शनिवार, 26 मई 2012

भारत और भारतीयों की बढ़ती शक्ति


मैंने अपने ब्लॉग पर क्लस्टर मैप लगा रखा है जो ब्लॉग पर आने वाले रीडर्स का लेखा-जोखा रखता है. खालिस हिंदी भाषा का मेरा ब्लॉग भारत के अलावा विश्व के कई देशों में पढ़ा जाता है. क्लस्टर मैप को मानें तो भारत के बाद सबसे ज्यादा रीडर्स अमेरिका से हैं, फिर तायवान, यूरोप और ऑस्ट्रिेलिया से. ऐसा नहीं है कि मैं बहुत बड़ा लिक्खाड़ हूं या कोई सेलिब्रिटी हूं. बल्कि सच ये है कि हिंदी के सभी ब्लॉग्स पूरे विश्व में पढ़े जाते हैं. हिंदी के लवर्स और ब्लॉगर्स केवल भारत में ही नहीं बल्कि विश्व भर में फैले हैं. ये हिंदी और हिंदुस्तानियों की बढ़ती शक्ति का प्रतीक है.

जिस तरह से इंडियन डायसपोरा अखिल विश्व में फैल हुआ है उसे देखकर मुझे भारत की बढ़ती जनसंख्या में अब समस्या नजर नहीं आती. अभावों में पैदा हुए भारतीयों ने अपने जिंदगियों को बेहतर बनाने के लिए कमरतोड़ मेहनत की और कर रहे हैं. विदेशों में भी भारतीयों ने अपना परचम लहराकर अपनी काबिलियत एक बार नहीं बार-बार सिद्ध की. चाहे राजनीति हो या उद्योग, आईटी हो या स्पेस टेक्नोलॉजी विदेशों में रह रहे भारतीय हर क्षेत्र में अपना लोहा मनवा रहे हैं.

और ऐसा भी नहीं है कि अप्रवासी भारतीयों ने ये मुकाम यूं ही हासिल कर लिया. उन्होंने तमाम तरह के नस्लभेद और रंगभेद भी झेले हैं और झेल रहे हैं. लेकिन अपनी मजबूत एकजुटता के चलते वे अपना अस्तित्व बचाए हैं. जब भी किसी देश से भारतीयों पर हमले की खबर आती है तो भारत में रह रहे भारतीयों का खून खौल कर रह जाता है. इसलिए नहीं कि भारतीयों में बड़ा प्रेम है, बल्कि इसलिए कि भले ही आपस में एक दूसरे की गर्दन काटें, लेकिन किसी बाहरी ताकत का हमला होने पर हम भारतीय उसके हलक में हाथ डाल देते हैं. ये भारतीयों का नेचर है.

दूसरी चीज भारतीय भारत में भले ही एक-दूसरे की गर्दन काटने को आतुर रहते हों, लेकिन दूसरे देशों की धरती पर वे 'भयंकर' एकजुटता के साथ रहते हैं और एक-दूसरे को प्रोमोट करते हैं. भारत में भले ही वेस्टर्न कल्ट एडॉप्ट किया जा रहा हो, लेकिन अप्रवासी भारतीयों ने भारतीय संस्कृति को बखूबी संजो रखा है. चाहे संयुक्त परिवार संस्था हो या तीज-त्योहार अगर कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो मोटेतौर पर अप्रवासी भारतीय अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं. हम भले ही नमस्ते का अर्थ न जानते हों, लेकिन अप्रवासी भारतीयों ने विदेशियों को इसका मतलब बखूबी समझा दिया है. अप्रवासी भारतीय अपनी हर परंपरा, रीति-रिवाज और तीज-त्योहार के पीछे छिपे तर्कों को अच्छी तरह जानते हैं, क्योंकि वहां उन्हें हर चीज के पीछे प्रश्न झेलने पड़ते हैं कि आप बिंदी क्यों लगाते हैं, माथे पर टीका क्यों लगाते हैं, मांग में सिंदूर क्यों भरते हैं वगैराह-वगैराह. भारत में क्योंकि ये प्रचलन है इसलिए न कोई पूछता है और न कोई इस पर ध्यान देता है. लेकिन विदेशियों के सवालों पर अप्रवासी भारतीयों ने अपनी हर परंपरा के पीछे छिपे विज्ञान और तर्क को खोजकर उनका जवाब दिया है. ये एक अच्छा सिग्नल है.

मैंने अब तक जितने भी अप्रवासियों को जाना और पहचाना उससे महसूस हुआ कि अप्रवासी भारतीयों में भारत को शक्तिशाली, विकसित और सुंदर देश के रूप में देखने की तीव्र और सच्ची उत्कंठा है. भारतीयों और भारत सरकार की नजर भले ही अप्रवासियों के धन पर हो, लेकिन अप्रवासी सच्चे दिल से भारत को शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं. न केवल वे दोनों हाथ खोलकर भारतीय संस्थानों और सामाजिक संस्थाओं में दान देते हैं बल्कि विदेशों में भी वे भारत के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास करते हैं. 

