Tuesday, November 3, 2015

पंचायत चुनाव बनाम ग्राम स्वराज


इन दिनों जब पूरे देश का ध्यान बिहार के विधानसभा चुनाव और उनके परिणामों पर केंद्रित हैं, ठीक उसी वक्त उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों का जोर है। अभी एक दिन के लिए अपने गांव जाना हुआ तो वहां की दीवारों पर चस्पा पोस्टरों को देखकर आभास हुआ कि देश में किसी भी चीज की कमी हो सकती है पर नेताओं की कमी कभी नहीं होगी। ऐसी-ऐसी चुनावी बिसात बिछाई जा रही हैं कि अमित शाह और लालू यादव भी मात खा जाएं। ऐसी गोटियां फेंकी जा रही हैं कि पूरी कांग्रेस पार्टी भी पानी मांगने लगे। पिलखुन के नीचे बैठकर ऐसी रणनीति तैयार हो रही हैं जिनको सुनकर बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ शर्म खा जाएं। छोटे-छोटे गांवों में इतनी बड़ी-बड़ी राजनीति खेली जा रही है कि दिल्ली भी लजा जाए। गांव के इस चुनावी माहौल को देखकर अरस्तु के वाक्य पर यकीन होने लगता है- ‘मनुष्य एक जन्मजात राजनीतिक जीव है’। भारत में तो राजनीति रग-रग में बसी है। किसी को छेड़ना भर मात्र है और वो अपने अंदर का पूरा राजनीतिक शास्त्र उड़ेल कर रख देगा। अपने यहां नाई की दुकान से लेकर रेल की बोगी तक, चाय के खोखे से लेकर गांव की चैपाल तक, मंदिर-मस्जिद से लेकर विश्वविद्यालयों तक राजनीतिक शास्त्रार्थ करने के लिए पुरोधा हर वक्त मुफ्त में तैयार मिलते हैं।

परंतु गांधी जी ने जिस ग्राम स्वराज का सपना देखा और दिखाया था वह आज के ग्राम पंचायत चुनाव से कतई मेल नहीं खाता। गांधी जी यदि आज की ग्रामीण राजनीति देख लेते तो शायद पंचायत चुनाव की जगह गांव की जिम्मेदारी एक दरोगा के हवाले करने की सिफारिश करते। उत्तर प्रदेश के अंदर ग्राम पंचायत चुनाव में जीतने के लिए हर वो हथकंडा अपनाया जाता है जिसका नैतिकता के दायरे से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं। पूरे चुनाव के दौरान मांस-मदिरा और सुरा-सुंदरी का प्रचलन अपने उत्कर्ष पर रहता है। इससे भी बात न बने तो बंदूक की गोली अंतिम उपाय के तौर पर काम आती है। यकीन न आए तो जिस दिन से चुनाव घोषित हुए हैं उस दिन से लेकर परिणाम घोषित होने के बीच कितनी चुनावी हत्याएं और हमले हुए इनके आंकड़े आरटीआई से निकलवाकर देखे जा सकते हैं। चुनाव आयोग ने विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान होने वाली हिंसा पर तो काबू पा लिया है, लेकिन पंचायत चुनाव के मौसम में पूरे उत्तर प्रदेश में रंजिशन गोलीबारी और हत्याओं के मामलों में अब भी बेतहाशा वृद्धि दर्ज की जाती है।  

कई जगह पंचायत चुनाव ने ऐसी गहरी रंजिशों की नींव डाली हैं कि पीढि़यां उसका खामियाजा भुगत रही हैं। यूं तो सतत विकास के कारण भी गांव की सामाजिक समरसता प्रभावित हो चुकी है, लेकिन पंचायत चुनावों ने भी गांव के सामाजिक ताने-बाने को पूरी तरह तोड़-मरोड़ दिया है। किसी कवि कि कविता या हिंदी फिल्म में गांव की जो सुनहरी तस्वीर पेश की जाती है, गांव दरअसल ठीक उसके विपरीत हैं। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाज का सटीक चित्रण श्रीलाल शुक्ला के उपन्यास ‘राग दरबारी’ में ही देखने को मिलता है। देश के आर्थिक विकास के साथ जब से पंचायतों को मोटा धन मिलना शुरू हुआ है, तब से उत्तर प्रदेश में सभी पंचायती प्रतिनिधित्व वाले पद सिर्फ भ्रष्टाचार के गढ़ बन कर रह गए हैं। ग्राम प्रधान बनते ही गांव की उन्नति हो न हो पर उस व्यक्ति की उन्नति निश्चित है जो उस पद पर शोभायमान है।

हो सकता है इसी पंचायती राज व्यवस्था के कुछ सकारात्मक पहलू भी हों या फिर कुछ गांवों ने इसी व्यवस्था के तहत विकास किया हो। लेकिन मेरा निजी अनुभव यही कहता है कि उत्तर प्रदेश के अंदर पंचायती राज व्यवस्था अधिकांश गांवों के अंदर राजनीतिक सड़ांध पैदा कर रही है। ऐसी सड़ांध जो ग्रामीण जीवन के लिए एक अभिशाप से कम नहीं। पंचायतों में महिलाओं को जबरदस्त आरक्षण देकर हम दिल्ली में दो-चार महिला सरपंचों को सम्मानित कर महिला सशक्तिकरण का ढोल भले ही पीटें, लेकिन 99.99 प्रतिशत मामलों में महिला सरपंच अपने पति के आधीन होकर ही चलती हैं। सिर्फ कागजों पर विश्व को दिखाने भर के लिए इस प्रकार का महिला सशक्तिकरण क्या सचमुच देश और समाज के हित में होगा। महात्मा गांधी ने जरूर ग्राम स्वराज की परिकल्पना देश के समक्ष रखी थी, लेकिन हम अपने दिल पर हाथ रख कर बता दें कि क्या वर्तमान पंचायती राज व्यवस्था सचमुच गांव के हित में है। जहां ग्राम प्रधान और स्कूल प्रधानाचार्य मिलकर बच्चों का भोजन डकारने की मानसिकता रखते हों भला ऐसा पंचायती राज समाज के किस काम का?

अन्ना हजारे के गांव रालेगण सिद्धि और उनके प्रभाव वाले आसपास के कुछ गांवों में पंचायत चुनाव नहीं होते, बल्कि आम राय से निर्विरोध तरीके से पदों पर नियुक्ति की जाती है। और फिर अन्ना के दिए गए सूत्रों के अनुसार गांव का विकास किया जाता है, जिसमें शराब बंदी, बालिका शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, जननी सुरक्षा, शाकाहार, अहिंसक जीवन जैसे मूल्यों को आधार बनाया गया है। उन्होंने अपने गांव में एक ऐसा स्कूल भी खोला है जिसमें दूसरे स्कूलों में फेल हुए बालक-बालिकाओं को पढ़ाया जाता है। साथ ही उत्तम भोजन भी प्रदान किया जाता है। कुछ ऐसे ही मापदंडों पर यदि देश के अधिकांश गांव आगे बढ़ते हैं तब कहीं गांव में सुधार की शुरुआत होगी अन्यथा खानापूर्ति के लिए पंचायती राज व्यवस्था हम अपने कंधों पर ढोते रहेंगे। अंतिम बात, राजनीति जब राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ही हो तो बेहतर है, लेकिन जब ये आपके गांव और घर में घुसने लगे तो बेहद घातक सिद्ध होती है।

Friday, June 5, 2015

गोलगप्पों में मिलावट-ए-टट्टी!

गोलगप्पे में टट्टी की मिलावट वाली खबर ने तो दिल ही तोड़ दिया। सच्ची! भला ये भी कोई चीज हुई मिलावट करने के लिए। शुक्ला जी को तो जिस दिन से इस खबर का पता चला है सन्नाटे में आ गए हैं। अजीब सा मौन पसरा हुआ है उनके चेहरे पर। जीवन में उन्होंने कोई ऐब या शौक नहीं पाला, शुद्ध शाकाहारी एवं ऐबरहित। बस गोलगप्पा ही उनका सबसे बड़ा ऐब और कमजोरी था। थकते नहीं थे, गोलगप्पों का बखान करते हुए। दिल्ली के कोने-कोने के गोलगप्पों का रसपान कर चुके थे। कहां-कहां कितने प्रकार के पानी के साथ गोलगप्पे खिलाए जाते हैं, सबकी फेहरिस्त उन्हें जुबानी याद थी। इसमें भी लाजपतनगर के गोलगप्पों के तो वो दीवाने थे। वैसे भी चाट के नाम पर गोलगप्पे ही उनके स्वास्थ्य पर विपरीत असर नहीं डालते थे, सुपाच्य पानी के साथ वसारहित भोज। चाट की दुकान पर ये जो टिक्की होती है न, बहुत नामुराद चीज होती है। एक तो आलू और वो भी सर से पांव तक घी में तला हुआ। घी मिलावटी हुआ फिर तो गई सेहत पानी में। सो, शुक्ला जी ने चाट की दुकान पर केवल गोलगप्पे के साथ ही अपना नाता जोड़ा था। बाकी किसी भी चाट की ओर वह आंख उठाकर भी नहीं देखते थे। अब जब एक गोलगप्पा ही खाना है, तो भला चार-पांच की संख्या में क्या खाया जाए, 15-20 से कम में शुक्ला जी का काम नहीं चलता था। जी भर के खाने के बाद जो जलजीरे वाली डकार आती, अहो! क्या कहने उसके। सचमुच दिव्य अनुभूति। अलौकिक। शुक्ला जी का वश चलता तो गोलगप्पों को ‘राष्ट्रीय खाद्य पदार्थ’ घोषित करवा देते।

गोलगप्पों के बिना अपने समाज की परिकल्पना अधूरी है। न जाने कितनी ही फिल्मों में गोलगप्पों का सीन फिल्माकर उनके महत्व का बखान किया गया है। कंगना की ‘क्वीन’ फिल्म गोलगप्पे वाले सीन के बिना अधूरी है। रब ने बना दी जोड़ी में भी शाहरुख और अनुष्का गोलगप्पे खाते हुए कितने अच्छे लगे हैं। पर गोलगप्पे में भी मिलावट हो सकती है, ये तो शुक्ला जी ने कभी सोचा ही नहीं था। मिलावट का स्कोप ही कहां है। आखिर इनमें होता ही क्या है, पानी के सिवा। लेकिन अखबारों की कतरनें चिल्ला-चिल्ला कर कह रही हैं, गोलगप्पों में मिलावट है, और वह भी ऐसी चीज की कि पूछो मत। मन घिनिया गया है उनका। पहले शुक्ला जी गोलगप्पे खाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते थे। आॅफिस से घर वापस लौटते वक्त दो-चार पत्तों पर हाथ साफ करना उनको दिन भर की थकान से आराम देता। पर जिस दिन से मिलावट वाली मनहूस खबर पढ़ी है, उस दिन से उनकी आंखें सिर्फ दूर से गोल-गोल गोलगप्पों को देखकर मन ही मन उनका स्वाद ले लेती हैं। उनके और गोलगगप्पों के बीच उनका दिमाग दीवार बनकर खड़ा हो जाता है। हालांकि, उनके दिल का एक कोना अब भी ये मानने को तैयार नहीं कि गोलगप्पे में टट्टी जैसी निकृष्ट चीज की मिलावट है।

आजकल अकेले में शुक्ला जी यही सोचकर अपने आपको समझाते हैं- ‘‘हो न हो ये झूठी खबर है, जो अखबारों के माध्यम से अपने समाज में फैलाई गई है। दिल्ली में सड़क किनारे चाट बेचने वालों पर कराया गया ये सर्वे हो न हो एक पेड सर्वे है। ये बड़े-बड़े रेस्तरां वाले छोटे दुकानदारों की रोजी खाना चाहते हैं। ठेले वालों ने सस्ते दाम में लजीज चाट परोसकर इन बड़े-बड़े रेस्तरां वालों के सामने खतरा पैदा कर दिया होगा। तभी ऐसा सर्वे कराने की नौबत आई होगी। ताकि सारी भीड़ सड़क पर खाना बंद कर दे और रेस्तरां चल निकलें। अरे हां! रेस्तरां के बिलों पर सर्विस टैक्स भी तो बढ़कर 14 परसेंट हो गया है, इससे तो उनके यहां भीड़ और कम हो जानी है। तभी ससुरों ने ये चाल चली है। अब भला जो मजा 10 रुपये के पांच खाने में है, वो 50 रुपये में पांच खाने में कैसे आ सकता है। उस पर 14 परसेंट सर्विस टैक्स भी दो। भाड़ में जाएं ये रेस्तरां वाले। वैसे तो मल विसर्जन के बिना दिन की शुरुआत हो ही नहीं सकती, जीवन का सबसे बड़ा सत्य है मल। पर गोलगप्पों में मिलावट ही दिखानी थी, तो किसी और चीज की भी दिखा सकते थे, टट्टी की मिलावट क्यों दिखाई। छिः छिः छिः। औक!’’

