बुधवार, 14 मई 2014

अच्छे दिन आने वाले हैं!

जब मैंने सितंबर 2013 में भाजपा को 210 से 249 सीटें मिलने का दावा किया था तो आॅफिस में अधिकांश लोगों ने हंसी में उड़ा दिया था। लेकिन आज अधिकांश एग्जिट पोल यही बता रहे हैं कि भाजपा अकेले अपने दम पर 250 तक जा सकती है। वैसे मोदी के आने की आहट मात्र से ही तमाम लोगों के सुर बदले-बदले लग रहे हैं। कल तक जो खबरिया चैनल मोदी के विरोध में एक सेट एजेंडे के तहत लंबे-लंबे कार्यक्रम प्रसारित करते थे, आज उनके गुण गाते नहीं थक रहे। खैर, कांग्रेस के खिलाफ लंबे समय से पनप रहा लोगों का जबरदस्त गुस्सा 16 मई के परिणामों के तौर पर सामने आएगा। परिणाम थोड़े इधर-उधर हो सकते हैं, पर भाजपा की सरकार बननी तय लग रही है। पूरे चुनाव के दौरान कांग्रेस कहीं भी मुकाबले में नजर नहीं आई। मोदी ने तकरीबन हर मोर्चे पर अपने विरोधियों से बाजी मारी। मोदी ने प्रचार के दौरान जन-जन को छुआ हर पहलू हो छुआ। हर चीज के पीछे जबरदस्त होमवर्क दिखा। भाषण, चाय पे चर्चा, थ्री डी हाॅलोग्राम, विशाल रैलियां, डेªसिंग सेंस, विस्फोटों के बीच हौसला, गर्म पानी पी-पी कांग्रेस को कोसना, वराणसी का चुनाव, ये सब लोगों को खूब भाया। एक सीनियर सिटीजन नरेंद्र मोदी ने तीन लाख किलोमीटर की यात्रा करके देश भर में 440 रैलियों को संबोधित किया। एक-एक दिन में छह-छह रैलियों को संबोधित किया, इतनी ऊर्जा अच्छे-अच्छे नौजवानों में भी देखने को नहीं मिलती।

सही समय पर सही चुनाव

सही समय पर भाजपा द्वारा मोदी को अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना पार्टी के लिए सबसे फायदेमंद सिद्ध हुआ। यदि ये निर्णय सही वक्त पर न लिया गया होता तो शायद तस्वीर कुछ दूसरी होती। इसके अलावा मोदी द्वारा उत्तर प्रदेश में अमित शाह को प्रभारी बनाकर भेजना सटीक फैसला रहा। अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में तकरीबन मृत पड़े कैडर में नई जान फूंकने का काम किया। वरना सपा और बसपा के क्षेत्रीय मकड़जाल में फंसी भाजपा के फिर से खड़े होने के आसार कम थे। इसके अलावा मोदी के लिए वाराणसी सीट का चुनाव भी एक सोचा-समझा फैसला रहा। मोदी का उत्तर प्रदेश आ जाने से कार्यकर्ताओं का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंच गया। जिसका असर परिणामों में साफ नजर आएगा।

डबल बेस का तवा

बाजार में जब आप बर्तन लेने जाते हैं तो दुकानदार अक्सर बर्तन दिखाते हुए बताता है कि साहब ये डबल बेस का तवा है, या कढ़ाई है या भगौना है। इसी तरह भाजपा भी एक डबल बेस की पार्टी है। एक इसका अपना बेस है और दूसरा संघ का। वैसे तो संघ के कार्यकर्ता हर चुनाव में भाजपा के समर्थन में अपना योगदान देते हैं, लेकिन इस चुनाव में जीत दर्ज कराने के लिए संघ ने अपनी जबरदस्त रणनीति और संगठनात्मक ताकत लगाई। अर्थ ये हुआ कि अगर दोनों संगठनों के कार्यकर्ता पूरी ताकत के साथ जुटे हैं तक इस मुकाम तक पहुंच पाए हैं कि जीत निश्चित लग रही है। भविष्य के चुनावों के लिए इस केमिस्ट्री को और ज्यादा शक्तिशाली बनाया जा सकता है। लेकिन वाजपेयी सरकार के दौरान दोनों संगठनों के रिश्ते बहुत अच्छे नहीं रह पाए थे, इस बार क्या होगा ये वक्त बताएगा।

मोदी के समक्ष चुनौतियां

खराब अर्थव्यवस्थाः भारत के खराब आर्थिक हालातों को सुधारना मोदी सरकार के लिए सबसे पहली चुनौती होगा। आर्थिक सशक्तिकरण की अपेक्षा कुछ इस तरह की जाएगी कि उससे महंगाई की मार पहले से झेल रही जनता पर कोई असर न पड़े। हालांकि शेयर बाजार ने तो मोदी को आने से पहले ही सलामी देनी शुरू कर दी है।

भ्रष्टाचारः अब जब इस बार के चुनाव में भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा रहा और देश में भी भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त हवा बह रही है, ऐसे में मोदी के लिए अपनी सरकार में भ्रष्टाचार को रोकना और एक साफ-सुथरी विकासशील शासन प्रदान करना बड़ी चुनौती होगी। साथ ही पुराने भ्रष्टाचार के मामलों का भी शीघ्र निपटान किया जाए। ध्यान रहे कि जिस आम आदमी पार्टी के लिए भ्रष्टाचार सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है, वह भी गाहे-बगाहे सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी।

