मंगलवार, 19 मई 2026

युवाओं का बदलता मनोविज्ञान: नौकरी से आगे बढ़कर “स्वनिर्माण” की ओर

भारत का युवा एक मानसिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। कुछ वर्ष पहले तक एक अच्छी नौकरी - विशेषकर सरकारी नौकरी या किसी बड़ी कंपनी में स्थायी पद - सफलता का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती थी। परिवारों का मुख्य लक्ष्य भी यही होता था कि बच्चे को सुरक्षित और स्थायी रोजगार मिल जाए। लेकिन आज का युवा केवल नौकरी नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, पहचान, संतुलित जीवन, आर्थिक स्वामित्व और आत्मसंतोष चाहता है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में युवा कुछ वर्षों की नौकरी के बाद अपना व्यवसाय, स्टार्टअप, फ्रीलांस कार्य या डिजिटल उद्यम शुरू करने की ओर बढ़ रहे हैं। यह केवल करियर परिवर्तन नहीं, बल्कि  समाज की मानसिकता का बदलाव है।

एआई और भविष्य की असुरक्षा ने बदल दी सोच

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और ऑटोमेशन ने युवाओं की सोच को गहराई से प्रभावित किया है। आईटी, कंटेंट, डिज़ाइन, डेटा एनालिटिक्स और अनेक कॉर्पाेरेट क्षेत्रों में यह स्पष्ट दिखने लगा है कि आने वाले समय में कई पारंपरिक नौकरियाँ बदल जाएँगी या सीमित हो जाएँगी।

युवाओं को लगने लगा है कि केवल नौकरी पर निर्भर रहना भविष्य में पर्याप्त सुरक्षित नहीं होगा। इसलिए दूरदर्शी युवा अब जल्दी ही अपने कौशल, नेटवर्क और स्वयं के कार्यक्षेत्र बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।

पहले लोग 40 वर्ष की आयु के बाद व्यवसाय की ओर सोचते थे, अब 25-30 वर्ष की आयु में ही युवा प्रयोग शुरू कर रहे हैं। वे समझ चुके हैं कि एआई के युग में केवल डिग्री नहीं, बल्कि अनुकूलन क्षमता और स्वनिर्माण ही सबसे बड़ी शक्ति होगी।

महानगरों से छोटे शहरों की ओर बढ़ता झुकाव

भारत में एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन यह भी है कि युवा अब केवल दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु या हैदराबाद जैसे महानगरों को ही अवसर का केंद्र नहीं मान रहा।

महानगरों की वास्तविकता आज यह है-

  • अत्यधिक महंगा किराया,
  • लंबा ट्रैफिक जाम,
  • प्रदूषण
  • तनावपूर्ण जीवन,
  • सीमित बचत,
  • सामाजिक अकेलापन।

अनेक युवाओं को यह महसूस होने लगा है कि बड़ी तनख्वाह के बावजूद जीवन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।

दूसरी ओर टीयर-2 और टीयर-3 शहर बेहतर संतुलन प्रदान कर रहे हैं। इंटरनेट, यूपीआई, ई-कॉमर्स, डिजिटल मार्केटिंग और रिमोट वर्क ने छोटे शहरों से भी व्यवसाय और प्रोफेशनल कार्य करना संभव बना दिया है।

आज इंदौर, जयपुर, लखनऊ, नागपुर, सूरत, देहरादून और कोच्चि जैसे शहर नई संभावनाओं के केंद्र बन रहे हैं। यहां तक कि पहाड़ों में घर लेने का चलन भी बहुत तेजी से बढ़ा है। बहुत बड़ी संख्या में दिल्ली के लोग उत्तराखण्ड और हिमाचल जैसे स्थानों पर घर ले चुके हैं या योजना बना रहे हैं। समाज के मन में कहीं न कहीं यह स्पष्ट हो रहा है कि- “सफलता केवल महानगरों की मोहताज नहीं है।”

भारतीय कार्यसंस्कृति से बढ़ती निराशा

युवाओं के मानसिक बदलाव का एक बड़ा कारण भारतीय कॉर्पाेरेट और पारंपरिक कार्यसंस्कृति भी है। सामान्यतः भारतीय कार्यालयों और पेशेवर संस्थानों में आज भी-

  • अत्यधिक पदानुक्रम,
  • माइक्रो-मैनेजमेंट,
  • सीमित स्वतंत्रता,
  • धीमी पदोन्नति,
  • कम वेतन वृद्धि,
  • और “आदेश पालन” आधारित संस्कृति देखने को मिलती है।

कई युवा यह महसूस करते हैं कि कंपनियाँ कर्मचारियों को साझेदार नहीं बल्कि प्रतिस्थापित संसाधन की तरह देखती हैं।

आज का युवा केवल वेतन के लिए काम नहीं करना चाहता। वह चाहता है-

  • सम्मान,
  • रचनात्मकता,
  • निर्णय लेने की स्वतंत्रता,
  • सीखने के अवसर,
  • और अपने कार्य का वास्तविक प्रभाव।

जब उसे लगता है कि उसकी प्रतिभा का उचित उपयोग नहीं हो रहा, तब वह स्वयं के लिए काम करने की दिशा में सोचने लगता है।

क्या यह भारतीय कंपनियों के लिए चेतावनी है?

यह बदलती मानसिकता भारतीय कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत भी है। पहले स्थायी वेतन और नौकरी की सुरक्षा कर्मचारियों को लंबे समय तक संगठन से जोड़े रखती थी। लेकिन आज का युवा पूछता है-

  • “क्या मैं यहाँ विकसित हो रहा हूँ?”
  • “क्या मेरी क्षमता को पहचान मिल रही है?”
  • “क्या इस कार्य में अर्थ और सम्मान है?”

यदि इन प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक हो, तो युवा नौकरी छोड़ने में देर नहीं करता।

एआई के दौर में केवल बड़ी कर्मचारी संख्या या कठोर व्यवस्थाएँ सफलता की गारंटी नहीं होंगी। आने वाले समय में वही कंपनियाँ आगे बढ़ेंगी जो-

  • नवाचार को बढ़ावा दें,
  • कर्मचारियों को स्वायत्तता दें,
  • लचीली कार्यसंस्कृति अपनाएँ,
  • और प्रतिभा को सम्मान दें।

अन्यथा कंपनियों को प्रतिभा पलायन, कम नवाचार और घटती निष्ठा जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

“स्थिरता” से अधिक “स्वतंत्रता” की चाह

पुरानी पीढ़ी का लक्ष्य था - सुरक्षित जीवन।

नई पीढ़ी का लक्ष्य है - स्वतंत्र और सार्थक जीवन।

कहीं न कहीं युवाओं के मन में यह बात उठती ही रहती है- “यदि संघर्ष करना ही है, तो अपने सपनों के लिए क्यों न किया जाए?”

इसलिए आज व्यवसाय केवल धन कमाने का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह-

  • आत्मसम्मान,
  • पहचान,
  • रचनात्मक संतोष,
  • और जीवन पर नियंत्रण का माध्यम बन गया है।

सोशल मीडिया और स्टार्टअप संस्कृति का प्रभाव

इंस्टाग्राम, यूट्यूब और लिंक्डइन जैसे प्लेटफॉर्म ने युवाओं के भीतर नई आकांक्षाएँ पैदा की हैं। वे लगातार ऐसे लोगों को देख रहे हैं जिन्होंने छोटे स्तर से शुरुआत करके अपनी पहचान बनाई।

स्टार्टअप संस्कृति ने यह विश्वास पैदा किया है कि- “साधारण पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति भी बड़ा परिवर्तन ला सकता है।”

हालाँकि सोशल मीडिया सफलता को अधिक दिखाता है और संघर्ष को कम, फिर भी उसने युवाओं में आत्मविश्वास और जोखिम लेने की मानसिकता को मजबूत किया है।

चुनौतियाँ भी कम नहीं

यह परिवर्तन अवसरों से भरा है, लेकिन चुनौतियों से भी। हर व्यवसाय सफल नहीं होता। आर्थिक अस्थिरता, प्रतिस्पर्धा, मानसिक दबाव और असफलता का जोखिम भी वास्तविक हैं।

इसलिए केवल उत्साह नहीं, बल्कि-

  • कौशल,
  • धैर्य,
  • वित्तीय अनुशासन,
  • और दीर्घकालिक सोच भी आवश्यक है।

भारतीय युवा आज “नौकरी खोजने वाली पीढ़ी” से “अवसर निर्माण करने वाली पीढ़ी” में बदल रहा है। एआई, डिजिटल क्रांति, महानगरों का बढ़ता खर्च, बदलती जीवनशैली और पारंपरिक कार्यसंस्कृति से असंतोष - ये सभी मिलकर एक नई मानसिकता को जन्म दे रहे हैं।

यह परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। आने वाले वर्षों में भारत में ऐसे युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ेगी जो नौकरी करने के साथ-साथ अपना कार्य, अपना ब्रांड और अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने का प्रयास करेंगे।

संभवतः यही परिवर्तन भारत के अगले आर्थिक और सामाजिक युग की सबसे बड़ी शक्ति सिद्ध होगा।

मंगलवार, 12 मई 2026

हिसाब-किताब का पक्का अपना समाज

भारतीय समाज बड़ा अद्भुत है। यहाँ रिश्ते दिल से कम और दिमाग से ज़्यादा निभाए जाते हैं।

दुनिया में शायद ही कोई ऐसा समाज होगा जहाँ “आशीर्वाद” भी डेबिट-क्रेडिट की तरह दर्ज किया जाता हो।

उत्तर भारत की शादी में जाइए, आपको लगेगा कि किसी बैंक की शाखा खुल गई है। एक तरफ मंच पर दूल्हा-दुल्हन मुस्कुरा रहे होते हैं, दूसरी तरफ शामियाने के कोने में एक गंभीर चेहरे वाले चाचा या फूफा जी रजिस्टर लेकर बैठे होते हैं। उनका चेहरा देखकर लगता है मानो देश का बजट वही संभाल रहे हों। 

मेहमान आते हैं। लिफाफा देते हैं।

व्यवहार लिखने वाले इंचार्ज फूफा जी तुरंत पूछते हैं - “क्या नाम है...?”