Saturday, May 23, 2015

परिधानों में भारत के प्रधानमंत्रीः गुलाब के फूल से लेकर सूट-बूट तक

राहुल गांधी द्वारा दिया गया ‘सूट-बूट की सरकार’ का जुमला मोदी सरकार के मंत्रियों को खिजाने का काम कर रहा है। इसके जवाब में सरकार को ‘सूझ-बूझ की सरकार’ बताया जा रहा है और यूपीए की सरकार को ‘झूठ-लूट की सरकार’। आजादी के बाद सभी भारतीय प्रधानमंत्रियों का अपना स्टाइल स्टेटमेंट रहा है। जब पद इतना शक्तिशाली हो तो हाकिम की साधारण चाल भी एक अंदाज बन जाती है। इसीलिए जवाहरलाल नेजरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक भारत के सभी प्रधानमंत्रियों का अंदाज पहले मीडिया और फिर जनता के बीच हमेशा चर्चा का विषय रहा। लेकिन पीएम मोदी को वह सूट भारी पड़ गया जिस पर उनका नाम लिखा हुआ था। हालांकि वह सूट उपहार में मिला हुआ था, पर किसी कलमकार ने खोजते-खोजते उसके तार होस्नी मुबारक के सूट से जोड़े और फिर उसी की कीमत से मोदी के सूट की कीमत का आंकलन कर लिया कि वह नामधारी सूट साढ़े दस लाख रुपये का है। लेकिन क्या प्रधानमंत्री का पहनावा ऐसी चीज है जिसकी चर्चा संसद में की जाए? सूट-बूट का तंज अगर राहुल बार-बार प्रयोग करेंगे तो इसके तार आखिरकार उनकी दादी और पर नाना की वार्डरोब तक पहुंच सकते हैं। अगर इंदिरा और नेहरू के कपड़ों की डिटेल निकलवाई गई तो वह पीएम मोदी की वार्डरोब से हल्की तो कतई नहीं निकलेगी। जो सबसे स्टाइलिश प्रधानमंत्री भारत को मिले उनमें नेहरू और इंदिरा गांधी का ही नाम आता है। इन दोनों ही प्रधानमंत्रियों ने अपना स्टाइल उस दौर में मेनटेन किया जब भारत के पास बहुत बड़ी आबादी का पेट भरने के लिए अनाज भी नहीं था। लिहाजा कपड़ों से हटकर काम पर ही नजर रखी जाए तो बेहतर होगा, क्योंकि बात अगर निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। खैर ‘सूट-बूट’ के बहाने एक नजर डालें भारत के कुछ लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों के ड्रेसिंग सेंस परः

जवाहरलाल नेहरू
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को देश का सबसे स्टाइलिश और वेल ड्रेस्ड नेता के रूप में जाना जाता है। उनके नाम पर ही कुर्ते पर पहने जाने वाली बंद गले की जैकेट का नाम ‘नेहरू जैकेट’ और ‘जवाहर कट’ पड़ गया। नेहरू अपने कपड़ों और स्टाइल को लेकर काफी सजग रहते थे। देश के गांव-गलियों में यह भी मशहूर है कि नेहरू अपने कपड़े लंदन से खरीदते थे, पेरिस में सिलवाते थे और ड्राइक्लीन के लिए भी पेरिस भेजते थे। उनकी शेरवानी और उस पर लगा गुलाब का फूल उनकी पहचान और स्टाइल बन गया था। राष्ट्र कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने गुलाब को संबोधित करते हुए ‘कुकरमुत्ता’ कविता लिखी थी। कहा जाता है कि ये कविता नेहरू की नीतियों पर निराला का परोक्ष रूप से हमला था। कविता की कुछ पंक्तियां कुछ इस प्रकार हैंः

अबे सुन बे गुलाब,
भूल मत जो पाई खुशबू, रंगोआब,
खून चूसा तूने खाद का अशिष्ट,
डाल पर इतरा रहा है कैपिटलिस्ट....

इंदिरा गांधी 
भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बारे में तो कई लेखकों ने लिखा है कि Indira always dressed to kill. इंदिरा गांधी का ड्रेसिंग सेंस बेहद आकर्षक था। इंदिरा गांधी ने उस दौर में अपने बालों के साथ प्रयोग किया जब भारतीय महिलाओं की केवल चोटी और जूड़े में ही स्वीकार्यता था। इंदिरा ने उस समय अपने बाल कटवाकर भारतीय महिलाओं के सामने एक नई छवि पेश की जब बाॅलीवुड की नायिकाएं भी जूड़े और चोटी में ही दिखती थीं। इंदिरा के हेयर स्टाइल को देश की तमाम महिलाओं के बीच लोकप्रिय हुआ। इंदिरा गांधी की साडि़यां हों या फिर विदेश यात्राओं के दौरान उनका लांग कोट हमेशा लीग से हटकर और खास होते थे। इंदिरा अवसर के अनुसार ही अपनी साडि़यां पहनती थीं। देश के किसी दूर-दराज के गांव में कभी वे बेहद सादगी भरी खादी की साड़ी में नजर आतीं तो अपनी विदेश यात्राओं में सिल्क साड़ी और लांग कोट में दिखतीं। उनके दौर के कई पत्रकारों ने लिखा है कि इंदिरा की साडि़यां किसी भी पुरुष राष्ट्राध्यक्ष के सूट-बूट के सामने इक्कीस होती थीं। इंदिरा गांधी अपने ड्रेस और प्रेजेंटेशन को लेकर काफी सजग रहतीं थी। अपने जीवन के अंतिम दिन भी वह बीबीसी को इंटरव्यू देने के लिए तैयार होकर जा रही थीं। इस दौरान जब उन्होंने एक टी-सेट को देखा तो उसे बदलने की सलाह दी। इससे यही पता चलता है कि वह छोटी-छोटी चीजों में भी प्रेजेंटेशन पर पैनी नजर रखती थीं।

राजीव गांधी 
भारत के सबसे युवा और स्मार्ट प्रधानमंत्री का गौरव अभी तक राजीव गांधी को ही प्राप्त है। राजीव गांधी तीन-चार तरह के परिधानों में नजर आते थे। औपचारिक कार्यक्रमों में राजीव बंद गले का जोधपुरी सूट पहनते थे, जबकि साधारणतया वह कुर्ता-पयजामा में ही दिखतेे। उन्होंने शाॅल को क्राॅस करके एक हाथ के नीचे से निकालकर पहनने का नया अंदाज निकाला था। राजीव के अभिन्न मित्र रहे अमिताभ बच्चन आज भी राजीव गांधी के स्टाइल में शाॅल पहनना पसंद करते हैं। धूप में निकलते वक्त राजीव रे-बैन का चश्मा भी पहना करते थे। जबकि अमेठी दौरे पर वह बेहद इन्फाॅर्मल होकर वहीं के अंदाज में अपने गले में गमछा भी डाल लिया करते थे।

अटल बिहारी वाजपेयी 
भाजपा के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पहनावा काफी सादगी भरा था। देश में वह अपनी चिर-परिचित कुर्ता धोती और जैकेट पहनते थे, तो विदेश यात्राओं पर वह बंद गले का जोधपुरी सूट पहना करते थे। हालांकि प्रधानमंत्री वाजपेयी कुर्ता-धोती के साथ जो जैकेट पहनते थे, वह जरूर अलग थी। वाजपेयी बंद गले की जगह गोल गले की जैकेट पहनना पसंद करते थे, जो उनके पहनावे की पहचान बन गई। साथ ही वाजपेयी के ज्यादातर कुर्तों की आस्तीनों में बटन भी लगे होते थे।

लालकृष्ण अडवाणी
भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण अडवाणी जब भारत के उप प्रधानमंत्री थे तब भारत यात्रा पर आए अफगानिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति हामिद करजई ने कई बार उनके द्वारा पहने जाने वाली जैकेट की तारीफ की थी। अमूमन सादगी पूर्ण अंदाज में रहने वाले भाजपा नेता लालकृष्ण अडवाणी की जैकेट में ऊपर की ओर तीन बटन लगे होते हैं। यही सिलाई उनकी जैकेट को बाकियों से अलग बनाती है। आखिरकार हुआ यह की हामिद करजई जब अगली बार भारत की यात्रा पर आए तो अडवाणी जी ने उन्हें चार जैकेट खासतौर से सिलवाकर उपहार में दी।

Wednesday, May 13, 2015

चुनाव जो इतिहास रच गया (भाग-4): टूट गया मुस्लिम वोट बैंक का तिलिस्म

16वीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव के जब 16 मई 2014 को परिणाम सामने आए तो वे अविस्मरणीय और हतप्रभ करने वाले थे। 16 मई की तिथि इतिहास में इस तरह दर्ज हो गई कि जब-जब बदलाव पर चर्चा होगी तो इस तिथि का जिक्र आएगा। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार किसी गैर कांग्रेसी दल को बहुमत देकर भारतीय मतदाताओं ने अपने वोट की ताकत का अहसास करा दिया। मतदाताओं ने न केवल एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार दी बल्कि इन परिणामों के माध्यम से देश के राजनीतिज्ञों को कई छिपे हुए संदेश भी दे दिए। जिस सुंदर राष्ट्र का सपना सड़क से लेकर संविधान तक आम लोगों को दिखाया जाता रहा, अब जनता उसे हकीकत में तब्दील होते देखना चाहती है। इसी उम्मीद के साथ देश के जनमानस ने नरेंद्र मोदी में अपनी आस्था दिखाई और उनके हाथ में एक मजबूत सरकार की बागडोर सौंप दी। उस ऐतिहासिक चुनाव परिणाम की पहली वर्षगांठ पर एक पुनरावलोकलनः
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देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी ने 2014 की ऐतिहासिक करारी हार के कारणों को तलाशती रिपोर्ट तैयार करने के लिए अपने वरिष्ठ नेता एके एंटनी को जिम्मेदारी सौंपी। जैसा कि एंटनी की ईमानदार छवि है, उन्होंने उसी के अनुसार हार का एक ईमानदार विश्लेषण कांग्रेस आलाकमान के सामने रखा। उनकी रिपोर्ट में पार्टी की हार का जो प्रमुख कारण सामने आया वो था कांग्रेस द्वारा जरूरत से ज्यादा ‘माइनाॅरिटी पालिटिक्स’ का कार्ड खेलना। एंटनी पैनल को लगा कि कांग्रेस द्वारा बहुत ज्यादा ‘अल्पसंख्यकवाद’ को बढ़ावा देने के कारण देश के बहुसंख्यक समाज में कहीं न कहीं ये संदेश चला गया कि कांग्रेस हिंदू विरोधी है और इस कारण हिंदू वोट का भाजपा की तरफ जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ, जिसका कांग्रेस को भी अंदाजा नहीं था।

‘फूट डालो राज करो’
दरअसल, अंग्रेजों ने जिस ‘फूट डालो राज करो’ की नीति पर चलकर भारत पर राज किया, आजादी के बाद वही नीति हमारे राजनीतिज्ञों की भी पथ प्रदर्शक बनी। पार्टियों ने जातियों में बंटे हिंदू समाज को जाति के आधार पर और ज्यादा बांटा और अल्पसंख्यकों को एक ठोस वोट बैंक की तरह प्रयोग किया। अमूमन सभी राजनीतिक पार्टियां इस नीति का अनुसरण करती दिखीं। योजनाएं बनाने से लेकर नीतियां गढ़ने तक जाति और धर्म व जाति आधारित राजनीति को दिमाग में रखा गया। देश की आने वाली पीढि़यां राजनीतिक विज्ञान की किताबों में ये पढ़कर अपना माथा पीटा करेंगी कि भारतीय राजनीति में सत्ता हथियाने के लिए ‘अजगर’ (अहीर, जाट, गुर्जर, राजपूत) और ‘मजगर’ (मुस्लिम, अहीर, जाट, गुर्जर, राजपूत) जैसे समीकरणों का सहारा लिया गया।

