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शनिवार, 22 नवंबर 2025

बिहार विधानसभा चुनाव 2025: शांतिपूर्ण लोकतंत्र का अद्भुत उदाहरण


बिहार, जिसे कभी चुनावी हिंसा और तनाव के लिये जाना जाता था, इस बार लोकतंत्र के इतिहास में एक उल्लेखनीय परिवर्तन का गवाह बना है। हाल ही सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव अब तक के सबसे शांतिपूर्ण चुनाव माने जा रहे हैं। न कोई बड़े पैमाने पर हिंसा, न प्रतिशोध की घटनाएँ—यह अपने आप में बिहार की लोकतांत्रिक परिपक्वता और प्रशासनिक तैयारियों का जीवंत प्रमाण है।

शांतिपूर्ण चुनाव के लिये सभी को बधाई

इस उत्कृष्ट उपलब्धि का श्रेय किसी एक संस्था या समूह को नहीं जाता। यह सामूहिक प्रयास की सफलता है।

  • बिहार की जनता, जिसने धैर्य, अनुशासन और समता के साथ मतदान किया।
  • भारत निर्वाचन आयोग, जिसने व्यापक और प्रभावी व्यवस्था की।
  • बिहार पुलिस और अर्धसैनिक बल, जिन्होंने बिना भय या दबाव के मतदान सुनिश्चित किया।
  • मतदान कर्मी, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपनी जिम्मेदारियाँ पूर्ण निष्ठा से निभाईं।

इन सबके प्रयासों ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि लोकतंत्र केवल मतदान का दिन नहीं बल्कि जनभागीदारी और अनुशासन का महोत्सव है।

राजनीतिक दलों की परिपक्वता

चुनावी भाषणों में भले ही तीखे शब्दों और आरोप–प्रत्यारोपों का दौर चला हो, परंतु परिणाम आने के बाद सभी दलों ने जनादेश का सम्मान किया। इससे यह प्रतीत होता है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच भी बिहार का लोकतंत्र संवाद और स्वीकार्यता की राह पर आगे बढ़ रहा है।

पश्चिम बंगाल के लिये एक सीख

इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का अंधकार अब भी गहरा है। वर्षों से चल रही राजनीतिक हिंसा—चाहे वह हत्याओं के रूप में हो, धमकियों में या आम नागरिकों के रक्तपात में—एक लोकतांत्रिक समाज की आत्मा को चोट पहुँचाती है।


विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक चली विचारधारात्मक राजनीति और जमीन-स्तर पर हिंसा-आधारित सत्ता संरचना इसका मुख्य कारण रही है। आज भारत के किसी अन्य राज्य में इतनी तीव्र और संगठित चुनावी हिंसा नहीं देखी जाती।

साल 2026 में पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले, वहाँ के नेतृत्व और जनता—दोनों को बिहार से सीख लेनी चाहिये। लोकतंत्र में सत्ता बदलने का अधिकार जनता का है, न कि हिंसा और भय का।

मीडिया की चुप्पी और बिहार की अनदेखी उपलब्धि

गौर करने वाली बात यह है कि इतने शांतिपूर्ण चुनाव के बावजूद राष्ट्रीय मीडिया ने बिहार की इस उपलब्धि को शायद ही उचित ध्यान दिया। हिंसा की खबरें सुर्खियों में आती हैं, लेकिन जब कोई राज्य शांतिपूर्ण लोकतंत्र का उदाहरण प्रस्तुत करता है—अक्सर वह अनदेखा रह जाता है।

बिहार ने साबित किया है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति, जनता का सहयोग और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान साथ हो, तो कोई भी राज्य हिंसक चुनावी इतिहास से निकलकर परिवर्तन की राह पकड़ सकता है।


यह चुनाव केवल सरकार गठन की प्रक्रिया नहीं था, बल्कि एक संदेश था—भारत का लोकतंत्र प्रगति की परिपक्व अवस्था में प्रवेश कर रहा है।

बिहार की यह उपलब्धि आने वाले वर्षों में अन्य राज्यों के लिये मार्गदर्शक बनेगी, और उम्मीद है कि देश का राजनीतिक वातावरण इसी तरह संयमित और शांतिपूर्ण बने।

सोमवार, 16 जनवरी 2017

ऑनलाइन मतदान की ओर कदम बढ़ाने का सही वक्त!

भारत में इलेक्ट्रिॉनिक वोटिंग मशीन की अपार सफलता के बाद अब चुनाव आयोग को ई-वोटिंग की ओर कदम बढ़ाना चाहिए। जिस प्रकार देश तेजी से डिजिटाइजेशन की ओर बढ़ रहा है, उसको देखते हुए यदि जल्द यह कदम उठाया जाता है, तो बहुत बड़े खर्च और प्रशासनिक उठापटक को टाला जा सकता है। साथ ही इससे उन लोगों को भी फायदा होगा जो नौकरी या अन्य कारणों से अपने शहर से दूर बस गए हैं, लेकिन वोट डालने के कारण उन्हें अपने शहर आना पड़ता है।

इसके लिए चुनाव आयोग ऑनलाइन वोट डालने के इच्छुक मतदाताओं से अपना एपिक नंबर आयोग की साइट पर रजिस्टर करवाये और ऐसे मतदाताओं के लिए अलग से एक ऑनलाइन वोटर लिस्ट तैयार करे। फिर ऐसे मतदाताओं के नाम कागजी वोटर लिस्ट से हटा दे। इस प्रकार चुनाव आयोग दो तरह की वोटर लिस्ट तैयार कर सकता है- एक ऑनलाइन मतदाताओं के लिए और दूसरी मतदान केंद्र पर जाने वाले मतदाताओं की। चुनाव के दिन ऑनलाइन मतदाता आयोग की वेबसाइट और मोबाइल एप पर वोट डाल सकते हैं और बाकी मतदाता मतदान केंद्र पर जाकर अपना मत डाल सकते हैं। ऑनलाइन मतदाताओं को मतदान केंद्र पर वोट डालने की अनुमति नहीं होगी। लेकिन ऑनलाइन वोट डालने के बाद मतदाता को मतदान रसीद अवश्य प्रदान की जाए, एसएमएस और ईमेल के माध्यम से भी। प्रयोग के तौर पर इसे छोटे राज्यों में आजमाया जा सकता है। 

जिस तरह डीबीटी एक सफल प्रयोग बनकर उभरा है, ऑनलाइन वोटिंग भी निश्चित तौर पर सफल होगी। ऑनलाइन वोटिंग का विकल्प आने से मतदान प्रतिशत में भी इजाफा होना लाजमी है, साथ ही भारी प्रशासनिक खर्च भी धीरे-धीरे घटता चला जाएगा। आज के दौर में जब ऐसे-ऐसे काम घर बैठे ऑनलाइन संभव हो रहे हैं, जिनके बारे में सोच भी नहीं सकते थे, तो फिर ऑनलाइन मतदान करवाना कोई बड़ी बात नहीं है। कई अखबार, न्यूज वेबसाइट और सर्वे कंपनियां इस तरह की वोटिंग समय-समय पर कराती ही रहती हैं। हालांकि चुनावी मतदान में थोड़ा एहतियात बरतने की आवश्यकता है। वोटिंग सॉफ्टवेयर तैयार करने में तमाम पहलुओं पर कड़ाई से सोचना होगा, ताकि दिमागी खुजली वाले लोग इसकी सुरक्षा में सेंध न लगा सकें। 

