Saturday, December 27, 2014

चुनावों का देश बनता जा रहा भारत

लोकतंत्र और चुनाव एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं या कहें कि इनका चोली-दामन का साथ है। लेकिन देश में बार-बार चुनावी बुखार चढ़ना भी उचित नहीं हैं। भारत में किसी न किसी बहाने से चुनाव इतनी बार आते हैं कि इसे चुनावों का देश कहना गलत नहीं होगा। लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव एक साथ न होने की वजह से हर साल भारत में चुनावी मेला लगता है। बार-बार टीवी पर लोग भाषण, रैलियां, घोषणाएं, वादे, आरोप, प्रत्यारोप और राजनीतिक छीछालेदर देखते हैं। 

2014 को ही लें, मार्च, अप्रैल, मई में आम चुनाव हुए। इसके साथ में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उड़ीशा, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में भी चुनाव हुए। पूरा देश तकरीबन चार महीनों तक चुनावी बुखार की गिरफ्त मेें रहा। कुछ महीने भी नहीं बीते थे कि हरियाणा और महाराष्ट्र में चुनाव आ गए, फिर एक बार सियासी पारा चढ़ गया। अंत में साल जाते-जाते जम्मू-कश्मीर और झारखंड के विधानसभा चुनाव देश को राजनीतिक सरगर्मियों में ले गया।

अब आने वाले 2015 में अगर किसी राज्य में सरकार नहीं गिराई गई (या नहीं गिरी) तो दो बड़े चुनाव सूची में हैं- दिल्ली और बिहार। दिल्ली में चुनाव फरवरी और मार्च में होने की उम्मीद है, तो बिहार विधानसभा का कार्यकाल नवंबर में पूरा हो रहा है। इसके बाद फिर देश को 2016 में आसाम, केरल, पुद्दुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का सामना करना होगा। शायद ही कोई साल ऐसा हो जब देश में चुनाव मुंह बाय न खड़े हों।

अब लोकतांत्रिक देश है तो चुनाव तो होंगे ही। चुनाव से इंकार करने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है, पर प्रश्न ये है कि क्या बार-बार होने वाले चुनावी खर्च से बचने के लिए कोई रास्ता नहीं खोजा जा सकता। पाकिस्तान में पूरे देश के अंदर केंद्र और राज्य के चुनाव एक साथ होते हैं। पहले भारत में भी यही व्यवस्था थी, लेकिन राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता के कारण समयावधि बदलती चली गई। और आज ये स्थिति है कि देश हर साल ही नहीं, साल में कई-कई बार चुनाव कराने के लिए मजबूर है।

बार-बार होने वाले चुनावों के कारण केंद्र में बैठी सरकार को ठोस निर्णय लेने में बाधा आती है। देश में चुनावों के दौरान लोकलुभावन नीति अपनाने की परंपरा है, जिसके कारण राष्ट्रहित में कड़े फैसले लेने से केंद्र सरकार को डर लगता है। भारत में आम जनता की सोच अभी इतनी परिपक्व नहीं हुई है। यहां तो प्याज के बढ़े हुए दामों की वजह से भी पार्टियों को चुनाव हारने पड़ जाते हैं। 

इसलिए व्यापक राष्ट्रहित में ये जरूरी है कि देश केंद्र और राज्यों में चुनाव एक साथ हों। भाजपा ने इस मुद्दे को अपने एजेंडे में भी जगह प्रदान की थी, लेकिन फिलहाल इस दिशा में कोई पहल नहीं होती दिख रही है। केंद्र और राज्य में चुनाव एक-साथ कराने के लिए भले ही सहमति न बने या इसमें वक्त लगे, लेकिन कम से कम इतना तो किया जा सकता है कि किसी साल के भीतर होने वाले सभी चुनावों को एक-साथ क्लब करके एक साथ कराए जाएं। जैसे 2015 में दिल्ली और बिहार के चुनाव अलग-अलग महीनों में होंगे। इन दोनों चुनावों को साल के मध्य में एक साथ कराया जाए, इससे समय और धन दोनों की बचत होगी। ये व्यवस्था देने में कोई बहुत बड़ा पेच नहीं है, केवल राजनीतिक दलों के बीच आपसी सहमति बनाने की जरूरत है।

बार-बार चुनाव होने के कुछ फायदे भी हैं, खबरिया चैनलों को 24 घंटे चैनल चलाने के लिए भरपूर मसाला मिल जाता है, ओपीनियन पोल और एग्जिट पोल करने वाली सर्वे कंपनियों को चांदी कूटने का मौका मिल जाता है और चुनाव से जुड़े एक बड़े बाजार को बिजनेस मिल जाता है। पर बार-बार मचने वाले चुनावी शोर के बीच आम आदमी की समस्याएं और उसके मुद्दे कहीं दबते चले जाते हैं।

Wednesday, December 24, 2014

सुशासन दिवस : 25 दिसंबर को मिली एक और पहचान

यूं तो 25 दिसंबर क्रिसमस के लिए जाना जाता है, भारत में इसे बड़ा दिन भी कहा जाता है। इस साल से भारत में इस दिन को ‘सुशासन दिवस’ के रूप में एक और पहचान मिलने जा रही है। वर्तमान सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिवस को सुशासन दिवस के तौर पर मनाने का जो फैसला किया है, वो कई मायनों में उचित है। 1998 से लेकर 2004 तक अटल जी ने जिस नई किस्म की सरकार का नेतृत्व किया उन परिस्थितियों में देश को नई दिशा प्रदान करना कोई आसान काम नहीं था। 

भारत में 90 के दशक का उत्तरार्ध बेहद अस्थिरता भरा था। देश की जनता ने अपनी आंखों के सामने ओछे राजनीतिक स्वार्थ, सत्ता लोलुपता और क्षेत्रीय टिड्डी दलों की ब्लैकमेलिंग का नंगा नाच देखा। तमाम आर्थिक कमजोरियों के बावजूद देश को बार-बार चुनाव के खर्चीले दलदल में धकेला गया। सरकारें गिराना मानो बच्चों का खेल हो गया था। देश को 1996, 1998 और 1999 में चुनावी खर्च की मार झेलनी पड़ी। ऐसे माहौल में ये अटल जी का ही व्यक्तित्व था जिन्होंने तमाम दलों के साथ सामंजस्य बिठाकर देश को अस्थिरता के माहौल से बाहर निकाला।

एनडीए के न्यूनतम साझा कार्यक्रम के साथ उन्होंने देश हित में कई बड़े फैसले किए। परमाणु बम परीक्षण के बाद देश पर लगे तमाम आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद उनकी नेतृत्व वाली सरकार देश को आत्मनिर्भरता प्रदान करने में सफल रही। कोई सोच भी नहीं सकता था कि भाजपा जैसी घोर दक्षिणपंथी पार्टी की सरकार पाकिस्तान के साथ दोस्ती की बात करेगी। ये अटल जी ही ही दूरदृष्टि थी कि वो बस लेकर लाहौर गए और कारगिल का घाव खाने के बावजूद जनरल परवेज मुशर्रफ को बातचीत के लिए आगरा बुलाया।

ये उनकी ही सरकार में पहली बार हुआ कि गैस सिलेंडरों की जमाखोरी खत्म हुई और गांव-गांव तक गैस कनेक्शन पहुंच गए। बुकिंग कराने के दो के अंदर ही सिलेंडर घर पहुंचने लगा, जबकि उसके बाद 2004 से 2014 तक यूपीए की सरकार में लोग एक-एक सिलेंडर के लिए तरसे। देश में वल्र्ड क्लास सड़कों का जाल बिछाकर उन्होंने विकास को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। नदियों को जोड़ने जैसा महाप्लान भी उन्हीं सात वर्षों की देन था।

हालांकि अटल जी को एक मजबूरियों से भरी सरकार चलाने का मौका मिला, लेकिन वो मजबूरी ही उनकी मजबूती बन गई और वो सभी दलों से ऊपर उठकर सर्वमान्य होते चले गए। आज भले ही एक से एक धुरंधर वक्ता राजनीतिक पार्टियों के पास हों, लेकिन अटल जी जैसी वाकपटुता, भाषण कला और शैली आज देश के किसी भी नेता के पास नहीं है। जब वो बोलने खड़े होते थे, तो पूरा सदन सुनता था, चुनावी सभाओं में सन्नाटा छा जाता था। उनका रुक-रुक कर बोलने का अंदाज लोगों को उनसे इस तरह जोड़ देता था कि पता नहीं उनके मुंह से अगली बात क्या निकल जाए।

पत्रकारों के लिए अटल जी का भाषण बेहद सहायक होता था। अटल जी अपने भाषण में ऐसे-ऐसे पंच छोड़ते थे कि हेडलाइन क्या हो ये सोचना नहीं पड़ता था। अटल जी अपने भाषण में चार-पांच हेडलाइन देकर जाते थे। ये उनका स्वाभाविक अंदाज था, इसके लिए वो कोई काॅपी राइटर या पीआर एजेंसी की मदद नहीं लेते थे। आज उनकी आवाज की सबसे ज्यादा कमी महसूस होती है।

ये संयोग ही है कि न केवल अटल बिहारी वाजपेयी और महामना मदन मोहन मालवीय के नाम एक साथ भारत रत्न के लिए घोषित हुए हैं, बल्कि उनका जन्म दिवस भी एक ही दिन 25 दिसंबर को होता है। और ये एक विडंबना ही है कि पाकिस्तान में मोहम्मद अली जिन्नाह और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का जन्म दिन भी 25 दिसंबर को ही पड़ता है

मोदी सरकार पर अपनों का वार!

अभी तक तो संघ परिवार से जुड़े संगठन ही अपनी कारस्तानियों से मोदी सरकारी की मुसीबतें बढ़ा रहे थे, लेकिन सरसंघचालक मोहन भागवत द्वारा कोलकाता में दिए बयान ने आग में घी का काम कर दिया। सरकार बने बमुश्किल छह महीने हुए हैं, राज्यसभा में बहुमत नहीं है, देश के सामने आर्थिक चुनौतियां हैं, आतंकवाद मुंह फैलाए देश को धमका रहा है, सीमाओं पर तनाव है, आम आदमी भ्रष्टाचार से त्रस्त है और कुछ संगठन बेमौसम के मुद्दे उछालकर मोदी सरकार के लिए रोज नई परेशानी पैदा कर रहा है।  

पिछले दस सालों में देश का मनोबल अपने न्यूनतम स्तर पर था, लोग ये कहने को मजबूर थे कि सबकुछ बदल सकता है, लेकिन भारत नहीं बदल सकता। ऐसे में 2014 चुनाव में मोदी के नेतृत्व में भाजपा को मिली ऐतिहासिक जीत के बाद देश की मनोदशा में बहुत तेजी से सुधार देखने को मिला। विश्व पटल पर भारत की नई छवि उभरी, अर्थव्यवस्था में सुधार दिखने लगा, महंगाई भी काफी हद तक औकात में आई, आम जनमानस की विचारधारा में एक आत्मविश्वास दिखने लगा, विपक्ष एक तरह से मुद्दा विहीन नजर आने लगाा, तब संघ परिवार से जुड़े संगठनों के क्रियाकलापों ने विपक्ष को बैठे-बिठाए मुद्दा दे दिया और अपनी ही सरकार को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया। नतीजा ये निकला कि शीतसत्र में राज्यसभा में न के बराबर काम हुआ है। देसी मीडिया ही नहीं विदेशी मीडिया भी हिंदू संगठनों के बयानों को बढ़चढ़कर उछाल रहा है, जिससे भारत की भी छवि खराब कर रही है।

मोदी जिस विजन के साथ देश के समक्ष खड़े एक-एक मुद्दे से दो-दो हाथ कर रहे हैं, उसको देखकर लगने लगा कि अब जल्द ही चीजें ऐसा मूर्तरूप लेती दिखेंगी जो देश को मजबूत बनाने वाली साबित होंगी। केंद्र सरकार द्वारा एक के बाद एक धड़ाधड़ उठाए गए सुधारात्मक कदमों से विपक्ष एक तरह से बौना दिखा। ऐसे अच्छे-खासे माहौल को कुछ संगठनों की नादानी भरी हरकतों ने जबरदस्ती खराब कर दिया। खबरें यहां तक आने लगीं कि प्रधानमंत्री मोदी ने इन बयानों से तंग आकर पद छोड़ने की धमकी दी है। ये घटनाएं एनडीए की पिछली सरकार की याद ताजा करती हैं। उन दिनों शब्दों की तीर वाजपेयी के सीने में लगते थे। मजेदार बात ये है कि संघ से जुड़े ये हिंदूवादी संगठन अपनी ही सरकार में मुखर और आक्रामक होते हैं, जबकि अन्य पार्टियों के राज में ये सुसुप्त अवस्था में काम करते हैं।

दरअसल हमारे देश की व्यवस्था और संस्कृति दोनों ही ऐसी हैं कि प्रधानमंत्री के पद पर बैठकर आप भेदनीति के साथ काम नहीं कर सकते। पद पर आसीन होने के बाद आपको राजधर्म का पालन हर हाल में करना है और भारत के पुरातन ग्रंथों ने इस राजधर्म की व्यवस्था उस समय दे दी थी जब लोकतंत्र के मां-बाप भी गर्भ में नहीं आए होंगे। आज अगर नरेंद्र मोदी सरकार उसी राजधर्म का पालन करते हुए देश को एक नई दिशा प्रदान करने की कोशिश कर रही है तो उसमें हर्ज क्या है?

ये बात सही है कि भारत अगर आज सेकुलर देश है तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है कि यहां 80 फीसदी से ज्यादा आबादी हिंदुओं की है, जिसकी मूल संस्कृति में ही सहिष्णुता भरी हुई है। हां, अगर आज भारत में हिंदू धर्म के बजाय कोई दूसरा धर्म बहुसंख्यक होता तो ये बात दावे के साथ कही जा सकती है कि भारत एक सेकुलर देश कभी नहीं होता। विश्व का कोई देश ऐसा नहीं है जहां बहुसंख्यक आबादी की इस तरह से अनदेखी की जाती रही हो जैसी भारत में होती है। अमेरिका जैसे तथाकथित विकसित और सबसे पुराने लोकतंत्र का राष्ट्रपति भी बाइबिल पर हाथ रखकर पद की शपथ लेता है, जबकि भारत में अगर कोई गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की भी मांग करे तो हो-हल्ला मच जाता है। ये हिंदू संस्कृति ही है जिसने हर धर्म को अपने यहां पनाह दी, क्योंकि यहां की मूल संस्कृति ही वसुधैव कुटुम्बकम की बात करती है। हिंदू सबको अपने परिवार का हिस्सा मानता ही नहीं, वह सबको अपनाने की क्षमता रखता है, यहां तक कि पेड़-पौधों, नदियों-पहाड़ों और पशुओं के साथ भी हमने रिश्ता जोड़ा हुआ है। अपने इसी स्वभाव के कारण हिंदुओं को कई स्तरों पर भारी नुकसान भी उठाना पड़ा। नुकसान यहां तक हुआ कि अपने ही देश में हिंदू होना, हिंदू हित की बात करना, शर्म की बात हो गई। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की ओछी राजनीति ने न केवल हिंदू हितों की अनदेखी बल्कि अल्पसंख्यकों के वोटों का भी जमकर दोहन किया। 

पर तमाम विपरीत परिस्थितियों को पार करते हुए आज हिंदू अपनी शक्ति को पहचानने लगा है या कहें कि हिंदू जागने लगा है। और इस जागरण में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का बहुत बड़ा योगदान है, संघ परिवार के अथक प्रयासों के बिना यह संभव ही नहीं था। देश को एक मजबूत सरकार का मिलना हिंदुओं की एकजुटता की ही देन है और गैरजरूरी बयानबाजी उसी सरकार को कमजोर बनाने का काम कर रही है। देश को नई दिशा देने का जो प्रयास किया जा रहा है उन प्रयासों को पटरी से उतारने में इस तरह के बयान मददगार साबित होंगे।

