ट एसी में सफर करने वालों की संख्या उंगलियों पर गिनने लायक है, वो आपको धन तो मुहैया करा सकती है पर चुनाव नहीं जुटा सकती।

आप के लिए कठिन डगर
जितनी बड़ी जीत आप ने हासिल की है, उसको अब उतना ही डरना जरूरी है। आने वाला समय आप और केजरीवाल के लिए बहुत कठिन साबित होने वाला है। पार्टी ने जिस तरह के वादे अपने मैनिफेस्टो में किए हैं उनको पूरा करना बहुत बड़ी चुनौती है। वादों को पूरा करने में अगर-मगर किया या फिर नियम व शर्तें लगाईं तो जनता आप नेताओं की सड़क पर खबर लेगी। केजरीवाल ने पिछली बार बहुमत न होने की मजबूरी जताई थी, इस बार आप की आप है, इसलिए अब अगर कोई ड्रामेबाजी, धरनेबाजी या बहानेबाजी की गई तो मीडिया और जनता दोनों उनको नहीं छोड़ने वाली। और अगर केजरीवाल एक जनोन्मुख, विकासोन्मुख आदर्श शासन देने में सफल होते हैं तो समाज की इससे बड़ी भलाई नहीं हो सकती।

शनिवार, 27 दिसंबर 2014

चुनावों का देश बनता जा रहा भारत

लोकतंत्र और चुनाव एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं या कहें कि इनका चोली-दामन का साथ है। लेकिन देश में बार-बार चुनावी बुखार चढ़ना भी उचित नहीं हैं। भारत में किसी न किसी बहाने से चुनाव इतनी बार आते हैं कि इसे चुनावों का देश कहना गलत नहीं होगा। लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव एक साथ न होने की वजह से हर साल भारत में चुनावी मेला लगता है। बार-बार टीवी पर लोग भाषण, रैलियां, घोषणाएं, वादे, आरोप, प्रत्यारोप और राजनीतिक छीछालेदर देखते हैं। 

2014 को ही लें, मार्च, अप्रैल, मई में आम चुनाव हुए। इसके साथ में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उड़ीशा, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में भी चुनाव हुए। पूरा देश तकरीबन चार महीनों तक चुनावी बुखार की गिरफ्त मेें रहा। कुछ महीने भी नहीं बीते थे कि हरियाणा और महाराष्ट्र में चुनाव आ गए, फिर एक बार सियासी पारा चढ़ गया। अंत में साल जाते-जाते जम्मू-कश्मीर और झारखंड के विधानसभा चुनाव देश को राजनीतिक सरगर्मियों में ले गया।

अब आने वाले 2015 में अगर किसी राज्य में सरकार नहीं गिराई गई (या नहीं गिरी) तो दो बड़े चुनाव सूची में हैं- दिल्ली और बिहार। दिल्ली में चुनाव फरवरी और मार्च में होने की उम्मीद है, तो बिहार विधानसभा का कार्यकाल नवंबर में पूरा हो रहा है। इसके बाद फिर देश को 2016 में आसाम, केरल, पुद्दुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का सामना करना होगा। शायद ही कोई साल ऐसा हो जब देश में चुनाव मुंह बाय न खड़े हों।

अब लोकतांत्रिक देश है तो चुनाव तो होंगे ही। चुनाव से इंकार करने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है, पर प्रश्न ये है कि क्या बार-बार होने वाले चुनावी खर्च से बचने के लिए कोई रास्ता नहीं खोजा जा सकता। पाकिस्तान में पूरे देश के अंदर केंद्र और राज्य के चुनाव एक साथ होते हैं। पहले भारत में भी यही व्यवस्था थी, लेकिन राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता के कारण समयावधि बदलती चली गई। और आज ये स्थिति है कि देश हर साल ही नहीं, साल में कई-कई बार चुनाव कराने के लिए मजबूर है।

बार-बार होने वाले चुनावों के कारण केंद्र में बैठी सरकार को ठोस निर्णय लेने में बाधा आती है। देश में चुनावों के दौरान लोकलुभावन नीति अपनाने की परंपरा है, जिसके कारण राष्ट्रहित में कड़े फैसले लेने से केंद्र सरकार को डर लगता है। भारत में आम जनता की सोच अभी इतनी परिपक्व नहीं हुई है। यहां तो प्याज के बढ़े हुए दामों की वजह से भी पार्टियों को चुनाव हारने पड़ जाते हैं। 

इसलिए व्यापक राष्ट्रहित में ये जरूरी है कि देश केंद्र और राज्यों में चुनाव एक साथ हों। भाजपा ने इस मुद्दे को अपने एजेंडे में भी जगह प्रदान की थी, लेकिन फिलहाल इस दिशा में कोई पहल नहीं होती दिख रही है। केंद्र और राज्य में चुनाव एक-साथ कराने के लिए भले ही सहमति न बने या इसमें वक्त लगे, लेकिन कम से कम इतना तो किया जा सकता है कि किसी साल के भीतर होने वाले सभी चुनावों को एक-साथ क्लब करके एक साथ कराए जाएं। जैसे 2015 में दिल्ली और बिहार के चुनाव अलग-अलग महीनों में होंगे। इन दोनों चुनावों को साल के मध्य में एक साथ कराया जाए, इससे समय और धन दोनों की बचत होगी। ये व्यवस्था देने में कोई बहुत बड़ा पेच नहीं है, केवल राजनीतिक दलों के बीच आपसी सहमति बनाने की जरूरत है।

बार-बार चुनाव होने के कुछ फायदे भी हैं, खबरिया चैनलों को 24 घंटे चैनल चलाने के लिए भरपूर मसाला मिल जाता है, ओपीनियन पोल और एग्जिट पोल करने वाली सर्वे कंपनियों को चांदी कूटने का मौका मिल जाता है और चुनाव से जुड़े एक बड़े बाजार को बिजनेस मिल जाता है। पर बार-बार मचने वाले चुनावी शोर के बीच आम आदमी की समस्याएं और उसके मुद्दे कहीं दबते चले जाते हैं।

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

मोदी का अमेरिका दौरा और भारत से बढ़ती अपेक्षाएं


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे से पहले ऐसी खबरें आ रही हैं कि ओबामा इस मुलाकात में मोदी से इस्लामिक स्टेट के खिलाफ चल रहे युद्ध में मदद मांग सकते हैं। इसे अमेरिका की कमजोरी समझा जाए या फिर उसकी एक और चालाकी। अमेरिका का स्वार्थ के बारे में कहा जाता है कि जब वो आपके हित की बात करता है तो उसमें कहीं न कहीं उसका हित छिपा होता है। सो, भारत से मदद की गुहार लगाने के पीछे भी निश्चित तौर पर उसका अपना ही स्वार्थ होगा।

