शनिवार, 10 अप्रैल 2010

हर बार एक ही बात क्यों दोहराई जाती है?

मिस्टर पीसी,
खबर मिली है कि दंतेवाडा की घटना के बाद आप इस्तीफ़ा देना चाहते हैं. लेकिन प्रधानमंत्री ने आपका प्रस्ताव ठुकरा दिया है. अच्छी बात ये रही कि बीजेपी ने भी आपका समर्थन किया है और वो भी नहीं चाहती कि आप पद त्याग करें.

सच पूछिए तो देश के लोग भी नहीं चाहते की आप इस्तीफ़ा दें, क्योंकि लोग आप से पूर्ववर्ती गृह मंत्री की कार्यशैली देख चुके हैं. कम से कम आपके काम करने का तौर तरीका उनके जैसा नहीं है. आप की बात में काफी हद तक गंभीरता झलकती है. ये आपकी इमानदार स्वीकारोक्ति है कि इस जघन्य जनसंहार के लिए अंततः आप ही जिम्मेदार हैं. सो, इस समय आपका पद त्याग उचित नहीं.

लेकिन मिस्टर पीसी, आपको अब ये समझ लेना चाहिए कि लोग अब आजिज आ चुके हैं. आखिर कब तक हम भारतियों का खून पानी की तरह बहता रहेगा. जब जिसके मन में आता है हमारा खून बहा के चला जाता है. हद तो तब होती है जब लोगों के खून पर राजनीती होने लगती है.

अच्छा हाँ, आज आपके मंत्रालय ने देश के सभी प्रमुख अख़बारों में विज्ञापन दिया है. विज्ञापन कह रहा है "इनफ-इज-इनफ". आखिर ये विज्ञापन देकर आप साबित क्या करना चाहते हैं. ये बात जो इस विज्ञापन में कही गयी है वो हर बार कही जाती है. लेकिन कभी कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता. भावनात्मक भाषण देने से कोई काम बनने वाला नहीं है. सरकार को दृढ इच्छाशक्ति दिखानी होगी, ढुल-मुल रवैये से कुछ काम बन ने वाला नहीं है. इस देश के लोग सरकार इसीलिए चुनते हैं कि वह उनकी रक्षा करे. आप विज्ञापन देकर पता नहीं किस को क्या दिखाना चाहते हैं.

सरकार हर तरह से सक्षम है. इस हत्याकांड का बदला लेना बेहद जरूरी है. ये हमारी बदला न लेने की प्रवृत्ति ही है जिसका हम आज खामियाजा भुगत रहे हैं. अपनी अच्छी छवि बनाने के चक्कर में हम हर साल हजारों लोगों को खो रहे हैं. अगर गिन ने बैठ जाएँ तो गिनती ख़तम हो जाये, लेकिन जुल्म की दास्ताँ न ख़तम होगी. भारत इतना कमजोर तो कभी नहीं रहा.

आतंकियों ने हमारा हवाई जहाज हाई-जैक किया, हमने बदला नहीं लिया,
बांग्लादेशियों ने हमारे जवानों की ऑंखें निकल ली, हमने बदला नहीं लिया,
हमारी संसद की आबरू को तार तार कर दिया गया, हमने बदला नहीं लिया,
हमारे धार्मिक स्थलों को लहूलुहान कर दिया गया, हमने बदला नहीं लिया,
हमारी दिवाली काली कर दी गयी, हमने बदला नहीं लिया,
होटल ताज बर्बाद कर दिया गया, हमने बदला नहीं लिया,
अब हमारे ७६ जवान हमसे छीन लिए गए और हम अब भी चुप हैं....

मिस्टर पीसी, माना कि आप भले आदमी हैं, लेकिन ये भलाई अपने नागरिकों के लिए रखिये, आतताइयों के लिए नहीं. जब तक खून का बदला खून नहीं होगा, इस तरह की घटनाएँ रुकने वाली नहीं हैं. हमारी शांति प्रियता को अब हमारी कमजोरी और कायरता समझा जाने लगा है. इस छवि को जल्द से जल्द बदला जाये.

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

अबकी बार मार के देख....