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

पंचायत चुनाव बनाम ग्राम स्वराज


इन दिनों जब पूरे देश का ध्यान बिहार के विधानसभा चुनाव और उनके परिणामों पर केंद्रित हैं, ठीक उसी वक्त उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों का जोर है। अभी एक दिन के लिए अपने गांव जाना हुआ तो वहां की दीवारों पर चस्पा पोस्टरों को देखकर आभास हुआ कि देश में किसी भी चीज की कमी हो सकती है पर नेताओं की कमी कभी नहीं होगी। ऐसी-ऐसी चुनावी बिसात बिछाई जा रही हैं कि अमित शाह और लालू यादव भी मात खा जाएं। ऐसी गोटियां फेंकी जा रही हैं कि पूरी कांग्रेस पार्टी भी पानी मांगने लगे। पिलखुन के नीचे बैठकर ऐसी रणनीति तैयार हो रही हैं जिनको सुनकर बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ शर्म खा जाएं। छोटे-छोटे गांवों में इतनी बड़ी-बड़ी राजनीति खेली जा रही है कि दिल्ली भी लजा जाए। गांव के इस चुनावी माहौल को देखकर अरस्तु के वाक्य पर यकीन होने लगता है- ‘मनुष्य एक जन्मजात राजनीतिक जीव है’। भारत में तो राजनीति रग-रग में बसी है। किसी को छेड़ना भर मात्र है और वो अपने अंदर का पूरा राजनीतिक शास्त्र उड़ेल कर रख देगा। अपने यहां नाई की दुकान से लेकर रेल की बोगी तक, चाय के खोखे से लेकर गांव की चैपाल तक, मंदिर-मस्जिद से लेकर विश्वविद्यालयों तक राजनीतिक शास्त्रार्थ करने के लिए पुरोधा हर वक्त मुफ्त में तैयार मिलते हैं।

परंतु गांधी जी ने जिस ग्राम स्वराज का सपना देखा और दिखाया था वह आज के ग्राम पंचायत चुनाव से कतई मेल नहीं खाता। गांधी जी यदि आज की ग्रामीण राजनीति देख लेते तो शायद पंचायत चुनाव की जगह गांव की जिम्मेदारी एक दरोगा के हवाले करने की सिफारिश करते। उत्तर प्रदेश के अंदर ग्राम पंचायत चुनाव में जीतने के लिए हर वो हथकंडा अपनाया जाता है जिसका नैतिकता के दायरे से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं। पूरे चुनाव के दौरान मांस-मदिरा और सुरा-सुंदरी का प्रचलन अपने उत्कर्ष पर रहता है। इससे भी बात न बने तो बंदूक की गोली अंतिम उपाय के तौर पर काम आती है। यकीन न आए तो जिस दिन से चुनाव घोषित हुए हैं उस दिन से लेकर परिणाम घोषित होने के बीच कितनी चुनावी हत्याएं और हमले हुए इनके आंकड़े आरटीआई से निकलवाकर देखे जा सकते हैं। चुनाव आयोग ने विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान होने वाली हिंसा पर तो काबू पा लिया है, लेकिन पंचायत चुनाव के मौसम में पूरे उत्तर प्रदेश में रंजिशन गोलीबारी और हत्याओं के मामलों में अब भी बेतहाशा वृद्धि दर्ज की जाती है।  

कई जगह पंचायत चुनाव ने ऐसी गहरी रंजिशों की नींव डाली हैं कि पीढि़यां उसका खामियाजा भुगत रही हैं। यूं तो सतत विकास के कारण भी गांव की सामाजिक समरसता प्रभावित हो चुकी है, लेकिन पंचायत चुनावों ने भी गांव के सामाजिक ताने-बाने को पूरी तरह तोड़-मरोड़ दिया है। किसी कवि कि कविता या हिंदी फिल्म में गांव की जो सुनहरी तस्वीर पेश की जाती है, गांव दरअसल ठीक उसके विपरीत हैं। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाज का सटीक चित्रण श्रीलाल शुक्ला के उपन्यास ‘राग दरबारी’ में ही देखने को मिलता है। देश के आर्थिक विकास के साथ जब से पंचायतों को मोटा धन मिलना शुरू हुआ है, तब से उत्तर प्रदेश में सभी पंचायती प्रतिनिधित्व वाले पद सिर्फ भ्रष्टाचार के गढ़ बन कर रह गए हैं। ग्राम प्रधान बनते ही गांव की उन्नति हो न हो पर उस व्यक्ति की उन्नति निश्चित है जो उस पद पर शोभायमान है।

हो सकता है इसी पंचायती राज व्यवस्था के कुछ सकारात्मक पहलू भी हों या फिर कुछ गांवों ने इसी व्यवस्था के तहत विकास किया हो। लेकिन मेरा निजी अनुभव यही कहता है कि उत्तर प्रदेश के अंदर पंचायती राज व्यवस्था अधिकांश गांवों के अंदर राजनीतिक सड़ांध पैदा कर रही है। ऐसी सड़ांध जो ग्रामीण जीवन के लिए एक अभिशाप से कम नहीं। पंचायतों में महिलाओं को जबरदस्त आरक्षण देकर हम दिल्ली में दो-चार महिला सरपंचों को सम्मानित कर महिला सशक्तिकरण का ढोल भले ही पीटें, लेकिन 99.99 प्रतिशत मामलों में महिला सरपंच अपने पति के आधीन होकर ही चलती हैं। सिर्फ कागजों पर विश्व को दिखाने भर के लिए इस प्रकार का महिला सशक्तिकरण क्या सचमुच देश और समाज के हित में होगा। महात्मा गांधी ने जरूर ग्राम स्वराज की परिकल्पना देश के समक्ष रखी थी, लेकिन हम अपने दिल पर हाथ रख कर बता दें कि क्या वर्तमान पंचायती राज व्यवस्था सचमुच गांव के हित में है। जहां ग्राम प्रधान और स्कूल प्रधानाचार्य मिलकर बच्चों का भोजन डकारने की मानसिकता रखते हों भला ऐसा पंचायती राज समाज के किस काम का?

