Monday, June 30, 2014

नया मंडी हाउस स्टेशन, नई सुविधाएं


मंडी हाउस स्टेशन के वाॅयलेट लाइन से जुड़ जाने के बाद वहां यात्रियों की संख्या खासी बढ़ गई है। आंकड़ेबाज बता रहे हैं कि राजीव चैक स्टेशन का 40 प्रतिशत भार मंडी हाउस की ओर सरक गया है। स्टेशन का नया हिस्सा सुंदर है और उसका कूलिंग सिस्टम पुराने हिस्से से ज्यादा बेहतर काम कर रहा है। नई चीज ये देखने को मिली कि डीएमआरसी ने दो बड़े-बड़े बोड्र्स पर आपके ज्ञान चक्षुओं को खोलने वाला मंडी हाउस इलाके का इतिहास उकेरा है। उस बोर्ड को पढ़कर ही पता चला कि जिस दूरदर्शन भवन में बैठकर अपन रोजी-रोटी कमा रहे हैं वो कभी मंडी के महाराजा की जागीर थी। इसी स्थान पर उनका भवन था जिसको मंडी हाउस कहा जाता था। 1970 में उनकी ये इमारत गिरा दी गई और दूरदर्शन भवन के निर्माण का रास्ता प्रशस्त हुआ।

इन दो डिस्प्ले बोर्ड्स पर आसपास की अन्य इमारतों जैसे फिक्की हाउस, एनएसडी, श्री राम सेंटर, टैगोर भवन आदि का इतिहास-भूगोल भी लिखा हुआ है। जिंदगी की रेस में शामिल मेट्रो यात्री इन बोड्र्स के पास से गुजरते वक्त अनायास ही रुक जाते हैं और कुछ पल ठहककर अपना ज्ञान वर्धन करते हैं।

इस स्टेशन से मेरे लिए दूसरा आराम ये हो गया है कि अब मुझे आॅफिस तक पहुंचने के लिए हिमाचल भवन वाली सड़क पार नहीं करनी पड़ती, पहले अपनी जिंदगी के दो मिनट मुझे दाएं-बाएं देखने में गंवाने पड़ते थे। अब स्टेशन के अंदर ही अंदर दूसरी तरफ बनी नई एग्जिट से बेड़ा पार उतर जाता है।

नए स्टेशन से तीसरा और सबसे अहम फायदा ये हुआ कि अब मुझे भारी जनसमर्थन मिल गया है। पहले वैशाली से आते वक्त मंडी हाउस स्टेश्न पर उतरने वाला अपने डिब्बे में मैं अकेला या दुकेला यात्री होता था। इसलिए खचाखच भरी मेट्रो में दरवाजे तक पहुंचने में काफी जद्दोजहद करनी पड़ती थी। किसी का पांव कुचलकर या किसी के पेट में कोहनी घुसाकर दरवाजा हाथ आता था। लेकिन अब बदरपुर की ओर जाने वाली बड़ी संख्या मेरे साथ मंडी हाउस उतरती है। ये लोग मेट्रो के दरवाजे पर भीम की तरह खड़े यात्रियों को पीछे ठेलने में काफी सहायक सिद्ध हो रहे हैं। तकरीबन बिना प्रयास के ही आप दरवाजे से बाहर खड़े नजर आते हैं।

तो नया मंडी हाउस स्टेशन मेरे लिए निजी तौर पर ये तीन सुविधाएं लेकर आया है। अब जब तक इधर नौकरी चलेगी सुविधाओं का आनंद लेते रहेंगे। इस बीच कोई नया जुगाड़ हो गया तो झोला उठाकर नई दिशा पकड़ लेंगे।