भारत के बड़े लोकप्रिय प्रधानमंत्री हुए अटल बिहारी वाजपेयी. सत्ता में आने से पहले देश को उनसे जरुरत से ज्यादा उम्मीदें थीं. अपने कार्यकाल में उन्होंने एक बड़ा बढ़िया बयान दिया था- "पाकिस्तान हमारे सब्र का इम्तिहान न ले, सब्र का प्याला भर गया तो अंजाम अच्छा न होगा....". इस बयान में अपने देश की लाचारी साफ़-साफ़ झलकती है.  वो दिन था और आज का दिन है भारत का सब्र का प्याला आज तक नहीं भरा है. देश की आज़ादी से लेकर आज तक कितनी ही सरकारें आई और चली गयीं. लेकिन उनके सब्र का बांध भाकड़ा-नागल बाँध से भी मजबूत था. कभी नहीं टूटा. गाल पर तमाचे पर तमाचे खाए, आम जनता मरती रही, पिसती रही, लेकिन कभी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. कही वोट बैंक आड़े आया तो कभी ऊपरी दवाब. 

छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने  अब ऐसा थप्पड़ मारा है जो किसी भी गैरतमंद देश की सरकार की नींद तोड़ने के लिए काफी है. भारत सरकार के चेहरे पर इस थप्पड़ की पांचों उँगलियों के निशान साफ-साफ छप गए हैं. लेकिन हमको पूरा विश्वास है कि इससे सरकार रवैये पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. देश के गृह मंत्री रटा-रटाया बयान देंगे, जिसमें रीढ़ विहीन सरकार की लाचारी नज़र आएगी. आखिर हो भी क्यों न, जो लोग मरे हैं उनमें सरकारी कर्मचारी भले ही हों लेकिन कोई सरकार में बैठे दिग्गजों का नाते रिश्ते वाला नहीं है न. आम लोग मरे हैं, वो तो मरते ही रहते हैं. उनके मरने से सरकार के काम काज पर कोई फर्क नहीं पड़ता. ७६ मरे हैं, हमारे पास तो सवा सौ  करोड़ हैं.

इससे भी गैरत की बात ये है कि देश का एक तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग नक्सलियों, माओवादियों जैसे लोगों के साथ बातचीत  का पक्षधर है, उनको सही ठहरा रहा है और उनको मुख्या धरा में शामिल करने की बात करता है. इन बुद्धिजीविओं में तमाम बड़े मीडिया संस्थान, बड़े बड़े विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरान, दिग्गज लीडरान शामिल हैं. हमें यकीन है कि छत्तीसगढ़ में इतने बड़े हत्याकांड के बाद भी इन लोगों का समर्थन जारी रहेगा.

आखिर कब तक हम नम्र रुख अख्तियार करे रहेंगे. ऐसे संगठनों और उनके समर्थकों दोनों के खिलाफ अगर कठोर कदम नहीं उठाया गया तो हम इसी तरह के नरसंहार के साक्षी बनते रहेंगे. कम से कम हमें दूसरे देशों से ही कुछ सबक लेना चाहिए. हाल ही में हुए मॉस्को हमले में रूस के प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन जो बयान दिया उसके बाद आतंकी अपने बिलों में घुस गए होंगे. पुतिन ने कड़ा बयान देते हुए कहा कि- एक-एक आतंकी को गटर में से खींच- खींच कर नष्ट किया जायेगा. अमेरिका ने ९/११ हमले के बाद दुश्मन  को उसी के देश में जाकर नष्ट किया और आज भी वहां कब्ज़ा जमाये है. हम तो संसद पर हमला करवाकर भी चुप रहे, होटल ताज में नाक कटवाकर पाकिस्तान के साथ केवल कागज़ी खेल खेल रहे हैं.

हिंसा के खिलाफ इस तरह का नम्र रुख अपनाना न  तो शांति प्रियता है, न अहिंसात्मक उपदेश, ये तो भारत सरकार की केवल कायरता है और डरपोकपन है......  A BLOODY SHAME 

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

क्या आप बोर हो रहे हैं...

