शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

जयंती तो वाल्मीकि की है, फिर चौपाइयां तुलसी की क्यों?

आज महर्षि वाल्मीकि जी की जयंती है. अवकाश भी है और उल्लास भी. हर साल की तरह इस बार भी अख़बारों में विज्ञापन दिए गए हैं. वाल्मीकि जयंती पर दिए जाने वाले विज्ञापनों में जो गलती मैं  हर साल देखता हूँ वही इस बार भी दिखी, तो सोचा इस बारे में लिख ही दिया जाए.

दरअसल हर बार महर्षि वाल्मीकि जी के चित्र के साथ उनकी जयंती की बधाई दी जाती है. रामायण लिखते हुए उनका पारंपरिक चित्र. लेकिन उनके समक्ष जो रामायण होती है वो वाल्मीकि रामायण की जगह तुलसी रामायण होती है, जिसमें तुलसी की चौपाइयां लिखी होती हैं. ये चीज़ आपको तमाम जगह देखने को मिल जाएगी. भगवन वाल्मीकि के कैलेंडरों से लेकर उनकी जयंती पर दिए जाने वाली विज्ञापनों तक. आज भी दिल्ली सरकार का जो विज्ञापन दिया गया है (चित्र देखें हिंदुस्तान टाइम्स  में छपा विज्ञापन) उसमें महर्षि वाल्मीकि के समक्ष जो रामायण रखी है उस पर तुलसी की चौपाई- "रघुकुल रीत सदा चल आई..." लिखी है. जबकि महर्षि वाल्मीकि की रामायण संस्कृत में है.

इस कन्फ्यूज़न को दूर करना जरूरी है. क्योंकि छोटे बच्चे इन्हीं सब चीज़ों से अपनी संस्कृति के बारे में सीखते हैं. गोस्वामी तुलसीदास और महर्षि वाल्मीकि की रामायण में अंतर हमें पता होना चाहिए. तुलसी की रामचरितमानस अवधी में है और वाल्मीकि रामायण संस्कृत में. इसलिए महर्षि वाल्मीकि के चित्र में वाल्मीकि रामायण के श्लोकों का समावेश करना चाहिए. इससे वाल्मीकि रामायण की जानकारी  का भी प्रसार होगा. कम से कम सरकारी विज्ञापन में इस तरह की गलती की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए. उम्मीद है आगे इस बात का ख्याल रखा जायेगा. दिल्ली सफाई कर्मचारी कमीशन की ओर से जारी इस विज्ञापन में मुख्यमंत्री का चित्र लगा है साथ में कमीशन के चेयरमैन स्वरुप चंद राजन और सदस्य गण राजू सारसर और बीरपाल गहलोत का नाम छपा है. मुझे पूरी उम्मीद है कि ये गलती केवल दिल्ली सरकार के विज्ञापन में ही नहीं बाकि प्रदेश सरकारों और संस्थाओं द्वारा जारी विज्ञापनों में भी होगी.

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

हम अपने पिता का कहना नहीं मानते!

महात्मा गांधी का सपना था कि भारत में रामराज्य की स्थापना हो और उन्होंने ये सपना भारत के लोगों को भी दिखाया। १५ अगस्त १९४७ से लेकर अब तक भारत में गाहे-बगाहे राम राज्य की चर्चा किसी न किसी मंच से होती आई है। लेकिन अगर पॉलिटिकल पंडितों की मानें तो 'राम राज्य' एक यूटोपिया है, एक ऐसा काल्पनिक शब्द जिसका इस्तेमाल कर राजनीतिज्ञ आवाम को भ्रम में रखते हैं। फिर भी राम राज्य आज भी भारत की आवाम का सपना है। एक ऐसा सपना जो दिमाग में खिंची धर्म की दीवारों को तोड़ चुका है। राम मंदिर पर भले ही तलवारें खिंची हों, लेकिन राम राज्य भारत में आए इसपर सब सहमत हैं। पहले ये सपना गांधी ने दिखाया और फिर भाजपा ने। लेकिन ये सपना केवल मंच, माइक और रैलियों तक ही सिमटा रहा। इसको हकीकत में बदलने की कोशिश न महात्मा गांधी की कांग्रेस ने ही की और न भाजपा ने। भाजपा भले ही केंद्र में लंबे समय तक न रही हो, लेकिन कई राज्यों में वह लगातार कब्जा जमाए है और वहां भी राम राज्य की दिशा में कोई ठोस प्रयोग होता नहीं दिखता। शायद यही कारण है कि राम राज्य को यूटोपिया का दर्जा दिया गया।

यहां संक्षेप में ये भी बताते चलें कि जिस राम राज्य की बात गांधी से लेकर आज तक के नेता करते आए हैं, आखिर उसमें ऐसा क्या था कि हम आज भी वैसे शासन की इच्छा रखते हैं। संदर्भ के लिए अगर केवल तुलसी की रामचरितमानस को ही लें तो हम पाएंगे कि राम के शासन में किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं था। न तो कोई किसी से बैर रखता था और न किसी तरह का भेदभाव था। सभी को समान अधिकार प्राप्त थे। सब अपने-अपने धर्म (कर्तव्यों) का भली-भांति पालन करते थे। न वहां भय था न कोई रोग और न शोक. न तो शारीरिक कष्ट थे और न सांसारिक, प्राकृतिक आपदाएं भी नहीं आती थीं। समय से बारिश होती थी और पशु-पक्षी स्वच्छंद रूप से विहार करते थे। यानि प्रकृति एकदम संतुलित थी। सभी नागरिक ज्ञानी, चरित्रवान और परोपकारी थे। यानि शिक्षा व्यवस्था बेहद उच्च स्तर की थी। सबसे बड़ी बात जो कही वो ये कि अल्पमृत्यु भी नहीं थी। सुनने में ये सब शायद एक सपनों की दुनिया लगे, लेकिन जरा सोच कर देखें कि उस शासन का कैसा सिस्टम रहा होगा? अगर आज की जुबान में कहें तो एकदम फूलप्रूफ सिस्टम।