भारत से क्या मतलब 
सवाल ये उठता है कि भारत अमेरिका का साथ क्यों दे? ऐसा अमेरिका ने भारत का विश्वास जीतने के लिए क्या किया है कि भारत अमेरिका के लिए अपने सैनिकों का खून बहाए। 90 के दशक में भारत में लगातार आतंकवादी हमले बढ़े तो भारत ने वैश्विक मंचों पर खड़े होकर अपनी आवाज उठाई और पूरे विश्व को आतंक के खतरे के खिलाफ आगाह किया। लेकिन पश्चिमी ताकतों के कान पर जूं नहीं रेंगी। किसी भी देश ने खुलकर आतंकवाद के खिलाफ भारत का समर्थन नहीं किया। उन्होंने इन हमलों की निंदा तो की, लेकिन कभी भारत को विशेष मदद नहीं दी। यहां तक कि पाकिस्तान में चल रही आतंक की फैक्ट्रियों को भी पश्चिमी देश अनदेखा करते रहे। 

जब खुद को दर्द हुआ
आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की आंख तब खुली जब आतंकवादियों ने न्यू याॅर्क के वल्र्ड ट्रेड सेंटर को मिट्टी में मिला दिया। उस दिन अमेरिका को ये एहसास हुआ कि आतंकवाद का दर्द क्या होता है। तब जाकर उसने अल कायदा के खिलाफ निर्णायक युद्ध छेड़ा। 9/11 के बाद भारत में भी अनेक आतंकी हमले हुए, लेकिन भारत ने उन्हें अपने अकेले के दम पर झेला और मुकाबला किया। भारत कभी किसी देश के सामने मदद के लिए नहीं गिड़गिड़ाया। और आज अमेरिका उसी भारत से मदद चाहता है, जिसके दर्द को कभी वो समझता नहीं था।

नहीं मानना चाहिए प्रस्ताव
अगर ऐसा कोई भी प्रस्ताव अमेरिका की तरफ से भारत के समक्ष रखा जाए तो उसे कतई स्वीकार नहीं करना चाहिए। ये युद्ध अमेरिका के ही बोए हुए बीजों का परिणाम है, सो फसल भी उसे खुद ही काटनी होगी। एशियाई देशों में अशांति और आतंक फैलाने के लिए अमेरिका ने ही कई संगठनों को पाला-पोसा था और आज वही संगठन नया रूप धरकर अमेरिका के खिलाफ लामबंद हो गए हैं। तो भारत उसकी मदद क्यों करे? 

नहीं बन सका विजेता
क्षेत्रीय अशांति को बढ़ावा देना अमेरिका की पुरानी नीति है, जिसके दम पर वो दुनिया का चैधरी बना हुआ है। भारत और पाकिस्तान के बीच अशांति बढ़ाने में भी अमेरिका ने कोई कमी नहीं की। पर आज यही नीति उसके सामने सबसे बड़ा खतरा बनकर खड़ी है। अफगानिस्तान और इराक में युद्ध लड़ते-लड़ते अमेरिका की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। हजारों सैनिकों की जान गंवाकर और खरबों डाॅलर खर्च करने के बावजूद अमेरिका विजेता नहीं बन पाया है और उसके सिर पर आतंक का खतरा लगातार मंडरा रहा है। इसलिए अमेरिका चाहता है कि अपनी डगमगाती नैया में कुछ सवार और चढ़ा लिए जाएं। अमेरिका अपनी लड़ाई को पूरे विश्व की लड़ाई बनाना चाहता है। चालीस देश उसके साथ आ चुके हैं और उसे अब भारत का भी सहयोग चाहिए।

दक्षिण एशिया की शांति
जब पूरे विश्व में जगह-जगह से हिंसा की ज्वालाएं सुलग रही हैं, ऐसे में दक्षिण एशियाई क्षेत्र लंबे समय से शांति और तरक्की की राह पर चल रहा है, खासतौर से भारत, चीन और जापान की स्थिति अमेरिका की आंख की किरकिरी बना हुआ है। इसलिए अमेरिका भारत को भी इस युद्ध में खींचना चाहता है। भारत और अमेरिका की दोस्ती नए शिखर पर पहुंचे ये हर भारतीय भी चाहता है और अमरीकी भारतीय भी चाहता है। पर उचित यही रहेगा कि ये दोस्ती अमेरिका के युद्ध कुचक्र से दूर रहे।

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

कृष्ण और राम से सीखें जनता के साथ ‘पर्सनल टच’ रखना

मधुबन में गोपियों संग रचाया गया रास भगवान कृष्ण की जीवनी का महत्वपूर्ण अंग है। रासलीला के बिना श्री कृष्ण की लीला अधूरी है। रास एक विशेष प्रकार का नृत्य होता है, जिसमें एक नायक होता है जो अनेक नायिकाओं के संग घूम-घूम कर नृत्य करता है। श्री कृष्ण को रास में महारथ हासिल थी। कहा जाता है कि श्री कृष्ण एक घेरे में नृत्य कर रही गोपियों के संग इतनी तीव्र गति से नृत्य करते थे कि प्रत्येक गोपी को यही लगता था कि कृष्ण केवल उन्हीं के संग नृत्य कर रहे हैं किसी और गोपी के पास जा ही नहीं रहे। जबकि वास्तविकता में श्री कृष्ण की गति इतनी तेज होती थी कि हर गोपी को यही लगता था कि कन्हैया केवल उन्हीं के साथ नृत्य कर रहे हैं। 

इसी प्रकार रामायण में भी एक ऐसा प्रसंग आता है जब भगवान राम पल भर में अनेक लोगों का अभिवादन
स्वीकारते हैं। लंका विजय के बाद जब श्री राम पुष्पक विमान से अयोध्या नगरी में पधारते हैं तो हजारों अयोध्यावासी नम आंखों के साथ उनके स्वागत में खड़े मिले। यहां भगवान राम ने ऐसी लीला रचाई कि वो प्रत्येक नगर वासी के साथ निजी तौर पर मिले। श्री राम हर नगरवासी का एक-एक करके अभिवादन स्वीकार करते हैं, पर उनकी गति इतनी तेज है कि इस काम में उनको बहुत देर नहीं लगी। और हर नगर वासी इस बात को लेकर खुश और संतुष्ट दिखा कि राम ने बड़े प्यार से निजी तौर पर उनके हालचाल लिये।

