शनिवार, 17 मई 2014

चुनावी दोहे

अबकी आम चुनाव में अलग-अलग दिन घटी घटनाओं को मैंने फेसबुक पर दोहों के रूप में लिखा। 17 मार्च को शुरू हुआ सफर लिखते-लिखते आज 17 मई को आकर समाप्त हुआ। दोस्तों के कहने पर इन सबको एक जगह इकठ्ठा करके अपने ब्लॉग पर डाल रहा हूँ, उम्मीद है पसंद आएंगे:-

चुनावी दोहा न. 1 

दंगों में मेहनत करी, हवा जेल की खाये।
टिकट गया संजीव को, सोम खड़े पछताये।

चुनावी दोहा न. 2

अरविंद-मोदी दोउ खड़े, किसको डालें वोट। 
गलती अबकी कर गए, बहुत पड़ेगी चोट।।

चुनावी दोहा न. 3 

सत्ता तू बड़भागिनी, मिले न बारम्बार। 
तेरे रहते देख लूँ, बढ़िया बंग्ला कार।।

चुनावी दोहा न. 4 

बातें बढ़-बढ़ कीजिए, सुनो न कोई पीर। 
सबको कुछ-कुछ दीजिए, अस्वासन की खीर।।

चुनावी दोहा न. 5 

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा मिला हर कोई। 
'कजरी' जा संसार में, तुझ से भला न कोई।।

चुनावी दोहा न. 6 

जब तक रहो विपक्ष में, खूब करो हड़ताल। 
कागा चित से बने रहो, चलो हंस की चाल।।

चुनावी दोहा न. 7 

मंत्री पद वो चीज़ है, एक बार मिल जाए। 
सात पुश्त परिवार की, बस यूं ही तर जाएं।।

चुनावी दोहा न. 8

अस्सी सावन जी चुके, जाए न पद को मोह।
चश्मा पहने ले रहे, राजनीति की टोह।।
चुनावी दोहा न. 9