फिर बड़ी श्रद्धा से लिखा जाता है -

“फलाने जी या ढिमकाने जी - 1100 रुपये।”

कई बार आपका बंद लिफाफा वहीं फाड़कर फेंक दिया जाता है और सबके सामने जोर से बोलकर राशि रजिस्टर में चढ़ाई जाती है। यह कई बार असहज करने वाली स्थिति होती है। शादी के अगले दिन पूरे रजिस्टर का हिसाब जोड़ा भी जाता है और कैश मिलाया जाता है।

सबसे मज़ेदार बात यह है कि यह हिसाब केवल याद रखने के लिए नहीं होता। यह एक प्रकार का सामाजिक निवेश है। आज आपने जितना डाला है, कल उतना ही ब्याज-मुक्त वापस मिलेगा।

किसी के घर शादी पड़े तो वर्षों पुराना रजिस्टर निकाला जाता है। धूल झाड़ी जाती है। फिर पूरा परिवार ऐसे बैठकर हिसाब देखता है जैसे पुरातत्व विभाग कोई प्राचीन शिलालेख पढ़ रहा हो।

“देखो, इनके यहाँ से 2001 आया था...”

“तो हमारे यहाँ से 2100 जाना चाहिए, आखिर इज़्ज़त का सवाल है।”

यानी रिश्ते नहीं, मानो यूपीआई ट्रांजैक्शन का इतिहास चल रहा हो।

और यह परंपरा केवल शादी तक सीमित नहीं। बहू की मुंह दिखाई हो या बच्चे का मुण्डन संस्कार हर आयोजन में जेवर, कैश, गिफ्ट - प्रत्येक लेन-देन का बाकायदा लेखा-जोखा तैयार। कहीं ऐसा न हो कि भविष्य में भावनाओं का बैलेंस गड़बड़ा जाए।

विडंबना यह है कि कार्ड पर छपवाया जाता है - “आपका स्नेह और आशीष ही हमारे लिए सबसे बड़ा उपहार है।” लेकिन अंदरखाने व्यवस्था ऐसी होती है कि स्नेह की पाई-पाई का हिसाब चढ़ा लिया जाता है।

हमारा समाज बड़ा दिलचस्प है। मुंह पर मिठास ऐसी कि रसगुल्ला शर्मा जाए, और दिमाग में हिसाब ऐसा कि चार्टर्ड अकाउंटेंट भी प्रेरणा लेने लगे।

शायद आने वाले समय में चीजें बदलें, लेकिन फिलहाल तो अपने समाज में आपके प्यार और आशीर्वाद का पूरा हिसाब रखा जा रहा है।

रविवार, 26 अप्रैल 2026

धन की भूखः कॉस्ट कटिंग के नाम पर कारों से स्टेपनी गायब

भारतीय संस्कृति की पहचान हमेशा “थोड़ा ज़्यादा देने” में रही है। यहाँ 100 नहीं, 101 देने की परंपरा है—क्योंकि इसमें सिर्फ लेन-देन नहीं, बल्कि अपनापन और सुरक्षा का भाव होता है। दूधवाला माप से थोड़ा ऊपर तक दूध भर देता था, किसान अनाज तौलने के बाद एक मुट्ठी और डाल देता था। यह “एक मुट्ठी ज़्यादा” ही तो विश्वास की असली पूँजी थी।

लेकिन आज के समय में यह भावना जैसे धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। अब बाजार का नया मंत्र है—“कम दो, ज़्यादा लो।” इसे बड़े आराम से “कॉस्ट कटिंग” का नाम दे दिया गया है, ताकि सुनने में आधुनिक लगे, लेकिन असल में यह ग्राहक के हिस्से और सुरक्षा—दोनों की कटौती है।

इस सोच का सबसे चिंताजनक उदाहरण कार कंपनियों में देखने को मिलता है। कभी गाड़ी में मिलने वाली स्टेपनी सिर्फ एक अतिरिक्त टायर नहीं होती थी, बल्कि रास्ते में आने वाली अनिश्चितताओं के खिलाफ एक मजबूत सुरक्षा कवच होती थी। पहले उसका आकार छोटा किया गया, और अब तो कई गाड़ियों से इसे पूरी तरह हटा ही दिया गया है।

Maruti Suzuki Grand Vitara जैसी गाड़ियों में स्टेपनी की जगह अब सिर्फ एक पंचर रिपेयर किट दी जा रही है।

अब ज़रा सोचिए—रात का अंधेरा, सुनसान सड़क, परिवार साथ में… और अचानक टायर फट जाता है। उस वक्त यह छोटी सी पंचर किट क्या कर पाएगी? क्या यह टायर के फटने या कट जाने की स्थिति में आपकी मदद कर सकती है? जवाब साफ है—नहीं।

उस पल में “कॉस्ट कटिंग” नहीं, “सुरक्षा” मायने रखती है। लेकिन जब सुरक्षा को ही कम कर दिया जाए, तो मुनाफे का यह खेल बेहद खतरनाक हो जाता है।

विडंबना यह है कि यही कंपनियाँ अपने विज्ञापनों में “फैमिली सेफ्टी”, “भरोसा” और “केयर” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती हैं। लेकिन असलियत में, सबसे ज़रूरी सुरक्षा कवच को ही हटा दिया जाता है—सिर्फ कुछ रुपये बचाने के लिए।

पहले कहते थे—“थोड़ा ज़्यादा दे दो, ग्राहक खुश रहेगा।”

आज कहा जा रहा है—“थोड़ा कम दे दो, कंपनी ज़्यादा कमाएगी।”

सवाल सिर्फ एक स्टेपनी का नहीं है, सवाल उस सोच का है—जहाँ मुनाफा इंसान की सुरक्षा से बड़ा हो गया है।

अब हमें तय करना है—क्या हम 101 देने वाली संस्कृति को बचाएंगे, या अपना समाज 99 में भी कटौती को चुपचाप स्वीकार कर लेगा?

शनिवार, 22 नवंबर 2025

बिहार विधानसभा चुनाव 2025: शांतिपूर्ण लोकतंत्र का अद्भुत उदाहरण


बिहार, जिसे कभी चुनावी हिंसा और तनाव के लिये जाना जाता था, इस बार लोकतंत्र के इतिहास में एक उल्लेखनीय परिवर्तन का गवाह बना है। हाल ही सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव अब तक के सबसे शांतिपूर्ण चुनाव माने जा रहे हैं। न कोई बड़े पैमाने पर हिंसा, न प्रतिशोध की घटनाएँ—यह अपने आप में बिहार की लोकतांत्रिक परिपक्वता और प्रशासनिक तैयारियों का जीवंत प्रमाण है।

शांतिपूर्ण चुनाव के लिये सभी को बधाई

इस उत्कृष्ट उपलब्धि का श्रेय किसी एक संस्था या समूह को नहीं जाता। यह सामूहिक प्रयास की सफलता है।

  • बिहार की जनता, जिसने धैर्य, अनुशासन और समता के साथ मतदान किया।
  • भारत निर्वाचन आयोग, जिसने व्यापक और प्रभावी व्यवस्था की।
  • बिहार पुलिस और अर्धसैनिक बल, जिन्होंने बिना भय या दबाव के मतदान सुनिश्चित किया।
  • मतदान कर्मी, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपनी जिम्मेदारियाँ पूर्ण निष्ठा से निभाईं।

इन सबके प्रयासों ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि लोकतंत्र केवल मतदान का दिन नहीं बल्कि जनभागीदारी और अनुशासन का महोत्सव है।

राजनीतिक दलों की परिपक्वता

चुनावी भाषणों में भले ही तीखे शब्दों और आरोप–प्रत्यारोपों का दौर चला हो, परंतु परिणाम आने के बाद सभी दलों ने जनादेश का सम्मान किया। इससे यह प्रतीत होता है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच भी बिहार का लोकतंत्र संवाद और स्वीकार्यता की राह पर आगे बढ़ रहा है।