अन्ना हजारे के गांव रालेगण सिद्धि और उनके प्रभाव वाले आसपास के कुछ गांवों में पंचायत चुनाव नहीं होते, बल्कि आम राय से निर्विरोध तरीके से पदों पर नियुक्ति की जाती है। और फिर अन्ना के दिए गए सूत्रों के अनुसार गांव का विकास किया जाता है, जिसमें शराब बंदी, बालिका शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, जननी सुरक्षा, शाकाहार, अहिंसक जीवन जैसे मूल्यों को आधार बनाया गया है। उन्होंने अपने गांव में एक ऐसा स्कूल भी खोला है जिसमें दूसरे स्कूलों में फेल हुए बालक-बालिकाओं को पढ़ाया जाता है। साथ ही उत्तम भोजन भी प्रदान किया जाता है। कुछ ऐसे ही मापदंडों पर यदि देश के अधिकांश गांव आगे बढ़ते हैं तब कहीं गांव में सुधार की शुरुआत होगी अन्यथा खानापूर्ति के लिए पंचायती राज व्यवस्था हम अपने कंधों पर ढोते रहेंगे। अंतिम बात, राजनीति जब राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ही हो तो बेहतर है, लेकिन जब ये आपके गांव और घर में घुसने लगे तो बेहद घातक सिद्ध होती है।

बुधवार, 13 मई 2015

चुनाव जो इतिहास रच गया (भाग-4): टूट गया मुस्लिम वोट बैंक का तिलिस्म

16वीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव के जब 16 मई 2014 को परिणाम सामने आए तो वे अविस्मरणीय और हतप्रभ करने वाले थे। 16 मई की तिथि इतिहास में इस तरह दर्ज हो गई कि जब-जब बदलाव पर चर्चा होगी तो इस तिथि का जिक्र आएगा। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार किसी गैर कांग्रेसी दल को बहुमत देकर भारतीय मतदाताओं ने अपने वोट की ताकत का अहसास करा दिया। मतदाताओं ने न केवल एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार दी बल्कि इन परिणामों के माध्यम से देश के राजनीतिज्ञों को कई छिपे हुए संदेश भी दे दिए। जिस सुंदर राष्ट्र का सपना सड़क से लेकर संविधान तक आम लोगों को दिखाया जाता रहा, अब जनता उसे हकीकत में तब्दील होते देखना चाहती है। इसी उम्मीद के साथ देश के जनमानस ने नरेंद्र मोदी में अपनी आस्था दिखाई और उनके हाथ में एक मजबूत सरकार की बागडोर सौंप दी। उस ऐतिहासिक चुनाव परिणाम की पहली वर्षगांठ पर एक पुनरावलोकलनः
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देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी ने 2014 की ऐतिहासिक करारी हार के कारणों को तलाशती रिपोर्ट तैयार करने के लिए अपने वरिष्ठ नेता एके एंटनी को जिम्मेदारी सौंपी। जैसा कि एंटनी की ईमानदार छवि है, उन्होंने उसी के अनुसार हार का एक ईमानदार विश्लेषण कांग्रेस आलाकमान के सामने रखा। उनकी रिपोर्ट में पार्टी की हार का जो प्रमुख कारण सामने आया वो था कांग्रेस द्वारा जरूरत से ज्यादा ‘माइनाॅरिटी पालिटिक्स’ का कार्ड खेलना। एंटनी पैनल को लगा कि कांग्रेस द्वारा बहुत ज्यादा ‘अल्पसंख्यकवाद’ को बढ़ावा देने के कारण देश के बहुसंख्यक समाज में कहीं न कहीं ये संदेश चला गया कि कांग्रेस हिंदू विरोधी है और इस कारण हिंदू वोट का भाजपा की तरफ जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ, जिसका कांग्रेस को भी अंदाजा नहीं था।

‘फूट डालो राज करो’
दरअसल, अंग्रेजों ने जिस ‘फूट डालो राज करो’ की नीति पर चलकर भारत पर राज किया, आजादी के बाद वही नीति हमारे राजनीतिज्ञों की भी पथ प्रदर्शक बनी। पार्टियों ने जातियों में बंटे हिंदू समाज को जाति के आधार पर और ज्यादा बांटा और अल्पसंख्यकों को एक ठोस वोट बैंक की तरह प्रयोग किया। अमूमन सभी राजनीतिक पार्टियां इस नीति का अनुसरण करती दिखीं। योजनाएं बनाने से लेकर नीतियां गढ़ने तक जाति और धर्म व जाति आधारित राजनीति को दिमाग में रखा गया। देश की आने वाली पीढि़यां राजनीतिक विज्ञान की किताबों में ये पढ़कर अपना माथा पीटा करेंगी कि भारतीय राजनीति में सत्ता हथियाने के लिए ‘अजगर’ (अहीर, जाट, गुर्जर, राजपूत) और ‘मजगर’ (मुस्लिम, अहीर, जाट, गुर्जर, राजपूत) जैसे समीकरणों का सहारा लिया गया।

एकजुट होता समाज
भारत की अधिकांश राजनीतिक पार्टियां यही मानकर चल रही थीं, कि जातियों में बंटा हिंदू समाज कभी संगठित होकर वोट कर ही नहीं सकता। जबकि अल्पसंख्यक समाज एक तरफा वोट डाल सकता है। कांग्रेस से लेकर कई क्षेत्रीय पार्टियों ने इस फाॅर्मूले का फायदा उठायाः ‘कुछ हिंदू जातियां + एकमुश्त अल्पसंख्यक वोट = जीत’। मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी ने इसी फाॅर्मूले के दम पर कई बार यूपी की सत्ता पर कब्जा किया। जबकि मायावती की बहुजन समाज पार्टी द्वारा दलितों को अपना ठोस वोट बैंक बना कर, बड़ी संख्या में मुस्लिमों को टिकट बांटना इसी रणनीति का हिस्सा है। जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एकजुट हिंदू समाज की बात करता है तो इसके पीछे भी कहीं न कहीं इस एकजुटता को सत्ता की चाभी में तब्दील करने की दूरगामी दृष्टि है, जिसकी एक बानगी 2014 के लोकसभा चुनाव में नजर आई। उत्तर प्रदेश में मोदीमय भाजपा के पक्ष में ऐसा जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ कि ऐसे-ऐसे लोग सांसद बनकर दिल्ली पहुंच गए जिनके सपने में भी जीत के आसार नहीं थे। ध्रुवीकरण का असर इतना गहरा था कि कि बसपा का परंपरागत दलित वोट भी उससे छिटक गया। 

फेल हुआ फाॅर्मूला
2014 लोकसभा चुनाव परिणामों की विशेषता यह भी रही कि इस बार जीत का ये परंपरागत फाॅर्मूला पार्टियों के काम नहीं आया। ‘जिधर हम हैं, उधर जीत है’ की बात कहकर ताल ठोकने वाले उत्तर प्रदेश के मुस्लिम समुदाय ने 2014 के चुनाव में हर कोण से सोच कर देखा लेकिन कहीं जीत बनती नहीं दिखी। पहली बार हुआ कि यूपी में मुस्लिम वोट भी सपा, कांग्रेस और बसपा के बीच जमकर बंटा। एमआईएम के अध्यक्ष ओवैसी ने एक इंटरव्यू में तंज कसते हुए कहा कि ‘मैं मोदी को इस चीज के लिए बधाई देना चाहता हूं कि उन्होंने मुस्लिम वोट बैंक के मिथक को तोड़ दिया’।

सबका साथ
भाजपा पर भी हिंदूवादी साम्प्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगता रहा है। भाजपा विरोधी पार्टियां साम्प्रदायिकता का हौवा दिखाकर लोगों को डाराने का भी काम करती आई हैं। अयोध्या के राम मंदिर मुद्दे को भाजपा ने जिस तरह से गर्माया उससे इन आरोपों में दम भी दिखाई दिया। लेकिन वही भाजपा जब सत्ता में आई तो सबको साथ लेकर चलने में ही उसे देश की भलाई लगी। भाजपा ने अयोध्या को अपने एजेंडे में रखकर काशी और मथुरा का मुद्दा छोड़ने में देर नहीं लगाई। पहली एनडीए सरकार में भाजपा के पास पूर्ण बहुमत नहीं था, इसलिए सबकी बात करना प्रधानमंत्री वाजपेयी की मजबूरी कहा जा सकता है, लेकिन वर्तमान सरकार में भाजपा के पास पूर्ण बहुमत है फिर भी प्रधानमंत्री मोदी ने ‘सबका साथ और सबके विकास’ की राह पर चलने का प्रण दोहराया। इसलिए मजबूरी न पहले थी न अब है, बल्कि यही भारत की मूल संस्कृति है जो इस देश को हमेशा ये संदेश देती आई हैः 
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्रणिपश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भाग भवेत्।।
(End of Series)