स्वामी विवेकानंद ने 2012 को परिवर्तन का वर्ष बताया था कि इसी साल से भारत एक शक्ति बनकर उभरना शुरू होगा. अतर्राष्ट्रीय मानचित्र पर जो माहौल बन रहा है उसको देखकर लगता भी है कि आने वाले दिनों में भारत विश्व में अहम भूमिका निभाने जा रहा है. और भारत को इस मुकाम पर पहुंचाने में निश्चित तौर पर अप्रवासी भारतीयों की अहम भूमिका होगी.

सोमवार, 21 मई 2012

आईपीएल: समरथ को नहिं दोष गोसांई!

कहते हैं कि क्रिकेट पहले नवाबों का खेल था. कम ही लोग इसे खेलते और देखते थे. लेकिन जब कपिल देव की अगुवाई में भारतीय टीम ने विश्वकप झटका तो एकाएक क्रिकेट राष्ट्र का गौरव बन गया. दूरदर्शन पर लाइव टेलिकास्ट की बदौलत न केवल घर-घर में युवाओं की पसंद बना बल्कि मोहल्ले की गलियों से लेकर घर की छतों तक लघु रूप में खेला जाने लगा. फिर जब सचिन जैसे महान बल्लेबाज का क्रिकेट की पिच पर जन्म हुआ तो क्रिकेट उन बुजुर्गों और महिलाओं की भी पसंद बन गया जिन्होंने कभी बल्ला पकड़ के नहीं देखा था.

क्रिकेट के प्रति लोगों की बढ़ती दीवानगी को देखकर बाजार के मगरमच्छों को इसमें खेल से कुछ ज्यादा नजर आने लगा और खेल-खेल में क्रिकेट दौलत की एक बहती गंगा बन गया. नैतिकता के झंडाबरदारों को उस समय क्रिकेट का व्यवसायीकरण करना ठीक न लगा और उन्होंने नैतिकता के सवाल खड़े किए. पर वो सवाल कान पर जूं की तरह रेंगे और फिसल गए.

फिर क्रिकेट के सफर में तीसरा चरण आया. लाइव टेलिकास्ट में मिनट-मिनट पर विज्ञापन मिलने लगे. खिलाडिय़ों की क्रिकेट से कम और विज्ञापन करने से ज्यादा कमाई होने लगी. नैतिकता के पैरोकारों ने फिर से नाक-भौंह सिकोड़ी, लेकिन फिर से उनकी एक न सुनी गई.

इधर बाजार में बैठे मगरमच्छ इतने से संतुष्ट नहीं थे. वे क्रिकेट की दुधारू गाय को और दूहना चाहते थे कि उसमें दूध का एक भी कतरा न बचे. सो, उन्होंने क्रिकेट में ग्लैमर और टेक्नोलॉजी का तड़का लगा दिया और बन गया आईपीएल. क्रिकेट की मंडी सजाई गई और सात समंदर पार से खिलाड़ी अपनी बोली लगवाने आए. लंबे समय बाद लोगों ने इंसानों को नीलाम होते देखा, लेकिन मॉडर्न जमाने में सब चलता है टाइप बातें कहकर सबने इसे पचा लिया. क्रिकेटरों के हेलमेट, बल्ले, ट्राउजर, जर्सी सब कुछ बिकाऊ हो गया. किसी न किसी ब्रांड ने उनके हर अंग को खरीद लिया. नैतिकता के सिपाहियों ने फिर से हाथ-पांव उछाले पर वे उछलते रह गए और कारवां बढ़ता गया.

आईपीएल दिन दोगनी-रात चौगुनी तरक्की करने लगा. पैसे का गुरूर रह-रहकर बोलने लगा. क्रिकेट अब क्रिकेट न रहकर शराब, शबाब, ग्लैमर, टेक्नोलॉजी, सट्टेबाजी, सेक्स और ड्रग्स की भयानक कॉकटेल बन गया, जो सोना बनकर बरस रहा है. कमाने वाले अपनी थैलियां भर रहे हैं. नेता हों या अभिनेता, वर्तमान क्रिकेटर हों या पूर्व क्रिकेटर, चैनल हों या रेडियो एफएम, अखबार हों या मैग्जीन सबके मुंह में सोना भर दिया गया. तनाव की मारी जनता मैदानों में पहुंचकर और टीवी से चिपककर ये सबूत देती रही कि पब्लिक इसे पसंद करती है. कमाई करने वाले इसी बात की दुहाई देकर मलाई उतारते रहे.

क्रिकेट की इस भयंकर कॉकटेल को जो भी पिएगा तो उसके कदम थोड़े बहुत तो बहकेंगे ही न. क्या हुआ जो रईस शाहरुख ने गरीब गार्ड से बद्तमीजी की, गरीब की कैसी इज्जत. क्या हुआ जो रेव पार्टी में खिलाड़ी पकड़े गए, आखिर पैसा कमाया तो खर्च भी तो करना पड़ेगा. क्या हुआ जो एक मॉडल से माल्या के लड़के और अजीब से नाम वाले एक खिलाड़ी ने छेड़खानी की, नशे में छोटी-मोटी गलतियां हो ही जाती हैं. फिक्सिंग को तो गलत मानना ही नहीं चाहिए, आईपीएल में नहीं कमाएंगे तो कहां कमाएंगे.