पश्चिम बंगाल के लिये एक सीख

इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का अंधकार अब भी गहरा है। वर्षों से चल रही राजनीतिक हिंसा—चाहे वह हत्याओं के रूप में हो, धमकियों में या आम नागरिकों के रक्तपात में—एक लोकतांत्रिक समाज की आत्मा को चोट पहुँचाती है।


विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक चली विचारधारात्मक राजनीति और जमीन-स्तर पर हिंसा-आधारित सत्ता संरचना इसका मुख्य कारण रही है। आज भारत के किसी अन्य राज्य में इतनी तीव्र और संगठित चुनावी हिंसा नहीं देखी जाती।

साल 2026 में पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले, वहाँ के नेतृत्व और जनता—दोनों को बिहार से सीख लेनी चाहिये। लोकतंत्र में सत्ता बदलने का अधिकार जनता का है, न कि हिंसा और भय का।

मीडिया की चुप्पी और बिहार की अनदेखी उपलब्धि

गौर करने वाली बात यह है कि इतने शांतिपूर्ण चुनाव के बावजूद राष्ट्रीय मीडिया ने बिहार की इस उपलब्धि को शायद ही उचित ध्यान दिया। हिंसा की खबरें सुर्खियों में आती हैं, लेकिन जब कोई राज्य शांतिपूर्ण लोकतंत्र का उदाहरण प्रस्तुत करता है—अक्सर वह अनदेखा रह जाता है।

बिहार ने साबित किया है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति, जनता का सहयोग और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान साथ हो, तो कोई भी राज्य हिंसक चुनावी इतिहास से निकलकर परिवर्तन की राह पकड़ सकता है।


यह चुनाव केवल सरकार गठन की प्रक्रिया नहीं था, बल्कि एक संदेश था—भारत का लोकतंत्र प्रगति की परिपक्व अवस्था में प्रवेश कर रहा है।

बिहार की यह उपलब्धि आने वाले वर्षों में अन्य राज्यों के लिये मार्गदर्शक बनेगी, और उम्मीद है कि देश का राजनीतिक वातावरण इसी तरह संयमित और शांतिपूर्ण बने।

शुक्रवार, 6 सितंबर 2024

कर्म फल

बहुत खुश हो रहा वो, यूरिया वाला दूध तैयार कर

कम लागत से बना माल बेचेगा ऊंचे दाम में जेब भर

बहुत संतुष्ट है वो, कि उसके बच्चों को यह नहीं पीना

बनाया है दूसरों के लिए, किसको यहां अधिक जीना


भूल गया है कि कोई और कर रहा आइसक्रीम में मिलावट

जिसे खरीदकर खाएंगे उसके बच्चे बड़े चाव से झटपट

खुद के मिलावटी दूध से अपने बच्चों को तो बचा लिया

पर जो मिलावटी आइसक्रीम वे खा रहे उसका क्या


आइसक्रीम वाले के बच्चे रोज खा रहे मिलावटी नमकीन

धन को लक्ष्य बनाकर तली गई है बिल्कुल होकर भावहीन 

और नकीमन वाले के बच्चों को नसीब हैं मिलावटी मसाले

पैकेट बंद अच्छे ब्रांड के चुनकर किये हैं पत्नी के हवाले


बड़े ब्रांड को भी बिना मिलावट के कहां मुनाफा आता है

आटे में नमक के बराबर तो पूरे देश में चल ही जाता है

मसाले वाले सेठ के बच्चे भी कहां बच पा रहे मिलावट से

चपेट में आ ही जाते हैं कहीं न कहीं इस गिरावट के


उसके बच्चे खा रहे बड़े होटल में मिलावटी पनीर का टिक्का

फाइव स्टार भोजन को समझ बैठे हैं एकदम खरा सिक्का

पर इस मिलावटी दौर में कहां अछूते हैं तथाकथित फाइव स्टार

सरल कमाई के इस दौर में शुद्धता की बात करनी है बेकार


मिलावटखोर चाहता है कि उसके बच्चे मिलावटी खाने से बचें

पर विधाता ने हर किसी के लिए कर्मों के फल यहीं पर रचे।


© सचिन राठौर

मंगलवार, 3 सितंबर 2024

सीसीटीवी कैमरा

सीसीटीवी कैमरा देख ठिठक गया है उसका मन,

सहसा बदल गए हैं चाल-ढाल और आचरण,

सतर्क हो गया है अपने बर्ताव में, व्यवहार में,

अभिनय ऐसा जो भरा हो एक उम्दा फनकार में,

दिखना चाहता है अधिक सभ्य और अत्यंत कुशल,

यही सोच कर रही अंदर गहरी उथल-पुथल,

कहीं कोई देख रहा हो कैमरे से उसका चाल-चलन,

जाने किस नज़र से कर रहा हो उसका आंकलन,

छोटे से कैमरे ने कर दिया इतना बड़ा परिवर्तन,

बेपरवाह व्यक्तित्व में भर दिया त्वरित अनुशासन,

वैसे एक कैमरा तो लगा है उसके स्वयं के भीतर भी,

रिकॉर्ड करता सब तस्वीरें और है एक अच्छा टीचर भी,

अंतर्मन के सीसीटीवी कैमरे से देखा होता अपने कर्म को,

तो समझ गया होता अब तक जीवन के असली मर्म को।


© सचिन राठौर

शुक्रवार, 5 जुलाई 2024

मिलावटः समाज में घुल रहा एक धीमा जहर


खाद्य पदार्थों में मिलावट की समस्या सतही तौर पर भले बहुत गंभीर नहीं दिखती हो, लेकिन मिलावटखोरी का बाजार देश में गहराई तक फैला हुआ है। धन कमाने की दौड़ इस कदर आंख मूंद ली गई हैं कि बच्चों के दूध और आइस्क्रीम को भी नहीं बख्शा गया है। यह समस्या न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, बल्कि इसके सामाजिक दुष्परिणाम भी नजर आने लगे हैं।

भारतीय मसालों पर लगा प्रतिबंध

हाल ही में भारतीय मसालों के ब्रांडों पर कई देशों में प्रतिबंध लगाया गया है। इनमें मिले हानिकारक रसायनों की वजह से कुछ देशों ने यह कदम उठाया। बताया जा रहा है कि इन मसालों में एथलीन ऑक्साइड मिला है, जो कैंसरकारक होता है। एमडीएच और एवरेस्ट जैसे ब्रांड के मसाले दशकों से भारतीय रसोइयों में बड़े विश्वास से प्रयोग किये जाते रहे हैं। लेकिन इन प्रतिबंधों के बाद नामी कंपनियों के प्रति विश्वास कमजोर हुआ है। अपने पेड पीआर के माध्यम से ऐसी कंपनियां अपने कारनामों पर कितना भी पर्दा डालें, लेकिन इन्होंने न केवल अपने उपभोक्ताओं का विश्वास खोया है, बल्कि विदेश में भी भारत की छवि खराब की है।

मिलावट का व्यापक असर

इसी प्रकार पनीर, दूध, घी और मिठाइयों में भी भारी मिलावट की खबरें भी लगातार आती रहती हैं। थोड़ी लागत से मोटा पैसा बनाने की फिराक में मिलावट का यह बाजार छोटे-छोटे शहरों और गांव तक तक फैल चुका नजर आता है। सब्जियों में भी खरनाक रसायन पाए जा रहे हैं। खाद्य तेलों में भी यह समस्या गंभीर रूप से देखी जा सकती है। इसके अलावा पैकेट बंद खाद्यपदार्थों की एक अलग दुनिया है, जो महीनों तक खराब ही नहीं होते। ऐसे कौन से कारक उनमें प्रयोग किये जाते हैं, जो उन्हें महीनों तक प्रयोग करने योग्य बनाए रखते हैं। इन सब परिस्थितियों में आम जन के स्वास्थ्य पर होने वाले दुष्परिणामों के बारे में आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। 

खाद्य मिलावट से जुड़े आंकड़े

मिलावट के संदर्भ में भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के आंकड़े डराने वाले हैं। एक संसदीय प्रश्न के उत्तर केन्द्रीय उपभोक्ता कार्य, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री द्वारा ये आंकड़े संसद के पटल पर रखे गए। इन आंकड़ों की मानें तो एफएसएसएआई द्वारा जांचे गए खाद्य पदार्थों में 20 से 25 प्रतिशत सैंपल मानकों पर खरे नहीं उतरे। गौर करने वाली बात यह है कि अनेक मामलों में सजा भी हुई, लेकिन 6 माह जैसी मामूली सजा ऐसे अपराध के लिए कम प्रतीत होती है, जिसके साथ देश का स्वास्थ्य जुड़ा हो। देश में तेजी से बढ़ रहीं कैंसर, डायबिटीज, ब्लडप्रेशर, और दिल की बीमारियों के मामलों के पीछे मिलावटी खाद्य पदार्थ भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं। 

Year

No. of Samples Analysed

No. of Samples found non-conforming

Civil Cases

Criminal Cases

 No. of Cases launched

No. of Convictions

 No. of Cases Launched

No. of Convictions

 