कहने का भाव ये है कि संबंधों में ‘पर्सनल टच’ हमेशा आपको करीब लाता है। लेकिन भारत में चली आ रही लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में शासन और जनता के बीच ये ‘पर्सनल टच’ मिसिंग है। 67 साल से ये हालात हैं कि आम जनता सरकार के साथ खुद को जुड़ा हुआ महसूस नहीं करती। अबकी बार आम चुनाव में जब नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया के साथ-साथ पूरे देश में घूम-घूम कर सैकड़ों रैलियों को संबोधित किया तो लोगों ने खुद को उनसे जुड़ा हुआ महसूस किया और परिणाम सबके सामने है। जरूरत इस बात की है कि सत्ता में बैठने के बाद भी शासक जनता के साथ जुड़ाव बनाए रखे। सत्ता के कोलाहल में जनता की आवाज दबनी नहीं चाहिए। लेकिन लोकतांत्रिक दस्तूर ऐसा रहा है जिसमें सत्ता मिलने के बाद जनता को हाशिए पर डाल दिया जाता है और पांच साल बाद ही उसकी सुध आती है। 

हाल ही मोदी सरकार ने http://mygov.nic.in/ पोर्टल की शुरुआत करके आम लोगों से जुड़ने का एक अच्छा प्रयोग किया है, पर सवा सौ करोड़ के देश के लिए ये प्रयास अभी छोटा है इसे और वृहद आकार देने की जरूरत है। इस तरह के प्रयास राज्यों के स्तर पर शुरू होने जरूरी है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री कार्यालय टेक्नोलाॅजी के स्तर पर इतने सशक्त होने चाहिए कि देश के प्रत्येक जिले के प्रत्येक गांव में क्या घटित हो रहा है इसकी पल-पल की जानकारी वहां उपलब्ध रहे। अभी हो ये रहा है कि जिला प्रशासन भी सूचनाओं के लिए मीडिया पर निर्भर रहता है, पीएम और सीएम तो बहुत दूर की बात है। टेक्नोलाॅजी के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकारें आम जनता के साथ इस तरह का पर्सनल टच स्थापित कर सकती हैं। इसके अलावा राजधानी की सीमाओं से बाहर निकलकर निजी तौर पर लोगों के बीच दौरा करने के बार-बार कारण खोजना भी शासक को जनता के साथ जोड़ता है। लेकिन, ‘मेरा इस जगह से गहरा रिश्ता है और यहां आकर मुझे बेहद खुशी मिली’ जैसे रटे-रटाये परंपरागत भाषण देने से काम नहीं चलेगा। अब समय है कुछ नया करने का।

शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

पहले ही भाषण में दीवार गिरा दी मोदी ने!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लाल किले से पहला कैसा होगा, इसको लेकर मीडिया और लोगों के मन में तरह-तरह के कयास थे। और आज उनके पहले भाषण के साथ उन कयासों पर विराम लग गया। उनके पहले भाषण में कई विशेषताएं रहीं, उन पर तमाम चैनलों पर चर्चा शुरू हो चुकी है। लेकिन मुझे इस भाषण में आज तीन बातें खास लगीं, जो पूर्व प्रधानमंत्रियों में नहीं दिखीं।

गिर गई दीवार
प्रधानमंत्री मोदी के लाल किले से पहले भाषण में सबसे उल्लेखनीय बात ये रही कि सरकार और जनता के बीच खड़ी उस कांच की दीवार गिरा दिया गया जो दशकों से सुरक्षा के नाम पर प्रधानमंत्री और लोगों के बीच खड़ी कर दी जाती थी। देखने में ये बहुत सामान्य लगे लेकिन ये बहुत असामान्य घटना है। वह कांच की बुलेट प्रूफ दीवार आम लोगों के दिलों में एक असुरक्षा का भाव पैदा करती थी। बचपन में उस दीवार को देखकर यही भाव आते थे कि जब देश का प्रधानमंत्री ही सुरक्षित नहीं तो आम लोग खुद को कैसे सुरक्षित मान लें। वह दीवार हमारी सुरक्षा व्यवस्था पर एक प्रश्नचिन्ह थी, जिसे आज नरेंद्र मोदी ने हटा दिया। 

मुझे याद आता है कि इस दीवार को हटाने का प्रयास पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी किया था। जिस दिन वाजपेयी ने लाल किले से अपना पहला भाषण दिया था उसके अगले दिन अखबार में सूत्रों के हवाले से एक खबर आई थी कि उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों के समक्ष बुलेट प्रूफ केबिन हटाने की बात रखी थी। लेकिन सुरक्षा एजेंसियों ने प्रधानमंत्री की सुरक्षा में कोई भी जोखिम उठाने से इंकार करते हुए खुद प्रधानमंत्री की बात नहीं मानी। इससे नाराज वाजपेयी ने उस दिन नाश्ता नहीं किया और बुलेट प्रूफ केबिन से ही अपना भाषण दिया। सरकार और जनता के बीच की दीवार यूं ही खड़ी रही।

इस बार जब मोदी के प्रथम भाषण में बुलेट प्रूफ केबिन गायब दिखा तो हैरानी के साथ प्रसन्नता भी हुई। मोदी ने फिर एक बार अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय दिया, जिसके लिए वो जाने जाते हैं। उम्मीद है कि ये सिलसिला आगे भी जारी रहेगा और देश की सुरक्षा एजेंसियों में लोगों का विश्वास भी बढ़ेगा।

सिर पर राजस्थानी पगड़ी
भारतीय संस्कृति में सिर ढकने का एक विशेष महत्व रहा है। खास मौकों पर तो सिर को विशेषकर ढका जाता है। सिर ढकने का महत्व हर धर्म में माना गया है। हर धर्म में सिर ढकने के अपने-अपने तरीके हैं। हो न हो इसके पीछे कोई वैज्ञानिक आधार होगा। पुराने महापुरुषों के चित्रों को देखें तो ये स्पष्ट हो जाता है कि पहले सिर ढकने का कितना महत्व था। बालगंगाधर तिलक के चित्र को देखकर सोच होती है कि न जाने वो किस तरह अपनी पगड़ी बांधते होंगे। आज वैसी पगड़ी कहीं देखने को नहीं मिलती। भारत में तो हर राज्य की एक विशेष पगड़ी या टोपी होती है। लेकिन फैशन के इस दौर में पगडि़यों का महत्व धीरे-धीरे खत्म होता चला गया। लोगों को टोपी या पगड़ी सिर पर बोझ लगने लगी। यहां तक कि पंजाब में बड़ी संख्या में सिख युवा भी पगड़ी पहनने से परहेज कर रहे हैं। आजादी के बाद लंबे समय तक राजनेताओं की पहचान गांधी टोपी से की जाती थी, लेकिन अब वो भी विलुप्त हो चली है। ज्यादातर नेता अब नंगे सिर ही दिखते हैं।

