मंगलवार, 17 जनवरी 2017

बोल-बोल सकारात्मक बोल!


आप जब सड़क पर निकलते हैं तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि आपके कानों में अश्लील गालियां न सुनाई पड़ें, विशेषकर दिल्ली, एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में। आम बोलचाल की भाषा में गालियों की टेक लगाकर बात करना आम बात सी लगने लगी है। लोग सार्वजनिक स्थलों पर अश्लील गालियों से सनी वार्तालाप बेधड़क होकर करते हैं, बिना इस बात की परवाह किये कि उनके आसपास महिलाएं भी खड़ी हैं। 


लेकिन पिछले रविवार जब मैं शेव कराने नाई की दुकान (आप सैलून या मेन्स पार्लर भी पढ़ सकते हैं) पर गया तो वहां एक व्यक्ति अपने बच्चे के साथ आया। उसने आकर नाई से कहा कि इसके ‘बाल बड़े’ कर दो। पहले मुझे सुनकर थोड़ा अजीब लगा कि लोग यहां बाल कटवाने आते हैं और ये आदमी कह रहा है कि बाल बड़े कर दो। बाद में समझ आया कि वह भी बाल कटवाने ही आया था, लेकिन ‘काटना’ एक नकारात्मक शब्द होने के कारण उसने बाल बड़े करना कहकर एक सकारात्मक शब्द प्रयोग किया। ऐसा नहीं था कि वह कोई बहुत बड़े बुद्धिजीवी या आध्यात्मिक वर्ग से था, बल्कि यह शब्द उसने अपने उस मूल स्थान की परंपरा से सीखा होगा जहां का वह निवासी था। हमारे क्षेत्र में भी बाल कटवाना नहीं कहा जाता था, बल्कि बाल बनवाना कहा जाता था। 

अपने समाज में बातचीत के दौरान नकारात्मक शब्द न प्रयोग करने की परंपरा शायद बहुत पुरानी है। अपनी दैनिक बोलचाल की भाषा में हमें तमाम ऐसे शब्द मिल जाएंगे जिनका अर्थ बिल्कुल विपरीत होता है। उदाहरण के लिए कोई भी दुकानदार दुकान ‘बंद’ करना नहीं बोलता बल्कि कहता है कि वह दुकान बढ़ा रहा है। कुछ लोग जब घर से बाहर जाते हैं तो यह नहीं कहते कि मैं जा रहा हूं, बल्कि कहते हैं कि मैं अभी आ रहा हूं। उसी प्रकार महिलाएं चूड़ियों के टूटने के लिए अपने-अपने क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग शब्द प्रयोग करती हैं, हमारी तरफ ‘चूड़ी मौलना’ शब्द प्रचलित है। ऐसे ही गांवों में दीया बुझा दो कोई नहीं बोलता बल्कि कहते हैं ‘दीया बढ़ा’ दो। इस प्रकार के तमाम शब्द हैं, जो हमारी जिंदगी से सकारात्मक कारणों से जुड़े हुए हैं।

सकारात्मक बोलने की परंपरा गढ़ने वालों की सोच यही रही होगी कि गलती से भी मुख से गलत शब्द न निकले, नकारात्मक बोल न निकलें। गौर से देखें तो हंसी-मज़ाक के लिए भी मर्यादाएं नजर आती हैं। पर इसे आधुनिकता कहें, टीवी का प्रभाव कहें या फिल्मों का असर कि लोग बेधड़क नकारात्मक शब्दों का प्रयोग करते हैं। नकारात्मक शब्दों से तात्पर्य केवल अश्लील गालियों से नहीं है, बल्कि आम बोलचाल में अपनी दिक्कतों, परेशानियों में गलत शब्द मुख से निकलना आम हो गया है। हास्य के नाम पर कवि सम्मेलनों में और काॅमेडी के नाम पर टीवी शो में ऐसे-ऐसे चुटकुले खुले मंच पर सुना दिये जाते हैं कि आप असहज हो जाएं। बातचीत का वही तौर-तरीका धीरे-धीरे समाज में स्वीकार किया जाने लगा है। 

संक्रमण के दौर से गुजर रही भाषा को देखकर लगता है कि नकारात्मकता ने जीवन में गहराई तक पांव पसार लिये हैं। यदि कभी अकेले में बैठकर मनन करें तो लगता कि कम बोलने, सार्थक बोलने और सकारात्मक बोलने की परंपरा कितनी सही थी।

सोमवार, 16 जनवरी 2017

ऑनलाइन मतदान की ओर कदम बढ़ाने का सही वक्त!

भारत में इलेक्ट्रिॉनिक वोटिंग मशीन की अपार सफलता के बाद अब चुनाव आयोग को ई-वोटिंग की ओर कदम बढ़ाना चाहिए। जिस प्रकार देश तेजी से डिजिटाइजेशन की ओर बढ़ रहा है, उसको देखते हुए यदि जल्द यह कदम उठाया जाता है, तो बहुत बड़े खर्च और प्रशासनिक उठापटक को टाला जा सकता है। साथ ही इससे उन लोगों को भी फायदा होगा जो नौकरी या अन्य कारणों से अपने शहर से दूर बस गए हैं, लेकिन वोट डालने के कारण उन्हें अपने शहर आना पड़ता है।