एकजुट होता समाज
भारत की अधिकांश राजनीतिक पार्टियां यही मानकर चल रही थीं, कि जातियों में बंटा हिंदू समाज कभी संगठित होकर वोट कर ही नहीं सकता। जबकि अल्पसंख्यक समाज एक तरफा वोट डाल सकता है। कांग्रेस से लेकर कई क्षेत्रीय पार्टियों ने इस फाॅर्मूले का फायदा उठायाः ‘कुछ हिंदू जातियां + एकमुश्त अल्पसंख्यक वोट = जीत’। मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी ने इसी फाॅर्मूले के दम पर कई बार यूपी की सत्ता पर कब्जा किया। जबकि मायावती की बहुजन समाज पार्टी द्वारा दलितों को अपना ठोस वोट बैंक बना कर, बड़ी संख्या में मुस्लिमों को टिकट बांटना इसी रणनीति का हिस्सा है। जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एकजुट हिंदू समाज की बात करता है तो इसके पीछे भी कहीं न कहीं इस एकजुटता को सत्ता की चाभी में तब्दील करने की दूरगामी दृष्टि है, जिसकी एक बानगी 2014 के लोकसभा चुनाव में नजर आई। उत्तर प्रदेश में मोदीमय भाजपा के पक्ष में ऐसा जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ कि ऐसे-ऐसे लोग सांसद बनकर दिल्ली पहुंच गए जिनके सपने में भी जीत के आसार नहीं थे। ध्रुवीकरण का असर इतना गहरा था कि कि बसपा का परंपरागत दलित वोट भी उससे छिटक गया। 

फेल हुआ फाॅर्मूला
2014 लोकसभा चुनाव परिणामों की विशेषता यह भी रही कि इस बार जीत का ये परंपरागत फाॅर्मूला पार्टियों के काम नहीं आया। ‘जिधर हम हैं, उधर जीत है’ की बात कहकर ताल ठोकने वाले उत्तर प्रदेश के मुस्लिम समुदाय ने 2014 के चुनाव में हर कोण से सोच कर देखा लेकिन कहीं जीत बनती नहीं दिखी। पहली बार हुआ कि यूपी में मुस्लिम वोट भी सपा, कांग्रेस और बसपा के बीच जमकर बंटा। एमआईएम के अध्यक्ष ओवैसी ने एक इंटरव्यू में तंज कसते हुए कहा कि ‘मैं मोदी को इस चीज के लिए बधाई देना चाहता हूं कि उन्होंने मुस्लिम वोट बैंक के मिथक को तोड़ दिया’।

सबका साथ
भाजपा पर भी हिंदूवादी साम्प्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगता रहा है। भाजपा विरोधी पार्टियां साम्प्रदायिकता का हौवा दिखाकर लोगों को डाराने का भी काम करती आई हैं। अयोध्या के राम मंदिर मुद्दे को भाजपा ने जिस तरह से गर्माया उससे इन आरोपों में दम भी दिखाई दिया। लेकिन वही भाजपा जब सत्ता में आई तो सबको साथ लेकर चलने में ही उसे देश की भलाई लगी। भाजपा ने अयोध्या को अपने एजेंडे में रखकर काशी और मथुरा का मुद्दा छोड़ने में देर नहीं लगाई। पहली एनडीए सरकार में भाजपा के पास पूर्ण बहुमत नहीं था, इसलिए सबकी बात करना प्रधानमंत्री वाजपेयी की मजबूरी कहा जा सकता है, लेकिन वर्तमान सरकार में भाजपा के पास पूर्ण बहुमत है फिर भी प्रधानमंत्री मोदी ने ‘सबका साथ और सबके विकास’ की राह पर चलने का प्रण दोहराया। इसलिए मजबूरी न पहले थी न अब है, बल्कि यही भारत की मूल संस्कृति है जो इस देश को हमेशा ये संदेश देती आई हैः 
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्रणिपश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भाग भवेत्।।
(End of Series)

Tuesday, May 12, 2015

चुनाव जो इतिहास रच गया (भाग-3): परिणामों ने पलट दी राजनीति की तस्वीर

2014 के चुनाव उपरांत भाजपा की सरकार बनेगी ऐसा विश्वास तो पार्टी के भीतर था, लेकिन अकेले अपने दम पर बनेगी ये दिग्गज से दिग्गज भाजपाई भी नहीं सोच पा रहे थे। यही कारण था कि पार्टी आखिरी दम तक अपने सहयोगियों की संख्या बढ़ाने में लगी थी। गठबंधन के लिए बातचीत का दौर खुला हुआ था। लेकिन भारत के चुनावी इतिहास में सबसे लंबे चले चुनाव का जब 16 मई को परिणाम आया तो उसने भारतीय राजनीति की तस्वीर बदल कर रख दी। आजादी के 67 साल बाद पहली बार देश में किसी गैर कांग्रेसी दल को अकेले अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिल गया। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का दूर-दूर तक सूपड़ा साफ हो गया। कांग्रेस पार्टी किसी भी राज्य में दो अंकों में सीटें नहीं ला पाई और अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन करते हुए 44 सीटों पर सिमट गई। देश की जनता ने मिलीजुली सरकार की कमजोरियों और लाचारियों का एक झटके में इलाज कर दिया। क्षेत्रीय पार्टिंयों की ब्लैकमेलिंग पर एकाएक विराम लग गया। उठापटक के पुरोधाओं के चेहरे लटक गए और मजबूत राष्ट्र का सपना देखने वालों की आंखें छलक उठीं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की ऐतिहासिक जीत की गवाह बनकर 16 मई की तारीख देश के स्वर्णिम इतिहास में दर्ज हो गई। 2014 के चुनाव परिणाम की सबसे मजेदार बात ये है कि इनके आंकड़े इतने एक-तरफा थे कि इनको याद रखना किसी के लिए भी बेहद आसान है।

खिसियानी बिल्ली
भाजपा की ये ऐतिहासिक जीत न तो विपक्ष को हजम हो रही थी और न कुछ पत्रकार रूपी चुनाव विश्लेषकों को। जब कोई तर्क देते नहींे बना तो कहा गया कि भाजपा को सीटें भले ही 282 मिल गई हों, लेकिन उसका वोट शेयर महज 31.3 प्रतिशत है, जो उसे सबसे कम वोट पाकर बहुमत लाने वाली सरकार की श्रेणी में डालता है। पर अगर आंकड़ों को गहराई से विश्लेषण किया जाए तो भाजपा की स्थिति किसी भी दृष्टि से कमजोर नहीं लगती। भाजपा ने कुल लोकसभा सीटों में से केवल 428 पर ही अपने उम्मीदवार खड़े किए थे और इन सीटों का वोट शेयर 40 प्रतिशत बैठता है। भाजपा ने गुजरात में 60 प्रतिशत से ज्यादा वोट पाए। कुल 6 प्रदेशों और केंद्र शासित प्रदेशों में 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल गए। जबकि कुल 9 प्रदेशों और केंद्र शासित प्रदेशों में 40 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले और तीन राज्यों में 30 प्रतिशत से ज्यादा मत मिले।

यूपी ने दिखाया दम
सभी पोल पंडितों को हैरानी में डालते हुए भाजपा ने दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और गोवा में शत प्रतिशत सीटें जीतकर अनोखा इतिहास रचा। इसके अलावा मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश में भी ऐतिहासिक जीत दर्ज कराई। उत्तर प्रदेश में 80 में से 71 सीट जीतकर भाजपा ने ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया जो खुद उसके लिए भी तोड़ना अब मुश्किल होगा। उत्तर प्रदेश में भाजपा की जबरदस्त जीत के पीछे एक ऐसा माहौल खड़ा था, जो अब शायद की कभी मिले। उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत में जो फाॅर्मूला काम किया उसे ऐसे लिखा जा सकता है- 

"केंद्र सरकार के खिलाफ लहर+राज्य सरकार के खिलाफ गुस्सा+नरेंद्र मोदी लहर+मुजफ्फरनगर दंगों का दंश = भाजपा की ऐतिहासिक जीत"

ये भाजपा के पक्ष में एक ऐसा ब्लेंड था जो आगे कभी नहीं मिलेगा और भाजपा का भविष्य में 71 सीटें जीत पाना बेहद मुश्किल है। 

अन्य राज्य
उधर मध्य प्रदेश में 29 में से 27 सीट जीतकर भाजपा ने अपना परचम लहरा दिया। जो दो सीटें कांग्रेस के खाते में गईं उनमें ज्योतिरादित्य सिंधिया की ग्वालियर सीट और कमलनाथ की छिंदवाड़ा सीट शामिल है। राजघराने से जुड़े सिंधिया की जीत तो समझ आती है, लेकिन जबरदस्त मोदी लहर के बीच कमलनाथ का अपनी सीट निकाल पाना काबिले तारीफ है। जबकि छत्तीसगढ़ में भाजपा ने 11 में से 10 सीटें जीतीं, जो एक दुर्ग सीट पार्टी हारी उसके पीछे भी कहा जा रहा है कि पार्टी के स्थानीय नेतृत्व ने इसे जानबूझकर हारा। जम्मू कश्मीर जैसे सेंसिटिव राज्य में भी पार्टी ने छह में से तीन सीट जीतकर सबको हैरत में डाल दिया। जम्मू कश्मीर से अब्दुल्ला परिवार का पूरी तरह सफाया हो गया। इधर बिहार में भाजपा ने भले ही 40 में से 22 सीटें जीती हों, पर उसका वोट शेयर महज 29.9 प्रतिशत ही रहा। आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को इस तरफ ध्यान देना होगा। जबकि कर्नाटक में भाजपा ने 28 में से 17 सीटें जीतकर मजबूत वापसी की और 43.4 प्रतिशत मत प्राप्त किए।

कहां हुई दुर्गति
जिन बड़े राज्यों में पार्टी की दुर्गति हुई उनमें दक्षिण और पूर्व के राज्य शामिल हैं। केरल में बिना खाता खोले पार्टी को 10.5 प्रतिशत मत मिले। तमिलनाडु में 5.5 प्रतिशत मत पाकर एक सीट जीती जबकि एक सीट सहयोगी पीएमके ने। जबकि जयललिता की अन्नाद्रमुक ने 37 सीटों पर जबरदस्त सीट दर्ज की। भ्रष्टाचार के चलते कानूनी चंगुल में फंसा करुणानिधि परिवार को सिफर पर धूल चाटनी पड़ी। उड़ीशा में 21 में से 20 सीटों में नवीन पटनायक की बीजद ने शानदार जीत दर्ज कराई, लेकिन एक सीट जीतकर भी भाजपा को राज्य में 21.9 प्रतिशत मत मिले जो पार्टी के लिए एक अच्छा संकेत हो सकता है। पश्चिम बंगाल में 42 में से 34 सीटें जीतकर ममता दीदी ने अपना दबदबा कायम रखा, जबकि भाजपा ने अपने वोट शेयर में दस प्रतिशत का इजाफा करते हुए 17 प्रतिशत मतों के साथ दो सीटें जीतीं। बंगाल में सीपीआईएम के वोट शेयर में जबरदस्त कमी आई, जो ये संकेत देता है कि वहां का वोटर विकल्प की तलाश में है। आंध्र प्रदेश में भाजपा टीडीपी के साथ गठबंधन में थी और दोनों ने मिलकर 25 में से 17 सीटें जीतीं, लेकिन दो सीटों पर सिमटी भाजपा के लिए आंध्र में स्थिति कुछ बहुत अच्छी नहीं है। जबकि हाल में अलग हुए तेलंगाना में भी पार्टी कोई विशेष उपलब्धि दर्ज नहीं करा पाई। 

भाजपा की कमजोर नस
भाजपा भले ही एक राष्ट्रीय पार्टी हो, लेकिन केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तलंगाना, पश्चिम बंगाल और उड़ीशा में उसकी स्थिति कमजोर है। पंजाब में अकाली दल के बिना पार्टी अभी तक कुछ खास नहीं कर पाई है। जबकि पर्वोत्तर राज्यों में अरुणाचल और आसाम में पार्टी अगली बार राज्य सरकार बनाने की स्थिति में लग रही है, किंतु मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम में पार्टी बेहद कमजोर है। केंद्र शासित राज्यों की बात करें तो एक लक्षद्वीप ही है जहां भाजपा के लिए निकट भविष्य में कोई संभावना नजर नहीं आती।
(To be continued....)