मैं एक बार कपड़े की दुकान में गया तो वहां पर एक स्टिकर चिपका देखा, जिस पर लिखा था- "फैशन के इस दौर में गारंटी की इच्छा न करें". शायद यही बात आईपीएल पर भी लागू होती है कि- "पैसे की इस दौड़ में नैतिकता की इच्छा न करें".

रविवार, 20 मई 2012

एक गर्म चाय की प्याली हो...


मोंटेक सिंह आहलुवालिया का ये आश्वासन कि अगले साल अप्रैल में चाय को राष्ट्रीय पेय घोषित कर दिया जाएगा, आश्वासन ही रह गया। केंद्र सरकार फिलहाल चाय को ये दर्जा न देने का मन बना चुकी है। मोंटेक के आश्वासन के बाद साफ लगने लगा था कि चाय राष्ट्रीय पेय बन जाएगी. लेकिन केंद्र सरकार ने चाय को ये दर्जा देने पर खड़े होने वाले संभावित विवादों को पहले ही ताड़ लिया और ये फैसला टाल दिया.

चाय को राष्ट्रीय पेय बनाने पर सवाल यही उठता कि आखिर चाय ही क्यों? देश में हजारों तरह के पेय हैं, सब के सब एक से बढ़कर एक, तो फिर चाय ही क्यों? पंजाब वाले लस्सी लेकर आ जाते, हरियाणे वाले दूध लेकर खड़े हो जाते, जम्मू कश्मीर वाले कहवा को लेकर शोर मचाने लगते, यूपी वाले छाछ की बाल्टी लेकर दस जनपथ पहुंच जाते, गुजरात की पूरी श्वेत क्रांति दिल्ली पहुंच जाती, दक्षिण वाले कॉफी की प्याली फूंकने लगते, बाबा रामदेव एलोवेरा जूस के पक्ष में आवाज उठाते, सारे क्रिकेटर पेप्सी-कोक को राष्ट्रीय पेय बनाने पर अड़ जाते, दारूबाज पियक्कड़ शराब को भी यही दर्जा देने की मांग करने लगते, चाय के खिलाफ स्वदेशी और राष्ट्रवादी आंदोलन खड़े हो जाते और न जाने क्या-क्या हो सकता था? सो, केंद्र सरकार के किसी समझदार सचिव ने अपनी तजुर्बेकार आखों पर चढ़े चश्में के लेंस से दूरदृष्टि का प्रयोग करके इन संभावित खतरों को देख लिया होगा और सरकार से इस जोखिम को न उठाने की सलाह दी होगी। 

हालांकि मोंटेक सिंह के आश्वासन के बाद चाय उत्पादकों ने उत्सव सा मनाना शुरू कर दिया था। लेकिन सरकार की न-नुकुर के बाद सब फुस्स हो गया। चाय को राष्ट्रीय दर्जा मिलने पर बीबीसी हिंदी भी कुछ कम खुश नहीं था। बीबीसी ने तो भारत में चाय के अच्छे उत्पादन के पीछे ब्रिटेन की औपनिवेशिक नीतियों की पीठ भी थपथपानी शुरू कर दी और बारे में इतिहास खंगालू लेख भी लिख डाले। बीबीसी के मुताबिक 2011 में 85 करोड़ किलोग्राम चाय की खपत देश में ही हो गई। अगर चाय के प्रति भारतीयों की दीवानगी ऐसी ही चलती रही तो भारत को आने वाले समय में चाय का आयात करना पड़ सकता है।

वैसे सच है कि देश में चाय एक नशा बन चुकी है। कहते हैं कि इंडिया में एवरी टाइम इज टी टाइम, यानि यहां चाय का कोई समय नहीं, जब चाहो, जहां चाहो। घर में कोई मेहमान आए उसकी लाख खातिरदारी कर लीजिए, लेकिन अगर चाय न पिलाई तो भाड़ में गई सब खातिरदारी। सरकारी मीटिंग हो या ट्रेड यूनियन की मीटिंग चाय के बिना अधूरी। ठेठ राष्ट्रवादी और स्वदेशी के झंडाबरदार तमाम नेताओं की जिंदगी का आधार भी चाय ही है। सुबह से शाम तक सात्विक भोजन पर प्रवचन देने वाले संतों के आश्रमों में भी चाय का दबदबा कायम है। कई मंत्री तो चाय के नाम पर ही सालाना लाखों डकार जाते हैं। किसी सरकारी विभाग में काम कराने जाओ तो क्लर्क रिश्वत की जगह चाय-पानी के लिए पैसे मांगता है। लड़की का रिश्ता तय होता है तो वो अपने संभावित ससुराल वालों के सामने चाय की ट्रे लेकर ही प्रकट होती है। रेलवे स्टेशन पर फेरी वाले की अंतडिय़ों से निकलने वाली चाय-चाय की आवाज न हो तो काहे का स्टेशन। कुछ लोगों को अगर उनकी पत्नी सुबह-सुबह चाय ने दे तो उनका पेट हल्का नहीं हो पाता। कहानीकार और पत्रकार न जाने कितने किस्से कहानियां चाय के खोखे पर ही बनाते हैं। भारत में चाय की महिमा अपरंपार है। लिखते-लिखते लव हो जाए। लेकिन इस महिमा मंडन के चलते चाय को राष्ट्रीय पेय बना दिया जाए, तो ये बात कुछ हजम नहीं होती।

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

नकली खुशी बनाम असली खुशी !