अख़बारों में एक विज्ञापन तो सभी ने देखा होगा, अजी वाही वाला जिसमें फ़ोन नंबर दिए हुए होते हैं, साथ में एक कन्या का फोटो ओर बातचीत का खुला निमंत्रण. रसिक मिजाज़ लोग खूब इन नंबरों के झांसे में आते हैं और मोटा बिल भरते हैं. लेकिन अब तक ये अख़बार तक ही सिमित था. जिसकी गर्ज़ थी वही अपनी जेब ठंडी करता था. लेकिन हाय ये पैसे की दौड़, इन्सान को कहाँ ले जाकर पटकेगी पता नहीं. अब मोबाइल कंपनियों ने इन्सान की इस कमजोरी से कमाने का रास्ता अख्तियार कर लिया है. बार-बार फ़ोन करके ग्राहकों को प्रलोभन दिया जा रहा है और नए ग्राहक खोजे जा रहे हैं. उधर से आने वाली एक मादक आवाज आपकी तरफ दोस्ती का हाथ बढा रही है. अगर आप बोर हो रहे हैं तो आपका पूरा मनोरंजन करने का वादा भी कर रही है. और कह रही है कि जब मेरी हंसी इतनी दिलकश है तो मेरी बातें कैसे होंगी. इसके बाद ग्राहक को इस बातचीत के लिए खर्च होने वाली रकम भी बताई जाती है.

दिल्ली आने के बाद मैंने अपना नंबर डीएनडी नहीं कराया था. मेरे आईडिया और वोडा दोनों नंबरों पर दिन में एक-दो बार इस तरह की कॉल आ ही जाती हैं. कॉल तो बहुत आती हैं लेकिन इस कॉल के बारे में लिखना पड़ रहा है. बाज़ार की गिरावट का कोई अंत होता नज़र नहीं आता. पैसे के लिए किसी भी हद तक गिरने की तैयार हैं. कुंठाग्रस्त लोगों के बारे में तो कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन यहाँ बस उन युवाओं के बारे में सोचिये जिनको बहकाना आसान होता है. इस तरह कि कॉल उन को आसानी से पथभ्रष्ट कर सकती है.

कमाई कि ऐसी अंधी दौड़ मची है कि कुछ कहना मुश्किल है. दिल्ली के मार्केट को ओपन माइन्डिड बनाने में अंग्रेजी मीडिया का बड़ा हाथ है. अपना मार्केट ज़माने के लिए हर चीज़ छापी जा रही है. जो कोई ऊँगली उठाये तो उसको रुढ़िवादी, दकियानूसी, आदि आदि शब्दों से अलंकृत कर दिया जाता है. जब कि इस खुलेपन कि जड़ में केवल पैसे कि भूख दबी है, ऊपर से जो भी चाहे प्रदर्शित किया जाये. जब कुछ नहीं मिलता तो सेक्स सर्वे ही छाप दिया जाता है. साथ में कुछ ऐसी तस्वीरें जो किसी का भी ध्यान खीचने का मद्दा रखती हैं. तुर्रा ये कि समाज को ब्रॉड-माइन्डिड बनाया जा रहा है.

इस ब्रॉड-माइन्डिडनेस को फ़ैलाने के पीछे केवल और केवल पैसे की लोलुपता है, जिसे प्रोग्रेसिव सोच का आवरण उढ़ा दिया गया है. 

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

संस्मरण तिलक ब्रिज के...