इसके लिए चुनाव आयोग ऑनलाइन वोट डालने के इच्छुक मतदाताओं से अपना एपिक नंबर आयोग की साइट पर रजिस्टर करवाये और ऐसे मतदाताओं के लिए अलग से एक ऑनलाइन वोटर लिस्ट तैयार करे। फिर ऐसे मतदाताओं के नाम कागजी वोटर लिस्ट से हटा दे। इस प्रकार चुनाव आयोग दो तरह की वोटर लिस्ट तैयार कर सकता है- एक ऑनलाइन मतदाताओं के लिए और दूसरी मतदान केंद्र पर जाने वाले मतदाताओं की। चुनाव के दिन ऑनलाइन मतदाता आयोग की वेबसाइट और मोबाइल एप पर वोट डाल सकते हैं और बाकी मतदाता मतदान केंद्र पर जाकर अपना मत डाल सकते हैं। ऑनलाइन मतदाताओं को मतदान केंद्र पर वोट डालने की अनुमति नहीं होगी। लेकिन ऑनलाइन वोट डालने के बाद मतदाता को मतदान रसीद अवश्य प्रदान की जाए, एसएमएस और ईमेल के माध्यम से भी। प्रयोग के तौर पर इसे छोटे राज्यों में आजमाया जा सकता है। 

जिस तरह डीबीटी एक सफल प्रयोग बनकर उभरा है, ऑनलाइन वोटिंग भी निश्चित तौर पर सफल होगी। ऑनलाइन वोटिंग का विकल्प आने से मतदान प्रतिशत में भी इजाफा होना लाजमी है, साथ ही भारी प्रशासनिक खर्च भी धीरे-धीरे घटता चला जाएगा। आज के दौर में जब ऐसे-ऐसे काम घर बैठे ऑनलाइन संभव हो रहे हैं, जिनके बारे में सोच भी नहीं सकते थे, तो फिर ऑनलाइन मतदान करवाना कोई बड़ी बात नहीं है। कई अखबार, न्यूज वेबसाइट और सर्वे कंपनियां इस तरह की वोटिंग समय-समय पर कराती ही रहती हैं। हालांकि चुनावी मतदान में थोड़ा एहतियात बरतने की आवश्यकता है। वोटिंग सॉफ्टवेयर तैयार करने में तमाम पहलुओं पर कड़ाई से सोचना होगा, ताकि दिमागी खुजली वाले लोग इसकी सुरक्षा में सेंध न लगा सकें। 

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

पंचायत चुनाव बनाम ग्राम स्वराज


इन दिनों जब पूरे देश का ध्यान बिहार के विधानसभा चुनाव और उनके परिणामों पर केंद्रित हैं, ठीक उसी वक्त उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों का जोर है। अभी एक दिन के लिए अपने गांव जाना हुआ तो वहां की दीवारों पर चस्पा पोस्टरों को देखकर आभास हुआ कि देश में किसी भी चीज की कमी हो सकती है पर नेताओं की कमी कभी नहीं होगी। ऐसी-ऐसी चुनावी बिसात बिछाई जा रही हैं कि अमित शाह और लालू यादव भी मात खा जाएं। ऐसी गोटियां फेंकी जा रही हैं कि पूरी कांग्रेस पार्टी भी पानी मांगने लगे। पिलखुन के नीचे बैठकर ऐसी रणनीति तैयार हो रही हैं जिनको सुनकर बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ शर्म खा जाएं। छोटे-छोटे गांवों में इतनी बड़ी-बड़ी राजनीति खेली जा रही है कि दिल्ली भी लजा जाए। गांव के इस चुनावी माहौल को देखकर अरस्तु के वाक्य पर यकीन होने लगता है- ‘मनुष्य एक जन्मजात राजनीतिक जीव है’। भारत में तो राजनीति रग-रग में बसी है। किसी को छेड़ना भर मात्र है और वो अपने अंदर का पूरा राजनीतिक शास्त्र उड़ेल कर रख देगा। अपने यहां नाई की दुकान से लेकर रेल की बोगी तक, चाय के खोखे से लेकर गांव की चैपाल तक, मंदिर-मस्जिद से लेकर विश्वविद्यालयों तक राजनीतिक शास्त्रार्थ करने के लिए पुरोधा हर वक्त मुफ्त में तैयार मिलते हैं।

परंतु गांधी जी ने जिस ग्राम स्वराज का सपना देखा और दिखाया था वह आज के ग्राम पंचायत चुनाव से कतई मेल नहीं खाता। गांधी जी यदि आज की ग्रामीण राजनीति देख लेते तो शायद पंचायत चुनाव की जगह गांव की जिम्मेदारी एक दरोगा के हवाले करने की सिफारिश करते। उत्तर प्रदेश के अंदर ग्राम पंचायत चुनाव में जीतने के लिए हर वो हथकंडा अपनाया जाता है जिसका नैतिकता के दायरे से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं। पूरे चुनाव के दौरान मांस-मदिरा और सुरा-सुंदरी का प्रचलन अपने उत्कर्ष पर रहता है। इससे भी बात न बने तो बंदूक की गोली अंतिम उपाय के तौर पर काम आती है। यकीन न आए तो जिस दिन से चुनाव घोषित हुए हैं उस दिन से लेकर परिणाम घोषित होने के बीच कितनी चुनावी हत्याएं और हमले हुए इनके आंकड़े आरटीआई से निकलवाकर देखे जा सकते हैं। चुनाव आयोग ने विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान होने वाली हिंसा पर तो काबू पा लिया है, लेकिन पंचायत चुनाव के मौसम में पूरे उत्तर प्रदेश में रंजिशन गोलीबारी और हत्याओं के मामलों में अब भी बेतहाशा वृद्धि दर्ज की जाती है।  