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सेना और पुलिस के जवानों के बीच भी सिर पर विशेष पगड़ी पहनने की परंपरा है, पर लंबे समय से देश के प्रधानमंत्री बिना सिर ढके ही राष्ट्र को संबोधित करते आ रहे थे (हालाँकि इसमें डॉक्टर मनमोहन सिंह अपवाद हैं)। इस बार नरेंद्र मोदी ने राजस्थानी पगड़ी पहनकर एक अच्छी परंपरा शुरू की है। राजस्थानी पगड़ी शौर्य का प्रतीक है। उम्मीद है कि आने वाले सालों में वो अपने सिर पर अन्य राज्यों का भी प्रतिनिधित्व करेंगे।

छोटी-छोटी बातें
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पहले भाषण में साफ-सफाई, शौचालय, समय से आॅफिस आना, मेहनत से काम करने जैसे कुछ छोटे-छोटे मुद्दे उठाए। उन्होंने देश के माता-पिताओं से ये अपील भी करी कि वे जितनी लगाम अपनी बेटियों पर लगाते उतनी अगर अपने बेटों पर लगाएं ताकि देश को बलात्कार जैसी घिनौनी घटनाओं से शर्मिंदा न होना पड़े। देश के प्रधानमंत्री द्वारा इस तरह की अपील लोगों पर निश्चित तौर पर असर छोड़ती है। फिर ये उम्मीद की जा सकती है कि देश इन बातों को गंभीरता से लेगा। क्योंकि अकेली सरकार कभी बदलाव नहीं ला सकती, उसके साथ लोगों का खड़ा होना बहुत जरूरी है।

जय विज्ञान को भूले
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में लाल बहादुर शास्त्री को याद करते हुए उनके ‘जय जवान जय किसान’ नारे का जिक्र किया, लेकिन वो अटल बिहारी वाजपेयी के दिये ‘जय विज्ञान’ के नारे को भूल गए। ऐसा उन्होंने सोच समझकर किया या फिर यूं ही भूल गए, ये कहा नहीं जा सकता।

शनिवार, 12 जुलाई 2014

उनके लिए, जिन्हें सरदार की मूर्ति पर ऐतराज है!


आम बजट में सरदार वल्लभ भाई पटेल की मूर्ति के लिए 200 करोड़ रुपये का प्रावधान होने के बाद सोशल मीडिया पर एक वर्ग तरह-तरह के तर्क देकर स्टैचु आॅफ यूनिटी का लगातार विरोध कर रहा है। हालांकि हर किसी को समर्थन और विरोध का निजी अधिकार है और इस अधिकार को छीना नहीं जा सकता। फिर भी कई बार विरोध केवल इसलिए भी किया जाता है कि आपको विरोध करना ही है। सो, जिन लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से विरोध लिया हुआ है, उनको विरोध करने से कोई नहीं रोक रहा, लेकिन क्या ये जरूरी है कि हर उस चीज का विरोध किया जाए जो नरेंद्र मोदी से जुड़ी है।

मुझे ऐसा लगता है कि ये मूर्ति जब बनकर तैयार हो जाएगी तो भारत की गौरव गाथा का हिस्सा बनेगी और इसका विशाल आकार एक नया इतिहास बनाएगा। ये सत्य है कि स्वतंत्रता के बाद से देश लगातार विभिन्न मोर्चों पर संघर्ष करता आ रहा है। गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, युद्ध, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, प्राकृतिक आपदाएं, कमजोर अर्थव्यवस्था जैसी समस्याओं से जूझते-जूझते, इस तरफ कम ही ध्यान गया कि देश में विशाल स्मारकों या भवनों का निर्माण भी किया जाए। भारत में आज जो भी ऐतिहासिक इमारतें हैं वे या तो हमें भारत के स्वर्णकाल से या फिर फिर मुगलों और अंग्रेजों के शासन काल से विरासत में मिली हैं। आजादी के उपरांत बहुत कम निर्माण ऐसे हुए जो भारतीय शिल्प विद्या का लोहा मनवा सकें।

जिन निर्माणों की भारत में प्रमुखता से चर्चा होती है उनमें एक तरफ कोणार्क मंदिर, जगन्नाथ मंदिर, मीनाक्षी मंदिर जैसी कुछ पौराणिक इमारतें हैं, तो दूसरी तरफ मुगल काल से मिले लाल किला, ताज महल, चार मीनार, बुलंद दरवाजा जैसे निर्माण। इसके अलावा ब्रिटिश राज में बने हावड़ा ब्रिज, राष्ट्रपति भवन, इंडिया गेट, गेटवे आॅफ इंडिया, विक्टोरियल मेमोरियल और संसद भवन जैसी इमारतें हमें अपनी गुलामी काल की याद दिलाते हैं। स्वतंत्र भारत में जो भव्य निर्माण हुए उनमें दिल्ली और अहमदाबाद के अक्षरधाम को छोड़कर कोई ऐसा भव्य निर्माण नहीं नजर आता जिस पर हम गर्व कर सकें।

जब भारत सरकार ने इस बजट में स्टैचु आॅफ यूनिटी और वाॅर मेमोरियल के लिए धन आवंटित किया है, तो कुछ लोग यह कहकर निंदा कर रहे हैं कि भारत जैसे गरीब देश में 200 करोड़ रुपये मूर्ति निर्माण में खर्च करना उचित नहीं है, तो कुछ लोग सरदार की मूर्ति की तुलना मायावती के मूर्ति प्रेम से कर रहे हैं। ये दोनों ही तर्क आधारहीन हैं। मायावती का मूर्ति प्रेम बिल्कुल अलग किस्म का है, मैं उसके विस्तार में जाना नहीं चाहता। और मायावती के पार्कों के निर्माण में जो खर्च हुआ था उसकी तुलना में तो सरदार की मूर्ति का खर्च बेहद छोटा है। दूसरी बात यह कि सरदार की मूर्ति अपने आप में एक विश्वरिकाॅर्ड कायम करने जा रही है और इसके निर्माण के दौरान तो रोजगार का सृजन होगा ही, निर्माण पूर्ण हो जाने के उपरांत भी पर्यटन के माध्यम से हजारों लोगों को रोजगार के अवसर मिलेंगे। सबसे बड़ी बात ये मूर्ति भारत की बढ़ती शक्ति का प्रतीक बनेगी।