बात उन दिनों की है जब अपन पत्रकारिता की पढाई पूरी करके नौकरी ढूँढने के अभियान पर थे. हमारे कॉलेज ने एडमिशन के समय जो वादे किये थे वो कोर्स ख़तम होते-होते धराशायी होते नज़र आये. अंततः अपनी क्लास का हर शख्स सड़क पर था, या फिर कुछ ने हायर एजुकेशन के लिए जाना उचित समझा. मुझे कुछ लोगों की ये राय सही लगी कि पत्रकारिता में सीखने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है, पीजी करके भी वही नौकरी मिलेगी जो अब ग्राजुएशन करने के बाद मिल सकती है. तो क्यों दो साल बर्बाद करने. सो अपन निकल पड़े नौकरी की तलाश में. इस अभियान में मेरे साथ अनुज का साथ सबसे ज्यादा रहा. मैं चाचा के यहाँ फरीदाबाद में था ओर अनुज गाज़ियाबाद में. क्योंकि अधिकांश अख़बारों के दफ्तर आईटीओ पर थे इसलिए हम दोनों की मुलाकात अक्सर तिलक ब्रिज स्टेशन पर होती थी. वहीँ से फिर आगे प्रस्थान करते. लोकल यात्रियों के लिए तिलक ब्रिज, शिवाजी ब्रिज और आनंद विहार जैसे स्टेशन खासे अहमियत रखते हैं. देखने में भले छोटे-छोटे हों लेकिन हजारों की संख्या में लोग यहाँ अपनी मंजिल के लिए गाड़ी पकड़ते हैं.  हालाँकि अब आनंद विहार स्टेशन वो वाला आनंद विहार नहीं रहा, जहाँ से गुजरते वक़्त अनुज मुझे कोहनी मारा करता था.

स्टेशन की सीढियों का दृश्य देखने लायक होता था. कोई अपने क्लाइंट से फ़ोन पर उलझ रहा है, तो कोई बिजनेस डील में बिजी है, कोई कागजों में नुक्ताचीनी कर रहा है, तो कहीं एक कोने में बैठे प्रेमी युगल सपनों की दुनिया बुन रहे हैं. सभी को ट्रेन इंतज़ार है, लेकिन कोई चाहता है कि ट्रेन जल्द से जल्द आये और कोई चाहता है कि थोड़ी देर और लगाये. वैसे एनसीआर में चलने वाली ईएमयू में सफ़र का भी अनोखा और अलग ही अनुभव होता है. स्टेशन पर बने पुल के नीचे एक कचौड़ी वाले का ठेला होता था, शायद आज भी लगाता होगा. उसके यहाँ अक्सर अनुज और मैं दो दो कचौड़ी पेलते थे. उस समय हायजिन की चिंता कम और जेब की चिंता ज्यादा सताती थी.  हाँ, बरसात के दिनों में वहां भुट्टों की बहार रहती थी.

मेरा रेल से हमेशा लगाव रहा. यही कारण था कि मेरठ में पत्रकारिता के दौरान मैंने रेलवे बीट को सहर्ष स्वीकार किया जिसे कोई नहीं लेना चाहता था, क्योंकि स्टेशन शहर से बिलकुल बहार था. मुझे हमेशा लगता था कि रेल और रेल के आस-पास अनेक कहानियां बिखरी पड़ी हैं. 
तिलक ब्रिज की ही बात है, एक दिन अपने नॉर्मल रुटीन में स्टेशन पर मैं ट्रेन का इंतज़ार कर रहा था. बैठने की जगह कोई बची नहीं थी सो हाथ में बैग लिए प्लेटफ़ॉर्म पर टहल रहा था. तभी फ़ोन पर बात कर रहे एक लड़के की आवाज सुनकर मैं वहीँ ठिठक गया. उसकी दो-चार बातें सुनकर पूरी स्थिति साफ़ हो गयी. जनाब इश्क में थे और अपनी प्रेमिका से बतिया रहे थे. बातों से साफ़ था कि उनका इश्क आखिरी सांसें ले रहा है. लड़का बार-बार उस तरफ से आ रही पतली सी आवाज को समझाने की कोशिश कर रहा था. लेकिन लड़की को कोई और मिल गया था और वो इन भाई साहब को अब घास नहीं डाल रही थी. लेकिन लड़का सीरियस था. जब लड़की ने एक न सुनी तो उसने झल्लाकर फ़ोन काटा और उसको फ़ोन लगाया जो इस लव ट्राईएंगल का तीसरा कोण था. उसने इस लड़के को सहानुभूति दी, लेकिन ये जनाब जानना चाहते थे कि आखिर इनमें क्या कमी थी.