कई जगह पंचायत चुनाव ने ऐसी गहरी रंजिशों की नींव डाली हैं कि पीढि़यां उसका खामियाजा भुगत रही हैं। यूं तो सतत विकास के कारण भी गांव की सामाजिक समरसता प्रभावित हो चुकी है, लेकिन पंचायत चुनावों ने भी गांव के सामाजिक ताने-बाने को पूरी तरह तोड़-मरोड़ दिया है। किसी कवि कि कविता या हिंदी फिल्म में गांव की जो सुनहरी तस्वीर पेश की जाती है, गांव दरअसल ठीक उसके विपरीत हैं। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाज का सटीक चित्रण श्रीलाल शुक्ला के उपन्यास ‘राग दरबारी’ में ही देखने को मिलता है। देश के आर्थिक विकास के साथ जब से पंचायतों को मोटा धन मिलना शुरू हुआ है, तब से उत्तर प्रदेश में सभी पंचायती प्रतिनिधित्व वाले पद सिर्फ भ्रष्टाचार के गढ़ बन कर रह गए हैं। ग्राम प्रधान बनते ही गांव की उन्नति हो न हो पर उस व्यक्ति की उन्नति निश्चित है जो उस पद पर शोभायमान है।

हो सकता है इसी पंचायती राज व्यवस्था के कुछ सकारात्मक पहलू भी हों या फिर कुछ गांवों ने इसी व्यवस्था के तहत विकास किया हो। लेकिन मेरा निजी अनुभव यही कहता है कि उत्तर प्रदेश के अंदर पंचायती राज व्यवस्था अधिकांश गांवों के अंदर राजनीतिक सड़ांध पैदा कर रही है। ऐसी सड़ांध जो ग्रामीण जीवन के लिए एक अभिशाप से कम नहीं। पंचायतों में महिलाओं को जबरदस्त आरक्षण देकर हम दिल्ली में दो-चार महिला सरपंचों को सम्मानित कर महिला सशक्तिकरण का ढोल भले ही पीटें, लेकिन 99.99 प्रतिशत मामलों में महिला सरपंच अपने पति के आधीन होकर ही चलती हैं। सिर्फ कागजों पर विश्व को दिखाने भर के लिए इस प्रकार का महिला सशक्तिकरण क्या सचमुच देश और समाज के हित में होगा। महात्मा गांधी ने जरूर ग्राम स्वराज की परिकल्पना देश के समक्ष रखी थी, लेकिन हम अपने दिल पर हाथ रख कर बता दें कि क्या वर्तमान पंचायती राज व्यवस्था सचमुच गांव के हित में है। जहां ग्राम प्रधान और स्कूल प्रधानाचार्य मिलकर बच्चों का भोजन डकारने की मानसिकता रखते हों भला ऐसा पंचायती राज समाज के किस काम का?

अन्ना हजारे के गांव रालेगण सिद्धि और उनके प्रभाव वाले आसपास के कुछ गांवों में पंचायत चुनाव नहीं होते, बल्कि आम राय से निर्विरोध तरीके से पदों पर नियुक्ति की जाती है। और फिर अन्ना के दिए गए सूत्रों के अनुसार गांव का विकास किया जाता है, जिसमें शराब बंदी, बालिका शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, जननी सुरक्षा, शाकाहार, अहिंसक जीवन जैसे मूल्यों को आधार बनाया गया है। उन्होंने अपने गांव में एक ऐसा स्कूल भी खोला है जिसमें दूसरे स्कूलों में फेल हुए बालक-बालिकाओं को पढ़ाया जाता है। साथ ही उत्तम भोजन भी प्रदान किया जाता है। कुछ ऐसे ही मापदंडों पर यदि देश के अधिकांश गांव आगे बढ़ते हैं तब कहीं गांव में सुधार की शुरुआत होगी अन्यथा खानापूर्ति के लिए पंचायती राज व्यवस्था हम अपने कंधों पर ढोते रहेंगे। अंतिम बात, राजनीति जब राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ही हो तो बेहतर है, लेकिन जब ये आपके गांव और घर में घुसने लगे तो बेहद घातक सिद्ध होती है।

शुक्रवार, 5 जून 2015

गोलगप्पों में मिलावट!

गोलगप्पे में टट्टी की मिलावट वाली खबर ने तो दिल ही तोड़ दिया। सच्ची! भला ये भी कोई चीज हुई मिलावट करने के लिए। शुक्ला जी को तो जिस दिन से इस खबर का पता चला है सन्नाटे में आ गए हैं। अजीब सा मौन पसरा हुआ है उनके चेहरे पर। जीवन में उन्होंने कोई ऐब या शौक नहीं पाला, शुद्ध शाकाहारी एवं ऐबरहित। बस गोलगप्पा ही उनका सबसे बड़ा ऐब और कमजोरी था। थकते नहीं थे, गोलगप्पों का बखान करते हुए। दिल्ली के कोने-कोने के गोलगप्पों का रसपान कर चुके थे। कहां-कहां कितने प्रकार के पानी के साथ गोलगप्पे खिलाए जाते हैं, सबकी फेहरिस्त उन्हें जुबानी याद थी। इसमें भी लाजपतनगर के गोलगप्पों के तो वो दीवाने थे। वैसे भी चाट के नाम पर गोलगप्पे ही उनके स्वास्थ्य पर विपरीत असर नहीं डालते थे, सुपाच्य पानी के साथ वसारहित भोज। चाट की दुकान पर ये जो टिक्की होती है न, बहुत नामुराद चीज होती है। एक तो आलू और वो भी सर से पांव तक घी में तला हुआ। घी मिलावटी हुआ फिर तो गई सेहत पानी में। सो, शुक्ला जी ने चाट की दुकान पर केवल गोलगप्पे के साथ ही अपना नाता जोड़ा था। बाकी किसी भी चाट की ओर वह आंख उठाकर भी नहीं देखते थे। अब जब एक गोलगप्पा ही खाना है, तो भला चार-पांच की संख्या में क्या खाया जाए, 15-20 से कम में शुक्ला जी का काम नहीं चलता था। जी भर के खाने के बाद जो जलजीरे वाली डकार आती, अहो! क्या कहने उसके। सचमुच दिव्य अनुभूति। अलौकिक। शुक्ला जी का वश चलता तो गोलगप्पों को ‘राष्ट्रीय खाद्य पदार्थ’ घोषित करवा देते।