बात तब की है जब अपन छोटे थे। पापा की सरकारी नौकरी। किराए का मकान। घर में एक ब्लैक एंड व्हाइट टीवी, जिस पर शटर लगा था और उस टीवी पर दूरदर्शन की प्रस्तुति। समझ ही नहीं आता था कि इत्ते सारे लोग इस छोटे से डिब्बे के अंदर कैसे सोते थे। खैर, अब ये तो समझ आ गया कि इत्ते सारे लोग बुद्धू बक्से में कैसे सोते हैं। लेकिन ये आज तक समझ नहीं आया कि उसमें दिखाए जाने वाली विज्ञापनों की दुनिया इत्ती खुशहाल क्यों होती है। सारे के सारे जरूरत से ज्यादा खुश पहले भी दिखते थे आज भी दिखते हैं। अपने मसूढ़ों को आखिरी छोर तक दिखाने पर आमादा रहते हैं। उनकी खुशहाल दुनिया के सामने अपन की दुनिया तो ऐसी लगती है मानो अपन तो धरती पर भार ही बढ़ा रहे हैं।
 
उस समय एक विज्ञापन आता था किसान यूरिया का, जिसमें एक किसान बड़ा खुश होकर और गाना गाकर अपने खेत में खाद बिखेर रहा होता था। इस तरह के तमाम विज्ञापनों का बाल मन पर खासा असर पड़ता। छुट्टियों में गांव जाना हुआ। चाचा ने कहा कि आज खेत में खाद डालना है। इतना सुनते ही हम खुश। हमारे लिए खाद डालने का मतलब था चाचा खेत में जाकर गाना गाएंगे। हमने जिद ठान ली कि हम भी साथ चलेंगे। खैर, चाचा ने बुग्गी में दो खाद के बोरे रखे, तीन लोहे की बाल्टी और चल दिए खेत पर। खेत पर जाकर चाचा ने हमें मेंढ पर बैठा दिया, दो मजदूरों को संग लिया, बाएं हाथ में बाल्टी लटकाई और दाएं हाथ से खाद बिखेरना शुरू कर दिया। हमको मामला जंचा नहीं और बेहद नाॅन रोमांटिक लगा। हमने कहा चाचा खाद ऐसे थोड़ी बिखेरते हैं। खाद बिखेरते हैं तो गाना गाते हैं। हमने टीवी पर देखा है। चाचा हंस दिए और हम बच्चों का मन रखने के लिए उन्होंने एक गाना गाया। लेकिन चाचा की आवाज में वो चीज नहीं आ पा रही थी, जो टीवी वाले किसान की आवाज में थी। दूसरा बैकग्राउंड में म्युजिक भी नहीं था। तीसरा चाचा उतने खुश भी नहीं लग रहे थे, जितना टीवी वाला किसान था। वो तो बीच-बीच में मजदूरों को हिदायतें दे रहे थे, ऐसे नहीं, वैसे नहीं।
 
उस क्लोज-अप वाले मुंडे को ही लो, मंजन करते ही उसका काॅन्फीडेंस आसमान छूता है। चारों तरफ तितलियों की तरह लड़कियां इठलाने लगती हैं। दांत रगड़ते-रगड़ते तीस साल हो गए, आज तक उस मुंडे का दस प्रतिशत काॅन्फीडेंस भी नहीं आया। किसी काॅलेज का विज्ञापन देखा है कभी- काला गाउन पहने, सिर पर चैकोर टोपी लगाए, हाथ में डिग्री लेकर उसका ग्रेजुएट अपनी टांगें मोड़कर आसमान में ऐसा उछलता है मानो इंद्र का सिंहासन मिल गया हो। लेकिन असल जिंदगी में जब भी मैं किसी काॅलेज के काॅन्वोकेशन में गया तो वहां अपने अंधकारमय फ्यूचर में मोटा चश्मा लगाकर झांकते डिप्रेस्ड स्टूडेंट्स ज्यादा नजर आए और आसमान में उछलता हुआ कोई न दिखा। आजकल रीयल एस्टेट में विज्ञापनों का सबसे ज्यादा जोर है। चैक-चैबारों पर लगे बड़े-बड़े साइन बोर्ड ऐसे वादे करते दिखेंगे कि आपको दो कमरे का दड़बा नहीं, बल्कि एक राजमहल बेच रहे हों। बीस परसेंट की छूट देकर आप पर एहसान भी कर रहे हैं। लेकिन बुकिंग करवाने से लेकर पजेशन लेने तक आपके घुटनों में से एक-एक बूंद तेल न निकलवा लें तो बात है।
 
