भारतीय संस्कृति की पहचान हमेशा “थोड़ा ज़्यादा देने” में रही है। यहाँ 100 नहीं, 101 देने की परंपरा है—क्योंकि इसमें सिर्फ लेन-देन नहीं, बल्कि अपनापन और सुरक्षा का भाव होता है। दूधवाला माप से थोड़ा ऊपर तक दूध भर देता था, किसान अनाज तौलने के बाद एक मुट्ठी और डाल देता था। यह “एक मुट्ठी ज़्यादा” ही तो विश्वास की असली पूँजी थी।
लेकिन आज के समय में यह भावना जैसे धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। अब बाजार का नया मंत्र है—“कम दो, ज़्यादा लो।” इसे बड़े आराम से “कॉस्ट कटिंग” का नाम दे दिया गया है, ताकि सुनने में आधुनिक लगे, लेकिन असल में यह ग्राहक के हिस्से और सुरक्षा—दोनों की कटौती है।
इस सोच का सबसे चिंताजनक उदाहरण कार कंपनियों में देखने को मिलता है। कभी गाड़ी में मिलने वाली स्टेपनी सिर्फ एक अतिरिक्त टायर नहीं होती थी, बल्कि रास्ते में आने वाली अनिश्चितताओं के खिलाफ एक मजबूत सुरक्षा कवच होती थी। पहले उसका आकार छोटा किया गया, और अब तो कई गाड़ियों से इसे पूरी तरह हटा ही दिया गया है।
Maruti Suzuki Grand Vitara जैसी गाड़ियों में स्टेपनी की जगह अब सिर्फ एक पंचर रिपेयर किट दी जा रही है।
अब ज़रा सोचिए—रात का अंधेरा, सुनसान सड़क, परिवार साथ में… और अचानक टायर फट जाता है। उस वक्त यह छोटी सी पंचर किट क्या कर पाएगी? क्या यह टायर के फटने या कट जाने की स्थिति में आपकी मदद कर सकती है? जवाब साफ है—नहीं।
उस पल में “कॉस्ट कटिंग” नहीं, “सुरक्षा” मायने रखती है। लेकिन जब सुरक्षा को ही कम कर दिया जाए, तो मुनाफे का यह खेल बेहद खतरनाक हो जाता है।
विडंबना यह है कि यही कंपनियाँ अपने विज्ञापनों में “फैमिली सेफ्टी”, “भरोसा” और “केयर” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती हैं। लेकिन असलियत में, सबसे ज़रूरी सुरक्षा कवच को ही हटा दिया जाता है—सिर्फ कुछ रुपये बचाने के लिए।
पहले कहते थे—“थोड़ा ज़्यादा दे दो, ग्राहक खुश रहेगा।”
आज कहा जा रहा है—“थोड़ा कम दे दो, कंपनी ज़्यादा कमाएगी।”
सवाल सिर्फ एक स्टेपनी का नहीं है, सवाल उस सोच का है—जहाँ मुनाफा इंसान की सुरक्षा से बड़ा हो गया है।
अब हमें तय करना है—क्या हम 101 देने वाली संस्कृति को बचाएंगे, या अपना समाज 99 में भी कटौती को चुपचाप स्वीकार कर लेगा?