मंगलवार, 12 मई 2015

चुनाव जो इतिहास रच गया (भाग-3): परिणामों ने पलट दी राजनीति की तस्वीर

2014 के चुनाव उपरांत भाजपा की सरकार बनेगी ऐसा विश्वास तो पार्टी के भीतर था, लेकिन अकेले अपने दम पर बनेगी ये दिग्गज से दिग्गज भाजपाई भी नहीं सोच पा रहे थे। यही कारण था कि पार्टी आखिरी दम तक अपने सहयोगियों की संख्या बढ़ाने में लगी थी। गठबंधन के लिए बातचीत का दौर खुला हुआ था। लेकिन भारत के चुनावी इतिहास में सबसे लंबे चले चुनाव का जब 16 मई को परिणाम आया तो उसने भारतीय राजनीति की तस्वीर बदल कर रख दी। आजादी के 67 साल बाद पहली बार देश में किसी गैर कांग्रेसी दल को अकेले अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिल गया। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का दूर-दूर तक सूपड़ा साफ हो गया। कांग्रेस पार्टी किसी भी राज्य में दो अंकों में सीटें नहीं ला पाई और अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन करते हुए 44 सीटों पर सिमट गई। देश की जनता ने मिलीजुली सरकार की कमजोरियों और लाचारियों का एक झटके में इलाज कर दिया। क्षेत्रीय पार्टिंयों की ब्लैकमेलिंग पर एकाएक विराम लग गया। उठापटक के पुरोधाओं के चेहरे लटक गए और मजबूत राष्ट्र का सपना देखने वालों की आंखें छलक उठीं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की ऐतिहासिक जीत की गवाह बनकर 16 मई की तारीख देश के स्वर्णिम इतिहास में दर्ज हो गई। 2014 के चुनाव परिणाम की सबसे मजेदार बात ये है कि इनके आंकड़े इतने एक-तरफा थे कि इनको याद रखना किसी के लिए भी बेहद आसान है।

खिसियानी बिल्ली
भाजपा की ये ऐतिहासिक जीत न तो विपक्ष को हजम हो रही थी और न कुछ पत्रकार रूपी चुनाव विश्लेषकों को। जब कोई तर्क देते नहींे बना तो कहा गया कि भाजपा को सीटें भले ही 282 मिल गई हों, लेकिन उसका वोट शेयर महज 31.3 प्रतिशत है, जो उसे सबसे कम वोट पाकर बहुमत लाने वाली सरकार की श्रेणी में डालता है। पर अगर आंकड़ों को गहराई से विश्लेषण किया जाए तो भाजपा की स्थिति किसी भी दृष्टि से कमजोर नहीं लगती। भाजपा ने कुल लोकसभा सीटों में से केवल 428 पर ही अपने उम्मीदवार खड़े किए थे और इन सीटों का वोट शेयर 40 प्रतिशत बैठता है। भाजपा ने गुजरात में 60 प्रतिशत से ज्यादा वोट पाए। कुल 6 प्रदेशों और केंद्र शासित प्रदेशों में 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल गए। जबकि कुल 9 प्रदेशों और केंद्र शासित प्रदेशों में 40 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले और तीन राज्यों में 30 प्रतिशत से ज्यादा मत मिले।

यूपी ने दिखाया दम
सभी पोल पंडितों को हैरानी में डालते हुए भाजपा ने दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और गोवा में शत प्रतिशत सीटें जीतकर अनोखा इतिहास रचा। इसके अलावा मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश में भी ऐतिहासिक जीत दर्ज कराई। उत्तर प्रदेश में 80 में से 71 सीट जीतकर भाजपा ने ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया जो खुद उसके लिए भी तोड़ना अब मुश्किल होगा। उत्तर प्रदेश में भाजपा की जबरदस्त जीत के पीछे एक ऐसा माहौल खड़ा था, जो अब शायद की कभी मिले। उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत में जो फाॅर्मूला काम किया उसे ऐसे लिखा जा सकता है- 

"केंद्र सरकार के खिलाफ लहर+राज्य सरकार के खिलाफ गुस्सा+नरेंद्र मोदी लहर+मुजफ्फरनगर दंगों का दंश = भाजपा की ऐतिहासिक जीत"

ये भाजपा के पक्ष में एक ऐसा ब्लेंड था जो आगे कभी नहीं मिलेगा और भाजपा का भविष्य में 71 सीटें जीत पाना बेहद मुश्किल है। 

अन्य राज्य
उधर मध्य प्रदेश में 29 में से 27 सीट जीतकर भाजपा ने अपना परचम लहरा दिया। जो दो सीटें कांग्रेस के खाते में गईं उनमें ज्योतिरादित्य सिंधिया की ग्वालियर सीट और कमलनाथ की छिंदवाड़ा सीट शामिल है। राजघराने से जुड़े सिंधिया की जीत तो समझ आती है, लेकिन जबरदस्त मोदी लहर के बीच कमलनाथ का अपनी सीट निकाल पाना काबिले तारीफ है। जबकि छत्तीसगढ़ में भाजपा ने 11 में से 10 सीटें जीतीं, जो एक दुर्ग सीट पार्टी हारी उसके पीछे भी कहा जा रहा है कि पार्टी के स्थानीय नेतृत्व ने इसे जानबूझकर हारा। जम्मू कश्मीर जैसे सेंसिटिव राज्य में भी पार्टी ने छह में से तीन सीट जीतकर सबको हैरत में डाल दिया। जम्मू कश्मीर से अब्दुल्ला परिवार का पूरी तरह सफाया हो गया। इधर बिहार में भाजपा ने भले ही 40 में से 22 सीटें जीती हों, पर उसका वोट शेयर महज 29.9 प्रतिशत ही रहा। आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को इस तरफ ध्यान देना होगा। जबकि कर्नाटक में भाजपा ने 28 में से 17 सीटें जीतकर मजबूत वापसी की और 43.4 प्रतिशत मत प्राप्त किए।