विशाल जनअपेक्षाएंः मोदी को जिस तरह की मीडिया कवरेज मिली, उन्होंने जिस तरह का विकास माॅडल लोगों के बीच रखा और अब चैनल जिस तरह से उनको करिश्माई पुरुष की तरह पेश कर रहे हैं, इससे देश में विशाल जन अपेक्षाएं बन गई हैं। इन जन अपेक्षाओं पर खरा उतरना मोदी के लिए बहुत बड़ी चुनौती होगा। वाजपेयी सरकार ने भी अपने सात साल के शासन में विकास के कई कीर्तिमान स्थापित किए थे, वाजपेयी ने ही देश को विश्वास दिलाया था कि 2020 तक भारत एक विकसित राष्ट्र होगा, लेकिन फिर भी 2004 में वाजपेयी सरकार को हार का मुंह देखना पड़ा।

भाजपा का कांग्रेसीकरणः भाजपा पर हमेशा ये आरोप लगते रहे हैं कि जब भी भाजपा सत्ता में आती है उसके कामकाज का ढर्रा कांग्रेस के जैसा ही हो जाता है। भाजपा की सरकार नई बोतल में पुरानी शराब सरीखी दिखती है। इसलिए मोदी को कुछ ऐसा करना होगा जिसका असर आम लोगों को जीवन में स्पष्ट नजर आए।

शाही या सादगी भरी सरकारः नए प्रधानमंत्री को ये भी देखना होगा कि सरकार की कार्यशैली में अहंकार और शाही तामझाम कम नजर आए। सरकारी खर्च को कम करके आम लोगों से सीधे जुड़ने का प्रयास किया जाए। भाजपा इससे पहले प्रमोद महाजन के समय में फाइव स्टार कल्चर आजमा कर देख चुकी है, जिसे आम लोगों के बीच बिल्कुल पसंद नहीं किया गया था। आम आदमी पार्टी की कम समय में बड़ी सफलता प्राप्त करने के पीछे यही कारण है कि उसने सादगी अपनाकर सीधी लोगों से जुड़ाव बनाया। संघ भी राजनीति में सादगी का प्रबल समर्थक है।

भाजपा-संघ संबंधः मोदी के लिए भाजपा और संघ के बीच मधुर संबंध बनाए रखना भी एक चुनौती होगा। वैसे प्रधानमंत्री पद के लिए खुद संघ ने ही मोदी को पसंद किया है, लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद इस पसंद को कायम रखना मोदी के हाथ में है। राष्ट्र निर्माण के लिए संघ का अपना एक नजरिया है, लेकिन केंद्र सरकार में बैठी भाजपा की अपनी मजबूरियां। अब देश की भावी सरकार संघ के साथ किस तरह तालमेल बैठाएगी ये देखने वाली बात होगी।

बाबा रामदेवः बाबा रामदेव ने मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए न केवल खुलकर समर्थन किया बल्कि अपने भारत स्वाभिमान के कार्यकर्ताओं की ताकत को भी भाजपा के पीछे खड़ा कर दिया। खुद बाबा ने पूरे देश में घूमकर कांग्रेस के खिलाफ प्रचार किया। रामलीला मैदान में हुए अपने अपमान के खिलाफ बाबा ने चाणक्य की तरह कांग्रेस को खत्म करने का बीड़ा उठाया है। लेकिन बाबा इस जीत में अपना श्रेय अवश्य लेना चाहेंगे। साथ ही सरकार बनने के बाद विदेश में जमा काले धन के मुद्दे पर बार-बार हस्तक्षेप करेंगे।

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

स्टिंग आॅपरेशन और एक दिन की नैतिकता!

"There are well known instances of bad journalism, like unfair reporting, pronouncement of guilt without fair trial , invasion of privacy, insensitive portrayal of victims." -N Ravi, Editor, The Hindu (July 6, 2012)

एक दौर था जब पत्रकारिता तीक्ष्णता और बुद्धिमत्ता का काम था। समय बदला और पत्रकारिता धीरे-धीरे टीआरपी और सर्कुलेशन का नाम हो गया। जितनी ज्यादा टीआरपी और सर्कुलेशन उतने ज्यादा विज्ञापन, जितना ज्यादा विज्ञापन उतनी ज्यादा इनकम। भारत में प्रिंट मीडिया का इतिहास खासा पुराना है, सो कुछ अखबारों को अगर छोड़ दिया जाए तो अधिकांश अखबारों ने फिर भी पत्रकारिता की गरिमा को बचा रखा है। लेकिन इलेक्ट्राॅनिक मीडिया में 24 घंटे वाले खबरिया चैनल अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए नित नए हथकंडे आजमा रहे हैं। इनमें स्टिंग आॅपरेशन भी एक ऐसा ही हथकंडा है, जो चैनल को कुछ समय के लिए अच्छी टीआरपी दिला देता है।