Sunday, December 14, 2014

गोलगप्पे की बात ही कुछ और है

चाट की दुनिया में गोलगप्पों का कोई तोड़ हो नहीं सकता। बिना कोई गरिष्ठता लिए, सीधा, सरल, प्यारा सा गोलगप्पा। दिखने में जितना गोलू-मोलू खाने में उतना की जायकेदार। बशर्ते उसका पानी जरा ठीक से बनाया गया हो। फिर बीच में चाहे आलू भरा हो या काला चना या फिर उबली मटर। मुंह में जाते ही खट्टे, मीठे, चटपटे स्वाद के साथ घुल जाता है। लेकिन अगर आप मुंह बड़ा करके नहीं खोल सकते तो इसे खाने से बचें या अकेले में ही खाएं।

चटपटा स्वाद, मजेदार नाम 
इसका स्वाद जितना चटखारेदार है उतने ही रोचक इसके नाम हैं। भारत के अलग-अलग हिस्सों में इसे कई मजेदार नामों से पुकारा जाता है, जैसे दिल्ली में गोलगप्पा, पश्चिमी यूपी में पानी के बताशे, बंगाल में फुचका, हरियाणा और पंजाब में पानी के पताशे, महाराष्ट्र और गुजरात में पानी पूरी, उड़ीशा में गुपचुप, मध्यप्रदेश में फुल्की जैसे नामों से फेमस हैं। हाल ही में आई क्वीन फिल्म में हिरोइन कंगना राणावत ने भी इन नामों का जिक्र किया है। इसके चाहने वाले भी हर उम्र में मिलते हैं। छोटे बच्चे जरूर इसका तीखा स्वाद नहीं झेल पाते, लेकिन टीन-एज से लेकर ओल्ड-एज तक इसके कद्रदानों की तादाद बहुत बड़ी है। हालांकि कुछ लोग ऐसे भी आपको मिल सकते हैं जो कहेंगे कि गोलगप्पे भी कोई खाने की चीज है (फिलहाल उनसे बहस करने का कोई मूड नहीं है)।

गोलगप्पे और नफासत!
गोलगप्पे खाने का तरीका परंपरागत देसी वाला ही अच्छा लगता है। मतलब हाथ में हो दोना (पत्ते वाला,प्लास्टिक का नहीं) और सामने वाला एक-एक करके खिलाए। प्लेट में पानी और गोलगप्पे रखकर खुद खाले वाला नफासती तरीका अपन को नहीं जंचता। हाथ में पन्नी पहनने तक तो ठीक है, लेकिन एक शादी में गए तो कैटरर ने नफासत की पूरी टांग ही तोड़ रखी थी। एक जगह गोलगप्पे और दोने रख दिए और दो जगह डिस्पेंसर में पानी भरकर रख दिया। टोंटी खोलो, गोलगप्पे में पानी भरो और खुद ही खाओ। जबरदस्ती की नफासत दिखाने के चक्कर में वहां लंबी लाइन लग गई और व्यवस्था डोल गई। न स्वाद आया न मजा, पानी गिरने से जूता गीला हुआ सो अलग।

सस्ता ही अच्छा
बात गोलगप्पे के दामों की करें तो ये इन दिनों दस रुपये प्लेट से लेकर साठ रुपये प्लेट तक मिलते हैं। लेकिन गोलगप्पा एक ऐसी चाट है जो महंगी नहीं जंचती। ये सस्ती और आम आदमी से जुड़ी हुई चीज है। आज के समय के हिसाब से दस रुपये से ज्यादा नहीं मिलनी चाहिए। लेकिन दिल्ली के कुछ ब्रांडेड फूड चेन इस सस्ती चाट को भी 60 रुपये में बेचकर गोलगप्पे की सादगी और स्वाद का अपमान करते हैं। अपनी तो यही राय है कि ऐसी जगह गोलगप्पे कभी नहीं खाने चाहिए। जबकि मेरठ में अच्छे से अच्छे गोलगप्पे 10-20 रुपये में ही मिलते हैं। हालांकि गोलगप्पे के लिए 20 रुपये भी ज्यादा हैं। क्योंकि गोलगप्पे गिनकर प्लेट के हिसाब से खाने की चीज नहीं है। एक बार खाओ तो तब तक खाओ जब तक मन न भर जाए। दिल्ली में रहकर मैं मेरठ के गोलगप्पे मिस करता हूं। आबूलेन के टी प्वाइंट पर डेरावाल चाट भंडार के गोलगप्पों का जवाब नहीं साहब। खट्टे, मीठे और हींग के पानी की तीन वैरायटी के  साथ, सस्ते और स्वादिष्ट।

हजारों गोलगप्पे वाले, लाखों गोलगप्पे
ये स्वादिष्ट चाट हजारों लोगों को रोजगार भी मुहैया कराती है। शहर की गलियों में हजारों रेहड़ी-फेरी वाले गोलगप्पे बेचकर अपने घर की गुजर-बसर करते हैं। बेरोजगारी की स्थिति में कोई नया काम शुरू करने के लिए ये एक कम इन्वेस्टमेंट वाला बिजनेस आइडिया है। अगर आपके हाथ में स्वाद, जुबान पर मिठास और रेट लाजमी हों तो ग्राहक खोजना कोई बड़ी बात नहीं। एक दिन मेरठ में राकेश जी के साथ मैंने बैठे-बैठे हिसाब जोड़ा तो पता चला कि शहर में प्रतिदिन तकरीबन तीन लाख गोलगप्पों की खपत है। ये अंदाजा उस समय और पुख्ता हो गया जब कहीं से ये खबर मिली कि शहर में एक गोलगप्पे की फुल्की बनाने वाला प्लांट लगने जा रहा है, जो शहर के सभी मशहूर गोलगप्पे वालों को उचित रेट पर रेडीमेड फुल्कियां मुहैया कराएंगे।

गोलगप्पे का ठेला और पुलिस
कभी-कभी गोलगप्पे का मोह मुझे कहीं भी ब्रेक लगाकर इनका स्वाद चखने को मजबूर कर देता है। पिछले दिनों घर लौटते वक्त वैशाली में गोलगप्पे का नया ठेला दिखा तो एक प्लेट आजमाने के लिए मैं वहां रुका। दस रुपये के पांच पीस दिए। रेट के हिसाब से उसका स्वाद ठीक-ठाक था। ज्यों ही मैं उसके पैसे देकर आगे बढ़ा तभी एक पुलिस जीप चैराह पर आकर रुकी और उसमें से एक रौबदार आवाज ने गाली का छौंक लगाकर गोलगप्पे वाले को अपने पास बुलाया। गोलगप्पे वाला थोड़ा झिझकता हुआ वर्दीधारियों के पास जा पहुंचा, कुछ सवाल-जवाब हुए, फिर एक नई गाली की टेक के साथ जोरदार तमाचे की आवाज आई। उत्तर प्रदेश पुलिस ने अपनी वीरता का परिचय देते हुए बीच चैराहे पर गोलगप्पे बेचने वाले उस युवक की इज्जत उतार दी। अगले दिन मैंने उससे पूछा तो उसने बताया कि स्टाल लगाने से पहले हल्का इंचार्ज से महीना तय नहीं किया था, अब मामला तय हो गया है। साहिबान ये आलम तक है जब केंद्र सरकार रेहड़ी-ठेले वालों के हितों की रक्षा के लिए स्ट्रीट वेंडर्स बिल पास कर चुकी है। पर सरकारी रक्षक उस बिल की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। गोलगप्पे वाले का कुसूर सिर्फ इतना है कि वो इज्जत और ईमानदारी से गुजर-बसर करना चाहता है। अगर वो भी नक्सलियों की तरह बंदूक उठा ले या अपराध की दुनिया में उतर जाए तो यही यूपी पुलिस उसके आगे दुम हिलाती नजर आएगी।

Saturday, October 11, 2014

कैसे बनेंगे आदर्श ग्राम!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आदर्श ग्राम योजना की शुरुआत एक सराहनीय कदम है। ये कदम बहुत लंबे समय से अपेक्षित था, लेकिन पहले अंग्रेजों ने और फिर आजाद भारत की सरकारों ने गांव को हमेशा उपेक्षित ही रखा। परिणाम ये निकला कि आज गांव खाली हो रहे हैं। एक ओर गांव जबरदस्त पलायन के शिकार है तो दूसरी ओर शहरीकरण की चपेट में आते जा रहे हैं। जिन सात लाख गांवों की बात गांधी जी किया करते थे आज की जनगणना के अनुसार उनकी संख्या घटकर 6,38,596 रह गई है। ऐसे में प्रधानमंत्री द्वारा सांसदों को गांव के काम पर लगाना कितने परिणाम ला पाएगा ये तो पता नहीं, पर कम से कम इस बहाने गांव एक बार चर्चा में जरूर आ जाएंगे। वोटों की संख्या कम होने के कारण गांव कभी नेताओं की प्राथमिकता पर तो नहीं रहे, पर प्रधानमंत्री ने अगर खुद सांसदों का फौलोअप रखा तो जरूर कुछ हो सकता है।

शहर में खो रहा गांव
शहर का रहन-सहन और वहां की चमक-दमक ने ग्रामीण भारत को भी अपनी तरफ खींच लिया है। गांव का खानपान, बोलचाल और पहनावे पर अब शहर का असर स्पष्ट दिखता है। ये अजीब सी विडंबना ही है कि जिसे देश में तकरीबन साढ़े छह लाख गांवों का शक्तिशाली बसेरा हो उसी देश में गांव का मतलब गंवार और पिछड़ेपन से समझा जाता है। गांवों की यही उपेक्षा वहां के निवासियों को या तो शहरों में खींच लाई है या फिर गांव में ही शहरी जीवनशैली अपनाई जा रही है। जैविकता और प्राकृतिक देन से भरपूर गांवों में अब प्लास्टिक, पक्के मकान, फास्टफूड और जीन्स का चलन आम हो गया है। शहरों को तवज्जो देने वाली हमारी व्यवस्था कुछ ऐसी है कि ग्रामीण भारत को कहीं न कहीं ये आभास कराया जाता है कि जहां वे रहते हैं, जो वे खाते हैं, जो वे बोलते हैं, जो वे पहनते हैं वो सब पिछड़ा हुआ है। कुछ-कुछ वैसा ही अहसास जैसा अंग्रेजों ने भारत को कराया था। जबकि मुझे ऐसा लगता है कि गांव का घर, कुएं, भोजन, भाषा और परिधान एक बहुमूल्य धरोहर हैं, अगर हमने इन पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाली पीढ़ी के लिए ये रिसर्च का विषय बन जाएंगे।

गांव को खा गई प्रधानी और शराब
गांव के सामाजिक ताने-बाने को तोड़ने में प्रधानी के चुनाव बहुत बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। प्रधानी के चक्कर में आज गांव के अंदर ऐसी वीभत्स राजनीति हो रही है कि शहर में बैठकर उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। इस राजनीति ने गांवों को कई टुकड़ों में बांट दिया है। रंजिशें और कत्ल बहुत आम हो गए हैं। पिद्दी से इलेक्शन के लिए लाखों रुपया बहाया जा रहा है। गांव वालों को लुभाने के लिए उपहार से लेकर शराब तक हर हथकंडा अपनाया जाता है। प्रधानी जीतने के बाद गांव के विकास के लिए जो रुपया आता है उसका कोई पारदर्शी हिसाब-किताब रखने वाला नहीं। इस तरह भ्रष्टाचार की राष्ट्रीय समस्या व्यवस्था की सबसे निचली इकाई में जड़ें फैला रही है। जो गांव कभी प्यार, सहयोग और सरलता के लिए जाने जाते थे उनमें अब घृणा, वैमनस्य और भ्रष्ट आचरण फैल गया है। रही सही कसर गांव में कुकरमुत्तों की तरह खुल रहे शराब के ठेकों ने पूरी कर दी। शराब की इतनी आसान उपलब्धता गांव तक पहुंचाने से पहले राज्य सरकार के मन में क्या सोच रही होगी कहा नहीं जा सकता।

निर्विरोध कराए जाएं चुनाव
केंद्र और राज्य सरकारों को पंचायती चुनावों की विश्लेषण के लिए देश भर में सर्वे कराना चाहिए जो ये बताए कि पंचायती राज व्यवस्था से गांवों को कितना फायदा और उनका कितना विकास हुआ है? मुझे नहीं लगता कि इक्का-दुक्का राज्यों को छोड़कर कहीं से भी अच्छी तस्वीर सामने आएगी। और अगर ऐसा सामने आता है तो पंचायती चुनाव की इस फिजूलखर्ची पर प्रतिबंध लगाया जाए। जिस तरह कुछ राज्यों ने शिक्षा की गुणवत्ता में हो रहे नुकसान को देखते हुए यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ चुनावों पर प्रतिबंध लगा रखा है उसी तरह पंचायती चुनावों पर भी पुनर्विचार किया जाए। यदि चुनाव बहुत ही जरूरी हों तो इसके लिए निर्विरोध वाली व्यवस्था बनाई जाए। अन्ना हजारे ने अपने गांव रालेगण सिद्धि में आदर्श ग्राम के लिए बेहद प्रेरणादायी प्रयोग किये हैं।

सबसे जरूरी मानसिकता का बदलाव
गांवों को आदर्श ग्राम बनाने के लिए सबसे जरूरी है मानसिकता में बदलाव। पंचायती चुनाव ने सकारात्मक बदलाव के स्थान पर गांव की मानसिकता में नकारात्मक बदलाव को बल दिया है। उत्तर प्रदेश के गांवों का तो ये हाल है कि अब आपसी सहयोग भी धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। केवल केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री की पहल से आदर्श ग्राम नहीं बन सकते। इसके लिए राज्य सरकारों, सांसदों, विधायकों और सबसे पहले खुद गांव वालों को पहल करनी होगी। गांधी जी ने जिस ग्राम स्वराज का सपना देखा था वो तो बहुत दूर की कौड़ी दिखता है। बहुत कुछ नहीं तो स्वच्छ, निर्मल व हरे-भरे गांव बनाने की दिशा में भी अगर सफलता मिल जाए तो ये बड़ी उपलब्धि होगी।

Thursday, September 25, 2014

मोदी का अमेरिका दौरा और भारत से बढ़ती अपेक्षाएं


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे से पहले ऐसी खबरें आ रही हैं कि ओबामा इस मुलाकात में मोदी से इस्लामिक स्टेट के खिलाफ चल रहे युद्ध में मदद मांग सकते हैं। इसे अमेरिका की कमजोरी समझा जाए या फिर उसकी एक और चालाकी। अमेरिका का स्वार्थ के बारे में कहा जाता है कि जब वो आपके हित की बात करता है तो उसमें कहीं न कहीं उसका हित छिपा होता है। सो, भारत से मदद की गुहार लगाने के पीछे भी निश्चित तौर पर उसका अपना ही स्वार्थ होगा।

भारत से क्या मतलब 
सवाल ये उठता है कि भारत अमेरिका का साथ क्यों दे? ऐसा अमेरिका ने भारत का विश्वास जीतने के लिए क्या किया है कि भारत अमेरिका के लिए अपने सैनिकों का खून बहाए। 90 के दशक में भारत में लगातार आतंकवादी हमले बढ़े तो भारत ने वैश्विक मंचों पर खड़े होकर अपनी आवाज उठाई और पूरे विश्व को आतंक के खतरे के खिलाफ आगाह किया। लेकिन पश्चिमी ताकतों के कान पर जूं नहीं रेंगी। किसी भी देश ने खुलकर आतंकवाद के खिलाफ भारत का समर्थन नहीं किया। उन्होंने इन हमलों की निंदा तो की, लेकिन कभी भारत को विशेष मदद नहीं दी। यहां तक कि पाकिस्तान में चल रही आतंक की फैक्ट्रियों को भी पश्चिमी देश अनदेखा करते रहे। 

जब खुद को दर्द हुआ
आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की आंख तब खुली जब आतंकवादियों ने न्यू याॅर्क के वल्र्ड ट्रेड सेंटर को मिट्टी में मिला दिया। उस दिन अमेरिका को ये एहसास हुआ कि आतंकवाद का दर्द क्या होता है। तब जाकर उसने अल कायदा के खिलाफ निर्णायक युद्ध छेड़ा। 9/11 के बाद भारत में भी अनेक आतंकी हमले हुए, लेकिन भारत ने उन्हें अपने अकेले के दम पर झेला और मुकाबला किया। भारत कभी किसी देश के सामने मदद के लिए नहीं गिड़गिड़ाया। और आज अमेरिका उसी भारत से मदद चाहता है, जिसके दर्द को कभी वो समझता नहीं था।

नहीं मानना चाहिए प्रस्ताव
अगर ऐसा कोई भी प्रस्ताव अमेरिका की तरफ से भारत के समक्ष रखा जाए तो उसे कतई स्वीकार नहीं करना चाहिए। ये युद्ध अमेरिका के ही बोए हुए बीजों का परिणाम है, सो फसल भी उसे खुद ही काटनी होगी। एशियाई देशों में अशांति और आतंक फैलाने के लिए अमेरिका ने ही कई संगठनों को पाला-पोसा था और आज वही संगठन नया रूप धरकर अमेरिका के खिलाफ लामबंद हो गए हैं। तो भारत उसकी मदद क्यों करे? 