कहां हुई दुर्गति
जिन बड़े राज्यों में पार्टी की दुर्गति हुई उनमें दक्षिण और पूर्व के राज्य शामिल हैं। केरल में बिना खाता खोले पार्टी को 10.5 प्रतिशत मत मिले। तमिलनाडु में 5.5 प्रतिशत मत पाकर एक सीट जीती जबकि एक सीट सहयोगी पीएमके ने। जबकि जयललिता की अन्नाद्रमुक ने 37 सीटों पर जबरदस्त सीट दर्ज की। भ्रष्टाचार के चलते कानूनी चंगुल में फंसा करुणानिधि परिवार को सिफर पर धूल चाटनी पड़ी। उड़ीशा में 21 में से 20 सीटों में नवीन पटनायक की बीजद ने शानदार जीत दर्ज कराई, लेकिन एक सीट जीतकर भी भाजपा को राज्य में 21.9 प्रतिशत मत मिले जो पार्टी के लिए एक अच्छा संकेत हो सकता है। पश्चिम बंगाल में 42 में से 34 सीटें जीतकर ममता दीदी ने अपना दबदबा कायम रखा, जबकि भाजपा ने अपने वोट शेयर में दस प्रतिशत का इजाफा करते हुए 17 प्रतिशत मतों के साथ दो सीटें जीतीं। बंगाल में सीपीआईएम के वोट शेयर में जबरदस्त कमी आई, जो ये संकेत देता है कि वहां का वोटर विकल्प की तलाश में है। आंध्र प्रदेश में भाजपा टीडीपी के साथ गठबंधन में थी और दोनों ने मिलकर 25 में से 17 सीटें जीतीं, लेकिन दो सीटों पर सिमटी भाजपा के लिए आंध्र में स्थिति कुछ बहुत अच्छी नहीं है। जबकि हाल में अलग हुए तेलंगाना में भी पार्टी कोई विशेष उपलब्धि दर्ज नहीं करा पाई। 

भाजपा की कमजोर नस
भाजपा भले ही एक राष्ट्रीय पार्टी हो, लेकिन केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तलंगाना, पश्चिम बंगाल और उड़ीशा में उसकी स्थिति कमजोर है। पंजाब में अकाली दल के बिना पार्टी अभी तक कुछ खास नहीं कर पाई है। जबकि पर्वोत्तर राज्यों में अरुणाचल और आसाम में पार्टी अगली बार राज्य सरकार बनाने की स्थिति में लग रही है, किंतु मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम में पार्टी बेहद कमजोर है। केंद्र शासित राज्यों की बात करें तो एक लक्षद्वीप ही है जहां भाजपा के लिए निकट भविष्य में कोई संभावना नजर नहीं आती।
(To be continued....)

रविवार, 10 मई 2015

चुनाव जो इतिहास रच गया (भाग-1): चारों ओर नमो-नमो का शोर

16वीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव के जब 16 मई 2014 को परिणाम सामने आए तो वे अविस्मरणीय और हतप्रभ करने वाले थे। 16 मई की तिथि इतिहास में इस तरह दर्ज हो गई कि जब-जब बदलाव पर चर्चा होगी तो इस तिथि का जिक्र आएगा। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार किसी गैर कांग्रेसी दल को बहुमत देकर भारतीय मतदाताओं ने अपने वोट की ताकत का अहसास करा दिया। मतदाताओं ने न केवल एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार दी बल्कि इन परिणामों के माध्यम से देश के राजनीतिज्ञों को कई छिपे हुए संदेश भी दे दिए। जिस सुंदर राष्ट्र का सपना सड़क से लेकर संविधान तक आम लोगों को दिखाया जाता रहा, अब जनता उसे हकीकत में तब्दील होते देखना चाहती है। इसी उम्मीद के साथ देश के जनमानस ने नरेंद्र मोदी में अपनी आस्था दिखाई और उनके हाथ में एक मजबूत सरकार की बागडोर सौंप दी। उस ऐतिहासिक चुनाव परिणाम की पहली वर्षगांठ पर एक पुनरावलोकलनः
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ब भारतीय जनता पार्टी ने अपने वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की नाराजगी मोल लेकर 10 जून 2013 को नरेंद्र मोदी को 2014-लोकसभा चुनाव के लिए अपना प्रचार प्रमुख चुना था तब शायद किसी को ये अंदाजा नहीं रहा होगा कि मोदी पार्टी के लिए ऐसा प्रचार करेंगे जो न किसी ने कभी देखा होगा और न सुना। मोदी ने देश का ऐसा तूफानी दौरा किया कि 32,87,590 वर्ग किलोमीटर में फैला ये विशाल राष्ट्र उनके हौसले के सामने एक छोटा सा गांव नजर आया। चुनाव प्रचार के दौरान मोदी तीन लाख किलोमीटर से ज्यादा यात्रा कर कुल 440 रैली और 5827 अन्य कार्यक्रमों के सूत्रधार बने। भारत के चुनावी इतिहास में देश की जनता ने ऐसा जोशीला प्रचार कभी नहीं देखा था। चैनल से लेकर अखबारों तक, रेडियो से लेकर लाउडस्पीकरों तक, गली मोहल्लों से लेकर रैलियों तक, हर मोर्चे पर मोदी विपक्षी पार्टियों पर भारी और बहुत भारी पड़ते दिखे। चुनाव शुरू होने से पहले पोल पंडित ये तो कह रहे थे कि एनडीए की सरकार बनेगी, लेकिन कोई खुलकर ये कहने को तैयार नहीं था कि भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलेगा। लेकिन नौ चरणों का मतदान खत्म होते-होते कई सर्वे यह कहने को मजबूर हो गए कि भाजपा पूर्ण बहुमत से आ रही है।

चैनल बोले नमो-नमो
विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जहां धार्मिक विविधता सबसे ज्यादा है और शायद इसीलिए साम्प्रदायिक दंगे भारत में एक हकीकत हैं। ये दंगे न अंग्रेज रोक पाए और आजादी के बाद न कोई भारतीय सरकार रोक पाई। लेकिन भारतीय न्यूज चैनलों ने जितना पोस्ट माॅर्टम 2002 के गुजरात दंगों का किया और जितनी कीचड़ वहां के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर उछाली गई वैसा सुलूक भारतीय इतिहास में न तो किसी सरकार और न ही किसी नेता के साथ किया गया। यूपीए के दस साल के शासन में भारतीय न्यूज चैनल तकरीबन हर रोज गुजरात दंगों का जिक्र कर मोदी को नीचा दिखाने का कोई न कोई प्रयास करते दिखते थे। बात साम्प्रदायिकता की हो रही हो, तो उसे जबरदस्ती मोड़कर गुजरात ले जाया जाता था। पर 2014 के लोकसभा चुनाव आते-आते उसी मीडिया के सुर बदलने लगे। 2002 के दंगों को लेकर पिछले 12 सालों से हाथ-पांव धोकर नरेंद्र मोदी के पीछे पड़ी भारत की सबसे तेज मीडिया, मोदी रंग में रंगती चली गई। यकायक मीडिया ने मोदी के खिलाफ जहर उगलना बंद कर दिया और ‘तटस्थ’ खबरें दिखाने लगी। ब्रांड मोदी ने मीडिया को टीआरपी भी खूब दिलाई। बताने वाले ये भी कहते हैं कि कुछ बड़े उद्योगपतियों के माध्यम से कुछ बड़े मीडिया घरानों में पैसा लगवाया गया और विचारधारा विशेष के लिए काम कर रहे कुछ जहरीले पत्रकारों की छुट्टी का रास्ता साफ हुआ। दिल्ली के प्रेस क्लब में हल्के-हल्के सुरूर में कुछ खबरनवीस दिन के उजाले में ये कहते हुए दिख जाएंगे कि सभी सिद्धांतवादी, सत्यवादी और सुपर फास्ट न्यूज चैनलों ने मोदी को व्यापक कवरेज देने के एवज में भाजपा से ‘ठीकठाक’ दोहन भी किया। वह भी कुछ इस तरह कि पेड न्यूज का हंटर भी उनकी कमर पर न पड़े।