2018-19

1,06,459

30,415

18,550

12,734

2,813

701

 

2019-20

1,18,775

29,589

27,412

17,345

4681

780

 

2020-21

1,07,829

28347

24,195

14,817

3869

506

 

2021-22

1,44,345

32,934

28,906

19,437

4,946

671

 

2022-23

1,72,687

44,421

38,053

27,053

4,817

1133

 

एक स्वस्थ समाज की दिशा

इस समस्या के समाधान के लिए अत्यंत जनजागरण की आवश्यकता है। पैकेट बंद खाद्य पदार्थों पर तेजी से बढ़ रही निर्भरता पर स्व-नियंत्रण करना होगा। बाजार के खाद्य पदार्थों पर आंख मूंदकर विश्वास करने की प्रवृत्ति बदलनी होगी। सदैव यह ध्यान रहे कि बाजार मुनाफे के लिए बना है, परोपकार के लिए नहीं और मुनाफा बढ़ाने के लिए बाजार में बैठी शक्तियां किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहती हैं।

बुधवार, 3 जुलाई 2024

अत्यंत विशेष है कैवल्यदर्शनम् पुस्तक की भूमिका

सब राष्ट्रों में आध्यात्मिक सामंजस्य को बढ़ावा देने में श्रीयुक्तेश्वर जी की गहरी रुचि को देखते हुए महावतार बाबाजी ने उन्हें हिंदुत्व और ईसाइयत में निहित मूलभूत एकता को दर्शाने के लिए कैवल्यदर्शनम् पुस्तक लिखने का आदेश दिया। अतः श्रीयुक्तेश्वर गिरि जी ने अपने गुरु लाहिड़ी महाशय के गुरू महाअवतार बाबाजी की आज्ञा का पालन करने के लिए यह पुस्तक सन् 1894 में लिखी।

यह पुस्तक भारत के सांख्य दर्शन और बाइबिल के यूहन्ना का प्रकाशित वाक्य (रिविलेशन) के बीच मूलभूत एकता को दर्शाती है। हालांकि, इस पुस्तक में मुझे सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित करने वाली प्रतीत हुई इसकी भूमिका, जो स्वयं श्रीयुक्तेश्वर गिरि जी द्वारा लिखी गई है। 21 पृष्ठों की इस प्रस्तावना में श्रीयुक्तेश्वर जी द्वारा काल गणना से संबंधित भाग विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है।

उनकी गणना के अनुसार हमारे पंचांगों में कुछ गलत भाष्यों या अनुवाद के कारण भूल आ गई है और वर्तमान में जिसे हम कलियुग मानते हैं, वह वास्तव में द्वापर युग है। वह अकाट्य तर्कों के माध्यम से इस बात को सिद्ध भी करते हैं। उनकी गणना को मानें तो आज 2024 में द्वापर युग का 324वां वर्ष चल रहा है।

वे बताते हैं कि सारे उपग्रह अपने-अपने ग्रहों की परिक्रमा करते हैं और सारे ग्रह अपनी-अपनी धुरी पर गोल घूमते हुए सूर्य की परिक्रमा करते हैं, जबकि सूर्य भी एक महा-केन्द्र या विष्णुनाभि की परिक्रमा करता है, जो स्रष्टा या ब्रह्मा का अर्थात सृष्टि के चुम्बकत्व का केन्द्र है। ब्रह्मा धर्म का या आन्तरिक जगत् की मानसिक सच्चरित्रता का नियंत्रणकर्ता है।

जब सूर्य अपनी परिक्रमा करते हुए इस महा केन्द्र के सबसे निकट पहुंचता है, तब मानसिक सच्चरित्रता या धर्म इतना उन्नत हो जाता है कि मनुष्य को सहज ही सब ज्ञान हो जाता है, यहां तक कि परमतत्व के गूढ़ तत्वों का भी और इसी काल को सतयुग कहा जाता है।

जब सूर्य अपने परिक्रमा पथ पर अपने महा-केन्द्र या ब्रह्मा से सबसे दूर पहुंचता है, तब धर्म का हृास होते-होते इतनी निकृष्ट अवस्था में पहुंच जाता है कि मनुष्य स्थूल जगत से परे कुछ भी नहीं समझ पाता, इसी काल को कलियुग कहा जाता है।

पुस्तक की भूमिका में इस कालगणना को श्रीयुक्तेश्वर जी ने बेहद सरल शब्दों में विस्तार से समझाया है। 1894 में लिखी अपनी इस पुस्तक में वे इसी आधार पर वे 19वीं शताब्दी के कुछ महान वैज्ञानिकों के आविष्कारों और मानव जाति की अन्य प्रगतियों की चर्चा करते हुए बताते हैं कि मनुष्य की यह उन्नति इस चीज को सिद्ध करती है कि समाज में चेतना जागृत हो रही है और ये सभी लक्षण द्वापर युग में देखने को मिलते हैं।

पुस्तक की भूमिका में कालगणना से संबंधित ये रोचक तथ्य इस विषय में रुचि रखने वाले मनीषियों द्वारा अवश्य ही चिंतन करने योग्य हैं। पुस्तक में वर्णित कालगणना को यहां मैंने बेहद संक्षेप में यहां प्रस्तुत किया। उत्सुकजन विस्तार से जानने के लिए पुस्तक को पढ़ सकते हैं। लगभग 130 वर्ष पहले लिखी गई यह पुस्तक पढ़कर सहज ही यह आभास होता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा कितनी समृद्धशाली रही है।

मंगलवार, 2 जुलाई 2024

निर्माण कार्यों की गुणवत्ता जांचने आया मानसून और कर्नल बड़ोग का स्वाभिमान


इस वर्ष मानसून की शुरुआत के साथ ही देश के विभिन्न हिस्सों में पुलों, हवाई अड्डों और राजमार्गों के धंसने की खबरें सुर्खियां बटोरने लगी हैं। हाल ही में देश ने जब स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मनाया है, तब निर्माण कार्यों की संदेहास्पद गुणवत्ता आधुनिक डिग्री धारक इंजीनियर्स और निर्माण कार्य से जुड़े संस्थानों के लिए निश्चित रूप से गहन चिंता का विषय है। 

जिस ब्रिटिश शासन से हमने स्वतंत्रता प्राप्त की, उसके माथे पर भले ही अनेक संगीन आरोप हों, लेकिन उनके निर्माण कार्य आज भी अपनी गुणवत्ता की तस्दीक कर रहे हैं। नई दिल्ली का निर्माण हो या भारतीय रेल व्यवस्था की आधारशिला, यह सब कार्य अंग्रेजों ने भले ही अपने स्वार्थ के लिए किये, लेकिन उनके कार्य पर आज भी कोई संदेह नहीं करता। एक ही बारिश में धराशायी हो जाने वाले कागजी निर्माण करने वाले आधुनिक समय के काबिल इंजीनियर्स के लिए पुराने निर्माण कार्य निश्चित रूप से एक नज़ीर हैं। 

जब भी अखबारों में खराब निर्माण कार्य से जुड़ी खबरें प्रकाशित होती हैं, तब सहसा कर्नल बड़ोग (बरोग) का नाम सहसा ध्यान में आता है। वे ऐसा ही एक उदाहरण हैं, जिससे अपने काम के प्रति समर्पण, ईमानदारी और जिम्मेदारी का भाव सीखा जा सकता है। 

जब 20वीं सदी में जब कालका- शिमला रेलवे लाइन बिछाने का कार्य चल रहा था, तब पहाड़ी काटकर बड़ोग सुरंग (क्रमांक 33) बनाने का कार्य ब्रिटिश इंजीनियर कर्नल बड़ोग के पास था। उस जमाने में कालका- शिमला के बीच पहाड़ों को काटकर 100 से अधिक सुरंगें बनाना अपने आप में एक विलक्षण कार्य था। बरोग सुरंग कर्नल बड़ोग के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन गई। सुरंग बनाने के लिए कर्नल बड़ोग ने सबसे पहले पहाड़ का निरीक्षण किया। सुरंग बनाने के लिए दोनों छोर पर निशान लगाने के बाद मजदूरों को खोदने का ऑर्डर दिए। मजदूर दोनों छोर से एकसाथ खुदाई करने लगे। कर्नल बड़ोग इस बात से आश्वस्त थे कि खुदाई के दौरान दोनों सुरंगें बीच में आकर मिल जाएंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अंग्रेजी हुकूमत को यह पैसे की बर्बादी लगी और उन्होंने कर्नल बड़ोग पर एक रुपया जुर्माना लगा दिया। बड़ोग इस कार्रवाई से बहुत आहत हुए और उनके आत्मसम्मान को गहरी ठेस लगी। एक दिन वह अपने कुत्ते को लेकर सुबह टहलने निकले व सुरंग के नजदीक ही खुद को गोली मार ली। बड़ोग को वर्तमान सुरंग के पास ही दफनाया गया है। आत्महत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं, लेकिन यह कहानी उस इंजीनियर के स्वाभिमान की है। बाद में एक स्थानीय निवासी बाबा भलकू ने उस सुरंग को पूरा करने में मदद की थी, जिनके दिशा-निर्देशन में एक नई सुरंग बनाई गई। ब्रिटिश सरकार ने नई सुरंग का नाम इंजीनियर कर्नल बड़ोग के नाम पर ही रखा। यह इस मार्ग पर सबसे लंबी सुरंग है।

अपने कार्य के प्रति निष्ठा और समर्पण का कर्नल बड़ोग जैसा भाव ही ऐतिहासिक और पीढ़ियों तक चलने वाले निर्माण की नींव रखते हैं। वर्तमान भारत में निर्माण कार्यों से जुड़ी एजेंसियों और  अधिकारियों को यह कहानी नियमित पढ़ानी चाहिए, शायद कभी उनके अंदर अंतःप्रेरणा जागृत हो, ताकि एक मजबूत देश का निर्माण बन सके। हर विफलता का आरोप राजनीति पर लगा देना सबसे आसान मार्ग है। किसी भी तरह की राजनीति आपको तब तक मजबूर नहीं कर सकती, जब तक कमजोरी आपके स्वयं के अंदर न हो। कहीं न कहीं आपने भी बहती नदी में हाथ धोए होंगे, तब जाकर ये पुल धराशायी हुए होंगे।


सोमवार, 1 अप्रैल 2019

पता नहीं कितने दिन और मिलेगी कच्चे चूल्हे की रोटी?