नहीं बन सका विजेता
क्षेत्रीय अशांति को बढ़ावा देना अमेरिका की पुरानी नीति है, जिसके दम पर वो दुनिया का चैधरी बना हुआ है। भारत और पाकिस्तान के बीच अशांति बढ़ाने में भी अमेरिका ने कोई कमी नहीं की। पर आज यही नीति उसके सामने सबसे बड़ा खतरा बनकर खड़ी है। अफगानिस्तान और इराक में युद्ध लड़ते-लड़ते अमेरिका की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। हजारों सैनिकों की जान गंवाकर और खरबों डाॅलर खर्च करने के बावजूद अमेरिका विजेता नहीं बन पाया है और उसके सिर पर आतंक का खतरा लगातार मंडरा रहा है। इसलिए अमेरिका चाहता है कि अपनी डगमगाती नैया में कुछ सवार और चढ़ा लिए जाएं। अमेरिका अपनी लड़ाई को पूरे विश्व की लड़ाई बनाना चाहता है। चालीस देश उसके साथ आ चुके हैं और उसे अब भारत का भी सहयोग चाहिए।

दक्षिण एशिया की शांति
जब पूरे विश्व में जगह-जगह से हिंसा की ज्वालाएं सुलग रही हैं, ऐसे में दक्षिण एशियाई क्षेत्र लंबे समय से शांति और तरक्की की राह पर चल रहा है, खासतौर से भारत, चीन और जापान की स्थिति अमेरिका की आंख की किरकिरी बना हुआ है। इसलिए अमेरिका भारत को भी इस युद्ध में खींचना चाहता है। भारत और अमेरिका की दोस्ती नए शिखर पर पहुंचे ये हर भारतीय भी चाहता है और अमरीकी भारतीय भी चाहता है। पर उचित यही रहेगा कि ये दोस्ती अमेरिका के युद्ध कुचक्र से दूर रहे।

Tuesday, September 2, 2014

कृष्ण और राम से सीखें जनता के साथ ‘पर्सनल टच’ रखना

मधुबन में गोपियों संग रचाया गया रास भगवान कृष्ण की जीवनी का महत्वपूर्ण अंग है। रासलीला के बिना श्री कृष्ण की लीला अधूरी है। रास एक विशेष प्रकार का नृत्य होता है, जिसमें एक नायक होता है जो अनेक नायिकाओं के संग घूम-घूम कर नृत्य करता है। श्री कृष्ण को रास में महारथ हासिल थी। कहा जाता है कि श्री कृष्ण एक घेरे में नृत्य कर रही गोपियों के संग इतनी तीव्र गति से नृत्य करते थे कि प्रत्येक गोपी को यही लगता था कि कृष्ण केवल उन्हीं के संग नृत्य कर रहे हैं किसी और गोपी के पास जा ही नहीं रहे। जबकि वास्तविकता में श्री कृष्ण की गति इतनी तेज होती थी कि हर गोपी को यही लगता था कि कन्हैया केवल उन्हीं के साथ नृत्य कर रहे हैं। 

इसी प्रकार रामायण में भी एक ऐसा प्रसंग आता है जब भगवान राम पल भर में अनेक लोगों का अभिवादन
स्वीकारते हैं। लंका विजय के बाद जब श्री राम पुष्पक विमान से अयोध्या नगरी में पधारते हैं तो हजारों अयोध्यावासी नम आंखों के साथ उनके स्वागत में खड़े मिले। यहां भगवान राम ने ऐसी लीला रचाई कि वो प्रत्येक नगर वासी के साथ निजी तौर पर मिले। श्री राम हर नगरवासी का एक-एक करके अभिवादन स्वीकार करते हैं, पर उनकी गति इतनी तेज है कि इस काम में उनको बहुत देर नहीं लगी। और हर नगर वासी इस बात को लेकर खुश और संतुष्ट दिखा कि राम ने बड़े प्यार से निजी तौर पर उनके हालचाल लिये।

कहने का भाव ये है कि संबंधों में ‘पर्सनल टच’ हमेशा आपको करीब लाता है। लेकिन भारत में चली आ रही लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में शासन और जनता के बीच ये ‘पर्सनल टच’ मिसिंग है। 67 साल से ये हालात हैं कि आम जनता सरकार के साथ खुद को जुड़ा हुआ महसूस नहीं करती। अबकी बार आम चुनाव में जब नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया के साथ-साथ पूरे देश में घूम-घूम कर सैकड़ों रैलियों को संबोधित किया तो लोगों ने खुद को उनसे जुड़ा हुआ महसूस किया और परिणाम सबके सामने है। जरूरत इस बात की है कि सत्ता में बैठने के बाद भी शासक जनता के साथ जुड़ाव बनाए रखे। सत्ता के कोलाहल में जनता की आवाज दबनी नहीं चाहिए। लेकिन लोकतांत्रिक दस्तूर ऐसा रहा है जिसमें सत्ता मिलने के बाद जनता को हाशिए पर डाल दिया जाता है और पांच साल बाद ही उसकी सुध आती है। 

हाल ही मोदी सरकार ने http://mygov.nic.in/ पोर्टल की शुरुआत करके आम लोगों से जुड़ने का एक अच्छा प्रयोग किया है, पर सवा सौ करोड़ के देश के लिए ये प्रयास अभी छोटा है इसे और वृहद आकार देने की जरूरत है। इस तरह के प्रयास राज्यों के स्तर पर शुरू होने जरूरी है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री कार्यालय टेक्नोलाॅजी के स्तर पर इतने सशक्त होने चाहिए कि देश के प्रत्येक जिले के प्रत्येक गांव में क्या घटित हो रहा है इसकी पल-पल की जानकारी वहां उपलब्ध रहे। अभी हो ये रहा है कि जिला प्रशासन भी सूचनाओं के लिए मीडिया पर निर्भर रहता है, पीएम और सीएम तो बहुत दूर की बात है। टेक्नोलाॅजी के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकारें आम जनता के साथ इस तरह का पर्सनल टच स्थापित कर सकती हैं। इसके अलावा राजधानी की सीमाओं से बाहर निकलकर निजी तौर पर लोगों के बीच दौरा करने के बार-बार कारण खोजना भी शासक को जनता के साथ जोड़ता है। लेकिन, ‘मेरा इस जगह से गहरा रिश्ता है और यहां आकर मुझे बेहद खुशी मिली’ जैसे रटे-रटाये परंपरागत भाषण देने से काम नहीं चलेगा। अब समय है कुछ नया करने का।

Friday, August 15, 2014

पहले ही भाषण में दीवार गिरा दी मोदी ने!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लाल किले से पहला कैसा होगा, इसको लेकर मीडिया और लोगों के मन में तरह-तरह के कयास थे। और आज उनके पहले भाषण के साथ उन कयासों पर विराम लग गया। उनके पहले भाषण में कई विशेषताएं रहीं, उन पर तमाम चैनलों पर चर्चा शुरू हो चुकी है। लेकिन मुझे इस भाषण में आज तीन बातें खास लगीं, जो पूर्व प्रधानमंत्रियों में नहीं दिखीं।

गिर गई दीवार
प्रधानमंत्री मोदी के लाल किले से पहले भाषण में सबसे उल्लेखनीय बात ये रही कि सरकार और जनता के बीच खड़ी उस कांच की दीवार गिरा दिया गया जो दशकों से सुरक्षा के नाम पर प्रधानमंत्री और लोगों के बीच खड़ी कर दी जाती थी। देखने में ये बहुत सामान्य लगे लेकिन ये बहुत असामान्य घटना है। वह कांच की बुलेट प्रूफ दीवार आम लोगों के दिलों में एक असुरक्षा का भाव पैदा करती थी। बचपन में उस दीवार को देखकर यही भाव आते थे कि जब देश का प्रधानमंत्री ही सुरक्षित नहीं तो आम लोग खुद को कैसे सुरक्षित मान लें। वह दीवार हमारी सुरक्षा व्यवस्था पर एक प्रश्नचिन्ह थी, जिसे आज नरेंद्र मोदी ने हटा दिया। 

मुझे याद आता है कि इस दीवार को हटाने का प्रयास पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी किया था। जिस दिन वाजपेयी ने लाल किले से अपना पहला भाषण दिया था उसके अगले दिन अखबार में सूत्रों के हवाले से एक खबर आई थी कि उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों के समक्ष बुलेट प्रूफ केबिन हटाने की बात रखी थी। लेकिन सुरक्षा एजेंसियों ने प्रधानमंत्री की सुरक्षा में कोई भी जोखिम उठाने से इंकार करते हुए खुद प्रधानमंत्री की बात नहीं मानी। इससे नाराज वाजपेयी ने उस दिन नाश्ता नहीं किया और बुलेट प्रूफ केबिन से ही अपना भाषण दिया। सरकार और जनता के बीच की दीवार यूं ही खड़ी रही।

इस बार जब मोदी के प्रथम भाषण में बुलेट प्रूफ केबिन गायब दिखा तो हैरानी के साथ प्रसन्नता भी हुई। मोदी ने फिर एक बार अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय दिया, जिसके लिए वो जाने जाते हैं। उम्मीद है कि ये सिलसिला आगे भी जारी रहेगा और देश की सुरक्षा एजेंसियों में लोगों का विश्वास भी बढ़ेगा।

सिर पर राजस्थानी पगड़ी
भारतीय संस्कृति में सिर ढकने का एक विशेष महत्व रहा है। खास मौकों पर तो सिर को विशेषकर ढका जाता है। सिर ढकने का महत्व हर धर्म में माना गया है। हर धर्म में सिर ढकने के अपने-अपने तरीके हैं। हो न हो इसके पीछे कोई वैज्ञानिक आधार होगा। पुराने महापुरुषों के चित्रों को देखें तो ये स्पष्ट हो जाता है कि पहले सिर ढकने का कितना महत्व था। बालगंगाधर तिलक के चित्र को देखकर सोच होती है कि न जाने वो किस तरह अपनी पगड़ी बांधते होंगे। आज वैसी पगड़ी कहीं देखने को नहीं मिलती। भारत में तो हर राज्य की एक विशेष पगड़ी या टोपी होती है। लेकिन फैशन के इस दौर में पगडि़यों का महत्व धीरे-धीरे खत्म होता चला गया। लोगों को टोपी या पगड़ी सिर पर बोझ लगने लगी। यहां तक कि पंजाब में बड़ी संख्या में सिख युवा भी पगड़ी पहनने से परहेज कर रहे हैं। आजादी के बाद लंबे समय तक राजनेताओं की पहचान गांधी टोपी से की जाती थी, लेकिन अब वो भी विलुप्त हो चली है। ज्यादातर नेता अब नंगे सिर ही दिखते हैं।

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सेना और पुलिस के जवानों के बीच भी सिर पर विशेष पगड़ी पहनने की परंपरा है, पर लंबे समय से देश के प्रधानमंत्री बिना सिर ढके ही राष्ट्र को संबोधित करते आ रहे थे (हालाँकि इसमें डॉक्टर मनमोहन सिंह अपवाद हैं)। इस बार नरेंद्र मोदी ने राजस्थानी पगड़ी पहनकर एक अच्छी परंपरा शुरू की है। राजस्थानी पगड़ी शौर्य का प्रतीक है। उम्मीद है कि आने वाले सालों में वो अपने सिर पर अन्य राज्यों का भी प्रतिनिधित्व करेंगे।

छोटी-छोटी बातें
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पहले भाषण में साफ-सफाई, शौचालय, समय से आॅफिस आना, मेहनत से काम करने जैसे कुछ छोटे-छोटे मुद्दे उठाए। उन्होंने देश के माता-पिताओं से ये अपील भी करी कि वे जितनी लगाम अपनी बेटियों पर लगाते उतनी अगर अपने बेटों पर लगाएं ताकि देश को बलात्कार जैसी घिनौनी घटनाओं से शर्मिंदा न होना पड़े। देश के प्रधानमंत्री द्वारा इस तरह की अपील लोगों पर निश्चित तौर पर असर छोड़ती है। फिर ये उम्मीद की जा सकती है कि देश इन बातों को गंभीरता से लेगा। क्योंकि अकेली सरकार कभी बदलाव नहीं ला सकती, उसके साथ लोगों का खड़ा होना बहुत जरूरी है।

जय विज्ञान को भूले
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में लाल बहादुर शास्त्री को याद करते हुए उनके ‘जय जवान जय किसान’ नारे का जिक्र किया, लेकिन वो अटल बिहारी वाजपेयी के दिये ‘जय विज्ञान’ के नारे को भूल गए। ऐसा उन्होंने सोच समझकर किया या फिर यूं ही भूल गए, ये कहा नहीं जा सकता।

Friday, August 1, 2014

रफ्ता-रफ्ता आउट-डेटेड होती जिंदगी

छोटी सी जिंदगी में हम बार-बार आउट-डेटेड हो रहे हैं। कभी मोबाइल के बहाने, कभी टीवी के बहाने, कभी कपड़ों के बहाने, कभी खानपान के बहाने तो कभी अपनी सोच के बहाने। पिछली पीढ़ी को ये सुविधा उपलब्ध नहीं थी, जब उनको आउट-डेटेड कहा जाता था तब तक वे 60 के पार पहुंच जाते थे, पर अब आप टीन एज में भी आउटडेटेड कहलाए जा सकते हैं। हालत ये है कि आप आउट-डेटेड होने से बच नहीं सकते क्योंकि बाजार और टेक्नोलाॅजी आप से दस कदम आगे चल रहा है। बाजार के साथ कदमताल करने के लिए आपकी जेब में दम होना चाहिए। जेब में दम नहीं तो आप बाजार से पीछे तो रहेंगे, लेकिन खुद को सही साबित करने के लिए थोड़ा ज्ञान भी बांचेंगे और आपका ये ज्ञान फिर आपकी आउट-डेटेड सोच का परिचायक बन जाएगा।