खैर लम्बी बातचीत के बाद फ़ोन काट दिया गया. लड़का अपना सर पकड़कर बेंच पर ही बैठा रहा. बेंच की दूसरी तरफ एक अधेड़ व्यक्ति बैठा था, जो शर्तिया हरियाणा से   ही था. वो भी मेरी तरह इस लड़के की बातें सुन रहा था. मैं  तो बात सुन कर चुप ही रहा, लेकिन उससे न रुका गया, फट से बोला- 'देख भैया तेरी भलाई इसी में है कि उसको भूल जा और अपनी जिंदगी पर ध्यान दे. ये प्यार-व्यार का चक्कर बुरा है'. उसकी बात सुनकर लड़का झेंप गया और थोड़ी सी मुस्कराहट के साथ वहां से अपना बैग उठाकर आगे की तरफ चला गया. उसके जाने के बाद वह व्यक्ति अपने पास बैठे संगी से फिर बोला 'पता नहीं का हवा चल पड़ी है आज कल. इसका ज्यादा दिमाग ख़राब हुआ तो कहीं आत्महत्या न कर ले'. ये सुनकर मेरा दिमाग चल गया. मुझे उसकी बात में दम लगा. और ट्रेन से बढ़कर आत्महत्या का कोई साधन है भी नहीं. साधन और कारण दोनों मौजूद हैं, कहीं जोश जोश में प्लेटफ़ॉर्म से छलांग न लगा दे.

सो प्लेटफ़ॉर्म पर एकांत की तरफ कदम बढा रहे उस लड़के का मैंने पीछा करना शुरू किया. सोचा कि अगर अभी इसने कोई हरकत की तो दो थप्पड़ में प्यार का भूत उतार दिया जायेगा. लेकिन उसकी चाल ढाल से लगा नहीं कि वो इतना बड़ा कदम उठाएगा. एक दो फास्ट ट्रेनें भी वहां से गुजरीं लेकिन लड़के ने कोई हरकत नहीं की. अपन को लगा कि मामला सेंसिबिल है. वैसे मैं तो थोड़ी देर बाद अपनी लोकल पकड़ कर फरीदाबाद की तरफ लपक लिया. आगे का पता नहीं उसने कुछ किया कि नहीं.

बुधवार, 31 मार्च 2010

बातें ज्यादा, काम कम!


बताया जाता है कि अपने देश में इमरजेंसी के दौरान एक नारा बहुत चला था- "बातें कम, काम ज्यादा!"। इमरजेंसी के डंडे का असर इतना व्यापक था कि सरकारी दफ्तरों में काम-काज का ढर्रा सुधर गया था। कर्मचारियों की सारी नेतागिरी फुर्र हो गयी थी। खैर अपन तो उस समय थे ही नहीं लेकिन इतना जरूर लगता है कि सही मायने में आज इमरजेंसी के इतने सालों बाद भी इस नारे की आवश्यकता है। पूरे देश में चाहे सरकारी विभाग हों या फिर निजी संस्थान, हर जगह बातें ज्यादा हैं ओर काम कम।

जहाँ जाइये वहां बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर अधिकांश फुस्स हैं। जिसे देखो खुद को नंबर-१ होने का दावा कर रहा है। लेकिन असलियत उनको परखने के बाद ही पता चलती है। हर कंपनी के विज्ञापन वाले दावे कुछ और होते हैं और असलियत कुछ और। मिसाल के तौर पर बीमा कंपनियों को लें, बीमा करते वक़्त एकदम गाय की तरह बात करते हैं। और जो अगर क्लेम लेने की नौबत आ जाये तो आपको नाकों चने चबाने पड़ सकते हैं।