इसके उलट जरा आज के भारत पर नजर डालते हैं। आजादी से लेकर आज तक भारत सरकार के सामने समस्याओं का अटंबार लगता जा रहा है, लेकिन किसी भी समस्या का कोई ठोस निराकरण नहीं निकल पा रहा। प्राकृतिक आपदाएं हों, अंदरूनी समस्याएं या फिर बाहरी खतरे हर मोर्चे पर हम ढुलमुल खड़े हैं। न तो हम अपने लोगों की बीमारियों से रक्षा कर पा रहे हैं और न तरह-तरह के आतंकवादियों से। कश्मीर से लेकर आसाम तक, आतंकवाद से लेकर नक्सलवाद तक हम हर समस्या के सामने घुटने टेक कर खड़े हैं। हम कोई समाधान नहीं निकाल पा रहे, न तो शक्ति के बल पर और न प्रीति के बल पर। ऊपर से तुर्रा ये कि हम विकास कर रहे हैं, विश्व में एक शक्ति के रूप में उभर रहे हैं। आर्थिक विकास का छद्‌म चश्मा उतार कर देखें तो दिखेगा कि हम एक मुगालते में जी रहे हैं। ये एकदम २००४ के इंडिया शाइनिंग के माफिक है।

राष्ट्र निर्माण करते-करते हम चरित्र निर्माण करना भूल गए। आज हमने नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर तो खड़ा कर लिया है लेकिन देश   के पास नेशनल कैरेक्टर नहीं बचा। ये नेशनल कैरेक्टर की ही कमी है कि तमाम योजनाओं में करोड़ों बहाने के बावजूद उसका लाभ आम लोगों तक नहीं पहुंच पाता। ये नेशनल कैरेक्टर की ही कमी है कि आज कॉमनवेल्थ खेलों में ७० हजार करोड का खजाने खोलने के बावजूद हमारे पांव थर-थर कांप रहे हैं और देश की इज्जत दाव पर है। इस सबकी जड में कहीं न कहीं हमारे एजुकेशन सिस्टम का ही दोष है। जिन बालकों के संग खेलते वक्त पंडित नेहरू उन्हें देश का भविष्य कहकर पुकारते थे, उन बालकों को हम अच्छा नागरिक बनने की दिशा ठीक से नहीं दे पाए। अब वही बालक विभिन्न पदों पर बैठे देश का बंटाधार कर रहे हैं।

गांधी ने अपने राम राज्य का खाका सत्य और अहिंसा की नींव पर खड़ा किया था। वो चाहते कि विकास की बयार गांव से शहर की ओर बहे। बेहूदे विकास के नाम पर पर्यावरण के साथ खिलवाड न किया जाए। नागरिक तप और त्याग का जीवन जिएं। ऐसी अर्थव्यवस्था हो जो सबका पेट भर सके। लेकिन हुआ क्या? सत्ता मिलते ही गांधी के विचार को दरकिनार कर दिया गया और विकास का पश्चिमी मॉडल अपनाया गया। विकास शहरों से शुरू किया गया और गांव पिछडते चले गए, जिसका परिणाम निकला पलायन। स्थिति ये बन गई कि बार-बार दिल्ली की मुखयमंत्री को कहना पड़ा कि दिल्ली अब और लोगों को जगह नहीं दे सकती, कृपया दूसरे राज्यों से लोग यहां आकर न बसें।

हम अपनी नदियों, पहाड़ों और जंगलों को नहीं बचा पा रहे। गंगा-यमुना को साफ करने के नाम पर बार-बार प्रोजेक्ट लांच कर खानापूर्ति की गई लेकिन उनको गंदा करने वाली इंडस्ट्रीज के मालिकों से चुनावी फंड पाने के लिए राजनीतिज्ञ गलबहियां करते रहे। बाजारवाद और भोगवाद इतनी गहराई तक फैल गया कि तप और त्याग की बातें बेहद दकियानूसी लगीं। प्रकृति के साथ तो हमने ऐसा घिनौना बर्ताव किया कि हम उसको अपनी दासी मान बैठे हैं। हालांकि प्रकृति बार-बार अपनी ताकत का ऐहसास कराकर चेताने की कोशिश भी करती है, लेकिन हम उसके इशारे को नहीं समझ पाते। इस साल के मॉनसून ने समूचे उत्तर भारत को पानी पिला दिया। कॉमनवेल्थ की आयोजन कमेटी को तो ये मॉनसून खासतौर से याद रहेगा। खैर, जीव जंतुओं और पर्यावरण की रक्षा तो हम बाद में करेंगे, पहले तो हमारे नागरिक ही देश की सीमाओं में सुरक्षित नहीं हैं। हमको कोई भी, कभी भी, कहीं भी मार जाता है और सरकार के पास बयानों के मलहम के सिवा कुछ नहीं होता। शायद इसीलिए अब ये जुमला आम हो चला है कि भारत राम भरोसे चल रहा है।

जहां तक बात अल्पमृत्यु की है तो आज भारत में वह भी चर्म पर है। अल्पमृत्यु का सबसे बड़ा कारण बन रहे हैं तमाम तरह के हादसे और जानलेवा बीमारियां। हमने आज तक लड़े गए युद्धों में इतनी जानें नहीं गंवाई जितने नागरिक हमने देश की सडकों पर गंवा दिए। हमने ऐसी-ऐसी कारों को अपनी सडकों पर दौडने की इजाजत दे दी जिनके लिए भारतीय सडकें बिल्कुल अनुकूल नहीं हैं। हाईवे पर अधिकतम गति सीमा ६० किमी प्रति घंटा की है लेकिन गाडियों के अंदर २०० किमी प्रति घंटे तक का प्रावधान है। हाई स्पीड पर गाड़ी चलाने पर हम चालक का तो चालान काटते हैं, लेकिन गाड़ी में हाई स्पीड का प्रावधान देने वाली कंपनी के प्रति हमारा रवैया क्या होना चाहिए? वैसे इसपर कोई यह भी सवाल उठा सकता है कि देश का नागरिक कम उम्र में मरता है या उम्र पूरी करके, इसमें शासन की भूमिका कहां पर है। दरअसल यहीं पर राम राज्य का अंतर छिपा है। हम भारत पर भारतीयता की दृष्टि से शासन करने के बजाय एक विदेशी चश्मा लगाकर राज कर रहे हैं। गांधी के स्वदेशी मंत्र में केवल विदेशी चीज़ों की होली जलाना भर नहीं था, उनके 'स्वदेशी अपनाओ' में गहरा दर्शन छिपा था।