कल तक जो अस्पृश्य थे, और बहुत बदनाम।
सत्ता की खातिर लगें, अब वो बहुत महान।।

चुनावी दोहा न. 10 

भाजप का कुनबा बढ़ा, मोदी का गुणगान।
चढ़ते सूरज को सदा, करते लोग प्रणाम।।

चुनावी दोहा न. 11

राजनीति के खेल में, कोई शत्रु न मित्र।
सत्ता सुख पनपा रहा, अवसरवाद विचित्र।।

चुनावी दोहा न. 12 

राजनीति में तय नहीं, कब लेवें संन्यास।
नेता बढ़ती उम्र में, करवाते परिहास।।

चुनावी दोहा न. 13 

सत्ता के संघर्ष का, कोई आदि न अंत। 
हवा किधर है बह रही, ये समझें जसवंत।।

चुनावी दोहा न. 14

जद(यू) का कुनबा घटे, चले न कोई जोर। 
कई विभीषण छोड़ कर, चले 'राम' की ओर।।

चुनावी दोहा न. 15 

विश्वनाथ दरबार में, भइ नेतन की भीर।
कौन करे काशी विजय, बड़े-बड़े हैं वीर।।

चुनावी दोहा न. 16

जनरल सिंह लड़ने चले, नई चुनावी जंग। 
'
गलत' उम्र के फेर में, 'सही' जम गया रंग।।

चुनावी दोहा न. 17 

राजनीति ने खा लिया, भाइ-बहन का प्यार।
सारण आकर बिखर गए, राखी के सब तार।।

चुनावी दोहा न. 18 

डंडे से अंडे भले, सुनो केजरीवाल।
सिर पर यूँ खाते रहो, मस्त रहेंगे बाल।।

चुनावी दोहा न. 19 

पासवान को मिल गया, फिर एक नव जीवन। 
जब से लोजप को मिली, भाजप ऑक्सीजन।।

चुनावी दोहा न. 20

राहुल ने दौरा किया, यत्र तत्र सर्वत्र। 
कांग्रेस ने तब किया, जारी घोषणापत्र।।

चुनावी दोहा न. 21

जन सेवा हेतू बना, राजनीति का कर्म।
नेता करियर मानते, समझ न पाए मर्म।।

चुनावी दोहा न. 22

टिकट मांगने को मची, है जूतम पैजार।
अपनों के ही सामने, हर दल है लाचार।।

चुनावी दोहा न. 23

मोदी की गोदी चढ़े, साबिर अलि भी आय। 
गठबंधन को तोड़कर, अब नितीश पछताय।।

चुनावी न. 24

नकवी ने जारी किया, साबिर पर एतराज़। 
दाउद से तुलना करी, हुए विकट नाराज़।।

चुनावी न. 25 

भाजप सत्ता के लिए, सबको गले लगाय।
भानुमती के नाम का, कुनबा बढ़ता जाय।।

चुनावी दोहा 26 

साबिर को अपनाय के, भाजप घिरती जाय।
बढ़ता हल्ला देखकर, रस्ता दिया दिखाय।।

चुनावी दोहा 27 

बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछताय।
काम बिगाड़े आपना, जग में होत हंसाय।।

(
ये वाला मेरा दोहा नहीं, पर यहाँ भाजपा पर फिट)

चुनावी दोहा न. 28

भारी पड़े मसूद को, ऊंचे कड़वे बोल।
गाल बजाने से प्रथम, मन में लेवें तोल।।

चुनावी दोहा न. 29 

बूढ़ों के संग भाजपा, रोज फंसावे कोण।
कोइ बना है भीष्मपिता, कोइ बन गया द्रोण।।

चुनावी दोहा न. 30 

राहुल, तुलसी और कवि, भिड़े अमेठी आय। 
जनता पर निर्भर करे, किसे कहेगी बाय।।

चुनावी दोहा न. 31

टिकट वापसी के लिए, लगी 'आप' में होड़।
'
कजरी' के पद चिन्ह पर, भाग रहे रण छोड़।।

चुनावी दोहा न. 32

दल-दल दर-दर घूम लिए, कोई न डाले घास।
चले बुखारी हार कर, कांग्रेस के पास।।
चुनावी दोहा न. 33