लेकिन वो दुनिया खुशहाल है। उस दुनिया का युवक जरा सा डियोडरेंट ही छिड़क ले तो लड़की हां कर देती है, इस दुनिया का युवक प्रोपोज करते-करते अपनी जान ही क्यों न छिड़क दे तब भी लड़की के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। शायद इस दुनिया की सारी लड़कियां मेडिकर लगाने लगी हैं। उस दुनिया में आईपीएल देखना एक उत्सव है और इस दुनिया में घर के अंदर देर रात टीवी चलाना एक महाभारत है। उस दुनिया में कपड़े धोने में गोविंदा स्त्री की मदद करता है, इस दुनिया में घर की गृहणी को कपड़े रगड़ते-रगड़ते सालों बीत गए पर पति महोदय ने दो शब्द तारीफ के नहीं बोले। इस दुनिया के लोगों ने वो सारी चीजें खरीदकर देख लीं जो विज्ञापन की दुनिया में दिखाई जाती हैं, लेकिन वैसी वाली खुशी घर में आज तक नहीं आई। ये बात आज तक मेरी समझ में नहीं आई। या तो उस दुनिया की खुशी नकली है या फिर इस दुनिया में टेंशन बहुत ज्यादा है।

मंगलवार, 27 मार्च 2012

भारतीय गांव तो पान सिंह तोमर जैसे बागी पैदा करने की फैक्ट्री हैं

विकिपीडिया पर पान सिंह तोमर की तस्वीर
फिल्म पान सिंह तोमर भारतीय ग्रामीण परिवेश की सच्ची तस्वीर दिखाती है। उस तस्वीर से बिल्कुल अलग जो कवियों की कविताओं में होती है- संुदरता, प्यार और सौहार्द से भरे गांव! शायद पहले कभी ऐसे गांव रहे हों जो प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण हों, जहां के समाज में आपसी सौहार्द हो, आज हिंदी क्षेत्र के अधिकांश गांव पान सिंह तोमर के गांव से मेल खाते हैं, जहां की परिस्थितियों ने एक बेहतरीन प्रतिभा को बागी (डकैत नहीं; डकैत तो पान सिंह तोमर ने फिल्म में बता ही दिया था कि कहां मिलते हैं।) बनने पर मजबूर कर दिया। उत्तराखंड और हिमाचल में जरूर ऐसे गांव बचे हैं जहां प्राकृतिक सौंदर्य भी है और आपसी सौहार्द भी। लेकिन अब वहां भी धीरे-धीरे राजनीति और पैसे की होड़ पहुंचती जा रही है।

पढ़ाई के दौरान 2004 में काॅलेज टूर पर एक बार मनाली जाना हुआ। हिमाचल का खूबसूरत गांव जो अटल जी को खासा प्रिय है। वहां के लोकल टैक्सी ड्राइवर से हुई बातचीत मुझे आजतक याद है। पत्रकारिता के छात्र होने के नाते मैंने केलांग और सोलांग के रास्ते पर उससे कई सवाल किए थे। मनाली और हिमाचल के सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक पक्ष से जुड़े सवाल। बात मनाली के सेबों की और पहाड़ी आलुओं की हुई तो उसने बताया- ‘‘फसल को बेचने के लिए यहां के किसानों को दिल्ली और मुंबई के बाजारों में नहीं जाना पड़ता। हमारे गांव का ही एक एजेंट वहां होता है, जो सबकी फसल की चिंता करता है। हमारा आपसी विश्वास इतना गहरा है कि कोई भी उस एजेंट पर शक नहीं करता, वो जितनी रकम भेजता है वो हमें स्वीकार होती है। और हमें पता है कि वो हमारे साथ कुछ गलत कर ही नहीं सकता। वैसे भी गांव के लोग बेहद भोले हैं वे दिल्ली और मुंबई के बाजारों में फिट नहीं बैठते।’’ काॅलेज टूर पर एक और छोटी सी घटना घटी। हमारी गाड़ी के पीछे चल रही इन्नोवा में जो लड़के सवार थे, उनमें से किसी ने मनाली की एक लड़की को देखकर कोई फब्ती कसी, जिसे सुनकर गाड़ी के ड्राइवर ने गाड़ी को वहीं रोक लिया और गाड़ी चलाने से इंकार कर दिया। उसने लड़कों से कहा ‘‘मनाली की लड़कियां हमारी मां बहनें हैं। आप लोगों को ये सब करना है तो पैदल चले जाइए। यहां का कोई भी ड्राइवर ये सब बर्दाश्त नहीं करेगा।’’ काॅलेज स्टाफ के लड़कों को डांटने और ड्राइवर से माफी मांगने के बाद काॅनवाॅय आगे बढ़ा।