यूं तो गार्गी हर साल ही गांव जाती रही है, लेकिन अब वह चार बरस की हो गई है और हर चीज पर सवाल करने लगी है। इस बार होली पर जब वह हमारे गांव गई तो चूल्हे पर रोटी बनते देख उसके जिज्ञासु मन से सवाल निकला कि ‘यहां लकड़ी से खाना क्यों बन रही है’? फिर उसकी नजर लकड़ी के बने पटले और पीढे़ पर पड़ी। फिर सवाल किया यहां सबकुछ लकड़ी का ही क्यों है? शहर में गैस स्टोव पर खाना बनते देखना और घर में अधिकांश वस्तुएं प्लास्टिक की होने के कारण गार्गी के मन में यह जिज्ञासाएं स्वभाविक ही थीं। लेकिन उसने सब लोगों को हंसने पर मजबूर कर दिया। हालांकि गांव में गैस सिलेंडर के दो-दो कनेक्शन हैं, लेकिन लकड़ी के ईंधन की उपलब्धता के कारण वह अभी भी सस्ता पड़ रहा है। गैस का इस्तेमाल अति आवश्यक होने पर ही किया जाता है। 

पर भाजपा नेता संबित पात्रा के वीडियो के कारण चूल्हे पर बनी रोटी को लेकर सोशल मीडिया पर जो हल्ला मच रहा है, उसे देखकर मन दूर तक निकल गया। यह बात सही है कि चुनावी मौसम में संबित पात्रा द्वारा वह वीडियो प्रचार के लिए ही डाला गया है और हंगामा भी इसीलिए मच रहा है, क्योंकि वे राजनीति से जुड़े हैं। लेकिन चूल्हे की रोटी को बहुत गलत ढंग से प्रदर्शित किया जा रहा है। इसमें हेय दृष्टि नजर आती है। गैस पर रोटी पकाना जरूर आधुनिकता की निशानी है और इंडक्शन चूल्हे पर पकाना अति-आधुनिकता की बात है, पर चूल्हे की रोटी की बात और स्वाद कुछ अलग ही होता है। यह स्वाद उन लोगों के लिए समझना कठिन है, जिन्होंने कभी कच्चे चूल्हे की बनी रोटी खाई ही नहीं। सरकार द्वारा गांव-गांव गैस कनेक्शन पहुंचाने की बात सही है। शत-प्रतिशत लोगों के घर में गैस कनेक्शन है, ऐसा दावा तो अभी नहीं किया गया है। और फिर गांवों में जिन घरों में गैस कनेक्शन पहुंच गया है, उन लोगों ने चूल्हे का प्रयोग बिल्कुल बंद कर दिया है, ऐसा भी नहीं है। गैस कनेक्शन ने उनकी सहूलियत जरूर बढ़ाई है। लेकिन कच्चा चूल्हा आज भी ग्रामीण घरों के आंगन की पहचान है।

हालांकि, आर्थिक उन्नति के साथ परिवार सिकुड़ रहे हैं, धीरे-धीरे नई पीढ़ी चूल्हे से तौबा कर रही है, और हो सकता है कि अगले 20 से 30 वर्षों बाद मिट्टी के चूल्हे भारत के किसी मानव संग्राहलय में ही नजर आएं। ज्यों-ज्यों देश आर्थिक रूप से तरक्की करेगा, विकास की परिभाषा गांव देहात तक पहुंचेगी, हम अपनी पुरानी जीवन शैली को खोते चले जाएंगे। ऐसा होता ही है, कोई नई बात नहीं। पक्के घरों को आधुनिकता और संपन्नता की पहचान बनाया गया, और पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों से कच्चे घर धीरे-धीरे गायब होने लगे। आज स्थिति ये है कि न केवल ठंडी छांव वाली झोंपड़ियां खत्म हुईं बल्कि छप्पर बनाने वाले लोग भी अब नहीं रहे। मटका, घड़ा, सुराही की जगह गांवों में भी फ्रिज, कूलर और एसी पहुंचने लगे हैं। यह जीवनशैली गांव और शहर का अंतर कम होने की पहचान है और देश की अर्थव्यवस्था के लिए लाभदायक भी। पर अजीब तब लगता है जब विकास के नाम पर गांवों का शहरीकरण किया जाए और शहरों में ‘ईको-विलेज’ और ‘नेचुरल लिविंग’ जैसे रिहायशी अपार्टमेंट तैयार किये जाएं। गांवों की झोंपड़ियां पिछड़ेपन की निशानी लगने लगें, लेकिन शहर में विशेष कारीगर बुलवाकर रिजाॅर्ट में ‘हट’ का निर्माण कराते फिरें। दिल्ली के आसपास कई ऐसे रिजाॅर्ट खुल गये हैं, जहां काफी खर्चा करके माॅडर्न लोग ग्रामीण परिवेश देखने के लिए जाते हैं और चूल्हे की रोटी खाते हैं।

देश बहुत तेज रफ्तार से विकासशील मार्ग पर दौड़ते हुए विकसित मार्ग तक पहुंचने जा रहा है। आज हम विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं और जल्द शीर्ष तीन की श्रेणी में भी होंगे। देश की राजधानी दिल्ली व इसके जैसे अन्य मेट्रोपोलिटन शहर इतने ज्यादा विकसित हो गए हैं कि यहां के तमाम निवासी हर वीकएंड पर अपनी विकसित जिंदगी से दूर किसी गैर-विकसित स्थान की तरफ निकल लेते हैं। वर्ष 2020 को लेकर पूर्ण विकसित देश का सपना देखा गया था। 2020 न सही पर 2025 तक यह लक्ष्य हम अवश्य प्राप्त कर लेंगे, ऐसा अनुमान है। लेकिन तब तक शहर के साथ-साथ हमारे गांवों की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी होगी। घर के आंगन से गायब हो जाएगा कच्चा चूल्हा, साथ ही गायब हो जाएगा उस पर पकाने का कौशल। इसलिए कच्चे चूल्हे की रोटी जहां मिले खा लो, क्योंकि यह कितने दिन और मिलेगी, पता नहीं।

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

बोल-बोल सकारात्मक बोल!


आप जब सड़क पर निकलते हैं तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि आपके कानों में अश्लील गालियां न सुनाई पड़ें, विशेषकर दिल्ली, एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में। आम बोलचाल की भाषा में गालियों की टेक लगाकर बात करना आम बात सी लगने लगी है। लोग सार्वजनिक स्थलों पर अश्लील गालियों से सनी वार्तालाप बेधड़क होकर करते हैं, बिना इस बात की परवाह किये कि उनके आसपास महिलाएं भी खड़ी हैं। 


लेकिन पिछले रविवार जब मैं शेव कराने नाई की दुकान (आप सैलून या मेन्स पार्लर भी पढ़ सकते हैं) पर गया तो वहां एक व्यक्ति अपने बच्चे के साथ आया। उसने आकर नाई से कहा कि इसके ‘बाल बड़े’ कर दो। पहले मुझे सुनकर थोड़ा अजीब लगा कि लोग यहां बाल कटवाने आते हैं और ये आदमी कह रहा है कि बाल बड़े कर दो। बाद में समझ आया कि वह भी बाल कटवाने ही आया था, लेकिन ‘काटना’ एक नकारात्मक शब्द होने के कारण उसने बाल बड़े करना कहकर एक सकारात्मक शब्द प्रयोग किया। ऐसा नहीं था कि वह कोई बहुत बड़े बुद्धिजीवी या आध्यात्मिक वर्ग से था, बल्कि यह शब्द उसने अपने उस मूल स्थान की परंपरा से सीखा होगा जहां का वह निवासी था। हमारे क्षेत्र में भी बाल कटवाना नहीं कहा जाता था, बल्कि बाल बनवाना कहा जाता था। 