मधुसूदन को जीत की, आस नज़र ना आय। 
लगा पोस्टर फाड़कर, खुजली लीन्ह मिटाय।।

चुनावी दोहा न. 34

टीडीपी भी आ गई, एनडीए के साथ।
सींग लड़ाए तब बनी, गठबंधन पर बात।।

चुनावी न. 35

आखिरकर जारी हुआ, भाजप घोषणा पत्र।
शक्ल दिखाने को हुए, नेता सभी एकत्र।।

चुनावी न. 36

राम राम रटते रहो, जब तक रहो विपक्ष। 
तुरत राम बिसराइ दो, जइसे आओ पक्ष।।

चुनावी दोहा न. 37

राजनीति के गुल खिलें, नित नए नवल प्रवीन।
तीन लोक तारण तरण, संविधान आधीन।।

चुनावी दोहा न. 38

अजित सिंह या सत्यपाल, जीत एक की होय।
दो जाटन के बीच में, बाकी बचा न कोय।।

चुनावी दोहा न. 39

क्षमा बड़न को चाहिए, 'लड़कन' को उत्पात।
फंसे मुलायम बोलकर, ऐसी घटिया बात।।

चुनावी दोहा न. 40

कटू वचन होते सदा, दो-धारी तलवार। 
आज़म-अमित गंवा दिए, सम्बोधन अधिकार।।

चुनावी दोहा न. 41

मनमोहन पीछे पड़ा, बारू पुस्तक भूत।
पन्ना - पन्ना खोलता, यूपीए करतूत।।

चुनावी दोहा न. 42

संजय ने वर्णन किया, यूपीए का हाल।
नई महाभारत छिड़ी, भारत में तत्काल।।

चुनावी दोहा न. 43

भाजप गठबंधन चला, नए शिखर की ओर।
जनमत सर्वेक्षण करें, नमो नमो का शोर ।।

चुनावी दोहा न. 44 

गर्म हो रहा हर तरफ, दावों का बाजार।
सोलह मइ ही तय करे, पीएम का किरदार।।

चुनावी दोहा न. 45

राजदीप-अर्णब गए, राज ठाकरे द्वार।
टीआरपी हेतु सुनी, नेता की फटकार।।

चुनावी दोहा न. 46

जीजा जी के नाम पर, मचा चुनावी दंग।
भाषा की सीमाएं सब, नित्य हो रहीं भंग।।

चुनावी दोहा न. 47

जहां पहुंच अरविंद का, धरना बन गया ध्यान।
धरती का दिखता असर, काशी बड़ा महान।।

चुनावी दोहा न. 48

जिसने चुन चुन कर जहां, पंडित दिए निकाल।
वो फ़ारुक़ कश्मीर से, बजा रहे हैं गाल।।
चुनावी दोहा न. 49 