Thursday, June 12, 2014

शांति से निबटा पहला सत्र पर हंगामा तो होकर रहेगा


संसद का पहला सत्र नई सरकार और नए प्रधानमंत्री के लिए काफी हद तक सफल रहा। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लाए गए धन्यवाद प्रस्ताव पर दो दिन चली बहस में विपक्ष पूरी तरह बंटा हुआ दिखा। संसदीय परंपरा के मुताबिक राष्ट्रपति के प्रति आभार जताते वक्त प्रस्ताव का विरोध नहीं किया जाता और आम राय से इसे पारित कर दिया जाता है। लेकिन फिर भी विपक्ष सरकार द्वारा तैयार किए गए अभिभाषण में मीनमेख निकाल ही देता है। चर्चा के दौरान कांग्रेस ने अभिभाषण को भाजपा का मैनिफेस्टो और चुनावी नारे बताने की कोशिश की, और सरकार को ये भी बताया कि उसने कांग्रेस का माल उठाकर अपनी दुकान में रख लिया है। पर कांग्रेस के वक्ता ये समझाने में विफल रहे कि जब उनकी सोच देश के प्रति इतनी ही अच्छी थी तो उसका क्रियान्वयन क्यों नहीं किया? क्या केवल योजनाएं बना देने से ही देश का भला हो सकता है?

ममता और जयललिता के संसदीय सिपाहियों को सुनकर लगा कि वे संसद में नहीं बल्कि अपनी-अपनी विधानसभाओं में बोल रहे हों। दो दलों के नेता अपने भाषण में धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने से ज्यादा अपनी-अपनी नेताओं के गुणगान करने में ज्यादा व्यस्त दिखे। दोनों ही पार्टियों ने बातों-बातों में सरकार की तरफ दोस्ती के इशारे भी किये। चार सांसद लेकर संसद पहुंचे सपा के प्रमुख और एक मात्र वक्ता मुलायम सिंह यादव को जब कुछ नहीं सूझ तो उन्होंने बिना किसी ठोस सुबूत के 15 दिन पुरानी सरकार पर महंगाई बढाने का आरोप लगा दिया। आम आदमी पार्टी के वक्ता भी खास असर नहीं छोड़ पाए।

अमूमन बिना व्यवधान के चलने वाले धन्यवाद प्रस्ताव में भी बसपा राज्यसभा को दो बार दस-दस मिनट के लिए मुल्तवी करवाने में सफल रही। शुक्र है कि लोकसभा में हाथी के पास अंडा था इसलिए सदन निर्विघ्न चलता रहा। लोग इससे सीख ले सकते हैं कि संसद का पैसा और समय किस तरह बचाया जाए। वीके सिंह के ट्विीट पर सरकार की थोड़ी किरकिरी जरूर हुई पर अरुण जेटली ने मामले को संभाल लिया। लालकृष्ण अडवाणी और सोनिया गांधी ने चर्चा के दौरान चुप रहना ही बेहतर समझा।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने लोकसभा में और वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अपनी कुशल वाक शैली का लोहा मनवाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले भाषण बेहद बड़प्पन दिखाते हुए सधी हुई भाषा में बड़े प्यार से पूरे विपक्ष को आइना दिखा दिया।

संसद में होने वाली बहस की सबसे खूबसूरत बात यही है कि हर कोई अपनी-अपनी सहूलियत के हिसाब से किसी भी मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष में लामबंद हो जाते हैं। संसद की बहस से कम से कम ये तो सीखा जा सकता है कि कोई भी चीज पूरी तरह सही और गलत नहीं होती। कल तक धुर विरोधी रहे रामविलास पासवान पुरजोर तरीके से प्रधानमंत्री मोदी का पक्ष लेते नजर आए और राजग का अंग रहे जदयू के लिए आज मोदी से बड़ा गुनहगार कोई नहीं। राजनीति कुछ इसी तरह की चीज है कि राजनेता सबसे पहले अपना निजी हित साधते हैं, जब निजी हित सध जाए तो उसे राष्ट्रहित से जोड़ देते हैं। पल-पल अपना स्टैंड बदलने वाले क्षेत्रीय दलों पर ये बात खासतौर से लागू होती है।

हालांकि 2014 का जनादेश देखने के बाद तो लगता है कि लोग नेताओं के रंगों को समझने लगे हैं। कई दलों को शून्य पर लपेटकर जनता ने मौकापरस्ती और भ्रष्टाचार के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा जाहिर किया है। लोग 1998 से 2014 तक वाजपेयी और मनमोहन सरकार में टिड्डी दलों की ब्लैकमेलिंग देखते आए थे। राष्ट्रहित के फैसले लेने में भी किस तरह केंद्र सरकार मजबूर दिखती थी, वो मजबूरी के पल अब नहीं दिखेंगे। उम्मीद है कि अच्छे दिन आएंगे!