जहां तक बात गरीबी की है तो 200 करोड़ रुपये में हम देश की गरीबी को नहीं मिटा सकते। भारत की अर्थव्यवस्था जिस तरह उभर रही है और जिस तरह की कल्याणकारी योजनाएं पिछली और वर्तमान सरकारों ने चलाई हैं, उसमें से अगर भ्रष्टाचार का पुट हटा दिया जाए तो हाशिए पर पड़े व्यक्ति को सशक्त करने में देश आज सक्षम है। पर हमारी व्यवस्था में लालफीताशाही का जंजाल और भ्रष्टाचार का पेट इतना बड़ा है कि किसी भी योजना का लाभ आम आदमी तक पहुंचते-पहुंचते मरणासन्न स्थिति में पहुंच जाता है। चाहे वह भ्रष्टाचार हो या फिर बेपनाह सरकारी खर्च, असली जरूरत इन गड्ढों को भरने की है, जिनमें देश का करोड़ों रुपया समा जाता है। सरदार की मूर्ति का विरोध करने से देश का कोई भला होने नहीं जा रहा।

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

शादी से पहले और चुनाव के बाद!


शादी से पहले
बाॅलीवुड की फिल्मों से प्रेरणा लेकर 16 से लेकर 25 साल की उम्र में परवान चढ़ते प्रेम प्रसंग में प्रेमी रूपी पुरुष की हालत बेहद दयनीय होती है। उसके मन-मस्तिष्क में अपनी प्रियसी को पाने की इतनी तीव्र उत्कंठा घर कर जाती है कि प्रेमिका उसके जीवन का अंतिम लक्ष्य बन जाती है और वो मनसा, वाचा कर्मणा उसे प्राप्त करने की प्रतिज्ञा उठाकर सोता, जागता और विचरता नजर आता है। उसके हृदय की वीणा से निरंतर ऐसे स्वर फूटते हैं जो प्रतिपल उसकी प्रेमिका को आकर्षित कर उसे मंत्रमुग्ध कर देते हैं। इस अवस्था में प्रीतम अपनी प्रियसी के लिए हर वो कर्म करने के लिए तत्पर रहता है, जिससे प्रेमिका प्रसन्न हो। वो प्रेमिका के साथ तमाम सपने देखता और दिखाता है। वादों का ऐसा पहाड़ खड़ा करता है कि प्रेमिका उसकी वादियों में खो जाती है। और एक दिन ऐसा आता है जब प्रेमी अपनी प्रेमिका का पूरा विश्वास जीत लेता है और प्रेमिका उसे वरने के लिए तैयार हो जाती है। खुशी-खुशी दोनों का विवाह संपन्न होता है। सालों से हिलोरे ले रहे प्रेमी के हृदय में हनीमून के ख्याल मात्र से हजारों मयूर नृत्य करने लगते हैं। किसी हसीन से पर्यटक स्थल पर आखिरकार प्रेमी उन पलों का अनुभव करता है जिसका उसे न जाने कब से इंतजार था। प्रेमिका अपने प्रेमी के समक्ष संपूर्ण समर्पण कर देती है। कुछ समय दोनों एक हसीन दुनिया का अनुभव करते हैं। फिर शनैः शनैः समय बीतता है और प्रेमी का प्रेमिका के प्रति आकर्षण कम होने लगता है। प्रेमी के अंदर आ रहे बदलाव प्रेमिका को विचलित करते हैं। वो रह-रह कर प्रेमी को पुरानी बातें पुराने वादे याद दिलाती है, लेकिन प्रेमी हर बार हंस कर टाल देता है। और थोड़े समय में ही वो वक्त आ जाता है जब प्रेमिका को अपने पति से कहना पड़ता है- ‘‘सारे मर्द एक जैसे होते हैं’’!

चुनाव के बाद
देश के महापुरुषों से प्रेरणा लेकर परिपक्व उम्र में परवान चढ़ती राजनीतिक लालसा में सज्जन रूपी नेता की हालत बेहद दयनीय होती है। उसके मन-मस्तिष्क में सत्ता को पाने की इतनी तीव्र उत्कंठा घर कर जाती है कि जनता की वोट उसके जीवन का अंतिम लक्ष्य बन जाती है और वो मनसा, वाचा कर्मणा सत्ता प्राप्त करने की प्रतिज्ञा उठाकर सोता, जागता और विचरता नजर आता है। उसके हृदय की वीणा से निरंतर ऐसे स्वर फूटते हैं जो प्रतिपल आम जनता को आकर्षित कर उसे मंत्रमुग्ध कर देते हैं। इस अवस्था में नेता अपनी प्रिय जनता के लिए हर वो कर्म करने के लिए तत्पर रहता है, जिससे जनता प्रसन्न हो। वो जनता के साथ तमाम सपने देखता और दिखाता है। वादों का ऐसा पहाड़ खड़ा करता है कि जनता उसकी वादियों में खो जाती है। और एक दिन ऐसा आता है जब नेता अपनी प्रिय जनता का पूरा विश्वास जीत लेता है और जनता उसे वोट देने के लिए तैयार हो जाती है। पूरे जोश के साथ चुनाव संपन्न होता है। सालों से हिलोरे ले रहे नेता के हृदय में सत्ता के ख्याल आते ही हजारों मयूर नृत्य करने लगते हैं। एक खूबसूरत कार्यक्रम में शपथ ग्रहण करके आखिरकार नेता उन पलों का अनुभव करता है जिसका उसे न जाने कब से इंतजार था। जनता खुद को अपने नेता के समक्ष समर्पण कर चुकी होती है। कुछ समय नेता और जनता परिवर्तन का सुखद अनुभव करते हैं। फिर शनैः शनैः समय बीतता है और नेता का जनता के प्रति आकर्षण कम होने लगता है। नेता के अंदर आ रहे बदलाव जनता को विचलित करते हैं। वो रह-रह कर नेता को पुरानी बातें पुराने वादे याद दिलाती है, लेकिन नेता हर बार हंस कर टाल देता है। और थोड़े समय में ही वो वक्त आ जाता है जब जनता को अपने नेता से कहना पड़ता है- ‘‘सारे नेता एक जैसे होते हैं’’!