थ्री डी, ट्वीटर, फ़ेसबुक, टेकनीक का राज। 
एक बची थी सेल्फ़ी, वो भी कर दी आज।।

चुनावी दोहा न. 50 

बहुत सरल है दिग्विजय, गैर पे करना वार।
अब खुद की तस्वीर पर, बोलो बरखुरदार।।

चुनावी दोहा न. 51

रिश्तों में दिखने लगे, वोटों के आसार।
मित्र बहन बेटी बुआ, चर्चा बारम्बार।।

चुनावी दोहा न. 52

मोदी की शतरंज पर, मोहरा डीडी न्यूज़।
इंटरव्यू लेकर फंसा, कांग्रेस कन्फ्यूज।।

चुनावी दोहा न. 53

जदयू के अध्यक्ष जी, बदल रहे हैं बोल।
आगे की रणनीति पर, पोल रहे हैं खोल।।

चुनावी दोहा न. 54 

जिसके सुमिरन से सदा, कटें सभी के व्याध।
वही नाम लेना हुआ, भारत में अपराध।।

चुनावी दोहा न. 55

'
यादव जी' ने जो किया, पक्षपात का काम।
भाजप को मुद्दा मिला, हुआ बनारस जाम।।

चुनावी दोहा न. 56

मोदी को प्रतिबंध से, हुआ दोगुना लाभ।
जिला प्रशासन भीड़ में, बौना दिखा जनाब।।

चुनावी दोहा न. 57

अबकी आम चुनाव में, बलवे पड़े दिखाइ।
पिछले हिंसक दौर की, फिर से याद दिलाइ।।

चुनावी दोहा न. 58

सबसे बड़े चुनाव में, हालत हुई ख़राब। 
नौ चरणों का फैसला, लंबा रहा जनाब।।

चुनावी दोहा न. 59 

सकल चरण मतदान के, आकर हुए समाप्त। 
अब सोलह को देखिए, किसको क्या हो प्राप्त।।

चुनावी दोहा न. 60

एग्जिट पोल ने कर दिया, मोदी का अभिषेक।
विजय श्री की राह में, शंका बची न शेष।।

चुनावी दोहा न. 61

साफ़ इशारा रहे, यूं तो एग्जिट पोल।
फिर भी धुक-धुक हो रही, फंसे न कोई झोल।।

चुनावी दोहा न. 62 

कांग्रेस का धुआं उड़ा, जदयू चाटे धूल। 
तकरीबन हर राज्य में, खिला नमो फूल।।

चुनावी दोहा न. 63 

मोदी-मोदी सब कहें राहुल कहे न कोय।
दस सालों के राज पर कांग्रेस अब रोय।।

चुनावी दोहा न. 64

चौवालिस पर सिमट गइ, कांग्रेस इस बार।
पूर्ण बहुमत पा गई, मोदी की सरकार।।

चुनावी दोहा न. 65

पहली बार चुनाव में, मुद्दा बना विकास। 
सदियां याद दिलाएंगी, चौदह का इतिहास।।

चुनावी दोहा न. 66 

उत्सव आम चुनाव का, हुआ सफल संपन्न। 
अंत भला तो सब भला, जनता दिखे प्रसन्न।।

चुनावी दोहा न. 67

देते यहां विराम अब, दोहों को भी आज। 
बहुत बधाइ मोदी जी, करें कुशलतम राज।।


चुनावी दोहा न. 68 

धन्यवाद सबका करूं, सबने किया पसंद।
बहुत शुक्रिया दोस्तों, जमकर लिया अनंद।।

मित्रों ने शपथ ग्रहण समारोह तक चुनावी दोहों को जारी रखने का आग्रह किया इसलिए कुछ दोहे और लिखे: 

चुनावी दोहा न. 69 

दगा कभी ना कीजिये, लगती मोटी हाय। 
नीतिश रिश्ता तोड़कर, लुटिया दीन्ह डुबाय।।


चुनावी दोहा न. 70

धोखा देकर फल चखा, जदयू ने भरपूर।
कुत्ता बिल्ली पालिए, पले न अहं हुज़ूर।।


चुनावी दोहा न. 71

आज सेंट्रल हॉल में, हुई धीरता भंग।
बही सफलता आंख से, लौह पुरुषों के संग।।

चुनावी दोहा न. 72 

यदि ना होती चार में, भाजप की वो हार।
चौदह में मिलती नहीं, ये मोदी सरकार।।


चुनावी दोहा न. 73 

गलत जगह पंगा लिया, अबकि केजरीवाल।
बिना वजह की बात पर, पहुंच गए ससुराल।।


चुनावी दोहा न. 74 

अब तो ड्रामा मत करो, हे ड्रामा अधिराज। 
गलती से कुछ सीख लो, करो सार्थक काज।।


चुनावी दोहा न. 75

जिसकी देश में कइ जगह, हुई जमानत जब्त। 
उसको डर क्यों ना लगे, कोर्ट में भरते वक़्त।।


चुनावी दोहा न. 76

यूपी में अखिलेश को, मिली करारी हार। 
बिजली काट के ले रहे, हैं बदला सरकार।।


चुनावी दोहा न. 77

मोदी जी का पाक में, न्योता हुआ क़ुबूल।
इधर-उधर कुछ दे रहे, बिना वजह की तूल।।

बुधवार, 14 मई 2014

अच्छे दिन आने वाले हैं!

जब मैंने सितंबर 2013 में भाजपा को 210 से 249 सीटें मिलने का दावा किया था तो आॅफिस में अधिकांश लोगों ने हंसी में उड़ा दिया था। लेकिन आज अधिकांश एग्जिट पोल यही बता रहे हैं कि भाजपा अकेले अपने दम पर 250 तक जा सकती है। वैसे मोदी के आने की आहट मात्र से ही तमाम लोगों के सुर बदले-बदले लग रहे हैं। कल तक जो खबरिया चैनल मोदी के विरोध में एक सेट एजेंडे के तहत लंबे-लंबे कार्यक्रम प्रसारित करते थे, आज उनके गुण गाते नहीं थक रहे। खैर, कांग्रेस के खिलाफ लंबे समय से पनप रहा लोगों का जबरदस्त गुस्सा 16 मई के परिणामों के तौर पर सामने आएगा। परिणाम थोड़े इधर-उधर हो सकते हैं, पर भाजपा की सरकार बननी तय लग रही है। पूरे चुनाव के दौरान कांग्रेस कहीं भी मुकाबले में नजर नहीं आई। मोदी ने तकरीबन हर मोर्चे पर अपने विरोधियों से बाजी मारी। मोदी ने प्रचार के दौरान जन-जन को छुआ हर पहलू हो छुआ। हर चीज के पीछे जबरदस्त होमवर्क दिखा। भाषण, चाय पे चर्चा, थ्री डी हाॅलोग्राम, विशाल रैलियां, डेªसिंग सेंस, विस्फोटों के बीच हौसला, गर्म पानी पी-पी कांग्रेस को कोसना, वराणसी का चुनाव, ये सब लोगों को खूब भाया। एक सीनियर सिटीजन नरेंद्र मोदी ने तीन लाख किलोमीटर की यात्रा करके देश भर में 440 रैलियों को संबोधित किया। एक-एक दिन में छह-छह रैलियों को संबोधित किया, इतनी ऊर्जा अच्छे-अच्छे नौजवानों में भी देखने को नहीं मिलती।