अपने समाज में बातचीत के दौरान नकारात्मक शब्द न प्रयोग करने की परंपरा शायद बहुत पुरानी है। अपनी दैनिक बोलचाल की भाषा में हमें तमाम ऐसे शब्द मिल जाएंगे जिनका अर्थ बिल्कुल विपरीत होता है। उदाहरण के लिए कोई भी दुकानदार दुकान ‘बंद’ करना नहीं बोलता बल्कि कहता है कि वह दुकान बढ़ा रहा है। कुछ लोग जब घर से बाहर जाते हैं तो यह नहीं कहते कि मैं जा रहा हूं, बल्कि कहते हैं कि मैं अभी आ रहा हूं। उसी प्रकार महिलाएं चूड़ियों के टूटने के लिए अपने-अपने क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग शब्द प्रयोग करती हैं, हमारी तरफ ‘चूड़ी मौलना’ शब्द प्रचलित है। ऐसे ही गांवों में दीया बुझा दो कोई नहीं बोलता बल्कि कहते हैं ‘दीया बढ़ा’ दो। इस प्रकार के तमाम शब्द हैं, जो हमारी जिंदगी से सकारात्मक कारणों से जुड़े हुए हैं।

सकारात्मक बोलने की परंपरा गढ़ने वालों की सोच यही रही होगी कि गलती से भी मुख से गलत शब्द न निकले, नकारात्मक बोल न निकलें। गौर से देखें तो हंसी-मज़ाक के लिए भी मर्यादाएं नजर आती हैं। पर इसे आधुनिकता कहें, टीवी का प्रभाव कहें या फिल्मों का असर कि लोग बेधड़क नकारात्मक शब्दों का प्रयोग करते हैं। नकारात्मक शब्दों से तात्पर्य केवल अश्लील गालियों से नहीं है, बल्कि आम बोलचाल में अपनी दिक्कतों, परेशानियों में गलत शब्द मुख से निकलना आम हो गया है। हास्य के नाम पर कवि सम्मेलनों में और काॅमेडी के नाम पर टीवी शो में ऐसे-ऐसे चुटकुले खुले मंच पर सुना दिये जाते हैं कि आप असहज हो जाएं। बातचीत का वही तौर-तरीका धीरे-धीरे समाज में स्वीकार किया जाने लगा है। 

संक्रमण के दौर से गुजर रही भाषा को देखकर लगता है कि नकारात्मकता ने जीवन में गहराई तक पांव पसार लिये हैं। यदि कभी अकेले में बैठकर मनन करें तो लगता कि कम बोलने, सार्थक बोलने और सकारात्मक बोलने की परंपरा कितनी सही थी।

सोमवार, 16 जनवरी 2017

ऑनलाइन मतदान की ओर कदम बढ़ाने का सही वक्त!

भारत में इलेक्ट्रिॉनिक वोटिंग मशीन की अपार सफलता के बाद अब चुनाव आयोग को ई-वोटिंग की ओर कदम बढ़ाना चाहिए। जिस प्रकार देश तेजी से डिजिटाइजेशन की ओर बढ़ रहा है, उसको देखते हुए यदि जल्द यह कदम उठाया जाता है, तो बहुत बड़े खर्च और प्रशासनिक उठापटक को टाला जा सकता है। साथ ही इससे उन लोगों को भी फायदा होगा जो नौकरी या अन्य कारणों से अपने शहर से दूर बस गए हैं, लेकिन वोट डालने के कारण उन्हें अपने शहर आना पड़ता है।

इसके लिए चुनाव आयोग ऑनलाइन वोट डालने के इच्छुक मतदाताओं से अपना एपिक नंबर आयोग की साइट पर रजिस्टर करवाये और ऐसे मतदाताओं के लिए अलग से एक ऑनलाइन वोटर लिस्ट तैयार करे। फिर ऐसे मतदाताओं के नाम कागजी वोटर लिस्ट से हटा दे। इस प्रकार चुनाव आयोग दो तरह की वोटर लिस्ट तैयार कर सकता है- एक ऑनलाइन मतदाताओं के लिए और दूसरी मतदान केंद्र पर जाने वाले मतदाताओं की। चुनाव के दिन ऑनलाइन मतदाता आयोग की वेबसाइट और मोबाइल एप पर वोट डाल सकते हैं और बाकी मतदाता मतदान केंद्र पर जाकर अपना मत डाल सकते हैं। ऑनलाइन मतदाताओं को मतदान केंद्र पर वोट डालने की अनुमति नहीं होगी। लेकिन ऑनलाइन वोट डालने के बाद मतदाता को मतदान रसीद अवश्य प्रदान की जाए, एसएमएस और ईमेल के माध्यम से भी। प्रयोग के तौर पर इसे छोटे राज्यों में आजमाया जा सकता है। 

जिस तरह डीबीटी एक सफल प्रयोग बनकर उभरा है, ऑनलाइन वोटिंग भी निश्चित तौर पर सफल होगी। ऑनलाइन वोटिंग का विकल्प आने से मतदान प्रतिशत में भी इजाफा होना लाजमी है, साथ ही भारी प्रशासनिक खर्च भी धीरे-धीरे घटता चला जाएगा। आज के दौर में जब ऐसे-ऐसे काम घर बैठे ऑनलाइन संभव हो रहे हैं, जिनके बारे में सोच भी नहीं सकते थे, तो फिर ऑनलाइन मतदान करवाना कोई बड़ी बात नहीं है। कई अखबार, न्यूज वेबसाइट और सर्वे कंपनियां इस तरह की वोटिंग समय-समय पर कराती ही रहती हैं। हालांकि चुनावी मतदान में थोड़ा एहतियात बरतने की आवश्यकता है। वोटिंग सॉफ्टवेयर तैयार करने में तमाम पहलुओं पर कड़ाई से सोचना होगा, ताकि दिमागी खुजली वाले लोग इसकी सुरक्षा में सेंध न लगा सकें। 

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

पंचायत चुनाव बनाम ग्राम स्वराज


इन दिनों जब पूरे देश का ध्यान बिहार के विधानसभा चुनाव और उनके परिणामों पर केंद्रित हैं, ठीक उसी वक्त उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों का जोर है। अभी एक दिन के लिए अपने गांव जाना हुआ तो वहां की दीवारों पर चस्पा पोस्टरों को देखकर आभास हुआ कि देश में किसी भी चीज की कमी हो सकती है पर नेताओं की कमी कभी नहीं होगी। ऐसी-ऐसी चुनावी बिसात बिछाई जा रही हैं कि अमित शाह और लालू यादव भी मात खा जाएं। ऐसी गोटियां फेंकी जा रही हैं कि पूरी कांग्रेस पार्टी भी पानी मांगने लगे। पिलखुन के नीचे बैठकर ऐसी रणनीति तैयार हो रही हैं जिनको सुनकर बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ शर्म खा जाएं। छोटे-छोटे गांवों में इतनी बड़ी-बड़ी राजनीति खेली जा रही है कि दिल्ली भी लजा जाए। गांव के इस चुनावी माहौल को देखकर अरस्तु के वाक्य पर यकीन होने लगता है- ‘मनुष्य एक जन्मजात राजनीतिक जीव है’। भारत में तो राजनीति रग-रग में बसी है। किसी को छेड़ना भर मात्र है और वो अपने अंदर का पूरा राजनीतिक शास्त्र उड़ेल कर रख देगा। अपने यहां नाई की दुकान से लेकर रेल की बोगी तक, चाय के खोखे से लेकर गांव की चैपाल तक, मंदिर-मस्जिद से लेकर विश्वविद्यालयों तक राजनीतिक शास्त्रार्थ करने के लिए पुरोधा हर वक्त मुफ्त में तैयार मिलते हैं।

परंतु गांधी जी ने जिस ग्राम स्वराज का सपना देखा और दिखाया था वह आज के ग्राम पंचायत चुनाव से कतई मेल नहीं खाता। गांधी जी यदि आज की ग्रामीण राजनीति देख लेते तो शायद पंचायत चुनाव की जगह गांव की जिम्मेदारी एक दरोगा के हवाले करने की सिफारिश करते। उत्तर प्रदेश के अंदर ग्राम पंचायत चुनाव में जीतने के लिए हर वो हथकंडा अपनाया जाता है जिसका नैतिकता के दायरे से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं। पूरे चुनाव के दौरान मांस-मदिरा और सुरा-सुंदरी का प्रचलन अपने उत्कर्ष पर रहता है। इससे भी बात न बने तो बंदूक की गोली अंतिम उपाय के तौर पर काम आती है। यकीन न आए तो जिस दिन से चुनाव घोषित हुए हैं उस दिन से लेकर परिणाम घोषित होने के बीच कितनी चुनावी हत्याएं और हमले हुए इनके आंकड़े आरटीआई से निकलवाकर देखे जा सकते हैं। चुनाव आयोग ने विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान होने वाली हिंसा पर तो काबू पा लिया है, लेकिन पंचायत चुनाव के मौसम में पूरे उत्तर प्रदेश में रंजिशन गोलीबारी और हत्याओं के मामलों में अब भी बेतहाशा वृद्धि दर्ज की जाती है।  