इन स्टिंग आॅपरेशनों ने किसी को नहीं बख्शा है- नेता, संत, महात्मा, डाॅक्टर, ब्यूरोक्रेट, काॅरपोरेट, बाॅलीवुड, टीचर, प्रोफेसर सब इसकी जद में आ चुके हैं। देश में राजनीतिक और धार्मिक स्टिंग आॅपरेशन सबसे ज्यादा बिके हैं। पर यहां मौलिक प्रश्न यही उठता है कि स्टिंग आॅपरेशन करके दूसरे पर कीचड़ उछालने वाले खुद कितने दूध के धुले हैं। स्टिंग आॅपरेशन के दौरान नैतिकता की बार-बार दुहाई देने वाले खुद कितने नैतिक हैं। सच पूछा जाए तो नैतिकता का आधार इतना ऊंचा है कि अगर हर चीज में नैतिकता को ही आधार बना दिया जाए तो देश के तमाम व्यवसायिक संस्थान और व्यवस्थाओं को चलाना असंभव है। शायद की कोई ऐसा पेशा है जिसे विशुद्ध नैतिकता के आधार पर चलाया जा सकता है। नैतिकता हर मोड़ पर आपके सामने अपने प्रश्न लेकर खड़ी मिलेगी। इसलिए कई बार आपको व्यवहारिकता की राह पकड़नी होती है। देश की कानून व्यवस्था कुछ ऐसी है कि घर से निकलने से लेकर अपने आॅफिस पहुंचने तक आप जाने-अनजाने तमाम नियम तोड़ते हैं। पर व्यवहारिक दृष्टि से उनको नजरंदाज किया जा सकता है। लेकिन स्टिंग आॅपरेशन करने वाले उस दिन नैतिकता का ऐसा पैमाना लेकर स्टूडियो में बैठते हैं कि सामने वाले को विश्व का सबसे बड़ा अपराधी और खुद को स्टिंग करने वाला सबसे बड़ा वीर घोषित कर डालते हैं। अगर चैनल नैतिकता के लिए इतने ही ज्यादा मचल रहे हैं तो फिर विज्ञापन लेने में नैतिकता को आधार क्यों नहीं बनाते, पेड न्यूज का काॅन्सेप्ट क्यों तेजी से फल-फूल रहा है। सही मायने में तो ये चैनल द्वारा ओढ़ी गई एक दिन की नैतिकता होती है, जिसका वे चिल्ला-चिल्लाकर ढोल पीटते हैं।

वास्तव में स्टिंग आॅपरेशन विश्वासघात का खेल है, जिसमें आप दूसरे को अपना बनाकर उसकी पीठ में छुरा भोंकते हैं। लेकिन इस स्टिंग को जनहित में बताकर नैतिकता के दायरे के अंदर धकेल दिया जाता है। देश में टीवी पत्रकारिता के उदय से लेकर अब तक तमाम स्टिंग आॅपरेशन किए गए, उसमें चैनल का पहला उद्देश्य जनहित के बजाय अपनी टीआरपी बढ़ाना था। लेकिन उस स्टिंग को परोसा कुछ इस तरह जाता है कि मानो उस चैनल से ज्यादा जनहितकारी संसार में कोई नहीं। भले ही स्टूडियो से उठने के बाद एडिटर महोदय खुद सेटिंग और गेटिंग का खेल खेलते हों, लेकिन कैमरे के सामने उनसे बड़ा नैतिकतावादी दूसरा कोई नहीं। खबरें किस तरह दबाई और भड़काई जाती हैं, कई संस्थानों के साथ काम करने के बाद इसका मुझे खूब अनुभव है। खबर को लिखते और पेश करते वक्त एक पत्रकार जितना शुद्धतावादी दिखता है, असल जिंदगी में उतना होता नहीं। लेकिन दूसरों से उसकी अपेक्षा ये रहती है कि नैतिकता की नंगी तलवार पर चलकर दिखाए।

भारतीय रेल में सफर के दौरान पहले एक परंपरा थी, लोग अपना खाना बांटकर खाते थे। अगर किसी का बच्चा भूखा रो रहा है, तो सहयात्री अपना खाने का डिब्बा खोलकर उसकी भूख मिटाने में देर नहीं लगाता था। इस परंपरा में जहरखुरानों को एक सुनहरा मौका नजर आया और उन्होंने यात्रियों को नशीला पदार्थ खिलाकर लूटना शुरू कर दिया। इसका नजीता यह हुआ कि आज रेल में कोई अपना खाना नहीं बांटता। मुझे लगता है कि ये स्टिंग आॅपरेशन समाज में थोड़े से बचे विश्वास को भी खा जाएंगे। 

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

तेंदुआ आया तेंदुआ आया!