१९४७ से लेकर आज तक भारत में भ्रष्टाचार का बोलबाला रहा। पिछले ६३ सालों से हम अलग-अलग सुरों में देश के अंदर व्याप्त भ्रष्टाचार का रोना रो रहे हैं। लेकिन आज तक उसका खात्मा करने की दिशा में सिवाय असफलता के कुछ नहीं मिला। सर्वोच्च स्थानों से लेकर निचले तबके तक निजी हितों ने राष्ट्र हितों के ऊपर वरीयता प्राप्त कर ली है। उपभोक्तावाद ऐसा बढ़ा है कि हम अब केवल मुनाफे की भाषा बोलते और समझते हैं। बिना फायदे के तो अब हम ईश्वर को भी नहीं पूजते। राष्ट्रपिता ने तो बताया तप और त्याग का जीवन लेकिन राष्ट्र को दिया गया भोग और विलास का जीवन। धन और संपदा का लोभ इतना सिर चढ़ा कि जो धन राष्ट्र के विकास में लगना चाहिए था वह स्विस बैंकों में पड़ा सड़ रहा है। देश का शासक स्वयं देश के लिए घुन बन गया और लगातार उसको खोखला कर रहा है।

राम राज्य में दंड का भी प्रावधान था, लेकिन प्रजा इतनी अनुशासित थी कि दंड देने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। पर राजा राम ने बार-बार इस बात पर बल दिया कि अगर उचित समय पर उचित दंड दे दिया जाए तो बाकी प्रजा में उसका गहरा असर होता है। लेकिन आजाद भारत में न्यायिक प्रक्रिया किस तरह काम करती है ये बताने की आवश्यकता नहीं। देश की अस्मिता पर हमला करने वाले आतंकवादियों को सजा सुनाई गई, लेकिन उसको अमलीजामा पहनाने में सरकार के हाथ कांप रहे हैं। ऐसे में आम लोगों का देश के कानून में विश्वास कैसे दृढ बने। इसीलिए लोग कानून तोडने से भी नहीं डरते।

राजा राम का एक और विशेष गुण था। चक्रवर्ती सम्राट होने के बावजूद वे स्वयं अयोध्या के लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याओं का आकलन करते थे। लेकिन आज के शासक ने आम लोगों से बहुत बड़ी दूरी बना ली है। राजा राम के दरबार में हर रोज कार्यार्थियों के काम और शिकायतें सुनने का प्रावधान था। वे लक्ष्मण को द्वार पर देखने को भेजते कि कहीं कोई अपना काम लेकर तो नहीं आया। लेकिन लक्ष्मण को द्वार पर कभी कोई नहीं मिलता। इसका अर्थ ये नहीं कि लोगों को बोलने का अधिकार नहीं था। राजा राम के शासन में प्रजा की राय सर्वोपरि थी, जिसके कारण राम को सीता का भी परित्याग करना पड़ा। द्वार पर कोई फरियादी न होने का अर्थ है कि निचले पदों पर बैठे राजा राम के प्रशासक बखूबी अपने काम को निभा रहे थे। आज उसका उल्टा है। जिला स्तर पर देखें तो डीएम और एसएसपी के ऑफिस में सुबह से ही शिकायत लेकर आए लोगों का जमावड़ा लग जाता है। इसका सीधा सा अर्थ यही है कि डीएम् एसएसपी से नीचे बैठे कर्मचारी अपने कर्तव्यों का ठीक से पालन नहीं कर रहे।

इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर साइंटिफिक स्प्रिचुअलिज्म के संयोजक डॉ. गोपाल शास्त्री से जब मैंने राम राज्य के बाबत पूछा तो उनका कहना था कि राम राज्य तब आया जब अयोध्या के लोगों ने १४ वर्ष तक राम के इंतजार में कठिन तप किया। सभी अयोध्यावासियों ने कठोर तप करके राम के प्रति अपना समर्पण प्रदर्शित किया। उस १४ वर्ष के तप और त्याग ने अयोध्यावासियों को हर दृष्टि से एक श्रेष्ठ इंसान बनाया। जबकि उधर स्वयं राम वनवास में और अयोध्या के कार्यवाहक राजा भरत नंदिग्राम में तपस्वी का जीवन व्यतीत कर रहे थे। जब राजा और प्रजा दोनों ने १४ वर्ष तक कठोर तप और त्याग के जीवन का अनुसरण किया तो अयोध्या में राम राज्य की स्थापना हुई। एक ऐसा राज्य जो राम के पिता दशरथ के शासन से भी श्रेष्ठ सिद्ध हुआ और एक मिसाल बन गया। आज तक लोग उस शासन का सपना देख रहे हैं।

हमने महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता का दर्जा तो दे दिया। लेकिन तप और त्याग के जीवन का जो उदाहरण गांधी ने पेश किया उसको न तो देश के शासक ने अपनाया, न प्रशासक ने और न आम लोगों ने। हमने अपने बीच से एक श्रेष्ठ पुरुष को चुन लिया और अखिल विश्व को दिखाने के लिए उसको राष्ट्रपिता का दर्जा दे दिया, लेकिन हम अपने राष्ट्रपिता की वे संतानें हैं जो अपने पिता का कहना मानने को तैयार नहीं।