गोलगप्पों के बिना अपने समाज की परिकल्पना अधूरी है। न जाने कितनी ही फिल्मों में गोलगप्पों का सीन फिल्माकर उनके महत्व का बखान किया गया है। कंगना की ‘क्वीन’ फिल्म गोलगप्पे वाले सीन के बिना अधूरी है। रब ने बना दी जोड़ी में भी शाहरुख और अनुष्का गोलगप्पे खाते हुए कितने अच्छे लगे हैं। पर गोलगप्पे में भी मिलावट हो सकती है, ये तो शुक्ला जी ने कभी सोचा ही नहीं था। मिलावट का स्कोप ही कहां है। आखिर इनमें होता ही क्या है, पानी के सिवा। लेकिन अखबारों की कतरनें चिल्ला-चिल्ला कर कह रही हैं, गोलगप्पों में मिलावट है, और वह भी ऐसी चीज की कि पूछो मत। मन घिनिया गया है उनका। पहले शुक्ला जी गोलगप्पे खाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते थे। आॅफिस से घर वापस लौटते वक्त दो-चार पत्तों पर हाथ साफ करना उनको दिन भर की थकान से आराम देता। पर जिस दिन से मिलावट वाली मनहूस खबर पढ़ी है, उस दिन से उनकी आंखें सिर्फ दूर से गोल-गोल गोलगप्पों को देखकर मन ही मन उनका स्वाद ले लेती हैं। उनके और गोलगगप्पों के बीच उनका दिमाग दीवार बनकर खड़ा हो जाता है। हालांकि, उनके दिल का एक कोना अब भी ये मानने को तैयार नहीं कि गोलगप्पे में टट्टी जैसी निकृष्ट चीज की मिलावट है।

आजकल अकेले में शुक्ला जी यही सोचकर अपने आपको समझाते हैं- ‘‘हो न हो ये झूठी खबर है, जो अखबारों के माध्यम से अपने समाज में फैलाई गई है। दिल्ली में सड़क किनारे चाट बेचने वालों पर कराया गया ये सर्वे हो न हो एक पेड सर्वे है। ये बड़े-बड़े रेस्तरां वाले छोटे दुकानदारों की रोजी खाना चाहते हैं। ठेले वालों ने सस्ते दाम में लजीज चाट परोसकर इन बड़े-बड़े रेस्तरां वालों के सामने खतरा पैदा कर दिया होगा। तभी ऐसा सर्वे कराने की नौबत आई होगी। ताकि सारी भीड़ सड़क पर खाना बंद कर दे और रेस्तरां चल निकलें। अरे हां! रेस्तरां के बिलों पर सर्विस टैक्स भी तो बढ़कर 14 परसेंट हो गया है, इससे तो उनके यहां भीड़ और कम हो जानी है। तभी ससुरों ने ये चाल चली है। अब भला जो मजा 10 रुपये के पांच खाने में है, वो 50 रुपये में पांच खाने में कैसे आ सकता है। उस पर 14 परसेंट सर्विस टैक्स भी दो। भाड़ में जाएं ये रेस्तरां वाले। वैसे तो मल विसर्जन के बिना दिन की शुरुआत हो ही नहीं सकती, जीवन का सबसे बड़ा सत्य है मल। पर गोलगप्पों में मिलावट ही दिखानी थी, तो किसी और चीज की भी दिखा सकते थे, टट्टी की मिलावट क्यों दिखाई। छिः छिः छिः। औक!’’

शनिवार, 23 मई 2015

परिधानों में भारत के प्रधानमंत्रीः गुलाब के फूल से लेकर सूट-बूट तक

राहुल गांधी द्वारा दिया गया ‘सूट-बूट की सरकार’ का जुमला मोदी सरकार के मंत्रियों को खिजाने का काम कर रहा है। इसके जवाब में सरकार को ‘सूझ-बूझ की सरकार’ बताया जा रहा है और यूपीए की सरकार को ‘झूठ-लूट की सरकार’। आजादी के बाद सभी भारतीय प्रधानमंत्रियों का अपना स्टाइल स्टेटमेंट रहा है। जब पद इतना शक्तिशाली हो तो हाकिम की साधारण चाल भी एक अंदाज बन जाती है। इसीलिए जवाहरलाल नेजरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक भारत के सभी प्रधानमंत्रियों का अंदाज पहले मीडिया और फिर जनता के बीच हमेशा चर्चा का विषय रहा। लेकिन पीएम मोदी को वह सूट भारी पड़ गया जिस पर उनका नाम लिखा हुआ था। हालांकि वह सूट उपहार में मिला हुआ था, पर किसी कलमकार ने खोजते-खोजते उसके तार होस्नी मुबारक के सूट से जोड़े और फिर उसी की कीमत से मोदी के सूट की कीमत का आंकलन कर लिया कि वह नामधारी सूट साढ़े दस लाख रुपये का है। लेकिन क्या प्रधानमंत्री का पहनावा ऐसी चीज है जिसकी चर्चा संसद में की जाए? सूट-बूट का तंज अगर राहुल बार-बार प्रयोग करेंगे तो इसके तार आखिरकार उनकी दादी और पर नाना की वार्डरोब तक पहुंच सकते हैं। अगर इंदिरा और नेहरू के कपड़ों की डिटेल निकलवाई गई तो वह पीएम मोदी की वार्डरोब से हल्की तो कतई नहीं निकलेगी। जो सबसे स्टाइलिश प्रधानमंत्री भारत को मिले उनमें नेहरू और इंदिरा गांधी का ही नाम आता है। इन दोनों ही प्रधानमंत्रियों ने अपना स्टाइल उस दौर में मेनटेन किया जब भारत के पास बहुत बड़ी आबादी का पेट भरने के लिए अनाज भी नहीं था। लिहाजा कपड़ों से हटकर काम पर ही नजर रखी जाए तो बेहतर होगा, क्योंकि बात अगर निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। खैर ‘सूट-बूट’ के बहाने एक नजर डालें भारत के कुछ लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों के ड्रेसिंग सेंस परः