Monday, May 11, 2015

चुनाव जो इतिहास रच गया (भाग-2): मोदी ने ठोका हर विवाद पर छक्का


16वीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव के जब 16 मई 2014 को परिणाम सामने आए तो वे अविस्मरणीय और हतप्रभ करने वाले थे। 16 मई की तिथि इतिहास में इस तरह दर्ज हो गई कि जब-जब बदलाव पर चर्चा होगी तो इस तिथि का जिक्र आएगा। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार किसी गैर कांग्रेसी दल को बहुमत देकर भारतीय मतदाताओं ने अपने वोट की ताकत का अहसास करा दिया। मतदाताओं ने न केवल एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार दी बल्कि इन परिणामों के माध्यम से देश के राजनीतिज्ञों को कई छिपे हुए संदेश भी दे दिए। जिस सुंदर राष्ट्र का सपना सड़क से लेकर संविधान तक आम लोगों को दिखाया जाता रहा, अब जनता उसे हकीकत में तब्दील होते देखना चाहती है। इसी उम्मीद के साथ देश के जनमानस ने नरेंद्र मोदी में अपनी आस्था दिखाई और उनके हाथ में एक मजबूत सरकार की बागडोर सौंप दी। उस ऐतिहासिक चुनाव परिणाम की पहली वर्षगांठ पर एक पुनरावलोकलनः
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भाजपा नेता नरेंद्र मोदी कभी अपने कड़वे बोलों के लिए चर्चित रहते थे। 2009 के चुनाव में राहुल गांधी को जर्सी बछड़ा और सोनिया को जर्सी गाय कहकर वो मीडिया के निशाने पर आ गए थे। लेकिन वही मोदी जब 2014 के चुनावी मैदान में उतरे तो उनकी भाषा इतनी ज्यादा संयत थी कि 440 रैलियों में लंबे-लंबे भाषण देने के बावजूद उनकी जुबान ऐसी नहीं फिसली जिससे कोई विवाद खड़ा हो। राहुल गांधी के चुनावी करियर को तो उन्होंने केवल ‘शहजादे’ कह-कह कर ही हाशिए पर पहुंचा दिया। कुछ रैलियों में उनके भाषण में फैक्चुअल मिस्टेक जरूर हुईं, लेकिन वे ऐसी नहीं थीं कि उन पर विवाद खड़ा हो। उन गलतियों से ‘आज तक’ चैनल को अपने ‘सो साॅरी’ सीरीज का एक एपिसोड बनाने भर का मसाला मिला। पूरे चुनावी माहौल में मोदी विकास का माॅडल प्रस्तुत करते और कांग्रेस की खामियां गिनाते नजर आए। कहीं भी उन्होंने निजी हमले या कमर से नीचे वार नहीं किए और ये बात उनके पक्ष में जाती गई। चुनावी युद्ध पर गिद्ध की तरह नजरें गड़ाए बैठी मीडिया इसी फिराक में थी कि कब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार गलती करें और कब वो उस गलती का पोस्ट माॅर्टम करे, पर मोदी ने उस पद की पूरी गरिमा को बनाए रखा, जिसके वो उम्मीदवार थे।

चाय वाला तंज
भारतीय राजनीति का पढ़ा-लिखा चेहरा समझे जाने वाले मणिशंकर अय्यर को न जाने क्या हुआ कि उन्होंने 18 जनवरी 2014 कोई हुई एआईसीसी की मीटिंग में नरेंद्र मोदी के खिलाफ जहर उगलते हुए कह दिया कि- 21वीं शताब्दी में मोदी इस देश के प्रधानमंत्री कभी नहीं बन सकते, हां अगर वो चाय बेचना चाहें तो उसके लिए जगह का इंतजाम कर दिया जाएगा। दून स्कूल से पढ़े-बढ़े मणिशंकर का ये तंज उनकी पार्टी के लिए इतना भारी पड़ेगा ये उन्होंने सोचा नहीं होगा। भाजपा कार्यकर्ता सचमुच चाय की केतली लेकर एआईसीसी की मीटिंग में पहुंच गए और मीडिया ने जबरदस्त कवरेज दी। इसके बाद मोदी ने हर रैली में अपनी पहचान बतानी शुरू कर दी। मोदी ने ‘चाय वाले’ की छवि को पूरे चुनाव प्रचार में इतना ज्यादा भुनाया कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी मोदी की काबिलियत के कायल हो गए। इतना ही नहीं उन्होंने अपने नामांकन में चाय वालों को अपना अनुमोदक भी बनाया। मोदी ने हर मंच से अपनी पुरजोर आवाज में बार-बार लोगों को बताया- ‘मैंने चाय बेची है, देश नहीं बेचा’। इस स्ट्रैटेजी को अपनाकर भाजपा ने मोदी के पक्ष में माहौल बनाने में असरदार मदद की।

बड़ौदा की सेल्फी 
अपनी संसदीय सीट बड़ौदा में वोट डालने के बाद मोदी ने जब कमल के फूल के निशान के साथ मीडिया के सामने सेल्फी खींची तो उन्हें अच्छी तरह पता होगा कि ये आचार संहिता का उल्लंघन है, बात बढ़ सकती है। लेकिन यही मोदी चाहते थे। दरअसल 2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी की मीडिया में अधिकतम दिखने और चर्चित रहने की रणनीति साफ नजर आई। चाहे इसके लिए कोई छोटा-मोटा उल्लंखन ही क्यों न करना पड़े। सेल्फी लेने की पीछे उनकी यही मंशा थी। जैसे ही सेल्फी टीवी स्क्रीन पर दिखनी शुरू हुई, हंगामा खड़ा हो गया। चैनल और विपक्षी पार्टियां उल्लंघन-उल्लंघन चिल्लाने लगे। अपने चुनाव चिन्ह के साथ फोटो खिंचाना चुनाव आयोग की आचार संहिता का उल्लंघन जरूर था पर ये इतना बड़ा अपराध कतई नहीं था कि मतदाता को नागवार गुजरे। इसलिए इस विवाद का भाजपा के अभियान पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा, पर मीडिया में हुई चर्चा के कारण मोदी ने कम से कम दो दिन तक सभी चैनलों का एयर टाइम अपने पक्ष में मोड़ लिया।

वाराणसी रैली पर प्रतिबंध
वाराणसी के जिलाधिकारी और रिटर्निंग आॅफिसर प्रांजल यादव द्वारा सुरक्षा का हवाला देकर शहर के बेनियाबाग इलाके में नरेंद्र मोदी की प्रस्तावित रैली को इजाजत न देकर चुनावी माहौल में जबरदस्त उबाल ला दिया। भाजपा ने रैली की पूरी तैयारी कर ली थी, गुजरात की बहुत बड़ी टीम वाराणसी में डेरा डाले थी, कार्यकर्ताओं का जोश आसमान पर था, ऐसे में रैली की इजाजत न मिलने की खबर फैलते ही, मायूसी के साथ-साथ भावनात्मक उबाल भी देखने को मिला। जिलाधिकारी ने भले ही सुरक्षा और कानून व्यवस्था की बात कहकर रैली पर प्रतिबंध लगाया था, लेकिन आम लोग इस निर्णय के पीछे डीएम प्रांजल यादव और यूपी के मुखिया अखिलेश यादव के बीच यादव कनेक्शन की नजर से देखने लगे। खबरिया चैनलों पर इस प्रतिबंध का अलग-अलग एंगल से पोस्ट माॅर्टम होने लगा। एक बार फिर माहौल मोदी के पक्ष में जाता दिखा। मौका भांपकर भाजपा के रणनीतिज्ञों ने गर्म लोहे पर चोट की। नरेंद्र मोदी 8 मई को वाराणसी पहुंचे, पर रैली नहीं की, न माइक संभाला और न कोई बयान दिया। मोदी ने बस इतना किया कि वो बीएचयू गेट से अपनी गाड़ी में सवार होकर वाराणसी की सड़कों से गुजरते हुए भाजपा कार्यालय तक पहुंचे। पर ये कदम इतना छोटा नहीं था, जितना पढ़ने में लग रहा है। इस छोटे से सफर को तय करने में मोदी के काफिले को कई घंटे लगे। भारी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता और आम लोग उन्हें देखने के लिए सड़कों और घरों की छत पर निकल आए। मोदी खुद को एक ऐसी उम्मीदवार के तौर पर पेश करने में सफल रहे जिससे उसका बोलने का अधिकार छीना जा रहा है। मीडिया पल-पल की लाइव कवरेज दिखाता रहा और ये सब फिर एक बार नरेंद्र मोदी के पक्ष में चला गया।

दूरदर्शन का इंटरव्यू 
बिना बात के विवाद कैसे खड़ा किया जाता है ये मोदी के आखिरी मास्टर स्ट्रोक में देखा जा सकता है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने एक खास पैटर्न में सभी टीवी चैनलों को इंटरव्यू दिए। इंडिया टीवी की ’आपकी अदालत’ में रजत शर्मा को दिया गया इंटरव्यू तो लोगों में जबरदस्त हिट हुआ। चैनल ने इस इंटरव्यू को बार-बार दिखाकर खूब टीआरपी भी बटोरी। अंत में दूरदर्शन की बारी आई। वैसे तो चुनाव के दौरान दूरदर्शन चुनाव आयोग की आचार संहिता का सख्ती से पालन करता है, लेकिन फिर भी वह उस समय की यूपीए सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधीन था। किसी भी इंटरव्यू के बाद उसमें एडिटिंग होना एक स्वभाविक प्रक्रिया है। सभी चैनलों में ऐसा होता है, ये हर चैनल का विशेषाधिकार है। लेकिन डीडी न्यूज को नरेंद्र मोदी के इंटरव्यू में काट-छांट बहुत भारी पड़ गई। डीडी-न्यूज द्वारा गुजरात जाकर मुख्यमंत्री आवास पर लिए गए इस इंटरव्यू के प्रसारित होते ही भाजपा ने दूरदर्शन पर हल्ला बोल दिया। भाजपा ने आरोप लगाया कि चैनल ने यूपीए सरकार के दबाव में इंटरव्यू का सबसे महत्वपूर्ण भाग काट दिया है। ये आरोप कुछ हद तक ठीक भी था, क्योंकि मोदी का इटरव्यू प्रसारित करने से पहले दूरदर्शन के आला अधिकारियों से लेकर कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा उसे देखा गया था। पर चैनल की समय सीमा में बांधने के लिए इंटरव्यू को काटना भी जरूरी था। कहीं न कहीं से तो इंटरव्यू को काटा ही जाना था। पर भाजपा दूरदर्शन को कोई मौका नहीं देना चाहती थी। पार्टी ने बेहद आक्रामक होकर दूरदर्शन पर आरोप लगाए। ये गुस्सा इसलिए भी था क्योंकि पूरे यूपीए काल में डीडी न्यूज ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का बायकाॅट करके रखा। गुजरात सरकार तो दूर वहां के विकास से जुड़ी खबरें भी बमुश्किल दिखाई गईं। पर मोदी ने एक ही मास्टर स्ट्रोक से दूरदर्शन से बदला भी ले लिया और अपना चुनावी मकसद भी पूरा कर लिया। ये मुद्दा कई दिनों तक मीडिया में छाया रहा, और मोदी को कवरेज मिलने का सिलसिला जारी रहा।

भाजपा की इस तरह की रणनीति का परिणाम ये निकला कि चुनाव प्रचार के दौरान चैनलों का अधिकांश एयर टाइम हो या अखबारों के फ्रंट पेज हर ओर मोदी ही मोदी छाए रहे। कोई दूसरा चेहरा चाहे वह अपनी पार्टी का हो या विपक्षी पार्टियों का, उनके आसपास भी नहीं भटका।
(To be continued...)