नारे जो जमकर चले
भाजपा के विजय अभियान में ‘अबकी बार मोदी सरकार’ ऐसा नारा रहा जो बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ गया। इस नारे को भ्रष्टाचार, अत्याचार, दुराचार, आम का अचार और न जाने किस-किस चीज के साथ जोड़कर लगाकर चलाया गया। ये नारा जमकर चला और ऐसा चला कि 16 मई को आए परिणामों में सच्चाई में तब्दील हो गया।

इसके अलावा जब मोदी समर्थकों ने वाराणसी में उनकी एक रैली में ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी’ का नारा लगाया तो ये भी लोगों ने हाथों-हाथ लिया। भगवान शिव के ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे से उधार लेकर बनाया गया ये नारा उस समय विवादों में घिर गया जब द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद ने इस पर आपत्ति दर्ज कराई। वैसे स्वामी स्वरूपानंद जी का कांग्रेस प्रेम और संघ से टकराहट जगजाहिर है, फिर भी खुद नरेंद्र मोदी को सामने आकर ये नारा न लगाने की अपील करनी पड़ी। 

इसके अलावा भाजपा के विज्ञापन ‘अच्छे दिन आने वाले हैं' की संगीतमय धुन इतनी सहज, कर्णप्रिय और उम्मीद जगाने वाली थी कि लोगों ने इसे हाथों हाथ लिया। पर पीएम बनने के बाद नरेंद्र मोदी को सबसे ज्यादा ताने, उलाहने ‘अच्छे दिन’ को लेकर ही सुनने पड़ रहे हैं।

हर वक्त कुछ नया करने की फिराक में रहने वाले नरेंद्र मोदी ने भाजपा का एंथम भी लांच किया। इस इलेक्शन एंथम में उन्होंने खुद अभिनय किया और अपनी आवाज भी दी। ‘मैं देश नहीं झुकने दूंगा’ के शब्द लोगों के बीच उतने चर्चित तो नहीं हो पाए, फिर भी नरेंद्र मोदी ने खुद इस गीत में अपनी आवाज देकर लोगों तक अपना संदेश पहुंचा दिया।

कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी
‘कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना’ किसे कहते हैं ये 2014 के भाजपा के प्रचार अभियान में देखा जा सकता है। चुनाव आते-आते ये बात लगभग साफ हो चुकी थी कि देश में जबरदस्त कांग्रेस विरोधी माहौल है और सत्ता बदलनी तय है। लेकिन मोदी इस माहौल को पूर्ण बहुमत में तब्दील करना चाहते थे। पर भाजपा के चुनावी इतिहास को देखते हुए पूर्ण बहुमत एक सपने जैसा ही था। इसलिए मोदी ने चाय पे चर्चा करने से लेकर थ्री-डी रैली तक, सेल्फी से लेकर सोशल मीडिया तक, हाई प्रोफाइल मंच से लेकर एलसीडी स्क्रीन तक हर वो माध्यम अपनाया जो जन-जन तक उनकी आवाज को पहुंचाए और तब तक पहुंचाए जब तक लोगों को ये विश्वास न हो जाए कि अगला पीएम बनने लायक अगर देश में कोई है तो वो हैं नरेंद्र मोदी। मोदी के इस हाई-टेक प्रचार अभियान के सामने सारे विपक्षी दल बेहद बौने नजर आए। हालांकि इस हाई टेक प्रचार में हुए खर्च पर उंगलियां उठती रहीं हैं।

रंग लाया ‘एक बूथ-एक बोलेरो’
मोदी की रैलियों में जबरदस्त भीड़ जुटाने के लिए ‘एक बूथ-एक बोलेरो’ का फाॅर्मूला खूब रंग लाया। मोदी ने देश भर में तकरीबन 440 रैलियों को संबोधित किया। इसके लिए भाजपा और संघ कार्यकर्ताओं को हर बूथ से कम से कम आठ लोगों को लाने की जिम्मेदारी दी गई थी। इसी फाॅर्मूले के दम पर मोदी की रैलियों में जनसैलाब देखने को मिला। मोदी खुद भी पूरी तैयारी के साथ हर रैली में पहुंचते थे। वे अपने हर भाषण में स्थानीय लोगों के साथ रिश्ता जोड़ने का प्रयास करते थे, स्थानीय समस्याओं पर चर्चा करते थे, जो लोगों के मन पर असर डालता था। भाषण में उस क्षेत्र के महापुरुषों का जिक्र करना भी मोदी नहीं भूलते थे। इससे लोगों में यह संदेश जाता था कि बंदे को हमारी समस्याओं के बारे में पता है। हर क्षेत्र की रैली में मोदी इसी तरह जनभावनाओं को समझकर अपने भाषण का मसौदा तैयार करके माइक संभालते थे।

एनआरआई योगदान
प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी जिस अप्रवासी भारतीय समुदाय की प्रशंसा करते नहीं थकते, उस समुदाय का भी चुनाव मोदी के प्रचार में कुछ कम योगदान नहीं रहा। विदेशों में बैठे भाजपा के सिम्पैथाइजर्स की एक बड़ी फौज कामधाम छोड़कर भारत पहुंची हुई थी और चुनाव प्रचार में सहयोग कर रही थी। कुछ लोगों ने वाॅल्यूंटीयर्स के समूह बनाकर इंटरनेट पर सोशल मीडिया और वेबसाइट्स पर भाजपा के समर्थन में माहौल बना रखा था। सोशल मीडिया पर भाजपा समर्थक अपने विरोधियों पर बहुत भारी पड़े। एनआरआई समुदाय ने भाजपा को चुनाव लड़ने के लिए चंदा भी जमकर दिया। यही सब कारण हैं कि पीएम मोदी अप्रवासी भारतीयों के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव रखते हैं और पीएम बनने के बाद उन्होंने अप्रवासी भारतीयों को नागरिकता और वीजा संबंधी बहुत सी सहूलियतें और रियायतें भी दी हैं। अप्रवासी भारतीयों में अपने देश के लिए कुछ करने की एक जबरदस्त भूख है। मोदी को अमेरिका द्वारा वीजा देने से इंकार करना अप्रवासी भारतीयों के बीच नाक का सवाल बन गया था। यही कारण है कि पीएम बनने के बाद मोदी के पहले अमरीकी दौरे पर अप्रवासी भारतीयों ने उनका एक हीरो की तरह स्वागत किया और मैडिसन स्क्वायर में एक अभूतपूर्व कार्यक्रम का आयोजन किया।
(To be continued...)