मनाली की ये तस्वीर मैदानी क्षेत्र के गांवों से कतई भिन्न है। मैदानी क्षेत्र के गांव आज ईष्र्या, द्वेष और डाह के शिकार बनकर रह गए हैं। गांवों में रंजिशें, जमीनों को लेकर हत्याएं, मुकदमेबाजी आम हो गई है। छोटी-छोटी बातों को लेकर एक-दूसरे की जान का दुशमन बन जाना, दूसरे की तरक्की देखकर जलना, ईष्र्या के कारण द्वेष रखना और फिर उस द्वेष का रंजिश में बदल जाना और फिर शहर की कचहरियों के चक्कर लगाना गांवों का शगल बनता जा रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में ऐसी-ऐसी चीजों को लेकर मुकदमेबाजी के दिलचस्प केस मिल जाएंगे कि गधों को भी हंसी आ जाए। मसलन- खेत की मेंढ को लेकर, चैक के कुएं को लेकर, दल्लान में बैठने को लेकर, घर में गिर रहे पनारे या नालियों को लेकर, खेत में भैंस के घुस जाने पर और न जाने कैसी-कैसी हास्यासपद चीजों पर लोग आपस में भिड़ने को तैयार रहते हैं और उस भिडं़त को कोर्ट-कचहरी तक ले जाने में गुरेज नहीं करते। घर चाहे खाने के लाले पड़ रहे हों, लेकिन नाक की झूठी लड़ाई वो पेट पर पत्थर बांधकर लड़ने को भी तैयार हैं। लोगों की आपसी जलन और अहम की लड़ाई न तो उन्हें न तो खुद की तरक्की करने दे रही है और न ग्रामीण समाज की। इस तरह की ओछी लड़ाइयां ग्रामीण समाज को नई सोच देने में बड़ी बाधा बनी हुई है। अगर उस दौर में पान सिंह तोमर को एक श्रेष्ठ धावक से एक बागी बनकर बंदूक उठानी पड़ी तो आज का दौर भी कुछ भिन्न नहीं है। आज के गांवों में भी तमाम युवा ऐसे हैं जिनकी आंखों में आगे बढ़ने के सपने हैं, देश के प्रति सपने हैं, लेकिन गांव की आपसी रंजिशें और आए दिन की छोटी-छोटी परेशानियां उन्हें आगे नहीं बढ़ने देतीं।

राजनीति जब अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर हो तो ठीक लगती है लेकिन जब वो गिरते-गिरते ग्रामीण स्तर तक पहुंच जाए तो बेहद हानिकारक सिद्ध होती है और हो भी रही है। पंचायती राज व्यवस्था बनाई तो गई थी गांवों के विकास के लिए, लेकिन इस व्यवस्था ने ग्रामीण समाज का जितना नुकसान किया शायद उतना किसी चीज ने नहीं किया। ग्राम प्रधान या सरपंच पद को लेकर होने वाली ग्रामीण स्तर की राजनीति ने गांव के समाज को बुरी तरह बांटकर रख दिया। और इतना गहरा बांटा है कि खाइयों को पाटना नामुमकिन लगता है। पंचायती राज व्यवस्था के तहत होने वाले चुनावों से हो रहे नुकसान को शायद अन्ना हजारे को भी दिखा होगा, तभी तो रालेगणसिद्धि से जुड़े तमाम गांवों में ग्राम प्रधान के चुनाव नहीं होते, बल्कि सरपंच को सर्वसम्मति से चुना जाता है। गांवों के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत रखने के लिए अन्ना द्वारा उठाया गया ये एक बेहद जरूरी कदम है। भारत के गांव अगर इसी तरह राजनीति के शिकार होते रहे तो फिर गांवों को बचाना मुश्किल होगा। सांप जब बाहर घूमता है टेढ़ा-मेढ़ा होकर चलता है, लेकिन जब भी अपने घर में घुसता है तो सीधा घुसता है। गांव भारत के सच्चे घर हैं, राष्ट्रीय स्तर पर भले ही राजनीति का टेढ़ापन झेला जा सकता है, लेकिन अगर राजनीति का ये टेढ़ापन गांवों में घुसता रहा तो नुकसान ही नुकसान है। गांवों को राजनीति से दूर सीधी-सादी जिंदगी से भरा ही रहने दिया जाए तो बेहतर होगा। खासतौर से हिंदी पट्टी के मैदानी क्षेत्र के गांवों को पहाड़ के ग्रामीण समाज से और अन्ना के रालेगणसिद्धि से काफी कुछ सीखने की जरूरत है।

सोमवार, 19 मार्च 2012

लालू के बाद अब बिहार के आलू का जलवा


अब तब बिहार लालू के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन अब अपने आलू के लिए भी जाना जाएगा। जी हां, खबर है कि बिहार में नितीश कुमार नाम के एक किसान ने जैविक खेती के माध्यम से आलुओं की रिकाॅर्ड पैदावार की है (ये संयोग ही है कि किसान का नाम वहां के मुख्यमंत्री के नाम से मिलता है)। किसान ने 72.9 टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से आलुओं की पैदावार कर एक विश्व कीर्तिमान स्थापित किया है।

ये खबर पढ़ते वक्त मुझे मेरठ के सेंट्रल पटैटो रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीपीआरआई) की याद आ गई। मेरठ में पत्रकारिता के दौरान सीपीआरआई के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक का इंटरव्यू करने का मौका मिला। बातों-बातों में जब उनसे मैंने पूछा कि अनाज, सब्जियों और फलों में जो पहले स्वाद हुआ करता था वो कहां विलुप्त होता जा रहा है। न गेहूं की रोटी में वो खुशबू हैं न अरहड़ की पाॅलिश्ड दाल में वो स्वाद, कहीं आने वाली पीढ़ी स्वाद से वंचित तो नहीं होने जा रही? क्या अब लोग केवल पेट भरने के लिए खाएंगे और स्वाद भूल जाएंगे? और क्या आलुओं में जेनेटिकली माॅडिफाइड बीजों के इस्तेमाल की तरफ कदम बढ़ाए जा रहे हैं?