Sunday, May 10, 2015

चुनाव जो इतिहास रच गया (भाग-1): चारों ओर नमो-नमो का शोर

16वीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव के जब 16 मई 2014 को परिणाम सामने आए तो वे अविस्मरणीय और हतप्रभ करने वाले थे। 16 मई की तिथि इतिहास में इस तरह दर्ज हो गई कि जब-जब बदलाव पर चर्चा होगी तो इस तिथि का जिक्र आएगा। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार किसी गैर कांग्रेसी दल को बहुमत देकर भारतीय मतदाताओं ने अपने वोट की ताकत का अहसास करा दिया। मतदाताओं ने न केवल एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार दी बल्कि इन परिणामों के माध्यम से देश के राजनीतिज्ञों को कई छिपे हुए संदेश भी दे दिए। जिस सुंदर राष्ट्र का सपना सड़क से लेकर संविधान तक आम लोगों को दिखाया जाता रहा, अब जनता उसे हकीकत में तब्दील होते देखना चाहती है। इसी उम्मीद के साथ देश के जनमानस ने नरेंद्र मोदी में अपनी आस्था दिखाई और उनके हाथ में एक मजबूत सरकार की बागडोर सौंप दी। उस ऐतिहासिक चुनाव परिणाम की पहली वर्षगांठ पर एक पुनरावलोकलनः
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ब भारतीय जनता पार्टी ने अपने वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की नाराजगी मोल लेकर 10 जून 2013 को नरेंद्र मोदी को 2014-लोकसभा चुनाव के लिए अपना प्रचार प्रमुख चुना था तब शायद किसी को ये अंदाजा नहीं रहा होगा कि मोदी पार्टी के लिए ऐसा प्रचार करेंगे जो न किसी ने कभी देखा होगा और न सुना। मोदी ने देश का ऐसा तूफानी दौरा किया कि 32,87,590 वर्ग किलोमीटर में फैला ये विशाल राष्ट्र उनके हौसले के सामने एक छोटा सा गांव नजर आया। चुनाव प्रचार के दौरान मोदी तीन लाख किलोमीटर से ज्यादा यात्रा कर कुल 440 रैली और 5827 अन्य कार्यक्रमों के सूत्रधार बने। भारत के चुनावी इतिहास में देश की जनता ने ऐसा जोशीला प्रचार कभी नहीं देखा था। चैनल से लेकर अखबारों तक, रेडियो से लेकर लाउडस्पीकरों तक, गली मोहल्लों से लेकर रैलियों तक, हर मोर्चे पर मोदी विपक्षी पार्टियों पर भारी और बहुत भारी पड़ते दिखे। चुनाव शुरू होने से पहले पोल पंडित ये तो कह रहे थे कि एनडीए की सरकार बनेगी, लेकिन कोई खुलकर ये कहने को तैयार नहीं था कि भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलेगा। लेकिन नौ चरणों का मतदान खत्म होते-होते कई सर्वे यह कहने को मजबूर हो गए कि भाजपा पूर्ण बहुमत से आ रही है।

चैनल बोले नमो-नमो
विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जहां धार्मिक विविधता सबसे ज्यादा है और शायद इसीलिए साम्प्रदायिक दंगे भारत में एक हकीकत हैं। ये दंगे न अंग्रेज रोक पाए और आजादी के बाद न कोई भारतीय सरकार रोक पाई। लेकिन भारतीय न्यूज चैनलों ने जितना पोस्ट माॅर्टम 2002 के गुजरात दंगों का किया और जितनी कीचड़ वहां के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर उछाली गई वैसा सुलूक भारतीय इतिहास में न तो किसी सरकार और न ही किसी नेता के साथ किया गया। यूपीए के दस साल के शासन में भारतीय न्यूज चैनल तकरीबन हर रोज गुजरात दंगों का जिक्र कर मोदी को नीचा दिखाने का कोई न कोई प्रयास करते दिखते थे। बात साम्प्रदायिकता की हो रही हो, तो उसे जबरदस्ती मोड़कर गुजरात ले जाया जाता था। पर 2014 के लोकसभा चुनाव आते-आते उसी मीडिया के सुर बदलने लगे। 2002 के दंगों को लेकर पिछले 12 सालों से हाथ-पांव धोकर नरेंद्र मोदी के पीछे पड़ी भारत की सबसे तेज मीडिया, मोदी रंग में रंगती चली गई। यकायक मीडिया ने मोदी के खिलाफ जहर उगलना बंद कर दिया और ‘तटस्थ’ खबरें दिखाने लगी। ब्रांड मोदी ने मीडिया को टीआरपी भी खूब दिलाई। बताने वाले ये भी कहते हैं कि कुछ बड़े उद्योगपतियों के माध्यम से कुछ बड़े मीडिया घरानों में पैसा लगवाया गया और विचारधारा विशेष के लिए काम कर रहे कुछ जहरीले पत्रकारों की छुट्टी का रास्ता साफ हुआ। दिल्ली के प्रेस क्लब में हल्के-हल्के सुरूर में कुछ खबरनवीस दिन के उजाले में ये कहते हुए दिख जाएंगे कि सभी सिद्धांतवादी, सत्यवादी और सुपर फास्ट न्यूज चैनलों ने मोदी को व्यापक कवरेज देने के एवज में भाजपा से ‘ठीकठाक’ दोहन भी किया। वह भी कुछ इस तरह कि पेड न्यूज का हंटर भी उनकी कमर पर न पड़े।

नारे जो जमकर चले
भाजपा के विजय अभियान में ‘अबकी बार मोदी सरकार’ ऐसा नारा रहा जो बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ गया। इस नारे को भ्रष्टाचार, अत्याचार, दुराचार, आम का अचार और न जाने किस-किस चीज के साथ जोड़कर लगाकर चलाया गया। ये नारा जमकर चला और ऐसा चला कि 16 मई को आए परिणामों में सच्चाई में तब्दील हो गया।

इसके अलावा जब मोदी समर्थकों ने वाराणसी में उनकी एक रैली में ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी’ का नारा लगाया तो ये भी लोगों ने हाथों-हाथ लिया। भगवान शिव के ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे से उधार लेकर बनाया गया ये नारा उस समय विवादों में घिर गया जब द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद ने इस पर आपत्ति दर्ज कराई। वैसे स्वामी स्वरूपानंद जी का कांग्रेस प्रेम और संघ से टकराहट जगजाहिर है, फिर भी खुद नरेंद्र मोदी को सामने आकर ये नारा न लगाने की अपील करनी पड़ी। 

इसके अलावा भाजपा के विज्ञापन ‘अच्छे दिन आने वाले हैं' की संगीतमय धुन इतनी सहज, कर्णप्रिय और उम्मीद जगाने वाली थी कि लोगों ने इसे हाथों हाथ लिया। पर पीएम बनने के बाद नरेंद्र मोदी को सबसे ज्यादा ताने, उलाहने ‘अच्छे दिन’ को लेकर ही सुनने पड़ रहे हैं।

हर वक्त कुछ नया करने की फिराक में रहने वाले नरेंद्र मोदी ने भाजपा का एंथम भी लांच किया। इस इलेक्शन एंथम में उन्होंने खुद अभिनय किया और अपनी आवाज भी दी। ‘मैं देश नहीं झुकने दूंगा’ के शब्द लोगों के बीच उतने चर्चित तो नहीं हो पाए, फिर भी नरेंद्र मोदी ने खुद इस गीत में अपनी आवाज देकर लोगों तक अपना संदेश पहुंचा दिया।

कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी
‘कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना’ किसे कहते हैं ये 2014 के भाजपा के प्रचार अभियान में देखा जा सकता है। चुनाव आते-आते ये बात लगभग साफ हो चुकी थी कि देश में जबरदस्त कांग्रेस विरोधी माहौल है और सत्ता बदलनी तय है। लेकिन मोदी इस माहौल को पूर्ण बहुमत में तब्दील करना चाहते थे। पर भाजपा के चुनावी इतिहास को देखते हुए पूर्ण बहुमत एक सपने जैसा ही था। इसलिए मोदी ने चाय पे चर्चा करने से लेकर थ्री-डी रैली तक, सेल्फी से लेकर सोशल मीडिया तक, हाई प्रोफाइल मंच से लेकर एलसीडी स्क्रीन तक हर वो माध्यम अपनाया जो जन-जन तक उनकी आवाज को पहुंचाए और तब तक पहुंचाए जब तक लोगों को ये विश्वास न हो जाए कि अगला पीएम बनने लायक अगर देश में कोई है तो वो हैं नरेंद्र मोदी। मोदी के इस हाई-टेक प्रचार अभियान के सामने सारे विपक्षी दल बेहद बौने नजर आए। हालांकि इस हाई टेक प्रचार में हुए खर्च पर उंगलियां उठती रहीं हैं।

रंग लाया ‘एक बूथ-एक बोलेरो’
मोदी की रैलियों में जबरदस्त भीड़ जुटाने के लिए ‘एक बूथ-एक बोलेरो’ का फाॅर्मूला खूब रंग लाया। मोदी ने देश भर में तकरीबन 440 रैलियों को संबोधित किया। इसके लिए भाजपा और संघ कार्यकर्ताओं को हर बूथ से कम से कम आठ लोगों को लाने की जिम्मेदारी दी गई थी। इसी फाॅर्मूले के दम पर मोदी की रैलियों में जनसैलाब देखने को मिला। मोदी खुद भी पूरी तैयारी के साथ हर रैली में पहुंचते थे। वे अपने हर भाषण में स्थानीय लोगों के साथ रिश्ता जोड़ने का प्रयास करते थे, स्थानीय समस्याओं पर चर्चा करते थे, जो लोगों के मन पर असर डालता था। भाषण में उस क्षेत्र के महापुरुषों का जिक्र करना भी मोदी नहीं भूलते थे। इससे लोगों में यह संदेश जाता था कि बंदे को हमारी समस्याओं के बारे में पता है। हर क्षेत्र की रैली में मोदी इसी तरह जनभावनाओं को समझकर अपने भाषण का मसौदा तैयार करके माइक संभालते थे।

एनआरआई योगदान
प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी जिस अप्रवासी भारतीय समुदाय की प्रशंसा करते नहीं थकते, उस समुदाय का भी चुनाव मोदी के प्रचार में कुछ कम योगदान नहीं रहा। विदेशों में बैठे भाजपा के सिम्पैथाइजर्स की एक बड़ी फौज कामधाम छोड़कर भारत पहुंची हुई थी और चुनाव प्रचार में सहयोग कर रही थी। कुछ लोगों ने वाॅल्यूंटीयर्स के समूह बनाकर इंटरनेट पर सोशल मीडिया और वेबसाइट्स पर भाजपा के समर्थन में माहौल बना रखा था। सोशल मीडिया पर भाजपा समर्थक अपने विरोधियों पर बहुत भारी पड़े। एनआरआई समुदाय ने भाजपा को चुनाव लड़ने के लिए चंदा भी जमकर दिया। यही सब कारण हैं कि पीएम मोदी अप्रवासी भारतीयों के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव रखते हैं और पीएम बनने के बाद उन्होंने अप्रवासी भारतीयों को नागरिकता और वीजा संबंधी बहुत सी सहूलियतें और रियायतें भी दी हैं। अप्रवासी भारतीयों में अपने देश के लिए कुछ करने की एक जबरदस्त भूख है। मोदी को अमेरिका द्वारा वीजा देने से इंकार करना अप्रवासी भारतीयों के बीच नाक का सवाल बन गया था। यही कारण है कि पीएम बनने के बाद मोदी के पहले अमरीकी दौरे पर अप्रवासी भारतीयों ने उनका एक हीरो की तरह स्वागत किया और मैडिसन स्क्वायर में एक अभूतपूर्व कार्यक्रम का आयोजन किया।
(To be continued...)

Thursday, April 23, 2015

मत जइयो केदार!