जवाहरलाल नेहरू
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को देश का सबसे स्टाइलिश और वेल ड्रेस्ड नेता के रूप में जाना जाता है। उनके नाम पर ही कुर्ते पर पहने जाने वाली बंद गले की जैकेट का नाम ‘नेहरू जैकेट’ और ‘जवाहर कट’ पड़ गया। नेहरू अपने कपड़ों और स्टाइल को लेकर काफी सजग रहते थे। देश के गांव-गलियों में यह भी मशहूर है कि नेहरू अपने कपड़े लंदन से खरीदते थे, पेरिस में सिलवाते थे और ड्राइक्लीन के लिए भी पेरिस भेजते थे। उनकी शेरवानी और उस पर लगा गुलाब का फूल उनकी पहचान और स्टाइल बन गया था। राष्ट्र कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने गुलाब को संबोधित करते हुए ‘कुकरमुत्ता’ कविता लिखी थी। कहा जाता है कि ये कविता नेहरू की नीतियों पर निराला का परोक्ष रूप से हमला था। कविता की कुछ पंक्तियां कुछ इस प्रकार हैंः

अबे सुन बे गुलाब,
भूल मत जो पाई खुशबू, रंगोआब,
खून चूसा तूने खाद का अशिष्ट,
डाल पर इतरा रहा है कैपिटलिस्ट....

इंदिरा गांधी 
भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बारे में तो कई लेखकों ने लिखा है कि Indira always dressed to kill. इंदिरा गांधी का ड्रेसिंग सेंस बेहद आकर्षक था। इंदिरा गांधी ने उस दौर में अपने बालों के साथ प्रयोग किया जब भारतीय महिलाओं की केवल चोटी और जूड़े में ही स्वीकार्यता था। इंदिरा ने उस समय अपने बाल कटवाकर भारतीय महिलाओं के सामने एक नई छवि पेश की जब बाॅलीवुड की नायिकाएं भी जूड़े और चोटी में ही दिखती थीं। इंदिरा के हेयर स्टाइल को देश की तमाम महिलाओं के बीच लोकप्रिय हुआ। इंदिरा गांधी की साडि़यां हों या फिर विदेश यात्राओं के दौरान उनका लांग कोट हमेशा लीग से हटकर और खास होते थे। इंदिरा अवसर के अनुसार ही अपनी साडि़यां पहनती थीं। देश के किसी दूर-दराज के गांव में कभी वे बेहद सादगी भरी खादी की साड़ी में नजर आतीं तो अपनी विदेश यात्राओं में सिल्क साड़ी और लांग कोट में दिखतीं। उनके दौर के कई पत्रकारों ने लिखा है कि इंदिरा की साडि़यां किसी भी पुरुष राष्ट्राध्यक्ष के सूट-बूट के सामने इक्कीस होती थीं। इंदिरा गांधी अपने ड्रेस और प्रेजेंटेशन को लेकर काफी सजग रहतीं थी। अपने जीवन के अंतिम दिन भी वह बीबीसी को इंटरव्यू देने के लिए तैयार होकर जा रही थीं। इस दौरान जब उन्होंने एक टी-सेट को देखा तो उसे बदलने की सलाह दी। इससे यही पता चलता है कि वह छोटी-छोटी चीजों में भी प्रेजेंटेशन पर पैनी नजर रखती थीं।

राजीव गांधी 
भारत के सबसे युवा और स्मार्ट प्रधानमंत्री का गौरव अभी तक राजीव गांधी को ही प्राप्त है। राजीव गांधी तीन-चार तरह के परिधानों में नजर आते थे। औपचारिक कार्यक्रमों में राजीव बंद गले का जोधपुरी सूट पहनते थे, जबकि साधारणतया वह कुर्ता-पयजामा में ही दिखतेे। उन्होंने शाॅल को क्राॅस करके एक हाथ के नीचे से निकालकर पहनने का नया अंदाज निकाला था। राजीव के अभिन्न मित्र रहे अमिताभ बच्चन आज भी राजीव गांधी के स्टाइल में शाॅल पहनना पसंद करते हैं। धूप में निकलते वक्त राजीव रे-बैन का चश्मा भी पहना करते थे। जबकि अमेठी दौरे पर वह बेहद इन्फाॅर्मल होकर वहीं के अंदाज में अपने गले में गमछा भी डाल लिया करते थे।

अटल बिहारी वाजपेयी 
भाजपा के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पहनावा काफी सादगी भरा था। देश में वह अपनी चिर-परिचित कुर्ता धोती और जैकेट पहनते थे, तो विदेश यात्राओं पर वह बंद गले का जोधपुरी सूट पहना करते थे। हालांकि प्रधानमंत्री वाजपेयी कुर्ता-धोती के साथ जो जैकेट पहनते थे, वह जरूर अलग थी। वाजपेयी बंद गले की जगह गोल गले की जैकेट पहनना पसंद करते थे, जो उनके पहनावे की पहचान बन गई। साथ ही वाजपेयी के ज्यादातर कुर्तों की आस्तीनों में बटन भी लगे होते थे।