बुधवार, 1 अप्रैल 2015

बिहार चुनावः भाजपा सरकार या जनता परिवार


2014 के लोकसभा चुनाव से लेकर अक्टूबर 2015 में जब बिहार का चुनाव होगा तब तक पाटलिपुत्र की राजनैतिक परिस्थितियों में बहुत परिवर्तन आ चुका होगा। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न चुनाव के दौरान भी वही होगा और आज भी वही है कि सत्ता का स्वाद कौन चखेगा। क्या अपने करिश्माई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा बिहार में पूर्ण बहुमत हासिल करेगी, या फिर लालू-नीतीश की गलबहियां कोई रंग खिलाएंगी या कांग्रेस किंग मेकर बनकर उभरेगी, क्या आम आदमी पार्टी के मुखिया केजरीवाल (अपने स्टैंड, कि दिल्ली के बाहर अभी नहीं जाएंगे से यू टर्न लेकर) पार्टी के लिए बिहार के पानी में गहराई नापेंगे या फिर जीतन राम मांझी अपने राजनीतिक कौशल से नीतीश से अपने अपमान का बदला लेंगे? सवाल बहुत सारे हैं, मगर जवाब अभी किसी के पास नहीं। लेकिन अगर पिछले एक साल के दौरान हुए लोकसभा और विधानसभा चुनावों के आंकड़ों का जायजा लिया जाए तो अंदाजा जरूर लगाया जा सकता है कि बिहार का चुनाव किस करवट जा सकता है।

लोकसभा चुनाव 2014
2014 के लोकसभा चुनाव के परिणामों का विश्लेषण करें तो बिहार में भाजपा ने 40 में से कुल 30 सीटों पर चुनाव लड़ा और 30 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 22 सीटों पर विजय दर्ज कराई। जबकि उसके सहयोग से रामविलास पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी ने सात सीटों पर चुनाव लड़कर 6.5 प्रतिशत वोट शेयर के साथ छह सीटों पर जीत दर्ज कराई। भाजपा की दूसरी सहयोगी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने तीन सीटों पर चुनाव लड़ा और 3.1 प्रतिशत वोट पाकर तीनों सीटें जीत लीं।

वहीं बिहार के दूसरे धड़े पर नजर डालें तो लालू यादव की राजद ने 20.5 प्रतिशत वोट शेयर के साथ चार सीटें जीतीं। जबकि नीतीश की जनता दल यूनाइटेड ने 16 प्रतिशत वोट शेयर के साथ दो सीटों पर जीत दर्ज की। उधर सोनिया गांधी की कांग्रेस ने 8.6 प्रतिशत वोट पाकर दो सीटें जीतीं।

विधानसभा पर लोकसभा का असर
अब लोकसभा के इन परिणामों को विधानसभा वार परिवर्तित किया जाए तो भाजपा कुल 121 विधानसभा सीटों पर आगे थी और 49 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही, उसकी सहयोगी लोकजनशक्ति पार्टी 34 विधानसभा सीटों पर आगे थी और 7 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही और उसकी दूसरी सहयोगी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी 17 विधानसभा सीटों पर आगे रही और 1 सीट पर दूसरे स्थान पर। इनको जोड़ा जाए तो एनडीए कुल 172 सीटों पर आगे रहा और 57 सीटों पर दूसरे स्थान पर। बिहार विधानसभा में 243 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए 122 सीटों की जरूरत है, अगर लोकसभा चुनाव परिणामों को हूबहू विधानसभा पर लागू कर दिया जाए तो एनडीए बहुत आराम से सरकार बनाता नजर आ रहा है। लेकिन फिर वही बात है कि 2014 से लेकर 2015 तक पटना की गंगा में बहुत पानी बह चुका होगा।

यही लोकसभा परिणाम अगर भाजपा की विरोधी पार्टियों पर लागू किए जाएं तो राष्ट्रीय जनता दल 32 सीटों पर आगे रही और 110 सीटों पर दूसरे स्थान पर, जबकि जनता दल यूनाइटेड 18 सीटों पर आगे रही और 27 सीटों पर दूसरे स्थान पर और कांग्रेस 14 सीटों पर आगे रही और 44 सीटों पर दूसरे स्थान पर। इन तीनों को अगर जोड़ा जाए तो ये तीनों विरोधी दल 66 सीटों पर आगे रही और 181 सीटों पर दूसरे स्थान पर। इन आंकड़ों के अनुसार तो विरोधी दलों की सरकार बनना मुश्किल लगती है, लेकिन इस बार परिवर्तन ये आ गया है कि लालू और नीतीश एक हो गए हैं, लिहाजा उनका गठबंधन भाजपा के सामने कितनी बड़ी चुनौती पेश कर पाता है ये कहना मुश्किल है।

भाजपा और जनता परिवार की मुश्किलें
बिहार की राजनीति को सतही तौर पर देखा जाए तो मोटे तौर पर माहौल भाजपा के पक्ष में नजर आता है। लेकिन भाजपा की अच्छे बहुमत वाली जीत इसी बात पर निर्भर करेगी कि दिल्ली के विध्वंस के बाद पार्टी कितनी एकजुटता के साथ चुनाव लड़ती है। जनता परिवार तो भाजपा को चुनौती देने की कोशिश कर ही रहा है, लेकिन उसके सामने पहली चुनौती होगी लोजप और रालोप के साथ सीटों का बंटवारा। महाराष्ट्र जैसे अनुभव से बचने के लिए पार्टी की पहली कोशिश यही होनी चाहिए कि वह अपने दम पर बहुमत प्राप्त करे और बाद में दोनों सहयोगियों को भी सरकार में स्थान दे। पार्टी के लिए दूसरी चुनौती होगी कि वह अपना सीएम उम्मीदवार चुनाव से पहले घोषित करे या बाद में। हालांकि सुशील मोदी उर्फ सुमो अपनी जबरदस्त दावेदारी पेश करते रहे हैं, फिर भी यह निर्णय बेहद अहम है। भाजपा के सामने तीसरी चुनौती होगी टिकट बंटवारे के बाद बागियों से निपटना। ये बात भी ध्यान देने की है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने वोट डालते वक्त जाति की दीवारों को भी दरकिनार करके भाजपा के पक्ष में वोट दिया। लेकिन विधानसभा चुनावों में वैसा हो पाना बहुत मुश्किल है।

वहीं दूसरी ओर जनता परिवार के लिए उम्मीदें संजोए बैठे नीतीश कुमार की राह बिल्कुल आसान नहीं है। नीतीश द्वारा सालों पुराना गठबंधन तोड़ने के फैसले के बाद उन पर पीठ में छुरा भोंकने का बड़ा आरोप भाजपा लगाती रही है। चुनाव की घोषणा होते ही उनकी पार्टी पर टूटने का खतरा मंडरा रहा है। दूसरे, लालू का साथ कितना भरोसेमंद और कितना लंबा चलेगा यह कहना मुश्किल है। ऊपरी तौर पर जनता परिवार सत्ता के लिए इक्ट्ठे हुए मौका परस्त लोगों का समूह ही नजर आता है। उनमें लोगों के लिए गंभीरता कम और कुर्सी के लिए आतुरता ज्यादा नजर आती है, जहां साफ छवि वाले नीतीश कुमार फिर से बिहार की रण जीतने की खातिर भ्रष्टाचार में आरोपी लालू का भी साथ लेने को तैयार हैं और जेल काट रहे ओमप्रकाश चैटाला को भी। भाजपा अगर ये सब चीजें अगर बिहार के लोगों को समझाने में सफल रही तो जनता परिवार के सपने टूट सकते हैं।