गुरुवार, 12 जून 2014

शांति से निबटा पहला सत्र पर हंगामा तो होकर रहेगा


संसद का पहला सत्र नई सरकार और नए प्रधानमंत्री के लिए काफी हद तक सफल रहा। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लाए गए धन्यवाद प्रस्ताव पर दो दिन चली बहस में विपक्ष पूरी तरह बंटा हुआ दिखा। संसदीय परंपरा के मुताबिक राष्ट्रपति के प्रति आभार जताते वक्त प्रस्ताव का विरोध नहीं किया जाता और आम राय से इसे पारित कर दिया जाता है। लेकिन फिर भी विपक्ष सरकार द्वारा तैयार किए गए अभिभाषण में मीनमेख निकाल ही देता है। चर्चा के दौरान कांग्रेस ने अभिभाषण को भाजपा का मैनिफेस्टो और चुनावी नारे बताने की कोशिश की, और सरकार को ये भी बताया कि उसने कांग्रेस का माल उठाकर अपनी दुकान में रख लिया है। पर कांग्रेस के वक्ता ये समझाने में विफल रहे कि जब उनकी सोच देश के प्रति इतनी ही अच्छी थी तो उसका क्रियान्वयन क्यों नहीं किया? क्या केवल योजनाएं बना देने से ही देश का भला हो सकता है?

ममता और जयललिता के संसदीय सिपाहियों को सुनकर लगा कि वे संसद में नहीं बल्कि अपनी-अपनी विधानसभाओं में बोल रहे हों। दो दलों के नेता अपने भाषण में धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने से ज्यादा अपनी-अपनी नेताओं के गुणगान करने में ज्यादा व्यस्त दिखे। दोनों ही पार्टियों ने बातों-बातों में सरकार की तरफ दोस्ती के इशारे भी किये। चार सांसद लेकर संसद पहुंचे सपा के प्रमुख और एक मात्र वक्ता मुलायम सिंह यादव को जब कुछ नहीं सूझ तो उन्होंने बिना किसी ठोस सुबूत के 15 दिन पुरानी सरकार पर महंगाई बढाने का आरोप लगा दिया। आम आदमी पार्टी के वक्ता भी खास असर नहीं छोड़ पाए।

अमूमन बिना व्यवधान के चलने वाले धन्यवाद प्रस्ताव में भी बसपा राज्यसभा को दो बार दस-दस मिनट के लिए मुल्तवी करवाने में सफल रही। शुक्र है कि लोकसभा में हाथी के पास अंडा था इसलिए सदन निर्विघ्न चलता रहा। लोग इससे सीख ले सकते हैं कि संसद का पैसा और समय किस तरह बचाया जाए। वीके सिंह के ट्विीट पर सरकार की थोड़ी किरकिरी जरूर हुई पर अरुण जेटली ने मामले को संभाल लिया। लालकृष्ण अडवाणी और सोनिया गांधी ने चर्चा के दौरान चुप रहना ही बेहतर समझा।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने लोकसभा में और वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अपनी कुशल वाक शैली का लोहा मनवाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले भाषण बेहद बड़प्पन दिखाते हुए सधी हुई भाषा में बड़े प्यार से पूरे विपक्ष को आइना दिखा दिया।

संसद में होने वाली बहस की सबसे खूबसूरत बात यही है कि हर कोई अपनी-अपनी सहूलियत के हिसाब से किसी भी मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष में लामबंद हो जाते हैं। संसद की बहस से कम से कम ये तो सीखा जा सकता है कि कोई भी चीज पूरी तरह सही और गलत नहीं होती। कल तक धुर विरोधी रहे रामविलास पासवान पुरजोर तरीके से प्रधानमंत्री मोदी का पक्ष लेते नजर आए और राजग का अंग रहे जदयू के लिए आज मोदी से बड़ा गुनहगार कोई नहीं। राजनीति कुछ इसी तरह की चीज है कि राजनेता सबसे पहले अपना निजी हित साधते हैं, जब निजी हित सध जाए तो उसे राष्ट्रहित से जोड़ देते हैं। पल-पल अपना स्टैंड बदलने वाले क्षेत्रीय दलों पर ये बात खासतौर से लागू होती है।

हालांकि 2014 का जनादेश देखने के बाद तो लगता है कि लोग नेताओं के रंगों को समझने लगे हैं। कई दलों को शून्य पर लपेटकर जनता ने मौकापरस्ती और भ्रष्टाचार के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा जाहिर किया है। लोग 1998 से 2014 तक वाजपेयी और मनमोहन सरकार में टिड्डी दलों की ब्लैकमेलिंग देखते आए थे। राष्ट्रहित के फैसले लेने में भी किस तरह केंद्र सरकार मजबूर दिखती थी, वो मजबूरी के पल अब नहीं दिखेंगे। उम्मीद है कि अच्छे दिन आएंगे!

हालांकि आगे के सत्रों में विपक्ष सरकार का इतना सहयोग नहीं करेगा और हंगामा करने का कोई न कोई रास्ता जरूरत निकालेगा। जब हर स्तर पर मोदी सरकार नए प्रयोग करने के लिए आतुर है तो फिर संसद में समय की बर्बादी रोकने के लिए भी कुछ करना चाहिए। कुछ सुझाव ये भी हो सकते हैं-
  • सरकार और स्पीकर को संसदीय हंगामे पर जीरो टाॅलरेंस की पाॅलिसी अपनाएं।
  • सरकार और विपक्ष के बीच बेहतर तालमेल के लिए किसी भी मुद्दे को सदन में लाने से पहले बाहर चर्चा की जाए।
  • कार्यवाही में व्यवधान पैदा करने वालों और वेल में आने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाए।
  • एक दिन सदन स्थगित कराने पर सांसदों का चार दिन का वेतन काटा जाए, यात्रा भत्ता रद् किया जाए।
  • विवादास्पद मुद्दे सत्र के अंत में लाए जाएं।
  • सबसे ज्यादा हंगामा करने वाले सदस्यों को चिन्हित करके उनके चित्र संसद की वेबसाइट पर जारी किए जाएं।
  • सबसे अनुशासित सांसद के साथ-साथ सबसे गैर अनुशासित सांसद का खिताब दिया जाए।
पिछले दिनों अखबार में खबर पढ़ी कि संसद की कैंटीन में चाय के जबरदस्त सस्ते दाम देखकर नए - नए चुनकर आये एक सांसद ने चुटकी ली कि जब इतनी सस्ती चाय मिले तो सांसद बार-बार टी ब्रेक क्यों न लें। सांसद की इस बात में दम है। संसद की कैंटीन सबसे बेहतरीन भोजन तैयार करने वाली शायद भारत की सबसे सस्ती कैंटीन है। महंगाई को देखते हुए संसदीय कैंटीन की भोजन दरों में दस गुना इजाफा करने की आवश्यकता है। पहले सांसदों को मिलने वाला भत्ता और वेतन बहुत कम हुआ करते थे इसलिए ये सस्ती दरें रखी गई होंगी। लेकिन न तो अब सांसद गरीब हैं और न उनका वेतन कमजोर है। इसलिए संसद की कैंटीन को मुनाफे वाला आय का स्रोत बनाया जाए। सरकार चाहे तो संसद घूमने आने वाले स्टूडेंट्स के लिए सस्ता भोजन परोस सकती है।