सही समय पर सही चुनाव

सही समय पर भाजपा द्वारा मोदी को अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना पार्टी के लिए सबसे फायदेमंद सिद्ध हुआ। यदि ये निर्णय सही वक्त पर न लिया गया होता तो शायद तस्वीर कुछ दूसरी होती। इसके अलावा मोदी द्वारा उत्तर प्रदेश में अमित शाह को प्रभारी बनाकर भेजना सटीक फैसला रहा। अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में तकरीबन मृत पड़े कैडर में नई जान फूंकने का काम किया। वरना सपा और बसपा के क्षेत्रीय मकड़जाल में फंसी भाजपा के फिर से खड़े होने के आसार कम थे। इसके अलावा मोदी के लिए वाराणसी सीट का चुनाव भी एक सोचा-समझा फैसला रहा। मोदी का उत्तर प्रदेश आ जाने से कार्यकर्ताओं का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंच गया। जिसका असर परिणामों में साफ नजर आएगा।

डबल बेस का तवा

बाजार में जब आप बर्तन लेने जाते हैं तो दुकानदार अक्सर बर्तन दिखाते हुए बताता है कि साहब ये डबल बेस का तवा है, या कढ़ाई है या भगौना है। इसी तरह भाजपा भी एक डबल बेस की पार्टी है। एक इसका अपना बेस है और दूसरा संघ का। वैसे तो संघ के कार्यकर्ता हर चुनाव में भाजपा के समर्थन में अपना योगदान देते हैं, लेकिन इस चुनाव में जीत दर्ज कराने के लिए संघ ने अपनी जबरदस्त रणनीति और संगठनात्मक ताकत लगाई। अर्थ ये हुआ कि अगर दोनों संगठनों के कार्यकर्ता पूरी ताकत के साथ जुटे हैं तक इस मुकाम तक पहुंच पाए हैं कि जीत निश्चित लग रही है। भविष्य के चुनावों के लिए इस केमिस्ट्री को और ज्यादा शक्तिशाली बनाया जा सकता है। लेकिन वाजपेयी सरकार के दौरान दोनों संगठनों के रिश्ते बहुत अच्छे नहीं रह पाए थे, इस बार क्या होगा ये वक्त बताएगा।

मोदी के समक्ष चुनौतियां

खराब अर्थव्यवस्थाः भारत के खराब आर्थिक हालातों को सुधारना मोदी सरकार के लिए सबसे पहली चुनौती होगा। आर्थिक सशक्तिकरण की अपेक्षा कुछ इस तरह की जाएगी कि उससे महंगाई की मार पहले से झेल रही जनता पर कोई असर न पड़े। हालांकि शेयर बाजार ने तो मोदी को आने से पहले ही सलामी देनी शुरू कर दी है।

भ्रष्टाचारः अब जब इस बार के चुनाव में भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा रहा और देश में भी भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त हवा बह रही है, ऐसे में मोदी के लिए अपनी सरकार में भ्रष्टाचार को रोकना और एक साफ-सुथरी विकासशील शासन प्रदान करना बड़ी चुनौती होगी। साथ ही पुराने भ्रष्टाचार के मामलों का भी शीघ्र निपटान किया जाए। ध्यान रहे कि जिस आम आदमी पार्टी के लिए भ्रष्टाचार सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है, वह भी गाहे-बगाहे सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी।