2013 की विनाशकारी घटना के बाद से उत्तराखंड सरकार फिर से वहां पर्यटन बहाल करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही है। केदार घाटी की घटना के बाद पर्यटकों में इतनी दहशत है कि बाकी के तीन धामों में भी पर्यटन को भारी धक्का लगा है। पर्यटकों का विश्वास जीतने के लिए सरकार बुजुर्गों को मुफ्त यात्रा कराने से लेकर सेलिब्रिटीज को बुलाने तक हर हथकंडा अपनाया जा रहा है। पर सवाल ये उठता है कि क्या ऐसे सेंसिटिव जोन में अत्यधिक पर्यटन को बढ़ावा देना उचित है।

केदार घाटी में बेतरतीब ढंग से धनोपार्जन की भावना से पर्यटन को बढ़ावा देने का बहुत बुरा खामियाजा हम 2013 में भुगत चुके हैं। उस दिल दहलाने वाले हादसे के बाद उत्तराखंड सरकार को यात्री खोजे नहीं मिल रहे हैं। 2014 में यात्रा शुरू तो कर दी गई लेकिन खराब मौसम ने फिर उसमें टांग अड़ाई। लेकिन इंसान प्रकृति से आखिरी दम तक लड़ने को आतुर है। हजारों की तादाद में जानें गंवाने के बावजूद हम फिर उसी राह पर चलने को आतुर हैं, जिस पर हमने अपनों को हमेशा के लिए खो दिया।

एक तरह तो हम तीर्थस्थलों का उनके आध्यात्मि महत्व के लिए महिमा मंडन करते हैं और दूसरी तरफ उन्हें पर्यटन की दृष्टि से दुकान में तब्दील करने की वकालत करते हैं। ये दोहरे मापदंड़ वाला दृष्टिकोण प्रकृति, पर्यावरण और पर्यटन के साथ-साथ तीर्थस्थल के लिए भी हानिकारक सिद्ध होगा। हिमालय के तीर्थस्थल श्रद्धालुओं और साधकों के लिए थे, हमने पर्यटन के नाम पर उन्हें अइयाशी के टूरिस्ट स्पाॅट में बदल दिया।

ये बात ठीक है कि तीर्थस्थलों पर जाने वाले श्रद्धालुओं के कारण स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है और राज्य की जीडीपी में बढ़त होती है। लेकिन अगर हमारी पूरी मानसिकता श्रद्धालुओं की जेबें झाड़ना ही बन जाए तो स्थिति वही होगी जो 2013 में बनी। नाजुक पहाड़ों पर अंधाधुंध डीजल गाडि़यों को प्रवेश, मानकों को ताक पर रखकर किया गया निर्माण कार्य आपको थोड़े समय के लिए धन जरूर दिला सकता है पर अंत में ये घातक ही सिद्ध होगा। इसलिए केदारनाथ धाम को साधकों हेतु एक साधनास्थली ही रहने दिया जाए। वहां जबरदस्ती कृत्रिम भीड़ खींचने का प्रयास न किया जाए। 

क्योंकि अब केदार आराम चाहता है। कृपा करके उसे कुछ समय के लिए अकेला छोड़ दो।

Wednesday, April 1, 2015

बिहार चुनावः भाजपा सरकार या जनता परिवार


2014 के लोकसभा चुनाव से लेकर अक्टूबर 2015 में जब बिहार का चुनाव होगा तब तक पाटलिपुत्र की राजनैतिक परिस्थितियों में बहुत परिवर्तन आ चुका होगा। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न चुनाव के दौरान भी वही होगा और आज भी वही है कि सत्ता का स्वाद कौन चखेगा। क्या अपने करिश्माई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा बिहार में पूर्ण बहुमत हासिल करेगी, या फिर लालू-नीतीश की गलबहियां कोई रंग खिलाएंगी या कांग्रेस किंग मेकर बनकर उभरेगी, क्या आम आदमी पार्टी के मुखिया केजरीवाल (अपने स्टैंड, कि दिल्ली के बाहर अभी नहीं जाएंगे से यू टर्न लेकर) पार्टी के लिए बिहार के पानी में गहराई नापेंगे या फिर जीतन राम मांझी अपने राजनीतिक कौशल से नीतीश से अपने अपमान का बदला लेंगे? सवाल बहुत सारे हैं, मगर जवाब अभी किसी के पास नहीं। लेकिन अगर पिछले एक साल के दौरान हुए लोकसभा और विधानसभा चुनावों के आंकड़ों का जायजा लिया जाए तो अंदाजा जरूर लगाया जा सकता है कि बिहार का चुनाव किस करवट जा सकता है।

लोकसभा चुनाव 2014
2014 के लोकसभा चुनाव के परिणामों का विश्लेषण करें तो बिहार में भाजपा ने 40 में से कुल 30 सीटों पर चुनाव लड़ा और 30 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 22 सीटों पर विजय दर्ज कराई। जबकि उसके सहयोग से रामविलास पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी ने सात सीटों पर चुनाव लड़कर 6.5 प्रतिशत वोट शेयर के साथ छह सीटों पर जीत दर्ज कराई। भाजपा की दूसरी सहयोगी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने तीन सीटों पर चुनाव लड़ा और 3.1 प्रतिशत वोट पाकर तीनों सीटें जीत लीं।

वहीं बिहार के दूसरे धड़े पर नजर डालें तो लालू यादव की राजद ने 20.5 प्रतिशत वोट शेयर के साथ चार सीटें जीतीं। जबकि नीतीश की जनता दल यूनाइटेड ने 16 प्रतिशत वोट शेयर के साथ दो सीटों पर जीत दर्ज की। उधर सोनिया गांधी की कांग्रेस ने 8.6 प्रतिशत वोट पाकर दो सीटें जीतीं।

विधानसभा पर लोकसभा का असर
अब लोकसभा के इन परिणामों को विधानसभा वार परिवर्तित किया जाए तो भाजपा कुल 121 विधानसभा सीटों पर आगे थी और 49 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही, उसकी सहयोगी लोकजनशक्ति पार्टी 34 विधानसभा सीटों पर आगे थी और 7 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही और उसकी दूसरी सहयोगी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी 17 विधानसभा सीटों पर आगे रही और 1 सीट पर दूसरे स्थान पर। इनको जोड़ा जाए तो एनडीए कुल 172 सीटों पर आगे रहा और 57 सीटों पर दूसरे स्थान पर। बिहार विधानसभा में 243 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए 122 सीटों की जरूरत है, अगर लोकसभा चुनाव परिणामों को हूबहू विधानसभा पर लागू कर दिया जाए तो एनडीए बहुत आराम से सरकार बनाता नजर आ रहा है। लेकिन फिर वही बात है कि 2014 से लेकर 2015 तक पटना की गंगा में बहुत पानी बह चुका होगा।

यही लोकसभा परिणाम अगर भाजपा की विरोधी पार्टियों पर लागू किए जाएं तो राष्ट्रीय जनता दल 32 सीटों पर आगे रही और 110 सीटों पर दूसरे स्थान पर, जबकि जनता दल यूनाइटेड 18 सीटों पर आगे रही और 27 सीटों पर दूसरे स्थान पर और कांग्रेस 14 सीटों पर आगे रही और 44 सीटों पर दूसरे स्थान पर। इन तीनों को अगर जोड़ा जाए तो ये तीनों विरोधी दल 66 सीटों पर आगे रही और 181 सीटों पर दूसरे स्थान पर। इन आंकड़ों के अनुसार तो विरोधी दलों की सरकार बनना मुश्किल लगती है, लेकिन इस बार परिवर्तन ये आ गया है कि लालू और नीतीश एक हो गए हैं, लिहाजा उनका गठबंधन भाजपा के सामने कितनी बड़ी चुनौती पेश कर पाता है ये कहना मुश्किल है।

भाजपा और जनता परिवार की मुश्किलें
बिहार की राजनीति को सतही तौर पर देखा जाए तो मोटे तौर पर माहौल भाजपा के पक्ष में नजर आता है। लेकिन भाजपा की अच्छे बहुमत वाली जीत इसी बात पर निर्भर करेगी कि दिल्ली के विध्वंस के बाद पार्टी कितनी एकजुटता के साथ चुनाव लड़ती है। जनता परिवार तो भाजपा को चुनौती देने की कोशिश कर ही रहा है, लेकिन उसके सामने पहली चुनौती होगी लोजप और रालोप के साथ सीटों का बंटवारा। महाराष्ट्र जैसे अनुभव से बचने के लिए पार्टी की पहली कोशिश यही होनी चाहिए कि वह अपने दम पर बहुमत प्राप्त करे और बाद में दोनों सहयोगियों को भी सरकार में स्थान दे। पार्टी के लिए दूसरी चुनौती होगी कि वह अपना सीएम उम्मीदवार चुनाव से पहले घोषित करे या बाद में। हालांकि सुशील मोदी उर्फ सुमो अपनी जबरदस्त दावेदारी पेश करते रहे हैं, फिर भी यह निर्णय बेहद अहम है। भाजपा के सामने तीसरी चुनौती होगी टिकट बंटवारे के बाद बागियों से निपटना। ये बात भी ध्यान देने की है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने वोट डालते वक्त जाति की दीवारों को भी दरकिनार करके भाजपा के पक्ष में वोट दिया। लेकिन विधानसभा चुनावों में वैसा हो पाना बहुत मुश्किल है।

वहीं दूसरी ओर जनता परिवार के लिए उम्मीदें संजोए बैठे नीतीश कुमार की राह बिल्कुल आसान नहीं है। नीतीश द्वारा सालों पुराना गठबंधन तोड़ने के फैसले के बाद उन पर पीठ में छुरा भोंकने का बड़ा आरोप भाजपा लगाती रही है। चुनाव की घोषणा होते ही उनकी पार्टी पर टूटने का खतरा मंडरा रहा है। दूसरे, लालू का साथ कितना भरोसेमंद और कितना लंबा चलेगा यह कहना मुश्किल है। ऊपरी तौर पर जनता परिवार सत्ता के लिए इक्ट्ठे हुए मौका परस्त लोगों का समूह ही नजर आता है। उनमें लोगों के लिए गंभीरता कम और कुर्सी के लिए आतुरता ज्यादा नजर आती है, जहां साफ छवि वाले नीतीश कुमार फिर से बिहार की रण जीतने की खातिर भ्रष्टाचार में आरोपी लालू का भी साथ लेने को तैयार हैं और जेल काट रहे ओमप्रकाश चैटाला को भी। भाजपा अगर ये सब चीजें अगर बिहार के लोगों को समझाने में सफल रही तो जनता परिवार के सपने टूट सकते हैं।

‘आप’ और ‘हम’ का असर 
बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) और जीतन राम मांझी की हिंदुस्तान आवाम मोर्चा (हम) भी अपना दम आजमा सकते हैं। दिल्ली में बुरी तरह अंदरूनी कलह से जूझ रहे केजरीवाल ने यूं तो शपथ लेते वक्त दिल्ली के बाहर जाने की अनिच्छा प्रकट की थी, लेकिन बाद में खबरें आईं कि आप दिल्ली के बाहर भी चुनावी भाग्य आजमाएगी। दिल्ली में चमत्कार करने वाली आप बिहार में शायद ही कोई जादू कर पाए। पार्टी की वर्तमान अंदरूनी हालात देखकर तो लगता है कि पार्टी चुनाव लड़ने से भी इंकार कर सकती है। जबकि जीतन राम मांझी की ‘हम’ का एकमात्र उद्देश्य नीतीश कुमार से अपने अपमान का बदला लेना होगा। महादलितों के वोट विधानसभा सीटों में अहम किरदार अदा करते हैं, मांझी इस वोट को काट पाएंगे या नहीं चुनाव में ही पता चलेगा। भाजपा भी मांझी को अपने पक्ष में लेने का प्रयास कर सकती है।

अन्य राज्यों पर लोकसभा चुनाव का असर
लोकसभा चुनाव के बाद कुल पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें से भाजपा ने हरियाणा और झारखंड में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया। जबकि महाराष्ट्र और जम्मू कश्मीर में मिली जुली सरकार बनाने में सफलता मिली। लेकिन दिल्ली के विस्मयकारी परिणाम ऐसे रहे कि पार्टी को अभूतपूर्व हार का सामना करना पड़ा। नीचे चित्रों में दिया गया विश्लेषण ये बताने का प्रयास करता है कि लोकसभा चुनाव के अनुसार इन राज्यों की विधानसभाओं में कितनी सीटें अनुमानित की गई थीं और वास्तविक परिणाम क्या रहे। वैसे तो हर राज्य की परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं फिर भी बिहार के बारे में एक मोटा अंदाजा लगाया जा सकता है।