किसी कंपनी की वेबसाइट या विज्ञापन देख कर तो ऐसा लगता है मानो इस कंपनी से आदर्श कंपनी कोई नहीं हो सकती, लेकिन असलियत उसके कर्मचारियों को ही पता होती है। वे बेचारे अपनी नौकरी बचने के चक्कर में मुह बंद करे रखते हैं। बाज़ार का इतना बुरा हाल हो चुका है कि मुंह माँगा पैसा देकर भी आपके प्रोडक्ट की कोई गारंटी नहीं। या तो आपकी जान-पहचान हो, या फिर आपके डंडे में दम हो। तभी आप सही चीज़ के हक़दार हैं। चार रूपए के सामान से लेकर चार करोड़ के सामान तक किसी की कोई गारंटी नहीं। ठेले वाले से लेकर ठेकेदार तक सब धोखा देने पर आमादा हैं। पैंठ से लेकर माल तक, गाँव से लेकर महानगरों तक, ऑटो वाले से लेकर दूध वाले तक, डॉक्टर से लेकर इंजिनियर तक, समाज सेवक से लेकर स्वयंसेवक तक कब कौन आपको दिन के उजाले में ठग ले कोई भरोसा नहीं। हर शख्स ने झूठ का आवरण पहन रखा लगता है। सच्चे लोग हिरण्यलोक सिधार गए लगता है।

हम सब जानते हैं कि ऐसा क्यों है, लेकिन हम कुछ नहीं कर सकते। क्योंकि इस परिस्थिति के लिए थोडा बहुत हम सब भी जिम्मेदार हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि ये स्थिति सुधर नहीं सकती। सुधार हो सकता है, ये आसान भी है और जरूरी भी। दिक्कत बस ऊपर बैठे लोगों की नियत के साथ है। उसका इलाज मुश्किल है।

एक कदम स्वदेशी लोकतंत्र की ओर

बाबा रामदेव ने आख़िरकार राजनीती में दखल देने की घोषणा कर ही दी। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वह खुद चुनाव नहीं लड़ेंगे, ये कदम केवल राजनीती की सफाई के लिए उठाया गया है।

बाबा का ये कदम भारत की प्राचीन ऋषि परंपरा की तरफ इशारा करता है, जहाँ शासन के पीछे ऋषियों का मार्गदर्शन होता था। हालाँकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भाजपा को आगे करके ऐसा ही प्रयोग करने की कोशिश की थी। लेकिन भाजपा के हाथ में जैसे ही सत्ता आई वह न केवल संघ के सिद्धांतों को भूल गयी, बल्कि सत्ता लोलुपता की पराकाष्ठा को लाँघ गयी। पार्टी के इस रूप परिवर्तन से संघ का भाजपा से मोह भंग हो गया। संघ ने अपनी तरफ से भरसक प्रयास कर के देख लिए लेकिन पार्टी में पद का लोभ इस कदर बढ़ चूका है कि उसका उबर पाना मुश्किल लगता है।

अब ऐसा ही कुछ प्रयास बाबा रामदेव करने जा रहे हैं। अपने कार्यकर्ताओं को संसद तक पंहुचा कर वे इंडिया में भारत का निर्माण करने का सपना देख रहे हैं। बाबा का सपना तो अच्छा है, उनके पास दूरदर्शिता भी है, विकास के भारतीय मॉडल का ब्लूप्रिंट भी है, लेकिन देखने वाली बात ये है कि २०१४ में लोग उनके संगठन को कितना स्वीकारते हैं। और अगर स्वीकार भी लिया तो बाबा के कार्यकर्ता संसद पहुचकर कहीं भाजपा की तरह अपना रूप तो नहीं बदल लेंगे।

वैसे बाबा के मैदान में आने की खबर से बाकी पार्टियों का तो पता नहीं, सबसे ज्यादा भाजपा की ही हवा ख़राब है। क्योंकि बाबा ने मोटे तौर पर वही लाइन पकड़ी है, जिसको भाजपा ने सत्ता मिलने पड़ने पर भुला दिया था। इसमें कोई दो राय नहीं है कि बाबा की पार्टी सबसे ज्यादा भाजपा को ही नुकसान पहुंचाने वाली है।

गुरुवार, 25 मार्च 2010

वह कौन है जो सच में सुखी है?