इन सवालों के जवाब में  उन्होंने माना कि ये सही बात है कि अनाज, दलहन, तिलहन, सब्जियों और फलों में से स्वाद गायब हो रहा है, जिसका कारण है अधिक से अधिक पैदावार के लिए खेती के तौर तरीकों में बदलाव। उन्होंने कहा कि देश की आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है और उपजाऊ जमीनें उसी तेजी के साथ घट रही हैं। कृषि वैज्ञानिकों के ऊपर दबाव है कि वे बढ़ती आबादी के अनुपात में फसलों की पैदावार भी बढ़ाएं। और अगर पैदावार बढ़ानी है तो कहीं न कहीं स्वाद के साथ समझौता करना ही होगा। कृषि के परंपरागत तौर-तरीकों को छोड़कर खेती में आज जीएम बीज (जेनेटिकली माॅडिफाइड), हाइब्रिड बीज और केमिकल्स का प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि आलू हाई एनर्जी फूड है और क्योंकि भारत की अधिकांश गरीब जनता पेट भरने के लिए आलू पर निर्भर है तो आलू की पैदावार लगातार बढ़ानी ही होगी। इसके लिए जीएम बीजों के प्रयोग पर भी विचार किया जा रहा है।

लेकिन बिहार से जो खबर आई है उसके मुताबिक वहां के किसान ने जैविक खेती के माध्यम से आलू का रिकाॅर्ड उत्पादन किया है। अगर ये बात सही है तो उन कृषि विशेषज्ञों के लिए ये आइना दिखाने वाला है जो मानते हैं कि जीएम बीजों और केमिकल्स के बिना पैदावार को नहीं बढ़ाया जा सकता। जिस समय देश में हरित क्रांति आई थी उस समय खेती के गैर-परंपरागत तरीकों को अपनाना एक मजबूरी हो सकती थी, लेकिन अब हम इतने मजबूर नहीं हैं कि जैविक खेती को सिरे से नकारते रहें और उस दिशा में प्रयास ही न करें। किसी प्रजाति की जींस में छेड़छाड़ करके बाजार और मनुष्य की जरूरतों के अनुरूप तैयार किए जा रहे जीएम बीजों की खासियत ये है कि ये बीज एक ही बार इस्तेमाल किये जा सकते हैं। इन बीजों के फलों से जो बीज प्राप्त होते हैं वे दोबारा नहीं बोए जा सकते। दोबारा बोने के लिए आपको फिर से बाजार पर निर्भर होना पड़ेगा। इन बीजों के रेट का अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं कि एक बार मेरी आंटी ने अपनी गढ़मुक्तेश्वर वाली जमीन में पपीते का बाग लगाने का सोचा, काफी विचार-विमर्श के बाद उन्होंने पूसा कैंपस से बीज खरीदने का प्लान बनाया। तो वहां पपीते के बीजों के रेट थे 90 हजारे रुपए किलो और 20 हजार रुपए किलो। 90 हजार वाले बीजों में ये गारंटी थी कि पपीते के हर पेड़ पर फल आएगा। क्योंकि साधरण पपीते के पेड़ों में जो नर पेड़ होते हैं उन पर फल नहीं लगते। लेकिन वैज्ञानिकों ने उत्पादन बढ़ाने के लिए इसका भी तोड़ निकाल लिया।

वैज्ञानिकों के तोड़ के बारे में तो पूछिए ही मत, उन्होंने किस-किसी चीज के तोड़ नहीं निकाले। पहले टमाटर काटते-काटते उसका दम निकल जाता था, लेकिन आजकल का टमाटर सेब की तरह कटता है और उसमें खटास नाम को नहीं मिलेगी, सब्जी को खट्टा करने के लिए अमचूर डालना पड़ता है। प्याज काटो तो अब आंसू नहीं निकलेंगे। पपीते के अंदर बीज नहीं निकलता। तरबूज में भी बीज कम हो गए हैं। चित्तीदार केला देखने को नहीं मिलता। फल और सब्जियां जल्दी खराब नहीं होते। और बीटी ब्रिंजल के बारे में तो सबको पता ही है। सभी फल और सब्जियां देखने में बेहद सुंदर और आकर्षक होते जा रहे हैं, लेकिन उनके अंदर गुण कितने बचे हैं ये किसी को नहीं पता। और अगर इसी तरह बीजों के लिए किसानों की निर्भरता बाजार पर बढ़ती गई तो गरीब किसान तो गया काम से। रही बात स्वाद की तो बाजारवाद के इस दौर में स्वाद और गुणों की इच्छा न करें, तो ही बेहतर होगा।

मंगलवार, 13 मार्च 2012

राजनीति में परिवारवादः मजबूत परिवार संस्था की निशानी?