मेरठ शहर में तेंदुआ घुस आया है। उसने कैंट जनरल हाॅस्पिटल को अपना ठिकाना चुना है। मेरठ पुलिस की पूरी फोर्स और आर्मी के जवान अपनी पूरी ताकत झोंकने के बावजूद अभी तक उसे पकड़ने में नाकाम साबित हुए हैं। मीडिया फोटोग्राफरों और कैमरामैनों के लिए ये एक लाइफटाइम फोटो आॅपोच्र्युनिटी है। इसलिए वे अपनी जान पर खेलकर भी इस तेंदुए को अपने कैमरे में कैद करना चाहते हैं। आम लोगों को मजमा लगाने का नया ठिकाना और बातें छौंकने का नया मुद्दा मिल गया है। और बच्चों को स्कूल से छुट्टी मिल गई है। अब तक कई लोग जख्मी हो चुके हैं। सो, अब इस तेंदुए का बचना मुश्किल है। मनुष्य अपने खून का बदला जरूर लेगा। ये खून अगर आपसी लड़ाई में बहा होता तो एक बार को बदला छोड़ भी दिया जाता, लेकिन एक पिद्दी से जानवर की इतनी हिम्मत की इंसान का खून बहाय! इस जानवर को सबक सिखाकर ये बताना जरूरी है कि मनुष्य ने अब बहुत विकास कर लिया है, धरती का कोई भी जानवर अब उससे ज्यादा शक्तिशाली नहीं है।

आखिर क्यों
ऐसी घटनाएं पहले भी सामने आ चुकी हैं, और हर ऐसे मौके पर उपदेश दिया जाता है कि मनुष्य जब जानवरों के इलाके में घुसेगा तो जानवरों को भी मनुष्य के इलाके में घुसने को मजबूर होना पड़ेगा। इस प्रकार की घटनाओं में या तो मनुष्य खुंखार जानवर को मौत के घाट उतारकर अपनी वीरता और सक्षमता को स्थापित कर देता है या फिर खुद जानवर अपनी जान बचाकर भाग जाता है। अब हो ये रहा है कि जंगली जानवरों द्वारा मनुष्य के क्षेत्र में अतिक्रमण की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। हालांकि जंगली जानवर बिल्कुल नहीं चाहते कि मनुष्य के इलाके में घुसें, उन्हें तो अपने जंगल में ही मजा आता है, लेकिन उनके हरे-भरे जंगलों में अब कंक्रीट के जंगल खड़े होते जा रहे हैं। लिहाजा जानवर अब अंदाजा नहीं लगा पा रहे कि कब वो भटककर कंक्रीट के जंगल में पहुंच जाते हैं।

हस्तिनापुर वन्यक्षेत्र
मेरठ से सटा हस्तिनापुर वन्यक्षेत्र तमाम तरह की प्रजातियों का घर है। यहां तकरीबन 350 तरह की पक्षियों की प्रजातियां चिन्हित की जा चुकी हैं। इसके अलावा कई प्रकार के स्तनधारी, सांप, तितलियां, तेंदुए, हिरण, जंगली बिल्ली, गीदड़, लोमड़ी, जंगली सुअर, अजगर, घडि़याल और डाॅलफिन भी इस क्षेत्र में पाए जाते हैं। इस पूरे वन्यक्षेत्र पर इन समस्त प्रजातियों का प्रथम हक है और वही यहां की मालिक हैं। लेकिन इंसान ने तेजी से इनके इलाके में अतिक्रमण किया है। खुद वन विभाग की मिलीभगत से पेड़ों का अवैध कटान कर क्षेत्र को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। गंगा नदी से सटे वेटलैंड पर आसपास के किसान जमकर पटान कर रहे हैं, जिससे वेटलैंड में पाए जाने वाली प्रजातियां नष्ट होने की कगार पर हैं।

विकास और संतुलन
विकास की अंधी दौड़ में हम प्रकृति का जमकर दोहन कर रहे हैं। विकास होना जरूरी है, लेकिन आंखें बंद करके नहीं होना चाहिए। अभी तक जिन भी क्षेत्रों में आधारभूत विकास को बढ़ावा दिया वहां इतना अंधाधुंध विकास कर दिया गया कि वहां की प्रकृति को छिन्न-भिन्न कर दिया गया। विकास का कोई चेक-डैम नहीं बनाया जाता। विकास आया, पैसा आया, पैसी की भूख आई और उस भूख के लिए प्रकृति तहस-नहस कर दी गई। अभी पिछले ही साल उत्तराखंड में प्रकृति ने भारी तबाही मचाकर पूरे क्षेत्र को साफ कर दिया। उत्तराखंड में पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर पहाड़ों पर प्रकृति के साथ जबरदस्त छेड़छाड़ आज भी जारी है। और भविष्य के लिए खतरा जस का तस मुंह बाय खड़ा है। जबकि इन घटनाओं में सिर्फ एक ही संदेश छिपा होता है कि ‘चेत जाओ और भविष्य के लिए सबक लो’।

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

केजरीवाल की 'काइयां राजनीति'

अंग्रेजी अखबारों में लिखा जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल ‘‘श्रूड पाॅलिटिक्स’’ कर रहे हैं। शब्दकोष पर सर्च करें तो हिंदी में ‘श्रूड’ का अर्थ आता है-चतुर, चालाक, धूर्त या तीक्ष्ण। लेकिन अंग्रेजी के श्रूड शब्द के लिए हमारे इलाके में हिंदी का एक बेहद सटीक शब्द प्रचलित है और वो है- काइयां या काइयांपन। अरविंद केजरीवाल की राजनीति पर हिंदी में ‘काइयां राजनीति’ सबसे ज्यादा फिट बैठता है। अपने 49 दिनों के कार्यकाल में उन्होंने कुछ खास किया न धरा, पर सुर्खियां जमकर बटोरीं। लोगों को लगता था कि एक नए मिजाज का निजाम मिला है, कुछ बदलाव लाएगा। निजाम ने बदलाव की बातें तो खूब कीं, लेकिन बदलाव ला नहीं पाया। और ऐन मौके पर जनता को दुराहे पर छोड़कर मैदान छोड़ गया।