हालांकि आगे के सत्रों में विपक्ष सरकार का इतना सहयोग नहीं करेगा और हंगामा करने का कोई न कोई रास्ता जरूरत निकालेगा। जब हर स्तर पर मोदी सरकार नए प्रयोग करने के लिए आतुर है तो फिर संसद में समय की बर्बादी रोकने के लिए भी कुछ करना चाहिए। कुछ सुझाव ये भी हो सकते हैं-
  • सरकार और स्पीकर को संसदीय हंगामे पर जीरो टाॅलरेंस की पाॅलिसी अपनाएं।
  • सरकार और विपक्ष के बीच बेहतर तालमेल के लिए किसी भी मुद्दे को सदन में लाने से पहले बाहर चर्चा की जाए।
  • कार्यवाही में व्यवधान पैदा करने वालों और वेल में आने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाए।
  • एक दिन सदन स्थगित कराने पर सांसदों का चार दिन का वेतन काटा जाए, यात्रा भत्ता रद् किया जाए।
  • विवादास्पद मुद्दे सत्र के अंत में लाए जाएं।
  • सबसे ज्यादा हंगामा करने वाले सदस्यों को चिन्हित करके उनके चित्र संसद की वेबसाइट पर जारी किए जाएं।
  • सबसे अनुशासित सांसद के साथ-साथ सबसे गैर अनुशासित सांसद का खिताब दिया जाए।
पिछले दिनों अखबार में खबर पढ़ी कि संसद की कैंटीन में चाय के जबरदस्त सस्ते दाम देखकर नए - नए चुनकर आये एक सांसद ने चुटकी ली कि जब इतनी सस्ती चाय मिले तो सांसद बार-बार टी ब्रेक क्यों न लें। सांसद की इस बात में दम है। संसद की कैंटीन सबसे बेहतरीन भोजन तैयार करने वाली शायद भारत की सबसे सस्ती कैंटीन है। महंगाई को देखते हुए संसदीय कैंटीन की भोजन दरों में दस गुना इजाफा करने की आवश्यकता है। पहले सांसदों को मिलने वाला भत्ता और वेतन बहुत कम हुआ करते थे इसलिए ये सस्ती दरें रखी गई होंगी। लेकिन न तो अब सांसद गरीब हैं और न उनका वेतन कमजोर है। इसलिए संसद की कैंटीन को मुनाफे वाला आय का स्रोत बनाया जाए। सरकार चाहे तो संसद घूमने आने वाले स्टूडेंट्स के लिए सस्ता भोजन परोस सकती है।

Monday, June 9, 2014

यूपी में भाजपा किस पर लगाएगी दाव?


2014 के चुनाव में उत्तर प्रदेश से भाजपा को मिली सफलता को शतप्रतिशत कहा जा सकता है। क्योंकि जो सात सीटें पार्टी ने हारी हैं वे चेहरों पर आधारित सीटें थीं। अगर वे चेहरे उन सीटों से न खड़े होते तो ये सातों सीट भी भाजपा की झोली में गिरतीं। प्रदेश में हाशिए पर गए संगठन को अमित शाह की इंजीनियरिंग ने नई आॅक्सीजन प्रदान कर दी। सूबे में ऐसी मोदी सुनामी आई कि 73 सीटें झटक लीं और यहीं से केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार की बुनियाद बन गई।

अब पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि वह विधानसभा के स्तर पर भी कुछ ऐसा करिश्मा करे कि उत्तर प्रदेश को सपा के गुंडा राज और बसपा के भ्रष्ट राज से मुक्ति मिल सके। सपा-बसपा रूपी क्षेत्रीय ताकतों के सामने भाजपा 2007 और 2012 के विधानसभा चुनाव में लगातार तीसरे स्थान जगह बनाए हुए है। यूपी में पार्टी की इतनी बदहाली के लिए अंदरूनी कलह और लचर नेतृत्व जिम्मेदार है। वैसे यूपी में भाजपा की दुर्गति की सबसे बड़ी वजह मायावती से हाथ मिलाना भी माना जाता है। मायावती को तीन बार भाजपा ने मुख्यमंत्री बनाया और चैथी बार माया भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाकर 2007 में अपने दम पर पूर्ण बहुमत ले आईं। मायावती का प्रशासन सख्त था, अपराध पर लगाम लगी, लेकिन भ्रष्टाचार अपनी सारी सीमाएं लांघकर पराकाष्ठा पर पहुंच गया। लोग मायावती के भ्रष्टाचार से त्रस्त थे और हर हाल बदलाव चाहते थे। इस जनभावना को पहचानने में भी भाजपा विफल रही और 2012 में मजबूत विकल्प नहीं दे पाए, नतीजतन लोगों को युवा अखिलेश में ज्यादा संभावनाएं नजर आईं और सपा के हाथों में सूबे की बागडोर सौंप दी।