नरेंद्र मोदी के प्रचार तंत्र के सामने कांग्रेस का प्रचार तंत्र एकदम आउट-डेटेड साबित हुआ, जैसे स्मार्ट फोन के सामने साधारण मोबाइल फोन आउट-डेटेड होते जा रहे हैं। अब तक शाहरुख खान की डीडीएलजे सबकी जुबान पर थी लेकिन ज्यों ही आलिया भट्ट अभिनीत ‘हम्प्टी शर्मा की दुलहनिया’ आई तो पता चला कि हमारे जमाने का प्यार करने का स्टाइल भी अब आउट-डेटेड हो गया है। शहर के व्यस्ततम चौक पर अपनी पुश्तैनी दुकान को एक शोरूम में तब्दील करके दुकानदारी पर बैठे लालाजी से अगर आप आॅनलाइन शाॅपिंग की बात छेड़ दो तो बुरी तरह फनफना जा रहे हैं और फ्लिपकार्ट, अमेजन, स्नैपडील जैसी साइट्स को जमकर गरियाकर उनका सामान फर्जी बता रहे हैं। पर वो ये स्वीकार करने को कतई तैयार नहीं कि वो और उनका शोरूम अब आउट-डेटेड हो गया है।

तो जी, फिर से बताएं कि खुद को आउट-डेटेड होने से बचाने के लिए आपके बटुए में दम होना जरूरी है। खानपान से लेकर बोलचाल तक, शाॅपिंग से लेकर बैंकिंग तक, मोबाइल से लेकर टीवी, फिल्मों से लेकर सीरियल्स, नेता से लेकर अभिनेता, लाइफस्टाइल से लेकर लविंगस्टाइल तक सब बहुत तेजी से बदल रहे हैं। इस तीव्र गति बदलाव के साथ कदमताल करना एक काॅमन मैन के बस की बात नहीं, इसके लिए सुपर मैन होना जरूरी है। दूसरा फाॅर्मूला ये है कि ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना’ वाले सिद्धांत को आत्मसात करते हुए आप अपनी गति से चलते जाएं और लोगों को अपनी जुबानी खुजली मिटाने का मौका देते रहे।

वैसे तो आपकी जिंदगी की डेट हर रोज आपके हाथ से निकल रही है, लेकिन उससे ज्यादा मतलब नहीं है। असली मतलब इस बात से है कि आप बाजार और टेक्नोलाॅजी के हिसाब से आउट-डेटेड न हो जाएं। वैसे भारतीय संस्कृति की बात की जाए तो हम भारतीयों की प्राथमिकता पर जिंदगी की डेट्स होनी चाहिए, पर एक विकासशील देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था की मजबूरियों और अंतर्राष्ट्रीय मानकों को ध्यान में रखा जाए तो राष्ट्र का हित इसी में है कि उसके नागरिक अपना ज्यादा से ज्यादा ध्यान बाजार और टेक्नोलाॅजी के हिसाब से खुद को अपडेट करने पर लगाएं।

हमारे ऋषि-मुनि तो बहुत पहले ही कह गए हैं कि बाबू ये संसार सब माया है ज्यादा चक्कर में मत पड़ना अगर संसार के ज्यादा चक्कर में पड़ोगे तो इह लोक तो खराब होगा ही परलोक भी बिगड़ जाएगा, इसलिए जिंदगी की डेट्स का ध्यान रखना और जितना वक्त इस दुनिया में आए हो प्रभु का भजन करते हुए सत्कर्मों में लगा देना। लेकिन हमारी सरकार और बाजारू ताकतें यही चाहती हैं कि आप खुद को बाजार के हिसाब से अपडेटेड रखें, इसी में देश और विश्व की अर्थव्यवस्था की भलाई है। यदि हर कोई अपनी जरूरतों को कम करके हरि भजन करने लग गया तो संसार की आर्थिक कश्ती डूब सकती है। बीच-बीच में कुछ धर्म धुरंधर बढ़ते उपभोक्तावाद के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद तो करते हैं, लेकिन ध्यान से देखने पर धर्म भी खुद बाजार की गिरफ्त में खड़ा मिलता है।

सो, अंत में गौतम बुद्ध के मध्यम मार्ग का ही सहारा लेना पड़ता है, के भैया इतना भी मत जुटाओ की बाजार के हिसाब से चलकर ईएमआई भरते-भरते कमरिया टूट जाए और इतने भी सिद्धांतों पर अडिग मत रहो कि दीन-हीन की श्रेणी में आ जाओ।

Saturday, July 12, 2014

उनके लिए, जिन्हें सरदार की मूर्ति पर ऐतराज है!


आम बजट में सरदार वल्लभ भाई पटेल की मूर्ति के लिए 200 करोड़ रुपये का प्रावधान होने के बाद सोशल मीडिया पर एक वर्ग तरह-तरह के तर्क देकर स्टैचु आॅफ यूनिटी का लगातार विरोध कर रहा है। हालांकि हर किसी को समर्थन और विरोध का निजी अधिकार है और इस अधिकार को छीना नहीं जा सकता। फिर भी कई बार विरोध केवल इसलिए भी किया जाता है कि आपको विरोध करना ही है। सो, जिन लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से विरोध लिया हुआ है, उनको विरोध करने से कोई नहीं रोक रहा, लेकिन क्या ये जरूरी है कि हर उस चीज का विरोध किया जाए जो नरेंद्र मोदी से जुड़ी है।

मुझे ऐसा लगता है कि ये मूर्ति जब बनकर तैयार हो जाएगी तो भारत की गौरव गाथा का हिस्सा बनेगी और इसका विशाल आकार एक नया इतिहास बनाएगा। ये सत्य है कि स्वतंत्रता के बाद से देश लगातार विभिन्न मोर्चों पर संघर्ष करता आ रहा है। गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, युद्ध, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, प्राकृतिक आपदाएं, कमजोर अर्थव्यवस्था जैसी समस्याओं से जूझते-जूझते, इस तरफ कम ही ध्यान गया कि देश में विशाल स्मारकों या भवनों का निर्माण भी किया जाए। भारत में आज जो भी ऐतिहासिक इमारतें हैं वे या तो हमें भारत के स्वर्णकाल से या फिर फिर मुगलों और अंग्रेजों के शासन काल से विरासत में मिली हैं। आजादी के उपरांत बहुत कम निर्माण ऐसे हुए जो भारतीय शिल्प विद्या का लोहा मनवा सकें।

जिन निर्माणों की भारत में प्रमुखता से चर्चा होती है उनमें एक तरफ कोणार्क मंदिर, जगन्नाथ मंदिर, मीनाक्षी मंदिर जैसी कुछ पौराणिक इमारतें हैं, तो दूसरी तरफ मुगल काल से मिले लाल किला, ताज महल, चार मीनार, बुलंद दरवाजा जैसे निर्माण। इसके अलावा ब्रिटिश राज में बने हावड़ा ब्रिज, राष्ट्रपति भवन, इंडिया गेट, गेटवे आॅफ इंडिया, विक्टोरियल मेमोरियल और संसद भवन जैसी इमारतें हमें अपनी गुलामी काल की याद दिलाते हैं। स्वतंत्र भारत में जो भव्य निर्माण हुए उनमें दिल्ली और अहमदाबाद के अक्षरधाम को छोड़कर कोई ऐसा भव्य निर्माण नहीं नजर आता जिस पर हम गर्व कर सकें।

जब भारत सरकार ने इस बजट में स्टैचु आॅफ यूनिटी और वाॅर मेमोरियल के लिए धन आवंटित किया है, तो कुछ लोग यह कहकर निंदा कर रहे हैं कि भारत जैसे गरीब देश में 200 करोड़ रुपये मूर्ति निर्माण में खर्च करना उचित नहीं है, तो कुछ लोग सरदार की मूर्ति की तुलना मायावती के मूर्ति प्रेम से कर रहे हैं। ये दोनों ही तर्क आधारहीन हैं। मायावती का मूर्ति प्रेम बिल्कुल अलग किस्म का है, मैं उसके विस्तार में जाना नहीं चाहता। और मायावती के पार्कों के निर्माण में जो खर्च हुआ था उसकी तुलना में तो सरदार की मूर्ति का खर्च बेहद छोटा है। दूसरी बात यह कि सरदार की मूर्ति अपने आप में एक विश्वरिकाॅर्ड कायम करने जा रही है और इसके निर्माण के दौरान तो रोजगार का सृजन होगा ही, निर्माण पूर्ण हो जाने के उपरांत भी पर्यटन के माध्यम से हजारों लोगों को रोजगार के अवसर मिलेंगे। सबसे बड़ी बात ये मूर्ति भारत की बढ़ती शक्ति का प्रतीक बनेगी।

जहां तक बात गरीबी की है तो 200 करोड़ रुपये में हम देश की गरीबी को नहीं मिटा सकते। भारत की अर्थव्यवस्था जिस तरह उभर रही है और जिस तरह की कल्याणकारी योजनाएं पिछली और वर्तमान सरकारों ने चलाई हैं, उसमें से अगर भ्रष्टाचार का पुट हटा दिया जाए तो हाशिए पर पड़े व्यक्ति को सशक्त करने में देश आज सक्षम है। पर हमारी व्यवस्था में लालफीताशाही का जंजाल और भ्रष्टाचार का पेट इतना बड़ा है कि किसी भी योजना का लाभ आम आदमी तक पहुंचते-पहुंचते मरणासन्न स्थिति में पहुंच जाता है। चाहे वह भ्रष्टाचार हो या फिर बेपनाह सरकारी खर्च, असली जरूरत इन गड्ढों को भरने की है, जिनमें देश का करोड़ों रुपया समा जाता है। सरदार की मूर्ति का विरोध करने से देश का कोई भला होने नहीं जा रहा।

Wednesday, July 2, 2014

ईएमयू ट्रेन का रसास्वादन


वैसे तो हर भारतीय ट्रेन में सफर का अपना अलग अनुभव और रोमांच होता है, लेकिन अगर आपने भारतीय रेल द्वारा चलाए जाने वाली ईएमयू या लोकल सेवा में सफर नहीं किया तो समझिए कि जीवन का एक बड़ा एक्सपीरिएंस मिस किया है। खचाखच भरी लोकल ईएमयू के फर्श पर अपने दो पैरों के लिए जगह बनाने में जो मशक्कत करनी पड़ती है उतनी अगर कोई जीवन के बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने में करे तो वो उसे अवश्य हासिल हो जाए। 2005-06 में जाॅब स्ट्रगल के दौरान ईएमयू में सफर का मौका मिला था। जिंदगी आगे बढ़ी और फिर ये मौका नहीं मिला। दिल्ली आने के बाद पिछले दिनों फिर ईएमयू में सफर का अवसर मिला और पाया कि ईएमयू की दुनिया जस की तस है, कोई खास फर्क नहीं पड़ा। सफर के दौरान आप अलग-अलग रसों का आनंद उठाते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़ते चले जाते हैं। ईएमयू में ऐसी तमाम चीजें होती हैं जो आपको विचलित कर सकती हैं, लेकिन अगर आप नजरिया बदलें तो उन चीजों में आपको मजा आने लगेगा। दिल्ली में जिसे ईएमयू कहा जाता है उसे मुंबई में लोकल कहकर पुकारा जाता है। वैसे ईएमयू का अर्थ होता है इलेक्ट्रिक मल्टिपल यूनिट। 

ज्ञान रस
ईएमयू ट्रेन में आपको छोटे-छोटे समूह में बैठी यात्रियों की बहुत बड़ी संख्या समसामयिक विषयों पर बहस करके अपनी ज्ञान क्षुधा को शांत करती दिख जाएगी। यात्रियों के बीच बतियाने के लिए सबसे हाॅट टाॅपिक ‘भारतीय राजनीति का उत्थान और पतन’ होता है। इंदिरा के जमाने से लेकर मोदी के सत्ता हथियाने तक का सफर इन यात्रियों को मुंह जुबानी याद होता है। बहस का स्तर कभी-कभी इतना गहरा हो जाता है कि रवीश कुमार को भी शर्म आ जाए। चुनाव से पहले ये यात्री कांग्रेस के आतंक से परेशान थे तो चुनाव के बाद अब इन्हें मोदी सरकार का कांग्रेसीकरण होता दिख रहा है। कभी बहस का विषय राजनीति से बदलकर महिलाओं पर भी फोकस हो जाता है, उसका स्तर कहां तक जाता है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। गाजियाबाद से दिल्ली की ओर जाने वाली ईएमयू में कभी-कभी एक हींग-गोली बेचने वाला भी आता है, जो एक डिब्बी गोली यात्रियों के बीच प्रचार करने के लिए यूं ही बांट देता है। इससे उसकी एक-दो डिब्बी बिक जाती हैं। लेकिन उसके जाने के बाद डिब्बे के अंदर जो वायु प्रकोप मचता है उससे न मोदी बचा सकते हैं और न मनमोहन। इससे बचने के लिए सांस रोकने की अच्छी प्रैक्टिस होनी चाहिए जो बाबा रामदेव का प्राणायाम करने से मिलती है।

भक्ति रस
ईएमयू में एक बड़ा ग्रुप उन भक्तों का होता है जो सफर के दौरान भजन गाकर अपना टाइम पास करते हैं। हर ईएमयू से आपको भजनों की आवाज सुनाई देगी। भजन प्रेमी यात्री किसी न किसी कीर्तन समूह से नाता जोड़ लेते हैं। इन समूहों का ग्रुप मैनेजमेंट पर आईआईएम रिसर्च कर सकता है। जहां से टेªन चलती है, वहां मंडली के लोग कुछ सीटें घेरकर दोनों तरफ की खिड़कियों पर अपनी मंडली की झंडी बांध देते हैं। अगले स्टेशनों पर समूह से जुड़े यात्री इन्हीं झंडियों को देखकर पता लगाते हैं कि उनके लोग किस डिब्बे में बैठे हैं और वे उसी डिब्बे में सवार हो जाते हैं। कीर्तन मंडली आधा-पौन घंटे के सफर के लिए भी अपने साथ पूरा तामझाम लेकर चलती है। किसी के बैग से मंजीरे निकलते हैं, किसी के बैग से झांझ, किसी के बैग में ढपली रखी होती है, तो किसी बैग से चालीसा और प्रार्थनाओं की पुस्तिकाएं। कुछ मंडली अपने साथ माइक और स्पीकर सिस्टम भी लेकर चलती हैं। मंडली के लोगों के एक डिब्बे में मिलते ही शुरू होता है संगीत का अखिल भारतीय कार्यक्रम। एक से एक नई तान छेड़ी जाती है, उनका गायन कुछ इसी तरह का होता है कि- न सुर है न सरगम है, न लय न तराना है, भगवान के चरणों में एक पुष्प चढ़ाना है। डिब्बे में बैठे जो भगवत प्रेमी हैं वे भक्ति रस में डूब जाते हैं और जो भजन प्रेमी नहीं हैं वे नाक-भौं सिकोड़कर कान में ईयरफोन लगाकर मोबाइल से पाॅप सुनने लगते हैं। कीर्तन मंडली दिन के हिसाब से भजन गाती है। कीर्तन की शुरुआत गुणपति बप्पा को समर्पित होती है, सोमवार को मंडली बाबा भोलेनाथ को मनाती है, मंगलवार को हनुमान चालीसा का जोरदार पाठ होता है, नवरात्रों को माता रानी की चैकी सजती है, कोई त्योहार आने वाला हो तो उसके हिसाब से अलग भजन, दिल्ली से मेरठ जाने वाली लंबी दूरी की डीएमयू में सुंदरकांड का पाठ किया जाता है। कुछ मंडलियां गायन के साथ-साथ नृत्य का आयोजन भी करती हैं और नृत्य भी ऐसा कि हर कोई देखने को मजबूर हो जाए। ज्यों ही मंडली का पड़ाव आने वाला होता है तो आरती के साथ कीर्तन का समापन किया जाता है। एक कार्यकर्ता पूरे डिब्बे में प्रसाद वितरण शुरू कर देता है। मंगल के दिन बूंदी और बाकी दिन मिश्री से काम चलाया जाता है। डिब्बे में बैठे कुछ भजन प्रेमी इस कार्यकर्ता को दान में कुछ रुपये देते हैं, जिनको अगले दिन का प्रसाद खरीदने या मंडली के लिए संसाधन जुटाने में इस्तेमाल किया जाता है। पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव से एक बार जब इस बारे में शिकायत की गई तो उन्होंने ट्रेन में होने वाले कीर्तन पर ये कहते हुए प्रतिबंध लगाने की बात कही कि इससे डिब्बे में बैठे दूसरे धर्म के लोगों की भावनाएं आहत होती हैं। लेकिन वो इसे अमलीजामा नहीं पहना पाएं, ट्रेन के पहियों की तरह रेलवे कीर्तन का सिलसिला लगातार जारी है।