हरियाणा


झारखण्ड 


महाराष्ट्र 


जम्मू कश्मीर 


दिल्ली 

बिहार



Wednesday, March 4, 2015

प्रधानमंत्री का यूं कैंटीन में जाकर खबर बन जाना

प्रधानमंत्री मोदी ने संसद की कैंटीन में खाना खाया और ये राष्ट्रीय खबर बन गई। इस खबर से दो बातें मुखर होकर सामने आईं, पहली ये कि सांसदों के लिए बनी इस कैंटीन में प्रधानमंत्री, जो खुद भी एक सांसद होते हैं, कभी भोजन नहीं करते थे। ये पहली बार था कि देश के प्रधानमंत्री ने कैंटीन में जाकर भोजन किया। ये अच्छी पहल है, स्वागतयोग्य है। दूसरी बात ये सामने आई कि संसद की कैंटीन कितनी सस्ती है कि यहां सिर्फ 29 रुपये में शाकाहारी थाली मिल जाती है। 

जनप्रतिनिधि खास क्यों?
जब ये खबर लोगों ने टीवी पर देखी तो एक तरफ उनको खुशी हुई कि प्रधानमंत्री ने एक सहज-सरल सा कदम उठाया, दूसरी तरफ ये कुंठा मन में आई कि आम लोगों को पूरी कोशिश करने के बावजूद अच्छा खाना 100 रुपये से कम में नसीब नहीं होता, वहीं उनके प्रतिनिधि सांसद आसानी से इतना सस्ता खाना खाते हैं। देश के वित्त मंत्री बार-बार सब्सिडी हटाकर आत्मनिर्भर बनने की सलाह देते आए हैं। पेट्रोल, डीजल, सिलेंडर, खाद, बीज, राशन तमाम चीजों पर सब्सिडी कम या खत्म करने की पैरोकारी हो रही है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है। देश के जन अगर आत्मनिर्भर बनते हैं, तो ये एक सुखद सफलता होगी। पर आत्मनिर्भर बनने की अपेक्षा केवल जनता से ही क्यों की जाए। जनप्रतिनिधि इस दायरे में क्यों न आएं? क्या वे ताउम्र सब्सिडी का लाभ उठाकर सरकार पर बोझ बने रहेंगे?

शुरुआत अपने घर से
ये जगजाहिर है कि देश के बजट का बहुत बड़ा हिस्सा सरकारी खर्चों में चला जाता है। अगर सरकार अपनी नीतियों में सरकारी खर्च को कम करती नजर आए तो कहना ही क्या? हो सकता है कि कुछ कदम उठाए भी गए हों, पर वे न तो कहीं नजर आए न उनकी चर्चा हुई। सब्सिडी की बैसाखियों को हटाकर देश को आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने का नारा बुलंद कर रही वर्तमान एनडीए सरकार अगर सब्सिडी हटाने की शुरुआत संसद से ही शुरू करती तो संदेश बहुत सकारात्मक जाता। अभी भी देर नहीं हुई, ये कदम उठाया जा सकता है। मीडिया के माध्यम से संसद के बारे में ये जानकारी तो आम लोगों तक पहुंच ही जाती है कि संसद की कार्यवाही का खर्च काफी ज्यादा होता है, जिसका भार आम जनता की जेब पर पड़ता है। और ये भी कि संसद का काफी वक्त हंगामे की भेंट चढ़ जाता है। ऐसे में आम लोगों के मन में ये प्रश्न उठना लाजमी है कि वे अपनी जेब से कुछ खास लोगों का खर्च क्यों उठाएं। क्या सांसद अपने भोजन का खर्च स्वयं नहीं उठा सकते। एक दौर था जब सांसद की पगार बहुत कम हुआ करती थी। लेकिन आज सांसद अपने अन्य भत्तों से अलग 50 हजार रुपये प्रति माह पगार के रूप में उठाते हैं। अगर भत्तों को मिला लिया जाए तो एक सांसद पर सरकार प्रति माह एक लाख 40 हजार रुपये खर्च उठाती है। ये रकम किसी भी दृष्टि से कम नहीं है। क्या इतनी रकम प्रति माह लेने वाले व्यक्ति को अपनी रोटी के लिए सरकार से सब्सिडी लेने की आवश्यकता है? फिर भी पता नहीं क्यों सरकार सांसदों के भोजन पर इतनी भारी सब्सिडी प्रदान करती है। इस अनावश्यक बोझ से सरकार को तुरंत फारिग होना चाहिए।

किसको दें सब्सिडी
सच्चे मायनों में संसद भवन के अंदर अगर सब्सिडी प्रदान करनी है तो उन स्टूडेंट्स को प्रदान की जाए जो यहां एजूकेशनल टूर पर आते हैं, संसद के फोर्थ ग्रेड कर्मचारियों को प्रदान की जाए। सांसद आर्थिक दृष्टि से पूरी तरह मजबूत हैं, उनको कम से कम रोटी पर सब्सिडी देने की कोई आवश्यकता नजर नहीं आती। उसी तरह देश में कदम-कदम पर ठोके गए टोल बूथों पर जहां आम आदमी जद्दोजहद में फंसा रहता है, ये गणमान्य लोग अपने पूरे काफिले के साथ सर्रर्र से सरक जाते हैं। आखिर सांसद, विधयक और ब्यूरोक्रेट टोल टैक्स की जद में क्यों न आएं? इनकी तनख्वाह भारत के किसी भी मिडिल क्लास परिवार से कहां कम है? इसी तरह का भेद जगह-जगह आम लोगों को असमानता का अहसास कराता है। इस बारे में अगर सरकार ध्यान दे तो सरकारी खर्च और असमानता दोनों घट सकते हैं।

Tuesday, February 10, 2015

जनता का संदेश - जमीनी बन जाओ सब!



कई महान संतों की भविष्यवाणी है कि 21वीं सदी भारत की होगी। जिस तरह के बदलाव देश में दिख रहे हैं उसको देखते हुए ये लगने भी लगा है। दिल्ली में भाजपा की कड़ी शिकस्त और आप की शानदार जीत उसी श्रृंखला की एक कड़ी है जो नए भारत को गढ़ने जा रही है। दिल्ली की हार में भाजपा के लिए सबक ही सबक छिपे हैं। अपने नौ महीने के कार्यकाल में पहली बार भाजपा ने हार का मजा चखा है। भले ही पार्टी इस बात को न माने लेकिन लगातार मिल रही सफलताओं से भाजपा के अंदर अहंकार बढ़ रहा था। पार्टी के आला नेताओं का आम आदमी से जुड़ाव घट रहा था। ये परिणाम भाजपा के लिए खतरे की घंटी है कि अभी भी वक्त है जमीन पर उतरें वरना कुछ भी संभव है। जनता की अपेक्षाएं लगातार बढ़ रही हैं, वो अब सरकार को नौ महीने भी नहीं देना चाहती है। इसलिए शासन को काम में स्पीड दिखानी ही होगी।

भितराघात
माने या न माने पर भाजपा इस बार सबसे बड़े भितराघात से जूझ रही है। किरण बेदी के आ जाने से दिल्ली भाजपा के नेताओं ने जमीन पर काम करने से तकरीबन इंकार कर दिया था। अपने ही नेताओं ने पार्टी के खिलाफ प्रदर्शन किया। ऐसा लग रहा था मानो इस बार पार्टी कार्यकर्ताओं ने अपनी नेशनल लीडरशिप को सबक सिखाने का मन बना लिया था। अपने पिछले ब्लाॅग में मैंने खुद किरण बेदी को मुख्यमंत्री के तौर पर उतारने की वकालत की थी। लेकिन किरण बेदी को सीएम उम्मीदवार बनाना दिल्ली भाजपा को इतना बुरा लगेगा ये कभी नहीं सोचा था। मुझको लगा था कि थोड़े विरोध के बाद प्रदेश कार्यकारिणी किरण को अपना लेगी, पर ऐसा नहीं हुआ। पार्टी में एक धड़ा ऐसा था जिसने हर्षवर्धन के उठने के डर से किरण को लाने का समर्थन कर दिया, तो दूसरा धड़ा किरण के विरोध में काहिली पर उतर आया। हारकर मोदी कैबिनेट के मंत्रियों को जिम्मेदारी बांटी गई, पर उसका कोई परिणाम नहीं मिला। एक राष्ट्रीय पार्टी ने अपना पूरा धनबल, जनबल और अनुभवबल झोंक दिया, पर परिणाम ढाक के तीन पात की तरह विधानसभा की तीन सीट में मिला।

किरण का स्टाइल
उधर किरण बेदी का स्टाइल भी कुछ ठीक नहीं रहा। वो पहले दिन से खुद को सीएम उम्मीदवार के बजाय दिल्ली की सीएम की तरह कार्यकर्ताओं और लोगों से बात करती रहीं। टीवी डिबेट में भी वो अपना पक्ष ठीक से नहीं रखती पाई गईं। उनके इंटरव्यू सोशल मीडिया पर मजाक का पात्र बन गए। उनकी तुलना राहुल गांधी से की जाने लगी। ये बात तो समझ आती है कि राजनीतिज्ञ न होने के कारण उनके पास भाषण शैली नहीं है, पर तर्कों के स्तर पर भी खालीपन दिखा। अंततः पार्टी तो हारी ही खुद बेदी भी सबसे सुरक्षित सीट से हार गईं।

कमजोर पड़ी साइबर सेना
दिल्ली चुनाव में भाजपा की साइबर सेना भी कमजोर नजर आई। लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया पर मोदी और भाजपा के पक्ष में जबरदस्त जंग लड़ी जा रही थी। इस बार साइबर वीरों ने आप के आरोपों पर माकूल जवाब नहीं दिया। इसका मुख्य कारण है कि लोकसभा की जीत और फिर उसके बाद कुछ राज्यों में लगातार मिली सफलता के बाद भाजपा समर्थक कंफर्ट जोन में चले गए थे। दूसरे उन पर सोशल मीडिया पर ‘मोदी के अंध भक्त’ होने का आरोप भी बेड़ी तेजी से लगाया गया। तीसरे केंद्र सरकार बनने के बाद अधिकांश कार्यकर्ता खुद को कटा सा महसूस कर रहे हैं। यहां मैं उन लोगों की भी बात कर रहा हूं जो सक्रिय रूप से पार्टी में काम नहीं करते हैं। बल्कि भाजपा के सिम्पैथाइजर होने के नाते सोशल मीडिया पर पार्टी का पक्ष मजबूती के साथ रखते हैं, बहस करते हैं, विरोधियों को माकूल जवाब देते हैं। इसके लिए इन लोगों को पार्टी से कुछ मान्यता तो नहीं मिलती पर भक्त होने का आरोप जरूर झेलना पड़ता है।

नौ लखा सूट
जब हार के कारणों की बात चल ही रही है तो प्रधानमंत्री द्वारा ओबामा से मुलाकात के दौरान पहना गया नामांकित सूट की चर्चा नहीं छूट सकती। मीडिया ने इस सूट की कीमत नौ लाख रुपये आंकी है, जबकि कुछ लोगों का मानना है कि सूट की कीमत तकरीबन तीन लाख होगी। भले ही यह तर्क दिया जा रहा हो कि वह सूट जेड ब्लू कंपनी ने उपहार में दिया था। लेकिन ये प्रश्न तो उठता है कि जिस देश में हजारों गरीब नागरिक हर साल ठंड से मर जाते हों, क्या उस देश के प्रधानमंत्री इतने महंगे वस्त्र पहने चाहिए? प्रधानमंत्री मोदी के बारे में ये मशहूर होता जा रहा है कि वह एक जोड़ी कपड़ा एक ही बार पहनते हैं। हालांकि जिस विचारधारा से मोदी आते हैं वहां सादगी पर सबसे ज्यादा बल दिया जाता है। वह उस आरएसएस से जुड़े रहे हैं जहां एक धोती को दो दिन पहनने की तरकीब सिखाई जाती है। लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने खुद को चाय वाले से जोड़कर जो आम लोगों के दिलों में जगह बनाई थी, नौ लाख का सूट पहनने के बाद वह जगह जाती रही। ये बात समझनी जरूरी है कि भारत का संपन्न वर्ग बहुत छोटा है। अधिकांश संख्या मध्यम वर्ग और गरीबों की है और वह सादगी को ही पसंद करते हैं। भले ही प्रधानमंत्री मोदी अपने बहुत से निजी उपहारों को हर साल नीलाम कर धन को सामाजिक कार्यों के लिए दान दे देते हैं, फिर भी लोग फाइव स्टार कल्चर को नापसंद करते हैं। गांधी जी ने तो ये बात बहुत पहले ही समझ ली थी, इसीलिए उन्होंने सूट उतारकर धोती बांध ली थी और जन-जन के नेता बन गए। वही काम आज केजरीवाल कर रहे हैं, छोटी पैंट, सैंडल पर मोजे, छेद वाली जर्सी और मफलर पहनकर वो सीधे आम आदमी से जुड़ गए।