जैसा कि अंदाजा लगाया जा रहा था सपा की सरकार वैसी ही साबित हुई। पहले से भ्रष्टाचार की मार झेल रहे सूबे में अराजकता, अपराध और गुंडागर्दी का अभिशाप और जुड़ चुका है। अब तक अखिलेश यादव एक कमजोर मुख्यमंत्री साबित हुए हैं। यूपी में लोग बदलाव के लिए कितने उत्सुक हैं, ये उन्होंने इस लोकसभा चुनाव में बता दिया है। यही वो समय है जब भाजपा को संगठन स्तर पर ठोस फैसले लेने होंगे। 2012 के विधानसभा चुनाव में आंतरिक खींचतान के कारण भाजपा बिना नेतृत्व के ही चुनाव मैदान में कूद पड़ी थी। अमूमन भाजपा किसी भी चुनाव में अपना सीएम और पीएम कैंडिडेट चुनाव से पहले ही घोषित करती है, लेकिन यूपी में तब ऐसा नहीं किया गया।

अगला विधानसभा चुनाव अब 2017 में होना है। सपा सरकार इसी ढर्रे पर चलती रही तो पहले भी हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश में बदलाव लाने के लिए भाजपा को अभी से मेहनत करनी होगी। लोकसभा चुनाव ऐसे संकेत दे चुके हैं कि भाजपा का खोया हुआ वोटबैंक वापस आ गया है। पार्टी को लोकसभा चुनाव में कुछ 42.3 प्रतिशत वोट मिले। पार्टी ने सारी आरक्षित सीटें जीतकर बसपा को भी शून्य पर लाकर खड़ा कर दिया।

केंद्र में मोदी सरकार को राष्ट्रहित के फैसले लेने में आसानी हो, इसके लिए जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा राज्यों में भाजपा की सरकारें बनें। यूपी क्योंकि देश की आबादी में सबसे बड़ा योगदान देता है इसलिए यहां का पिछड़ापन दूर करना बहुत जरूरी है। प्रदेश में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपना सीएम कैंडिडेट चुनने में ही आएगी। यूपी में इस पद के कई दावेदार नजर आते हैं। पिछली बार राजनाथ सिंह और उमा भारती के बीच ये पद उलझ कर रह गया था। जिसका खामियाजा पार्टी ने भुगत भी लिया। जितनी जल्दी पार्टी अपना कैंडिडेट तय करेगी, उतना ही ज्यादा लाभ पार्टी को मिलने के आसार हैं।

उत्तर प्रदेश में दाव लगाने के लिए फिलहाल पार्टी के जो चेहरे हैं उनकी संभावना नीचे हैः

राजनाथ सिंहः एक बार यूपी की गद्दी संभाल चुके राजनाथ गृह मंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद छोड़कर यूपी जाएंगे ऐसा मुश्किल है। फिर भी अगर भाजपा उनको सीएम कैंडिडेट बनाती है तो इसका लाभ पार्टी को मिलेगा।

उमा भारतीः भाजपा एक बार फिर उमा को आगे कर चुनाव लड़ सकती है। उमा ने उत्तर प्रदेश में लंबे समय से काम भी किया है। पर इसके आसार कम ही हैं कि उमा गंगा पुनरुद्धार का महत्वाकांक्षी कार्य छोड़कर यूपी की डोर संभालें। गंगा अभियान उमा के दिल के करीब रहा है। उमा अगर गंगा सफाई का लक्ष्य पूरा करती हैं तो उनका नाम इतिहास में दर्ज हो जाएगा। हालांकि उनको कैंडिडेट बनाने से योगी भी अपनी दावेदारी पेश कर सकते हैं।