हास्य रस
जो लोग ये सोचते हैं कि क्रिकेट और वीडियो गेम के जमाने में ताश खेलने का चलन देश से पोलियो की तरह खत्म हो गया है, तो वे बिल्कुल गलत हैं। वे लोग किसी दिन फुर्सत निकालकर दिल्ली की ईएमयू में सफर करें, ईएमयू के हर डिब्बे में उन्हें ताश का वल्र्ड कप खेला जाता नजर आएगा। खेल भी ऐसा कि आसपास वालों को जबरदस्ती अपना दर्शक बना ले। सीट नहीं मिली तो डिब्बे के फर्श पर बैठकर, सीट मिली तो चार लोग आमने सामने बैठे घुटनों पर बैग रखा या रूमाल बिछाया और फिर होने दो दो-दो हाथ। कोई भी चार डेली पैसेंजर आपस में खेलना शुरू कर देते हैं। तकरीबन 70 फीसदी डेली पैसेंजरों के बैग में बाकी कुछ मिले या न मिले पर ताश की गड्डी जरूर रखी मिल जाएगी। खेल के दौरान पत्ता इतनी जोर से फेंका जाता है मानों ओलंपिक के मैदान में भाला फेंक रहे हों, और पत्ता फेंकने के साथ मुंह से विशेष तरह की आवाज या फिर किसी चिरपरिचित गाली की टेक। साथ में ठहाकों की जबरदस्त गूंज।

प्रेम रस
दिल्ली से चलने वाली लोकल ईएमयू में एक बड़ी संख्या उन स्टूडेंट्स की भी होती है गाजियाबाद, फरीदाबाद, अलीगढ़, मथुरा आदि शहरों से अपनी पढ़ाई के लिए रोज अप-डाउन करती है। ये स्टूडेंट्स भी एक ग्रुप बनाकर सफर करते हैं। मोबाइल फोन की मदद से अलग-अलग स्टेशनों से चढ़ने के बावजूद ये सभी पहले से तय डिब्बे में ही बैठते हैं। ट्रेन के अंदर इन स्टूडेंट्स की अपनी एक अलग दुनिया होती है, बातचीत के अपने विषय होते हैं। लेकिन अगर इस ग्रुप अगर लड़कियां भी हों तो पूरे ग्रुप का अंदाज अलग ही होता है। ग्रुप के लड़के, लड़कियों को सुरक्षित महसूस कराने के साथ-साथ अपने मन में उमड़ रही एक तरफा प्यार की हिलोर को भी जाहिर करने का प्रयास करते नजर आते हैं। कुछ लड़के अन्य संसाधन होने के बावजूद जानबूझकर लोकल से इसलिए सफर करते हैं कि उनकी बैचमेट ईएमयू से काॅलेज जाती है। कई बार लोकल ट्रेन की लव स्टोरीज लंबी खिंचती हैं तो कभी सफर के साथ ही खत्म हो जाती हैं। खैर, स्टूडेंट्स के ये ग्रुप पूरी लोकल में सबसे ज्यादा उत्साहित और जीवंत होते हैं। उनकी आंखों में उम्मीदें होती हैं, भविष्य के सपने होते हैं।

मौन रस
ईएमयू में सफर के दौरान सबका अपना-अपना स्टाइल होता है। ईएमयू के सफर में प्रत्येक पैसेंजर को संविधान में मिले तमाम अधिकार और स्वतंत्रता बरतने का पूरा हक होता है। सफर करने का एक मूल नियम ये है कि आप किसी को डिस्टर्ब न करें। अगर आपकी भुजाओं में भीमसेन का दम हो तभी किसी को हिदायत देने का प्रयास करें। कोई कुछ भी कर रहा है उसे वो करने दें, वरना अगर आपने किसी को ज्ञान देने की कोशिश की या नफासत दिखाने की कोशिश की तो पलक झपकते ही आपकी नाक से खून का फव्वारा बहता नजर आएगा। फिर आपकी बाकी जिंदगी लोगों को ये बताने में बीतेगी कि आपकी नाक कैसे टेढ़ी हुई। इसलिए ईएमयू में अगर आप अकेले सफर कर रहे हैं तो तब तक मौन धारण करके रखें जब तक कि आपकी निजता को जबरदस्त रूप से भंग न किया जाए।

Tuesday, July 1, 2014

शादी से पहले और चुनाव के बाद!


शादी से पहले
बाॅलीवुड की फिल्मों से प्रेरणा लेकर 16 से लेकर 25 साल की उम्र में परवान चढ़ते प्रेम प्रसंग में प्रेमी रूपी पुरुष की हालत बेहद दयनीय होती है। उसके मन-मस्तिष्क में अपनी प्रियसी को पाने की इतनी तीव्र उत्कंठा घर कर जाती है कि प्रेमिका उसके जीवन का अंतिम लक्ष्य बन जाती है और वो मनसा, वाचा कर्मणा उसे प्राप्त करने की प्रतिज्ञा उठाकर सोता, जागता और विचरता नजर आता है। उसके हृदय की वीणा से निरंतर ऐसे स्वर फूटते हैं जो प्रतिपल उसकी प्रेमिका को आकर्षित कर उसे मंत्रमुग्ध कर देते हैं। इस अवस्था में प्रीतम अपनी प्रियसी के लिए हर वो कर्म करने के लिए तत्पर रहता है, जिससे प्रेमिका प्रसन्न हो। वो प्रेमिका के साथ तमाम सपने देखता और दिखाता है। वादों का ऐसा पहाड़ खड़ा करता है कि प्रेमिका उसकी वादियों में खो जाती है। और एक दिन ऐसा आता है जब प्रेमी अपनी प्रेमिका का पूरा विश्वास जीत लेता है और प्रेमिका उसे वरने के लिए तैयार हो जाती है। खुशी-खुशी दोनों का विवाह संपन्न होता है। सालों से हिलोरे ले रहे प्रेमी के हृदय में हनीमून के ख्याल मात्र से हजारों मयूर नृत्य करने लगते हैं। किसी हसीन से पर्यटक स्थल पर आखिरकार प्रेमी उन पलों का अनुभव करता है जिसका उसे न जाने कब से इंतजार था। प्रेमिका अपने प्रेमी के समक्ष संपूर्ण समर्पण कर देती है। कुछ समय दोनों एक हसीन दुनिया का अनुभव करते हैं। फिर शनैः शनैः समय बीतता है और प्रेमी का प्रेमिका के प्रति आकर्षण कम होने लगता है। प्रेमी के अंदर आ रहे बदलाव प्रेमिका को विचलित करते हैं। वो रह-रह कर प्रेमी को पुरानी बातें पुराने वादे याद दिलाती है, लेकिन प्रेमी हर बार हंस कर टाल देता है। और थोड़े समय में ही वो वक्त आ जाता है जब प्रेमिका को अपने पति से कहना पड़ता है- ‘‘सारे मर्द एक जैसे होते हैं’’!

चुनाव के बाद
देश के महापुरुषों से प्रेरणा लेकर परिपक्व उम्र में परवान चढ़ती राजनीतिक लालसा में सज्जन रूपी नेता की हालत बेहद दयनीय होती है। उसके मन-मस्तिष्क में सत्ता को पाने की इतनी तीव्र उत्कंठा घर कर जाती है कि जनता की वोट उसके जीवन का अंतिम लक्ष्य बन जाती है और वो मनसा, वाचा कर्मणा सत्ता प्राप्त करने की प्रतिज्ञा उठाकर सोता, जागता और विचरता नजर आता है। उसके हृदय की वीणा से निरंतर ऐसे स्वर फूटते हैं जो प्रतिपल आम जनता को आकर्षित कर उसे मंत्रमुग्ध कर देते हैं। इस अवस्था में नेता अपनी प्रिय जनता के लिए हर वो कर्म करने के लिए तत्पर रहता है, जिससे जनता प्रसन्न हो। वो जनता के साथ तमाम सपने देखता और दिखाता है। वादों का ऐसा पहाड़ खड़ा करता है कि जनता उसकी वादियों में खो जाती है। और एक दिन ऐसा आता है जब नेता अपनी प्रिय जनता का पूरा विश्वास जीत लेता है और जनता उसे वोट देने के लिए तैयार हो जाती है। पूरे जोश के साथ चुनाव संपन्न होता है। सालों से हिलोरे ले रहे नेता के हृदय में सत्ता के ख्याल आते ही हजारों मयूर नृत्य करने लगते हैं। एक खूबसूरत कार्यक्रम में शपथ ग्रहण करके आखिरकार नेता उन पलों का अनुभव करता है जिसका उसे न जाने कब से इंतजार था। जनता खुद को अपने नेता के समक्ष समर्पण कर चुकी होती है। कुछ समय नेता और जनता परिवर्तन का सुखद अनुभव करते हैं। फिर शनैः शनैः समय बीतता है और नेता का जनता के प्रति आकर्षण कम होने लगता है। नेता के अंदर आ रहे बदलाव जनता को विचलित करते हैं। वो रह-रह कर नेता को पुरानी बातें पुराने वादे याद दिलाती है, लेकिन नेता हर बार हंस कर टाल देता है। और थोड़े समय में ही वो वक्त आ जाता है जब जनता को अपने नेता से कहना पड़ता है- ‘‘सारे नेता एक जैसे होते हैं’’!

Monday, June 30, 2014

नया मंडी हाउस स्टेशन, नई सुविधाएं


मंडी हाउस स्टेशन के वाॅयलेट लाइन से जुड़ जाने के बाद वहां यात्रियों की संख्या खासी बढ़ गई है। आंकड़ेबाज बता रहे हैं कि राजीव चैक स्टेशन का 40 प्रतिशत भार मंडी हाउस की ओर सरक गया है। स्टेशन का नया हिस्सा सुंदर है और उसका कूलिंग सिस्टम पुराने हिस्से से ज्यादा बेहतर काम कर रहा है। नई चीज ये देखने को मिली कि डीएमआरसी ने दो बड़े-बड़े बोड्र्स पर आपके ज्ञान चक्षुओं को खोलने वाला मंडी हाउस इलाके का इतिहास उकेरा है। उस बोर्ड को पढ़कर ही पता चला कि जिस दूरदर्शन भवन में बैठकर अपन रोजी-रोटी कमा रहे हैं वो कभी मंडी के महाराजा की जागीर थी। इसी स्थान पर उनका भवन था जिसको मंडी हाउस कहा जाता था। 1970 में उनकी ये इमारत गिरा दी गई और दूरदर्शन भवन के निर्माण का रास्ता प्रशस्त हुआ।

इन दो डिस्प्ले बोर्ड्स पर आसपास की अन्य इमारतों जैसे फिक्की हाउस, एनएसडी, श्री राम सेंटर, टैगोर भवन आदि का इतिहास-भूगोल भी लिखा हुआ है। जिंदगी की रेस में शामिल मेट्रो यात्री इन बोड्र्स के पास से गुजरते वक्त अनायास ही रुक जाते हैं और कुछ पल ठहककर अपना ज्ञान वर्धन करते हैं।

इस स्टेशन से मेरे लिए दूसरा आराम ये हो गया है कि अब मुझे आॅफिस तक पहुंचने के लिए हिमाचल भवन वाली सड़क पार नहीं करनी पड़ती, पहले अपनी जिंदगी के दो मिनट मुझे दाएं-बाएं देखने में गंवाने पड़ते थे। अब स्टेशन के अंदर ही अंदर दूसरी तरफ बनी नई एग्जिट से बेड़ा पार उतर जाता है।

नए स्टेशन से तीसरा और सबसे अहम फायदा ये हुआ कि अब मुझे भारी जनसमर्थन मिल गया है। पहले वैशाली से आते वक्त मंडी हाउस स्टेश्न पर उतरने वाला अपने डिब्बे में मैं अकेला या दुकेला यात्री होता था। इसलिए खचाखच भरी मेट्रो में दरवाजे तक पहुंचने में काफी जद्दोजहद करनी पड़ती थी। किसी का पांव कुचलकर या किसी के पेट में कोहनी घुसाकर दरवाजा हाथ आता था। लेकिन अब बदरपुर की ओर जाने वाली बड़ी संख्या मेरे साथ मंडी हाउस उतरती है। ये लोग मेट्रो के दरवाजे पर भीम की तरह खड़े यात्रियों को पीछे ठेलने में काफी सहायक सिद्ध हो रहे हैं। तकरीबन बिना प्रयास के ही आप दरवाजे से बाहर खड़े नजर आते हैं।

तो नया मंडी हाउस स्टेशन मेरे लिए निजी तौर पर ये तीन सुविधाएं लेकर आया है। अब जब तक इधर नौकरी चलेगी सुविधाओं का आनंद लेते रहेंगे। इस बीच कोई नया जुगाड़ हो गया तो झोला उठाकर नई दिशा पकड़ लेंगे।

Thursday, June 12, 2014

शांति से निबटा पहला सत्र पर हंगामा तो होकर रहेगा


संसद का पहला सत्र नई सरकार और नए प्रधानमंत्री के लिए काफी हद तक सफल रहा। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लाए गए धन्यवाद प्रस्ताव पर दो दिन चली बहस में विपक्ष पूरी तरह बंटा हुआ दिखा। संसदीय परंपरा के मुताबिक राष्ट्रपति के प्रति आभार जताते वक्त प्रस्ताव का विरोध नहीं किया जाता और आम राय से इसे पारित कर दिया जाता है। लेकिन फिर भी विपक्ष सरकार द्वारा तैयार किए गए अभिभाषण में मीनमेख निकाल ही देता है। चर्चा के दौरान कांग्रेस ने अभिभाषण को भाजपा का मैनिफेस्टो और चुनावी नारे बताने की कोशिश की, और सरकार को ये भी बताया कि उसने कांग्रेस का माल उठाकर अपनी दुकान में रख लिया है। पर कांग्रेस के वक्ता ये समझाने में विफल रहे कि जब उनकी सोच देश के प्रति इतनी ही अच्छी थी तो उसका क्रियान्वयन क्यों नहीं किया? क्या केवल योजनाएं बना देने से ही देश का भला हो सकता है?