लालकृष्ण अडवाणी
भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण अडवाणी जब भारत के उप प्रधानमंत्री थे तब भारत यात्रा पर आए अफगानिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति हामिद करजई ने कई बार उनके द्वारा पहने जाने वाली जैकेट की तारीफ की थी। अमूमन सादगी पूर्ण अंदाज में रहने वाले भाजपा नेता लालकृष्ण अडवाणी की जैकेट में ऊपर की ओर तीन बटन लगे होते हैं। यही सिलाई उनकी जैकेट को बाकियों से अलग बनाती है। आखिरकार हुआ यह की हामिद करजई जब अगली बार भारत की यात्रा पर आए तो अडवाणी जी ने उन्हें चार जैकेट खासतौर से सिलवाकर उपहार में दी।

बुधवार, 13 मई 2015

चुनाव जो इतिहास रच गया (भाग-4): टूट गया मुस्लिम वोट बैंक का तिलिस्म

16वीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव के जब 16 मई 2014 को परिणाम सामने आए तो वे अविस्मरणीय और हतप्रभ करने वाले थे। 16 मई की तिथि इतिहास में इस तरह दर्ज हो गई कि जब-जब बदलाव पर चर्चा होगी तो इस तिथि का जिक्र आएगा। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार किसी गैर कांग्रेसी दल को बहुमत देकर भारतीय मतदाताओं ने अपने वोट की ताकत का अहसास करा दिया। मतदाताओं ने न केवल एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार दी बल्कि इन परिणामों के माध्यम से देश के राजनीतिज्ञों को कई छिपे हुए संदेश भी दे दिए। जिस सुंदर राष्ट्र का सपना सड़क से लेकर संविधान तक आम लोगों को दिखाया जाता रहा, अब जनता उसे हकीकत में तब्दील होते देखना चाहती है। इसी उम्मीद के साथ देश के जनमानस ने नरेंद्र मोदी में अपनी आस्था दिखाई और उनके हाथ में एक मजबूत सरकार की बागडोर सौंप दी। उस ऐतिहासिक चुनाव परिणाम की पहली वर्षगांठ पर एक पुनरावलोकलनः
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देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी ने 2014 की ऐतिहासिक करारी हार के कारणों को तलाशती रिपोर्ट तैयार करने के लिए अपने वरिष्ठ नेता एके एंटनी को जिम्मेदारी सौंपी। जैसा कि एंटनी की ईमानदार छवि है, उन्होंने उसी के अनुसार हार का एक ईमानदार विश्लेषण कांग्रेस आलाकमान के सामने रखा। उनकी रिपोर्ट में पार्टी की हार का जो प्रमुख कारण सामने आया वो था कांग्रेस द्वारा जरूरत से ज्यादा ‘माइनाॅरिटी पालिटिक्स’ का कार्ड खेलना। एंटनी पैनल को लगा कि कांग्रेस द्वारा बहुत ज्यादा ‘अल्पसंख्यकवाद’ को बढ़ावा देने के कारण देश के बहुसंख्यक समाज में कहीं न कहीं ये संदेश चला गया कि कांग्रेस हिंदू विरोधी है और इस कारण हिंदू वोट का भाजपा की तरफ जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ, जिसका कांग्रेस को भी अंदाजा नहीं था।

‘फूट डालो राज करो’
दरअसल, अंग्रेजों ने जिस ‘फूट डालो राज करो’ की नीति पर चलकर भारत पर राज किया, आजादी के बाद वही नीति हमारे राजनीतिज्ञों की भी पथ प्रदर्शक बनी। पार्टियों ने जातियों में बंटे हिंदू समाज को जाति के आधार पर और ज्यादा बांटा और अल्पसंख्यकों को एक ठोस वोट बैंक की तरह प्रयोग किया। अमूमन सभी राजनीतिक पार्टियां इस नीति का अनुसरण करती दिखीं। योजनाएं बनाने से लेकर नीतियां गढ़ने तक जाति और धर्म व जाति आधारित राजनीति को दिमाग में रखा गया। देश की आने वाली पीढि़यां राजनीतिक विज्ञान की किताबों में ये पढ़कर अपना माथा पीटा करेंगी कि भारतीय राजनीति में सत्ता हथियाने के लिए ‘अजगर’ (अहीर, जाट, गुर्जर, राजपूत) और ‘मजगर’ (मुस्लिम, अहीर, जाट, गुर्जर, राजपूत) जैसे समीकरणों का सहारा लिया गया।

एकजुट होता समाज
भारत की अधिकांश राजनीतिक पार्टियां यही मानकर चल रही थीं, कि जातियों में बंटा हिंदू समाज कभी संगठित होकर वोट कर ही नहीं सकता। जबकि अल्पसंख्यक समाज एक तरफा वोट डाल सकता है। कांग्रेस से लेकर कई क्षेत्रीय पार्टियों ने इस फाॅर्मूले का फायदा उठायाः ‘कुछ हिंदू जातियां + एकमुश्त अल्पसंख्यक वोट = जीत’। मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी ने इसी फाॅर्मूले के दम पर कई बार यूपी की सत्ता पर कब्जा किया। जबकि मायावती की बहुजन समाज पार्टी द्वारा दलितों को अपना ठोस वोट बैंक बना कर, बड़ी संख्या में मुस्लिमों को टिकट बांटना इसी रणनीति का हिस्सा है। जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एकजुट हिंदू समाज की बात करता है तो इसके पीछे भी कहीं न कहीं इस एकजुटता को सत्ता की चाभी में तब्दील करने की दूरगामी दृष्टि है, जिसकी एक बानगी 2014 के लोकसभा चुनाव में नजर आई। उत्तर प्रदेश में मोदीमय भाजपा के पक्ष में ऐसा जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ कि ऐसे-ऐसे लोग सांसद बनकर दिल्ली पहुंच गए जिनके सपने में भी जीत के आसार नहीं थे। ध्रुवीकरण का असर इतना गहरा था कि कि बसपा का परंपरागत दलित वोट भी उससे छिटक गया। 