चलना मेरा काम नहीं अड़ना मेरी शान
यदि अरविंद केजरीवाल के हिसाब से चला जाता तो आज वह लोकपाल बिल भी नहीं पास हो पाता जो संसद में पास हुआ। अन्ना ने उस बिल पर खुशी जताई लेकिन केजरी को खुश करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था। ये केजरीवाल का अडि़यल रुख ही था जिसकी वजह से बिल पास होने में देर लगी। कम से कम आज देश को लोकपाल मिलने का रास्ता तो साफ हुआ, उसमें परिवर्तन तो बाद में भी किए जा सकते हैं। केजरीवाल की बातों में केवल शिकायत ही शिकायत होती है, मानों उन्हें हर चीज से प्राॅब्लम है। गणतंत्र दिवस परेड से प्राॅब्लम, राष्ट्रपति से प्राॅब्लम, प्रधानमंत्री से प्राॅब्लम, अदालत से प्राॅब्लम, जज से प्राॅब्लम, पुलिस से प्राॅब्लम, मीडिया से प्राॅब्लम, बिजली से प्राॅब्लम, पानी से प्राॅब्लम, घर से प्राॅब्लम, लाल बत्ती से प्राॅब्लम। और जब इन समस्याओं को सुलझाने के लिए दिल्ली की जनता ने उन्हें सत्ता प्रदान की तो वो और ज्यादा प्राॅब्लम पैदा करने लगे। 

कैमरे की भूख
49 दिनों तक उन्होंने हर रोज नई घोषणा की, लेकिन किसी भी एक घोषणा को अंजाम तक नहीं पहुंचा पाए। जितने भी दिन आपको काम करने के लिए मिले थे, उनमें भी आपने ज्यादातर समय धरना देने में गंवा दिया। ऐसा लगा मानो उनको हर वक्त मीडिया अटेंशन की जरूरत है और उन्होंने मीडिया का जमकर दोहन भी किया। उनके कंधों को हर वक्त मीडिया के सहारे की जरूरत दिखाई दी। इससे यही लगा कि वो काम करने के बजाय उसे दिखाना ज्यादा चाहते थे, यानि नापो ज्यादा फाड़ो कम। आप तो निकल लिए, पर अब उन लोगों का क्या होगा जिन्होंने आपके कहने पर बिजली के बिल जमा नहीं किए। आपने लोगों को ऐसे सब्जबाग आखिर क्यों दिखाए जो आप पूरे नहीं कर सकते थे?

आरोपों की राजनीति
पहले से खिंची किसी भी लकीर को छोटा करने के दो ही तरीके होते हैं। या तो उस लकीर को मिटाकर छोटा करो या फिर उसके बगल में एक बड़ी लकीर खींच दो। केजरीवाल ने एक बड़ी लकीर खींचने के बजाय पुरानी लकीर को मिटाकर छोटा करने के फाॅर्मूला अपनाया। जिस शक्ति से उन्हें दिल्ली की जनता के जीवन में परिवर्तन के लिए इस्तेमाल करना चाहिए था, उन्होंने वो सारी शक्ति दूसरों को फंसाने, उन पर आरोप लगाने और नए-नए खुलासे करने में झोंक दी। मोहल्ला सभा और जनलोकपाल दोनों का विचार बहुत अच्छा था, लेकिन केजरीवाल खुद को इतना बड़ा समझने लगे कि वो सारे नियमों को ताक पर रखकर इन दोनों विधेयकों को पास करने चल दिए। उनके हिसाब से पूरा विपक्ष भ्रष्ट और चोर है, लेकिन एक अल्पमत सरकार को विपक्ष की हर मोड़ पर जरूरत होती है। पर केजरीवाल को पूरा विपक्ष अपनी ईमानदारी के सामने सिर्फ एक कुकरमुत्ता नजर आया। और यही कुकरमुत्ते विधानसभा में उन पर भारी पड़े।

लोकसभा की तैयारी
इस्तीफे के कदम से यही बात साफ होता है कि केजरीवाल की पूरी नजर लोकसभा चुनाव पर है। वो दिल्ली में बिना कुछ किए सीधे संसद पहुंचना चाहते हैं। अगर वो इन स्वराज और जनलोकपाल बिलों के लिए गंभीर होते तो हर संभव प्रयास करके इन्हें पास करवाते। भले ही उन्हें विपक्ष के सामने झुकना पड़ता। पर उन्होंने तो राज्यपाल, संविधान, विपक्ष, सबको बौना जताकर अपनी अलग राह चुनी। बात-बात पर ईमानदारी की दुहाई देने वाले केजरीवाल की सच्ची ईमानदारी इसी में थी कि वो हर परिस्थिति में दिल्ली की जनता का साथ निभाते, बीच सफर में लोगों को यूं अकेला छोड़कर चले जाना बेइमानी ही है। संसद की चाह में उन्होंने जनता की सेवा करने का एक सशक्त माध्यम खो दिया। उनके 49 दिनों के कार्यकाल को देखकर ये अंदाजा लगाना मुश्किल था कि वो चाहते क्या हैं। पूरा कार्यकाल कंफ्यूजन से भरा दिखा। बहुत पहले मुंबइया फिल्मों में एक गाना आया था, उसको अगर केजरीवाल के लिए गाया जाए तो कुछ इस तरह गाना होगा-

तुम सा कोई सच्चा कोई मासूम नहीं है,
क्या चाहते हो तुम खुद तुम्हें मालूम नहीं है.… 

शनिवार, 18 जनवरी 2014

एक था आम आदमी!