ममता और जयललिता के संसदीय सिपाहियों को सुनकर लगा कि वे संसद में नहीं बल्कि अपनी-अपनी विधानसभाओं में बोल रहे हों। दो दलों के नेता अपने भाषण में धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने से ज्यादा अपनी-अपनी नेताओं के गुणगान करने में ज्यादा व्यस्त दिखे। दोनों ही पार्टियों ने बातों-बातों में सरकार की तरफ दोस्ती के इशारे भी किये। चार सांसद लेकर संसद पहुंचे सपा के प्रमुख और एक मात्र वक्ता मुलायम सिंह यादव को जब कुछ नहीं सूझ तो उन्होंने बिना किसी ठोस सुबूत के 15 दिन पुरानी सरकार पर महंगाई बढाने का आरोप लगा दिया। आम आदमी पार्टी के वक्ता भी खास असर नहीं छोड़ पाए।

अमूमन बिना व्यवधान के चलने वाले धन्यवाद प्रस्ताव में भी बसपा राज्यसभा को दो बार दस-दस मिनट के लिए मुल्तवी करवाने में सफल रही। शुक्र है कि लोकसभा में हाथी के पास अंडा था इसलिए सदन निर्विघ्न चलता रहा। लोग इससे सीख ले सकते हैं कि संसद का पैसा और समय किस तरह बचाया जाए। वीके सिंह के ट्विीट पर सरकार की थोड़ी किरकिरी जरूर हुई पर अरुण जेटली ने मामले को संभाल लिया। लालकृष्ण अडवाणी और सोनिया गांधी ने चर्चा के दौरान चुप रहना ही बेहतर समझा।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने लोकसभा में और वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अपनी कुशल वाक शैली का लोहा मनवाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले भाषण बेहद बड़प्पन दिखाते हुए सधी हुई भाषा में बड़े प्यार से पूरे विपक्ष को आइना दिखा दिया।

संसद में होने वाली बहस की सबसे खूबसूरत बात यही है कि हर कोई अपनी-अपनी सहूलियत के हिसाब से किसी भी मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष में लामबंद हो जाते हैं। संसद की बहस से कम से कम ये तो सीखा जा सकता है कि कोई भी चीज पूरी तरह सही और गलत नहीं होती। कल तक धुर विरोधी रहे रामविलास पासवान पुरजोर तरीके से प्रधानमंत्री मोदी का पक्ष लेते नजर आए और राजग का अंग रहे जदयू के लिए आज मोदी से बड़ा गुनहगार कोई नहीं। राजनीति कुछ इसी तरह की चीज है कि राजनेता सबसे पहले अपना निजी हित साधते हैं, जब निजी हित सध जाए तो उसे राष्ट्रहित से जोड़ देते हैं। पल-पल अपना स्टैंड बदलने वाले क्षेत्रीय दलों पर ये बात खासतौर से लागू होती है।

हालांकि 2014 का जनादेश देखने के बाद तो लगता है कि लोग नेताओं के रंगों को समझने लगे हैं। कई दलों को शून्य पर लपेटकर जनता ने मौकापरस्ती और भ्रष्टाचार के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा जाहिर किया है। लोग 1998 से 2014 तक वाजपेयी और मनमोहन सरकार में टिड्डी दलों की ब्लैकमेलिंग देखते आए थे। राष्ट्रहित के फैसले लेने में भी किस तरह केंद्र सरकार मजबूर दिखती थी, वो मजबूरी के पल अब नहीं दिखेंगे। उम्मीद है कि अच्छे दिन आएंगे!

हालांकि आगे के सत्रों में विपक्ष सरकार का इतना सहयोग नहीं करेगा और हंगामा करने का कोई न कोई रास्ता जरूरत निकालेगा। जब हर स्तर पर मोदी सरकार नए प्रयोग करने के लिए आतुर है तो फिर संसद में समय की बर्बादी रोकने के लिए भी कुछ करना चाहिए। कुछ सुझाव ये भी हो सकते हैं-
  • सरकार और स्पीकर को संसदीय हंगामे पर जीरो टाॅलरेंस की पाॅलिसी अपनाएं।
  • सरकार और विपक्ष के बीच बेहतर तालमेल के लिए किसी भी मुद्दे को सदन में लाने से पहले बाहर चर्चा की जाए।
  • कार्यवाही में व्यवधान पैदा करने वालों और वेल में आने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाए।
  • एक दिन सदन स्थगित कराने पर सांसदों का चार दिन का वेतन काटा जाए, यात्रा भत्ता रद् किया जाए।
  • विवादास्पद मुद्दे सत्र के अंत में लाए जाएं।
  • सबसे ज्यादा हंगामा करने वाले सदस्यों को चिन्हित करके उनके चित्र संसद की वेबसाइट पर जारी किए जाएं।
  • सबसे अनुशासित सांसद के साथ-साथ सबसे गैर अनुशासित सांसद का खिताब दिया जाए।
पिछले दिनों अखबार में खबर पढ़ी कि संसद की कैंटीन में चाय के जबरदस्त सस्ते दाम देखकर नए - नए चुनकर आये एक सांसद ने चुटकी ली कि जब इतनी सस्ती चाय मिले तो सांसद बार-बार टी ब्रेक क्यों न लें। सांसद की इस बात में दम है। संसद की कैंटीन सबसे बेहतरीन भोजन तैयार करने वाली शायद भारत की सबसे सस्ती कैंटीन है। महंगाई को देखते हुए संसदीय कैंटीन की भोजन दरों में दस गुना इजाफा करने की आवश्यकता है। पहले सांसदों को मिलने वाला भत्ता और वेतन बहुत कम हुआ करते थे इसलिए ये सस्ती दरें रखी गई होंगी। लेकिन न तो अब सांसद गरीब हैं और न उनका वेतन कमजोर है। इसलिए संसद की कैंटीन को मुनाफे वाला आय का स्रोत बनाया जाए। सरकार चाहे तो संसद घूमने आने वाले स्टूडेंट्स के लिए सस्ता भोजन परोस सकती है।

Monday, June 9, 2014

यूपी में भाजपा किस पर लगाएगी दाव?


2014 के चुनाव में उत्तर प्रदेश से भाजपा को मिली सफलता को शतप्रतिशत कहा जा सकता है। क्योंकि जो सात सीटें पार्टी ने हारी हैं वे चेहरों पर आधारित सीटें थीं। अगर वे चेहरे उन सीटों से न खड़े होते तो ये सातों सीट भी भाजपा की झोली में गिरतीं। प्रदेश में हाशिए पर गए संगठन को अमित शाह की इंजीनियरिंग ने नई आॅक्सीजन प्रदान कर दी। सूबे में ऐसी मोदी सुनामी आई कि 73 सीटें झटक लीं और यहीं से केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार की बुनियाद बन गई।

अब पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि वह विधानसभा के स्तर पर भी कुछ ऐसा करिश्मा करे कि उत्तर प्रदेश को सपा के गुंडा राज और बसपा के भ्रष्ट राज से मुक्ति मिल सके। सपा-बसपा रूपी क्षेत्रीय ताकतों के सामने भाजपा 2007 और 2012 के विधानसभा चुनाव में लगातार तीसरे स्थान जगह बनाए हुए है। यूपी में पार्टी की इतनी बदहाली के लिए अंदरूनी कलह और लचर नेतृत्व जिम्मेदार है। वैसे यूपी में भाजपा की दुर्गति की सबसे बड़ी वजह मायावती से हाथ मिलाना भी माना जाता है। मायावती को तीन बार भाजपा ने मुख्यमंत्री बनाया और चैथी बार माया भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाकर 2007 में अपने दम पर पूर्ण बहुमत ले आईं। मायावती का प्रशासन सख्त था, अपराध पर लगाम लगी, लेकिन भ्रष्टाचार अपनी सारी सीमाएं लांघकर पराकाष्ठा पर पहुंच गया। लोग मायावती के भ्रष्टाचार से त्रस्त थे और हर हाल बदलाव चाहते थे। इस जनभावना को पहचानने में भी भाजपा विफल रही और 2012 में मजबूत विकल्प नहीं दे पाए, नतीजतन लोगों को युवा अखिलेश में ज्यादा संभावनाएं नजर आईं और सपा के हाथों में सूबे की बागडोर सौंप दी।

जैसा कि अंदाजा लगाया जा रहा था सपा की सरकार वैसी ही साबित हुई। पहले से भ्रष्टाचार की मार झेल रहे सूबे में अराजकता, अपराध और गुंडागर्दी का अभिशाप और जुड़ चुका है। अब तक अखिलेश यादव एक कमजोर मुख्यमंत्री साबित हुए हैं। यूपी में लोग बदलाव के लिए कितने उत्सुक हैं, ये उन्होंने इस लोकसभा चुनाव में बता दिया है। यही वो समय है जब भाजपा को संगठन स्तर पर ठोस फैसले लेने होंगे। 2012 के विधानसभा चुनाव में आंतरिक खींचतान के कारण भाजपा बिना नेतृत्व के ही चुनाव मैदान में कूद पड़ी थी। अमूमन भाजपा किसी भी चुनाव में अपना सीएम और पीएम कैंडिडेट चुनाव से पहले ही घोषित करती है, लेकिन यूपी में तब ऐसा नहीं किया गया।

अगला विधानसभा चुनाव अब 2017 में होना है। सपा सरकार इसी ढर्रे पर चलती रही तो पहले भी हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश में बदलाव लाने के लिए भाजपा को अभी से मेहनत करनी होगी। लोकसभा चुनाव ऐसे संकेत दे चुके हैं कि भाजपा का खोया हुआ वोटबैंक वापस आ गया है। पार्टी को लोकसभा चुनाव में कुछ 42.3 प्रतिशत वोट मिले। पार्टी ने सारी आरक्षित सीटें जीतकर बसपा को भी शून्य पर लाकर खड़ा कर दिया।

केंद्र में मोदी सरकार को राष्ट्रहित के फैसले लेने में आसानी हो, इसके लिए जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा राज्यों में भाजपा की सरकारें बनें। यूपी क्योंकि देश की आबादी में सबसे बड़ा योगदान देता है इसलिए यहां का पिछड़ापन दूर करना बहुत जरूरी है। प्रदेश में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपना सीएम कैंडिडेट चुनने में ही आएगी। यूपी में इस पद के कई दावेदार नजर आते हैं। पिछली बार राजनाथ सिंह और उमा भारती के बीच ये पद उलझ कर रह गया था। जिसका खामियाजा पार्टी ने भुगत भी लिया। जितनी जल्दी पार्टी अपना कैंडिडेट तय करेगी, उतना ही ज्यादा लाभ पार्टी को मिलने के आसार हैं।

उत्तर प्रदेश में दाव लगाने के लिए फिलहाल पार्टी के जो चेहरे हैं उनकी संभावना नीचे हैः

राजनाथ सिंहः एक बार यूपी की गद्दी संभाल चुके राजनाथ गृह मंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद छोड़कर यूपी जाएंगे ऐसा मुश्किल है। फिर भी अगर भाजपा उनको सीएम कैंडिडेट बनाती है तो इसका लाभ पार्टी को मिलेगा।

उमा भारतीः भाजपा एक बार फिर उमा को आगे कर चुनाव लड़ सकती है। उमा ने उत्तर प्रदेश में लंबे समय से काम भी किया है। पर इसके आसार कम ही हैं कि उमा गंगा पुनरुद्धार का महत्वाकांक्षी कार्य छोड़कर यूपी की डोर संभालें। गंगा अभियान उमा के दिल के करीब रहा है। उमा अगर गंगा सफाई का लक्ष्य पूरा करती हैं तो उनका नाम इतिहास में दर्ज हो जाएगा। हालांकि उनको कैंडिडेट बनाने से योगी भी अपनी दावेदारी पेश कर सकते हैं।

मेनका गांधीः सीएम की कुर्सी के लिए मेनका गांधी लीग से हटकर एक चेहरा साबित होंगी। भाजपा अगर मेनका को सीएम कैंडिडेट बनाती है, तो उनको लोगों का समर्थन मिल सकता है।

वरुण गांधीः यूपी में भाजपा के पास सबसे डायनेमिक चेहरा वरुण गांधी के रूप में है। पर उनका कम अनुभव बाधा बन सकता है। यूपी जैसे बड़े और जटिल प्रदेश को चलाने के लिए जोश के साथ अनुभव बहुत जरूरी है।

डाॅ. लक्ष्मीकांत वाजपेयीः लोकसभा चुनाव की सफलता के बाद वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी को भी सीएम कैंडिडेट के तौर पर देखा जा रहा है। वैसे वाजपेयी को किसी प्रदेश का राज्यपाल भी बनाया जा सकता है।

अमित शाहः यूपी वालों की खासियत होती है कि वे क्षेत्रवाद में विश्वास नहीं रखते। अगर अमित शाह को भाजपा यूपी में सीएम कैंडिडेट बनाती है तो लोग उनको अपनाने से गुरेज नहीं करेंगे। लोकसभा चुनाव में उनका काम और सफलता देखने के बाद ऐसी मांग उठने भी लगी हैं।

मुख्तार अब्बास नकवीः भाजपा का चर्चित मुस्लिम चेहरा हैं। हर समय मुस्लिम हितों की दुहाई देने वाले मुलायम सिंह यादव रामपुर के आजम खां को सीएम बनाने की जो हिम्मत नहीं दिखा पाए, भाजपा रामपुर के ही नकवी को सीएम कैंडिडेट बनाकर वो हिम्मत दिखा सकती है। यानि भाजपा चाहे तो सूबे को पहला मुस्लिम मुख्यमंत्री दे सकती है।

Tuesday, June 3, 2014

सड़कों पर सपनों की मौत

नई सरकार ने संसद का मुख देखने से पहले ही अपने वरिष्ठ मंत्री गोपीनाथ मंुडे को सड़क हादसे में खो दिया। एक ऐसा नेता जो जमीन से उठकर राजनीति के शिखर तक पहुंचा, जो अपने पीछे कठोर संघर्ष का इतिहास और प्रेरणा छोड़ गया। इस दुर्घटना में यदि उनकी मृत्यु न होती तो वो अवश्य कल महाराष्ट्र की सबसे ताकतवर कुर्सी पर बैठते। व्यक्ति के चले जाने के बाद उसके पीछे रह गए लोग शोक और संवेदनाओं के अलावा कुछ विशेष नहीं कर पाते। अकाल मृत्यु को ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करने के अलावा कोई चारा उनके पास नहीं बचता। लेकिन सड़क दुर्घटनाएं भारत में इतना बड़ा अभिशाप बन गई हैं कि अगर इन पर गंभीरता से विचार करके ठोस कदम नहीं उठाए गए तो देश इसी तरह अपने नागरिकों से हाथ धोता रहेगा।

युद्ध से बड़ा खतरा
भारत में सड़क दुर्घटनाएं युद्ध से भी बड़ा खतरा हैं। भारत ने अब तक जितने युद्ध लड़े उनमें इतनी जानें नहीं गंवाईं जितनी हम हर साल सड़क दुर्घटनाओं में गंवा देते हैं। एनसीआरबी के आंकड़े इस बारे में भयावह आंकड़े पेश करते रहे हैं। इससे भी दुखद बात ये है कि इन सड़क हादसों में सबसे ज्यादा मौत युवाओं और बच्चों की दर्ज होती हैं। ये किसी भी देश के लिए सबसे शर्मसार करने वाला और चिंताजनक तथ्य है। भारत की सड़कों पर सुरक्षा मानकों के साथ किस हद तक लापरवाही बरती जाती है ये बताना तो बेमानी ही है। पर  दुर्घटना में केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती, उसके साथ उसके परिवार, उसके सपनों और तमाम संभावनाओं की भी मौत हो जाती है। 

एनसीआरबी के भयावह आंकड़े
वर्ष         सड़क दुर्घटना में मौत
2008 118239 
2009 126896
2010 133938
2011 136834
2012 139091

नई सरकार के लिए चुनौती
भाजपा सरकार को पहले ही दिन रेल हादसे से दो-चार होना पड़ा था। और अब अपने मंत्री की सड़क हादसे में मौत के बाद सरकार को दुर्घटनाओं पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है। देश में नए-नए हाई स्पीड नेशनल हाईवे बनाए जा रहे हैं, एक्सप्रेस वे बनाए जा रहे हैं, विदेशों से हाईस्पीड गाडि़यां आयात करने का रास्ता आसान किया जा रहा है, मलाईदार सड़कों पर टोल-टैक्स लगाकर सरकार जमकर चांदी भी छाप रही है। वहीं जब आप सड़क दुर्घटनाओं पर नजर डालें तो ये सब मौत के सरकारी इंतजाम लगते हैं। इसका मतलब ये भी नहीं है कि देश को फिर से बैलगाड़ी युग में धकेल दिया जाए, लेकिन कम से कम इस दिशा में कुछ ऐसे ठोस कदम उठाए जाएं कि दुर्घटनाओं की संख्या घटे।