फेल हुआ फाॅर्मूला
2014 लोकसभा चुनाव परिणामों की विशेषता यह भी रही कि इस बार जीत का ये परंपरागत फाॅर्मूला पार्टियों के काम नहीं आया। ‘जिधर हम हैं, उधर जीत है’ की बात कहकर ताल ठोकने वाले उत्तर प्रदेश के मुस्लिम समुदाय ने 2014 के चुनाव में हर कोण से सोच कर देखा लेकिन कहीं जीत बनती नहीं दिखी। पहली बार हुआ कि यूपी में मुस्लिम वोट भी सपा, कांग्रेस और बसपा के बीच जमकर बंटा। एमआईएम के अध्यक्ष ओवैसी ने एक इंटरव्यू में तंज कसते हुए कहा कि ‘मैं मोदी को इस चीज के लिए बधाई देना चाहता हूं कि उन्होंने मुस्लिम वोट बैंक के मिथक को तोड़ दिया’।

सबका साथ
भाजपा पर भी हिंदूवादी साम्प्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगता रहा है। भाजपा विरोधी पार्टियां साम्प्रदायिकता का हौवा दिखाकर लोगों को डाराने का भी काम करती आई हैं। अयोध्या के राम मंदिर मुद्दे को भाजपा ने जिस तरह से गर्माया उससे इन आरोपों में दम भी दिखाई दिया। लेकिन वही भाजपा जब सत्ता में आई तो सबको साथ लेकर चलने में ही उसे देश की भलाई लगी। भाजपा ने अयोध्या को अपने एजेंडे में रखकर काशी और मथुरा का मुद्दा छोड़ने में देर नहीं लगाई। पहली एनडीए सरकार में भाजपा के पास पूर्ण बहुमत नहीं था, इसलिए सबकी बात करना प्रधानमंत्री वाजपेयी की मजबूरी कहा जा सकता है, लेकिन वर्तमान सरकार में भाजपा के पास पूर्ण बहुमत है फिर भी प्रधानमंत्री मोदी ने ‘सबका साथ और सबके विकास’ की राह पर चलने का प्रण दोहराया। इसलिए मजबूरी न पहले थी न अब है, बल्कि यही भारत की मूल संस्कृति है जो इस देश को हमेशा ये संदेश देती आई हैः 
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्रणिपश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भाग भवेत्।।
(End of Series)

मंगलवार, 12 मई 2015

चुनाव जो इतिहास रच गया (भाग-3): परिणामों ने पलट दी राजनीति की तस्वीर

2014 के चुनाव उपरांत भाजपा की सरकार बनेगी ऐसा विश्वास तो पार्टी के भीतर था, लेकिन अकेले अपने दम पर बनेगी ये दिग्गज से दिग्गज भाजपाई भी नहीं सोच पा रहे थे। यही कारण था कि पार्टी आखिरी दम तक अपने सहयोगियों की संख्या बढ़ाने में लगी थी। गठबंधन के लिए बातचीत का दौर खुला हुआ था। लेकिन भारत के चुनावी इतिहास में सबसे लंबे चले चुनाव का जब 16 मई को परिणाम आया तो उसने भारतीय राजनीति की तस्वीर बदल कर रख दी। आजादी के 67 साल बाद पहली बार देश में किसी गैर कांग्रेसी दल को अकेले अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिल गया। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का दूर-दूर तक सूपड़ा साफ हो गया। कांग्रेस पार्टी किसी भी राज्य में दो अंकों में सीटें नहीं ला पाई और अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन करते हुए 44 सीटों पर सिमट गई। देश की जनता ने मिलीजुली सरकार की कमजोरियों और लाचारियों का एक झटके में इलाज कर दिया। क्षेत्रीय पार्टिंयों की ब्लैकमेलिंग पर एकाएक विराम लग गया। उठापटक के पुरोधाओं के चेहरे लटक गए और मजबूत राष्ट्र का सपना देखने वालों की आंखें छलक उठीं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की ऐतिहासिक जीत की गवाह बनकर 16 मई की तारीख देश के स्वर्णिम इतिहास में दर्ज हो गई। 2014 के चुनाव परिणाम की सबसे मजेदार बात ये है कि इनके आंकड़े इतने एक-तरफा थे कि इनको याद रखना किसी के लिए भी बेहद आसान है।

खिसियानी बिल्ली
भाजपा की ये ऐतिहासिक जीत न तो विपक्ष को हजम हो रही थी और न कुछ पत्रकार रूपी चुनाव विश्लेषकों को। जब कोई तर्क देते नहींे बना तो कहा गया कि भाजपा को सीटें भले ही 282 मिल गई हों, लेकिन उसका वोट शेयर महज 31.3 प्रतिशत है, जो उसे सबसे कम वोट पाकर बहुमत लाने वाली सरकार की श्रेणी में डालता है। पर अगर आंकड़ों को गहराई से विश्लेषण किया जाए तो भाजपा की स्थिति किसी भी दृष्टि से कमजोर नहीं लगती। भाजपा ने कुल लोकसभा सीटों में से केवल 428 पर ही अपने उम्मीदवार खड़े किए थे और इन सीटों का वोट शेयर 40 प्रतिशत बैठता है। भाजपा ने गुजरात में 60 प्रतिशत से ज्यादा वोट पाए। कुल 6 प्रदेशों और केंद्र शासित प्रदेशों में 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल गए। जबकि कुल 9 प्रदेशों और केंद्र शासित प्रदेशों में 40 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले और तीन राज्यों में 30 प्रतिशत से ज्यादा मत मिले।