कड़वे बोल
भाजपा के लिए कुछ अनुषांगिक संगठनों के कड़वे बोल भी भारी पड़े। घर वापसी, चार-पांच बच्चे, योगी, साध्वी सबने मिलकर बयानों की झड़ी लगा दी। खुद प्रधानमंत्री को भी माफी मांगनी पड़ी। उनके कड़वे बोलों से हिंदू वोट बैंक पर तो कोई असर नहीं पड़ा पर मुस्लिम वोट बैंक लामबंद हो गया। इस बार दिल्ली में आप के पक्ष में मुस्लिम, निम्न वर्ग, मध्यम वर्ग, दलित, सरकारी कर्मचारी सबने मिलकर भाजपा को हराने का काम किया।

गणित नहीं अब भावना चलेगी
इस परिणाम में एक बात गौर करने वाली है कि भाजपा को 2013 में 26 लाख से ज्यादा वोट मिले और 2015 में 28 लाख से ज्यादा वोट मिले हैं। वोट शेयर 2013 में 33 फीसदी था और 2015 में ये 32 फीसदी है। इसका अर्थ ये हुआ कि पार्टी का वोट बैंक अपनी जगह इंटैक्ट है। पर कांग्रेस और बसपा को पूरा वोट बैंक आम आदमी पार्टी की तरफ शिफ्ट हो जाने से उनका वोट शेयर बढ़कर 54 फीसदी तक पहुंच गया और इतनी भारी जीत मिली। इन परिणामों में एक सीख ये भी है कि गणित लगाकर चुनाव लड़ने का जमाना गया, अब भावना का महत्व है। पार्टियां किस भावना और नीयत से चुनाव लड़ रही हैं इसका महत्व आने वाले समय में बढ़ेगा। मंच पर खड़े होकर बनावटी बातों से काम नहीं चलने वाला अब लोगों को विश्वास में लेना जरूरी होगा।

तुलना हो सकेगी
दिल्ली चुनाव से केंद्र में बैठी मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ा फायदा ये होगा कि अब उनकी किसी से तुलना हो सकेगी। अब तक तो मोदी की पाॅलिसियों और उनके स्टाइल की किसी से तुलना नहीं हो पा रही थी। प्रधानमंत्री मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद कई नए प्रयोग किए, कई तरह की नई पहल कीं, एक नए किस्म की व्यवस्था की शुरुआत की। इधर केजरीवाल भी नए-नए प्रयोग करने के लिए जाने जाते हैं। अब मीडिया और जनता दोनों नेताओं का तुलनात्मक अध्ययन कर सकेंगे और देश में आगे की राजनीति की दिशा तय होगी।

परिपक्व होता लोकतंत्र 
जनता द्वारा 2014 में सातों सांसद भाजपा की गोद में डालना और फिर नौ महीने बाद सारे विधायक आप की गोद में डालना भारत के परिपक्व होते लोकतंत्र की निशानी है। ऐसा उदाहरण कम ही देश में देखने को मिलेगा। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत की जनता कितनी जागरुक और परिपक्व है कि अपने लिए सही प्रधानमंत्री और सही मुख्यमंत्री के बीच चुनाव करना उसे अच्छी तरह आता है।

जमीनी बन जाओ
इस पूरे चुनावी प्रकरण में जनता ने अपने राजनेताओं को जो संदेश दिया है वो साफ है कि ‘हे भारत वर्ष के राजनीतिज्ञों जमीनी बन जाओ’।  जनता से कट कर अब राजनीति नहीं चलने वाली। जो लोग जनता के वोट से चुनाव जीतकर कैपिटलिस्ट और काॅरपोरेट हाउस की गोद में बैठ जाते हैं वे लोग अब आम लोगों की अवहेलना नहीं कर सकते। काॅरपोरेट भक्त नेताओं को भारतीय रेल से सबक लेना चाहिए। भारती की अधिकांश ट्रेनों में फस्र्ट एसी की बोगी एक ही होती है, ज्यादा डिब्बे स्लीपर और जनरल के ही होते हैं। रेलगाड़ी पूरे भारतीय समाज की तस्वीर है। नेताओं को स्लीपर और जनरल बोगी में सफर करने वाली जनता का ध्यान रखना होगा। फस्र्ट एसी में सफर करने वालों की संख्या उंगलियों पर गिनने लायक है, वो आपको धन तो मुहैया करा सकती है पर चुनाव नहीं जुटा सकती।

आप के लिए कठिन डगर
जितनी बड़ी जीत आप ने हासिल की है, उसको अब उतना ही डरना जरूरी है। आने वाला समय आप और केजरीवाल के लिए बहुत कठिन साबित होने वाला है। पार्टी ने जिस तरह के वादे अपने मैनिफेस्टो में किए हैं उनको पूरा करना बहुत बड़ी चुनौती है। वादों को पूरा करने में अगर-मगर किया या फिर नियम व शर्तें लगाईं तो जनता आप नेताओं की सड़क पर खबर लेगी। केजरीवाल ने पिछली बार बहुमत न होने की मजबूरी जताई थी, इस बार आप की आप है, इसलिए अब अगर कोई ड्रामेबाजी, धरनेबाजी या बहानेबाजी की गई तो मीडिया और जनता दोनों उनको नहीं छोड़ने वाली। और अगर केजरीवाल एक जनोन्मुख, विकासोन्मुख आदर्श शासन देने में सफल होते हैं तो समाज की इससे बड़ी भलाई नहीं हो सकती।

Sunday, January 4, 2015

दिल्ली में किरण बेदी से क्यों बच रही भाजपा?

दिल्ली में दस्तक दे रहे चुनावों को लेकर अब तक जितने भी ओपीनियन पोल हुए हैं, उनमें भाजपा को बढ़त दिखाई गई है, हालांकि ये बढ़त इतनी मजबूत नहीं है कि इसे चुनाव तक बदला न जा सके। दूसरी ओर मुख्यमंत्री की रूप में अभी भी अरविंद केजरीवाल लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं। एक चीज सब तय मानकर चल रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी को तीसरे दर्जे पर धकिया दिया जाएगा। मुख्य मुकाबला भाजपा और आप के बीच ही होने जा रहा है। लोकसभा चुनावों में भी आप सातों लोकसभा सीटों पर दूसरे स्थान पर रही थी। खैर, दिल्ली विधानसभा के चुनावों का परिणाम जो भी हो, पर इन दिनों आप और भाजपा के रणनीतिज्ञों की चिंताएं जरूर बढ़ी हुई होंगी। आप अपने 49 दिनों की दुहाई देकर लोगों को रिझाने का प्रयास कर रही है तो भाजपा मोदी के सुशासन को आगे रखकर लोगों से मिल रही है।

सीएम कैंडिडेट गायब
आप को छोड़कर बाकी दोनों पार्टियों ने अपने सीएम उम्मीदवार घोषित नहीं किये हैं। जबकि केजरीवाल के नाम पर आप जमकर खेल रही है। कांग्रेस में तो नहीं पर भाजपा में पहले परंपरा थी कि पीएम या सीएम कैंडिडेट चुनाव से पहले की घोषित कर दिए जाते थे। भाजपा हमेशा एक चेहरा सामने रखकर लोगों के बीच जाती थी। भाजपा ने पीएम के लिए पहले अटल बिहारी वाजपेयी, फिर एलके आडवाणी और फिर नरेंद्र मोदी को कैंडिडेट के रूप में पेश करके चुनाव लड़ा। उसी तरह राज्यों में भी सीएम कैंडिडेट के चेहरों पर चुनाव लड़े गए हैं। लेकिन मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से भाजपा की इस रणनीति में बदलाव आया दिखता है। अब भाजपा मोदी के चेहरे पर ही राज्यों के चुनाव लड़ती दिख रही है। महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, और जम्मू-कश्मीर इसके हालिया उदाहरण हैं। अब आगामी दिल्ली और बिहार के चुनाव में भी भाजपा इसी राह पर कदम बढाएगी, ऐसा लगता है।

केजरीवाल नहीं आसां
भाजपा के लिए दिल्ली में केजरीवाल की छवि के सामने बिना सीएम कैंडिडेट घोषित करे चुनाव लड़ना आसान नहीं होगा। केजरीवाल का ट्रैक रिकाॅर्ड साफ-सुथरा है और वो बाकी पार्टियों को भ्रष्ट साबित करने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं। ऐसे में भाजपा साफ छवि के सीएम कैंडिडेट के बिना चुनाव में उतरती है तो उसे जबरदस्त मेहनत करनी पड़ेगी। पछले चुनाव में डाॅ. हर्षवर्धन को उतारने से भाजपा को जबरदस्त फायदा मिला था। उससे पहले तक भाजपा की स्थिति डांवाडोल थी। फिलहाल हर्षवर्धन केंद्र में मंत्री हैं और दिल्ली भाजपा से जुड़े कई दिग्गज उनकी अनुपस्थिति का फायदा जरूर उठाना चाहेंगे। कुछ नेताओं को सीएम बनाने के समर्थन में तो होर्डिंग्स भी लगाए गए थे।

किरण में उम्मीद की किरण
अगर भाजपा अभी भी किरण बेदी को अपना सीएम कैंडिडेट बनाती है तो केजरीवाल की मजबूत दावेदारी पर पानी फेरा जा सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के कई नेता अन्ना आंदोलन की सूत्रधार रहीं किरण को दिल्ली के सीएम कैंडिडेट के रूप में उतारना चाहते हैं, तो वहीं दिल्ली राज्य ईकाई के कई नेता इसके विरोध में है। उनकी नजर में सीएम कैंडिडेट ग्रासरूट से होना चाहिए न कि पैराशूट से। पर भाजपा के लिए किरण एक ऐसा चेहरा हो सकती हैं, जो आम आदमी पार्टी की बढ़त पर तगड़ी चोट पहुंचा सकती हैं। किरण बेदी की साफ छवि, प्रशासनिक अनुभव और बदलाव लाने की क्षमता के साथ-साथ वो आप नेताओं को भी नजदीकी से परिचित हैं, लिहाजा उनकी शक्ति और कमजोरियों को पहचानती हैं, ये सभी बातें भाजपा के हक में जाती हैं। इसमें कोई शक नहीं किरण के समाने आते ही केजरीवाल की दावेदारी की हवा भले ही न निकले, लेकिन कमजोर पड़ जाएगी। जबकि आम आदमी पार्टी भी किरण बेदी पर उस तरह हमला नहीं कर पाएगी जिस तरह वो अन्य कैंडिडेट पर कर सकती है।

ग्रासरूट बनाम पैराशूट
ये बात सही है कि पैराशूट नेताओं के आने से ग्रासरूट नेताओं के मनोबल पर असर पड़ता है, लेकिन किसी भी संगठन के लिए ये बात भी समझने की है कि उसकी सफलता में सक्रिय कार्यकर्ताओं की मेहनत के साथ-साथ भावनात्मक रूप से जुड़े जनमानस का भी बहुत बड़ा योगदान होता है। किरण बेदी भले ही भाजपा की सक्रिय कार्यकर्ता न रही हों, लेकिन उन्होंने कई बार आड़े वक्त पर भाजपा को समर्थन जताकर उसे मजबूती प्रदान की है। वैसे भी किरण बेदी को दिल्ली का सीएम कैंडिडेट बनाने में ज्यादा फायदा भाजपा को ही होने जा रहा है। नई क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभर रही आप को साधने के लिए ये कदम काफी कारगर साबित हो सकता है।