जनजागरण जरूरी
जिस देश के नागरिक हेलमेट पहनने में अपनी तौहीन समझते हों, बंद रेलवे फाटक पार करना वीरता समझा जाता हो, अत्यधिक तेज गति में गाड़ी चलाना फैशन हो, ट्रैफिक लाइट तोड़ना फख्र की बात हो और विदेशी गाडि़यों में बैठकर सड़कों पर रेस लगाना स्टेटस सिंबल समझा जाए, उस देश में एक्सीडेंट्स को रोक पाना नामुमकिन है। फिर भी यदि जनजागरण के साथ सड़कों पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाएं तो काफी जानें बच सकती हैं। हालांकि ये काम काफी मुश्किल है, पर अगर लगातार अभियान चलाने से देश का वोटिंग परसेंट बढ़ाया जा सकता है तो एक्सीडेंट परसेंट भी घटाया जा सकता है।

सरकार के स्तर पर जो पहल हो सकती है

  • बच्चों को लाइसेंस देने में सख्ती
  • मोटरसाइकिल निर्माता उनमें अधिकतम स्पीड 50 करें से ज्यादा न हो
  • हाई स्पीड विदेशी गाड़ियों के आयात पर लगाम कसे 
  • हाईवे पेट्रोलिंग पुलिस का गठन किया जाए
  • हाईवे पर ट्राॅमा सेंटरों की स्थापना 
  • हाईवे पर एयर एंबुलेंस से सर्विस सुविधा
  • हाईवे पर सबको एक्सीडेंट बीमा
  • मदद करने वालों को पुलिस प्रताड़ना से सुरक्षा
  • प्राइवेट अस्पतलों को एक्सीडेंटल केस में बिना फीस जमा कराए तत्काल कदम उठाने के निर्देश

मेट्रो का विस्तार
यदि देश के पब्लिक ट्रांस्पोर्ट पर नजर डालें तो मेट्रो अब तक कि सबसे सुरक्षित यात्रा सेवा साबित हुई है। दिल्ली में मेट्रो चलते 10 साल से ज्यादा हो गए हैं, और कोलकाता मेट्रो उससे भी पुरानी है, लेकिन आज तक कोई बड़ा हादसा सामने नहीं आया है। दिल्ली मेट्रो में कुछ मामले आत्महत्या के जरूर हुए हैं, पर एक्सीडेंट मेट्रो के स्तर पर हुआ हो ऐसा सुनने को नहीं मिला। यदि देश में इस तरह का सुरक्षित पब्लिक ट्रांसपोर्ट को विस्तार दिया जाता है तो इन हादसों पर काफी हद तक लगाम कसी जा सकती है।

राम राज्य की बात
देश में समय-समय पर राम राज्य की बात अक्सर उठा करती है, तो राम राज्य के बारे में बता दें कि उस राज्य का एक पक्ष ये भी था कि उस समय अकाल मृत्यु नहीं हुआ करती थीं। 21वीं सदी में राम राज्य का ये पक्ष आधुनिक सरकारें कैसे दे पाएंगी ये उन्हीं को तय करना है। ये भी याद रहे कि दुर्घटनाएं बड़ा और छोटा नहीं देखतीं, ये किसी के भी साथ कहीं भी घट सकती हैं।

Saturday, May 31, 2014

नई सरकार और भारत के गांव

भारतीय शहर और गांव में इतना बड़ा अंतर है कि उन्हें देखकर ये लगता ही नहीं कि वे एक ही देश के हिस्सा हैं। भारतीय गांव की असली तस्वीर किसी पेंटिग में बनी गांव की सुंदर सी तस्वीर से बिल्कुल विपरीत है। गांवों और शहर के विकास के लिए केंद्र सरकार ने  अलग-अलग मंत्रालय खड़े किये- शहरी विकास और ग्रामीण विकास मंत्रालय। जहां तक शहरी विकास का मामला है तो वह तो खुली आंखों से स्पष्ट नजर आता है, लेकिन अगर गांव के विकास की बात करें तो वह केवल किसानों की जमीन अधिग्रहण तक ही नजर आता है। जब भी सरकार कोई भी नया काॅलेज या अस्पताल खोलने की घोषणा करती है तो वह शहर के लिए ही होती है, यानि हर काम के लिए गांव वाले ही शहर आएं। इसका विपरीत कभी होते नहीं देखा। यहां तक कि देश के नेताओं को भी अगर चुनावी रैली करनी है तो वह शहर में ही होगी, गांव में जाकर रैली करना केवल किसी विशेष अवसर पर ही होता है। 67 साल की आजादी में गांवों को मुख्य धारा से जोड़ने के दावे और वादे तो बहुत हुए पर गांव अभी भी बहुत उपेक्षित हैं। अब अच्छे दिन देने का वादा करके देश में नई सरकार आई है। लोगों में उत्साह है और उनकी नए प्रधानमंत्री से ‘महा‘ अपेक्षाएं हैं। ऐसे में गांव के कुछ मुद्दों को उठाने का प्रयास-

गांव की राजनीतिः राजनीति जब राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो तो अच्छी होती है, लेकिन अगर वही राजनीति गांव और घर में होने लगे तो बेहद घातक सिद्ध होती है। इसके दुष्परिणाम सामने आने भी लगे हैं। पंचायती राज व्यवस्था बनाई तो गई थी गांवों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए, लेकिन इस व्यवस्था ने कितना वीभत्स रूप अख्तियार किया है, ये उत्तर प्रदेश के कुछ गांवों में जाकर देखें। आपसी प्रेम, सौहार्द और सहयोग पर टिका गांव का समाज गांव की राजनीति के कारण पूरी तरह बिखर चुका है। आपसी सहयोग की भावना पैसे की दौड़ में खत्म होती चली जा रही है। ऐसे में गांवों में होने वाले प्रधानी के चुनावों पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। महात्मा गांधी ने जिस ग्राम स्वराज की अवधारणा देश को दी थी वो वर्तमान पंचायती राज व्यवस्था कभी नहीं दे सकती। सही मायने में गांधी के ग्राम स्वराज को वास्तविकता में उतारने का प्रयोग अगर किसी ने किया है तो वह अन्ना हजारे ने रालेगण सिद्धि और उसके आसपास के गांव में कर के दिखाया है। नई सरकार को ग्रामीण भारत के उत्थान के लिए पंचायती राज व्यवस्था पर नये सिरे से सोचना चाहिए। गैर सरकारी संगठन और सीएसआर ग्रामीण उत्थान में बड़ा सहयोग कर सकते हैं। बस जरूरत यही है कि जो भी योजना या कदम उठाए जाएं उनमें गंभीरता हो, सिर्फ पैसे कमाने और नेतागीरी के उद्देश्य से काम न हो।

किसान और खेती को सम्मानः ग्लैमरस नौकरियों के इस दौर में ग्रामीण युवा के बीच खेती के प्रति तेजी से अरुचि पैदा हो रही है। गांव का युवा अब हल चलाना नहीं चाहता, उसको भी शहर में अच्छी नौकरी की दरकार है। बड़ी तादाद में ग्रामीण युवा इस दिशा में सफल भी हो रहे हैं, सरकारी और निजि क्षेत्र दोनों में अपना परचम लहराया है। इनमें अधिकांश मामले उन युवाओं के हैं, जिनके परिवारों की माली हालत पहले से ठीक-ठाक होती है। इधर जिन युवाओं का शहर में नौकरी का सपना पूरा नहीं हो पाता वो भी खेती-किसानी से कतराता है। भले ही पूरे देश को किसान की उपजाई फसल के कारण दो वक्त की रोटी नसीब होती हो, लेकिन खेती करना समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता है। इसलिए नई सरकार को खेती को प्रोमोट करने की दिशा में ध्यान देना चाहिए। गांव से तेजी से हो रहा पलायन रोकने के लिए उनके आसपास ही रोजगार हों। खेती के साथ-साथ उनके हाथ में जो हुनर है उसको नजदीक में ही बाजार मिले। ऐसे तमाम उदाहरण इसी देश में उपलब्ध हैं जहां बड़ी-बड़ी नौकरियां छोड़कर लोगों ने खेती करना बेहतर समझा। खबरें आ रही हैं कि सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश पी. सताशिवम् रिटायरमेंट के बाद दिल्ली में रहने के बजाय तमिलनाडु स्थित अपने गांव जाकर खेती करेंगे।

उपजाऊ जमीन और विकासः ये भी अजीब विडंबना है कि भारत में सिमेंटीकरण की प्रक्रिया को ही विकास का मापदंड समझा जाता है। जिस इलाके में जितना ज्यादा सीमेंट ठुका है यानि वो उतना ही विकसित है। कच्चे छप्पर वाले घर पिछड़ेपन की निशानी बन गए हैं। सिमेंटीकरण को बढ़ाकर शुरू हुआ विकास का दौर इस कदर फैल रहा है कि गांव की खेतीहर भूमि को भी कब्जे में लेता जा रहा है। रीयल एस्टेट की छतरी के नीचे फैल रहा हाई राइज अपार्टमेंट कल्चर दिल्ली से निकल कर एनसीआर, फिर एनसीआर से निकल कर वृहद एनसीआर और वृहद एनसीआर से निकल कर छोटे-छोटे शहरों की उपजाऊ जमीन कब्जाता जा रहा है। आलम ये है कि मेरठ जैसे उपजाऊ जिले के किसानों ने भी थोड़े से लाभ के लिए बड़े पैमाने पर अपनी खेती की जमीन रीयल एस्टेट के हाथों बेच दी और बेच रहे हैं। इसी तरह 160 किलोमीटर लंबे नवनिर्मित यमुना एक्सप्रेस वे के दोनों तरफ हजारों एकड़ उपजाऊ जमीन को भी अर्बन जोन में तब्दील करने की भी महायोजना है। इतनी बड़े स्तर पर उपजाऊ जमीन का सीमेंटीकरण करना न केवल पर्यावरण की दृष्टि से बल्कि कृषि उत्पादन की दृष्टि से भी नुकसान दायक साबित होगा। जबकि जरूरत इस बात की है कि देश में ऐसी भूमि को चिन्हित किया जाए जो अनउपजाऊ और बेकार पड़ी हैं। नए टाउनशिप, इंडस्ट्रियल एरिया डेवलप करने से पहले इलाके का सर्वे कराकर बेकार और बंजर जमीन को प्राथमिकता दी जाए। हालांकि ये थोड़ा जटिल कार्य होगा, पर अगर ध्यान नहीं दिया गया तो परिणाम आगे लिखे हैं।

काॅस्मेटिक फूड-काॅस्मेटिक जेनरेशनः मेरठ में पत्रकारिता के दौरान एक बार सेंट्रल पटैटो रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीपीआरआई) के एक वैज्ञानिक का इंटरव्यू लेने का मौका मिला। बातचीत करते-करते हाइब्रिड बीज और जीएम बीज तक पहुंची। मैंने उनसे पूछा कि आजकल के अनाज में वो पहले वाली खुशबू क्यों नहीं है। गेहूं की रोटी, अरहड़ की दाल और बासमती चावल में वो पहले जैसी बात कहां चली गई? क्या ये हाइब्रिड बीजों का नतीजा है। उन्होंने न लिखने की शर्त पर बताया कि ‘देश की जनसंख्या लगातार तेजी से बढ़ रही है और उपजाऊ जमीन उतनी ही तेजी से घट रही है। ऐसे में सरकार की पहली प्राथमिकता है इतनी बड़ी जनसंख्या का पेट भरना। इसलिए सरकार का मुख्य ध्यान पैदावार पर है, गुणवत्ता पर नहीं। यानि क्वांटिटी प्राथमिकता है क्वालिटी नहीं। हाइब्रिड और जीएम बीजों की मदद से पैदावार में जबरदस्त इजाफा देखने को मिला है‘। पर्यावरणविद् समय-समय पर जीएम फूड के नुकसानों की ओर ध्यान खींचते रहे हैं। एक और नुकसानदायक प्रत्यक्ष उदाहरण पंजाब में देखने को मिलता है जहां अच्छी पैदावार के चक्कर में केमिकल फर्टिलाइजर और पेस्टिसाइड्स के प्रयोग से वहां कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इस तरह का अन्न खाकर देश की आने वाली पीढ़ी कैसी होगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। नए पर्यावरण मंत्री ने बयान तो दे दिया कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, लेकिन असलियत तो यही है कि विकास पर्यावरण की कीमत चुकाकर ही होता है। अब ये नई सरकार को तय करना है कि वो सिमेंटीकरण के विकास का अनुसरण करे या फिर विकास के नए अर्थ गढ़े। 

गोधन और जैविक खादः खेती और गौपालन को समाज में सम्मान दिलाना बहुत जरूरी है। व्हाइट काॅलर जाॅब का आकर्षण गांव के युवाओं को खेती और गौपालन से खींच रहा है। अच्छी खेती के लिए गायों का बड़े स्तर पर पालन होना चाहिए उनका कटान नहीं। गायों का पालन हर दृष्टि से लाभदायक है, इसे बार-बार बताया गया है। बच्चों के लिए दूध से लेकर किसान को जैविक खाद प्रदान करने तक गायें हर तरह से अर्थव्यवस्था में लाभदायक है। जरूरत इस बात की है कि गौपालन का काम भी समाज में सम्मान से देखा जाए। अन्यथा सिंथेटिक दूध, दही और पनीर खाकर बढ़ रही पीढ़ी कितनी मजबूत होगी ये कहना मुश्किल है। सरकार चाहे तो शहरों में घरों से निकलने वाला कचरा और नदियों की सफाई में निकलने वाले कचरे को भी जैविक खाद् में तब्दील कर किसानों को मुहैया करा सकती है।

गांव की संस्कृतिः इसे बाॅलीवुड का असर ही कह सकते हैं कि गांव का नाम सुनकर जो पहली तस्वीर बनती है वो है एक हरा-भरा, साफ-सुथरा स्थान जहां सीधे-सरल लोग रहते हैं। जबकि सच्चाई इसके उलट है। न तो गांव उतने हरे-भरे रहे और न साफ-सुथरे। गांव की राजनीति ने वहां के लोगों को भी सीधा और सरल नहीं रहने दिया है। वो तो भला हो पाॅपुलर के पेड़ों से मिलने वाले आर्थिक लाभ का कि कई गांवों में इन पेड़ों की वजह से हरियाली फिर लौट आई है। फिर भी हर गांव की अपनी एक संस्कृति होती है, जो शहरीकरण की होड़ और दौड़ में खोती जा रही है। वहां की बोलचाल, भाषा, वेशभूषा तथाकथित माॅडर्न कल्चर की भेंट चढ़ती जा रही है। इसे घर-घर लगे टेलीविजन का ही असर कहें या आधुनिक दिखने की होड़ कि गांव की अपनी बोली का स्थान एक सभ्य खड़ी हिंदी लेती जा रही है, वहां का खानपान बदल रहा है, पहनावा बदल रहा है। हालांकि बदलाव अवश्यंभावी है और उसको स्वीकार किया जाना चाहिए, लेकिन किस हद तक ये सोचना होगा!