सोमवार, 27 सितंबर 2010

बातों के बतोले और राष्ट्रीय चिंतन

जिन्दगी में गपरचौथ  का बड़ा महत्व होता है. हर कोई कहीं न कहीं गपरचौथ जरूर  करता है. चाहे ऑफिस में या चाय की दुकान पर, गाँव हो तो किसी पेड़ के नीचे, कॉलेज में हो तो कैंटीन में, यानि सबके पास गपरचौथ के अपने अपने अड्डे हैं. अब आप पूछेंगे गपरचौथ क्या? तो जी हमारे यहाँ गपरचौथ यानि बातों के बतोले फोड़ना, खाली वक़्त की पंचायत या बैठकी. अमूमन इस तरह की गपरचौथ में इधर-उधर की बुराई और एक-दूसरे की टांग खिंचाई होती है. लेकिन अगर गंभीर विषय छिड़ जाये तो कई बार अच्छे अच्छे विचारों का भी आदान प्रदान हो जाता है. मेरठ में पत्रकारिता के दौरान इस गपरचौथ का आनंद लिया जाता था रात को अखबार निकालने के बाद. ऑफिस के पास चाय की दुकान पर. अमूमन १२-१ बजे से शुरू होकर ये गपरचौथ २-३ बजे तक चलती. इस गपरचौथ के मुखिया होते हमारे मकेश सर. इस बैठकी के सबसे बड़े रसिया थे अनुराग और कपिल जी. अन्य लोग जो साथ निभाते उनमें सुशील, संतोष, सचिन त्यागी,  कुशल जी, मैं और विवेक जी. इस गपरचौथ की संख्या ५ से कम कभी नहीं घटी. सबकी चाय का प्रबंध हर रोज मुकेश सर की ओर से रहता. इस बैठकी में मुख्य मुद्दा होता आज के दौर की पत्रकारिता और पत्रकार. इसके बाद नम्बर था समसामयिक मुद्दों और देश की अन्य समस्याओं का. हलकी-फुलकी चुहलें और थोड़ी टांग खिंचाई.

दिल्ली आकर एनजीओ से जुड़ने के बाद अब मुझे इस गपरचौथ के लिए नयी जगह मिल गयी. अब हमारी बैठकी अक्सर आंटी के घर जुटती है. अक्सर रात के खाने के बाद सबका उनके घर हालचाल जानने के बहाने आना होता है. और अगर बहस का मुद्दा गर्म हो तो समझो जम गयी पंचायत. अलग-अलग टेस्ट के लोग होने के कारण इस बहस में पक्ष और विपक्ष भी बन जाता है. आंटी के घर की गपरचौथ में भाग लेने वालों में हमारे अंकल जोकि डॉक्टर हैं और आंटी के अलावा, भगवन अंकल, तेजेश मामा, मैं और टीनू भैया. जिस दिन की बहस में टीनू भैया शामिल होते हैं उस दिन समझो रात को तीन बजने ही बजने हैं. बुधवार के दिन मेरी छुट्टी होती है तो मंगलवार रात को अगर बहस छिड़ जाए तो फिर मत पूछो. एक दिन मंगलवार को मृगांक भी आया हुआ था उस दिन फिल्मों से लेकर खाने-पीने तक के मुद्दों पर ऐसी चर्चा छिड़ी कि जब मैं रात को वहां से उठ कर अपने रूम की तरफ बढ़ा तो बहार पेड़ों पर चिड़ियाँ बोल रही थीं. घर जाकर समय देखा तो तडके के ४:३० बजे थे. चद्दर तान के ऐसा सोया कि सुबह १० बजे आँख खुली.

चलती बहस में से बार बार उठने की कोशिश भी करो लेकिन फिर सबका अनुग्रह-  "अरे बैठो अभी...", "घर जाकर सोना ही तो है...", "चले जाना, थोड़ी देर और रुको ज़रा....", ऐसा दबाव होता है कि उठ-उठ कर बैठना पड़ता है. टीनू भैया तो ऐसे चटकारे छोड़ते हैं कि बीच में छोड़ भी नहीं सकते. और फिर थोड़ी-थोड़ी देर के अंतर पर आंटी की चाय, साथ में उनकी रसोई के नए- नए प्रयोग. रात का खाली समय, चाय, नाश्ता और बातें करने के लिए रोचक लोगों की बैठक और भला क्या चाहिए. क्लीनिक से आकर अंकल भी फुल चर्चा करने के मूड में होते हैं. बस कोई कह दे एक बार ज़रा. अंकल के जो भी तर्क होते हैं वो विज्ञान और अध्यात्म का मिला-जुला मिश्रण होते हैं. मेरा पक्ष पूरी तरह अध्यात्मिक, आंटी का भावनात्मक और टीनू भैया का एकदम व्यावहारिक. जब भगवन अंकल होते हैं तो वे गरमा गर्मी हो जाने पर बीच-बचाव करते हैं, खासतौर से जब बात शाकाहार बनाम मांसाहार पर चल रही हो. मैं और भगवन अंकल शाकाहार का पक्ष लेते हैं और टीनू भैया और डॉक्टर अंकल मांसाहार के पक्ष में एक से बढ़कर एक तर्क पेश करते हैं. लेकिन जब बात राष्ट्रीय समस्याओं पर चल रही हो तो सबका व्यू-पॉइंट तकरीबन एक सा ही है. विचारधारा की दृष्टि से देखा जाए तो मोटे तौर पर इस बैठकी में सब दक्षिणपंथी ही हैं, मेरठ गपरचौथ में एक-दो वामपंथी भी थे तो बहस में छौंक ज्यादा तगड़ा लगता था.

खैर कल आंटी के घर आजकल के सबसे गर्म मुद्दे पर हलकी सी चर्चा छिड़ी- यानि कॉमनवेल्थ खेलों पर. टीनू भैया नहीं थे वरना  कल पूरी रात कम पड़ जाती. मामला था कि ऑस्कार के लिए इस बार भी जो फिल्म "पीपली लाइव" भेजी गयी है उसमें भी भारत की निगेटिव इमेज विश्व के सामने जाएगी. बाकी की इमेज पर कॉमनवेल्थ का आयोजन पानी फेर ही रहा है. हलकी सी बहस छिड़ी सबकी यही राय कि ऐसी फिल्मों को भेजने से बचा जाये जो भारत को पिछड़ा, गरीब और बेकार देश होने की छाप छोड़ती हों. इतने में आंटी ने एक बेहद तार्किक और व्यावहारिक बात कह डाली. उसी बात को लिखने के लिए मैंने ये पूरी पोस्ट लिखी है.