एक बार एक आम आदमी था। एक दम आम, खास होने के दूर-दूर तक कोई लक्षण नहीं। सादगी से जीवन जीता, दिन भर मेहनत करता, दो वक्त की रोटी कमाता और रात को चैन की नींद सोता। मनोरंजन के लिए उसके पास ज्यादा कुछ नहीं था, अपने तीज-त्योहार और कुछ लोक गीत। कभी-कभार सिनेमा भी देख आता था। उसकी दाल-रोटी आराम से चल रही थी। उसकी जरूरतें भी ज्यादा नहीं थीं।

फिर अचानक उसकी भेंट रेडियो नामक यंत्र से हुई। देश दुनिया की खबरें और फिल्मी गाने सुनने के लिए ये यंत्र उसको बढि़या लगा। थोड़े पैसे जोड़कर वो इस यंत्र को अपने घर ले आया। शाम को जब ये आम आदमी काम के बाद लौटता तो रेडियो पर खबरें सुनकर अपनी जानकारी बढ़ाता। रेडियो की खबरें सुनकर उसकी अपनी भी राय बनने लगी। उस पर प्रसारित होने वाले फिल्मी गानों की गीतमाला की उसे आदत सी पड़ गई। जिंदगी में छोटी-मोटी परेशानियां तो थीं, लेकिन आम आदमी टेंशन में कभी नहीं आता था। साधारण दाल-रोटी खाकर भी उसका स्वास्थ्य ठीक था।

समय बीता और आम आदमी को पता चला कि टीवी नामक यंत्र भी देश के शहरों में पांव पसारने लगा है। इस यंत्र पर आप गाने सुनने के साथ-साथ देख भी सकते हो। नाायक और नायिका टीवी पर नाचते हुए दिखते हैं। घर के घर में बैठे सिनेमा भी देख लो। यंत्र थोड़ा महंगा था, फिर भी आम आदमी पैसे जोड़-जोड़ कर जैसे-तैसे एक ब्लैक एंड व्हाइट टीवी घर में ले ही आया। बच्चों और पत्नी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पूरा परिवार बड़ी खुशी से टीवी पर रामायण, महाभारत सीरियल, चित्रहार और फिल्म देखता। आम आदमी को समाचार देखने का भी शौक था। समाचार से ही उसको पता चलता कि हमारी सरकार देश के प्रति कितनी चिंतित है। वो रोज दूरदर्शन पर प्रधानमंत्री के बयान सुनता। टीवी पर दिखने वाले तमाम नेताओं का आभामंडल उसको खासा आकर्षित करता। उसका भी मन होता कि काश वो भी उन्हीें की तरह बड़ा आदमी होता। 

खैर, टीवी देखकर ही उसको पता चला कि वो दुनिया से कितना पीछे चल रहा है। वो अभी तक घड़े का पानी पीता है, जबकि बाजार में फ्रिज आ चुका है। वो मंजन करता है जबकि दांतों को मोतियों की तरह चमकाने वाला पेस्ट बाजार में मौजूद है। पत्नी रद्दी से साबुन से कपड़े धोती है जबकि बाजार में साबुन की ऐसी नीली टिकिया आ चुकी है जो उसकी साड़ी को पड़ोसन की साड़ी से ज्यादा सफेद बना देती है। पत्नी का रंग इसलिए सांवला है क्योंकि वो गोरापन बढ़ाने वाली क्रीम नहीं लगाता। बच्चों को भी पता चल गया कि दूध ऐसे ही नहीं पीना चाहिए इसमें लंबाई बढ़ाने वाला पाउडर डालना चाहिए उससे दूध का स्वाद भी अच्छा लगता है। आम आदमी को लगने लगा कि बेहतर जीवन जीने के लिए घर में ये सब सामान होने जरूरी हैं। पत्नी और बच्चों की भी यही इच्छा थी। इसके लिए आम आदमी ने अपनी आमदनी बढ़ाने की सोची। छोटी सी सरकारी नौकरी में ये सब जुटा पाना मुश्किल था। सो, आम आदमी ने वही राह पकड़ी जिस पर उसके कुछ साथी चल रहे थे। आम आदमी अपनी तनख्वाह के अलावा मेज के नीचे से भी कमाना शुरू कर दिया।