Sunday, May 18, 2014

भारत में बदलाव की बयार

एक दौर था जब भारत एक गरीब देश था, और उसके नेताओं के पास लोगों को देने के लिए सिर्फ आश्वासन और वादे थे। भाषण देते वक्त वे खुद भी जानते थे कि वादों को पूरा कर पाना संभव नहीं। लेकिन अब देश की स्थिति इतनी कमजोर नहीं है। देश के आर्थिक हालातों में बेहद सुधार आया है। इन्हीं सुधारों के आधार पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 2020 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का सपना संजोया था। मगर बीच में यूपीए के दस सालों में ये सपना कहीं खो सा गया। इतनी बेहतरीन परिस्थितियों में भी अगर आज नेता अपने वादों को पूरा नहीं करते हैं तो इसका मतलब है कमजोर इच्छाशक्ति और खराब नियत। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की तूफानी जीत ने पूरे देश में एक नया आत्मविश्वास भरा है, एक नई उम्मीद जगाई है। स्वयं मोदी ने अपने भाषणों में जो विजन पेश किया है उनसे सुधार आने की संभावना जगी है। जिस तरह मोदी की जीत सुनिश्चित करने के लिए तमाम संगठनों ने एकजुटता के साथ काम किया उसी तरह अगर भारत को सचमुच विश्वगुरू बनाना है तो उसके लिए समाज के हर वर्ग को एकजुटता के साथ काम करना होगा और सबसे पहले खुद को बदलना होगा।

बदलाव का समय, राह नहीं आसानः स्वामी विवेकानंद से लेकर श्री राम शर्मा आचार्य तक कई मनीषियों ने इस बात की घोषणा की थी कि 2011 के बाद भारत में बड़े परिवर्तन आएंगे और भारत विश्व गुरू बनकर उभरेगा। 2010 से भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए तमाम आंदोलनों के साथ इन बदलावों की शुरुआत हुई। भाजपा की जीत होगी इस बात को लेकर सब आश्वस्त थे, लेकिन इतना प्रचंड जनादेश मिलेगा इसका अनुमान भाजपा को भी नहीं था। इस जबरदस्त जीत के पीछे मोदी की मेहनत के साथ-साथ ईश्वर की कृपा भी दिखती है। अच्छी बात ये है कि मोदी अब तक देश के अन्य प्रधानमंत्रियों की तरह बड़ी-बड़ी बातें करने के बजाय छोटी-छोटी बातें लोगों को समझा रहे हैं, जो लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी हैं। उन्होंने लोगों से साफ-सफाई पर ध्यान देने का आह्वान किया है, उन्होंने सरकारी कर्मचारियों से मन लगाकर काम करने की बात कही है, उन्होंने गंगा में गंदगी न फेंकने की अपील की है। अमूमन एक प्रधानमंत्री स्तर का व्यक्ति इस तरह की बातें नहीं करता था। मोदी को इस चुनाव में केवल जनसमर्थन ही नहीं मिला जनश्रद्धा भी मिली है। अपने जुझारू व्यक्तित्व के चलते वो लोगों के बीच श्रद्धा का पात्र बनते जा रहे हैं। जितने आरोप मोदी पर लगे, जितनी उंगलियां उन पर उठाई गईं, जितना द्वेष उनके प्रति फैलाया गया यदि किसी दूसरे के खिलाफ फैलाया गया होता तो वो कब का खत्म हो जाता। लेकिन मोदी खुद को मजबूत और मजबूत करते गए। आज उनके विरोधियों के मुंह पर ताले जड़ गए हैं। उन्हें ये समझ नहीं आ रहा है कि अब कौनसा हथियार चलाएं। बहरहाल, मोदी ने अब तक जिस तरह लोगों से सीधा संवाद स्थापित किया है, उसको प्रधानमंत्री के तौर पर भी जारी रखने की जरूरत है। किसी ऊंचे पद पर बैठकर लोगों से कट जाना सबसे बड़ी भूल होती है। दूसरी ओर मोदी को पार्टी के भीतर भी सादगी और जनसेवा का भाव जगाना होगा। फाइव स्टार कल्चर एक बार पहले भी भाजपा को भारी पड़ चुका है। देश की मिडिल क्लास जनता को ये कतई गले नहीं उतरता कि उनका जनप्रतिनिधि हाई प्रोफाइल जिंदगी में मस्त रहे।

एमपी नहीं पीएमः मोदी को अपने सभी सांसदों को भी ये अहसास दिलाना होगा कि कि उन्हें एमपी नहीं बल्कि अपने क्षेत्र के पीएम की तरह काम करना है। अधिकांश सांसद जीतने के बाद न्यूनतम जनसंपर्क करते हैं। जिस तरह का जनसंपर्क वो चुनाव के दौरान करते हैं उसका आधा भी अगर वो पांच साल तक करते रहें तो संसदीय क्षेत्र की तस्वीर बदल जाए। हर सांसद अगर अपने क्षेत्र के लोगों के साथ मिलकर वहां की समस्याओं को एक-एक करके सुलझाने का बीड़ा उठाए तो बड़े बदलाव आ सकते हैं। लेकिन होता इसके उलट है, सांसद महोदय बाहर जाने के बजाय घर पर जनता दरबार लगाते हैं, फिर दिन में निमंत्रण निबटाना, कहीं फीता काट दिया, तो कहीं नारियल तोड़ दिया, स्थानीय अखबार में रोज फोटो छप जाए इसका जुगाड़ करना, अमूमन इसी सबको राजनीति समझा जाने लगा है। राजनीति का मतलब लाल बत्ती, अर्दली, गनर, माइक, भाषण, सफेद गाड़ी, खादी का कुर्ता पयजामा ये सब बनकर रह गया है। जबकि देश अब नई किस्म की राजनीति चाहता है।

करियर नहीं सेवाः अधिकांश पार्टियों का ये हाल है कि स्थानीय नेता राजनीति को करियर की तरह लेते हैं। उनको अपने पीछे सत्ता की ताकत चाहिए, थाने कचहरियों में सुनवाई हो सके ऐसी हनक चाहिए, एक सामाजिक सुरक्षा चाहिए। उसी उद्देश्य को लेकर सबसे पहले व्यक्ति किसी पार्टी का कार्यकर्ता बनने की कोशिश करता है, कार्यकर्ता बनते ही टिकट पाने की कोशिश करता है, टिकट मिलते ही मंत्री बनने की जुगत भिड़ाता है और मंत्री बनते ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजर टिका देता है। इस सबके बीच जो सामाजिक बदलाव का मूल काम है वह पीछे छूटता चला जाता है। जरूरत इस बात की है कि स्थानीय नेताओं का काम सुनिश्चित करना होगा। सरकार का मुखिया कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर उसकी बनाई योजनाओं का लाभ जिला स्तर तक नहीं पहुंच पा रहा, तो लोगों का रोष लाजमी है। संगठन को जिला स्तर पर मथने की सबसे ज्यादा आवश्यकता है, क्योंकि लोगों से सीधा जुड़ाव वहीं से बनेगा। जिला कार्यकारिणी का विजिनरी होना बेहद जरूरी है। इस दिशा में भाजपा को ही नहीं बाकी पार्टियों को भी काम करना चाहिए।

कांग्रेस को सबकः कांग्रेस को जनता ने इस बार जबरदस्त सबक सिखाया है। कुछ लोग इसे बाबा रामदेव का श्राप भी कह रहे हैं। जिस तरह चाणक्य ने अपने अपमान का बदला लेने के लिए चंद्रगुप्त के माध्यम से मगध का सिंहासन हिला दिया था, उसी तरह रामलीला मैदान में हुए अपने अपमान के बाद रामदेव ने भी कांग्रेस को सत्ता-विहीन करने का संकल्प ले रखा था। खैर, भाजपा की जबरदस्त जीत के बाद इस तरह के तमाम प्रसंग फेसबुक और लोगों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं। लेकिन इतनी बड़ी ऐतिहासिक हार के बाद कांग्रेस का पुनःउत्थान किस प्रकार हो ये पार्टी के समक्ष एक यक्ष प्रश्न है।

योजनाएं हैं योजनाओं का क्या: कांग्रेस के हार के पीछे सबसे बड़ा कारण उसके भ्रष्टाचार, घोटाले, महंगाई और वे तमाम विफलताएं हैं जिनकी वजह से भारत को बदनामी झेलनी पड़ी। आलम ये था कि अगर सुप्रीम कोर्ट, मीडिया और सामाजिक संगठनों ने सक्रिय भूमिका न निभाई होती तो न जाने स्थिति कितनी भयावह होती। इसमें कोई दो राय नहीं सोनिया और राहुल गांधी की पार्टी के अंदर जबरदस्त पकड़ है और उनके शब्द ही अंतिम माने जाते हैं, लेकिन सोनिया और राहुल ने अपनी ये ताकत खुद के मंत्रियों के भ्रष्ट क्रियाकलापों को रोकने में इस्तेमाल नहीं की। अगर राहुल और सोनिया सही सोच के साथ चाह लेते तो मंत्रियों के भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा सकती थी, लेकिन प्रतीत ऐसा हो रहा था मानो उन्होंने पार्टी नेताओं को खुला हाथ दे रखा है। कांग्रेस से ‘खाओ और खाने दो’ की नीति की बू आ रही थी। राहुल गांधी अपनी रैलियों में जिन कानूनों और योजनाओं की बार-बार बात कर रहे थे, वे लोगों के गले नहीं उतर रहे थे। क्योंकि योजनाएं बनाना एक बात है और उनको जमीन पर उतार कर दिखाना दूसरी। लोगों को पता था कि सारी जनकल्याणकारी योजनाएं अंततः भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं। देश को व्यवस्था परिवर्तन चाहिए कानून परिवर्तन नहीं। छद्म धर्मनिर्पेक्षता के नाटक ने भी बहुसंख्यक समाज को कांग्रेस से खासा नाराज किया। खुद अल्पसंख्यकों को भी स्पष्ट नजर आने लगा था कि धर्मनिर्पेक्षता का राग अलाप कर कांग्रेस केवल माइनोरिटी कार्ड खेलती है और उसमें सचमुच अल्पसंख्यकों के कल्याण की भावना नहीं है।

महात्मा गांधी की शरण में कल्याणः कांग्रेस को वर्तमान परिस्थितियों में केवल एक शख्स बचा सकता है और वह है महात्मा गांधी। कांग्रेस सालों से गांधी का नाम तो इस्तेमाल करती आई है, लेकिन उनका अनुसरण लेशमात्र भी नहीं दिखता। पार्टी कार्यकर्ताओं में सेवा भाव और देश प्रेम से ज्यादा पद प्रेम दिखता है। हाई प्रोफाइल कल्चर और लोगों से दूरी बनाकर रखना भी हार का कारण है। प्रचार के दौरान भी पार्टी के स्टार प्रचारक कार्यकर्ताओं के घर में ठहरने के बजाय होटलों में ठहरना पसंद करते हैं। जबकि महात्मा गांधी की कांग्रेस में कार्यकर्ताओं को संगठन चलाने और लोगों की सेवा करने के लिए विशेष ट्रेनिंग दी जाती थी। कांग्रेस सेवा दल के कार्यकर्ता पूरे जोश के साथ लोगों के सुख-दुख में खड़े रहते थे। लेकिन आज की कांग्रेस में सेवा दल को सबसे कम तवज्जो दी जाती है।

अध्ययन अवकाशः राहुल गांधी को कुछ महीने तक केवल महात्मा गांधी के साहित्य का अध्ययन करना चाहिए। महात्मा ने भारत के विकास के लिए जिस तरह का माॅडल दिया था उसको वर्तमान परिस्थिति में किस प्रकार उतारा जाए, गांवों को आत्मनिर्भर बनाने और उनका विकास करने के लिए जिस प्रकार का सपना देखा था उसे कैसे साकार किया जाए ये देखना होगा। गांव पलायन की समस्या से बुरी तरह जूझ रहे हैं, गांव के युवाओं में खेती के प्रति अरुचि तेजी से बढ़ रही है, जो खतरनाक संकेत है। राजीव गांधी ने ग्राम पंचायतों को मजबूत करने की दिशा में जरूर गंभीर कदम उठाए लेकिन वे कदम दिल्ली से गांव तक पहुंचते-पहुंचते कुरूप होते गए। ग्राम पंचायत चुनावों ने गांव के सामाजिक तानेबाने को तोड़कर रख दिया है। गांव की घटिया राजनीति वहां के सौहार्द को खाती जा रही है। दूसरी ओर शराब गांव की पहले से खराब अर्थव्यवस्था को और ज्यादा नष्ट कर रही है। जबकि महात्मा गांधी के माॅडल में शराब के लिए बिल्कुल जगह नहीं थी। इस तरह के तमाम मुद्दे हैं जिन्हें कांग्रेस को महात्मा गांधी के चश्मे से देखने की जरूरत है। 

आम आदमी पार्टी का भविष्यः कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ समाज में जनजागरण लाने का श्रेय अगर किसी को जाता है तो वह है अन्ना हजारे का आंदोलन और उनका सत्याग्रह। लेकिन इस आंदोलन से जन्मी अरिवंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी सत्ता मिलने पर कोई खास करामात नहीं दिखा पाई। दिल्ली के लोगों ने आम आदमी पार्टी के पक्ष में अभूतपूर्व परिणाम दिए। गली-मोहल्लों से निकले मामूली आंदोलनकारियों ने पहले से स्थापित मठाधीशों के सिंहासन हिला दिए। लेकिन अरिवंद केजरीवाल अपने 49 दिनों के शासन में पूरी तरह कंफ्यूज दिखे। उन्होंने मीडिया के कंधों का सहारा लेकर सरकार चलाने की कोशिश की। 49 दिनों में एक भी दिन ऐसा नहीं रहा जब दिल्ली में हंगामा न रहा हो और इन हंगामों में गंभीरता कम और ड्रामा ज्यादा नजर आई। चाहे वह बंग्ले का मुद्दा हो, मेट्रो में सफर का मुद्दा हो, जनता दरबार हो, या फिर उनका मफ्लर। पहले से स्थापित संस्थाओं और परंपराओं को तोड़ने की कोशिश की। कई चीजों पर तो एकदम बचकानी जिद दिखाई। अब जब किसी बिल पर चर्चा करने के लिए असेंबली है तो क्या जरूरी है कि जनलोकपाल बिल कुतुब मीनार की छत पर बैठ कर पास किया जाए। हद तो तब हो गई जब उन्होंने देश के गौरव का प्रतीक गणतंत्र दिवस परेड पर प्रश्न चिन्ह लगा दिए। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर भी उंगलियां उठाईं। दरअसल नकारात्मक राजनीति करते-करते वो खुद को सच्चाई का मसीहा और बाकी सब को चोर साबित करने में जुटे रहे। जब काम करने का वक्त आया तब भी खुद को आंदोलनकारी दिखाने की कोशिश करते रहे। वो मीडिया के माध्यम से खुद को हीरो दिखाने की कोशिश कर रहे थे और मीडिया उन्हें मसालेदार खबरों के लिए इस्तेमाल कर रही थी। जब मीडिया उन पर टाइट हुई तो कहने लगे मीडिया वाले भी चोर हैं और सबको जेल में डलवा दूंगा। जबकि महोदय खुद पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ भगत सिंह के नाम पर इंटरव्यू फिक्स कर रहे थे।

नकारात्मक राजनीति से बचेंः आम आदमी पार्टी को यदि अपना आधार बचाना है तो उसे दूसरों पर कीचड़ उछालने के बजाय कुछ करके दिखाना होगा। उसे विपक्ष के तौर पर अपने लिए एक सकारात्मक भूमिका तलाशनी होगी, जिसमें ड्रामेबाजी कम और गंभीरता ज्यादा दिखे। बड़े पैमाने पर सामाजिक कार्यों को अपनाना होगा। उन क्षेत्रों में काम करना होगा जिन पर अक्सर सरकार नहीं कर पाती। अगर सचमुच अरविंद केजरीवाल देश और समाज को बदलना चाहते हैं तो उसके लिए प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की कुर्सी की कोई आवश्यकता नहीं है, वो बाहर रहकर भी बहुत बड़ा बदलाव ला सकते हैं। देश में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। छोटी-छोटी चीजों पर ध्यान देकर बड़े-बड़े बदलाव किए जा सकते हैं। चुनावी राजनीति भी करते रहे अगर जनादेश मिले तो गंभीरता से सरकार चलाकर दिखाएं। इतना तो तय है कि देश करवट ले रहा है, आने वाला समय बहुत बड़े बदलावों का समय होगा, उसमें आम आदमी पार्टी अपने लिए क्या भूमिका तय करती है ये उसी को देखना है।