बात थी विश्व में ख़राब तस्वीर पेश करने वाली चीज़ों की. आंटी ने इसके लिए सबसे बड़ा दोष रेलवे के सर मढ़ा और वो भी पर्याप्त कारणों के साथ. उन्होंने कहा कि बाहरी लोगों के सामने देश की ख़राब तस्वीर पेश करने में यहाँ के रेलवे स्टेशनों का सबसे बड़ा हाथ है. वैसे तो रेलवे भारत की पूरी जी-जान से सेवा कर रहा है. उसकी सेवाओं में दिन-प्रतिदिन सुधार भी हो रहा है, लेकिन हर शहर में रेलवे स्टेशन से दो-तीन किलोमीटर पहले और बाद में ट्रैक के दोनों तरफ का एरिया इतना गन्दा और भद्दा होता है कि चाहकर भी आप उस शहर के बारे में अच्छा तो सोच ही नहीं सकते. भारत की राजधानी के मुख्य स्टेशन से लेकर छोटे से कसबे के हॉल्ट तक हर जगह पटरियों के आस-पास गंदगी का अटम्बार, झुग्गियां और अपने पेट को हल्का करते हुए भारतीय नज़र आएंगे. भला ऐसे में उस शहर के बारे में अच्छी इमेज कैसे बने. तमाम विदेशी पर्यटक भरता में ट्रेन से सफ़र करते हैं. रेल खिडकियों पर बैठे-बैठे अपने कैमरे से यही तसवीरें खींचकर वो अपने ब्लॉग पर, अपनी किताबों में या फिर प्रदर्शनियों में लगते हैं.

रेलवे अपनी पटरियों के आसपास से अवैध कब्जों को हटाने की तमाम दफै नाकाम कोशिश कर चुका है. लेकिन कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं इन अवैध कब्जों की. हटायें तो हटाये भी कैसे? किसी को इन कब्जों में वोट नज़र आते हैं, किसी को सर्वहारा, किसी को अपनी कौम,  तो किसी को बहुजन समाज. तमाम रेलवे स्टेशनों पर आपको पटरियों के बीचों-बीच मंदिर और मस्जिद भी मिल जायेंगे. इस सबके चक्कर में रेलवे का मनोबल इस दिशा में क्षीण पड़ जाता है. अब तो दिल्ली की मेट्रो ट्रेन ने इस मामले में भारतीय रेल के सामने एक नजीर भी पेश कर दी है. उससे भी गाइडलाइन ली जा सकती है. वैसे साफ़ सफाई के मामले में कुछ रेलवे स्टेशनों की भी स्थिति बेहतर है. रेलवे अपने ट्रैक के किनारे जट्रोफा के पेड़ उगाने का भी एक असफल प्रयास कर चुका है. लेकिन मुख्य बात है स्टेशन से कुछ किलोमीटर पहले और बाद में  पसरी गंदगी और अवैध कब्जों की. अगर इसका कोई उपाय खोज लिया जाए तो लोगों के मन में अपने शहर और अपने देश के बारे में नकारात्मक छवि न बने. किसी भी स्टेशन पर ट्रेन का स्वागत ग्रीनरी और अच्छी लाइटिंग से हो तो तस्वीर कुछ सुधरे.

खैर  ऊषा आंटी की ये चिंता कब तक दूर होगी ये तो नहीं कह सकते, फिलहाल तो रेलवे के ही सिपहसलार रेलवे स्टेशनों की दीवारों पर नारे लिख रहे हैं और दीवारों पर पीक मार रहे हैं.

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

अयोध्या को बहुत कुछ चाहिए...

अयोध्या विवाद पर आने वाला फैसला एक बार फिर टाल दिया गया है. और ऐसा पहली बार नहीं हो रहा, पिछले ६० सालों से ऐसा ही होता आ रहा है. हमारा सिस्टम इस मुद्दे को च्युइंगगम की तरह चबा रहा है. इशारा साफ़ मिल रहा है कि इस बार कॉमनवेल्थ के मद्देनज़र फैसला टाला गया है. अब कम से कम कॉमनवेल्थ ख़त्म होने तक तो इस फैसले को भूल ही जाइए. जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को टालने में तत्परता दिखाई उसको देख कर लगता है कि देश में बन रहे हालातों के मद्देनज़र कोर्ट से कहीं न कहीं भारत सरकार ने भी फैसला टालने की अलहदा से गुजारिश की है.

भारतीय सिस्टम की सबसे बड़ी  विडम्बना यही है की वह चीज़ों को टालने में विश्वास रखता है. चाहे कश्मीर हो या नक्सलवाद, अयोध्या हो या पूर्वोत्तर राज्यों की समस्या. भारतीय सरकारें सदा से ही समस्याओं को टालने की प्रवृत्ति अपनाती आई हैं. नतीजा ये कि पीढ़ी दर पीढ़ी समस्याएं विकराल होती चली गयी.   काश अगर हमने परेशानियों को टालने की जगह उनसे मुकाबला करने का जज्बा दिखाया होता तो न बाबरी मस्जिद गिराई जाती और न आज कश्मीर सुलगता. भारतीय लोकतंत्र में वोट खोने का इतना बड़ा खौफ है कि सत्ता-हित के सामने राष्ट्र-हित दरकिनार कर दिए जाते हैं. आज देश में तमाम सुलगती समस्याओं की जड़ में यही कारण है. हमारी हिम्मत को लकवा मार गया है, हम डरपोंक हो गए हैं, हमारी रीढ़ में पानी घुस गया है.