भारतीय राजनीति पर हमेशा से परिवारवाद और भाई-भतीजावाद के आरोप लगते रहे हैं। तर्क ये कि लोकतंत्र में परिवारवाद के लिए जगह नहीं होनी चाहिए। मिसाल दी जाती है पश्चिमी देशों की। हालांकि इंग्लैंण्ड जैसा लोकतंत्र सदियों से एक शाही परिवार के अंगूठे के नीचे काम करता चला आ रहा है। अब इसे सही मानें या गलत, लेकिन भारतीय राजनीति में परिवारवाद कहीं न कहीं भारतीय समाज की मजबूत परिवार संस्था को ही दर्शाता है। जिन देशों में परिवार संस्थाएं बेहद कमजोर हैं वहां की राजनीति में भी परिवारवाद कम देखने को मिलता है। भारत समेत अधिकांश एशियाई देश भले ही लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत काम कर रहे हों, लेकिन वहां की राजनीति में परिवारों का खासा दखल है। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि इन देशों के समाज में परिवार आज भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। जबकि पश्चिमी देशों में परिवार संस्थाएं तेजी से भरभरा रही हैं।


देश के उत्तरी छोर से शुरू करते हुए अगर भारत पर नजर डालें तो- जम्मू कश्मीर की नेशनल काॅन्फ्रेंस में अब्दुल्ला परिवार और पीडीपी में मुफ्ती परिवार, उत्तर प्रदेश की सपा में मुलायम सिंह का परिवार और रालोद में चै. अजीत सिंह का परिवार, पंजाब के अकाली दल में बादल परिवार, हरियाणा के इनेलो में चैटाला परिवार, बिहार के राजद में लालू यादव परिवार, उड़ीसा के बीजद में पटनायक परिवार, महाराष्ट्र की शिव सेना में ठाकरे परिवार, तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार, ग्वालियर का सिंधिया परिवार और सबके ऊपर एक राष्ट्रीय परिवार- गांधी परिवार। भारत की राजनीति पूरी तरह परिवारों के गिरफ्त में है। भारतीय राजनीति में परिवार इतने महत्वपूर्ण हो चले हैं कि उनको राजनीति से अलग किया ही नहीं जा सकता। और जिस तरह जनता इन पारिवारिक पार्टियों के सिर पर जीत का सेहरा बांधती आ रही है, उसे देखकर तो यही लगता है कि आम जनमानस को परिवारवाद से कोई खास दिक्कत नहीं है।

वाम दल और भाजपा ऐसी पार्टियां हैं जहां पारिवारिक उत्तराधिकारी देखने को नहीं मिलते। भाजपा के वरिष्ठ नेता अपने बच्चों को सांसद और विधायक के पदों तक तो पहुंचाने में सफल रहे हैं, लेकिन किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के बेटे के सीएम-पीएम बनने के उदाहरण नहीं दिखते। भाजपा में संघ का दखल व अनुशासन और वाम दलों में पार्टी की सख्त कार्यप्रणाली व नीतियां इसके पीछे मुख्य कारण हो सकती है। लेकिन कांग्रेस समेत देश की बाकी पार्टियों में परिवारों का खासा बोलबाला है। वैसे भी ये तो इस देश की संस्कृति रही है कि पिता अपने पुत्र को और भाई अपने भाई को सदा से मजबूत बनाता चला आया है। तो अगर राजनीतिक दलों में ऐसा हो रहा है तो उसमें हैरान होने की कोई बात नहीं। भारत के जिन घरों में पिता-पुत्र और भाई-भाई के रिश्तों में दरारें हैं उन घरों को अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता। हमारे यहां खून के रिश्तों को इतना महत्व दिया जाता है कि सर्वोच्च पदों पर पहुंचने के बाद भी रिश्तों को दरकिनार नहीं कर सकते। जिस दिन भारतीय समाज में व्याप्त मजबूत परिवार संस्था कमजोर होगी उस दिन भारतीय राजनीति से भी परिवारवाद खत्म होना शुरू हो जाएगा।

इसमें कोई दो राय नहीं कि लोकतंत्र के लिए परिवारवाद अच्छा नहीं, लेकिन आजादी के 65वें साल में भी लाख हो-हल्ले के बावजूद देश की राजनीति से परिवारवाद नहीं मिट पा रहा है। अगर केंद्रीय सरकार की बात करें तो 65 में से तकरीबन 50 सालों तक एक मात्र नेहरू-गांधी परिवार की बादशाहत रही है। उसी तरह जम्मू-कश्मीर में अब्दुल्ला परिवार भी एकछत्र शासन करता चला आ रहा है। वैसे भारत में लोकतंत्र की स्थापना से पहले जो राजतांत्रिक व्यवस्था थी उसमें भी एक ही वंश लगातार शासन करता था। तो उस हिसाब से वर्तमान लोकतंत्र को उसी राजतांत्रिक व्यवस्था का सुधरा हुआ रूप भी कहा जा सकता है।

युवाओं का बदलता मनोविज्ञान: नौकरी से आगे बढ़कर “स्वनिर्माण” की ओर

भारत का युवा एक मानसिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। कुछ वर्ष पहले तक एक अच्छी नौकरी - विशेषकर सरकारी नौकरी या किसी बड़ी...