विशाल जनअपेक्षाएंः मोदी को जिस तरह की मीडिया कवरेज मिली, उन्होंने जिस तरह का विकास माॅडल लोगों के बीच रखा और अब चैनल जिस तरह से उनको करिश्माई पुरुष की तरह पेश कर रहे हैं, इससे देश में विशाल जन अपेक्षाएं बन गई हैं। इन जन अपेक्षाओं पर खरा उतरना मोदी के लिए बहुत बड़ी चुनौती होगा। वाजपेयी सरकार ने भी अपने सात साल के शासन में विकास के कई कीर्तिमान स्थापित किए थे, वाजपेयी ने ही देश को विश्वास दिलाया था कि 2020 तक भारत एक विकसित राष्ट्र होगा, लेकिन फिर भी 2004 में वाजपेयी सरकार को हार का मुंह देखना पड़ा।

भाजपा का कांग्रेसीकरणः भाजपा पर हमेशा ये आरोप लगते रहे हैं कि जब भी भाजपा सत्ता में आती है उसके कामकाज का ढर्रा कांग्रेस के जैसा ही हो जाता है। भाजपा की सरकार नई बोतल में पुरानी शराब सरीखी दिखती है। इसलिए मोदी को कुछ ऐसा करना होगा जिसका असर आम लोगों को जीवन में स्पष्ट नजर आए।

शाही या सादगी भरी सरकारः नए प्रधानमंत्री को ये भी देखना होगा कि सरकार की कार्यशैली में अहंकार और शाही तामझाम कम नजर आए। सरकारी खर्च को कम करके आम लोगों से सीधे जुड़ने का प्रयास किया जाए। भाजपा इससे पहले प्रमोद महाजन के समय में फाइव स्टार कल्चर आजमा कर देख चुकी है, जिसे आम लोगों के बीच बिल्कुल पसंद नहीं किया गया था। आम आदमी पार्टी की कम समय में बड़ी सफलता प्राप्त करने के पीछे यही कारण है कि उसने सादगी अपनाकर सीधी लोगों से जुड़ाव बनाया। संघ भी राजनीति में सादगी का प्रबल समर्थक है।

भाजपा-संघ संबंधः मोदी के लिए भाजपा और संघ के बीच मधुर संबंध बनाए रखना भी एक चुनौती होगा। वैसे प्रधानमंत्री पद के लिए खुद संघ ने ही मोदी को पसंद किया है, लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद इस पसंद को कायम रखना मोदी के हाथ में है। राष्ट्र निर्माण के लिए संघ का अपना एक नजरिया है, लेकिन केंद्र सरकार में बैठी भाजपा की अपनी मजबूरियां। अब देश की भावी सरकार संघ के साथ किस तरह तालमेल बैठाएगी ये देखने वाली बात होगी।

बाबा रामदेवः बाबा रामदेव ने मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए न केवल खुलकर समर्थन किया बल्कि अपने भारत स्वाभिमान के कार्यकर्ताओं की ताकत को भी भाजपा के पीछे खड़ा कर दिया। खुद बाबा ने पूरे देश में घूमकर कांग्रेस के खिलाफ प्रचार किया। रामलीला मैदान में हुए अपने अपमान के खिलाफ बाबा ने चाणक्य की तरह कांग्रेस को खत्म करने का बीड़ा उठाया है। लेकिन बाबा इस जीत में अपना श्रेय अवश्य लेना चाहेंगे। साथ ही सरकार बनने के बाद विदेश में जमा काले धन के मुद्दे पर बार-बार हस्तक्षेप करेंगे।

‘हनुमान अंश’ की सफलताः देशज कहानी की जीत

भारतीय सिनेमा में सफलता का पैमाना लंबे समय से बड़े बजट, बड़े सितारों, विदेशी लोकेशन और भव्य प्रचार से जोड़ा जाता रहा है। ऐसे समय में ‘हनुमान अं...