अयोध्या मसले पर ये मुकदमा पिछले ६० साल से चल रहा है. इतने लम्बे अन्तराल में न तो सरकार और न अदालत ये निर्णय देने की हिम्मत जुटा पा रही है कि ये ज़मीन किसकी है? हालाँकि पता दोनों को है कि ज़मीन पर असली हक किसका है. यही ढीला रवैया बाबरी गिराए जाने का सबसे बड़ा कारण बना. लेकिन ये २०१० है वो १९९२ था. तब से लेकर अब तक सरयू में बहुत पानी बह चुका है. आज लोगों को गुमराह करना मुश्किल है. लोग वोटों की माया को भी समझ गए हैं. दोनों धर्मों के संतों ने नेताओं से किनारा कर लिया है. दोनों पक्ष अब फैसला चाहते हैं. लेकिन नहीं! हमारा सिस्टम किसी मुद्दे को जड़ से ख़त्म करने की इज़ाज़त नहीं देता. हम उसको लटकाए रखना चाहते हैं. ताकि लोग इन सब चीज़ों से ऊपर उठ कर न सोच सकें. १९९२ वाला सीन भी भूल जाएँ क्योंकि तमाम धार्मिक संगठन तेजी से अपनी जमीन खो रहे हैं. नयी पीढ़ी नयी सोच के साथ आगे बढ़ रही है. कम से कम उसको तो कतई गुमराह नहीं किया जा सकता. गुमराह उन्हीं इलाकों को किया जा सकता है जहां शिक्षा का अभाव है, विकास का अभाव है और जहां बेकारी है.

खैर इसी बहाने मैं आपको अपने अयोध्या के संस्मरण भी सुना देता हूँ, जो मैंने अपनी पिछली यात्रा में अनुभव किये. बचपन में जब परिवार के साथ अयोध्या  गया था उस वक़्त उम्र बहुत कम थी. बस कुछ भीनी भीनी यादें हैं. उम्र तीन साल से भी कम रही होगी. उस समय की सबसे स्पष्ट याद है भाई के साथ हनुमान गढ़ी की ऊंची सीढ़ियों पर एक एक पैड़ी को हाथ से छूकर माथे से लगाकर चढ़ना. तब के बाद फिर कई बार सोचा कि अयोध्या चला जाए, लेकिन कभी मौका नहीं लग पाया. दिल्ली आने के बाद आखिरकार मौका लग ही गया और लखनऊ में दिव्य जी से मुलाकात के बहाने अयोध्या जाना हो गया. बीती अप्रैल में मेरी ये यात्रा थोड़ी जल्दी-जल्दी में जरूर रही लेकिन मैंने उद्देश्य को पूरा कर लिया. सरयू स्नान के बाद जल्दी में ही सही मैंने सभी मुख्य मंदिरों के दर्शन कर लिए.

पूरे संसार में अयोध्या के नाम पर जितना बड़ा बवाल है मुझे अयोध्या उतनी ही छोटा और दीन लगी. ये तुलसी की अयोध्या सरीखी कतई नहीं थी. अयोध्या में जिस वैभव का वर्णन तुलसी ने अपनी मानस में किया है ये अयोध्या तो उसके पैरों की धूल भी नहीं. मेरी आँखें एक अदद वैभवशाली मंदिर देखने को तरसती रहीं. हर जगह मुझे केवल छोटे छोटे मंदिर और छोटी छोटी दुकानें ही नज़र आयीं. एक मात्र हनुमान गढ़ी का मंदिर ही थोड़ी विशालता का अहसास कराता दिखा. वर्तमान अयोध्या से कहीं ज्यादा बड़े और वैभवशाली राम मंदिर भारत के दूसरे छोटे शहरों में हैं. वर्तमान अयोध्या में गरीबी भी जमकर अपना प्रदर्शन कर रही थी. आखिर क्यों?

न तो भगवान राम की अयोध्या ऐसी थी और न राजा राम की. फिर आज की अयोध्या इतनी दीन क्यों है. कहने को पर्यटन स्थल और देखने में इतनी दयनीय. इसका जिम्मेदार कौन है? और फिर ऐसा क्या किया जाना चाहिए कि वर्तमान अयोध्या भी वैसी ही वैभवशाली बने जैसा तुलसी ने अपनी रामायण में वर्णन किया है.

अगर अयोध्या विवाद को इतना लम्बा न खींचा गया होता तो आज यहाँ भी आर्थिक विकास जोरों पर होता. अयोध्या में भी वही वैभव देखने को मिलता जो तिरुपति बालाजी, वैष्णो देवी और शिर्डी में देखने को मिलता है. लेकिन वर्तमान अयोध्या तो संगीनों के साए में जीती है. विश्व पटल पर नाम इतना बदनाम कर दिया गया है कि अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन यहाँ अपनी पैठ भी नहीं बना पाया है. अगर जल्द ही इस विवाद का फैसला कर दिया गया होता तो आज शायद ये दिन न देखना पड़ता.

अदालत में इस विवाद पर २८ बिन्दुओं को लेकर मुकदमा चल रहा है. इनमें से विवादित स्थल पर मस्जिद के पक्ष में बहुत कम साक्ष्य मिले हैं. कोर्ट ने फैसला लिख कर रख लिया है, बस सुनाना बाकी है. लेकिन अचानक ऊपर से लेकर नीचे तक सबकी रीढ़ की हड्डी दरकने लगी है. दर के मारे हवा ख़राब है. इसलिए कानूनी पेचों में मामले को फंसाने की कोशिश की जा रही है. किन्हीं राम भक्त त्रिपाठी जी को मोहरा बनाकर इस्तेमाल किया जा रहा है. उनका इस्तेमाल कौन कर रहा है. पता नहीं. हिन्दू कह रहे हैं कि वो कांग्रेस के आदमी हैं मुसलमान कह रहे हैं कि वो विहिप के आदमी हैं लेकिन वो कह रहे हैं कि मैं एक आम आदमी हूँ. 

खैर, अगर हिन्दुओं की भावना का ख्याल रखते हुए वहां समय रहते मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ कर दिया जाता और मस्जिद के लिए दूसरा स्थान दे दिया जाता तो आज तस्वीर दूसरी होती. पूरे संसार में साम्प्रदायिकता के नाम पर न तो भारत की छवि धूमिल होती और न किसी को राजनीति का मौका मिलता.