महाभारत के यक्ष प्रश्नों से हम सभी परिचित हैं। वही प्रश्न जिनके उत्तर युधिष्ठिर ने अपने भाइयों की जान बचाने के लिए यक्ष को दिए थे। उनमें से एक प्रश्न और उसका उत्तर बड़ा कमाल का था।
यक्ष ने पूछा :
वह कौन है जो सच में सुखी है?
युधिष्ठिर ने इसका जवाब कुछ इस प्रकार दिया:
सच्चा सुखी वही है जो अपना खाना स्वयं पकाता है (यानि किसी दुसरे पर आश्रित नहीं है)। जो कर्जदार नहीं है (यानि जिसके खर्च उसकी कमाई से अधिक नहीं हैं )। और जिसे अपनी जीविका के लिए घर छोड़कर बहुत दूर जाने की जरुरत नहीं है (यानि भौतिक सुखों के लिए जो जरुरत से ज्यादा श्रम नहीं करता)।

अब मज़ेदार बात ये है कि इस आधार पर देखा जाए तो आज संसार का कोई भी प्राणी सुखी नहीं हैक्योंकि महानगरीय जीवन शैली में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो अपना खाना स्वयं पकाता हो (होटल, रेस्तरां, टिफिन सिस्टम, पैकेट फ़ूड जिंदाबाद ), जिसके ऊपर कर्जा न हो (क्रेडिट कार्ड, ईजी लोन जिंदाबाद ) और जो धनवान बन ने के लिए अपना घर छोड़ने कि ख्वाइश न रखता हो। यानी न्यूनतम लोग अपना खाना खुद पकाते हैं, हर व्यक्ति कर्जदार है और अधिकांश लोगों की संतानें धन कमाने के लिए घर से बहार पड़ी हैं। चाहे अपने देश में हों या फिर विदेश में।
युधिष्ठिर की बात मानें तो फिर संसार में अधिकांश लोग दुखी हैं। जो सुख उनके चेहरे और रहन-सहन से झलकता है वह वास्तविक सुख न होकर एक छद्म सुख है, जो अंततः उनको दुःख की ओर ले जा रहा है। शास्त्रों में कई बातें सहज ढंग से समझा दी गयी हैं। लेकिन विकास के अमरीकी मॉडल के सामने इन महत्वपूर्ण बातों को नज़रंदाज़ किया जा रहा है।

युधिष्ठिर के जवाब में खुशियों के तीन सूत्र छिपे हैं:-
१: इन्सान को आत्मनिर्भर होना चाहिए। पराधीनता में दुःख है।
२: आय से ज्यादा खर्च करने वाला जीवन में सुख का अनुभव नहीं कर सकता।
३: भौतिक सुखों के पीछे इतना मत दौड़ो कि अपने पीछे छूट जाएँ।
महात्मा गाँधी ने जब स्वतंत्र भारत की कल्पना की थी तो इन बातों का ख्याल किया था। उन्होंने ने ग्राम स्वराज का नारा दिया था। वो चाहते थे कि देश का विकास गाँव से शुरू हो। देश का हर गाँव अगर सशक्त होगा तो देश कि जडें मजबूत होंगी। उन्होंने सादा जीवन शैली अपना ने पर बल दिया था। लेकिन आज़ादी के बाद गाँधी के सिद्धांतों को सब भूल गए और उलटे विकास की गंगा बहाई गयी। पूरा ध्यान शहरों के विकास पर दे दिया गया। गाँव पिछड़ते चले गए। जिसका नतीजा पलायन के रूप में आज हमारे सामने है। गाँव खाली हो रहे हैं और शहर भरते चले जा रहे हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री को ये तक कहना पड़ा कि दिल्ली अब और लोगों का भार नहीं झेल सकती। ये बिना सोचे समझे शुरू किये गए विकास का नतीजा है। हमने पश्चिम का अन्धानुकरण किया। बिना अपने देश की परिस्थितियों पर विचार किये। अपने देश में भरे ज्ञान को हमने जान-बूझकर नज़रंदाज़ किया। इसके परिणाम स्वरुप आज पूरा देश बाज़ार बन गया है। पैसे की अंधी दौड़ में हम केवल जीने का अभिनय कर रहे हैं। हम कितने खुश हैं ये तो हमारा दिल जानता है।

युवाओं का बदलता मनोविज्ञान: नौकरी से आगे बढ़कर “स्वनिर्माण” की ओर

भारत का युवा एक मानसिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। कुछ वर्ष पहले तक एक अच्छी नौकरी - विशेषकर सरकारी नौकरी या किसी बड़ी...