मेनका गांधीः सीएम की कुर्सी के लिए मेनका गांधी लीग से हटकर एक चेहरा साबित होंगी। भाजपा अगर मेनका को सीएम कैंडिडेट बनाती है, तो उनको लोगों का समर्थन मिल सकता है।

वरुण गांधीः यूपी में भाजपा के पास सबसे डायनेमिक चेहरा वरुण गांधी के रूप में है। पर उनका कम अनुभव बाधा बन सकता है। यूपी जैसे बड़े और जटिल प्रदेश को चलाने के लिए जोश के साथ अनुभव बहुत जरूरी है।

डाॅ. लक्ष्मीकांत वाजपेयीः लोकसभा चुनाव की सफलता के बाद वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी को भी सीएम कैंडिडेट के तौर पर देखा जा रहा है। वैसे वाजपेयी को किसी प्रदेश का राज्यपाल भी बनाया जा सकता है।

अमित शाहः यूपी वालों की खासियत होती है कि वे क्षेत्रवाद में विश्वास नहीं रखते। अगर अमित शाह को भाजपा यूपी में सीएम कैंडिडेट बनाती है तो लोग उनको अपनाने से गुरेज नहीं करेंगे। लोकसभा चुनाव में उनका काम और सफलता देखने के बाद ऐसी मांग उठने भी लगी हैं।

मुख्तार अब्बास नकवीः भाजपा का चर्चित मुस्लिम चेहरा हैं। हर समय मुस्लिम हितों की दुहाई देने वाले मुलायम सिंह यादव रामपुर के आजम खां को सीएम बनाने की जो हिम्मत नहीं दिखा पाए, भाजपा रामपुर के ही नकवी को सीएम कैंडिडेट बनाकर वो हिम्मत दिखा सकती है। यानि भाजपा चाहे तो सूबे को पहला मुस्लिम मुख्यमंत्री दे सकती है।

Tuesday, June 3, 2014

सड़कों पर सपनों की मौत

नई सरकार ने संसद का मुख देखने से पहले ही अपने वरिष्ठ मंत्री गोपीनाथ मंुडे को सड़क हादसे में खो दिया। एक ऐसा नेता जो जमीन से उठकर राजनीति के शिखर तक पहुंचा, जो अपने पीछे कठोर संघर्ष का इतिहास और प्रेरणा छोड़ गया। इस दुर्घटना में यदि उनकी मृत्यु न होती तो वो अवश्य कल महाराष्ट्र की सबसे ताकतवर कुर्सी पर बैठते। व्यक्ति के चले जाने के बाद उसके पीछे रह गए लोग शोक और संवेदनाओं के अलावा कुछ विशेष नहीं कर पाते। अकाल मृत्यु को ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करने के अलावा कोई चारा उनके पास नहीं बचता। लेकिन सड़क दुर्घटनाएं भारत में इतना बड़ा अभिशाप बन गई हैं कि अगर इन पर गंभीरता से विचार करके ठोस कदम नहीं उठाए गए तो देश इसी तरह अपने नागरिकों से हाथ धोता रहेगा।

युद्ध से बड़ा खतरा
भारत में सड़क दुर्घटनाएं युद्ध से भी बड़ा खतरा हैं। भारत ने अब तक जितने युद्ध लड़े उनमें इतनी जानें नहीं गंवाईं जितनी हम हर साल सड़क दुर्घटनाओं में गंवा देते हैं। एनसीआरबी के आंकड़े इस बारे में भयावह आंकड़े पेश करते रहे हैं। इससे भी दुखद बात ये है कि इन सड़क हादसों में सबसे ज्यादा मौत युवाओं और बच्चों की दर्ज होती हैं। ये किसी भी देश के लिए सबसे शर्मसार करने वाला और चिंताजनक तथ्य है। भारत की सड़कों पर सुरक्षा मानकों के साथ किस हद तक लापरवाही बरती जाती है ये बताना तो बेमानी ही है। पर  दुर्घटना में केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती, उसके साथ उसके परिवार, उसके सपनों और तमाम संभावनाओं की भी मौत हो जाती है। 

एनसीआरबी के भयावह आंकड़े
वर्ष         सड़क दुर्घटना में मौत
2008 118239 
2009 126896
2010 133938
2011 136834
2012 139091