इस्लाम के मुताबिक विवादित स्थान पर मस्जिद नहीं बन सकती. सो, होना ये चाहिए कि वहां मंदिर का रास्ता साफ़ कर दिया जाए और मस्जिद के लिए अन्यत्र जगह प्रदान की जाये. भारत सरकार और प्रदेश सरकार दोनों पक्षों को अपने अपने धार्मिक स्थल बनाने के लिए बराबर की रकम प्रदान करे और फिर दोनों की धार्मिक स्थल इतने भव्य और दिव्य बनाये जाएँ कि वो एक मिसाल बन जाएँ. पर्यटन का ऐसा केंद्र बन जाएँ कि दूर दूर से सैलानी इनको देखने आयें. वहां पर्यटन का विकास हो, वहां के लोगों का विकास हो और गरीबी का नाश हो.

सोमवार, 20 सितंबर 2010

मेरा- "कॉमनवेल्थ सॉन्ग"

कॉमनवेल्थ खेलों के लिए जब सब गाने-वाने लिख रहे हैं तो मैंने भी सोचा एक गाना लिख दिया जाए. देश के इस महत्वपूर्ण पर्व में मेरा भी कुछ योगदान होना चाहिए. ऐसा मौका बार-बार थोड़े ही मिलता है.  न न मुझे इस गाने के लिए कोई पैसा नहीं चाहिए. एकदम मुफ्त. पैसा तो खेल कमेटी के लिए ही कम पड़ रहा है, बेकार में क्यूँ उनकी वेल्थ में सेंध लगायी जाए. तो पेशे खिदमत है मेरा-  "कॉमनवेल्थ सॉन्ग" :   


 १. सडकें बन गईं स्विमिंग पूल,
कॉमनवेल्थ की हिल गईं चूल,
कैसे खेल करें.


२. बारिश कर रही हाहाकार,
यमुना दे रही है ललकार,
पानी कहाँ रखें.


३. डेंगू फैल रहा विकराल,
कैसे मरेंगे मच्छर यार,
बताओ क्या करें.


४. आतंकी बैठे होशियार,
अयोध्या सुलगन को तैयार,
कैसे शांत करें.


५. उड़ गई कलमाड़ी की धूल
शीला फिर भी दिख रहीं कूल
चिंता कौन करे.


६. पूरी दिल्ली में है जाम,
छुट्टी कर दी सबकी आम,
कैसे जाम खुले.


७. आ रहे भर-भर के त्योहार,
रावण फुकेंगे अपरम्पार,
इज्जत राम रखें.


८. करोड़ों बहा दिए सरकार,
फिर भी लटका कारोबार,
ढीली चाल चलें.


९. प्लेयर बैठे हैं हैरान,
गीले पड़े सभी मैदान,
कैसे पदक मिले.


१०. गाना किये एक रहमान,
कर गए हैं सबको परेशान,
कैसे मूड बने.


११. सीखें सॉरी, थैंक-यू, प्लीज़,
सब अंग्रेजों वाली तमीज,
हिंदी दूर रखें.


१२. बिछा दें सब सड़कों पर फूल,
सब कुछ दिखना चहिये कूल,
सच को साफ़ ढकें.

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

हे भगवान! कॉमनवेल्थ खेलों पर कृपा करो

लगता है मणिशंकर अय्यर की  (बद) दुआ सीधे दिल से निकली थी. बारिश तो सचमुच कॉमनवेल्थ खेलों पर पानी फेरने पर उतारू है. दिल्ली से लेकर देहरादून तक पानी ही पानी है. रक्षाबंधन की छुट्टी पर मैं नैनीताल घूमने चला गया. बारिश ने वो हाल किया कि कमरे से बहार नहीं निकलने दिया. बूँद रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी. रास्ते में पड़ी कोसी, सोत, गांगन और रामगंगा  सरीखी नदियाँ सब की सब तट की मर्यादाएं भंग करती दिखी. कितनी भी बारिश क्यों न हुयी हो मैंने रामगंगा के पुल के नीचे कभी इतना पानी नहीं देखा. पुल के नीचे पहले पिलर से लेकर आखिरी पिलर तक पानी भरा था. दिल्ली में यमुना लगातार कई दिनों से खतरे के निशान से ऊपर बह रही है. लगता है इन्द्र को भी पता चल गया है कि कॉमनवेल्थ खेलों में करोड़ों की धांधली की गयी है. धरतीवासी सारा का सारा पैसा अकेले ही डकार गए, इन्द्र को उनका शेयर नहीं भेजा. आखिर किसी भी महान यज्ञ में देवताओं का भाग निकाला जाता है. फिर ये कॉमनवेल्थ खेल तो एक विश्व यज्ञ है.  तो लो अब भुगतो और कराओ कॉमनवेल्थ खेल.

लगता है उस दिन मणिशंकर अय्यर की जुबान पर सरस्वती बैठी थी. जो कहा सो हो गया. काश उन्होंने उस दिन कुछ और कहा होता. खैर असली मज़ा तो अब अक्टूबर में आने वाला है. कल कुछ फार्मर्स, आई मीन किसान लोग अपना अधिकार मांगने दिल्ली आ गए थे और दिल्ली उनको जगह नहीं दे पाई. किसानों के घुसते ही पूरी दिल्ली घुटनों के बल रेंगने लगी. सोचो कॉमनवेल्थ खेलों में क्या होगा? सुना है जितने दिन खेल चलेंगे तब तक दिल्ली के तमाम संस्थान बंद रहेंगे. मसलन स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी, कुछ गैर जरूरी सरकारी संस्थान आदि इत्यादि. ताकि दिल्ली की सडकें खाली रहें. सड़कों पर जाम न लगे. विदेशियों के सामने सबकुछ ढक कर  रखना है. आखिर देश की इज्जत का सवाल है.