‘आप’ और ‘हम’ का असर 
बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) और जीतन राम मांझी की हिंदुस्तान आवाम मोर्चा (हम) भी अपना दम आजमा सकते हैं। दिल्ली में बुरी तरह अंदरूनी कलह से जूझ रहे केजरीवाल ने यूं तो शपथ लेते वक्त दिल्ली के बाहर जाने की अनिच्छा प्रकट की थी, लेकिन बाद में खबरें आईं कि आप दिल्ली के बाहर भी चुनावी भाग्य आजमाएगी। दिल्ली में चमत्कार करने वाली आप बिहार में शायद ही कोई जादू कर पाए। पार्टी की वर्तमान अंदरूनी हालात देखकर तो लगता है कि पार्टी चुनाव लड़ने से भी इंकार कर सकती है। जबकि जीतन राम मांझी की ‘हम’ का एकमात्र उद्देश्य नीतीश कुमार से अपने अपमान का बदला लेना होगा। महादलितों के वोट विधानसभा सीटों में अहम किरदार अदा करते हैं, मांझी इस वोट को काट पाएंगे या नहीं चुनाव में ही पता चलेगा। भाजपा भी मांझी को अपने पक्ष में लेने का प्रयास कर सकती है।

अन्य राज्यों पर लोकसभा चुनाव का असर
लोकसभा चुनाव के बाद कुल पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें से भाजपा ने हरियाणा और झारखंड में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया। जबकि महाराष्ट्र और जम्मू कश्मीर में मिली जुली सरकार बनाने में सफलता मिली। लेकिन दिल्ली के विस्मयकारी परिणाम ऐसे रहे कि पार्टी को अभूतपूर्व हार का सामना करना पड़ा। नीचे चित्रों में दिया गया विश्लेषण ये बताने का प्रयास करता है कि लोकसभा चुनाव के अनुसार इन राज्यों की विधानसभाओं में कितनी सीटें अनुमानित की गई थीं और वास्तविक परिणाम क्या रहे। वैसे तो हर राज्य की परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं फिर भी बिहार के बारे में एक मोटा अंदाजा लगाया जा सकता है।

हरियाणा


झारखण्ड 


महाराष्ट्र 


जम्मू कश्मीर 


दिल्ली 

बिहार



शनिवार, 27 दिसंबर 2014

चुनावों का देश बनता जा रहा भारत

लोकतंत्र और चुनाव एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं या कहें कि इनका चोली-दामन का साथ है। लेकिन देश में बार-बार चुनावी बुखार चढ़ना भी उचित नहीं हैं। भारत में किसी न किसी बहाने से चुनाव इतनी बार आते हैं कि इसे चुनावों का देश कहना गलत नहीं होगा। लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव एक साथ न होने की वजह से हर साल भारत में चुनावी मेला लगता है। बार-बार टीवी पर लोग भाषण, रैलियां, घोषणाएं, वादे, आरोप, प्रत्यारोप और राजनीतिक छीछालेदर देखते हैं। 

2014 को ही लें, मार्च, अप्रैल, मई में आम चुनाव हुए। इसके साथ में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उड़ीशा, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में भी चुनाव हुए। पूरा देश तकरीबन चार महीनों तक चुनावी बुखार की गिरफ्त मेें रहा। कुछ महीने भी नहीं बीते थे कि हरियाणा और महाराष्ट्र में चुनाव आ गए, फिर एक बार सियासी पारा चढ़ गया। अंत में साल जाते-जाते जम्मू-कश्मीर और झारखंड के विधानसभा चुनाव देश को राजनीतिक सरगर्मियों में ले गया।

अब आने वाले 2015 में अगर किसी राज्य में सरकार नहीं गिराई गई (या नहीं गिरी) तो दो बड़े चुनाव सूची में हैं- दिल्ली और बिहार। दिल्ली में चुनाव फरवरी और मार्च में होने की उम्मीद है, तो बिहार विधानसभा का कार्यकाल नवंबर में पूरा हो रहा है। इसके बाद फिर देश को 2016 में आसाम, केरल, पुद्दुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का सामना करना होगा। शायद ही कोई साल ऐसा हो जब देश में चुनाव मुंह बाय न खड़े हों।

अब लोकतांत्रिक देश है तो चुनाव तो होंगे ही। चुनाव से इंकार करने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है, पर प्रश्न ये है कि क्या बार-बार होने वाले चुनावी खर्च से बचने के लिए कोई रास्ता नहीं खोजा जा सकता। पाकिस्तान में पूरे देश के अंदर केंद्र और राज्य के चुनाव एक साथ होते हैं। पहले भारत में भी यही व्यवस्था थी, लेकिन राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता के कारण समयावधि बदलती चली गई। और आज ये स्थिति है कि देश हर साल ही नहीं, साल में कई-कई बार चुनाव कराने के लिए मजबूर है।

बार-बार होने वाले चुनावों के कारण केंद्र में बैठी सरकार को ठोस निर्णय लेने में बाधा आती है। देश में चुनावों के दौरान लोकलुभावन नीति अपनाने की परंपरा है, जिसके कारण राष्ट्रहित में कड़े फैसले लेने से केंद्र सरकार को डर लगता है। भारत में आम जनता की सोच अभी इतनी परिपक्व नहीं हुई है। यहां तो प्याज के बढ़े हुए दामों की वजह से भी पार्टियों को चुनाव हारने पड़ जाते हैं। 

इसलिए व्यापक राष्ट्रहित में ये जरूरी है कि देश केंद्र और राज्यों में चुनाव एक साथ हों। भाजपा ने इस मुद्दे को अपने एजेंडे में भी जगह प्रदान की थी, लेकिन फिलहाल इस दिशा में कोई पहल नहीं होती दिख रही है। केंद्र और राज्य में चुनाव एक-साथ कराने के लिए भले ही सहमति न बने या इसमें वक्त लगे, लेकिन कम से कम इतना तो किया जा सकता है कि किसी साल के भीतर होने वाले सभी चुनावों को एक-साथ क्लब करके एक साथ कराए जाएं। जैसे 2015 में दिल्ली और बिहार के चुनाव अलग-अलग महीनों में होंगे। इन दोनों चुनावों को साल के मध्य में एक साथ कराया जाए, इससे समय और धन दोनों की बचत होगी। ये व्यवस्था देने में कोई बहुत बड़ा पेच नहीं है, केवल राजनीतिक दलों के बीच आपसी सहमति बनाने की जरूरत है।

बार-बार चुनाव होने के कुछ फायदे भी हैं, खबरिया चैनलों को 24 घंटे चैनल चलाने के लिए भरपूर मसाला मिल जाता है, ओपीनियन पोल और एग्जिट पोल करने वाली सर्वे कंपनियों को चांदी कूटने का मौका मिल जाता है और चुनाव से जुड़े एक बड़े बाजार को बिजनेस मिल जाता है। पर बार-बार मचने वाले चुनावी शोर के बीच आम आदमी की समस्याएं और उसके मुद्दे कहीं दबते चले जाते हैं।

‘हनुमान अंश’ की सफलताः देशज कहानी की जीत

भारतीय सिनेमा में सफलता का पैमाना लंबे समय से बड़े बजट, बड़े सितारों, विदेशी लोकेशन और भव्य प्रचार से जोड़ा जाता रहा है। ऐसे समय में ‘हनुमान अं...