नई सरकार के लिए चुनौती
भाजपा सरकार को पहले ही दिन रेल हादसे से दो-चार होना पड़ा था। और अब अपने मंत्री की सड़क हादसे में मौत के बाद सरकार को दुर्घटनाओं पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है। देश में नए-नए हाई स्पीड नेशनल हाईवे बनाए जा रहे हैं, एक्सप्रेस वे बनाए जा रहे हैं, विदेशों से हाईस्पीड गाडि़यां आयात करने का रास्ता आसान किया जा रहा है, मलाईदार सड़कों पर टोल-टैक्स लगाकर सरकार जमकर चांदी भी छाप रही है। वहीं जब आप सड़क दुर्घटनाओं पर नजर डालें तो ये सब मौत के सरकारी इंतजाम लगते हैं। इसका मतलब ये भी नहीं है कि देश को फिर से बैलगाड़ी युग में धकेल दिया जाए, लेकिन कम से कम इस दिशा में कुछ ऐसे ठोस कदम उठाए जाएं कि दुर्घटनाओं की संख्या घटे।

जनजागरण जरूरी
जिस देश के नागरिक हेलमेट पहनने में अपनी तौहीन समझते हों, बंद रेलवे फाटक पार करना वीरता समझा जाता हो, अत्यधिक तेज गति में गाड़ी चलाना फैशन हो, ट्रैफिक लाइट तोड़ना फख्र की बात हो और विदेशी गाडि़यों में बैठकर सड़कों पर रेस लगाना स्टेटस सिंबल समझा जाए, उस देश में एक्सीडेंट्स को रोक पाना नामुमकिन है। फिर भी यदि जनजागरण के साथ सड़कों पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाएं तो काफी जानें बच सकती हैं। हालांकि ये काम काफी मुश्किल है, पर अगर लगातार अभियान चलाने से देश का वोटिंग परसेंट बढ़ाया जा सकता है तो एक्सीडेंट परसेंट भी घटाया जा सकता है।

सरकार के स्तर पर जो पहल हो सकती है

  • बच्चों को लाइसेंस देने में सख्ती
  • मोटरसाइकिल निर्माता उनमें अधिकतम स्पीड 50 करें से ज्यादा न हो
  • हाई स्पीड विदेशी गाड़ियों के आयात पर लगाम कसे 
  • हाईवे पेट्रोलिंग पुलिस का गठन किया जाए
  • हाईवे पर ट्राॅमा सेंटरों की स्थापना 
  • हाईवे पर एयर एंबुलेंस से सर्विस सुविधा
  • हाईवे पर सबको एक्सीडेंट बीमा
  • मदद करने वालों को पुलिस प्रताड़ना से सुरक्षा
  • प्राइवेट अस्पतलों को एक्सीडेंटल केस में बिना फीस जमा कराए तत्काल कदम उठाने के निर्देश

मेट्रो का विस्तार
यदि देश के पब्लिक ट्रांस्पोर्ट पर नजर डालें तो मेट्रो अब तक कि सबसे सुरक्षित यात्रा सेवा साबित हुई है। दिल्ली में मेट्रो चलते 10 साल से ज्यादा हो गए हैं, और कोलकाता मेट्रो उससे भी पुरानी है, लेकिन आज तक कोई बड़ा हादसा सामने नहीं आया है। दिल्ली मेट्रो में कुछ मामले आत्महत्या के जरूर हुए हैं, पर एक्सीडेंट मेट्रो के स्तर पर हुआ हो ऐसा सुनने को नहीं मिला। यदि देश में इस तरह का सुरक्षित पब्लिक ट्रांसपोर्ट को विस्तार दिया जाता है तो इन हादसों पर काफी हद तक लगाम कसी जा सकती है।

राम राज्य की बात
देश में समय-समय पर राम राज्य की बात अक्सर उठा करती है, तो राम राज्य के बारे में बता दें कि उस राज्य का एक पक्ष ये भी था कि उस समय अकाल मृत्यु नहीं हुआ करती थीं। 21वीं सदी में राम राज्य का ये पक्ष आधुनिक सरकारें कैसे दे पाएंगी ये उन्हीं को तय करना है। ये भी याद रहे कि दुर्घटनाएं बड़ा और छोटा नहीं देखतीं, ये किसी के भी साथ कहीं भी घट सकती हैं।