कई जगह पंचायत चुनाव ने ऐसी गहरी रंजिशों की नींव डाली हैं कि पीढि़यां उसका खामियाजा भुगत रही हैं। यूं तो सतत विकास के कारण भी गांव की सामाजिक समरसता प्रभावित हो चुकी है, लेकिन पंचायत चुनावों ने भी गांव के सामाजिक ताने-बाने को पूरी तरह तोड़-मरोड़ दिया है। किसी कवि कि कविता या हिंदी फिल्म में गांव की जो सुनहरी तस्वीर पेश की जाती है, गांव दरअसल ठीक उसके विपरीत हैं। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाज का सटीक चित्रण श्रीलाल शुक्ला के उपन्यास ‘राग दरबारी’ में ही देखने को मिलता है। देश के आर्थिक विकास के साथ जब से पंचायतों को मोटा धन मिलना शुरू हुआ है, तब से उत्तर प्रदेश में सभी पंचायती प्रतिनिधित्व वाले पद सिर्फ भ्रष्टाचार के गढ़ बन कर रह गए हैं। ग्राम प्रधान बनते ही गांव की उन्नति हो न हो पर उस व्यक्ति की उन्नति निश्चित है जो उस पद पर शोभायमान है।

हो सकता है इसी पंचायती राज व्यवस्था के कुछ सकारात्मक पहलू भी हों या फिर कुछ गांवों ने इसी व्यवस्था के तहत विकास किया हो। लेकिन मेरा निजी अनुभव यही कहता है कि उत्तर प्रदेश के अंदर पंचायती राज व्यवस्था अधिकांश गांवों के अंदर राजनीतिक सड़ांध पैदा कर रही है। ऐसी सड़ांध जो ग्रामीण जीवन के लिए एक अभिशाप से कम नहीं। पंचायतों में महिलाओं को जबरदस्त आरक्षण देकर हम दिल्ली में दो-चार महिला सरपंचों को सम्मानित कर महिला सशक्तिकरण का ढोल भले ही पीटें, लेकिन 99.99 प्रतिशत मामलों में महिला सरपंच अपने पति के आधीन होकर ही चलती हैं। सिर्फ कागजों पर विश्व को दिखाने भर के लिए इस प्रकार का महिला सशक्तिकरण क्या सचमुच देश और समाज के हित में होगा। महात्मा गांधी ने जरूर ग्राम स्वराज की परिकल्पना देश के समक्ष रखी थी, लेकिन हम अपने दिल पर हाथ रख कर बता दें कि क्या वर्तमान पंचायती राज व्यवस्था सचमुच गांव के हित में है। जहां ग्राम प्रधान और स्कूल प्रधानाचार्य मिलकर बच्चों का भोजन डकारने की मानसिकता रखते हों भला ऐसा पंचायती राज समाज के किस काम का?

अन्ना हजारे के गांव रालेगण सिद्धि और उनके प्रभाव वाले आसपास के कुछ गांवों में पंचायत चुनाव नहीं होते, बल्कि आम राय से निर्विरोध तरीके से पदों पर नियुक्ति की जाती है। और फिर अन्ना के दिए गए सूत्रों के अनुसार गांव का विकास किया जाता है, जिसमें शराब बंदी, बालिका शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, जननी सुरक्षा, शाकाहार, अहिंसक जीवन जैसे मूल्यों को आधार बनाया गया है। उन्होंने अपने गांव में एक ऐसा स्कूल भी खोला है जिसमें दूसरे स्कूलों में फेल हुए बालक-बालिकाओं को पढ़ाया जाता है। साथ ही उत्तम भोजन भी प्रदान किया जाता है। कुछ ऐसे ही मापदंडों पर यदि देश के अधिकांश गांव आगे बढ़ते हैं तब कहीं गांव में सुधार की शुरुआत होगी अन्यथा खानापूर्ति के लिए पंचायती राज व्यवस्था हम अपने कंधों पर ढोते रहेंगे। अंतिम बात, राजनीति जब राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ही हो तो बेहतर है, लेकिन जब ये आपके गांव और घर में घुसने लगे तो बेहद घातक सिद्ध होती है।

शुक्रवार, 5 जून 2015

गोलगप्पों में मिलावट!

गोलगप्पे में टट्टी की मिलावट वाली खबर ने तो दिल ही तोड़ दिया। सच्ची! भला ये भी कोई चीज हुई मिलावट करने के लिए। शुक्ला जी को तो जिस दिन से इस खबर का पता चला है सन्नाटे में आ गए हैं। अजीब सा मौन पसरा हुआ है उनके चेहरे पर। जीवन में उन्होंने कोई ऐब या शौक नहीं पाला, शुद्ध शाकाहारी एवं ऐबरहित। बस गोलगप्पा ही उनका सबसे बड़ा ऐब और कमजोरी था। थकते नहीं थे, गोलगप्पों का बखान करते हुए। दिल्ली के कोने-कोने के गोलगप्पों का रसपान कर चुके थे। कहां-कहां कितने प्रकार के पानी के साथ गोलगप्पे खिलाए जाते हैं, सबकी फेहरिस्त उन्हें जुबानी याद थी। इसमें भी लाजपतनगर के गोलगप्पों के तो वो दीवाने थे। वैसे भी चाट के नाम पर गोलगप्पे ही उनके स्वास्थ्य पर विपरीत असर नहीं डालते थे, सुपाच्य पानी के साथ वसारहित भोज। चाट की दुकान पर ये जो टिक्की होती है न, बहुत नामुराद चीज होती है। एक तो आलू और वो भी सर से पांव तक घी में तला हुआ। घी मिलावटी हुआ फिर तो गई सेहत पानी में। सो, शुक्ला जी ने चाट की दुकान पर केवल गोलगप्पे के साथ ही अपना नाता जोड़ा था। बाकी किसी भी चाट की ओर वह आंख उठाकर भी नहीं देखते थे। अब जब एक गोलगप्पा ही खाना है, तो भला चार-पांच की संख्या में क्या खाया जाए, 15-20 से कम में शुक्ला जी का काम नहीं चलता था। जी भर के खाने के बाद जो जलजीरे वाली डकार आती, अहो! क्या कहने उसके। सचमुच दिव्य अनुभूति। अलौकिक। शुक्ला जी का वश चलता तो गोलगप्पों को ‘राष्ट्रीय खाद्य पदार्थ’ घोषित करवा देते।

गोलगप्पों के बिना अपने समाज की परिकल्पना अधूरी है। न जाने कितनी ही फिल्मों में गोलगप्पों का सीन फिल्माकर उनके महत्व का बखान किया गया है। कंगना की ‘क्वीन’ फिल्म गोलगप्पे वाले सीन के बिना अधूरी है। रब ने बना दी जोड़ी में भी शाहरुख और अनुष्का गोलगप्पे खाते हुए कितने अच्छे लगे हैं। पर गोलगप्पे में भी मिलावट हो सकती है, ये तो शुक्ला जी ने कभी सोचा ही नहीं था। मिलावट का स्कोप ही कहां है। आखिर इनमें होता ही क्या है, पानी के सिवा। लेकिन अखबारों की कतरनें चिल्ला-चिल्ला कर कह रही हैं, गोलगप्पों में मिलावट है, और वह भी ऐसी चीज की कि पूछो मत। मन घिनिया गया है उनका। पहले शुक्ला जी गोलगप्पे खाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते थे। आॅफिस से घर वापस लौटते वक्त दो-चार पत्तों पर हाथ साफ करना उनको दिन भर की थकान से आराम देता। पर जिस दिन से मिलावट वाली मनहूस खबर पढ़ी है, उस दिन से उनकी आंखें सिर्फ दूर से गोल-गोल गोलगप्पों को देखकर मन ही मन उनका स्वाद ले लेती हैं। उनके और गोलगगप्पों के बीच उनका दिमाग दीवार बनकर खड़ा हो जाता है। हालांकि, उनके दिल का एक कोना अब भी ये मानने को तैयार नहीं कि गोलगप्पे में टट्टी जैसी निकृष्ट चीज की मिलावट है।

आजकल अकेले में शुक्ला जी यही सोचकर अपने आपको समझाते हैं- ‘‘हो न हो ये झूठी खबर है, जो अखबारों के माध्यम से अपने समाज में फैलाई गई है। दिल्ली में सड़क किनारे चाट बेचने वालों पर कराया गया ये सर्वे हो न हो एक पेड सर्वे है। ये बड़े-बड़े रेस्तरां वाले छोटे दुकानदारों की रोजी खाना चाहते हैं। ठेले वालों ने सस्ते दाम में लजीज चाट परोसकर इन बड़े-बड़े रेस्तरां वालों के सामने खतरा पैदा कर दिया होगा। तभी ऐसा सर्वे कराने की नौबत आई होगी। ताकि सारी भीड़ सड़क पर खाना बंद कर दे और रेस्तरां चल निकलें। अरे हां! रेस्तरां के बिलों पर सर्विस टैक्स भी तो बढ़कर 14 परसेंट हो गया है, इससे तो उनके यहां भीड़ और कम हो जानी है। तभी ससुरों ने ये चाल चली है। अब भला जो मजा 10 रुपये के पांच खाने में है, वो 50 रुपये में पांच खाने में कैसे आ सकता है। उस पर 14 परसेंट सर्विस टैक्स भी दो। भाड़ में जाएं ये रेस्तरां वाले। वैसे तो मल विसर्जन के बिना दिन की शुरुआत हो ही नहीं सकती, जीवन का सबसे बड़ा सत्य है मल। पर गोलगप्पों में मिलावट ही दिखानी थी, तो किसी और चीज की भी दिखा सकते थे, टट्टी की मिलावट क्यों दिखाई। छिः छिः छिः। औक!’’