आम आदमी के घर में धीरे-धीरे संसाधन जुटने लगे। आम आदमी अब अपने सपनों को जी रहा था। जिंदगी काफी आरामदायक लग रही थी। लेकिन उसके मन का चैन कहीं जाता रहा। पर आम आदमी ने उस चैन की परवाह किए बगैर अपना अभियान जारी रखा। आम आदमी को अभी भी वो नेताओं वाला आभा मंडल आकर्षित कर रहा था। लाल बत्ती, सलाम ठोकते अर्दली, बड़ा बंगला, दौलत, शौहरत। आम आदमी ने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाया। उनको एक से एक बेहतर सुविधा देने की कोशिश की। तब तक बाजार में नए-नए कोर्स भी आ गए थे। सो, एक बेटे को एमबीए कराया और दूसरे को बीटेक।

आज आम आदमी के पास गाड़ी है, बंगला है सब सुख सुविधाएं हैं। एक बेटा विदेश में है, दूसरा मुंबई में सेटल है। आम आदमी अपने बच्चों के साथ रोज वीडियो चैटिंग करता है। उसको ये सब बच्चों न ही सिखाया। बच्चे इतने व्यस्त हैं कि माता-पिता के पास कम ही आ पाते हैं। फिर काम का इतना दबाव है कि उनकी तबियत भी ठीक नहीं रहती। आम आदमी को अपने बच्चों की याद तो आती है, लेकिन ये सुकून होता है कि उसके बच्चे भले ही उसके पास नहीं हैं पर अपनी मेहनत के दम पर अपने पांव पर खड़े हैं और सारी सुख सुविधाएं जुटा ली हैं।

लेकिन जब से ये आम आदमी पार्टी आई है तब से आम आदमी के मन में उथल-पुथल सी है। आम आदमी को लग रहा है कि जिन सुविधाओं के पीछे वो पिछले 30 सालों से दौड़ता रहा, ये नई पार्टी उन सुविधाओं को दरकिनार करके काम कर रही है। आम आदमी का मन बदल रहा है, पर उसको लगता है कि थोड़ी देर हो चुकी है क्योंकि उसने अपने जीवन का सबसे खूबसूरत दौर सुख-सुविधाओं के पीछे दौड़ने में बिता दिया।

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

कर्ण बनाम अर्जुन और केजरीवाल बनाम मोदी!

महाभारत में कर्ण और अर्जुन के भयंकर युद्ध पर बड़े-बड़े महारथियों की नजर थी। समस्त योद्धा इन दो महारथियों को भिड़ता देखना चाहते थे। नियत समय पर इन दोनों का युद्ध हुआ। अर्जुन और कर्ण दोनों एक से बढ़कर एक थे। एक गुरु द्रोण का शिष्य तो एक भगवान परशुराम का। युद्ध के दौरान अर्जुन के बाणों के प्रहार से कर्ण का रथ कई गज पीछे खिसक जाता और कर्ण के बाण से अर्जुन का रथ हथेली भर ही पीछे खिसकता। लेकिन भगवान कृष्ण कर्ण की प्रशंसा करते। इस पर अर्जुन ने हैरान होकर प्रशंसा का कारण पूछा तो भगवान कृष्ण ने बताया कि कर्ण के रथ पर तो केवल कर्ण और उसके सारथी शल्य का ही भार है, लेकिन तुम्हारे रथ पर स्वयं हनुमान जी विराजमान है, इसके अलावा मेरे अंदर तीन लोक का भार और तुम्हारे रथ के पहियों पर शेषनाग भी लिपटे हुए हैं। फिर भी कर्ण के बाण द्वारा रथ को हथेली भर खिसका देना प्रशंसनीय है। यह जानकर अर्जुन ने भी मन ही मन कर्ण की प्रशंसा की।

आज के राजनीतिक महाभारत में नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल के बीच भी कर्ण और अर्जुन जैसी स्थिति बनी हुई है। एक गोलवलकर का शिष्य है तो एक अन्ना हजारे का। मोदी और केजरीवाल दोनों अपने-अपने क्षेत्र में महारथी हैं। लेकिन जहां नरेंद्र मोदी के पीछे एक मजबूत आधार वाली भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी, आरएसएस और पूरा काॅरपोरेट जगत खड़ा है। उनकी रैलियों में जो हुजूम उमड़ रहा है उस सफलता के पीछे बहुत बड़ा धन और जन का तंत्र काम कर रहा है। तब कहीं जाकर मोदी की सफलता नजर आती है। इस सबकी तुलना में केजरीवाल की सफलता को देखा जाए तो वह प्रशंसनीय लगती है। एक बिना कैडर की पार्टी ने दिल्ली के जन-जन तक अपनी पहुंच बनाई। उनका विश्वास जीता। आप के किसी भी नेता के पास अच्छी भाषण शैली नहीं थी, फिर भी लोगों को उनकी बात सच्ची लगी। केजरीवाल के पीछे मोदी की तरह न तो उतना बड़ा जनबल है और न धनबल। फिर भी उन्होंने दिल्ली में बहुत बड़ी सफलता हासिल की।

लेकिन महाभारत में अंतिम विजय अर्जुन को मिली। कर्ण को उसके गुरु ने श्राप दिया था कि उसकी विद्या तब उसके काम नहीं आएगी जब उसे उसकी सबसे ज्यादा जरूरत होगी। युद्ध के दौरान वही हुआ और कर्ण की हार हुई। अब 2014 के महाभारत में अंतिम विजय किसको मिलेगी ये देखना होगा। वैसे दिल तो अरविंद केजरीवाल ने भी अपने गुरु (अन्ना हजारे) का दुखाया है!!!