शनिवार, 31 मई 2014

नई सरकार और भारत के गांव

भारतीय शहर और गांव में इतना बड़ा अंतर है कि उन्हें देखकर ये लगता ही नहीं कि वे एक ही देश के हिस्सा हैं। भारतीय गांव की असली तस्वीर किसी पेंटिग में बनी गांव की सुंदर सी तस्वीर से बिल्कुल विपरीत है। गांवों और शहर के विकास के लिए केंद्र सरकार ने  अलग-अलग मंत्रालय खड़े किये- शहरी विकास और ग्रामीण विकास मंत्रालय। जहां तक शहरी विकास का मामला है तो वह तो खुली आंखों से स्पष्ट नजर आता है, लेकिन अगर गांव के विकास की बात करें तो वह केवल किसानों की जमीन अधिग्रहण तक ही नजर आता है। जब भी सरकार कोई भी नया काॅलेज या अस्पताल खोलने की घोषणा करती है तो वह शहर के लिए ही होती है, यानि हर काम के लिए गांव वाले ही शहर आएं। इसका विपरीत कभी होते नहीं देखा। यहां तक कि देश के नेताओं को भी अगर चुनावी रैली करनी है तो वह शहर में ही होगी, गांव में जाकर रैली करना केवल किसी विशेष अवसर पर ही होता है। 67 साल की आजादी में गांवों को मुख्य धारा से जोड़ने के दावे और वादे तो बहुत हुए पर गांव अभी भी बहुत उपेक्षित हैं। अब अच्छे दिन देने का वादा करके देश में नई सरकार आई है। लोगों में उत्साह है और उनकी नए प्रधानमंत्री से ‘महा‘ अपेक्षाएं हैं। ऐसे में गांव के कुछ मुद्दों को उठाने का प्रयास-

गांव की राजनीतिः राजनीति जब राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो तो अच्छी होती है, लेकिन अगर वही राजनीति गांव और घर में होने लगे तो बेहद घातक सिद्ध होती है। इसके दुष्परिणाम सामने आने भी लगे हैं। पंचायती राज व्यवस्था बनाई तो गई थी गांवों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए, लेकिन इस व्यवस्था ने कितना वीभत्स रूप अख्तियार किया है, ये उत्तर प्रदेश के कुछ गांवों में जाकर देखें। आपसी प्रेम, सौहार्द और सहयोग पर टिका गांव का समाज गांव की राजनीति के कारण पूरी तरह बिखर चुका है। आपसी सहयोग की भावना पैसे की दौड़ में खत्म होती चली जा रही है। ऐसे में गांवों में होने वाले प्रधानी के चुनावों पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। महात्मा गांधी ने जिस ग्राम स्वराज की अवधारणा देश को दी थी वो वर्तमान पंचायती राज व्यवस्था कभी नहीं दे सकती। सही मायने में गांधी के ग्राम स्वराज को वास्तविकता में उतारने का प्रयोग अगर किसी ने किया है तो वह अन्ना हजारे ने रालेगण सिद्धि और उसके आसपास के गांव में कर के दिखाया है। नई सरकार को ग्रामीण भारत के उत्थान के लिए पंचायती राज व्यवस्था पर नये सिरे से सोचना चाहिए। गैर सरकारी संगठन और सीएसआर ग्रामीण उत्थान में बड़ा सहयोग कर सकते हैं। बस जरूरत यही है कि जो भी योजना या कदम उठाए जाएं उनमें गंभीरता हो, सिर्फ पैसे कमाने और नेतागीरी के उद्देश्य से काम न हो।

किसान और खेती को सम्मानः ग्लैमरस नौकरियों के इस दौर में ग्रामीण युवा के बीच खेती के प्रति तेजी से अरुचि पैदा हो रही है। गांव का युवा अब हल चलाना नहीं चाहता, उसको भी शहर में अच्छी नौकरी की दरकार है। बड़ी तादाद में ग्रामीण युवा इस दिशा में सफल भी हो रहे हैं, सरकारी और निजि क्षेत्र दोनों में अपना परचम लहराया है। इनमें अधिकांश मामले उन युवाओं के हैं, जिनके परिवारों की माली हालत पहले से ठीक-ठाक होती है। इधर जिन युवाओं का शहर में नौकरी का सपना पूरा नहीं हो पाता वो भी खेती-किसानी से कतराता है। भले ही पूरे देश को किसान की उपजाई फसल के कारण दो वक्त की रोटी नसीब होती हो, लेकिन खेती करना समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता है। इसलिए नई सरकार को खेती को प्रोमोट करने की दिशा में ध्यान देना चाहिए। गांव से तेजी से हो रहा पलायन रोकने के लिए उनके आसपास ही रोजगार हों। खेती के साथ-साथ उनके हाथ में जो हुनर है उसको नजदीक में ही बाजार मिले। ऐसे तमाम उदाहरण इसी देश में उपलब्ध हैं जहां बड़ी-बड़ी नौकरियां छोड़कर लोगों ने खेती करना बेहतर समझा। खबरें आ रही हैं कि सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश पी. सताशिवम् रिटायरमेंट के बाद दिल्ली में रहने के बजाय तमिलनाडु स्थित अपने गांव जाकर खेती करेंगे।