शनिवार, 23 मई 2015

परिधानों में भारत के प्रधानमंत्रीः गुलाब के फूल से लेकर सूट-बूट तक

राहुल गांधी द्वारा दिया गया ‘सूट-बूट की सरकार’ का जुमला मोदी सरकार के मंत्रियों को खिजाने का काम कर रहा है। इसके जवाब में सरकार को ‘सूझ-बूझ की सरकार’ बताया जा रहा है और यूपीए की सरकार को ‘झूठ-लूट की सरकार’। आजादी के बाद सभी भारतीय प्रधानमंत्रियों का अपना स्टाइल स्टेटमेंट रहा है। जब पद इतना शक्तिशाली हो तो हाकिम की साधारण चाल भी एक अंदाज बन जाती है। इसीलिए जवाहरलाल नेजरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक भारत के सभी प्रधानमंत्रियों का अंदाज पहले मीडिया और फिर जनता के बीच हमेशा चर्चा का विषय रहा। लेकिन पीएम मोदी को वह सूट भारी पड़ गया जिस पर उनका नाम लिखा हुआ था। हालांकि वह सूट उपहार में मिला हुआ था, पर किसी कलमकार ने खोजते-खोजते उसके तार होस्नी मुबारक के सूट से जोड़े और फिर उसी की कीमत से मोदी के सूट की कीमत का आंकलन कर लिया कि वह नामधारी सूट साढ़े दस लाख रुपये का है। लेकिन क्या प्रधानमंत्री का पहनावा ऐसी चीज है जिसकी चर्चा संसद में की जाए? सूट-बूट का तंज अगर राहुल बार-बार प्रयोग करेंगे तो इसके तार आखिरकार उनकी दादी और पर नाना की वार्डरोब तक पहुंच सकते हैं। अगर इंदिरा और नेहरू के कपड़ों की डिटेल निकलवाई गई तो वह पीएम मोदी की वार्डरोब से हल्की तो कतई नहीं निकलेगी। जो सबसे स्टाइलिश प्रधानमंत्री भारत को मिले उनमें नेहरू और इंदिरा गांधी का ही नाम आता है। इन दोनों ही प्रधानमंत्रियों ने अपना स्टाइल उस दौर में मेनटेन किया जब भारत के पास बहुत बड़ी आबादी का पेट भरने के लिए अनाज भी नहीं था। लिहाजा कपड़ों से हटकर काम पर ही नजर रखी जाए तो बेहतर होगा, क्योंकि बात अगर निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। खैर ‘सूट-बूट’ के बहाने एक नजर डालें भारत के कुछ लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों के ड्रेसिंग सेंस परः

जवाहरलाल नेहरू
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को देश का सबसे स्टाइलिश और वेल ड्रेस्ड नेता के रूप में जाना जाता है। उनके नाम पर ही कुर्ते पर पहने जाने वाली बंद गले की जैकेट का नाम ‘नेहरू जैकेट’ और ‘जवाहर कट’ पड़ गया। नेहरू अपने कपड़ों और स्टाइल को लेकर काफी सजग रहते थे। देश के गांव-गलियों में यह भी मशहूर है कि नेहरू अपने कपड़े लंदन से खरीदते थे, पेरिस में सिलवाते थे और ड्राइक्लीन के लिए भी पेरिस भेजते थे। उनकी शेरवानी और उस पर लगा गुलाब का फूल उनकी पहचान और स्टाइल बन गया था। राष्ट्र कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने गुलाब को संबोधित करते हुए ‘कुकरमुत्ता’ कविता लिखी थी। कहा जाता है कि ये कविता नेहरू की नीतियों पर निराला का परोक्ष रूप से हमला था। कविता की कुछ पंक्तियां कुछ इस प्रकार हैंः

अबे सुन बे गुलाब,
भूल मत जो पाई खुशबू, रंगोआब,
खून चूसा तूने खाद का अशिष्ट,
डाल पर इतरा रहा है कैपिटलिस्ट....

इंदिरा गांधी 
भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बारे में तो कई लेखकों ने लिखा है कि Indira always dressed to kill. इंदिरा गांधी का ड्रेसिंग सेंस बेहद आकर्षक था। इंदिरा गांधी ने उस दौर में अपने बालों के साथ प्रयोग किया जब भारतीय महिलाओं की केवल चोटी और जूड़े में ही स्वीकार्यता था। इंदिरा ने उस समय अपने बाल कटवाकर भारतीय महिलाओं के सामने एक नई छवि पेश की जब बाॅलीवुड की नायिकाएं भी जूड़े और चोटी में ही दिखती थीं। इंदिरा के हेयर स्टाइल को देश की तमाम महिलाओं के बीच लोकप्रिय हुआ। इंदिरा गांधी की साडि़यां हों या फिर विदेश यात्राओं के दौरान उनका लांग कोट हमेशा लीग से हटकर और खास होते थे। इंदिरा अवसर के अनुसार ही अपनी साडि़यां पहनती थीं। देश के किसी दूर-दराज के गांव में कभी वे बेहद सादगी भरी खादी की साड़ी में नजर आतीं तो अपनी विदेश यात्राओं में सिल्क साड़ी और लांग कोट में दिखतीं। उनके दौर के कई पत्रकारों ने लिखा है कि इंदिरा की साडि़यां किसी भी पुरुष राष्ट्राध्यक्ष के सूट-बूट के सामने इक्कीस होती थीं। इंदिरा गांधी अपने ड्रेस और प्रेजेंटेशन को लेकर काफी सजग रहतीं थी। अपने जीवन के अंतिम दिन भी वह बीबीसी को इंटरव्यू देने के लिए तैयार होकर जा रही थीं। इस दौरान जब उन्होंने एक टी-सेट को देखा तो उसे बदलने की सलाह दी। इससे यही पता चलता है कि वह छोटी-छोटी चीजों में भी प्रेजेंटेशन पर पैनी नजर रखती थीं।

राजीव गांधी 
भारत के सबसे युवा और स्मार्ट प्रधानमंत्री का गौरव अभी तक राजीव गांधी को ही प्राप्त है। राजीव गांधी तीन-चार तरह के परिधानों में नजर आते थे। औपचारिक कार्यक्रमों में राजीव बंद गले का जोधपुरी सूट पहनते थे, जबकि साधारणतया वह कुर्ता-पयजामा में ही दिखतेे। उन्होंने शाॅल को क्राॅस करके एक हाथ के नीचे से निकालकर पहनने का नया अंदाज निकाला था। राजीव के अभिन्न मित्र रहे अमिताभ बच्चन आज भी राजीव गांधी के स्टाइल में शाॅल पहनना पसंद करते हैं। धूप में निकलते वक्त राजीव रे-बैन का चश्मा भी पहना करते थे। जबकि अमेठी दौरे पर वह बेहद इन्फाॅर्मल होकर वहीं के अंदाज में अपने गले में गमछा भी डाल लिया करते थे।

अटल बिहारी वाजपेयी 
भाजपा के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पहनावा काफी सादगी भरा था। देश में वह अपनी चिर-परिचित कुर्ता धोती और जैकेट पहनते थे, तो विदेश यात्राओं पर वह बंद गले का जोधपुरी सूट पहना करते थे। हालांकि प्रधानमंत्री वाजपेयी कुर्ता-धोती के साथ जो जैकेट पहनते थे, वह जरूर अलग थी। वाजपेयी बंद गले की जगह गोल गले की जैकेट पहनना पसंद करते थे, जो उनके पहनावे की पहचान बन गई। साथ ही वाजपेयी के ज्यादातर कुर्तों की आस्तीनों में बटन भी लगे होते थे।

लालकृष्ण अडवाणी
भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण अडवाणी जब भारत के उप प्रधानमंत्री थे तब भारत यात्रा पर आए अफगानिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति हामिद करजई ने कई बार उनके द्वारा पहने जाने वाली जैकेट की तारीफ की थी। अमूमन सादगी पूर्ण अंदाज में रहने वाले भाजपा नेता लालकृष्ण अडवाणी की जैकेट में ऊपर की ओर तीन बटन लगे होते हैं। यही सिलाई उनकी जैकेट को बाकियों से अलग बनाती है। आखिरकार हुआ यह की हामिद करजई जब अगली बार भारत की यात्रा पर आए तो अडवाणी जी ने उन्हें चार जैकेट खासतौर से सिलवाकर उपहार में दी।

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