यूपी ने दिखाया दम
सभी पोल पंडितों को हैरानी में डालते हुए भाजपा ने दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और गोवा में शत प्रतिशत सीटें जीतकर अनोखा इतिहास रचा। इसके अलावा मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश में भी ऐतिहासिक जीत दर्ज कराई। उत्तर प्रदेश में 80 में से 71 सीट जीतकर भाजपा ने ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया जो खुद उसके लिए भी तोड़ना अब मुश्किल होगा। उत्तर प्रदेश में भाजपा की जबरदस्त जीत के पीछे एक ऐसा माहौल खड़ा था, जो अब शायद की कभी मिले। उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत में जो फाॅर्मूला काम किया उसे ऐसे लिखा जा सकता है- 

"केंद्र सरकार के खिलाफ लहर+राज्य सरकार के खिलाफ गुस्सा+नरेंद्र मोदी लहर+मुजफ्फरनगर दंगों का दंश = भाजपा की ऐतिहासिक जीत"

ये भाजपा के पक्ष में एक ऐसा ब्लेंड था जो आगे कभी नहीं मिलेगा और भाजपा का भविष्य में 71 सीटें जीत पाना बेहद मुश्किल है। 

अन्य राज्य
उधर मध्य प्रदेश में 29 में से 27 सीट जीतकर भाजपा ने अपना परचम लहरा दिया। जो दो सीटें कांग्रेस के खाते में गईं उनमें ज्योतिरादित्य सिंधिया की ग्वालियर सीट और कमलनाथ की छिंदवाड़ा सीट शामिल है। राजघराने से जुड़े सिंधिया की जीत तो समझ आती है, लेकिन जबरदस्त मोदी लहर के बीच कमलनाथ का अपनी सीट निकाल पाना काबिले तारीफ है। जबकि छत्तीसगढ़ में भाजपा ने 11 में से 10 सीटें जीतीं, जो एक दुर्ग सीट पार्टी हारी उसके पीछे भी कहा जा रहा है कि पार्टी के स्थानीय नेतृत्व ने इसे जानबूझकर हारा। जम्मू कश्मीर जैसे सेंसिटिव राज्य में भी पार्टी ने छह में से तीन सीट जीतकर सबको हैरत में डाल दिया। जम्मू कश्मीर से अब्दुल्ला परिवार का पूरी तरह सफाया हो गया। इधर बिहार में भाजपा ने भले ही 40 में से 22 सीटें जीती हों, पर उसका वोट शेयर महज 29.9 प्रतिशत ही रहा। आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को इस तरफ ध्यान देना होगा। जबकि कर्नाटक में भाजपा ने 28 में से 17 सीटें जीतकर मजबूत वापसी की और 43.4 प्रतिशत मत प्राप्त किए।

कहां हुई दुर्गति
जिन बड़े राज्यों में पार्टी की दुर्गति हुई उनमें दक्षिण और पूर्व के राज्य शामिल हैं। केरल में बिना खाता खोले पार्टी को 10.5 प्रतिशत मत मिले। तमिलनाडु में 5.5 प्रतिशत मत पाकर एक सीट जीती जबकि एक सीट सहयोगी पीएमके ने। जबकि जयललिता की अन्नाद्रमुक ने 37 सीटों पर जबरदस्त सीट दर्ज की। भ्रष्टाचार के चलते कानूनी चंगुल में फंसा करुणानिधि परिवार को सिफर पर धूल चाटनी पड़ी। उड़ीशा में 21 में से 20 सीटों में नवीन पटनायक की बीजद ने शानदार जीत दर्ज कराई, लेकिन एक सीट जीतकर भी भाजपा को राज्य में 21.9 प्रतिशत मत मिले जो पार्टी के लिए एक अच्छा संकेत हो सकता है। पश्चिम बंगाल में 42 में से 34 सीटें जीतकर ममता दीदी ने अपना दबदबा कायम रखा, जबकि भाजपा ने अपने वोट शेयर में दस प्रतिशत का इजाफा करते हुए 17 प्रतिशत मतों के साथ दो सीटें जीतीं। बंगाल में सीपीआईएम के वोट शेयर में जबरदस्त कमी आई, जो ये संकेत देता है कि वहां का वोटर विकल्प की तलाश में है। आंध्र प्रदेश में भाजपा टीडीपी के साथ गठबंधन में थी और दोनों ने मिलकर 25 में से 17 सीटें जीतीं, लेकिन दो सीटों पर सिमटी भाजपा के लिए आंध्र में स्थिति कुछ बहुत अच्छी नहीं है। जबकि हाल में अलग हुए तेलंगाना में भी पार्टी कोई विशेष उपलब्धि दर्ज नहीं करा पाई। 

भाजपा की कमजोर नस
भाजपा भले ही एक राष्ट्रीय पार्टी हो, लेकिन केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तलंगाना, पश्चिम बंगाल और उड़ीशा में उसकी स्थिति कमजोर है। पंजाब में अकाली दल के बिना पार्टी अभी तक कुछ खास नहीं कर पाई है। जबकि पर्वोत्तर राज्यों में अरुणाचल और आसाम में पार्टी अगली बार राज्य सरकार बनाने की स्थिति में लग रही है, किंतु मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम में पार्टी बेहद कमजोर है। केंद्र शासित राज्यों की बात करें तो एक लक्षद्वीप ही है जहां भाजपा के लिए निकट भविष्य में कोई संभावना नजर नहीं आती।
(To be continued....)

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