उपजाऊ जमीन और विकासः ये भी अजीब विडंबना है कि भारत में सिमेंटीकरण की प्रक्रिया को ही विकास का मापदंड समझा जाता है। जिस इलाके में जितना ज्यादा सीमेंट ठुका है यानि वो उतना ही विकसित है। कच्चे छप्पर वाले घर पिछड़ेपन की निशानी बन गए हैं। सिमेंटीकरण को बढ़ाकर शुरू हुआ विकास का दौर इस कदर फैल रहा है कि गांव की खेतीहर भूमि को भी कब्जे में लेता जा रहा है। रीयल एस्टेट की छतरी के नीचे फैल रहा हाई राइज अपार्टमेंट कल्चर दिल्ली से निकल कर एनसीआर, फिर एनसीआर से निकल कर वृहद एनसीआर और वृहद एनसीआर से निकल कर छोटे-छोटे शहरों की उपजाऊ जमीन कब्जाता जा रहा है। आलम ये है कि मेरठ जैसे उपजाऊ जिले के किसानों ने भी थोड़े से लाभ के लिए बड़े पैमाने पर अपनी खेती की जमीन रीयल एस्टेट के हाथों बेच दी और बेच रहे हैं। इसी तरह 160 किलोमीटर लंबे नवनिर्मित यमुना एक्सप्रेस वे के दोनों तरफ हजारों एकड़ उपजाऊ जमीन को भी अर्बन जोन में तब्दील करने की भी महायोजना है। इतनी बड़े स्तर पर उपजाऊ जमीन का सीमेंटीकरण करना न केवल पर्यावरण की दृष्टि से बल्कि कृषि उत्पादन की दृष्टि से भी नुकसान दायक साबित होगा। जबकि जरूरत इस बात की है कि देश में ऐसी भूमि को चिन्हित किया जाए जो अनउपजाऊ और बेकार पड़ी हैं। नए टाउनशिप, इंडस्ट्रियल एरिया डेवलप करने से पहले इलाके का सर्वे कराकर बेकार और बंजर जमीन को प्राथमिकता दी जाए। हालांकि ये थोड़ा जटिल कार्य होगा, पर अगर ध्यान नहीं दिया गया तो परिणाम आगे लिखे हैं।

काॅस्मेटिक फूड-काॅस्मेटिक जेनरेशनः मेरठ में पत्रकारिता के दौरान एक बार सेंट्रल पटैटो रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीपीआरआई) के एक वैज्ञानिक का इंटरव्यू लेने का मौका मिला। बातचीत करते-करते हाइब्रिड बीज और जीएम बीज तक पहुंची। मैंने उनसे पूछा कि आजकल के अनाज में वो पहले वाली खुशबू क्यों नहीं है। गेहूं की रोटी, अरहड़ की दाल और बासमती चावल में वो पहले जैसी बात कहां चली गई? क्या ये हाइब्रिड बीजों का नतीजा है। उन्होंने न लिखने की शर्त पर बताया कि ‘देश की जनसंख्या लगातार तेजी से बढ़ रही है और उपजाऊ जमीन उतनी ही तेजी से घट रही है। ऐसे में सरकार की पहली प्राथमिकता है इतनी बड़ी जनसंख्या का पेट भरना। इसलिए सरकार का मुख्य ध्यान पैदावार पर है, गुणवत्ता पर नहीं। यानि क्वांटिटी प्राथमिकता है क्वालिटी नहीं। हाइब्रिड और जीएम बीजों की मदद से पैदावार में जबरदस्त इजाफा देखने को मिला है‘। पर्यावरणविद् समय-समय पर जीएम फूड के नुकसानों की ओर ध्यान खींचते रहे हैं। एक और नुकसानदायक प्रत्यक्ष उदाहरण पंजाब में देखने को मिलता है जहां अच्छी पैदावार के चक्कर में केमिकल फर्टिलाइजर और पेस्टिसाइड्स के प्रयोग से वहां कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इस तरह का अन्न खाकर देश की आने वाली पीढ़ी कैसी होगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। नए पर्यावरण मंत्री ने बयान तो दे दिया कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, लेकिन असलियत तो यही है कि विकास पर्यावरण की कीमत चुकाकर ही होता है। अब ये नई सरकार को तय करना है कि वो सिमेंटीकरण के विकास का अनुसरण करे या फिर विकास के नए अर्थ गढ़े। 

गोधन और जैविक खादः खेती और गौपालन को समाज में सम्मान दिलाना बहुत जरूरी है। व्हाइट काॅलर जाॅब का आकर्षण गांव के युवाओं को खेती और गौपालन से खींच रहा है। अच्छी खेती के लिए गायों का बड़े स्तर पर पालन होना चाहिए उनका कटान नहीं। गायों का पालन हर दृष्टि से लाभदायक है, इसे बार-बार बताया गया है। बच्चों के लिए दूध से लेकर किसान को जैविक खाद प्रदान करने तक गायें हर तरह से अर्थव्यवस्था में लाभदायक है। जरूरत इस बात की है कि गौपालन का काम भी समाज में सम्मान से देखा जाए। अन्यथा सिंथेटिक दूध, दही और पनीर खाकर बढ़ रही पीढ़ी कितनी मजबूत होगी ये कहना मुश्किल है। सरकार चाहे तो शहरों में घरों से निकलने वाला कचरा और नदियों की सफाई में निकलने वाले कचरे को भी जैविक खाद् में तब्दील कर किसानों को मुहैया करा सकती है।

गांव की संस्कृतिः इसे बाॅलीवुड का असर ही कह सकते हैं कि गांव का नाम सुनकर जो पहली तस्वीर बनती है वो है एक हरा-भरा, साफ-सुथरा स्थान जहां सीधे-सरल लोग रहते हैं। जबकि सच्चाई इसके उलट है। न तो गांव उतने हरे-भरे रहे और न साफ-सुथरे। गांव की राजनीति ने वहां के लोगों को भी सीधा और सरल नहीं रहने दिया है। वो तो भला हो पाॅपुलर के पेड़ों से मिलने वाले आर्थिक लाभ का कि कई गांवों में इन पेड़ों की वजह से हरियाली फिर लौट आई है। फिर भी हर गांव की अपनी एक संस्कृति होती है, जो शहरीकरण की होड़ और दौड़ में खोती जा रही है। वहां की बोलचाल, भाषा, वेशभूषा तथाकथित माॅडर्न कल्चर की भेंट चढ़ती जा रही है। इसे घर-घर लगे टेलीविजन का ही असर कहें या आधुनिक दिखने की होड़ कि गांव की अपनी बोली का स्थान एक सभ्य खड़ी हिंदी लेती जा रही है, वहां का खानपान बदल रहा है, पहनावा बदल रहा है। हालांकि बदलाव अवश्यंभावी है और उसको स्वीकार किया जाना चाहिए, लेकिन किस हद तक ये सोचना होगा!

‘हनुमान अंश’ की सफलताः देशज कहानी की जीत

भारतीय सिनेमा में सफलता का पैमाना लंबे समय से बड़े बजट, बड़े सितारों, विदेशी लोकेशन और भव्य प्रचार से जोड़ा जाता रहा है। ऐसे समय में ‘हनुमान अं...