गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

चार धाम में यात्रियों का रिकॉर्डः खुशियां मनाएं या चिंता करें

Dainik Bhaskar: 8.10.2026

चार धाम यात्रा में श्रद्धालुओं की संख्या का हर वर्ष नया रिकॉर्ड बनाना निश्चित रूप से प्रसन्नता का विषय है। यह बढ़ती आस्था का संकेत है, देश की बढ़ती आर्थिक क्षमता का परिचायक है और इस बात का भी प्रमाण है कि समाज में अध्यात्म एवं भारतीय संस्कृति के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है। लेकिन इस प्रसन्नता के साथ एक गंभीर चिंता भी जुड़ी है-क्या हमारे पहाड़ इतनी बड़ी संख्या में आने वाले वाहनों और यात्रियों का बोझ लंबे समय तक सह पाएंगे?

कभी यह चार धाम की यात्रा अत्यंत कठिन मानी जाती थी। सीमित सड़कें, दुर्गम रास्ते, परिवहन के अभाव और आर्थिक सीमाओं के कारण हर व्यक्ति के लिए बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री की यात्रा कर पाना संभव नहीं था। परिवार में कोई एक व्यक्ति यात्रा कर आया तो वह पूरे परिवार के लिए अनुभव और आस्था का वाहक बन जाता था। आज परिस्थितियां बदल गई हैं। सड़कों के चौड़ीकरण, बेहतर परिवहन सुविधाओं, पर्यटन के विकास और देश की बढ़ती आर्थिक समृद्धि ने यात्रा को पहले की तुलना में कहीं अधिक सुगम बना दिया है। देश के कोने-कोने से अब बड़ी संख्या में परिवार पहाड़ों का रुख कर रहे हैं। दिल्ली-एनसीआर के अनेक परिवारों के लिए तो पहाड़ उनका वीकएंड होम बन गया है।

यह बदलाव स्वागतयोग्य है। आस्था का विस्तार हो, युवा भारतीय संस्कृति और अध्यात्म से जुड़ें और देश के दूर-दराज क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को पर्यटन से गति मिले-इससे अच्छी बात क्या हो सकती है? स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है, होटल, होम-स्टे, परिवहन, छोटे व्यवसाय और अनेक सेवाओं को बढ़ावा मिलता है। चार धाम यात्रा आज केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि एक बड़ा आर्थिक और सामाजिक तंत्र बन चुकी है।

लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब आस्था के साथ नागरिक जिम्मेदारी नहीं चलती। पहाड़ों पर पहुंचने वाले अनेक नवोदित पर्यटकों में अभी वह सिविक सेंस विकसित नहीं हुआ है, जिसकी इन संवेदनशील क्षेत्रों को सबसे अधिक आवश्यकता है। सड़क किनारे फेंकी गई पानी की बोतलें, प्लास्टिक के पैकेट, खाने की पैकिंग, डिस्पोजेबल सामग्री और जगह-जगह बिखरा कचरा हमारे सिविक सेंस पर एक गहरा प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं। हरे-भरे पहाड़ में तैयार हो रहा है एक नया प्लास्टिक का पहाड़।

हमें यह समझना होगा कि पहाड़ मैदान नहीं हैं। यहां का पारिस्थितिकी तंत्र अत्यंत नाजुक है। छोटी-सी लापरवाही भी लंबे समय में बड़ी समस्या बन सकती है। बढ़ता ट्रैफिक, अनियंत्रित निर्माण, कचरा, प्लास्टिक, जलस्रोतों पर दबाव और प्राकृतिक ढलानों के साथ छेड़छाड़-ये सभी खतरे के संकेत हैं।

केदारनाथ की भयानक आपदा को समय के साथ हम भले ही भूलने की कोशिश करें, लेकिन पहाड़, नदियां और नाले उसे नहीं भूले हैं। प्रकृति बार-बार हमें संकेत देती है कि उसकी सहनशीलता असीमित नहीं है। बाजार और विकास की दौड़ में प्रकृति के साथ किया गया खिलवाड़ अंततः मनुष्य पर ही भारी पड़ता है।

इसलिए चार धाम यात्रा का अगला लक्ष्य केवल नया रिकॉर्ड बनाना नहीं होना चाहिए। लक्ष्य यह होना चाहिए कि हर यात्री अपने साथ एक जिम्मेदार नागरिक की भावना लेकर आए और प्रकृति पर अपना न्यूनतम प्रभाव छोड़े।

भारतीय संस्कृति में सदैव प्रकृति को महत्व दिया गया है। नदियां, पेड़, वन, पहाड़ हमारे लिए पूज्य रहे हैं। अतः उसी संस्कृति को ध्यान में रखते हुए हमें ऐसे चार धाम चाहिए जहां श्रद्धालुओं आएं, स्थानीय अर्थव्यवस्था समृद्ध हो, अध्यात्म की जागृति हो-लेकिन पहाड़ सुरक्षित रहें। क्योंकि विकास की दौड़ में हम बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं, पर प्रकृति को खोकर अंततः कुछ भी नहीं बचता।

मनुष्य प्रकृति को जीत नहीं सकता-अंतिम विजय सदैव प्रकृति की होती है।

चार धाम में यात्रियों का रिकॉर्डः खुशियां मनाएं या चिंता करें

Dainik Bhaskar: 8.10.2026 चार धाम यात्रा में श्रद्धालुओं की संख्या का हर वर्ष नया रिकॉर्ड बनाना निश्चित रूप से प्रसन्नता का विषय है। यह बढ़ती...