रविवार, 8 दिसंबर 2013

आम आदमी की ताकत

चार राज्यों में झन्नाटेदार हार का सामना करने के बाद कांग्रेस के युवराज ने कहा- ’’शायद हम आम लोगों को अपने साथ नहीं जोड़ पाए। लेकिन अब हम कांग्रेस के साथ भी आम लोगों को जोड़ेंगे, और इस तरह जोड़ेंगे कि आपने सोचा भी नहीं होगा’’।

यहां सवाल यही उठता है कि इतनी करारी हार के बाद राहुल को आम आदमी की सुध क्यों आई। जब गली-गली, गांव-गांव घूमकर देश की नब्ज को समझ रहे थे, तब उनको समझ क्यों नहीं आया कि आम आदमी इस व्यवस्था से कितना आजिज आ चुका है। राहुल गरीब कलावती के घर पर रात बिताने के बाद भी उसके दर्द और जरूरतों को नहीं समझ पाए। कलावती के घर से लौटकर उन्होंने लंबा-चैड़ा भाषण तो दिया लेकिन सरकार में होते हुए भी कोई ऐसा ठोस कदम नहीं उठा पाए कि देश की सैकड़ों कलावतियों का भला हो। 

बस्तर की नक्सली हिंसा में तकरीबन 27 लोग मारे गए। कांग्रेस ने सहानुभूति भुनाने के लिए उस हमले में मारे गए नेताओं के परिजनों को तो चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिए, लेकिन कांग्रेस को ये ख्याल नहीं आया कि उन शहीद जवानों के परिजनों को भी टिकट दिए जाने चाहिए, जिन्होंने उन नेताओं की सुरक्षा करते हुए जान गंवाई। बल्कि ये काम बीजेपी भी कर सकती थी। लेकिन दोनों में से किसी पार्टी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। यही अंतर है आम आदमी पार्टी और दूसरी पार्टियों की सोच में। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में खालिस आम लोगों को टिकट दिए, उन युवाओं को मौका दिया जो अभी राजनीति का ककहरा भी नहीं जानते। आम आदमी पार्टी के नवनिर्वाचित विधायकों में से अधिकांश को भाषण देना भी नहीं आता। खुद केजरीवाल भी धाराप्रवाह नहीं बोल पाते। लेकिन फिर भी लोगों ने उन्हें जिताया। उसके पीछे बड़ा कारण यही है कि अब लोगों को भाषण देने वाला नहीं काम करने वाला नेता चाहिए। भाषण तो लोग पिछले 67 सालों से सुनते चले आ रहे हैं। उन भाषणों ने उनके जीवन को नहीं बदला। 

बस इतनी सी बात राहुल गांधी को समझनी होगी। अगर समझ गए तो आगे का रास्ता आसान हो जाएगा।

हार के बाद राहुल गांधी मीडिया के सामने दावा कर रहे थे कि वो किसी चमत्कारिक रूप से आम लोगों को कांग्रेस से जोड़कर दिखाने वाले हैं। उनका ये दावा बेहद संदेहास्पद है, क्योंकि ऐसा करने के लिए उन्हें कांग्रेस का पूरा कल्चर बदलना पड़ेगा। उन्हें उस बूढ़े फकीर के पास फिर से लौटना पड़ेगा जिसका ‘सरनेम’ वो आज तक इस्तेमाल कर रहे हैं। हो सकता है कि राहुल गांधी के मन की भावना अच्छी हो, लेकिन उस भावना को वो पिछले दस साल में कांग्रेस पर परिलक्षित नहीं कर पाए। दस साल की यूपीए सरकार ने देश को रिकाॅर्ड तोड़ भ्रष्टाचार, घोटाले और महंगाई की मार दी। खाद्य पदार्थों में जो महंगाई आई वो पूरी तरह आर्टिफिशियल थी और बाजारी ताकतों द्वारा पैदा की गई थी। उसका फायदा न तो किसान को मिल रहा था और न आम आदमी को। उसका लाभ केवल बिचैलिए और जमाखोर उठा रहे थे। कांग्रेस का नेतृत्व अपनी आंखों के सामने यह सब होता देखता रहा और देख रहा है। केवल मुफ्तखोरी की योजनाएं चलाने से देश और लोगों का भला कभी नहीं हो सकता। योजनाओं का असली लाभ तो किसी और की ही जेब में पहुंचता है। लोगों का भला तो उनको आत्मनिर्भर बनाने से ही होगा।

बहरहाल, इस कारारी हार के बाद राहुल गांधी को अगर आत्मविश्लेषण करना ही है तो एक महीने तक अपनी सलाहकार समिति से दूर रहकर केवल महात्मा गांधी का साहित्य पढ़ें। शायद उनको 2014 के लिए कोई दिशा मिले, अन्यथा लोगों ने अपने इरादे इन चुनावों में जता ही दिए हैं।

युवाओं का बदलता मनोविज्ञान: नौकरी से आगे बढ़कर “स्वनिर्माण” की ओर

भारत का युवा एक मानसिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। कुछ वर्ष पहले तक एक अच्छी नौकरी - विशेषकर सरकारी नौकरी या किसी बड़ी...