वैसे ३५ हजार करोड़ रूपए में एक नया शहर बसाया जा सकता था. जितनी रकम फूंक दी गयी है उतना तो कई राज्यों का साल का बजट होता है. खेलों के लिए सरकार खेल गाँव बनाती ही है तो फिर नया खेल गाँव बनाने की जगह देश के किसी छोटे से गाँव को ही खेलों के लिए क्यों नहीं चुनती. वहां पर इन्फ्रास्ट्रक्चर  खड़ा करके खेल कराये तो शायद देश के आम जन का भी भला हो. मुझे मेरठ में पत्रकारिता के दौरान वो खबर याद आती है जिसमें पता चला था कि जिन खिलाड़ियों से हम पदक की उम्मीद करते हैं उनकी एक वक़्त की डाईट के लिए सरकार की ओर से महज १७ रूपए ही पहुँचते हैं. खिलाड़ियों के खाने के लिए १७ रूपए और विदेशियों को दिखाने के लिए ३५ हज़ार करोड़, बढ़िया है. अब तक जो पदक ओलम्पिक में भारतीय खिलाड़ी लेकर आये हैं, वो केवल उनके निजी जूनून और उत्साह का नतीजा था. अभिनव बिंद्रा के पिता ने अगर उनको आर्थिक रूप से सहयोग न किया होता तो शायद ही वो रायफल शूटिंग जैसे महंगे खेल में स्वर्ण पदक ला पाते.
  
अगर ये खेल दिल्ली की जगह किसी छोटे शहर या किसी गाँव में कराये जाते तो बहुत से खिलाड़ियों का भला हो सकता था. दिल्ली तो सुरसा का मुंह है, जितना उड़ेलो उतना कम है.

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

क्या करके मानेगी ये ओछी राजनीति!

वामपंथियों ने थोड़ी नज़रें टेढ़ी कीं तो अब नक्सलियों को ममता दीदी के आंचल में जगह मिल गयी है. दीदी नक्सलियों को इतना ज्यादा पुचकार रही हैं कि पूछो मत, दीदी के दिल में रह-रह कर नक्सलियों के लिए ममता उमड़ रही है. वो भी इतनी की नक्सलियों को ममता की नयी छत्र-छाया मिलती नज़र आ रही है. 


जैसे सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है वैसे ही भारतीय नेताओं को केवल और केवल कुर्सी दिखती है. और इस कुर्सी के लिए देश, धर्म, जाति, परिवार, भाषा सबको दाव पर लगा देते हैं. ऐसा ही ममता दीदी के साथ भी है. उनको केवल बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी दिख रही है. इस कुर्सी की चाह उनके दिल में इतनी घर कर गयी है कि वो अपने सिद्धांतों से भी समझौता कर बैठी है. एक वो कर्मठ ममता थी जिसने कभी वामपंथियों से हार नहीं मानी और जिंदगी भर उनके खिलाफ लड़ती रही और एक ये ममता है जो कुर्सी की खातिर वामपंथियों के ही दूसरे रूप से हाथ मिलाने को तैयार है. ममता ने नक्सलियों के माथे पे लगे सब के सब खून माफ़ कर दिए हैं.


आखिर देश के लोग सही और गलत की पहचान कैसे करें. एक ओर ममता उस नक्सली नेता का समर्थन कर रही हैं जो छत्तीसगढ़ में ७० से ज्यादा सीआरपीऍफ़ जवानों की मौत का जिम्मेदार है. दूसरी ओर उसी सरकार के गृहमंत्री और प्रधानमंत्री नक्सलियों को देश के लिए बड़ा खतरा बता रहे हैं. देश की अवाम उलझन में है कि आखिर सही कौन है और गलत कौन. वैसे राजनीति तो यही चाहती है कि जनता उलझन में रहे, अँधेरे में रहे, गलत फहमी में रहे ताकि नेताओं की रोजी-रोटी चलती रहे.


अब तक इन नक्सलियों को बंगाल की वामपंथी सरकार दूध पिलाती रही. और जब इस नाग ने ज्यादा भयंकर रूप अख्तियार करके सरकार के लिए ही चुनौती खड़ी कर दी तो दूध की सप्लाई बंद कर दी गयी. सो अब नक्सलियों को ममता की छाँव मिल गयी है. वैसे ये सबकी समझ में अच्छी तरह से है कि ममता की ये दरियादिली केवल बंगाल में आने वाली चुनावों के चलते है. ममता जानती हैं कि केंद्र सरकार कितना भी प्रतिबन्ध क्यों न लगा ले लेकिन नक्सलियों को बंगाल के दबे, कुचले, पिछड़े वर्ग का भरपूर समर्थन है. शायद इसीलिए ममता की रैली में मेधा पाटकर, अरुंधती राय और आर्य समाज के भगवा चोले में खांटी वामपंथी स्वामी अग्निवेश भी नज़र आये.


एक बात का इतिहास गवाह है, जिसने भी हिंसक संगठनो को पाला-पोसा है अंत में वो खुद उस संगठन का शिकार बना है. चाहे वो अमेरिका हो, पाकिस्तान हो या फिर भारत के वामपंथी दल. जिन नक्सलियों का दीदी आज समर्थन कर रही है वही नक्सली एक दिन ममता के लिए खतरा बनेंगे. क्योंकि आसार ऐसे बन रहे हैं कि शायद ममता का सपना इस बार बंगाल में होने वाले चुनाव में पूरा हो जाये. मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता से ये नक्सली संभाले नहीं संभलेंगे.


कुल मिलाकर जनता को गुमराह किया जा रहा है. कुछ वैसे ही जैसे कश्मीर में किया गया. वहां के लोगों को आज़ादी का सपना दिखाकर. कश्मीर में आज जो भी हालात हैं उनके लिए अब्दुल्लाह परिवार पूरी तरह दोषी है. जिसने वहां की सत्ता की खातिर कश्मीरियों को जमकर गुमराह किया, अलगावादियों का समर्थन किया और आज परिणाम सामने हैं. मजेदार बात ये है कि वही अब्दुल्लाह परिवार कश्मीर में कुछ और बात करता है और दिल्ली में कुछ और. यही राजनीति का असली चेहरा है. इन सब चालों का शिकार भोली जनता बनती है. क्योंकि हिंसा में मरने वाले या तो सरकारी जवान होते हैं या फिर भोली अवाम. शर्म है ऐसी राजनीति पे.  

युवाओं का बदलता मनोविज्ञान: नौकरी से आगे बढ़कर “स्वनिर्माण” की ओर

भारत का युवा एक मानसिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। कुछ वर्ष पहले तक एक अच्छी नौकरी - विशेषकर सरकारी नौकरी या किसी बड़ी...